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इनकी मेघा से प्रभावित होकर कोटा के एक कोचिंग संस्थान ने इन्हें निशुल्क प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराया था। इन्होंने खूब मन लगाकर आईआईटी की परीक्षा की तैयारी की थी।

परंतु, इसे होनी कहिये कि परीक्षा के ठीक दो महीने पहले ये गंभीर रुप से बीमार हो गये। खूब इलाज हुआ। फ़िर भी स्थिति में बहुत अधिक सुधार न हुआ। इनके गरीब माता-पिता ने इन्हें पटना के पीएमसीएच में दाखिल कराया। लेकिन पीएमसीएच के होनहार डाक्टरों ने ओम जी को किसी निजी अस्पताल में भर्ती कराने का सुझाव दिया। इनका इलाज राजधानी पटना के प्रतिष्ठित राजेश्वर नार्सिंग होम मे कराया गया। इन्हें खून की आवश्यकता थी।

अपरिचित शहर में अपना बिहार के सदस्यों ने अपना खून इन्हें दिया। ओम जी बच गये। जिस दिन ये ठीक हुए, उसके कुछ दिनों बाद ही आईआईटी की प्रवेश परीक्षा निर्धारित थी। बुलंद हौसला रखने वाले ओम जी ने परीक्षा में भाग लिया। एक सीटिंग में इन्होंने जमकर लिखा, लेकिन दूसरी सीटिंग में ये स्वयं को संभाल नहीं सके। नतीजा यह हुआ कि ये बेहोश हो गये और परीक्षा देने से वंचित रह गये। लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी। इन्होंने एआईईईई की परीक्षा में भाग लिया और इस बार ये सफ़ल हुए। अस्वस्थता में भी इन्होंने 84 अंक प्राप्त किये और अपना स्थान सुनिश्चित किया। अपना बिहार परिवार इनकी सफ़लता से अभिभूत है और इनके उज्जवल भविष्य की कामना करता है।

जज्बे को सलाम – सफ़लता के लिये विकलांगता कोई बाधक नहीं

उस साहसी युवक का नाम बलवीर है। वे गया जिले के नगर प्रखंड रसूलपुर पंचायत में बलवीर सर के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उम्र केवल 25 वर्ष है और ये बचपन से ही दोनों पैरों से विकलांग हैं। ये खुद भी अभी विद्या अर्जन कर रहे हैं और साथ ही अपने आस-पड़ोस के गरीब बच्चों को मुफ़्त में शिक्षा भी उपलब्ध कराते हैं। आज इनकी पहचान एक सफ़ल शिक्षक के रुप में बन चुकी है। ये बिना किसी शुल्क के ही अपने इलाके में गरीब और निःशक्त बच्चों को पढाते हैं। अभी हाल ही में घोषित हुई मैट्रिक की परीक्षा में इनके अनेक छात्रों ने सफ़लता हासिल की। इससे इनका हौसला बढा है। इनकी कोशिश काबिले तारीफ़ है और अपना बिहार इनके जज्बे को सलाम करता है।

मैं अनशन करना चाहता हूँ .

मैंने आज तय किया .मैं अनशन करूँगा .क्यों करूँगा कहा करूँगा पता नहीं , पर करूँगा मैं अनसन . तैयारी करनी होगी .कई दोस्तों से पूछा अनसन कैसे करते है .जवाब भी विचित्र मिले .कईयों ने पागलपन कहा तो कईयों ने उपाय सुझाय .उन्ही में से किसी ने पूछा  मुद्दा क्या है अनसन का . मुद्दा ,कैसा मुद्दा ? मैं सोच में पड़ गया पूछा तो पता चला मुद्दे कि जरुरत होती है भाई अनसन के लिए .मतलब आपकी क्या मांगे है . तब तो एक फेहरिस्त बनाने का विचार आया सोचा मांगना ही है तो दिल खोल मांगो . सो , कागज़ कलम ले बैठ गया .

लिखा , मेरी मांगे  ... और वैसी तमाम चीज़े सूचीबद्ध कि जिनकी मुझे जरुरत है . अब बारी थी और जानकारी कि .इसलिए गूगल सर्च इस्तमाल किया . पाया कि एक जगह चाहिए ,कुछ समर्थक भी चाहिए , कुछ चिकने चेहरे कि भी जरुरत है , फेसबुक भी चाहिए ,ट्विटर को भी साथ रखना होगा , पैसे भी चाहिए ,खबरी दुनिया के कुछ सिपाहियों कि भी जरुरत है . ये सब इंतजाम करने होंगे मुझे .हा , यहाँ मैं एक सूधार करना चाहूँगा अब ये मुद्दा या मांगे मेरी नहीं रही ये सबकी हो गई .और मांग पूरा करना मेरे परिवार का नहीं वरन सरकार का कर्तव्य होगा . अब सब कुछ तय है अनसन शुरू होना है . काफी पौष्टिक आहार पहले ही ले लिया है . अब तो जान भी जाये पर मांग तो मांग है स्वार्थ से परे है . देश हित में है . तो  अब आप भी हमारी ( या मेरी ) मांगो पर गौर फरमाइए .

हमारी मांगे ..

.लिव इन रिलेशनशिप को मौलिक अधिकार बनाया जाये  .

.सार्वजनिक स्थलों पर धुम्रपान करने कि आज़ादी

माँ बाप के काले धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित कर उसे लुटाने कि आज़ादी

.और साथ ही एक आयोग कि स्थापना जो हमारे ज्वलंत मांगो को सरकार के सामने रखे . (आलोक मणि , पटना)

ये किसकी  मधुशाला ?

दिल्ली से लौटे काफी दिन हो गए . यूँ तो घर पर ही रहना होता है पर जब भी बाहर निकलता हु तब मेरी आंखे कुछ तलाशती है . हाँ , मैं उस पुराने पटना को खोजता हूँ जो शांत स्थिर और रोचक था .
आजकल जब हम किसी से पता पूछते है तो साथ में लैंडमार्क भी पूछते है .जिससे अमुक व्यक्ति का पता खोजने में सुविधा हो . तो उन दिनों हमारे मोहल्ले का लैंड मार्क एक पीपल का पेड़  हुआ करता था .साथ में बहता नाला और शनिवार को औरतों के हुजूम से उसकी सेवा होती . कुछ दिनों बाद मैंने वहा एक चबूतरा बनते देखा ,चंद महीनो में उस चबूतरे की घेराबंदी हुई .उस घेरे में हनुमान की मूर्ति भी स्थापित हुई . उस नाले का पानी और औरतों का हुजूम  दो चार वर्षों में तेजी से बढ़ा . पीपल बड़ा हुआ .दो चार दुकाने भी सजी . चबूतरे का लाभ  कइयो को मिला .कुत्ते भी पीछे नहीं रहें यह आरामगाह थी उनके लिए . कुछ भिखारियों ने उन कुत्तो का साथ भी दिया . सो इस तरह पीपल बढ़ता गया और उसका बाज़ार भी . हम भी बढे और दूर भी हुए उस पीपल से . पर जब भी पटना आना होता पीपल हमे देखता या हम पीपल को देखते .

तभी राम राज आया सुकून मिला .तथाकथित जंगलराज से मुक्ति . ढेरो उम्मीदे सजी मन में . सोचा पीपल के इलाके में नौकरी मिलेगी दूर देश जाने की जरुरत नहीं होगी . पीपल भी चहका उसे लगा बड़ा चबूतरा बनेगा . बाज़ार बढेगापर  इतने दिनों बाद आकर देखता हु किसी नौकरी की उम्मीद नहीं चबूतरा नहीं है नाला ढक चूका है बाज़ार नहीं है औरतों का वो  हुजूम नहीं है . हमारा पीपल नहीं है . पीपल मर चूका है . प्रदेश के राम ने उसकी बलि ले ली हनुमान भी नहीं दिखा रहा . शायद राम को वो पसंद  नहीं .इतना सब कुछ .कैसे ?
अब बस देखता हु तो उसी ढके नाले पर एक मदिरालय .शायद ये पीपल के गम को कुछ कम करेगा .
सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल ' हाला,
धूमधाम ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
झगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला। 
 
---  आलोक मणि  ,पटना , बिहार   मो   950413050

ये ओम जी हैं…

इनका नाम ओम जी है। इनका जन्म समस्तीपुर जिले के भगवानपुर देसुआ प्रखंड के जीतवारपुर गांव में वर्ष 1992 में हुआ था। इनके पिता का नाम राजेश कुमार मिश्रा और माता का नाम मालती मिश्रा है। ये शुरु से ही कुशाग्र बुद्धि के स्वामी रहे हैं और इनकी शैक्षणिक सफ़लता सराहनीय रही है।