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 इसके लगभग सभी महत्वपूर्ण नेता फेसबुक, ब्लाग, ट्वीटर, यूटयुब आदि के जरिए आम आदमी में अपनी आवाज पहुचा रहे हैं। गैर सरकारी संगठनों ने भी सोशल मीडिया का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए फेसबुक पर आंदोलन सा छेड़ा गया है। चाहे वह 16 दिसंबर की दिल्ली की वीभत्स ब्लात्कार कांड के खिलाफ आवाज हो या फिर छतीसगढ में पुलिस की बर्बरता और ब्लात्कार की शिकार सोनी सोरी हो। ये सारे घटनाक्रम सोशल मीडिया की ताकत और व्यापकता बताने के लिए काफी हैं।

सोशल मीडिया के माध्यमों में सबसे आगे फेसबुक है।

बदलते वक्त के साथ कुछ माध्यम पीछे छूट गए हैं जैसे वाल पेंटिंग। इसकी पश्चिम बंगाल की राजनीति में अच्छा खासा असर था। पर बाद में चुनाव आयोग की सख्ती के चलते वाल पेंटिंग लगभग खत्म से हो गए। 10-15 साल पहले परिवार नियोजन, सरकारी योजनाओं का विज्ञापन घरों की दीवारों पर किया जाता था। इन प्रचारों से घर की दीवारें रंगी होती थीं। अब इनमें कमी आयी है। वक्त बदला, दौर बदला और इसके साथ माध्यम बदले।

सोशल मीडिया इंटरनेट युग की देन है। पिछले 15 वर्षों में सूचना क्रांति आयी है। सोशल मीडिया इसी सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति का परिचायक है। इसके द्वारा काफी कम खर्चे में ही पूरी दुनिया में अपनी आवाज पहुॅचायी जा सकती है। ऐसे में भविष्य इस माध्यम का है। 16वीं लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया का अभूतपूर्व इस्तेमाल देखने में आ रहा है।

इंटरनेट के इस्तेमाल से जुड़े नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, विश्व में अमेरिका, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, युनाइटेड किंगडम, फ्रांस आदि देश इसके इस्तेमाल (प्रतिशत के हिसाब से) में सबसे आगे हैं। वहीं भारत में अभी इंटरनेट बमुश्किल 14-15 प्रतिशत लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। बिहार में इसकी स्थिति और भी खराब है।

आलोचकों का मानना है कि 2004 के लोक सभा के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की हार इसलिए हुई क्योंकि वह इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर बैठी। उन दिनों प्रमोद महाजन के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी इंडिया शायनिंग का सघन अभियान चला रही थी।

वैसे 2004 से 2010 तक में 10 वर्षों का अंतर आ चुका है। उस समय से काफी किशोर वय के बच्चे आज के युवा बन गए हैं और उसमें से कितने ही पहली बार वोट देने की स्थिति में आ गए हैं।   साथ ही इस दस सालों में मोबाइल क्रांति अपने उफान पर पहुंची है। पहले इंटरनेट कम्प्युटर और लैपटाॅप का गुुलाम था, पर मोबाइल क्रांति ने उसे इस गुलामी से आजाद कर दिया है। और इंटरनेट और सोशल मीडिया को घर-घर में पहॅुचा दिया है।

इंटरनेट इस्तेमाल से जुड़े नए आंकड़ें बता रहे हैं कि आज बिहार के सुदूर गांवों से दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान आदि जगहों पर जाकर काम करने वाले मजदूर भी इंटरनेट के इस्तेमाल के प्रति जागरूक हुए हैं।

- कामर्स से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि हाल के दस वर्षों में आनलाइन खरीदारी, व्यापार, बैंकिंग, अध्ययन आदि काफी तेजी से बढे हैं। कम्प्युटर, मोबाइल और लैपटाॅप की बिक्री से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि औसतन भारतीय साल में एक मोबाइल हैंडसेट खरीदता है। 3जी सिम की बिक्री काफी तेजी से बढी है। मोबाइल कंपनियों ने भी सस्ते मोबाइल सेट काफी बड़े पैमाने पर बनाने शुरू कर दिए हैं जिसके चलते इंटरनेट से जुड़े मोबाइल हैंडसेट साधारण कमाने वाले युवकों के हाथों में भी पहुच चुके हैं। जैसे तालाब में रिप्पल इफेक्ट पैदा होता है, उसी तरह सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए मैसेज को दोस्त शेयर करके एम्पलीफाई कर देते हैं।

ऐसे में सोशल मीडिया की शक्ति को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। भारतीय राजनीति में कुछ राजनीतिज्ञ इस दिशा में काफी सक्रिय हैं और लोग भी उनके टिवटर और फेसबुक को काफी बड़ी संख्या में फालो करते हैं। कई कंपनियां राजनेताओं के टिवटर और फेसबुक एकाउंट को हैंडल करती हैं। इसके लिए उन्हें अच्छी खासी रकम मिलती है।

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य-

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य की बात करें तोे सबसे पहले ध्यान अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की ओर जाता है। दुनिया भर की निगाह हर चार वर्ष पर होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर होती है। जिस तरह से जान एफ केनेडी पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने टेलीविजन की शक्ति को पहचाना। ठीक उसी तरह से ओबामा पहले राष्ट्रपति साबित हुए जिन्होंने सोशल मीडिया की ताकत को पहचाना और उसका लाजवाब इस्तेमाल किया। बराक ओबामा ने आनलाइन कैम्पेनिंग पर 47 मिलीयन डालर खर्च किया, वहीं रोमनी ने सिर्फ 4.7 मिलीयन डालर ही खर्च किए।

भारतीय परिदृश्य-

बराक ओबामा के अभियान की तर्ज पर भारतीय राजनीतिक दल सोशल मीडिया की जानकारियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं की निगरानी के लिए भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों ने पिनस्ट्राॅम डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी का सहारा लेना शुरू किया है। यह एजेंसी राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं पर नजर रख रही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में सोशल मीडिया के आंकड़ें ओपिनियन पोल की जगह ले लेंगे।

राजनीतिक दल अपना चुनाव प्रचार मोबाइल फोन पर भी कर रहे हैं। भाजपा नरेंद्र मोदी के भाषणों को देश भर में रियल टाइम पर मोबाइल फोन पर उपलब्ध करा रही है। आम आदमी पार्टी ने मिस्ड काॅल के जरिए हजारों लोगों को पार्टी की सदस्यता दी है।

आम आदमी पार्टी ने एक मैनिफेस्टो की जगह विधानसभा क्षेत्रों के लिए लोकल मैनिफेस्टो जारी  किया। इतना ही नहीं पार्टी ने मैनिफेस्टो पर आॅनलाइन चर्चा किया और लोगों की समस्याओं पर ध्यान भी दिया और उनका जबाब दिया। इस तरह से आम राजनीतिक अभियान जहाॅ एकतरफा संवाद होता है, सोशल मीडिया पर स्थापित संवाद टू वे ट्रैफिक की तरह हो जाता है। इसमें लोगों को भी अपनी बात कहने का मौका मिलता है।

ऐसे में आने वाले वक्त में भारत में चुनाव सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म पर भी लड़े जाएंगे। इसमें शक नहीं हैं। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आॅफ इंडिया के अध्ययन के अनुसार भारत में 160 ऐसे लोकसभा चुनाव क्षेत्र हैं जहां वोटर के वोटिंग पैटर्न सोशल मीडिया पर चलने वाले डिसकशन से प्रभावित हो सकते हैं। इसमें सबसे ज्यादा क्षेत्र महाराष्ट्र में हैं। यह भविष्य के पैटर्न की ओर इशारा कर रहा है।

समाजिक मुद्दों पर लोगों को एकजुट करने में सोशल मीडिया ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामले हों या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी की जंग हो, तो सोशल मीडिया की भूमिका निर्विवाद है। यह उम्मीद की जा रही है कि 2014 के लोकसभा के चुनाव में सोशल मीडिया अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभायगी। आने वाले इलेक्शन में सोशल मीडिया की वास्तविक भूमिका क्या रहेगी, इसका विश्लेषण तो चुनाव के बाद ही हो पाएगा परंतु यह तो सत्य है कि इसने लोगों को समाज से सरोकार रखने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखने का प्लेटफाॅर्म दिया है। फेसबुक का फौरी तौर पर अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि कई महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे भूख, बेकारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा आदि मुद्दों पर भारतीय काफी बेबाकी से चर्चा करते हैं और अपने विचार रखते हैं।

बिहार का परिदृश्य एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दल-

बिहार में ध्यान दिया जाए तो पहली बार राजद और लालू यादव ट्विटर पर आ गए हैं। राजद का अपना फेसबुक पर आधिकारिक वेबपेज हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार टिवटर पर काफी सक्रिय हैं जिसके जरिए वे अपने स्टैटस को अपडेट करते रहते हैं। इस पेज को फालो करने वाले लोगों को पता चलता रहता है कि आज वे कहां प्रचार अभियान चला रहे हैं, कल उन्होंने किस मुद्दे पर अपना विचार व्यक्त किया था। बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष का अपना फेसबुक वेबपेज है। सुशील मोदी खुद भी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं। आज से 10 साल पहले ये नेता जनता के इस विशाल समूह को एक साथ संबोधित करने की स्थिति में नहीं थे। आज वक्त बदल गया है।

बिहार की बात आयी है तो कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं जैसे बिहार भारत का एक पिछड़ा राज्य है। दूसरे बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका प्रधान है। तीसरे, बिहार में एक अच्छी संख्या प्रवासी बिहारियों की है पर गुजरात के विपरीत इन प्रवासी बिहारियों को बिहार के विकास से जोड़ा नहीं जा सका है। क्योंकि सरकार एवं इन प्रवासी बिहारियों के बीच कम्युनिकेशन गैप है। ग्लोबल बिहार समीट बिहार में पांच वर्षों के अंतराल पर हो रहा है। इसके बाद अगले चार सालों तक कोई फालोअप एक्शन होता है या नहीं, या यह सरकार के बेहद ईमानदार प्रयासों के बावजूद पांच वर्षीय जलसा हो गया है। यह देखना जरूरी है। वैश्वीकरण के इस दौर में उनके साथ लगातार संपर्क कैसे बनाया जाए, यह सोचना लाजमी है। इसके लिए पारंपरिक संपर्क के माध्यम नाकाफी होंगे। अगर हम यह मान लें कि इसके लिए एक विभाग गठित कर दिया जाए और वह विभाग इनकी समस्याओं को देखेगा तो यह पर्याप्त नहीं होगा। इस विभाग के कामकाज में सोशल मीडिया शामिल होना चाहिए। क्यांेकि सोशल मीडिया इंटैरेक्टिव होने के चलते उनके साथ संपर्क रखने का एक काफी तीव्र एवं सुलभ माध्यम हो सकता है। इसके लिए एक बेहतरीन टीम गठित करनी होगी। यह बात न केवल सत्ताधारी दल के लिए लागू होती है, बल्कि अन्य दलों के लिए भी लागू होती है। प्रवासी बिहारी बिहार के अन्य वर्गाें की तुलना में ज्यादा उद्यमशील हैं। बिहार के विकास के बारे में वे अपनी राय इन क्षेत्रीय दलों के साथ साझा कर सकते हैं।

युवाओं का एक ऐसा वर्ग है जो टीवी नहीं देखता, ऐसे युवाओं से जुड़ने के लिए फेसबुक काफी शानदार माध्यम हो सकता है। फेसबुक और टिवटर का फायदा यह है कि यह परस्पर संपर्क का तीव्र माध्यम है और यह दोहरी संपर्क का माध्यम है। इसके जरिए वोटरों की प्रतिक्रिया पायी जा सकती है।

हां में यह स्वीकार करना होगा कि राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय दलों के पास संसाधनों की कमी होती है। सोशल मीडिया अपनी कम लागत के कारण इस समस्या से निपटने में मदद कर सकता है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों को, चाहे वो जदयू हो, राजद हो या फिर लोजपा या कोई और, अपनी एक सोशल मीडिया टीम गठित करनी चाहिए। इसके बाद दल के नाम से और दल के मुखिया के नाम से सोशल मीडिया पर पेज बनाना चाहिए और उनके शासन संबंधी, विकास संबंधी विजन का प्रचार प्रसार करना चाहिए। प्रवासी बिहारियों को इस फेसबुक और टिवटर पेज से जोड़ना चाहिए। यहां पर उनसे बिहार के विकास के संबंध में उनसे विचार मांगे जा सकते हैं। ऐसे में ये प्रवासी भारतीय भी उस दल से जुड़ाव महसूस करेंगे। वे भले ही वोट करने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन राज्य में उनके परिवार के ृलोगों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

आज बिहार से काफी लोग बाहर रोजगार, अध्ययन आदि की जरूरत से जा रहे हैं। वे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में काम करने जा रहे हैं और अध्ययन के उद्देश्य से जा रहे हैं। वे फेसबुक और टिवटर से जुड़े हैं। इन क्षेत्रीय दलों को प्रयास यह करना चाहिए कि सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी समस्याओं को सुनना चाहिए और फिर उन समस्याओं के निराकरण के लिए कार्य करना चाहिए। ऐसे में इन दलों के समर्थकों की संख्या बढेगी। और चुनाव के पहले वोट मांगने के तरीके में और चुनाव के दौरान वोटिंग दोनों में परिवर्तन आएगा। इस तरीके से ये क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों के संसाधनों से परिपूर्ण चुनाव प्रचार अभियान का सामना कर पाएंगें।

 

थर्ड डिवीजनर भी बन सकेंगे बैंक के पीओ :  कैरियर गुरु भानू

ग्रेजुएशन के फ़ाइनल इयर के थर्ड डिवीजनर भी बन सकते हैं बैंक के पीओ। भारतीय स्टेट बैंक ने करीब 2 वर्ष के बाद PO की vaccancy निकली है वो भी २२०० के लगभग। पिछली बार 1500 रिक्तियां sbi ने निकाली थीं जिसमें रिज़र्व केटेगरी विशेषकर अनुसूचित जनजाति की 337 रिक्तियां के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिले थे। इसे इस बार की रिक्तियां में जोड़ दिया गया है।

 

इसकी एक वजह यह भी है कि बैंक को योग्य उम्मीदवारों का टोटा झेलना पड़ रहा है और इसलिए बैंक ने पूर्व की तरह इस बार भी योग्यता स्नातक पास किसी भी डिवीज़न से रखा है और जो इस वर्ष स्नातक फाइनल इयर की परीक्षा दे रहे है उनको भी मौका दिया है बशर्ते उनका रिजल्ट 10 अगस्त से पहले जाये इस वर्ष।


यह परीक्षा ऑनलाइन होगी। कंप्यूटर के स्क्रीन पर ही सवाल आयेंगे और उसी पर उत्तर भी दर्ज करना होगा। 2 घंटे का ऑनलाइन ऑब्जेक्टिव परीक्षा ली जाएगी जिसके तुरंत बाद वही पर 1 घंटे का 50 अंको का डिस्क्रिप्टिव इंग्लिश की परीक्षा होगी,  जिसे पास करना अनिवार्य होगा। सनद रहे कि ऑब्जेक्टिव परीक्षा में टॉप 10% विद्यार्थियों का ही डिस्क्रिप्टिव जांच के लिए भेजा जायेगा।

200 अंक ऑब्जेक्टिव प्रश्न चार भाग में बंटे होंगे जिसके हर भाग में 50 प्रश्न यानी कुल 50 अंकों के होंगे। पहला भाग रीजनिंग, दूसरा गणित का डाटा इंटरप्रिटेशन और एनालिसिस, तीसरा अंग्रेजी और चौथा करंट इवेंट्स के अलावा मार्केटिंग और कंप्यूटर से सम्बंधित होगा। सभी में एक न्यूनतम अंक लाना अनिवार्य होगा जो पिछले बार के आधार पर कहा जा सकता है की किसी भी भाग में 50 नंबर में से 10 से ज्यादा नहीं  जायेगा।
भारतीय स्टेट बैंक ने इस बार कुल 81 परीक्षा केंद्र बनाया है। इनमें से 12 केवल बिहार में ही बनाये गये हैं। परीक्षार्थियों को कम से कम दूरी तय करनी पड़े इसका विशेष ख्याल रखते हुए छोटे शहरों में भी परीक्षा केंद्र स्थापित किये गये हैं।

 

पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि वस्तुनिष्ठ परीक्षा में सफल ऊपर से टॉप 7000 के करीब परीक्षार्थियों को ग्रुप डिस्कशन और इंटरव्यू के लिए बुलाया जायेगा। ग्रुप डिस्कशन 20 नंबर का और इंटरव्यू 30 नंबर का होगा। इसके बाद केटेगरी में मेरिट में ऊपर से चयन लिस्ट बनाई जाएगी। पिछले 1500 रिक्तियों में 337 का भर पाना इस बात का द्योतक है कि बैंक को योग्य लड़के नहीं मिल पा रहे हैं। पिछली बार के अनुभव के आधार कहा जा सकता है कि इस बार sbi में जेनरल केटेगरी के लडकों का 70-80 नंबर के बीच में इंटरव्यू कॉल जायेगा। वे परीक्षार्थी जिन्हें इस परीक्षा में अपेक्षित सफ़लता अगर नहीं भी मिलती है तो भी उन्हें निराश होने की जरुरत नहीं है। बहु प्रतीक्षित sbi po की रिक्तियां आने के बाद जैसे ही इसके लिए अप्लाई करने का डेट ख़त्म होगा sbi क्लर्क की vaccancy जाएगी। उसके बाद sbi एसोसिएट PO और उसके बाद sbi एसोसिएट क्लर्क। इन सबके बीच जून में में IBPS PO, क्लर्क, IBPS ग्रामीण बैंक PO , clerk, और स्पेशलिस्ट ऑफिसर आदि के पदों के लिए वैकेंसी रहेगी।

अपनी बात : युवाओं को मिले सत्ता में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी

- सागरिका चौधरी, राज्य सचिव, महादलित प्रकोष्ठ, जनता दल यूनाईटेड

बिहार को एक यूथ पालिसी की सख्त जरूरत है। भारत सरकार ने यूथ पालिसी काफी पहले ही 1988 में बनायी थी फिर समय समय पर उसमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन करती गयी। इसका ताजा उदाहरण 2014 में भारत सरकार की नयी युवा नीति है। कुछ अन्य राज्यों जैसे झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि राज्यों ने भी अपनी यूथ पालिसी बनायी है।

 

बिहार के युवाओं की कुछ अपनी समस्याएं हैं और युवाओं का अपना वर्ग है, उदाहरण के लिए महादलित युवा, जिनके समाधान के लिए राज्य के लिए अपनी यूथ पालिसी होनी चाहिए। बिहार में युवाओं की संख्या एक तिहाई के आसपास है। उनके लिए सबसे बड़ी चिंता रोजगार की है। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं। ऐसे में कुछ युवकों को तो नौकरी मिली है बाकी तो बेरोजगारों की फौज खड़ी होती जा रही है।इसके चलते बिहार आज भारत के सबसे गरीब राज्य में गिना जाता है। इसलिए वक्त गया है कि बिहार के युवा नौकरी मांगे नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनें। और ऐसा तभी होगा जब उनमें इंटरप्रेन्यिोरशिप को बढावा दिया जाएगा।

 

मेरा मानना है कि महादलितों को स्वरोजगार के अवसर अधिक से अधिक उपलब्ध कराने और उन्हें बाजार से जोड़ने का काम करने पर ही वे गरीबी के मकड़जाल को तोड़कर आगे बढ़ पाएंगे। राज्य में युवाओं को केंद्रित कर कई नीतियां चल रही हैं। अब उन्हें एकीकृत करने की आवश्यकता है। बिहार का युवा तरक्की करेगा तो बिहार अन्य राज्यों के लिए रोल माडल बनेगा।

मेरे सुझाव :

बिहार में युूवा एवं खेल मामलों से जुड़ा एक मंत्रालय की स्थापना की जाए।

 

युवा नीति के किर्यान्वयन के मानिटरिंग के लिए स्टेट यूथ कमीशन, बिहार की स्थापना की जाए।

 

बिहार में युवाओं को राष्ट्रीय युवा नीति, 2014 से हटकर उन्हें परिभाषित किया जाए। राष्ट्रीय युवा नीति, 2014 में जहां 15 से 29 वर्ष के लोगों को युवा माना गया है, वहीं बिहार में इसकी उम्र अधिक होनी चाहिए यथा 15 से 35 ताकि वे सरकार की नीतियों का अधिकाधिक लाभ ले सकें।

 

युवाओं में खासकर महादलित युवाओं और महिलाओं में उद्यमिता विकसित करने के लिए एकीकृत नीति बनायी जाए। ताकि सरकारी रोजगार पर निर्भरता कम की जाए।

 

युवाओं के उत्पाद को बाजार से जोड़ने के लिए सरकारी प्रयास किए जाए। इसके लिए जरूरी हो तो एक नोडल एजेंसी की स्थापना की जाए।

 

युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर खेलकूद में राज्य का नाम रौशन करने के लिए हर स्तर पर प्रोत्साहित किया जाए।

 

बिहार के युवाओं में व्यावसायिक शिक्षा एवं तकनीक कौशल के विकास के लिए प्राइवेट सेक्टर में विश्वविद्यालयों एवं तकनीकी संस्थानों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाए।

 

युवाओं को बैंक से ऋण की सुविधा उपलब्ध करायी जाए और इसका माॅनिटरिंग भी किया जाए और बैंक ऋण को लेकर एक निश्चित अंतराल पर इम्पैक्ट स्टडी कराया जाए ताकि व्यवस्था में किसी खामी को समय रहते सुधार लिया जाए।

 

युवाओं के शिक्षा से जुड़ी सिलेबस को अपडेट किया जाए और उन्हें वैश्वीकरण के दौर में अधिक से अधिक प्रासंगिक बनाया जाए।

सभी विश्वविद्यालयों में शिक्षक एवं छात्रों का काउंसिल बनाया जाए जो विधार्थियों से फीडबैक लेकर विश्वविद्यालयों का प्रशासन चलाए।

 

युवाओं में उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करने के लिए स्कालरशिप एवं फेलोशिप की संख्या को बढाया जाए। सिर्फ यह यूजीसी जेआरएफ तक ही सीमित रह जाए।

 

विश्वविद्यालयों में समय पर लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आलोक में विधार्थी संघ का चुनाव कराया जाए।

 

बिहार में यूथ हास्टल की संख्या को बढाया जाए और सांस्कृतिक एक्सचेंज प्रोग्राम को बढावा दिया जाए ताकि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ बिहार के युवाओं का संपर्क बढे और उन्हें इस संपर्क कार्यक्रम से काफी कुछ सीखने को मिले।

 

हर विश्वविद्यालय में एनएसएस और एनसीसी का संगठन मजबूत किया जाए और इसके साथ ही एक्सट्रा करिकुलर गतिविधियों को बढावा दिया जाए ताकि युवाओं का समुचित विकास हो सके।

 

युवाओं को गैर सरकारी संगठनों को बनाने के बारे में जानकारी दी जाए ताकि एक तरफ वे सरकार के कल्याण कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुंचा सके और दूसरी तरफ युवाओं में नेतृत्व कला भी विकसित हो सके।

वैश्वीकरण के दौर में टेªड युनियन कितने प्रासंगिक रह गए हैं?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति, डायरेक्टर, सेंटर फार इन्कलुसिव सोसाइटी,पटना

दोस्तों, वैश्वीकरण के इस दौर में मजदूरों के हितों की चर्चा काफी कम हो गई हैं। मानों वे वक्त के साथ अप्रासंगिक हो गए हों। वर्तमान व्यवस्था में मजदूरों के हितों को उत्पादन और लाभ के विरोधी के रूप में देखा जाने लगा है। ट्रेड युनियन औद्योगिक क्रांति की उपज हैं। जब मजदूर एक कार्यस्थल पर इकट्ठा होने शुरू हुए और बेहद ही अमानवीय परिस्थितियों में काम करने लगे तो उनमें अपने अधिकारों के प्रति जागृति आयी। 16 से 18 घंटे काम, अंधेरे और धुॅए से भरे कमरे, महिलाओं के लिए बच्चों के दूध पिलाने और सुलाने की जगह नहीं होना, बेहद कम समय का लंच टाइम और आराम का कोई प्रावधान नहीं, बच्चों के लिए भी असीमित कार्य अवधि, पानी की उचित व्यवस्था का नहीं होना- इन कारणों के चलते मजदूर काफी जल्द ही बीमार हो जाते थे और फिर काम से भी उनकी छुट्टी हो जाती थी। चाल्र्स डिकेंस ने अपने उपन्यासों में इन समस्याओं का सजीव वर्णन किया है।

 

भारत में भी इंग्लैंड की तर्ज पर आधुनिक उद्योगों के खुलने के बाद आधुनिक मजदूर वर्ग की शुरूआत हुई। भारत में यद्यपि उसे औद्योगिक क्रांति का दर्जा नहीं दिया जा सकता है, परंतु भारत के तटीय शहरों जैसे बंबई, मद्रास, कलकता और कुछ अन्य शहर जैसे कानपुर आदि में आधुनिक उद्योग स्थापित किए गए। मजे की बात यह है कि इन उद्योगांे में मजदूर संघ और मजदूरों के हितों की रक्षा का प्रश्न भारतीय नेताओं की तरफ से नहीं बल्कि अंग्रेजों की तरफ से उठा। राष्ट्रवादी नेता जैसे गोखले आदि भारतीय नेता कल कारखानों में मजदूर नियमों के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि ऐसा करने से भारतीय कारखाने अंग्रेजी कल कारखानों से मुकाबला नहीं कर पाएॅगे। यह एक अजीब सोच लगती है परंतु मजदूरों के हितों और कारखानों के उत्पादन और लाभ के बीच विपरीत संबंध देखना या फिर कल कारखानों से जुड़े हितों को केवल मिल मालिकों के हितों से ही जोड़कर देखना- यह सोच कभी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी।

 

ट्रेड युनियन प्रथम विश्वयुद्ध के परिणामस्वरूप उपजी समस्याओं के संदर्भ में बने। जहाॅ एटक मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़नेवाला संगठन बना, वहीं गांधीजी का मजदूर संगठन अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को लेकर आया। इसके अनुसार, पूंजीपति समाज के लिए उनके पूंजी के ट्रस्टी हैं । यह पूरी तरह से मिल मालिकों और मजदूरों के बीच संघर्ष की बात को नकारता है। मजदूर आंदोलन पर अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का भी प्रभाव पड़ा। चाहे वह 1917 की रूस की अगस्त क्रांति हो, या फिर प्रथम विश्व युद्ध का परिणाम हो या फिर 1919 में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ का गठन हो।

 

वैचारिक मतभेदों के चलते आंदोलन में कई बार बंटवारे भी हुए। साथ ही ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों से भी आंदोलन को नुकसान पहुॅचा। उदाहरण के लिए  मेरठ षडयंत्र केस जिसके तहत एक ही झटके में 33 मजदूर नेताओं को लंबे कारावास की सजा सुना दी गयी। इसके चलते मजदूर आंदोलन एक तरह से नेतृत्वविहीन हो गया। आजादी के लिए संघर्ष के दौरान मिलिटेंट ट्रेड यूनियन ने आजादी पाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी खासकर 1942 और उसके बाद। उनका असर स्वाभाविक था कि औद्योगिक शहरों में ज्यादा रहता।

 

आजादी के बाद नेहरू की सरकार समाजवादी सोच को लेकर आयी। द्वितीय पंचवर्षीय योजनाकाल में ही देश का समाजवादी स्वरूप तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उद्देश्य घोषित किया गया, फलस्वरूप औद्योगिक विकास की नींव पड़ी और इसके साथ ही श्रमिक संघों की सदस्यता में वृद्धि हुई। सरकार ने श्रम से संबंधित अपनी महत्वपूर्ण नीतियों को भारतीय संविधान में शामिल कर लिया और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी इसके लिए पर्याप्त उपबंध किए। इसके अलावा श्रम कानूनों मे व्यापक स्तर पर सुधार का सुझाव देने के लिए भारत सरकार ने श्रम आयोग दो बार स्थापित किया। पहली बार 1966 में और दूसरी बार 2002 में। महलनोबिस माॅडल के अंतर्गत देश का विकास बड़े बड़े उद्योगांे पर आश्रित था। इसके तहत देश के अलग अलग कोने में औद्योगिक केंद्रों और संकुलों की स्थापना की गयी जैसे भिलाई, राउरकेला, बोकारो आदि। इसके चलते मजदूरों का जमावड़ा बढ़ा। कई तरह के कानून उनकी आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाए गए। उदाहरण के लिए संरक्षणात्मक श्रम विधान के तहत मजदूरी भुगतान अधिनियम,1936 न्युनतम मजदूरी अधिनियम,1948 कारखाना अधिनियम,1948 बागान श्रमिक अधिनियम, 1951 खान अधिनियम,1952। दूसरी तरफ विनियमकारी श्रम विधान के तहत श्रम संघ अधिनियम,1926 औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 आदि लाए गए। सामाजिक सुरक्षा श्रम विधान के तहत कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम,1948 कर्मचारी भविष्य निधि तथा प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम,1952 प्रसूति हितलाभ अधिनियम, 1961 आदि लाए गए। इसके अलावा कल्याण संबंधी श्रम विधान के तहत अभ्रक खान अधिनियम श्रम कल्याण निधि अधिनियम,1946 सार्वजनिक औद्योगिक उपक्रम श्रमिक कल्याण कोष अधिनियम,1966 आदि लाए गए। इसके साथ ही समान पारिश्रमिक अधिनियम,1976 महिला श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इस तरह से उनके लिए पेंशन, कार्य के दौरान छुट्टी का पर्याप्त प्रावधान, मेडिकल एवं बीमा प्रबंध एवं स्वास्थ्य प्रबंध आदि हर संभव सुविधा का ध्यान रखा गया।

हालांकि अधिकतर श्रमिक कानून संगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए ही लाए गए। वे संगठित थे। वे एक जगह पर बड़ी संख्या में केंद्रित थे, उनका अपना संगठन था। वे राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए थे। इन सबके चलते उनके हितों का संवर्द्धन हुआ और इस आपाधापी में असंगठित क्षेत्र के मजदूर पीछे छूट गए।

 

वैश्वीकरण की बात करें तो औपचारिक तौर पर राव मनमोहन माॅडल से 1991 मे वैश्वीकरण, प्राइवेटाइजेशन और उदारवाद की शुरूआत हुई परंतु व्यावहारिक तौर पर  भारत में नव उदारवाद की हवा तीव्र गति से 1980 के दशक से ही बहनी शुरू हो चुकी थी। इसके पीछे एक निश्चित आर्थिक सोच न होकर अर्थव्यवस्था के दशकों से मिसमैनेजमेंट और विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाब था। नतीजा सरकार ने इन अंतर्राष्ट्रीय वितीय संस्थाओं से आर्थिक पैकेज के बदले में अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार कार्यक्रम लागू करना शुरू किया।

 

ध्यान रहे कि भारत का औद्योगिक ढांचा युरोप के औद्योगिक ढांचे से अलग है। वहाॅ के विपरीत यहाॅ अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की बहुतायत है। भारत में लगभग 8 प्रतिशत श्रम संगठित क्षेत्र में हैं जबकि लगभग 92 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में है। संगठित क्षेत्र के मजदूरों में महिलाओं का हिस्सा सातवाॅ और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में एक तिहाई है। श्रम के हाल फिलहाल के आंकड़ें बताते हैं कि वैश्वीकरण के दौर में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या बढी है। उम्मीद की गयी थी कि देश के तुलनात्मक लाभ को देखते हुए पूंजी का निवेश कैपिटल इंटेंसिव इंडस्ट्री से लेबर इंटेंसिव इंडस्ट्री में होगा और इससे अधिक रोजगार, लाभ और निर्यात के लिए उत्पाद अधिक होगा। लेकिन शुरूआती फायदे के बाद इसकी गति धीमी हो गयी है। संगठित क्षेत्र में 1980 के दशक की तुलना में रोजगार में कमी आयी है खासकर पब्लिक सेक्टर में । कारण- सरकार की विनिवेश की नीति, कई क्षेत्रों से सरकार का हटना, वीआरएस स्कीम आदि। जाॅबलेस ग्रोथ अर्थात् रोजगार विहीन आर्थिक विकास इस आर्थिक दौर की विशेषता हो गई है। आर्थिक विकास की तुलना में रोजगार के अवसर उस अनुपात में नहीं बढे हैं। इसके अलावा इनफोर्मलाइजेशन आॅफ इकाॅनाॅमी का भी दौर बढा है। इसके अलावा फेमिनाइजेशन आॅफ इकाॅनाॅमी का प्रचलन भी बढा है।

ऐसे में वैश्वीकरण के चलते मजदूर संघों के सामने निःसंदेह चुनौतियों का रूप बदला है। वर्तमान में भारतीय मजदूर संघ, इंटक, सीटू, हिंद मजदूर सभा और एटक आदि महत्वपूर्ण मजदूर संघ हैं। इनके अलावा कई स्वतंत्र और छोटे स्तर के मजदूर संगठन भी हैं। अन्य कई तरह के मोर्चा, लेबर काॅओपरेटिव, एनजीओ आदि भी मजदूरों के हितों की रक्षा का काम करते हैं।

 

लेकिन ट्रेड युनियनों की अपनी कुछ खामियाॅ भी रही हैं। जैसे, वे राजनीतिक दलों के आर्म के रूप में काम करती रही हैं। उदाहरण के लिए इंटक कांग्रेस से संबद्ध है, भारतीय मजदूर संघ भाजपा से तो एटक कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध है। ऐसे में वे मजदूरों के हितों पर राजनीतिक दलों के एजेंडे से उपर उठकर नहीं सोच सके। मजदूर संघों ने महिलाओं के हितों को प्राथमिकता नहीं दी और न ही शीर्ष नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व रखा। इस संबंध में असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित करने का बेहद प्रशंसनीय कार्य सेवा ने किया है। यहाॅ पर फरवरी 2014 को फुटपाथ वेंडरों के अधिकारों की रक्षा करने  के लिए संसद से पास किए गए कानून का भी जिक्र करना होगा।

 

भारत में लगभग 92 प्रतिशत श्रम असंगठित क्षेत्र में है। यह स्थिति यूरोप और अमेरिका में नहीं है परंतु भारत में ट्रेड युनियनों ने युरोपीयन माॅडल को ही अपनाया। नतीजा उनका संघर्ष सिर्फ संगठित क्षेत्र के मुट्ठी भर मजदूरों के लिए रह गया। इनका आधार कमजोर रह गया। ट्रेड युनियन औद्योगिक क्रांति की उपज रहे हैं। लेकिन 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था का आधार सर्विस सेक्टर है। अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदलता जा रहा है। ऐेसे में ट्रेड यूनियन को भी अपनी भूमिका की सार्थकता तलाशनी होगी।

 

आज के वैश्विक युग में कई तरह की प्रतिस्पर्धी समुह उठ खड़ी हुई हैं। जैसे एनजीओ विश्व व्यापार समुह के सम्मेलनों के समय ऐसे मुद्दे उठाते रहे हैं जो कि ट्रेड युनियनों को उठाना चाहिए। इसके अलावा कई अन्य मुद्दों को विश्व व्यापार संगठन ने उठाया है या फिर व्यापारिक हितों के मद्देनजर विकसित देशों ने। उदाहरण के लिए कालीन का मामला या फिर एजो कलर का मामला।

प्रासंगिकता का प्रश्नः

ऐसे में प्रश्न यह है कि ट्रेड युनियन अपने आप को प्रासंगिक कैसे बनाए रखे? क्योंकि  मजदूरों के हितों की रक्षा होगी, उनके आर्थिक हितों का संवर्द्धन और संपोषण होगा तभी अर्थव्यवस्था निरंतर विकास के मोड में रहेगी और समेकित विकास की अवधारणा भी सच्चाई के धरातल पर आ पाएगी।

 

हाल के वर्षों में टेªड यूनियन की सोच और काम करने के तरीके में कुछ परिवर्तन देखने को आए हैं। उदाहरण के लिए, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए भी मजदूर संघ बनाने की कोशिश हो रही है। यद्यपि यह अलग बात है कि इस तरह के प्रयासों में अभी उतनी सफलता नहीं मिली है। इसके अलावा बदलते वक्त में मजदूर संघों की गिरती सदस्य संख्या को देखते हुए कुछ मजदूर संघ विलय के लिए भी प्रयासरत हैं पर इस दिशा में भी अभी सफलता नहीं मिली है। इसके अलावा गैर प्रोफेसनल तरीके से मजदूर संघों को संचालित करने को लेकर चैतरफा आलोचना का शिकार हो रहे मजदूर संघ कुछ लेबर रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसे नेशनल लेबर इंस्टीट्यूट, अम्बेदकर इंस्टीट्यूट आॅफ लेबर रिसर्च आदि की सहायता भी ले रहे हैं।

 

ये सारे शुभ संकेत हैं लेकिन इन्हें गंभीरता से आगे ले जाने का प्रयास करना होगा। वैश्वीकरण के दौर में ट्रेड युनियन के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह बदलते वक्त को पहचाने। इसके लिए वह अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार करे। सिर्फ यूरोप के माॅडल को अपनाने के बजाय लेबर रिसर्च पर पर्याप्त ध्यान दे ताकि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में ट्रेड युनियन कदम उठा सकें। इसके अलावा कृषि क्षेत्र के मजदूरों के हितों को भी उठाना होगा। महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देना होगा। इसके लिए सेवा से सीख लेनी होगी। हाल में फुटकर विक्रेताओं के हितों की रक्षा के लिए सरकार ने कानून बनाया। यह एक शुभ संकेत है। इसे और भी आगे ले जाना होगा। कानून बनाकर उनका अनुपालन सुनिश्चित करना होगा। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की मदद भारत के ट्रेड युनियनों को बड़े पैमाने पर लेनी होगी। मजदूरांे की आवाज उठाने वाले अन्य साझेदारों यथा अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों आदि से हाथ मिलाना होगा। साथ ही साथ ट्रेड युनियनों को बाल श्रम का मसला बड़ी शिद्दत से उठाना होगा। आउटसोर्सिंग से उपजी चुनौतियों को समझना होगा और उससे निपटना होगा। तभी जाकर वैश्वीकरण के दौर में ट्रेड युनियन अपनी सार्थकता बनाए रख पाएंगे।

Do You Have “The Sulemani Keeda” for Entrepreneurship?

- Anish Bari

Sid called me up one evening to seek time for some discussion. Sid was working as a software engineer since last 5 years in a multinational firm. For me the discussion seemed to be quite predictable. He was known as one of the brightest student in our college with lot of creative ideas and a guy who always scored high grades but never enjoyed programming. Now, he was completely standing at the crossroads, probably thinking what next? The call was to have a discussion about the same.

 

I met Sid the following Friday evening at United Coffee House, Connaught Place, New Delhi. UCH has been a great place for me as I got the idea for my first venture while doodling at the back of the napkin with 2 of my friends. The discussion wandered to his career options. He was really frustrated and wanted to do something of his own. His work had been quite stagnated as he was doing some kind of manual testing in a software firm. He was also pressurized by his parents and girlfriend to get married. He was aware of the risks of getting into entrepreneurship as it could mean great upsides. Thinking is good but going about it the toughest part. Sid aspires to be an entrepreneur but will he be comfortable cutting down his own salary package. Obviously in a setting of multinational company, he was overpaid for whatever work he was doing. He was bit skeptical about the same. He was aspiring to be an entrepreneur, carrying a tag of CEO but the possibility of failure made him standstill. I asked him “will your girlfriend be ready to marry an entrepreneur?” Entrepreneurs normally are crazy gamblers and instead of betting on horses they bet on their hard work with a bit of luck thrown to it. Will your girlfriend or possibly would be wife be ready to accept you as an entrepreneur? Sid himself was not sure and probably never asked these questions to himself. Before he could speak I asked one more question. Will your wife or parents be prepared to manage the family finances by themselves, no matter either you being a gambler striking it hot or not? Sid pushed the idea out of his mind space for future. I was quite sure that Sid is not ready today and probably he would never be.

 

Besides Sid, I have one more example. One more guy named Vishal who actually started a company for online retail stores. He was talented, hard working and was doing pretty well initially. He was married to extremely beautiful girl who was given all sorts of comforts of life and large chunk of Vishal’s efforts were directed towards keeping her happy. A major chunk of his saving goes to make his wife happy as in he moved to a 4 BHK house in posh locality in Indira Nagar, Bangalore for which he was giving rent of INR 32,000 per month. He mobilized his company staffs to his house for domestic help. He had to gift his wife an expensive gift every month. “Is this Saccha Pyar? Aur Jaanleva Pyar?” Love has to be unconditional where you should support your partner unconditionally. Vishal’s organizational goals were directed towards domestic peace. A few years later, he had to close down the company and he joined back the IT sector.

 

The characters here are fictional but their stories are not. In both of the example you can imagine how little prepared these guys were to build an organization. The term “Sulemani Kida” means a virus that cannot be killed. One of my uncle who is a film producer told me for anything to succeed you need to have sulemani kida in you. If you look at any actors who made it large on the silver screen had the sulemani kida within their heart and soul be it Shahrukh Khan, Amitabh Bacchan etc. Same is applicable to Entrepreneurship. We have examples of Infosys, Mindtree, Wipro, Reliance group, Meru Cabs etc. Obviously Rome was never built in a single day. Building a company is not like planting a big tree rather planting the seed and with time having a vision of creating an entire forest some day.

 

One of the very common notions that happened to few of us in our friend circle was “My career is not going anywhere. I hate this company and I do not like my manager and now I want to start my own company.” Before you take any decision, give time to yourself and think about it. If you are married then talk to your spouse, otherwise talk to your parents, Talk to your friend who has always been there for you. Talk to themselves about your plans of getting into entrepreneurship. Let them rate you and tell you bluntly if they see any weakness in you being not able to run a company. I am sure that most of the people you talk will not give you advice to leave your job and start your own company. That’s not a problem though. People often start a great journey with negative experience. One of my senior from college called me and said “You know… I want to start something of my own… I want to get into business”. I asked him “what kind of business? What value you are planning to offer to your customers? Who are your customers? How much money you need to start?”  Surprisingly he was not sure about these things. He just wanted to start a company in a hope of getting these answers once you get into the path of entrepreneurship. His only supporting argument was “This is the time, if not now then never”. And in the name of experience he had 4 years of experience in a software firm where he used to debug the code. For him it was important to have a girlfriend in life with whom he can hang out and share his thoughts. Probably this would give him a peace of mind to think and get an idea first and then can further look more into execution side.

 

In reality the right time to start any business is when your vision and mission are clear and properly aligned. The right time to start the business is when you are confident of utilizing your skills at maximum and are committed to create a family of product or services. The time is now when you are ready to dedicate your time on your venture. Any start up is like a new born baby and you need to give proper time and care to your venture. The time is now when you are able to manage both your professional and personal life in a balanced way. When a company is created one has to be very careful and responsible towards your investors, customers who all use your product/services and also employees. As an entrepreneur you need to love money. If you say you don’t want money or are not passionate about money then there is something wrong. You have to have enough money to maximize shareholder’s value and pay salaries to your employees. So having Sulemani Keeda is essential but with a proper plan and direction.

 

If you have the sulemani keeda and aspire to be an entrepreneur, you have a rough idea and surrounded by so much of BLAH BLAH BLAH stuffs. You need to pick the right thing and segregate it from Blah Blah Blah stuffs. So Are You Ready?

खास मुलाकात : राजनीति को जनसेवा का पर्याय मानती हैं सागरिका, सात समंदर पार रिश्तों का जड़ तलाशेगी महादलित की बेटी

बिहारी मूल के बहुत सारे लोग दुनिया के अनेक हिस्सों में बसे हैं। वैश्वीकरण के दौर में जहां एक ओर तमाम तरह की विषमतायें बढ़ी हैं वहीं दूसरी ओर लोगों में अपनी जड़ों के तलाशने की प्रवृति बढ़ी है। इसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव पूरे दुनिया में देखे जा सकते हैं। इसी विषय को लेकर महादलित समुदाय की एक बेटी सागरिका चौधरी आगामी 14 से 19 जुलाई के बीच कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में आयोजित होने वाले तेईसवें विश्व राजनीति कांग्रेस में अपने विचार प्रस्तुत करेंगी।

 

सागरिका ने बताया कि वह मूल रूप से शेखपुरा जिले की रहने वाली हैं। उनके पति बालेन्दूशेखर मंगलमूर्ति एक सोशल साइंस रिसर्चर हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह बिहार में सत्तासीन जदयू के महादलित प्रकोष्ठ की प्रदेश महासचिव व प्रवक्ता भी हैं। राजनीति में आने के संबंध में पूछने पर उन्होंने बताया कि राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी दयनीय है। खासकर वंचित तबके की महिलाओं की स्थिति नगन्य है। सागरिका ने बताया कि राजनीति में आने का मुख्य मकसद ही महिलाओं को समाज में आगे लाने की दिशा में हरसंभव प्रयास करना है।

 

पटना वुमेन्स कालेज की छात्रा रह चुकी सागरिका ने बताया कि वह वर्तमान में मगध विश्वविद्यालय में लेबर एंड सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट में रिसर्च स्कालर हैं। उनके शोध का विषय “पंचायती राज व्यवस्था में उभरते हुए दलित महिला प्रतिनिधित्व एवं उससे शासन के एजेंडे में आया परिवर्तन” है।

 

राजनीति से जुड़ने की वजह बताते हुए सागरिका ने बताया कि उन्होंने एनजीओ सेक्टर में काम करने के दौरान गरीबों एवं महादलितों की स्थिति को काफी करीब से देखा। मन में ख्याल उठा कि इनके लिए किस तरह प्रभावी ढंग से किस प्रकार काम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अधिक से अधिक लोगों खासकर जो शोषित और कुचले हुए हैं, उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना ही राजनीति से जुड़ने का मुख्य उद्देश्य है।

 

मान्ट्रियल में होने वाले कांफ़्रेंस के बारे में सागरिका ने बताया कि यह कांफ्रेंस मांट्रियल में 19 से 24 जुलाई तक चलेगा। इस दौरान वे बिहार के परिप्रेक्ष्य में “इन सर्च आफ़ रुट्स इन द एरा आफ़ ग्लोबलाइजेशन” विषयक शोध पत्र प्रस्तुत करेंगी। इसके बारे में विस्तार से बताते हुए सागरिका ने बताया कि वैश्वीकरण के दौर में ग्लोबल विलेज की संकल्पना मजबूत हुई है। लेकिन इस दौर में आइडेंटिटी की तलाश कई आयामों से होकर गुजर रही है। ये कौन हैं- वैश्वीकरण से लाभांवित वर्ग या वैश्वीकरण से समाज एवं अर्थव्यवस्था के हाशिए पर चला गया समुह? अपने लोकल आइडेंटिटी की खोज ग्लोबल विलेज की संकल्पना को मजबूत बनाता है या उसे कमजोर करता है? सागरिका का कहना है कि उनका रिसर्च पेपर इन तमाम मुद्दों पर सैद्धांतिक तौर पर चर्चा करेगा।

The Sulemani Keeda & Entrepreneurship

Anis Bari

सोशल मीडिया और राजनीति : पारंपरिक मीडिया को सशक्त चुनौती

 (बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति, निदेशक, सेंटर फार इन्क्लुसिव सोसाइटी, पटना)

मिस्र में और अरब देशों में तानाशाही और राजतंत्र के खिलाफ जो बयार बही, उसके पीछे सोशल मीडिया की ताकत थी। फेसबुक के चलते अरब देशों में सता परिवर्तन हुए। भारत में आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी की आवाज बनकर उभरी है। इसने भी फेसबुक का बेहतरीन इस्तेमाल किया है।