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अपना बिहार निष्पक्षता हमारी पहचान
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सरकार से पढने के लिये मांग करने सड़क पर उतरे विधि महाविद्यालय के छात्र |
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हाशिये पर हैं बिहार की महिलायें राजनीति के क्षेत्र में बिहार की महिलायें हाशिये पर हैं। स्थिति का अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि वर्तमान में महिला विधायकों की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम है और सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि 80 फ़ीसदी महिला विधायकों का संबंध ऊंची जातियों से है और इससे भी बड़ी खबर यह है कि पूरे राज्य में करीब 16 फ़ीसदी वाले अल्पसंख्यक समाज से एक भी महिला विधायक नहीं हैं। राजनीति में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली लगभग सभी बड़ी पार्टियों में एक भी महिला नेता ऐसी नहीं है, जिसमें महिलाओं के राजनीतिक संघर्ष को आगे ले जाने का माद्दा हो। नतीजतन बिहार के चुनावी संग्राम में एक बार फ़िर पुरुषों की तुती बोलेगी और महिलायें दर्शक दीर्घा में बैठकर महिला सशक्तिकरण का राग अलापेंगी। एक और अबला हुई डायन 21वी सदी में भी बिहार के लोग आदिम जमाने में जी रहे हैं। विगत सोमवार को एक और महिला को डायन बताकर पहले पीटा गया और निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया गया। यह घटना सुपौल जिले के किशनपुरा थाने के कुमरगंज गांव की है। पीड़िता के बेटे पप्पू कुमार यादव के बयान पर स्थानीय थाने में एक मामला दर्ज किया गया है। अपने बयान में पप्पु ने बताया है कि उसके पड़ोसियों बच्चा यादव, भूपेंद्र यादव, धर्म नारायण यादव और विजय यादव ने उनके पिता को खुंटे से बांध दिया और उसकी मां को खींच कर बाहर ले गये। इसके बाद मां के कपड़े उतार कर पूरे गांव में घुमाया। खबर लिखे जाने तक स्थानीय पुलिस अभी तक किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकी है। आधी आबादी ने मांगा हक जो करेगा महिलाओं की बात, आधी आबादी उसके साथ। चाहे वह कोई भी दल हो, जो सबसे अधिक महिलाओं को अपना प्र्त्याशी बनायेगा, महिला ब्रिगेड के नेतृत्व में आधी आबादी उसका साथ देगी। ये बातें महिला ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष सह बाल श्रमिक आयोग की नवनियुक्त उपाध्यक्ष अनीता सिन्हा ने कल विद्यापति भवन में आयोजित राजनैतिक सम्मेलन में कहीं। सूबे के हर दूसरे घर में रहती है एक आनंदी जी हां, राज्य के हर दूसरे घर में एक आनंदी रहती है। हांलाकि बिहार के घरों में रहने वाली हर आनंदी स्टार टीवी पर नजर आने वाली आनंदी के जैसे न तो अमीर है और न ही लोकप्रिय। राज्य की आनंदियों को तो बस घर में घुट-घुटकर अपने जीवन को जीना होता है, जहां उसकी पीड़ा से न तो समाज को मतलब होता है और न ही उसके परिजनों को। हम बात कर रहे हैं बिहार में बाल विवाह की। क्या आश्चर्य यदि इस कुप्रथा के मामले में बिहार देश में सबसे अग्रणी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश की 47 फ़ीसदी लड़कियां आनंदी बन जाती हैं यानि उनकी शादी 18 साल से पहले हो जाती है। जबकि बिहार में यह आंकड़ा 67 फ़ीसदी है। पूरे देश में शादी के समय लड़कियों की औसत आयु साढे उन्नीस साल है, जबकि बिहार में यह केवल 16 साल ही है। इसके अलावा सबसे अधिक खतरनाक संकेत यह कि बिहार की 68 फ़ीसदी महिलायें रक्त की कमी की शिकार हैं। हांलाकि राज्य में बाल विवाह के मामलों की संख्या न तो महिला विकास निगम के पास है और न ही किसी अन्य सरकारी एजेंसी के पास्। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बाल विवाह तो दूर की चीज है, आम विवाहों का भी पंजीकरण सामान्य परिस्थितियों में नहीं कराया जाता है। इस संबंध में युवा समाज सेविका अर्चना ने अपना बिहार को बताया कि बालिका वधू सहित विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर आने वाले धारावाहिकों को वह बड़े चाव से देखती हैं। इसका कारण बताते हुए अर्चना ने कहा कि इन धारावाहिकों में देश के अनेक राज्यों में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन किया जा सकता है। बालिका वधू के बारे में इन्होंने कहा कि ऐसे धारावाहिक हमारे समाज के नकारात्मकता को साबित करते हैं और इसकी लोकप्रियता यह साबित करती हैं कि आम आदमी के नजर में बाल विवाह कोई संज्ञेय अपराध नहीं है। इन्होंने यह भी कहा कि इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिये सभी अपने स्तर से शुरुआत करें। बिहार महिला विकास निगम की परियोजना निदेशक ईरीना सिन्हा का मानना है कि बाल विवाह के कारण कई समस्यायें जन्म लेती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कम उम्र में गर्भधारण करने से एक तरफ़ लड़कियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है तो दूसरी ओर उनके गर्भक्षमता में वृद्धि भी होती है। इसके अलावा बचपन की शादी के बाद जब ऐसे दंपत्ति युवा होते हैं तब उनके ईर्द-गिर्द की परिस्थिति में बदलाव हो चुका होता है और इसका परिणाम यह होता है कि घरेलू हिंसा और तलक जैसी अमर्यादित घटनायें घटती हैं। बहरहाल बिहार में अभी भी बाल विवाह को रोकने के लिये कोई विशेष पहल नहीं किया जा रहा है। जबकि पुरे देश में वर्ष 2007 से ही बाल विवाह प्रतिषेध नियम लागू है और हमारे राज्य में इसके क्रियान्वयन के लिये कानून अब बनाया जा रहा है। हांलाकि इस कलंक को मिटाने की जिम्मेवारी केवल राज्य सरकार पर ही नहीं है, बल्कि राज्य के हर नागरिक का कर्तव्य है कि इसके लिये सामूहिक प्रयास करें। एक बार जब सामूहिक प्रयास होगा, तब संभव है कि बेटियों का बाप होने पर भी किसी को चिंता नहीं होगी और न ही कोई आनंदी बनेगी। |