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वैश्वीकृत भारत और आधी आबादी

- ब्यूटी सिंह (साभार : दैनिक तरुणमित्र, पटना)

बड़ी दिलचस्प घटना है। दिलचस्प इसलिए कि वह देश जहां स्त्रियों को शक्ति स्वरूपा माना जाता है, उसी देश के एक मंत्री ने हाल ही में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ निंदनीय टिप्पणी की। यह एकमात्र घटना नहीं है जब देश के तथाकथित जिम्मेवार पुरूष नेताओं ने महिलाओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की है। हालांकि आजकल भाजपा की कुछ महिला नेता भी ऐसी हैं जो आये दिन भारतीय महिलाओं को कभी बच्चा पैदा करने की मशीन तो कभी कुछ और की संज्ञा देती रहती हैं। अब सवाल उठता है कि क्या वह भारत जो आजकल मेक इन इन्डिया के नारों से गूंज रहा है, वहां महिलाओं को इंसान होने का अधिकार हासिल है?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो मैं लोकप्रिय अमेरिकी उपन्यासकार सिडनी शेल्डन के एक उपन्यास का उल्लेख करना चाहूंगी। उन्होंने अपने एक उपन्यास में एक नर्स का जिक्र किया था, जो नई-नई डॉक्टर बनी थी। अस्पताल में पहले दिन उसे कहा जाता है कि वह नर्सों के लिए बने चेंजिंग रूम का इस्तेमाल करे जबकि पुरुष डॉक्टरों के लिए अलग चेंजिंग रूम था। वह इस बात का विरोध करती है और डॉक्टर होने की हैसियत से पुरुष डॉक्टरों के लिए बने रूम का ही इस्तेमाल करती है जहाँ उसे पहले तो अजीब नजरों से देखा जाता है पर फिर बराबरी का अधिकार दिया जाता है।

यह उपन्यास करीब ढाई दशक पुराना है। बिल्कुल वह समय जब भारत ने वैश्वीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया था। तबसे लेकर आजतक भारतीय महिलाओं के लिए चीजें कितना बदली हैं, उसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। माना जाता है कि महिलाएं दुनिया का दो तिहाई काम करती हैं, बदले में दुनिया की आय का दस फीसद ही पाती हैं और उत्पादन के साधनों पर उनका सिर्फ एक फीसदी अधिकार है। यह स्थिति तब है जबकि हर समाज में महिलाओं का स्थान अद्वितीय है यानि उनकी जगह कोई नहीं ले सकता फिर भी वे सर्वाधिक वंचित हैं। घरों के अन्दर महिलाएं सबसे ज्यादा काम करती हैं और सबसे कम देखभाल मांगती हैं, वे पूरे परिवार की अकेले देखभाल करती हैं और अक्सर काम के अत्यधिक बोझ से दबी रहती हैं। कामकाजी महिलाओं के ऊपर यह दबाव और बढ़ जाता है। महिलाओं को यूँ भी कमजोर, हीन और दोयम दर्जे का मानकर समाज और परिवार शोषित करता आ रहा है। उनके प्रति पुरूषों के रवैये से कामकाजी महिलाओं को कार्यस्थल पर भी झेलना पड़ता है।

हालांकि वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के युग में ऊपरी तौर पर यह जरूर नजर आता है कि महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है, उन्हें शिक्षा और काम के नए अवसर मिल रहे हैं और पुरुषों से बराबरी करने के मौके भी। परन्तु क्या वाकई समाज में उनकी स्थिति में बदलाव हुआ है? और इसे हम सिर्फ शिक्षित शहरी महिलाओं के सन्दर्भ में न सोचें बल्कि ग्रामीण, असंगठित क्षेत्रों में काम कर रही महिलाओं को भी सम्मिलित करें तो पाएंगे कि सच्चाई कितनी भयावह है इसे समझने के लिए सबसे पहले हम ये जाने कि वैश्वीकरण के मायने क्या हैं और इसकी शुरूआत कैसे हुई।

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक वैश्वीकरण को आम तौर पर व्यापार की बाधाओं को दूर करने और राष्ट्रीय सीमाओं के पार विदेशी निवेश, निजी पोर्टफोलियो पूंजी और श्रम के मुक्त प्रवाह को प्रोत्साहित करने के लिए दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण के रूप में देखा जा सकता है। इसके माध्यम से पूरे विश्व में व्यापक रूप से एक ही संस्कृति का पालन किये जाने के उद्देश्य की पूर्ति की जा रही है जिसे हम उपभोक्ता संस्कृति कहते हैं। वैश्वीकरण सम्पूर्ण विश्व को पूंजीवादी बाजार के रूप में देखता है। बाजार आधारित इस व्यवस्था में कुछ बड़ी और अग्रणी कम्पनियाँ ही लाभान्वित होती हैं। भारत में मात्र 5 फीसदी लोग इस व्यवस्था से लाभान्वित हुए हैं। गरीब, दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, महिलाएं और बच्चे इसके शिकार हुए हैं।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि वैश्वीकरण के मूल में औपनिवेशिक शासन है जब यूरोप के देशों ने एशियाई देशों की प्राकृतिक सम्पदा और अनुकूल जलवायु पर अपनी नजर डाली थी। उन्होंने न सिर्फ प्राकृतिक सम्पदा का दोहन किया बल्कि सस्ते श्रम का भी शोषण किया। लगभग तीन सौ वर्षों के औपनिवेशिक शासन ने बड़ी मात्रा में लोगों को गरीब बना दिया, सिर्फ उनका साथ देने वाले चंद राजा, जमींदार आदि ही संपन्न बने रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अधिकांश देशों ने स्वतंत्रता तो हासिल कर ली परन्तु अपनी जरूरतों के लिए वे इन विकसित देशों पर निर्भर बने रहे। विकासशील देशों में विज्ञान और तकनीकी का महंगा आयात किया गया और ये देश संपन्न देशों के कर्जदार बन गए और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेने पर मजबूर हो गए, जिसकी शर्तें इतनी कठोर थी कि अंतत: हम मल्टीनेशनलों का मुंह ताकने लगे। उन्हें प्रवेश देने के लिए खेती की जमीनों पर कब्जा किया जाने लगा, लाखों किसान बर्बाद हो गए, जरूरी सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म होने लगी। और एक नए किस्म के उपनिवेशवाद में हम फंस गए। इस तरह वैश्वीकरण मात्र राष्ट्रों की एकीकृत अर्थव्यवस्था न होकर एक स्वतंत्र व्यवस्था के रूप में उभरा है।

वैश्वीकरण मुख्यत: तीन सिद्धांतों पर चलता है, मुक्त बाजार यानि सरकार के नियंत्रण से मुक्त ताकि संसाधनों का कुशलतम दोहन हो सके, आर्थिक वैश्वीकरण अर्थात माल व पूँजी का मुक्त प्रवाह जिससे प्रतिस्पर्धा बढे, उपभोक्ताओं को कम कीमत पर चुनाव का अधिकतम अवसर मिले और रोजगार के अवसर बढ़ें, एवं निजीकरण जिसमें सरकार के बदले निजी क्षेत्र सेवाएं प्रदान करें और ज्यादा प्रभावशाली साबित हों।

इन सिद्धांतों पर चलते हुए भारत में भी वैश्वीकरण के कुछ सकारात्मक प्रभाव दिखाई देते हैं, मसलन व्यापक व प्रभावशाली संचार व्यवस्था. विभिन्न कम्पनिओं के यहाँ आने से उत्पन्न हुए रोजगार के नए अवसर, जिन्होंने न सिर्फ पुरुषों बल्कि महिलाओं को भी अवसर प्रदान किये। महिलाओं को उच्च वेतन मिलने से उनके आत्मविश्वास और स्वतंत्रता में वृद्धि हुई। उनमें यह भाव जागृत हुआ कि वे भी पुरुषों की बराबरी कर सकती हैं।

इस प्रकार जैसे कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, वैश्वीकरण के भी दो रूप सामने आये हैं। वैश्वीकरण का भी एक गहन पक्ष है जो डराता है। भारत में लगभग कुल श्रमिकों में से महिलाओं की हिस्सेदारी 31 फीसदी है जिसमें से 75-76 फीसदी महिलायें असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। इन क्षेत्रों में न तो अच्छा वेतन है, न काम के निश्चित घंटे, न कोई जॉब सिक्यूरिटी न ही सामाजिक सुरक्षा। इन क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं के शोषण होने की संभावनाएं बहुत अधिक है। इस प्रकार एक तरफ जहाँ इन महिलाओं की कीमत पर कम्पनियाँ मुनाफा कमाती हैं वहीँ दूसरी ओर शोषण उनके शरीर, मन और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

असंगठित क्षेत्रों में काम की अनिश्चितता होती है, प्रतिस्पर्धा के इस युग में काम को बचाए रखने के लिए महिलाएं अक्सर देर तक और अपनी क्षमता से ज्यादा काम करती हैं। श्रमिक कानूनों को धता बताकर न सिर्फ असंगठित बल्कि आईटी आदि अच्छे क्षेत्रों में भी 12-12 घंटे काम लेना सामान्य माना जाने लगा है। प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न तनाव, मानसिक व शारीरिक थकान, काम के लम्बे घंटे स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक हैं ही, सामाजिक संबंधों के लिए भी घातक हैं और कई मनोविकारों को जन्म देते हैं।

तकनीकी विकास के चलते कई क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन के लिए मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है। इसके कारण रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। हथकरघा अथवा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में काम कर रही महिलाओं के ऊपर रोजगार संकट मंडरा रहा है। बेरोजगारी, ठेका अथवा अस्थायी काम का असर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं पर ज्यादा होता है।

इसके अलावा जिस समस्या से महिलायें अधिक प्रभावित होती हैं वह कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन। सामान्य तौर पर यह हर क्षेत्र की महिलाओं के साथ होता है चाहे वे संगठित हो या असंगठित। विशेष तौर पर रात की पाली में काम कर रही महिलाओं के साथ। वैश्वीकरण के चलते बीपीओ, कॉल सेण्टर नए रोजगार बनकर उभरे हैं पर इनमें काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा पर अक्सर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे कई भयावह प्रकरण हुए हैं जहाँ इन क्षेत्रों में काम करने वाली नवयुवतियां बलात्कार की शिकार हुई हैं और बेरहमी से मार डाली गयी हैं।

सेज या विशेष आर्थिक क्षेत्र में सरकार के श्रम कानून आम तौर पर लागू नहीं हैं। यहाँ काम कर रही महिलाएं हर तरह के शोषण का शिकार होती हैं। केंद्र और राज्य सरकारें सेज में हस्तक्षेप नहीं करतीं। ऐसे में यहाँ काम कर रहे श्रमिक पूर्ण रूप से अपने नियोक्ता की दया पर निर्भर हैं। एक उदहारण नोएडा स्थित सेज का है, जहाँ महिलाओं को यह कहकर ज्यादा रोजगार मिलता हैं कि वे विनम्र और ज्यादा उत्पादनशील होती हैं। यहाँ उनकी अनावश्यक शारीरिक जाँच होती है। यौन उत्पीडन की शिकायतें ज्यादा हैं। काम के लम्बे घंटे हैं, परन्तु उन्हें ओवरटाइम नहीं मिलता। कोई न्यूनतम मजदूरी तय नहीं है, और पुरुष श्रमिकों के मुकाबले उन्हें कम मजदूरी मिलती है। उन्हें मातृत्व अवकाश नहीं मिलता, यहाँ तक कि गर्भवती होेने के साथ ही उन्हें काम से निकल दिया जाता है। यहाँ का वातावरण दूषित और दमघोटू हैं जहाँ कई तरह की बीमारियों से महिलाये पीड़ित हो जाती हैं।

एक और क्षेत्र मैन्युफैक्चरिंग अथवा विनिर्माण उत्पादन है, जहाँ महिलाओं की एक अलग और कम दिखाई देने वाली भागीदारी है जो उप ठेका प्रणाली और घर आधारित काम से होती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनिओं के मशहूर ब्रांड के टी शर्ट पर घर बैठे बटन लगाना या जूते के फीते बनाना, ये ऐसे काम है जहाँ महिला श्रमिक निम्नतम सोपान पर हैं। यहाँ केवल प्रति टुकड़ा मजदूरी मिलती है, वो भी अत्यंत कम। महिलाएं घंटों न सिर्फ खुद काम करती हैं बल्कि अपने बच्चों और पूरे परिवार को इसमें लगा देती हैं। इस तरह घर से काम लेकर कम्पनियाँ बहुत सी जिम्मेदारियों से बच जाती हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक अन्य क्षेत्र है जहां महिलाओं के रोजगार में वृद्धि हुई है,घरेलू सेवाओं या बड़ी कंपनियों आदि के कार्यालयों को साफ करने के लिए महिलाओं की नियुक्ति की जाती है। ये नौकरियां ऐसी है कि जहाँ यूनियन बनाना बहुत मुश्किल है। ऐसे क्षेत्रों में अपने अधिकारों के लिए लड़ना असंभव दिखाई देता है। इन महिलाओं पर दोहरी मार पड़ती है, एक तो आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं तथा मजदूरी कम है, अस्वस्थ होने पर निजी चिकित्सक के पास जाना पड़ता है, सार्वजनिक परिवहन भी इनके लिए महंगे हैं। ऐसे में इन पर बोझ बढ़ा है , वास्तविक मजदूरी नीचे आ गयी हैं और काम की परिस्थितियां खराब है।

बहरहाल समाज और परिवार का दबाव भी कामकाजी महिलाओं पर पहले की अपेक्षा बढ़ा है। पहले ही काम के लम्बे घंटे और अपर्याप्त व असंतुलित पोषण से उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर होता है। घर पहुंचते ही उनसे घर , परिवार और बच्चों की देखभाल की उम्मीद की जाती है। बच्चों को अकेला छोडकर जाना माताओं के लिए ग्लानि और कुंठा का सबब बन जाता है। कामकाजी महिलाओं के लिए बच्चों की उचित देखभाल एक बड़ा मुद्दा होता है। असंगठित क्षेत्रों में काम कर रही माताओं के लिए तो किसी भी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं है, संगठित क्षेत्रों में भी क्रेच की सुविधा बहुत कम है और यदि है भी तो उचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बच्चे किसी रिश्तेदार, पडोसी या आया के भरोसे छोड़कर आना महिलाओं के लिए भावनात्मक तनाव का कारण बनता है जिसका असर उनके कार्य पर भी होता है।

वैश्वीकरण के कारण बड़ी पूंजी की दिलचस्पी खेती में बढ़ती जा रही है, वह खेती की जमीन हथियाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। भारत में ठेके पर खेती कुछ वर्षों से चल रही है। इसके अंतर्गत भूस्वामियों और ठेके पर खेती करने की इच्छुक कम्पनियों के बीच करार होता । वे अपनी जमीन बेच देते हैं या लगान की तय दर पर दे देते हैं। कई जगह छोटे भूस्वामी कम्पनियों के फार्म पर मजदूर के रूप में लग जाते हैं। इस तरह कृषि कार्य पारिवारिक न होकर पूरी तरह पूंजीवादी हो जाता है और उसका उद्देश्य अधिकतम मुनाफा कमाना बन जाता है। असंगठित महिला श्रमिक मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में काम कर रही हैं और इन नीतियों पर प्रतिकूल प्रभाव उन पर बहुत होता है. इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की दर बहुत कम है और लगातार गिर रही है। हमारी जनसंख्या वृद्धि दर ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी है परन्तु रोजगार दर घटी है, महिलाओं की मजदूरी कम हुई है। पुरुषों और महिलाओं की मजदूरी के बीच का अंतर बढ़ गया है। हालाँकि पुरुषों और महिलाओं दोनों की मजदूरी में कमी आई है, लेकिन महिलाओं की मजदूरी में अधिक कमी आई है।

जब से नवउदारवाद अपनाया गया है तब से दो चीजें हुई हैं। पहली, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार बिलकुल बंद हो गया है। दूसरी स्थापित सार्वजनिक उद्यमों को बेचा जा रहा है। कई देशों में सार्वजनिक क्षेत्र के मजदूर संगठनों को सबक सिखाने की मंशा से उद्यमों के निजीकरण की शुरूआत की गई। माना गया कि निजी क्षेत्र में मजदूर संगठन निष्प्राण हो जाते हैं। आर्थिक वैश्विकरण के साथ श्रमिक वर्ग की कठिनाइयों की दुनिया भर में वृद्धि हुई है। खासकर उन लोगों की जो कम कुशल हैं , विशेष रूप से कामकाजी महिलाओं के लिए कई गुना वृद्धि हुई है।

बहरहाल, वैश्वीकरण की इन तमाम बुराईओं के बीच महिलाओं के लिए कुछ आशान्वित करने वाली बातें भी हुई है। पहले के मुकाबले रोजगार के लिए महिलाओं को उन क्षेत्रों में भी अवसर मिल रहे हैं, जहाँ उनका प्रवेश वर्जित माना जाता था अथवा उनकी नगण्य भागीदारी थी। इसके साथ ही समाज में इस बात की स्वीकार्यता बढ़ रही है कि महिलाएं घर से बाहर काम करने निकलेंगी. कामकाजी महिलाओं बाकि महिलाओं के लिए भी रोल मॉडल बन रही हैं, वे न सिर्फ उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित कर रही हैं बल्कि उनका रहन-सहन, जीवन-शैली आदि भी बदल रहा है। महिलाएं अधिक आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बन रही हैं. अपने अधिकारों के हनन की तमाम चुनौतियों से बिना घबराये महिलायें उस पथ पर अग्रसर हो चुकी हैं जिस पर समाज ने कांटे बिछा रखे हैं. समाज उन काँटों को बीने अथवा नहीं, महिलाओं के बढ़ते कदम रुकेंगे नहीं।

लोहिया की नजर में नारी अस्मिता : सुमन सिंह

भारतीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में जन्में डॉ राममनोहर लोहिया अनिश्वरवादी थे। वह हिन्दू होते हुए भी हिन्दू धर्म की मूल-मान्यताओं के कट्टर विरोधी थे। व धर्म को ईश्वर से न जोड़कर, मानव प्राणियों की भलाई के एक साधन के रूप में मानते थे। वे वर्णाश्रम व्यवस्था को भारतीय समाज में कोढ़ मानते थे क्योंकि उस व्यवस्था ने न केवल शूद्रों के सामाजिक जीवन को नरक बनाया, अपितु नारी जगत् की दुर्दशा भी की। उन्होंने पाया कि भारतीय लोग विशेषकर, हिन्दू, पृथ्वी पर सबसे दुःखी प्राणी हैं। वे न केवल दरिद्र हैं, बल्कि रोगग्रस्त भी हैं। इसके अतिरिक्त उनकी आत्मा अर्थात् मानसिक स्थिति बहुत गिर चुकी है। वे कहते हैं कि, प्रश्न है कि हमारी दरिद्रता तथा रोग का कौन सा कारण है? जाति एवं नारी का पार्थक्य हमारी पतनावस्था के मुख्य कारण हैं। मैं मानता हूँ कि जाति एवं नारी के दो पार्थक्य मुख्यतः हमारी मनःस्थिति के ह्रास के लिए उत्तरदायी हैं। इन पार्थक्यों में साहस और आनंद को ध्वस्त करने का पर्याप्त सामर्थ्य है। निर्धनता और ये दो पार्थक्य एक दूसरे के जीवाणुओं पर आश्रित हैं।

 

अतः निर्धनता को समाप्त करना है तो इन दोनों के विरूध्द युध्द स्तर पर कार्य करना होगा। देश की सारी राजनीति में, चाहे जान-बूझ कर अथवा परंपरा के द्वारा राष्ट्रीय सहमति का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है और वह यह कि शूद्र और औरत जो कि पूरी आबादी की तीन-चौथाई हैं, उनको दबा कर और राजनीति से अलग रखा गया है, यों तो औरत का स्थान भारत में छोटा नहीं है। कहीं किसी आधुनिक देश में औरत प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति फिलहाल अचिन्त्य है। कई मंत्री या राजदूत भी रहीं हैं। लेकिन उससे आधी आबादी होने वाली औरतों की भारतीय समाज की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हैं। हिन्दुस्तान की नारी घर में देवी है और बाहर नगण्य है। साधारण तौर पर पैरों के तले और कभी-कभी सिर पर बैठती हैं। वह व्यक्ति नहीं हैं, करीब-करीब उसी तरह से जिस तरह से पश्चिम एशिया की नारी अथवा इतिहास के कुछ युगों में चीन की। पश्चिम एशिया में औरत एक सुन्दर खिलौना रही है। तफरीह के क्षणों में क़दर और प्रेम, फिर अवस्तु। वे कहते हैं कि कई सौ या हजार बरस में हिन्दू नर का दिमाग अपने हित को लेकर गैर बराबरी के आधार पर बहुत ज्यादा ग़ठित हो चुका है। उस दिमाग को ठोकर मार-मार करके बदलना है। नर-नारी के बीच में बराबरी कायम करना है।

 

यूरोप में नारी कभी भी किसी युग में असमानता की वैसी शिकार नहीं रही जैसी एशिया में। बहुत ढूँढा लेकिन बड़े युध्दों के अलावा कहीं और एक मर्द के एक से अधिक विवाह की घटना न मिली। मध्य युग में शालमन ने अपने सरदारों की विधवाओं से एक साथ विवाह किया। ऐसी कुछ और भी घटनाएँ रहीं हैं। किन्तु पुराने से पुराने युग से लेकर आज तक बहुपत्नी-प्रथा यूरोप के कानून में सर्वथा त्याज्य है। जहाँ तक हम जानते हैं, इस प्रश्न को लेकर अभी तक शोध नहीं हुआ है। हो तो मजेदार नतीजे निकल सकते हैं।

 

बहुपत्नी प्रथा पर क्षोभ प्रकट करते हुए डॉ0 लोहिया कहते हैं कि- हमारे यहाँ यह तो बड़ी विचित्र सामाजिक घटना है और समाज रचना है। मैंने कई लोगों से कहा, इस पर अध्ययन करो। यह तो पी-एच0डी0 का विषय है। क्या बात है कि हिन्दुस्तान में मर्द को तो अधिकार मिल गया और खाली हिन्दुस्तान ही नहीं अरबिस्तान, चीन में शादी करने का या रखैल रखने का। प्रेमिका की बात अलग है। यहाँ शादी की बात है। शादी तो आखिर एक सामाजिक घटना है और जबरदस्त घटना है। गोरी दुनिया में तो कोई मर्द एक साथ एक से ज्यादा औरत से, साधारण जमाने में, शादी नहीं कर पाया, लेकिन हमारी रंगीन दुनिया में उसको यह अधिकार परम्परागत रहा है। यह एक ऐसा विषय है कि जिसके ऊपर कोई अध्ययन करके किताब लिखे तो बहुत बढ़िया चीज होगी। यौन शुचिता की एक पक्षीय दृष्टि पर व्यंग्य करते हुए लोहिया कहते हैं कि हिन्दुस्तान आज विकृत हो गया है, यौन पवित्रता की लम्बी-चौड़ी बातों के बावजूद आमतौर पर विवाह और यौन के सम्बन्ध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं। सारे संसार में कभी-कभी मर्द ने नारी के सम्बन्ध में शुचिता, शुध्दता, पवित्रता के बड़े लम्बे-चौड़े आदर्श बनाये हैं। घूम फिर कर इन आदर्शों का सम्बन्ध शरीर तक सिमट जाता है, और शरीर के भी छोटे से हिस्से पर। नारी का पर-पुरुष न स्पर्श से हो। शादी के पहले हरगिज न हो। बाद में अपने पति से हो। एक बार जो पति बने, तो दूसरा किसी हालत में न आये। भले ही ऐसे विचार मर्द के लिए सारे संसार में कभी न कभी स्वाभाविक रहे हैं, किन्तु भारत भूमि पर इन विचारों की जो जड़े और प्रस्फुटन मिले वे अनिवर्चनीय हैं।

 

अष्ट वर्षा भवेत गौरी यह सूत्र किसी बड़े ऋषि ने चाहे न बनाया हो लेकिन बड़ा प्रचलित है आज तक। इसे जकड़कर रखो, मन से, धर्म से, सूत्र से, समाज संगठन से और अन्ततोगत्वा शरीर की प्रणालियों से कि जल्दी से जल्दी लड़की का विवाह करके औरत को शुचि, शुध्द और पवित्र बनाकर रखो। विवाह से कन्या पवित्र नहीं होती तब तक उसको असीम अकेलेपन में जिन्दगी काटनी पड़ती है।

 

यौन शुचिताको केन्द्र में रखकर जाने कितने धर्म ग्रन्थ लिखे गये। सभी में स्त्री ही लक्ष्य बनायी गयी और उसी के कोमल हृदय का आखेट किया गया। पुरुष की यौन शुचिता, पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए किसी ऋषि, महर्षि ने कोई श्लोक नहीं लिखा। उसके लिए विवाह से पूर्व या विवाह के पश्चात् यौन शुचिता का कोई प्रतिबंधित नियम नहीं बनाया गया। वो सदैव से स्वतंत्र और स्वच्छंद रहा। स्त्री और पुरुष की यौन-शुचिता के लिए निर्धारित इन असमान प्राचीन अवधारणाओं से लोहिया की बौध्दिकता विचलित व आहत होती रही। वे स्त्री-पुरुष को समानता के धरातल पर देखना चाहते थे। वे कहते थे कि आज के हिन्दुस्तान में एक मर्द और एक औरत शादी करके जो सात-आठ बच्चे पैदा करते हैं उनके बनिस्बत मैं उनको पसंद करूँगा जो बिना शादी किये हुए एक भी या एक ही पैदा करते हैं। या, लड़की यानी उसके माँ-बाप दहेज देकर, जिसे समाज कहेगा अच्छी-खासी शादी की, उसको मैं ज्यादा खराब समझूँगा बनिस्बत एक ऐसी लड़की के जो कि दहेज दिये बिना दुनिया में आत्म-सम्मान के साथ चलती है और फिर ऐसे कुछ प्रसंग हो जाते हैं कि समाज कहे कि यह कहाँ कि छिनाल आई। मर्द छिनालों की तो हिन्दुस्तान में निन्दा नहीं होती लेकिन औरत छिनालों की निन्दा हो जाती हैं। संसार में सभी जगह थोड़ा-बहुत ऐसा है। यह वृत्ति भी छूट जानी चाहिए। और खास तौर में राजनीति में जो औरतें आएँगी वह तो थोड़ी-बहुत तेजस्वी होंगी, घर की गुड़िया तो नहीं होंगी। घर की गुड़िया क्यों समाजवादी दल, कांग्रेस दल या कम्युनिस्ट दल में आएगी । जब वह तेजस्वी होगी तो जो परंपरागत संस्कार हैं उनसे टकराव हो ही जाएगा। मैं जानता हूँ कि समाजवादी दल में भी ऐसे कुछ लोग हैं जो नाक-भौं सिकोड़ते हैं। आज के हिन्दुस्तान में किसी औरत की निंदा तो करनी ही नहीं चाहिए। केवल जहाँ तक विचार का संबंध है उसमें भी मैं समझता हूँ बहुत संभल कर उसके बारे में कुछ बोलना चाहिए।

 

महाभारत में द्रौपदी के चरित्र की लोहिया जी ने खूब सराहना की है उनकी दृष्टि में द्रौपदी एक ऐसी विदुषी नारी थी जिसने कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार नहीं खायी। वे आगे कहते हैं कि नारी को गठरी के समान नहीं बनना है, परंतु नारी इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए कि वक्त पर पुरुष को गठरी बनाकर अपने साथ ले चले।

 

लोहिया स्त्री को शक्तिस्वरूपिणी मानते थे किन्तु वैसे नहीं जैसे कि हमारे धर्मग्रंथों में वर्णित है। धर्मग्रंथ नारी को देवी के रूप में पूजनीय बताते हैं तो व्यवहारिक जीवन व सभ्य समाज में ताड़न के अधिकारी भी सिध्द करते हैं। लोहिया ऐसी दोहरी मानसिकता पर क्षुब्ध होकर कहते हैं- यह सही है कि भारत की नारी जैसी एक अर्थ की संज्ञा व्यापक अर्थ में नहीं है। कई प्रकार की और वर्गों की नारियाँ हैं। एक तरफ खेत मजदूरिनें हैं, जो राम को सीता के मुँह से पापी कहलवाने वाली सोहरें गाती हैं और जिनमे तलाक हमेशा चालू रहा है। दूसरी तरफ ऐसी मध्यम-वर्ग की और सनातनी नारियाँ हैं जो दिमाग और वचन से, कर्म चाहे भले ही अन्य दिशाओं में फूट पड़ता हो, राम को ही अपना आराध्य मानती हैं, चाहे वह अग्नि परीक्षा लेने के बाद भी वनवास दे दें। वह तो जंगलीपन था। राम ने जिस तरह से सीता के साथ व्यवहार किया है, हिन्दुस्तान की कोई भी औरत राम के प्रति कैसे कोई बड़ा स्नेह कर सकती है, इसमें मुझे कई बार बड़ा ताजुब्ब होता है।

 

यह कहना कि राम जनतंत्र का कितना उपासक था कि एक धोबी के कहने से उसको (सीता) निकाल दिया लेकिन अग्नि-परीक्षा वाला कौन सा मौका था। उस वक्त क्या माँग थी। अगर मान भी लो, थोड़ी देर के लिए कि जनता में से किसी एक ने यह माँग की थी तो जनतंत्र यह है कि कोई कह दें। सवाल यह उठता है कि अगर वे जनतंत्र के इतने बड़े उपासक थे तो क्या राम के पास कोई और रास्ता नहीं था। वे सीता को लेकर, गद्दी छोड़कर वनवास फिर से नहीं जा सकते थे? यदि गाँधी जी आज जिंदा होते तो मैं उनसे कहता कि आप रामराज की बात न करें। यह अच्छा नहीं है। इसलिए मैं सीता-रामराज की बात कहता हूँ। यदि सीतारामराज कायम करने की बात देश के घर-घर में पहुँच जाए तो औरत-मर्द के आपसी झगड़े हमेशा के लिए खत्म हो जाएँगे और तब उनके आपसी रिश्ते भी अच्छे होंगे। जाने कितने वर्षों से नारी पतिव्रत-धर्म निभाती आ रही है। एक पत्नी को अपने पति की लंबी आयु के लिए जाने कितने व्रत-उपवास के विधि-विधानों का पालन करना पड़ता है पति को परमेश्वर मान पूजा करने की अनगिनत विधियाँ हमारे धर्मग्रंथों में बतायी गयी है। पर दूसरी ओर पतियों के लिए ऐसा कोई भी कर्म-धर्म नहीं बताया गया है। धर्मशास्त्रों में पति के लिए पत्नीव्रत जैसी कोई अवधारणा ही नहीं है, इस विषय पर सारे धर्मग्रंथों ने मौन साध रखा है।

 

डॉ0 लोहिया ने भारतीय समाज की इस अराजक, असमान स्थिति की ओर भी तथाकथित सभ्य समाज का ध्यान आकृष्ट कराया है- सावित्री के लिए हिंद नर और हिन्दू नारी दोनों का दिल एकदम से आलोड़ित हो उठता है कि वह क्या गजब की औरत थी। अगर हिन्दू किंवदन्ती में ऐसी पतिव्रता का किस्सा मौजूद है कि जो यम के हाथों से अपने पति को छुड़ा लाई, तो कोई किस्सा हमको ऐसा भी बताओ, किसी पत्नीव्रत का, कि जो अपनी औरतों के मर जाने पर यम के हाथों से छुड़ाकर लाया हो और फिर से उसको जिलाया हो। आखिर मज़ा तो तभी आता है जब ऐसा किस्सा दो तरफ होता है। पतिव्रत की तरह पत्नीव्रत का किस्सा नहीं है। तो फिर इतना साफ साबित हो जाता है कि जब कभी ये किस्से बने या हुए भी हों तब से लेकर अब तक हिन्दुस्तानी दिमाग में उस औरत की कितनी जबरदस्त कदर है जो कि अपने पति के साथ शरीर, मन, आत्मा से जुड़ी हुई है और वह पतिव्रता या पतिव्रत धर्म का प्रतीक बन सकती है। इसके विपरीत मर्द का औरत के प्रति उसी तरह का कोई श्रध्दा या भक्ति का किस्सा नहीं है।

 

लोहिया ने दहेज-प्रथा का जमकर विरोध किया। शादी-ब्याह में लड़कियों का चाय-नाश्ता लेकर बेजुबान पशु की तरह खड़े रहना और बिना उनकी इच्छा जाने किसी पराये खूँटे पर बाँध दिये जाने की भारतीय परंपरागत प्रवृत्ति ने लोहिया के संवेदनशील हृदय में हलचल मचा दिया था वे कहते हैं,- बिना दहेज के लड़की किसी मसरफ की नहीं होती, जैसे बिन बछड़े वाली गाय। नाई या ब्राह्मण के द्वारा पहले शादियाँ तय की जाती थी उसकी बनिस्वत फोटू देखकर या सकुचाती-शरमाती लड़की द्वारा चाय की प्याली लाने के दमघोंटू वातावरण में शादी तय करना हर हालत में बेहूदा है।

 

हमारे समाज की विडंबना है कि स्त्रियाँ स्वयं ही एक दूसरे के प्रति क्रूर व असंवेदनशील हो जाती हैं। किन्हीं मामलों में तो इतनी हिंसक हो जाती हैं कि विश्वास करना कठिन हो जाता है कि उनमें कोमल हृदय भी निवास करता हैं दहेज-हत्या के अनगिनत मामलों में पारिवारिक स्त्रियों की ही अधिकाधिक भूमिका होती है। इस संदर्भ में लोहिया कहते हैं कि समाज क्रूर है और औरतें तो बेहद क्रूर बन सकती हैं, उन औरतों के बारे में विशेषतः अगर वे अविवाहित हों और अलग-अलग आदमियों के साथ घूमती-फिरती हैं, तो विवाहित स्त्रियाँ उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं, उसे देखकर चिढ़ होती है। इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी खत्म नहीं होगा।

 

भारतीय समाज में कन्या-भ्रूण हत्या मामूली सी बात है जो सदियों से होती आ रही है। भारतीय धर्म-ग्रंथों में विभिन्न पाप कर्मों हेतु दण्ड-विधान वर्णित है। लेकिन जिस कन्या को देवी मानकर पूजा करने की प्रथा है उसकी कोख में ही नृशंस हत्या कर दी जाती है या पैदा होने के पश्चात् दूध में डुबाकर मार दिया जाता है। अथवा कूड़ेदान में, या सड़क किनारे फेंक दिया जाता है। अपनी संस्कृति और सभ्यता का महात्म्य गाने वाला देश मंदिर की सीढ़ियों पर रोती-बिलखती नवजात का करुण-क्रंदन नहीं सुन पाता। वह उस मासूम अनाथ बच्ची से कहीं ज्यादा असहाय बन जाता है और मूक-बधिर बन भविष्य में लिंग-अनुपातों की असमानता से होने वाले भयंकर परिणामों की तरफ से अपनी ऑंखें मूँद लेता है।

 

लोहिया कहते हैं कि हिन्दुस्तान में कई जातियाँ ऐसी हैं कि उनके माता-पिता को लड़की जनमते दुःख होता है और पैदा हुई कन्या की वे हत्या कर देते हैं। इस तरह की कन्या हत्याएँ होती रहेंगी तो इस देश में न्याय प्रवृत्ति बढ़ना महज असंभव है। घरेलू हिंसा की शिकार स्त्रियों की दुर्दशा से विचलित लोहिया कहते हैं कि भारतीय मर्द इतना पाजी है कि अपनी घर की औरतों को वह पीटता है। सारी दुनिया में शायद औरतें पिटतीं हैं, लेकिन जितनी हिन्दुस्तान में पिटती हैं, उतनी और कहीं नहीं। मुस्लिम समाज में बहुपत्नी प्रथा और बुर्का के प्रचलन से लोहिया क्षुब्ध रहते थे। विधवा स्त्री की दीन-हीन अवस्था पर व्यथित होकर लोहिया ने कहा कि विधवा औरत क्रूरता का अवशेष, दुनियाभर में खास करके हिन्दुस्तान में रही है।

 

वे मानते हैं कि जब तक शूद्रों, हरिजनों और औरतों की खोई हुई आत्मा नहीं जगती और उसी तरह जतन तथा मेहनत से उसे फूलने-फलने और बढ़ाने की कोशिश न होगी, तब तक हिन्दुस्तान में कोई भी वाद, किसी तरह की नई जान लायी न जा सकेगी। निःसंदेह डॉ0 लोहिया एक मानववादी चिंतक थे, क्योंकि वे मानव कल्याण के प्रति अपनी आस्था निरंतर बनाये रखने में सक्षम रहे। नकारात्मक दृष्टि से वे ब्राह्मणवाद, वणिकवाद, छूआछूत, जातिवाद, वर्णवाद, निर्धनता, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयवाद धर्मांधता, हिंसा आदि के कट्टर विरोधी थे और सकारात्मक रूप में वे समाजवाद, समता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व आदि के मूल्यों पर आधारित नयी समाज व्यवस्था के हिमायती थे। उनकी मान्यता थी कि हर संघर्ष में जो सबसे नीचे दबे हुए मानव प्राणी हैं और जिनके पास रोटी, कपड़ा, और मकान का कोई साधन नहीं है, उन्हें सर्वप्रथम उठने के अवसर देना चाहिए। समाज तथा राज्य दोनों का यह दायित्व है। इन्हीं स्त्री-पुरुषों ने एक लंबी और कष्टदायक राह का सफ़र किया है। स्पष्ट है कि मनुष्य के लिए स्वतंत्रता, समता, सुख और शांति की प्राप्ति कराने हेतु डॉ0 लोहिया बड़े ही सजग एवं सक्रिय थे।

 

* लेखिका हरिश्चन्द्र स्‍नातकोत्तर महाविद्यालय, वाराणसी (उत्तरप्रदेश) में अंशकालिक हिन्दी प्रवक्ता हैं।

 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : प्रेमसंबंध और सशक्तिकरण

- कुलीना कुमारी(महिला अधिकार अभियान मासिक पत्रिका की संपादक)

प्रेम संबंध और सशक्तिकरण महिलाओं के संदर्भ में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। इतिहास ही नहीं वर्तमान के भी कुछ प्रसंग हमें बताते हैं कि प्यार का रिश्ता मनुष्य के जीवन को किस तरह प्रभावित करता है, प्यार का सकारात्मक स्वस्थ रिश्ता शारीरिक मानसिक रूप से भी मजबूती की ओर ले जा सकता है। प्यार की इस क्षमता को पहचान कर महसूस कर कितने ही लोग मुश्किल से मुश्किल कठिनाइयों को भी पार करने के लिए सहर्ष तैयार खड़े रहते हैं। ऐसे ही प्रेम में पड़कर जीवन साथी का चुनाव करना और इसके लिए परिवार समाज से बगावत के लिए भी तैयार रहना वर्तमान संदर्भ के कई महवपूर्ण उदाहरण है।

 

संयोगवश वैलेंटाइन डे के बाद महिला दिवस आता है, अतः प्रेम और महिला सशक्तिकरण के बीच संबंध पर चर्चा प्रासंगिक है। सेंट वैलेंटाइन डे के इतिहास के संबंध में कैथोलिक चर्च ने एक से अधिक वैलेंटाइन की पहचान की है जिनके नाम वैलेंटाइन या वैलेंटिनस था। प्रथम संदर्भ के अंतर्गत सेंट वैलेंटाइन के योगदान को इस रूप में याद किया जाता है जब तीसरी शताब्दी के दौरान रोम के क्लैडियस द्वितीय शासन के समय ये घोषित किया गया कि अविवाहित सैनिक अच्छा योद्धा साबित होगा,

 

इसीलिए उसे शादी की इजाजत नहीं होगी, सेंट वैलेंटाइन ने इस फैसलों को गलत समझा और सैनिक प्रेमी जोड़े को छुपकर शादी कराने लगा, जब क्लैडियस द्वितीय को इसकी जानकारी मिली, तो उसके आदेश से सेंट वैलेंटाइन को मार दिया गया।

 

वैलेंटाइन के संबंध में दूसरा संदर्भ ये है कि एक वेलेंटाइन ने रोम शासन के समय जेल में उत्पीड़न किया जा रहा कुछ क्रिश्चियन को बचाने में मदद की। इसी दौरान उसको जेलर की बेटी से प्यार हो गया, उसके प्यार में आकर उसने जेलर की बेटी को तुम्हारा वैलेंटाइन कहते हुए कई रोमांटिक पत्र लिखे प्रेम से संबंधित कई गिफट भी भेजे जिसके लिए उसे मौत के घाट उतार दिया गया। वैलेंटाइन के प्रेम और इसकी वजह से हुए बलिदान को समाज ने बाद के वर्षों में स्वीकार किया और इसे बड़े पैमाने पर 15वीं शताब्दी के बाद से वैलेंटाइन डे के रूप में मनाया जा रहा है।महिलाओं के द्वारा महिलाओं के लिए प्रेमसंबंध के अधिकार का प्रथम प्रयास साहित्य के माध्यम से 18वीं शताब्दी के अंत में मैरी वोल्फस्टोन क्राट के द्वारा किया गया। इन्होंने लेखनी के माध्यम से बंधनयुक्त विवाह का विरोध किया और उन्मुक्त प्रेम संबंध की वकालत की। 1788 में अपने उपन्यास मैरी: ए फिक्शन में उन्होंने महिला को बच्चा पैदा करने वाली मशीन मानने से भी इंकार किया। धीरे-धीरे जागरूकता आती गई। सन 1855 में मैरी गोव निकोलस ने उन्मुक्त प्रेम संबंध की वकालत की व विवाह संस्था का विरोध यह कहते हुए किया कि पत्नी ससुराल में पुरुष की संपिा के रूप में देखी जाती है व वह पूरी तरह पुरुष द्वारा नियंत्रित की जाती है जो कि गलत है।

 

सन 1857 में मिनरवा पुटनाम ने भी उन्मुक्त प्रेम संबंध की वकालत की और शिकायत किया कि इसके पक्ष में समाज खड़ा हो नहीं रहा। सन 1987 में एक प्रसिद्ध महिलावादी ग्लोरिया स्टेनम ने भी उन्मुक्त प्रेम संबंध की वकालत करते हुए कहा कि एक महिला को भी पुरुष की जरूरत होती है। उन्मुक्त प्रेम संबंध को सामाजिक परिवर्तन का वाहक भी बताया। सीमोन द बोआ हिंदी अनुवाद, स्त्री उपेक्षिता की लेखिका है, उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से महिलाओं के प्रेम संबंध की खुली चर्चा की तथा इसे जीवन व्यवहार में भी अपनाया। इन तमाम महिलाओं का कार्य व्यवहार महिलाओं की सोच को और आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

 

वर्तमान समय में लेखनी, कला व संगीत के माध्यम से कई जागरूक महिलाएं उन्मुक्त प्रेम संबंध की वकालत कर रही है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रेम संबंध को अभी सामाजिक स्वीकृत नहीं मिली है। एक अनुमानित आंकड़े के मुताबिक पश्चिमी देशों के 3000 प्रेम प्रसंगों की तुलना में हमारे यहां 1550 अर्थात करीब आधे प्रेम प्रसंग पाए जाते हैं। यद्यपि उच्चवर्गीय व पढ़े-लिखे कुछ परिवारों ने प्रेम संबंध को पिछले शतक से छिट-पुट तौर पर मंजूरी देना आरंभ कर दिया है। सूचिता कृपलानी, अरुणा आसफअली, इंदिरा गांधी, शीला दीक्षित, बसुंधरा राजे, पंडिता रमाबाई जैसे अनेकों उदाहरण स्थापित है। इन सबको देश में खासा सम्मान मिला हुआ है।

कानूनी तौर पर महिलाओं को प्रेम संबंध की मंजूरी लिव इन रिलेशनशिप के रूप में दी गई है जिसका बड़ा उदाहरण हिंदी सिनेमा उद्योग और दूरदर्शन कलाकारों के बीच देखा जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद 99 प्रतिशत महिलाएं अपने प्रेम संबंध को बयान नहीं कर पाती है जिसकी एक बड़ी वजह महिलाओं द्वारा यौन अपराध सहन करना व यौन संचारित रोगों से भी जूझना है। महिलाओं के बीच प्रेम संबंध की अभिव्यक्ति के अभाव में कुछ अन्य समस्याएं भी पाई जाती है। जिसमें महिलाओं का तनावग्रस्त रहना, गाली-गलौज बोलना व वैवाहिक संस्था में विश्वास का अभाव प्रमुख है। इसके बावजूद महिलाओं को अपनी स्वैच्छा से प्रेमसंबंध बनाने की आजादी सामाजिक व्यवहार में शामिल नहीं है। ऑनर किलिंग की घटनाएं इसके विद्रूप उदाहरणों में से एक है। हमारे समाज में पाए जाने वाले इसके अन्य विद्रूप उदाहरण में शामिल है, वैवाहिक पत्नी को अभी तक पुरुष की संपिा के रूप में देखा जाना व प्रेम संबंध बनाते वक्त स्त्री की आवश्यकता, तरीका व उसके आनंद के प्रति सजग नहीं होना।

 

महिला अधिकार अभियान द्वारा वैलेंटाइन डे के उपलक्ष्य पर प्रेम संबंध व संतुष्टि के विषय पर एक सर्वे किया गया जिसमें 50 से अधिक महिलाओं ने भागीदारी ली। 24 महिलाओं से पूछे गए प्रेम संतुष्टि के सवाल पर सीधा जवाब था सामाजिक तौर पर बच्चे जनने के अलावा कोई खुशी या आनंद भी प्रेम संबंध से मिलता है, यह वैवाहिक जीवन के दशकों पार करने के बाद भी नहीं पता चला। 13 महिलाओं ने यह शिकायत की कि प्रेम संबंध के दौरान शारीरिक अंतर्संबंध बनाने से पूर्व प्रेमातुर करने की प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती, जिस कारण से प्रेम संबंध में प्रेम का अनुभव नहीं होता। 4 महिलाओं ने प्रेम संबंध और संतुष्टि के प्रसंग पर कहा कि हमने शुरूआत में जब प्रेमसंबंध को संतुष्टि में बदलने के लिए पहल की ताकि मुझे भी आनंद का अनुभव हो तो मेरे इस पहल को उन्होंने आवश्यक नहीं समझा, मुझ पर व्यंग्य किया व सार्वजनिक रूप से भी फब्तियां कसी, तब से प्रेम संतुष्टि पर मैंने सोचना छोड़ दिया और पति के संतुष्टि पर निर्भर हो गई। 2 महिलाओं ने कहा कि वैवाहिक जीवन से ही हमने प्रेम संबंध को संतुष्टि से जोड़ने व आनंददायक बनाने के लिए पति से पहल की और पति ने साथ निभाया । आठ महिलाओं का प्रेम संबंध और संतुष्टि के विषय में बताया कि किसी कारणवश विवाहेार संबंध होने पर संतुष्टि महसूस किया फिर वैवाहिक जीवन में उस अनुभव को लागू किया। अब मेरा वैवाहिक प्रेम संबंध संतुष्टि और आनंद का सम्मिश्रण है। इस संतुष्टि के कारण पति-पत्नी के बीच आस्था भी विकसित हुआ।

 

इस सर्वें के माध्यम से हमने पाया कि जिन युगल जोड़े का प्रेमसंबंध आनंददायक था, वे असंतुष्टों की तुलना में अधिक विश्वासपूर्ण व सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे। अतः प्रेम का एक रूप वह ज्वाला है जिसके दायरे में कई परिवार आ सकते हैं वही प्रेम का दूसरा रूप वह शीतल कण है जो दुश्मन को भी दोस्त बना सकता है।

 

प्रेम के उन्मुक्त संबंध को लेकर भारतीय ऐतिहासिक दृष्टि से अंजनि एक महवपूर्ण नाम है। हनुमान की मां अंजनि ने अपने प्रेम को महिला अधिकार से जोड़कर दुनिया के सामने रखा और प्रेम संबंध से उत्पन्न बेटे को उन्होंने सिर्फ अपना नाम दिया। इनके प्रयास से प्रेम संबंध और महिला अधिकार की वास्तविक समझ सामने आई। ये उदाहरण वास्तव में महिलाओं की प्रेम की शुरुआती आजादी और अधिकार की अभिव्यक्ति का सवाल माना जा सकता है। (जैसा कि ज्ञात है हनुमान अंजनि पुत्र के रूप में पहचाने जाते हैं। वैसे अंजनि पर अत्यधिक पुरूषवादी दबाव पड़ने पर उन्होंने हनुमान को पवन पुत्र कहा, जिसका मतलब होता है हवा अर्थात अदृश्य यानी कोई नहीं।) कुछ अन्य ऐतिहासिक महिलाएं जिन्होंने विवाह से पूर्व या फिर विवाहेार संबंध अपने प्रेम संतुष्टि के लिए बनाए उसमें रामायण के महिला पात्रों में कौशल्या, कैकेयी व सुमित्रा का नाम आता है। (रामायण के अनुसार जब दशरथ कमजोर पुरुष साबित हुए व वंश समापन की ओर था, उस स्थिति में पति के द्वारा ही पहल किए जाने पर श्रंृगी ऋषि को बुलाया गया व वंश वृद्धि के उद्देश्य से दशरथ की पत्नियों ने प्रेम संबंध बनाए। श्रृंगी के साथ प्रेम संबंध महिलाओं के लिए इतना आनंददायी था कि सभी बच्चे स्वस्थ पैदा हुए।

)

महाभारत के महिला पात्रों में जिन्होंने विवाहपूर्व या विवाहेार संबंध बनाए उसमें गंगा, सत्यवती, अंबा, अंबिके तथा कुंती का नाम प्रमुख है। महाभारत में गंगा के बारे में कहा गया है कि उसने पति शांतनु द्वारा पैदा हुए बच्चे को पालना नहीं चाहती थी, इसीलिए गंगा उसे पानी में फेंक देती थी, आंठवे बच्चे के रूप में भीष्म बनाम देवव्रत इसीलिए जीवित बचे क्योंकि शांतनु ने उसे पानी में फेंकने का विरोध किया, इसीलिए गंगा पति शांतनु को देवव्रत को सौंप दी और खुद पानी में विलीन हो गई।

 

(इस तथ्य के बारे में एक तर्क ये हो सकता है कि गंगा शांतनु की प्रेमिका हो, पत्नी नहीं तभी समाज के लिहाज व डर से अपने प्रेमसंबंध से उत्पन्न बच्चे को वह नष्ट करती रही। ये तर्क इसलिए भी उचित दिखता है क्योंकि आज भी समाज मां के रूप को सबसे अधिक श्रेष्ठ मानता है, इसलिए क्योंकि अगर स्त्री को बच्चे पैदा करने व पालने का सामाजिक सम्मान मिले तो उसे किसी भी हाल में नष्ट नहीं कर सकती और उसके जीवन व विकास के लिए हर संभव प्रयास करती है, इतना जितना कि कोई पुरुष बनाम पिता नहीं कर पाता। कई ऐसी महिलाओं का उदाहरण भी सामने आया है कि जहां समाज उसे प्रेम संबंध से उत्पन्न बच्चे को पैदा करने की इजाजत नहीं दी, वहां भी कुछ महिलाओं ने बच्चे को पैदा किया है, अगर उसे पाल नहीं पायी तो उसे मारा भी नहीं, कुंती ऐसी ही एक मां है जिसने विवाह पूर्व कर्ण को जन्म दिया लेकिन उसे नहीं पालने की स्थिति में जीवित पानी में डाल दिया ताकि कोई और पाल लें।

 

यहां गंगा के संदर्भ में यह जान पड़ता है कि सामाजिक डर से कई बच्चे नष्ट किए जाने के बाद जब उसे स्त्री के मातृत्व अधिकार का बोध हुआ तो उसने अपने बेटे देवव्रत को मारने से मना किया और सार्वजनिक रूप से अपने प्यार व बच्चे के सामाजिक अधिकार की मांग की। बात समाज के सामने आने पर शांतनु ने बेटे देवव्रत को अपने घर में तो रख लिया लेकिन उसे उाराधिकारी नहीं बनाया और गंगा को भी पत्नी का दर्जा नहीं दिया। महाभारत में गंगा की भूमिका के साथ बहुत अन्याय किया गया, उसे प्रेम में धोखा भी मिला, और चाहकर भी प्रेमी को पति के रूप में प्राप्त नहीं कर पायी, पिता के घर में रहने का उसके बच्चे को जगह तो मिला पर गंगा के बच्चे को पिता का बराबर का प्यार और अधिकार नहीं मिला। इतनी यांत्रणाएं झेलने के बावजूद इतिहास गंगा को बच्चे मारने वाली मां के रूप में याद करता है जो कि एक स्त्री के लिए बहुत ही दुखदायी और कष्टदायक है। गंगा ने शांतनु के साथ सच्चे मन से प्यार किया लेकिन शांतनु ने उसके प्रेम को अपमानित और कलंकित किया।

 

गंगा के साथ हुए अन्याय व प्रेमसंबंध के अपमान ने महाभारत को जन्म दिया, शांतनु ने गंगा के साथ प्रेम संबंध स्थापित करने के बावजूद उसे अपनाया नहीं लेकिन इसके बावजूद गंगा की प्रेम की सच्चाई ने उसे महाभारत की मजबूत स्तंभ भीष्म पितामह की जननी के रूप में अपनी उपस्थिति मजबूत की।

 

उपरोक्त तर्क इस सिद्धांत की वजह से भी मजबूती प्रदान करता है महाभारत में गंगा को नदी से जोड़ा गया है अर्थात पानी जो स्त्री का प्रतीक हैं परन्तु वास्तव में एक जीवस्त्री नहीं। हो सकता है कि उस स्त्री का नाम गंगा ही हो और उसे नदी के भी नाम होने के कारण भ्रम पैदा किया गया हो।

 

यद्यपि शांतनु ने स्त्री सुख के लिए बेटे देवव्रत को शादी के अधिकार तक से वंचित किया, इसलिए देवव्रत का प्रत्यक्ष कोई वंश नहीं बना लेकिन महाभारत गंगा पुत्र देवव्रत से शुरू होकर भीष्म के मौत के साथ खतम हो गई। महाभारत की दूसरी पात्र सत्यवती ने शांतनु से विवाह से पूर्व पराशर से प्रेम संबंध बनाया जिसके फलस्वरूप वेदव्यास हुए, प्रेमसंबंध से उत्पन्न वेदव्यास को महाभारत के सभी पात्रों में सबसे ज्ञानी माना जाता है और इसके माध्यम से सत्यवती को मिला ज्ञानवान वेदव्यास की मां बनने का गौरव मिला।

 

शादी के बाद सत्यवती को शांतनु से दो बेटे हुए। दोनों बेटे शादी के बाद बिताए शादीशुदा जीवनकाल के दरम्यान अच्छे पुरुष नहीं साबित हो पाए और युवाकाल में ही निसंतान मर गये तब सत्यवती ने अपने दोनों बहुएं अंबा तथा अंबिका को अपने प्रथम पुत्र अर्थात प्रेमसंबंध से उत्पन्न वेदव्यास से बहुओं को संबंध स्थापित करने के लिए कहा ताकि वंश की वृ़ि़द्ध हो सकें जबकि आज की तारीख में भारतीय समाज की हिंदु संस्कृति में जेठ का स्पर्श भी नाजायज माना गया है। पारिवारिक इजाजत से अंबा तथा अंबिके द्वारा विवाहेार संबंध बनाए जाने के बाद पांडु व धृतराष्ठ पैदा हुए। महाभारत में कहा गया है कि व्यास के जंगली रूप को देखकर अंबा व अंबिका संबंध बनाते वक्त डरती रही अर्थात आनंद नहीं प्राप्त किया इसीलिए उन दोनों के ही बच्चें धृतराष्ट्र व पांडु विकृत बच्चे के रूप में पैदा हुए। ये भी हास्यास्पद ही है कि जिस व्यास को महाभारत में ज्ञानी माना जाता है, उसे स्त्री के प्रेम संतुष्टि की समझ नहीं थी।

 

महाभारत की एक प्रमुख पात्र कुंती ने भी विवाह से पूर्व व विवाह के बाद विवाहेार संबंध बनाए। कुंती द्वारा विवाहपूर्व प्रेमसंबंध की परिणति कर्ण है लेकिन कुंती ने उसे अपनाया नहीं। विवाह के बाद पांडु के कमजोर पुरुष साबित होने पर इन्होंने पति की इच्छा व सहमति से तीन अन्य पुरुषों से अपनी शारीरिक आवश्यकता, प्रेम संतुष्टि व वंशवृद्धि के लिए प्रेम संबंध स्थापित किया और युधिष्ठिर, भीम और अर्जून को जन्म दिया। पांडु की दूसरी पत्नी माद्री ने भी कुंती के पदचिन्हों का अनुशरण करते हुए दो अन्य पुरुषों से प्रेम संबंध स्थापित किया और दो बच्चे नकुल और सहदेव का जन्म दिया। कुंती ने अपने प्रेमसंबंधों के बदौलत ही समाज में एक मजबूत स्त्री और मां की भूमिका निभाई और इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों से दर्ज करवा लिया। एक अन्य उदाहरण है शकुंतला का, उन्होंने प्रेम संबंध बनाया और उससे उत्पन्न बेटा भरत को सार्वजनिक रूप से स्वीकार की, बिना यह सोचे कि उसका पिता स्वीकार करेगा कि नहीं। शकुंतला ने भरत को ऐसे लालन-पालन किया ताकि मुश्किल घड़ी में भी वह सही तरीके जीवन जी सके। फिर हमारे देश भारत का नाम शकुंतला के प्रेम संबंध से उत्पन्न भरत के ऊपर पड़ा है। फिर हम भारतीय प्रेम को क्यों न पूजे ?

 

ऐसे कई उदाहरण आज भी प्रतीक बने हुए है महिलाओं के प्रेम की आजादी का और उसे समाज के सामने स्वीकृत करने की हिम्मत कर गर्व के साथ जीने का। इन महिलाओं में से कई को समाज में पूजा जाता है लेकिन आज के समाज व्यवहार में इन महिलाओं द्वारा स्थापित यौन शूचिता की समझदारी को वैध नहीं माना जा रहा है। जबकि पुरुष के व्यक्तित्व विकास के लिए प्रेम संबंध हेतु सामाजिक परिस्थितियों में मौन स्वीकृति मिली हुई है, ऐसी स्वीकृति स्त्री को भी क्यों न मिलें। स्त्री भी पुरुष के समान है।

 

अतः स्त्री को भी अपनी पसंद, खुशी व प्रेम संबंध से प्राप्त संतुष्टि का सामाजिक अधिकार चाहिए। जब किसी पुरुष द्वारा प्रेम संबंध में नये वस्त्र धारण करने के बाद पूरानी वस्त्र का उपयोग खतम हो जाती है, फिर महिला के लिए प्रेम संबंध को महिला शूचिता से क्यों जोड़ा जाय। क्यों न इसे महिला की एक अन्य जरूरी आवश्यकता के रूप में देखा जाय जिसकी जरूरत पर उपलब्ध स्रोतों से उपयोग किए जाने पर बात वही पर खतम हो और महिला को सजा का हकदारिनी न घोषित किया जाय न ही दंडित किया जाय। जब तक महिलाओं को प्रेम संबंध व संतुष्टि प्राप्त करने की आजादी नहीं मिलेगी यह महिला सशक्तिकरण के सवाल को बार-बार कटघरे में खड़ा करता रहेगा।

स्त्री विमर्श : मजहब और स्त्री

- फरहत नाज़

मैंने जिंदगी को नहीं चुना,जिंदगी ने मुझे चुना...अगर इन शब्दों का प्रयोग हर नारी करे तो शायद वो कभी अपने आप को कमज़ोर महसूस नहीं करेगी। एक नारी एक नई जिंदगी को भी जन्म देती है और वही इस संसार को भी चलाती है।

 

इतिहास भी इस बात का गवाह रहा है कि न सिर्फ भारत बल्कि कई देशों में नारी को हमेशा से उच्च स्थान प्राप्त रहा है। लेकिन बदलते वक्त के साथ नारी के अस्तित्व को भी एक गहरी चोट पहुंची है और जिस प्रकार आज नारी को सामने रखा जाता है, ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। बल्कि हम सब जानते हैं हर धर्मग्रंथ में नारी को एक उच्च स्थान मिला हुआ है।

 

हमारे समाज में भी कई ऐसी औरतें हैं जिन्होंने न सिर्फ कारोबार में बल्कि राजनीति,साहित्य खेल और सिनेमा में भी अपना नाम कमाया है। हर औरत एक दूसरी औरत के लिए अलग मिसाल बनना चाहें तो आसानी से बन सकती है बस फर्क है तो अपनी सोच को और विकसित करने का। रानी लक्ष्मी बाई,श्रीमति इंदिरा गांधी,कलपना चावला,महादेवी वर्मा,सरोजनी नायडू,सानिया मिरज़ा,मधुबाला बिछेन्द्री पाल ,मेरी कॉम,प्रिया झिंगन,प्रतिभा पाटिल के साथ मीरा कुमार का नाम उल्लेखनीय है | इनके अतिरिक्त और कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने रास्ते स्वयं बनायें और ये साबित करदिया कि वो बेहते हुए पानी की तरह अपनी राह खुद बनाने के लिए सक्षम हैं। जिन्होंने कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से इस पुरूष प्रधान देश में भी अपने आपको स्थापित किया |

 

महिलाओं कि अगर बात हो और फातमा बीबी का नाम न लिया जाये तो बात अधूरी ही रह जायेगी फातमा बीबी ने सर्वोच्य न्यालय में प्रथम न्यायाधीश बन कर ये सिद्ध कर दिया कि अगर हौसले बुलन्द हो तो फिर आपको कोई समस्या डगमगा नहीं सकती है। फातमा बीबी मुस्लिम समाज कि महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं, वह एक सच्चे मुसलमान के साथ सत्य पर हमेशा चलने वाली भारतीय के रूप में जानी जाती रही हैं |

 

अगर बात करें हिंदू धर्म कि तो वेदों में नारी के शील,गुण,कर्तव्य और अधिकारों का विशद वर्णन है। पहले स्त्रियों की शिक्षा दीक्षा की सुंदर व्यव्स्था थी और वे सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त वे युद्धों तक में जाती थीं और अपनी वीरता की एक अलग मिसाल कायम करती थी। ब्राह्मण ग्रंथों में भी नारी का गौरव वर्णित है। नारी को सावित्री कहा गया है। नारी अर्धांगिनी है,वह आत्मा का आधा अंश है। इसके साथ ही स्त्रियों का अपमान इन ग्रंथों में निंदनीय बताया गया है। मनुस्मृति में तो स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है। जहां इनका आदर नहीं होता ,या इनका अपमान होता है,वहां किए गए सारे धर्म-कर्म निष्फल हो जाते हैं।

 

अब बात करते हैं इस्लाम धर्म की तो हमे पता चलेगा कि यहां पर भी हमेशा से नारी को एक विशेष स्थान प्राप्त हुआ है। दरअसल बहुत लोग जब मुस्लिम लड़कियों या फिर मुस्लिम महिलाओं के बारे में सोचते हैं तो उन्हें लगता है कि वह दबी हुई,पिछड़ी और समानता के अधिकारों से वंचित हैं। इस तरह कि सोच और अधूरी जानकारी रखने वाले लोग इस्लाम को कुछ सांस्कृतिक रीतियों के अनुसार देखते हैं और यह बात समझ नहीं पाते कि इस्लाम ने सातवीं शताब्दी से ही महिलाओं को सबसे अधिक विकासशील अधिकारों के द्वारा सशक्त बनाया था।

 

ऐसे समय में जब अरब में नवजात बच्चियों को ज़िन्दा दफ्न किया जाता था और उन्हें हस्तान्तरणीय सम्पत्ति समझा जाता था,तब इस्लाम में महिलाओं को समाज में ऐसे अधिकार देकर सुरक्षित किया और उनका स्थान ऊंचा किया जो उससे पहले नहीं दिए गए थे।इस्लाम ने महिलाओं को शिक्षा का अधिकार,अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार,विवाह के बाद अपनी पहचान बनाए रखने का अधिकार,काम करने का अधिकार,सम्पत्ति की स्वामिनी होने और बेचने का अधिकार,कानून के द्वारा सुरक्षा पाने का अधिकार,मतदान का अधिकार और नागरिक और राजनैतिक मामलों में भूमिका अदा करने का अधिकार प्रदान किया। अल्लाह के प्रिय पैग़म्बर मुहम्मद(सल्ल.) ने सातवीं शताब्दी में ही घोषणा कर दी थी कि शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक मुस्लिम स्त्री और पुरूष का कर्तव्य है। पैग़म्बर(सल्ल.) की पत्नी हज़रत आयशा इस्लाम के सबसे बड़े विद्वानों में से एक थीं। यहां तक कि पैग़म्बर(सल्ल.) की मृत्यु के बाद दूर दूर से लोग हज़रत आयशा से ज्ञान सीखने के लिए आया करते थे।

 

अगर ये कहा जाये तो गलत नहीं होगा कि अगर मुहम्मद साहब कि पत्नी आयशा के योगदान को इस्लामिक कानून से हटा दिया जाये तो इस्लाम पूरा हो ही नहीं सकता है। इसके अलावा पैग़बर(सल्ल.) की पहली पत्नी हज़रत ख़दीजा(रजि.) जो बेवा होने के साथ साथ उनसे 15 साल बड़ी थी ,सबसे अधिक सफल महिला व्यापारी थीं और उन्होंने अपने धन के द्वारा अपने पति को और इस्लाम को सहयोग देने के लिए भी खर्च किया। प्रारम्भिक मुसलमानों में महिलाएं समाज की गतिविधियों में सक्रिय रूप से साझीदार होती रहती थीं। पैग़म्बर मुहम्मद(सल्ल.) ने यहां तक फरमाया है कि जन्नत तुम्हारी मांओं के कदमों के नीचे हैं...

 

इन सब बातों के बावजूद क्या वाकई कहा जा सकता है कि किसी भी मज़हब में औरतों को दबाने की बात की गई है,जबकि हर औरत ने एक मिसाल ही काय़म की है। एक पुरूष अगर शिक्षित है तो व्यक्ति विशेष के शिक्षित होने बात कही जाती है। मगर वहीँ जब एक महिला शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। उसकी आने वाली पीढ़ी शिक्षित होगी और वह अपने परिवार के साथ स्वस्थ्य समाज के निर्माण में मुख्य भूमिका निभा सकती है। इसका मतलब यह है कि पूरे संसार की डोर एक औरत के हाथ में ही होती है।

 

बहरहाल, मेरी व्यक्तिगत राय है कि जनक के पद से जननी का पद बहुत ऊंचा हैं। सृजन की संपूर्ण प्रक्रिया को जननी अपने उदर में सहेजती है। वह अपनी सांस से,अपने रक्त से,अपने स्वेद से,अपने पोर पोर से सृजन को पोषण देती है पर आज जो नारी का अस्तित्व सामने आ रहा है, जिस प्रकार उसकी इज्जत को सरेआम निलाम किया जा रहा है वो बेहद चिंताजनक है। इसका एक कारण खुद नारी ही हैं। हम एक ऐसे युग में पहुंच गए हैं जहां केवल प्रकृति और पुरूष ही रह गया है,जहां मां,बहन,बेटी,बहू नहीं केवल स्त्री मात्र ही रह गई है। ऐसे में नारी को अपनी संस्कृति को जीवित रखते हुए अपने आप को खुद मज़बूत करना होगा। अपनी सुरक्षा भी स्वयं करनी होगी तभी वो इस समाज़ की डोर को थामे रख सकती है।

ऐ औरत! तू अपनी ज़िन्दगी को खुद एक नयी राह दिखा।

हर किरदार निभा, पर खुदको कभी रुसवा न कर..

(लेखिका फ़रहत, दिल्ली में एक पत्रकार/सहाफ़ी हैं)

खास खबर : बिहार में अनुकंपा के भरोसे आधी आबादी, वोट देने के मामले में बिहार व गुजरात की महिलायें सबसे पीछे

पूरे बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या 2 करोड़ 52 लाख 84 हजार 439 है। वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में केवल 1 करोड़ 7 लाख 75 हजार 241 महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। कुल मतों की तुलना में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 44.46 फीसदी थी। यानी खुद की आधी आबादी से भी कम। हालांकि लोकतंत्र में महिलाओं की आधी हिस्सेदारी केवल मतदान के आंकड़ों से ही स्पष्ट नहीं होती है। महिला उम्मीदवारों की संख्या भी इस बात का सबूत है कि सूबे की राजनीति में महिलायें किस स्थान पर हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में कुल 46 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरी थीं। जबकि कुल उम्मीदवारों की संख्या 672 थी। इस प्रकार उम्मीदवारी के मामले में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरूषों की तुलना में केवल 6.3 फीसदी रही। जीतने वाली महिलाओं की संख्या चार थी। इस प्रकार जीत में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 2.9 फीसदी।

 

महिलाओं की हिस्सेदारी केवल बिहार में ही कम है, ऐसी बात नहीं है। अमूमन पूरे देश में महिलाओं की हिस्सेदारी कमोबेश एक जैसी है। हालांकि कुछ राज्यों में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक अच्छी है। मसलन नागालैंड जिसे मुख्य तौर पर अनुसूचित जनजाति के लोगों की बहुलता के लिए जाना जाता है। वहां महिला मतदाताओं की संख्या 48.77 फीसदी है। वर्ष 2009 में हुए चुनाव में वहां 89.22 फीसदी महिलाओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। मतदान में महिलाओं की यह हिस्सेदारी पूरे देश में सबसे अधिक रही। इसके अलावा तामिलनाड़ू में भी महिलाओं की भागीदारी 70 फीसदी के पार रही। यहां तक कि पड़ोसी राज्य झारखंड में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 55.27 फीसदी थी। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि गुजरात जैसे तथाकथित विकसित राज्य में भी महिलाओं की हिस्सेदारी बिहार की तुलना में थोड़ी अधिक है। गुजरात में 47.39 फीसदी महिलाओं ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में अपने मताधिकार का उपयोग किया था। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी 58.13 फीसदी रही।

 

वहीं चुनाव में लड़ने की बात करें तो बिहार की महिलायें देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक पिछड़ी हैं। यह हालत तब है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं की उम्मीदवारी विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की मांग की जा रही है। मौजूदा हिस्सेदारी इस मांग का एक चौथाई भी नहीं है। बतौर उदाहरण यह कि वर्ष 2009 में पूरे देश में कुल 556 महिलाओं ने अपना भाग्य आजमाया था। जबकि कुल उम्मीदवारों की संख्या 8070 थी। इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 6.3 फीसदी रही।

 

बहरहाल, बिहार में महिलाओं की हिस्सेदारी का एक दूसरा पहलू यह भी है कि यहां महिला उम्मीदवारों को जीत भी अनुकंपा के आधार पर मिलती है। कहने का आशय यह है कि मौजूदा में पांच महिला सांसदों में केवल मीरा कुमार ही एकमात्र सांसद हैं जिनकी पहचान उनके पति के कारण नहीं है। जबकि शेष अन्य महिला सांसदों यथा अश्वमेघ देवी (पति स्व. प्रदीप महतो), मीना देवी(पति स्व. अजीत सिंह), रमा देवी(पति स्व. बृजबिहारी प्रसाद) और पुतुल देवी(पति स्व. दिग्विजय सिंह) को राजनीति में जगह उनके पति के निधनोपरांत अनुकंपा के आधार पर मिली है।

खास खबर : सीएम के आदेश पर दबंगों की दबंगई भारी, महिला सशक्तिकरण के दौर में जिंदा है खाप पंचायती का दौर, दहशत में है फारबिसगंज की बीवी हसीना खातून का परिवार

पटना(अपना बिहार, 7 फ़रवरी 2014) - अररिया जिले के फारबिसगंज के आलम टोला में रहने वाली हसीना खातून का परिवार सीएम नीतीश कुमार द्वारा दो-दो बार निर्देश दिये जाने के बावजूद दहशत में जीने को विवश है। विवश इसलिए कि स्थानीय दबंगों ने आपस में पंचायत कर हसीना खातून और उनकी तीन बेटियों को चरित्रहीन करार दिया हुआ है। हसीना खातून की विवशता का एक सबब यह भी है कि इनके द्वारा स्थानीय पुलिस थाने में दर्ज कराये गये प्राथमिकी भी दंबगों की दबंगई के आगे खामोश है।

 

हसीना खातून की सजनून ने अपने परिवार पर दबंगों के जुल्म की कहानी को दो-दो बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में दुहरा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता को गुम हुए अब एक लंबा अरसा हो गया है। घर में एक मां हसीना खातून के अलावा वह तीन बहनें हैं। बड़ी बहन मजनूर गूंगी और बधिर है। छोटी बहन अभी स्कूल में पढ़ती है। सजनूर के मुताबिक उसने इंटर तक की पढा की है। वह आगे भी पढ़ना चाहती हैं। लेकिन स्थानीय दबंगों ने एक तरह से उसे घर में नजरबंद कर रखा है।

 

सजनूर ने बताया कि स्थानीय दबंग उसके परिवार की जमीन हड़पना चाहते हैं। इसी कारण से उसके परिवार पर जुल्म ढाया जा रहा है। इसी क्रम में स्थानीय दबंगों ने घर में घुसकर उसके परिजनों के साथ मारपीट की और 40 हजार रुपए के अलावा घर के आंगन में रखी गयी र्इंटें जबरन ढोकर ले गये। इस घटना में सजनूर की बड़ी बहन मजनूर को बेरहमी से पीटा। इस कारण वह गंभीर रूप से जख्मी हो गयी। सजनूर ने इस मामले की शिकायत स्थानीय थाने में दर्ज करवाया।

 

सजनूर ने बताया कि जब स्थानीय पुलिस ने दबंगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की तब उसने इस वर्ष 6 जनवरी को मुख्यमंत्री के जनता दरबार में इस बात की शिकायत की। उस दिन मुख्यमंत्री ने मजनूर का इलाज पीएमसीएच में कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया। सजनूर के अनुसार सीएम के निर्देश पर उसकी बहन का इलाज किया गया। लेकिन दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है। सजनूर के मुताबिक गांव के दबंग उसकी जमीन हड़पने के इरादे से उसे और उसके परिवार को गांव से भगा देना चाहते हैं। इस क्रम में गांव के दबंगों ने 14 मार्च 2009 को स्थानीय स्तर पर पंचायती कर तालिबानी फरमान जारी किया कि हसीना खातून और उनकी बेटियों के कारण गांव का माहौल खराब हो रहा है।

 

बहरहाल, सजनूर और उसका पूरा परिवार चाहता है कि कोई उसके खानदानी आशियाने को उजाड़े। इस जद्दोजहद में सजनूर से स्थानीय प्रशसन से लेकर सूबे के मुखिया तक से गुहार लगाया है। उसे इंतजार है कि मुख्यमंत्री के द्वारा दिये गये निर्देश के मुताबिक दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।

चर्चा में भी नहीं है आधी आबादी, महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने वाली पार्टियां भी कर रहीं परहेज

पटना (अपना बिहार, 5 फ़रवरी 2014) - संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियां भी महिलाओं को राजनीतिक समर से दूर रखने का प्रयास कर रही हैं। हालत यह हो गयी है कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लगभग हर पार्टी ने दरकिनार कर रखा है। महिलाओं को उम्मीदवार बनाने जाने के सवाल पर सभी पार्टियों ने एक तरह से मौन साध रखा है।

 

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान कुल 57 महिलाओं ने अपना भाग्य आजमाया था। जबकि कुल उम्मीदवारों की संख्या 811 थी। इस प्रकार महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 7 फीसदी थी। हालांकि इनमें से केवल 4 महिलाओं को जीत हासिल हो सकी। 37 महिला उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गयी। महिला उम्मीदवारों को प्राप्त हुए मतों की बात करें तो वर्ष 2009 में महिला उम्मीदवारों को कुल मतों के तीन फीसदी से भी कम मत प्राप्त हुए थे।

 

बताते चलें कि महिला आरक्षण विधेयक के जरिए लोकसभा और देश के सभी राज्यों के विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जिच बरकरार है। हालांकि इस विधेयक को कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी दलों का समर्थन प्राप्त है। इसके बावजूद यह विधेयक संसद में पारित नहीं कराया जा सका। इसकी वजह समाजवादी पार्टी और राजद आदि राजनीतिक पार्टियां रही। इन दलों के नेताओं ने विघेयक के वर्तमान स्वरूप में संशोधन की मांग की थी ताकि इसमें वंचित तबके की महिलाओं को भी पृथक रूप से आरक्षण दिये जाने की व्यवस्था हो।

 

वर्तमान में बिहार में तमाम राजनीतिक दलों ने महिालाओं के इस मुद्दे को दरकिनार कर रखा है। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव के विरोध के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक के वर्तमान स्वरूप को समर्थन देने वाले नीतीश कुमार ने भी अभी तक इस मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। विधयेक को अपना समर्थन देने वाली भाजपा के लिए भी यह मुद्दा मायने नहीं रखता। भाजपा की विधान पार्षद किरण घई के मुताबिक महिला आरक्षण विधेयक पार्टी के एजेंडे में शामिल है। अगर केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो इसे जरूर अमलीजामा पहनाया जाएगा। यह पूछे जाने पर कि क्या भाजपा इस बार 33 फीसदी सीटों प महिलाओं को उम्मीदवार बनायेगी, श्रीमती घई ने कहा कि यह निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को लेना है। इसी मुद्दे पर भाकपा माले की राष्ट्रीय नेत्री व ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव कविता कृष्णन ने कहा कि महिलाओं के आधिकार से जुड़े मुद्दों को लेकर उनकी पार्टी हमेशा सजग रही है। इन मुद्दों को पार्टी के घोषणापत्र में भी शामिल किया जाएगा।

 

महिला उम्मीदवारों की उम्मीदवारी के सवाल पर भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर ने सफाई देने के अंदाज में कहा कि उम्मीदवारी का निर्धारण राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर किया जाता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी अधिक से अधिक महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाने का प्रयास करेगी।

 

बहरहाल, इस मुद्दे पर राजद, कांग्रेस और अन्य पार्टियों में मौन की स्थिति है। इन दलों के कोई भी नेता महिला आरक्षण के मुद्दे पर अपनी बात स्पष्ट रूप से नहीं कह रहे। सीपीआई और सीपीएम जैसे राजनीतिक दलों की ओर से भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर कोई पहल नहीं की जा रही है।

महिलाओं के संग दोयम दर्जे सा व्यवहार

तथाकथित सरकारी महिला सशक्तिकरण के दौर में भी महिलाओं के साथ भेदभाव जारी  है। बात बेशक हो विकास की लेकिन हमारे भारतीय समाज की परिस्थिति, कानून उसके लागू करने संबंधी प्रावधान महिलाओं के लिए उचित वातावरण नहीं बनाते। आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे की मानवीय प्राणी के रूप में देखा जाता है। जबकि पुरुष को अधिक से अधिक सक्षम बनाने के लिए सकारात्मक वातावरण उपलब्ध है।


जी-20 सातवीं अर्थव्यवस्था सम्मेलन में भी बताया गया कि भारत महिलाओं के लिए जीने लायक सबसे खराब देश है। इसमें कहा गया कि कन्या भ्रूण हत्या, कम उम्र में शादी और पराधीनता की वजह से भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय है।
सचमुच हमारे समाज में महिलाएं जन्म से पहले से ही भेदभाव की शिकार है। लांसेट 2011 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पिछले तीन दशकों में 1.2 करोड़ कन्या भ्रूणों की हत्या हुई है।

 

जो बच्चियां पैदा हुई है, उसके साथ भी लड़के बच्चे के समान बराबरी का व्यवहार नहीं किया जाता, खान-पान, शिक्षा-दीक्षा बराबरी का प्यार देने से भी गुरेज किया जाता है। लड़कियों को कमतर माने जाने का एक अन्य दुष्परिणाम है, बच्चियों को मानव व्यापार, जिस्मफरोशी बंधुआ मजदूरी में धकेला जाना। यद्यपि कुछ बच्चे स्वयं घर से भागते हैं लेकिन भारत में आज भी कई ऐसा समाज है जहां लड़कियों को कमाने काम करने के लिए शहर भेजा जाता है जबकि लड़का घर पर मां-बाप के देखभाल के लिए रहता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2008 से 2010 के बीच एक लाख से अधिक बच्चें गायब हो गए जिसमें अधिकतर बच्चियां थी। सिर्फ कर्नाटक से इन तीन सालों के दौरान 270 लड़कियां गायब हुई हैं। सेव चिल्ड्रेन, यू के की संस्था के हेल्थ प्रोग्राम डेवलपमेंट एडवाइजर गुलशन रहमान के भी मुताबिक भारत में लड़कियों और महिलाओं की वस्तु के रूप में बिक्री जारी है। सीबीआई रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी देश में तीस लाख से ज्यादा यौनकर्मी मौजूद हैं, जो कि एक बड़ा सवाल है।


सोचनीय यह भी है कि जिस परिवार में लड़कियां रहती भी है, उसे अनेक बिंदु पर ये एहसास कराया जाता है कि तू लड़की है, इसीलिए सीमाओं में रहना सीख। एक ही परिवार की लड़की-लड़का के शिक्षण की गुणवाा में भी अंतर किया जाता है। जबकि लड़कियों को  भी प्राथमिक शिक्षा देने का क्रेज बढ़ा है, इसीलिए उसे-लड़कियों को सरकारी स्कूल में लड़का-बच्चा को नीजि स्कूलों में भेजा जाता है। इसके बावजूद पिछले कई सालों से दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परिक्षाओं के दोनों ही परिणामों में लड़कियां अव्वल रही है लेकिन इसके बाद भी उच्च शिक्षा मंे महिलाओं की पहुंच बहुत कम है।

शिक्षण के क्षेत्र में और व्यवसायिक शिक्षा में खासकर चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का अनुपात बराबर अथवा बराबर से थोड़ा अधिक देखने को मिलता है। जबकि अन्य उच्चशिक्षण प्रशिक्षण में महिलाएं बहुत पीछे है। देश भर में आईआईटी में सिर्फ 10 प्रतिशत आईआईएम में मात्र 20 प्रतिशत लड़कियां है। शिक्षण डॉक्टरी के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या इसीलिए ठीक है क्योंकि ये दोनों क्षेत्र ऐसे हैं जिसे परिवार चलाते हुए चलाया जा सकता है। क्योंकि ये दोनों क्षेत्र ऐसे हैं जिसमें जॉब के अलावा प्रायवेट प्रैक्टिस की गुंजाइश रहती है जो कि अन्य क्षेत्र में इतना सहज नहीं। जबकि अन्य क्षेत्रों के प्रशिक्षण के लिए अधिक पैसा खर्च करना होगा, दूर भेजना होगा, साथ ही समय भी ज्यादा लगेगा जिसे परिवार वालों को मंजूर नहीं। अतः शिक्षण प्रशिक्षण के स्तर पर भी महिलाओं को दोयम दर्जें का मनुष्य माना जाता है।

लड़कियों को दी जा रही परवरिश का एक बुरा पहलू यह है कि बचपन से ही उसे समझाया जाता है कि तुम्हें वही करना है जो तुम्हें तुम्हारे बड़े कहे, चाहे वो गलत हो या सही, तुम्हें अपना दिमाग इस्तेमाल नहीं करना है और उनके अनुसार ही तुम्हें चलना हैं। बड़े से तात्पर्य विभिन्न प्रकार के रिश्तेदार है, जिसमें मां-बाप, भाई शादी के बाद पति सास-ससुर के लिए संबोधित किए जाते हैं। लड़कियों को विभिन्न प्रकार के व्यवहार द्वारा यह भी बताया जाता है चाहे भाई या अन्य कोई पुरुष उम्र में तुमसे छोटा ही क्यों हो लेकिन क्योंकि वह पुरुष है, इसीलिए उसे बड़ा ही समझो। मुझे आज भी वह प्रसंग याद है जब मेरे द्वारा देवर को नाम से संबोधित करने पर मेरी सास ने कहा था, यह बहुत गलत बात है, बड़का-जेठका के संतान को नाम से संबोधित नहीं करते। अधिकतर परिवारों में लड़कियांे को हुनर के रूप में सिखाया जाता है, प्राथमिक स्कूली शिक्षा, पाक कला, घर की साफ-सफाई येस वूमैन की भूमिका। एक तरफ समाज में लड़की के उन कार्याें का कोई मूल्य नहीं है जिस गुण के बिना कोई लड़का लड़की से शादी करने के लिए तैयार नहीं है।

दूसरी तरफ महिलाओं में इन गुणों के होने के बावजूद शादी की परिस्थिति में दहेज देने की प्रथा कायम है क्योंकि महिलाओं के घरेलू कार्य की निपुणता घरेलू कार्य में दिया जाने वाला सहयोग उसके आर्थिक क्षेत्र में किया जाने वाला सहयोग के रूप में नहीं देखा जाता, अपने चौबीस घंटे की डयूटी करने के लिए तैयार रहने के बावजूद उसे अपने ही घर में चाहे वह मां-बाप का घर हो या पति का, उसे आश्रित के रूप में ही देखा जाता है। मां-बाप स्वयं इस बेटीनुमा बोझ को दान-दहेज के साथ उपयुक्त व्यक्ति से शादी करा दूसरे घर में पहुंचा देते है फिर कभी वापस आने के लिए। अन्य मेहमानों के तरह समय-समय पर दो-चार दिन के लिए जाय तो अलग बात है। यद्यपि कानूनन दहेज गैरकानूनी है, लेकिन यह सरेआम चलता है जबकि कानून में बेटियों को भी संपिा देने का प्रावधान है किंतु दहेज की वजह से मां-बाप द्वारा लड़की को संपिा से बेदखल कर दिया जाता है।

अफसोस उन आत्मनिर्भर लड़कियों उसके अभिभावकों के लिए भी है जिनकी लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर इतना कमाती है कि स्वयं अपने परिवार का अच्छी तरह भरण-पोषण कर सकें, इसके बावजूद उस लड़कियों के ऊपर इतना पुरुषवादी सोच हावी रहती है कि वह अपने मां-बाप अभिभावकों के आज्ञा के बिना अपने लिए कुछ सोच नहीं पाती या फिर उन आत्मनिर्भर लड़कियों का भी मानसिक स्तर पराधीन सोच परवरिश की वजह से गुलाम बना रहता है। एक ताजातरीन घटना में मैंने देखा है कि एक आत्मनिर्भर लड़की का मानसिक स्तर इतना निम्न पराधीन है कि वह बेरोजगार पति की आंख बंद कर बात इसलिए मानती है क्योंकि वह पुरुष है और पुरुष की गलत बातों का भी विरोध नहीं करना चाहिए। जिस समाज में चाहे महिला घरेलू कार्य में निपुण है या अन्य बाहरी कार्य में आर्थिक रूप से सक्षम, उसे हर हाल में पुरुष के अनुसार चलने गुलामी करने का प्रशिक्षण दिया जाय, उस समाज में महिला का विकास कैसे संभव है।

इससे बड़ा महिलाओं के खिलाफ क्या साजिश हो सकता है कि जहां महिलाएं हर तरह से सक्षम भी है वहां भी वह खुशी से पुरुषों की गलत मानने उसकी गुलामी के लिए तैयार है। तभी तो जब-तब खबर आती है कि ससुराल वालों ने दहेज की मांग की है और मायके वाले ने उसे हर संभव देने का प्रयास किया है, जहां दहेज की मांग पूरा नहीं हो पाती वहां दुल्हन को मार दी जाती है।

राष्ट्रीय अपराध संाख्यिकी ब्यूरो-2010 के मुताबिक प्रति एक घ्ंाटे में दहेज के कारण एक दुल्हन की मौत हो जाती है। बात सिर्फ मौत की नहीं, घर-परिवार में रहने वाली जिंदा महिलाओं की स्थिति भी अच्छी नहीं है। बात चाहे पिता के घर की हो या पति के घर की, जो महिलाएं जरा सा भी अपने परिवार में मरजी चलाना चाहती है, उसके साथ बहुत दुर्व्यव्यवहार किया जाता है, उसे मारा-पीटा जाता है, घर से निकालने की धमकी दी जाती है या फिर घर से निकाल दिया जाता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा योजना आयोग द्वारा दो अलग-अलग अध्ययनों से खुलासा होता है कि 40 फीसदी से 80 फीसदी के बीच महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार है।

समाज के नीचले पायदान पर गुजर-बसर करने वाले परिवारों में भी लड़कियों की स्थिति अच्छी नहीं है, इस समुदाय में बेशक दहेज हत्याएं कम है लेकिन कच्ची उमर में शादी कम उमर में मां बनना जैसी समस्याओं से महिलाओं को गुजरना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 50 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी जाती है। इससे महिला का पूर्ण विकास नहीं हो पाता, कम उमर में अधिक जिम्मेदारी उठाने मां बनने से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्या की शिकार भी हो जाती है। ऐसी महिलाओं को जागरूक करने के बजाय  उसके स्वास्थ्य जीवन को प्रभावित करने में सहायक है, समाज में घूम रहे यत्र-तत्र घूम रहे बिचौलिया। गरीब बीपीएल परिवार की महिलाओं के संग स्वास्थ्य लाभ के नाम पर उसके शरीर जीवन से खेला जाता है उसका एक बड़ा उदाहरण है बिहार की 16 हजार से अधिक महिलाएं। मामला यह है कि बिचौलियों द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा राशि हड़पने के लिए ढाई वषों में 16 हजार से अधिक गरीब महिलाओं के गर्भाशय निकलवा दिए गए। सूबे में चल रही राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत बीपीएल परिवार के पांच सदस्यों के लिए अधिकतम तीस हजार रुपये की मुफ़्त इलाज की व्यवस्था है। गरीब परिवारों के इलाज के लिए सूबे में 829 निजी अस्पताल सूचीबद्ध है और यही से खेल शुरु हुआ। जिन सभी महिलाओं के गर्भाशय निकाला गया, उनकी उम्र 20 से 30 वर्ष है। अब ऐसी महिलाएं कभी भी मां नहीं बन पाएंगी।

मेरे ख्याल से स्वास्थ्य लाभ योजना का शिकार भी महिलाएं इसीलिए हुई क्योंकि इसके लिए उसे बिचौलियों से पहले उसके अपने परिवार वालों ने ही तैयार किया होगा। किसी भी पति के लिए जब उसकी पत्नी मां नहीं बनेगी तो किसी भी पुरुष के लिए ऐसी महिला को बांझ कहकर छोड़ देना अथवा दूसरी शादी करना बड़ी बात नहीं। फिर दूसरी महिला से किसी भी हद तक लाभ उठाना पुनः प्रारंभ हो जाता है।

यह महिलाओं के खिलाफ बनता वातावरण का ही दुष्परिणाम है कि जो पुरुष किसी महिला के पेट से पैदा हुआ है, और जिसका जीवन किसी महिला के साथ जीने से ही सफल है दुनिया का अस्तित्व भी, वही पुरुष अगर महिला जाति के अस्तित्व, अस्मिता उसके मह