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सुलेखा पांडेय की कविता

मैं नारी हूँ ,स्वर्ग से उतरी
अमृत की वह पवित्र बूंद
जिसको पीने से ,
अमरत्व की प्राप्ति होती है ,
पर क्या ,आज भी वह दर्जा आ सकी हूँ मैं ??

जो मेरा भी जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए .
सबको नज़र आता है , तो ,
सिर्फ मेरा रूप ,
टिकती हैं सबकी आँखें ,मेरी आँखें , मेरे होंठ , मेरे वक्ष पर ...
क्या मेरी आँखों में झांक कर देखी है , किसीने , मेरी वेदना , ,
सुना है मेरा मूक चीत्कार ,क्या सुने हैं किसीने ,
मेरे होंठों के अनकहे शब्द ??

क्या किसी ने कभी सोचा ,
कि ,मेरे अंदर एक हृदय है ,जो संवेदनशील है ,

जो धड़कता है , जो धधकता है ,
जब तुम मुझे खुद से ,
छोटा , हीन और कम अक्ल मानते हो .।
क्या तुम कभी माप पाये ,मेरे हृदय की अंतहीन सीमारेखा ?

तुम तो मुझे देवी बना कर पूजते रहे ,
पर देवी तो पाषाण है ,
मैं तो इन्सान हूँ
मगर तुम मुझे इन्सान मानते तो , कभी दोयम दर्जा ना देते .

दोयम मैं हूँ भी नहीं ..
तुम नर हो ,
मुझमें तुमसे दो मात्राएँ अधिक हैं , मैं नारी हूँ ,
तुमसे कहीं अधिक सबल ,तुमसे कहीं अधिक सशक्त ..

मैं पराधीन नहीं मैं पराधीन नहीं ....

 

अपनी बात - महिला सशक्तिकरण का मायने समझने की जरुरत
श्वेता सिंह

वैश्वीकरण के इस दौर में महिलाएं आज आसमान की बुलंदियों को छू रही हैं. अपने सपनों को साकार करने के लिए वे हर मुमकिन कोशिश भी कर रही हैं. काफी हद तक उन्हें सफलता भी मिली है, पर क्या, वास्तव में महिलाओं को उनका मुकाम हासिल हुआ है? घर की दहलीज पार करके वह पुरुषों की बराबरी करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम भी कर रही है. उसने उन क्षेत्रों में भी अपनी छाप छोड़ी है, जहां पहले सिर्फ पुरुषों का ही वर्चस्व था. राजनीति के दाव-पेंच हो, या व्यापार जगत, या फिर खेल का मैदान, महिलाओं ने आज हर क्षेत्र में अपनी जगह बना ली है. यही वजह है, कि समय-समय पर महिला सशक्तिकरण का मुद्दा भी सामने आता रहता है. लेकिन! बहस और चर्चाओं के दौर में यह विषय एक बार फिर ज्वलंत हो उठा है. हमारे सामने कई सवाल भी बड़े आकार में खड़े हुए हैं, और मेरे अंदर का इंसान सोचने पर मजबूर है.
आखिर ये महिला सशक्तिकरण है क्या ?....आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो जाना! क्या महिलाओं को समाज में उनकी जगह मिल जायेगी? वह पुरुषों को अपने वज़ूद का अहसास करा पायेगी? नहीं, इस तरह औरत-आदमी के खेल में हम इंसान होने से चूक जायेंगे और इससे महिलाओं को समाज में अपनी पैठ बनाने में कामयाबी नहीं मिल सकती. जिस आज़ादी को हासिल करने के लिए महिलाओं ने अपना घर छोड़ा है, क्या उसे पैसों के बल पर हासिल किया जा सकता है? क्या पैसा उस आज़ादी का अहसास करा देता है? नहीं, सच्चाई ऐसी नहीं है. पैसों के पीछे भागते-भागते हम पर सामाजिकता से ज्यादा बाज़ारवाद हावी हो गया है, लेकिन फिर भी औरत वहीं खड़ी है, और इसका खामियाजा भी महिलाओं को ही भुगतना पड़ रहा है. क्योंकि आज भी महिला और पुरुष एक दूसरे के लिए सिर्फ भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं हैं. और जब ये किसी भी तरफ से हावी होता है तो कमजोड़ कड़ी टूट जाती है, यानी जिम्मेवार सिर्फ औरत! इससे ज्यादा और कुछ नहीं. इसलिए जरूरत हमारे सोच में बदलाव की है. भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी दूसरे देश में महिलाओं की स्थिति कमोबेश एक ही है.
आए दिन अखबार के पन्नों और तमाम न्यूज़ चैनलों पर महिलाओं के साथ अत्याचार और भेदभाव की खबरें सूर्खियों में रहती हैं, हमें यह सोचने पर मजबूर भी करती हैं, क्या महिलाओं को सचमुच उनका अधिकार मिला है? क्या वास्तव में वो निडर होकर जीने की कल्पना कर सकती है? क्या आज भी वह कदम-कदम पर असुरक्षा की भावना लिए हुए नहीं जी रही है? कि, जाने अगले पल वह कहां और कैसी परिस्थिति में हो? वह अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त क्यों नहीं हो पायी है? ये डर आदमी और औरत में बराबर है. बेटियां और बहुएं तो अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं. आज भी दहेज हत्या, यौन उत्पीड़न, बलात्कार के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. और जो इन वारदातों को अंजाम देते हैं वे और भी ज्यादा सहमे हुए हैं. इस घटना के घातक परिणामों से वाकिफ होने की वजह से वे भ्रूण हत्या, बाल विवाह के रास्ते पर ही चल देते हैं. ये डर जितना फैल रहा है, समस्या उतनी ही गंभीर होती जा रही है. इस पर अब तक लगाम नहीं कसा जा सका है और ना ही कोई सोच कायम हुई है. फिर हम आखिर किस महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं. किस आधार पर राजनेता यह दावा करते हैं कि आधी आबादी को उनका हक मिल गया है.
सच तो यह है कि महिला सशक्तिकरण की कल्पना करना उस मुराद की तरह है जिसकी पूरी होने की उम्मीद बहुत कम नज़र आती है क्योंकि हम क्या चाहते हैं? यह अब तक तय नहीं कर पाये हैं. जब तक इंसान अपने मनोरंजन के लिए विपरीत लिंगों का इस्तेमाल करने की मानसिकता नहीं बदलेगा तब तक औरतें यूं ही जुल्म का शिकार होती रहेंगी और हज़ारों वर्षों की ये सोच बिना किसी मजबूत इरादे के नहीं बदलने वाली. इस पुरुष प्रधान समाज में वह घुट-घुट कर जीने को मजबूर होगी क्योंकि वो महिलाएं जो कालांतर में इस सामाजिकता में ढल चुकी हैं, इसकी वकालत भी करेंगी. आज भी महिलाएं पुरुषों के आगे घुटने टेकने को मजबूर है. यही उनका धर्म बन चुका है. हर कदम पर उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि उसे अपनी हद में रहना चाहिए. और यह हद तय करने का जिम्मा ले रखा है समाज के उन ठेकेदारों ने, जो इस दमन के अधिनायक हैं.
इस सामाजिक परिदृश्य में हम कह सकते हैं कि महिलाएं आज भी अबला ही हैं. उसे सबला होने में अभी और वक्त लगेगा और इसके लिए, इंसान को अपनी सामाजिक सोच बदलनी होगी. व्यभिचार का दौर थमने के बाद ही महिलाएं सुकून की ज़िंदगी जी पायेंगी. इसके लिए हम पूरी तरह से पुरुषों को ही दोषी नहीं ठहरा सकते हैं. इसकी जिम्मेवार खुद महिलाएं भी हैं. ऐसी महिलाएं भी कम नहीं हैं जो अपने फायदे के लिए या कभी-कभार सिर्फ मनोरंजन के लिए भी गैर मर्दों से रिश्ता बनाने से नहीं चूकती हैं. यही वजह है कि आज भारत में भी लिव-इन रिलेशनशिप की जड़ें मजबूत हो चुकी हैं. विवाहेतर संबंधों का चलन बढ़ गया है. इसकी वजह से तलाक के मामलों में भी काफी इजाफा हो रहा है. इस प्रकार की कुछ समस्याएं अभी छोटी हैं लेकिन इनके आकार के बदलते ही हम और बड़े नैतिक पतन की ओर बढ़ जायेंगे. अब! अगर हम इसके लिए पाश्चात्य संस्कृति को दोष दें तो गलत होगा, क्योंकि खुद हम जिम्मेवार हैं इस पतन के लिए. कुल मिलाकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जब तक हम अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तब तक समाज में महिलाओं को अपनी जगह नहीं मिल सकती.

स्त्री विमर्श - नारी अस्मिता की खोज

(कमलेश मेहरौल)

भारत में सदियों से महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण भेदभावपूर्ण रहा है। उसे सदा से ही दोयम दर्जे का नागरिक समझने की परिपाटी रही है। परंतु, महिलाओं की सहभागिता भी समाज में पुरुषों के बराबर ही रही है। पितृ सत्तात्मक समाज ने महिलाओं को सदैव हाशिये पर रखा है, जिसके पीछे वह महिलाओं की जैविक संरचना को कारण बताता रहा है। जबकि महिलाओं ने हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर पुरुषों का साथ दिया, लेकिन कभी भी उसे उसके कार्य के लिये मान्यता प्रदान नहीं की गई।

स्त्री की स्वयं की अस्मिता को कभी भी समाज द्वारा पहचान प्रदान नहीं की गई। उसे सदैव पिता, पुत्र और पति के अधीनस्थ देखा गया। पितृ सत्ता को ही उसकी पहचान का दर्जा दिया गया है। यदि हम समाज का सुदृढीकरण करना चाहते हैं तो महिलाओं को महत्व देना अत्यंत आवश्यक है। सबसे बड़ी वजह यह कि यह समाज का सेकेंड सेक्स नहीं, अपितु फ़र्स्ट सेक्स के रुप में स्वीकारा जा चुका है। क्योंकि महिलायें प्रत्येक कार्य करने में पुरुषों से अधिक सक्षम है।

प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति अत्यंत उच्च स्तरीय थी। परंतु, धीरे-धीरे महिलाओं की स्थिति निरंतर गिरती चली गई। महिलाओं को पर्दे में रखा गया। सती बनने पर मजबूर किया गया और वह सब कुछ किया गया, जिससे महिलाओं को कमजोर बनाया जा सके। हालांकि वर्तमान समय में महिलायें राष्ट्रीय निरंतरता से अपनी उपलब्धियां दर्ज करा रही है, जिसमें मेधा पाटेकर, इंदिरा नुई, मीरा कुमार, मायावती और बौद्धिक आतंकवादी कही जाने वाली अरुंधती राय जैसी शीर्षस्थ महिलायें अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। वही खेलकूद के क्षेत्र में भी सायना नेहवाल और सानिया मिर्जा जैसी महिलायें भी स्वयं को सिद्ध कर रही हैं। भारत वो देश जिसके संविधान में महिलाओं को बराबरी के अधिकार प्रदान किये गये हैं। यहां पर महिलाओं को अपने अधिकार के लिये किसी नारीवादी आंदोलनों का सहारा नहीं लेना पड़ा। परंतु दुखद यह है कि महिला सशक्तिकरण का मुद्दा व्यवहारिक रुप में न होकर कागजी दस्तावेज बनकर रह गया है।

भारत में जहां एक ओर महिलायें अपनी पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एवं सामाजिक स्तर पर निरंतर रुप से बनाने में सफ़ल हो रही हैं। वहीं दूसरी ओर भारतीय महिलायें तिरस्कार, उत्पीड़न, दुराचार और बलात्कार जैसी जटिलतम समस्याओं से गुजरती रही हैं। आज भी महिलाओं को मानवीय दृष्टिकोण से न देखकर केवल देह की दृष्टि से ही देखा जाता है। भंवरी देवी, आयुषी तलवार और अरूणा शानबाग जैसी नारियों का उल्लेख किया जा सकता है, जिन्हें पितृ सत्तातमक व्यवस्था, पुरुषों की गंदी राजनीति और नजरों का शिकार होना पड़ा। ऐसी घटनाओं से पितृ सत्तात्मक समाज द्वारा यही दर्शाने की कोशिश की जाती है कि वह कमजोर है और उसकी कोई पहचान नहीं है। वह स्वयं की सुरक्षा करने में भी असमर्थ है। उसके मनोबल को निरंतर गिराने का प्रयास किया जाता रहा है।

समाज के विकास के लिये नारी को पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की जरुरत है, फ़िर भी जहां-जहां स्त्री अपनी शक्ति के बूते आगे आने की बात करती है, उसे पितृ सत्ता द्वारा कुचल दिया जाता है। आधुनिक समाज जो पूर्ण रुप से मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक और तार्किक रुप से सजग है, इसके बावजूद भी स्त्रियों को अस्मिता प्रदान नहीं करता और जब स्त्रियां इस पहचान की खोज करने निकलती है, तभी उन्हें कुचल दिया जाता है। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये सिर्फ़ बौद्धिक जुगाली की जाती है। कोई ठोस और सक्रिय कदम नहीं उठाया जाता है। वही दलित समाज स्त्रियों के संदर्भ में अभी तक आदिम युग से आगे नहीं बढ पाया है।

अब समय आ गया है कि स्त्रियों को इस नव वर्ष में अपनी अस्मिता की खोज स्वयं करनी होगी और यह केवल शिक्षा के जरिये ही संभव है। शिक्षा ही स्त्रियों को सभी बंधनों से मुक्त कर सकती है। इसलिये पितृ सत्ता से मुक्ति के लिये स्त्री जाति को शिक्षित होकर अपना वर्चस्व स्थापित करना होगा और स्वयं को इस कसौटी पर खरा उतरना है कि समाज का सेकेंड सेक्स नहीं, अपितु फ़र्स्ट सेक्स है। (लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक की छात्रा हैं)

21वीं सदी और महिला सशक्तिकरण

किसी भी युग, समाज, संस्कृति के सशक्त होने की पहली सीढी है शिक्षा। पर यह केवल एकमात्र शर्त नहीं है। सशक्त होने के लिये तो मनःस्थिति को साफ़, सुन्दर, सुदृढ और जागरूक बनाने की आवश्यकता होती है। परंपराओं और सदियो से चली आ रही प्रथाओं के लीक से हटने के लिये मानसिक तौर पर जागरूक होने की जरुरत है। संवैधानिक तरीके से किसी भी व्यक्ति महिला/पुरुष को 18 वर्ष के पहले केयर आफ़ की आवश्यकता होती है।

यानी वह किसी न किसी पर आश्रित होता है अथवा होती है। एक बार जैसे ही वह संवैधानिक रुप से बालिग हो जाता/जाती है, फ़िर अपने पते में उसे C/o विवरण देने की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन यह तभी संभव है जब मानसिक रुप से सुदृढता और जागरुकता हो। हर इंसान की अपनी एक पहचान होती है। दूसरों के पहचान पर आश्रित रहने वाला/वाली कभी भी देश अथवा समाज या फ़िर स्वयं के लिये भी सहयोगी साबित नहीं सकता है।

उदाहरण स्वरुप मेरी चिट्ठी या अन्य कोई पत्राचार स्वतंत्र रुप से मेरे नाम और पता पर आता है। यहां तक कि मेरी 21 वर्षीया बेटी का पत्र भी उसके स्वतंत्र नाम और पता पर आता है। जैसे सुमन सिंह, अपर्णा बैंक कालोनी, फ़ेज-2, रामजयपाल रोड, दानापुर कैंट, पटना 801503

मेरे हिसाब से आज 21वीं सदी में महिलाओं और लड़कियों को मानसिक रुप से अवश्य ही सशक्त होना होगा। अपनी पहचान बनाने के लिये अपने पारंपरिक लीक से हटकर C/o की आदत को छोड़ना होगा और तब वह इंसान के रुप में स्वयं को स्थापित कर पायेगी। स्वयं को सशक्त महिला के रुप में अपनी पहचान बना सकेगी।

(लेखिका सूबे की जानी-मानी समाज सेविका हैं और सखी नामक समाज सेवी संगठन की संचालिका हैं।)

विशेष रिपोर्ट - पति की हैवानियत पर अबला को मिली जीत

(नवल किशोर कुमार)

अपने पति की हैवानियत से तंग होकर बेजार हो चुकी वर्षा ने लोक लाज की परवाह किये बगैर पूरे हिम्मत के साथ न्यायालय की शरण ली। न्यायालय ने भी पीड़ित के साथ हुए अन्याय को महसूस करते हुए उसके पति को दो वर्ष की कैद और 2000 रुपये का अर्थ दंड मुकर्रर कर दिया। इनका पुरा नाम वर्षा अशोक जोगलेकर है। ये मूलतः महाराष्ट्र की रहने वाली हैं। इनकी शादी वर्ष 2002 में मुंबई में रेंजी जार्ज जोसेफ़ के साथ इसाई रीति-रिवाज के साथ संपन्न हुई थी। पीड़िता का कहना है कि उसके पति रेंजी का व्यवहार शादी के प्रारंभिक दिनों से ही अत्याधिक क्रुरतापूर्ण था। वह उसे अप्राकृतिक तरीके से यौनाचार करने के लिये जबरन दबाव देता था। जिससे इन्कार करने पर रेंजी ने अनेक अवसरों पर हैवानियत की हर सीमा का उल्लंघन किया था।

बाद में रेंजी और वर्षा पटना के दानापुर इलाके में आकर रहने लगे। यहां भी रेंजी के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। इससे आजिज होकर वर्षा ने न्यायालय की शरण ली और अपने पति के खिलाफ़ प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया। धारा 498 ए भारतीय दंड विधान के तहत चले इस कानूनी कार्रवाई में रेंजी जार्ज जोसेफ़ के खिलाफ़ वर्षा द्वारा लगाये आरोपों के संबंध में उपलब्ध सबूतों के आधार पर दानापुर अनुमंडल न्यायिक दंडाधिकारी ने दिनांक 8 अप्रैल 2011 को दिये गये अपने निर्णय में रेंजी को कसूरवार पाया गया और उसे दो वर्ष की सजा और 2000 रुपये का अर्थ दंड दिया। बहरहाल, वर्षा अपने पति को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर खुश है। ये चाहती हैं कि सभी महिलायें अपने हक के लिये आगे बढें, जो अकारण ही अपने पति के जुल्मो सितम का शिकार हो रही हैं। उनकी जीत व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समग्र नारी जाति की जीत है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कार्यक्रमों का तांता

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राजधानी पटना में पूरे दिन कार्यक्रमों का तांता लगा रहा। कई महिला संगठनों ने इस अवसर पर नारी शक्ति को एकजूट होने का आहवान किया तो कई संगठनों ने इस अवसर पर महिला विरोधी नीतियों को लेकर आक्रोश मार्च निकाला।

मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित समारोह में प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा जगन्नाथ मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि महिलाओं ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी उपयोगिता को साबित किया है। इसके बावजूद महिलायें उपेक्षा की शिकार हैं। इनकी उपेक्षा की वजह तलाशकर उसका उन्मूलन करने हेतु पहल किये जाने की आवश्यकता है। बीमा कर्मचारी महासंघ की महिला इकाई द्वार इस अवसर पर मानव श्रृंखला निकाली गई। इस अवसर पर अपने संबोधन में सुपर्णा सान्याल ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ-साथ विधेयक का विरोध कर रहे विभिन्न दलों के नेताओं की आलोचना की।

उधर आल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला उत्पीड़न और कानून विषयक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना भगत ने कहा कि महिलाओं के साथ हिंसात्मक घटनाओं में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। स्वयं सेवी संगठन पहल की ओर से इस अवसर पर एच आई वी संक्रमित महिलाओं को गंभीर बीमारी के बावजूद समाज में सार्थक योगदान के लिय प्रोत्साहित किया गया। इस अवसर पर मसौढी की लीना देवी, काजी बिगहा की विमाला देवी, आरा की कंचन देवी, पटना की रीता कुमारी और दीघा निवासी रेहाना खाहून को सम्मानित किया गया। समारोह के मुखय अतिथि डा दिवाकर तेजस्वी ने एड्स की रोकथाम की दिशा में महिलाओं को पहल करने का आहवान किया।

कुछेक महिला संगठनों ने राज्य सरकार के खिलाफ़ कार्यक्रमों का अयोजन किया। बिहार वीमेंस नेटवर्क की ओर से स्थानीय कारगिल चौक पर एक धरना का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अपने संबोधन में संयोजिका नीलू ने बताया कि राज्य में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढती जा रही है। इसका मुख्य कारण राज्य सरकार की शराब नीति है। इसके अलावे अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन के बैनर तले एक जुलूस निकाला गया। इस अवसर पर महिला नेताओं रुपम पाठक को न्याय देने की मांग की। जुलूस का नेतृत्व मीना तिवारी, शशि यादव और सरोज चौबे ने किया।

अपनी बात - महिलाओं को संपत्ति का अधिकार की दरकार

(नवल किशोर कुमार)

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। पश्चिम के देशों में महिलाओं के लिये विशेष दिन निर्धारित किया गया ताकि पूरे विश्व के महिलाओं के प्रति पुरुष वर्ग का नजरिया बदले। वैश्वीकरण का दौर शुरु होने के बाद भारत में भी इस विशेष दिन का आगमन हो चुका है और आये दिन समाज पर इसका प्रभाव देखने को मिलता है। बहरहाल सरकार द्वारा दावा किया जा रहा है कि बिहार प्रगति के पथ पर अग्रसर है। सरकारी प्रमाण यह कि राज्य सरकार द्वारा महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं में 50 फ़ीसदी आरक्षण का अधिकार दे दिया गया है। इसका प्रभाव समाज पर दिखने लगा है।

जबकि सच्चाई यह है कि बिहार में अभी भी 95.5 फ़ीसदी महिलाओं के पास कोई अचल संपत्ति नहीं है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार में केवल 7.6 प्रतिशत महिलाओं के बैंक में खाते हैं। यह तो केवल एक बानगी है बिहार में महिलाओं की स्थिति की। विकास के अन्य मानदंडों पर भी बिहार में महिलाओं की स्थिति अनुकूल नहीं है। मसलन बिहार में अभी भी महिलाओं की साक्षरता दर 33.75 फ़ीसदी है। राष्ट्रीय स्तर पर यह 40 फ़ीसदी के करीब है। बिहार के महिलाओं की बदहाली की दास्तान यही खत्म नहीं होती। बिहार की केवल 6.5 फ़ीसदी महिलाओं को ही कामकाजी महिलाओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसमें भी नेशनल सैंपल सर्वे के अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार इसमें शहरी कामकाजी महिलाओं में 98.5 फ़ीसदी महिलायें घरेलू नौकरानी अथवा फ़ूटपाथी फ़ेरीवालियां हैं। जबकि 88 फ़ीसदी ग्रामीण महिलायें अवैतनिक मजदूर है। अवैतनिक मजदूर इसलिये कि इनकी आय पर इनका अपना कोई अधिकार नहीं है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह कि बिहार उन राज्यों में शुमार है जहां आज तक महिलाओं के कल्याण के लिये विशेष मंत्रालय की व्यवस्था नहीं है। हालांकि सूबे में महिला विकास निगम नामक संस्थान है, जिसकी बागडोर कल्याण विभाग के हाथों में रहती है। इसके अलावा महिलाओं के लिये राज्य सरकार द्वारा जेंडर बजट के मानिटरिंग के लिये भी न तो कोई कमिटी का गठन किया गया है और न ही इसकी जवाबदेही तय की गई है।

तमाम विसंगतियों के बावजूद आज बिहार की महिलायें पूर्व की अपेक्षा अधिक आशावान हैं। इसका सबसे नायाब उदाहरण है राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना। इसके तहत करीब 40 लाख उन महिलाओं को साक्षर बनाया गया, जिन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे साक्षर बन सकेंगी। बहरहाल सूबे की महिलाओं में चेतना का प्रसार हुआ है और महिलाओं को समाज के मुख्य धारा में आगे लाने की आवश्यकता है। इसके लिये यह भी आवश्यक है कि महिलाओं को संपत्ति का अधिकार मिले। सनद रहे कि बदल रहे बिहार की बात तबतक बेमानी है जबतक कि इसमें महिलायें शामिल न हो।

ये भी इंसान हैं इक तुम्हारी तरह……………………

आज 8 मार्च यानि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। हर साल की भांति इस साल भी यह दिन आया है और हर साल की तरह गुजर जायेगा। सरकारी स्तर पर इस अवसर पर उनके भोंपूं चीख पुकार मचायेंगे और औरते एवं बच्चों के ठेकेदारों को विकास विभाग के करोड़ों रुपय खर्च करने की जुगत में अपनी जेबें भरने का सुनहरा अवसर मिल जायेगा। महंगी पोशाकों से सुसज्जित, चमकदार जेवरों और खर्चीले सौंदर्य प्रसाधनों से पूते चेहरों वालियां किसी होटल, गार्डेन या आश्रमों में कुछ टुकड़े डालकर फ़ोटो खिंचवायेंगी और सधे हुए मीडियाकर्मी घूम-घूमकर अपने आग्रहो एवं पूर्वाग्रहों से चिन्हित संग़ठनों/ व्यक्तियों के कार्यक्रम में शिरकत करते अपने अखबार और चैनलों के माध्यम से दूनिया को धन्य कर सकेंगे। सभी ये दिखाने की जुगत में भिड़े होंगे कि उन्होंने ही एक्स्क्लूसिव रुप से समाज के हीरों को अपने दर्शकों और पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है। अक्सर इस तरह के दिखावटी कार्यक्रमों में लोग भूल जाते हैं कि जिनके लिये यह सब किया जायेगा, वे औरतें भी इंसान हैं।

सच कहूं तो औरत इंसान नहीं है साहब। अगर इंसान होतीं तो सरकारों के चरित्र में भी औरत का नाजूकपन, इंसानियत, संवेदनशीलता, केयरिंग और मोहब्बत भी कहीं न कहीं अवश्य होती। अगर औरत इंसान होती तो इरोम शर्मिला के गम में पूरा देश सिफ़ शरीक ही नहीं होता, बल्कि सड़कों पर निकल आया होता। औरत अगर इंसान होती तो रुपम पाठक को चाकू का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता और न ही न्याय पाने के लिये उसे सभ्य समाज के सामने कहना पड़ता कि उसका यौन शोषण करने वाला विपिन राय अभी भी खुलेआम घूम रहा है। सच मानिये अगर औरत इंसान होती तो मणिपुर की औरतें आसाम रायफ़ल्स के मुख्यालयों के सामने “इन्डियन आर्मी रेप अस” यानि “भारतीय फ़ौज के जवानों आओ और हमारा बलात्कार करो” का बैनर लगाकर बगैर कपड़ों के प्रदर्शन नहीं करतीं। औरतें इंसान होतीं तो दंतेवाड़ा की सोनी सोरी की रुदन सुनकर सरकारें उसके आरोपी पुलिस अधिकारी की जांच का नाटक ही कर लेती। इसी जिले की नेंद्रा सहित कई गांवों की युवतिया एसपीओ और सलवाजुड्म के नेताओं के बलात्कार की शिकार होकर भी न्याय में आस्था जताने की सजा आजतक नहीं भुगत रही होतीं। अगर औरत इंसान होती तो अपने ऊपर हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ़ केवल ब्रा और पैंटी में एक औरत अहमदाबाद की सड़कों पर दिन दहाड़े नहीं चल पड़ती।

औरतें इंसान नहीं हैं और इसकी पुष्टि के लिये अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं। सच्चाई यही है कि 21वीं सदी में भी औरत मात्र एक कठपुतली ही है। जुल्म सहना और सहते हुए जीना इसके जीवन का पर्याय बन चुका है। वे चाहें जिस किसी धर्म, जाति अथवा गोत्र में पैदा ले लें, लेकिन उनकी औकात इंसान की नहीं हो सकती है।

विकास के नाम पर जिस तरह इंसान विरोधी गतिविधियों में आज की सरकारें लिप्त होती जा रही हैं, उसमें धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों के लिये कोई जगह नहीं है। ऐसे में वंचित तबके जिनमे अब आदिवासी भी शामिल कर दिये गये है, वे भी हाशिये पर किये जा रहे हैं। विकास और विस्थापन का चोली दामन का साथ है। अपनी जमीन और अपनी संस्कृति से खदेड़े जा रहे लोगों की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, असुरक्षा, स्वास्थ्य की सुविधायें न मिल पाने की बेबसी ने इनके साथ औरतों और बच्चों की जिंदगी भी नर्क बना रखा है। सामंती समाज का औरत को सिर्फ़ जिस्म मानना और उसका मनमाना उपभोग का नजरिया, गरीबी, भूख और बेबसी ने इंसानी समाज और लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगा दिया है।

अब वक्त आ गया है कि सरकारें न सिर्फ़ अपने नजरिये को महिलावादी बनाए, बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी इमानदारी दिखाये। शैक्षणिक संस्थानों को भी जेंडर फ़्रेंडली बनाना होगा। हमें याद रखना होगा कि हमारे संविधान में दो लफ़्ज बराबरी और न्याय अभी भी मौजूद है। जिस दिन समाज इन दो लफ़्जों का मतलब समझने लगेगा, उस दिन या तो संविधान रहेगा या फ़िर ये लंपट सरकारें। इजिप्ट की क्रांति दीवी पर खूब देखी जा रही है। तानाशाही से मुक्ति के लिये दूसरे देशों में भी संघर्ष लोग लगातार देख रहे हैं। यकीन मानिये अगर समाज नहीं सुधरा और हमने औरतों को इंसान नहीं माना तो फ़िर एक वह दिन भी आयेगा जब तथाकथित धार्मिक कर्मकांडों की कट्टरपंथी दबंगई भी काम नहीं आयेगी। सारे त्रिशुल और तलवार धरे के धरे रह जायेंगे, जब आसमान का ज्वालामुखी फ़ूटेगा।

(लेखक राजा रिंकू स्वयं सेवी संस्था इजाद से जुड़े हैं)

 

आनर किलिंग से बचने के लिये मदद की गुहार लगा रही एक लाचार

मोकामा के रतनपुरा बिशुनपुर गांव की रहने वाली वह लाचार नौ माह की गर्भवती है। उसकी त्रासदी यह है कि जिसके साथ उसकी शादी हुई है, वह मानसिक रुप से असंतुलित है। वह लड़की अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती है, जबकि उसके अपने मां-बाप और भाई उसे जबरन ससुराल भेजना चाहते हैं। उस बेबस ने मना किया तो उसके परिजनों ने उसे अपने घर में कैद कर दिया है। इसके अलावा उसे जान से मारने की धमकी दी जा रही है।

इस संबंध में सपना(काल्पनिक नाम) ने पटना स्थित समाज सेवी संगठन महिला जागरण केंद्र की संचालिका नीलू को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई। अपने पत्र में सपना ने बताया कि उसके अपने परिजन किस प्रकार उसे मानसिक रुप से असंतुलित व्यक्ति के साथ जीवन जीने के लिये मजबूर कर रहे हैं और विरोध करने पर उसे यातना दे रहे हैं। इस संबंध में नीलू ने बताया कि सपना का पत्र उन्हे 13 सितम्बर को प्राप्त हुआ। इसके आलोक में उन्होंने बेगूसराय के संरक्ष्ण पदाधिकारी को पत्र लिखकर सूचित किया। उनके द्वारा दी गई सूचना के बाद बेगूसराय की संरक्षण पदाधिकारी ने सपना से मिलने के बजाय उसके परिजनों से बातचीत कर जांच पड़ताल की खानापूर्ति कर दी। जबकि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पीड़ित महिला का बयान लेना अनिवार्य है।

नीलू ने बताया कि बिहार में घरेलू हिंसा अधिनियम को लागू करने के अधूरे प्रयास किये गये हैं। अधिनियम के प्रावधानों के विपरित अनुबंध पर कारने वाले हेल्पलाइन के अधिकारियों को संरक्षण पदाधिकारी बनाया गया है। सपना के मामले में एक पुरुष द्वारा मामले की छानबीन की जा रही है जो इस अधिनियम का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। इन्होंने बताया कि यदि कोई बालिग लड़की स्वेच्छा से अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती है तो उसे इस बात की आजादी मिल्नी चाहिये। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसे घरेलू हिंसा अधिनियम का उल्लंघन माना जायेगा।

 

हाशिये पर हैं बिहार की महिलायें

राजनीति के क्षेत्र में बिहार की महिलायें हाशिये पर हैं। स्थिति का अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि वर्तमान में महिला विधायकों की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम है और सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि 80 फ़ीसदी महिला विधायकों का संबंध ऊंची जातियों से है और इससे भी बड़ी खबर यह है कि पूरे राज्य में करीब 16 फ़ीसदी वाले अल्पसंख्यक समाज से एक भी महिला विधायक नहीं हैं। राजनीति में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली लगभग सभी बड़ी पार्टियों में एक भी महिला नेता ऐसी नहीं है, जिसमें महिलाओं के राजनीतिक संघर्ष को आगे ले जाने का माद्दा हो। नतीजतन बिहार के चुनावी संग्राम में एक बार फ़िर पुरुषों की तुती बोलेगी और महिलायें दर्शक दीर्घा में बैठकर महिला सशक्तिकरण का राग अलापेंगी।

एक और अबला हुई डायन

21वी सदी में भी बिहार के लोग आदिम जमाने में जी रहे हैं। विगत सोमवार को एक और महिला को डायन बताकर पहले पीटा गया और निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया गया। यह घटना सुपौल जिले के किशनपुरा थाने के कुमरगंज गांव की है। पीड़िता के बेटे पप्पू कुमार यादव के बयान पर स्थानीय थाने में एक मामला दर्ज किया गया है। अपने बयान में पप्पु ने बताया है कि उसके पड़ोसियों बच्चा यादव, भूपेंद्र यादव, धर्म नारायण यादव और विजय यादव ने उनके पिता को खुंटे से बांध दिया और उसकी मां को खींच कर बाहर ले गये। इसके बाद मां के कपड़े उतार कर पूरे गांव में घुमाया। खबर लिखे जाने तक स्थानीय पुलिस अभी तक किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकी है।

आधी आबादी ने मांगा हक

जो करेगा महिलाओं की बात, आधी आबादी उसके साथ। चाहे वह कोई भी दल हो, जो सबसे अधिक महिलाओं को अपना प्र्त्याशी बनायेगा, महिला ब्रिगेड के नेतृत्व में आधी आबादी उसका साथ देगी। ये बातें महिला ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष सह बाल श्रमिक आयोग की नवनियुक्त उपाध्यक्ष अनीता सिन्हा ने कल विद्यापति भवन में आयोजित राजनैतिक सम्मेलन में कहीं।

सूबे के हर दूसरे घर में रहती है एक आनंदी

जी हां, राज्य के हर दूसरे घर में एक आनंदी रहती है। हांलाकि बिहार के घरों में रहने वाली हर आनंदी स्टार टीवी पर नजर आने वाली आनंदी के जैसे न तो अमीर है और न ही लोकप्रिय। राज्य की आनंदियों को तो बस घर में घुट-घुटकर अपने जीवन को जीना होता है, जहां उसकी पीड़ा से न तो समाज को मतलब होता है और न ही उसके परिजनों को।

हम बात कर रहे हैं बिहार में बाल विवाह की। क्या आश्चर्य यदि इस कुप्रथा के मामले में बिहार देश में सबसे अग्रणी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश की 47 फ़ीसदी लड़कियां आनंदी बन जाती हैं यानि उनकी शादी 18 साल से पहले हो जाती है। जबकि बिहार में यह आंकड़ा 67 फ़ीसदी है। पूरे देश में शादी के समय लड़कियों की औसत आयु साढे उन्नीस साल है, जबकि बिहार में यह केवल 16 साल ही है। इसके अलावा सबसे अधिक खतरनाक संकेत यह कि बिहार की 68 फ़ीसदी महिलायें रक्त की कमी की शिकार हैं। हांलाकि राज्य में बाल विवाह के मामलों की संख्या न तो महिला विकास निगम के पास है और न ही किसी अन्य सरकारी एजेंसी के पास्। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बाल विवाह तो दूर की चीज है, आम विवाहों का भी पंजीकरण सामान्य परिस्थितियों में नहीं कराया जाता है।

इस संबंध में युवा समाज सेविका अर्चना ने अपना बिहार को बताया कि बालिका वधू सहित विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर आने वाले धारावाहिकों को वह बड़े चाव से देखती हैं। इसका कारण बताते हुए अर्चना ने कहा कि इन धारावाहिकों में देश के अनेक राज्यों में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन किया जा सकता है। बालिका वधू के बारे में इन्होंने कहा कि ऐसे धारावाहिक हमारे समाज के नकारात्मकता को साबित करते हैं और इसकी लोकप्रियता यह साबित करती हैं कि आम आदमी के नजर में बाल विवाह कोई संज्ञेय अपराध नहीं है। इन्होंने यह भी कहा कि इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिये सभी अपने स्तर से शुरुआत करें।

बिहार महिला विकास निगम की परियोजना निदेशक ईरीना सिन्हा का मानना है कि बाल विवाह के कारण कई समस्यायें जन्म लेती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कम उम्र में गर्भधारण करने से एक तरफ़ लड़कियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है तो दूसरी ओर उनके गर्भक्षमता में वृद्धि भी होती है। इसके अलावा बचपन की शादी के बाद जब ऐसे दंपत्ति युवा होते हैं तब उनके ईर्द-गिर्द की परिस्थिति में बदलाव हो चुका होता है और इसका परिणाम यह होता है कि घरेलू हिंसा और तलक जैसी अमर्यादित घटनायें घटती हैं।

बहरहाल बिहार में अभी भी बाल विवाह को रोकने के लिये कोई विशेष पहल नहीं किया जा रहा है। जबकि पुरे देश में वर्ष 2007 से ही बाल विवाह प्रतिषेध नियम लागू है और हमारे राज्य में इसके क्रियान्वयन के लिये कानून अब बनाया जा रहा है। हांलाकि इस कलंक को मिटाने की जिम्मेवारी केवल राज्य सरकार पर ही नहीं है, बल्कि राज्य के हर नागरिक का कर्तव्य है कि इसके लिये सामूहिक प्रयास करें। एक बार जब सामूहिक प्रयास होगा, तब संभव है कि बेटियों का बाप होने पर भी किसी को चिंता नहीं होगी और न ही कोई आनंदी बनेगी।