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Text Box: सीएजी ने भी कहा कोशी महाप्रलय के लिये राज्य सरकार जिम्मेवार
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(26 जुलाई 2010)  वर्ष 2008 में आये कोशी महाप्रलय के लिये सीएजी ने भी राज्य सरकार को पूर्णरुपेण जिम्मेवार माना है। वर्ष 2008-09 के अपने प्रतिवेदन में सीएजी ने बताया है कि कुशहा के पूर्वी अफ़लक्स बांध के कमजोर होने की सूचना फ़रवरी 2008 में ही राज्य सरकार को प्राप्त हो गई थी। इसके अलावा सहरसा के तत्कालीन अनुमंडलाधिकारी ने सहरसा डीएम को पत्र लिखकर सूचित किया था कि अत्याधिक सिल्ट के कारण कोशी का जलस्तर महाप्रलय को निमंत्रित कर सकती है। राज्य सरकार के अधिकारियों के लेटलतीफ़ी का जिक्र करते हुए सीएजी ने कहा है कि पत्र मिलने के करीब एक महीने के बाद यानि मार्च 2008 में सहरसा के डीएम ने उक्त पत्र को आपदा विभाग एवं जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार को प्रेषित की और सब्से बड़ा आश्चर्य यह कि उस पत्र पर कभी अमल ही नहीं किया गया। इसके अलावा कोशी के पूर्वी अफ़लक्स बांध में कटाव 5 अगस्त 2008 से ही शुरू हो गया था। राज्य सरकार के पास इस तटबंध को बचाने का पूरा मौका था और इस मद में वर्ष 2007 में ही धनराशि निकाल ली गई थी इसके बावजूद इस टूटते तटबंध को बचाने की कोई कोशिश नहीं की गई। 18 अगस्त 2008 को आखिरकार बांध टूट गया और महाप्रलय से राज्य के चालीस लाख लोग प्रभावित हुए।

ट्रेजरी घोटाले में हाईकोर्ट ने दी सरकार को राहत

पटना हाईकोर्ट ने 11412 करोड़ रुपये के ट्रेजरी घोटाले पर सरकार द्वारा दायर तीन पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करने के बाद अपने फ़ैसले को सुरक्षित रख लिया है। हांलाकि कोर्ट ने अगले आदेश तक सभी प्रकार की कार्रवाईयों पर भी रोक लगा दिया है। पटना उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रेखा मनहर लाल दोशित और मुख्य न्यायाधीश सुधीर कुमार कटरियार की खंडपीठ ने बिहार सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। इस प्रकार अभी भी इस पूरे मामले में संशय की स्थिति बरकरार है क्योंकि न्यायालय ने न तो अपने पूर्व के आदेश को स्थगित करने का आदेश दिया है और न ही उस आदेश को वापस लिया है।

 

मोटरसाईकिल पर ढोया गया सैंकड़ो क्विंटल अनाज

जी हां, यह सच्चाई खगड़िया जिले की है। सीएजी के वर्ष 2008-09 के अंकेक्षण रिपोर्ट में यह सच्चाई सामने आयी है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया गया है कि बिहार राज्य खाद्य एवं असैनिक आपूर्ति निगम ने जाली ट्रक नम्बरों द्वारा अनाज की ढुलाई किया है। यह मामला वर्ष 2007 में आये बाढ के दिनों का है। बाढ में फ़ंसे लोगों के राहत के लिये भेजे गये अनाज के उठाव ऐसे वाहनों से हुए हैं जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जाली ट्रक नम्बरों के द्वारा करीब 25 लाख रुपये की 3115 क्विंटल लनाज की ढुलाई की गई। खगरिया जिले के मानसी स्टेशन से खगड़िया शहर स्थित निगम गोदाम तक अनाज पहूंचाकर उसे बाढ राहत के लिये जिस ट्रक से भेजा गया उसका नम्बर जाली है। अगस्त 2007 से अक्टुबर 2007 के बीच ऐसी अनिमततायें की गई हैं। सीएजी ने 32 मामलों में पाया है कि निगम के आवक पंजी में दर्शाये गये वाहन निबंधन संख्या या तो हैं ही नहीं और यदि कुछ मामलों में दर्शाये भी गये हैं तो मोटरसाईकिल और स्कूटर के हैं।

 

बिहार में कोई घोटाला नहीं किया गया – मोदी

राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ट्रेजरी घोटाले के मामले में अपनी सफ़ाई में संवाददताओं को बताया कि राज्य में कोई घोटाला नहीं किया गया है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितता की बात कही है, जबकि विपक्ष इसे घोटाले की संज्ञा दे रहा है। हांलाकि जब अपना बिहार ने इस संबंध में श्री मोदी से पूछा कि चारा घोटाला वित्तीय अनियमितता था या फ़िर घोटाला? इस सवाल पर श्री मोदी ने कहा कि चारा घोटाला एक अण्वेषित सच्चाई है, जिसमें करोड़ों की हेराफ़ेरी की गई। वह चारा घोटाला ही था जिसमें स्कूटर पर सांढों की ढुलाई की गई थी।

श्री मोदी ने बताया कि पिछले सात दिनों में 5516 करोड़ रुपये का डीसी बिल जमा किया जा चुका है। हांलाकि इन्होंने स्वीकार किया कि सिस्टम की अव्यवस्था के कारण समय पर डीसी बिल जमा नहीं हो सका है। इहोंने मांग किया कि केंद्र सरकार के खाते की जांच भी सीबीआई करे।

 

तुगलकी फ़रमान का आया परिणाम

पिछले दिनों 17 जुलाई को मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये तुगलकी फ़रमान कि 7 दिनों में 7 सालों के लंबित विपत्र जमा किये जायें, का परिणाम सामने आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अबतक 50 फ़ीसदी से भी अधिक राशि की डीसी बिल जमा कर दी गई है। करीब 6510 करोड़ रुपये का डीसी बिल सीएजी कार्यालय में जमा कराया जा चुका है। प्राप्त जानकरी के अनुसार निबंधन, उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग की ओर से 2-71 करोड़, ग्रामीन विकास मंत्रालय की ओर से 1727-85 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य विभाग की ओर से 354 करोड़ रुपये, भवन निर्माण विभाग की ओर से 793 करोड़ रुपये, कृषि विभाग की ओर से 85 करोड़ रुपये, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा 5 करोड़, पथ निर्माण विभाग द्वारा 302 करोड़ रुपये, जल संसाधन विभाग द्वारा 9 करोड़, अनुसूचित जाति कल्याण विभाग द्वारा 42 करोड़ रुपये, मानव संसाधन विभाग द्वारा 380 करोड़ रुपये, पशुपालन एवं मत्स्य विभाग द्वारा 9 करोड़, श्रम संसाधन विभाग द्वारा 1 करोड़ रुपये, नगर विकास विभाग के 20 हजार रुपये, पर्यटन विभाग के ओर से 2 करोड़ रुपये सहित कुल 6510 करोड़ रुपये के डीसी बिल जमा किये गये हैं।

 

विशेष रिपोर्ट - बिहार में कानून बिकता है, बोलो खरीदोगे?

क्या आपको कभी थाना जाने का अनुभव है? हम बात कर रहे हैं बिहार के थानों की। बिहार के थानों में एक बोर्ड लगा होता है, जो होता तो अदृश्य है लेकिन आपको जल्द ही नजर आ जायेगी, यदि आप कोई मामला दर्ज कराने गये हैं। मसलन रेस्टोरेंट के मेन्यू कार्ड के जैसे ही आपको हर काम के लिये फ़ीस देनी पड़ेगी। जैसे सिम खोने पर एफ़ आई आर दर्ज कराने के लिये 100 रुपये, पासपोर्ट बनाने के लिये वेरिफ़िकेशन के लिये कम से कम 1500 रुपये, प्रमाण पत्र खो जाने की सूचना देने के लिये कम से क्म 100 रुपये, चरित्र प्रमाण पत्र के लिये 1000 रुपये और अपने ऊपर हुए अत्याचार की सुचना देने की न्यूनतम फ़ीस है 500 रुपये।

यह तो हुई बिहार के थानों की बात। अब आपको हम बताते हैं कुछ और जानकारी।

ट्रेजरी घोटाले के मामले में राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जिस वकील एल नागेश्वर राव की सेवा ली गई, उसका एक दिन का मेहनताना दिल्ली में कम से कम 2 लाख रुपये है। प्राप्त जानकारी के अनुसार डेढ करोड़ रुपये का मेहनताना बिहार सरकार द्वारा श्री राव को दिया गया है। इसकी पुष्टी एक अत्यंत ही विश्वसनीय सूत्र ने की है। इस सूत्र ने यह भी बताया है कि इसके लिये पूरी राशि का अग्रिम भुगतान भी किया जा चुका है। इस सुत्र ने उन 12 बैंक खातों का विवरण भी भेजा है, जिसके माध्यम से यह रकम निकाली गई है।

इसके अलावा ऐसे कई सबूत भी हैं जो यह साबित करते हैं कि बिहार में कानून बिकता है। आवश्यकता है तो केवल एक खरीदार की। क्या आप इसके एक खरीदर बनेंगे।

 

हाईकोर्ट के फ़ैसले से राजनीतिक गलियारे में आया भूचाल

पटना हाईकोर्ट द्वारा सीबीआई जांच की कार्रवाई तत्काल रोक देने के आदेश के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारे में एक भूचाल आ गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जैसे ही यह जानकारी विभिन्न राजनीतिक दलों को मिली कि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तत्काल राहत प्रदान कर दी है, सबसे पहले जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने अपना मूंह खोलते हुए यह ऐलान कर दिया कि सच्चाई की जीत हुई है और विपक्षी दलों के नेताओं का मूंह ठिसुआ गया है। हांलाकि पूरे एनडीए खेमे में ट्रेजरी घोटाले की खबर से हुए राजनीतिक नुकसान को पाटने के लिये जोर-शोर से रणनीति बनाई जा रही है।

उधर विपक्षी दलों के नेता अभी भी यह कहते फ़िर रहे हैं कि कोर्ट ने सरकार को अपराध मुक्त नहीं किया है। जबतक अंतिम फ़ैसला नहीं आ जाता है, तबतक वे इस मामले में कोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। हांलाकि अपना बिहार ने एक याचिकाकर्ता अंजनी कुमार झा से भी दूरभाष पर बात किया, श्री झा ने बताया कि वे कोर्ट के फ़ैसले का इंतजार कर रहे हैं।

 

विपक्ष को मिली संजीवनी - बिहार में 11,412 करोड़ रुपये का ट्रेजरी घोटाला

महालेखाकार द्वारा अंकेक्षण के दौरान पाये गये अनेक वित्तीय अनियमितताओं को अब ट्रेजरी घोटाले की संज्ञा दी जा रही है। यह ठीक उसी प्रकार है जब राजद के शासनकाल में चारा घोटाले को प्रचारित किया गया था। इन दोनों मामलों मे खासियत है। चारा घोटाले की शुरूआत भी कांग्रेसी सरकार के कार्यकल से जुड़ी थी और ट्रेजरी घोटाले की शुरुआत भी वर्ष 2002-03 में हुई थी। यानि दोनों घोटालों में पूर्ववर्ती सरकारें भी शामिल थीं। जब चारा घोटाले को हवा दी जा रही थी, तब राजनीतिक गलियारे में यह बात चर्चा का केंद्र बना था कि क्या लालू को फ़ंसाने के लिये कांग्रेस अपने प्यादों को खोना पसंद करेगी। आखिरकार चारा घोटाले को सच साबित करने के लिये कांग्रेस ने अपने मोहरे पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र की बलि दे दी। इसे घोर आश्चर्य ही कहा जाना चाहिये कि जिस चारा घोटाले के लिये पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को उनके विपक्षियों ने चारा चोर कहा, वे ही एक अन्य चारा चोर को अपने खेमे में प्रश्रय दे रहे हैं।

अब रही बात ट्रेजरी घोटाले की तो इसकी शुरुआत वर्ष 2002-03 में बतायी जा रही है। यानि इसबार निशाने पर हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और निशाना साधने वाले हैं लालू प्र्साद समेत सभी विपक्षी दल्। राजद भी इस बात को जानता है कि जब बात चली है तो, दूर तक जायेगी और कुछ उसके प्यादे भी मारे जायेंगे। लेकिन इससे उनको कोई नुकसान तो होगा नहीं। इसलिये वे नीतीश कुमार को टारगेट कर रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में एक चीज जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह है नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी का राजनीतिक भविष्य्। कांग्रेसियों ने तो अभी से मोर्चा खोल दिया है। केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट ने कल कहा कि जिन्होंने गरीबों की रोटी बेच दी, उन्हें अब राजनीति नहीं, बल्कि जेल में चक्की पीसना है।

बहरहाल इस पूरे मामले में राजनीति गर्म होती जा रही है। एक ओर जहां कुछेक जदयू नेता नीतीश कुमार के शासन काल को गुप्तकाल जैसा स्वर्णयुग की संज्ञा दे रहे हैं तो विपक्षी दल इसे भ्रष्टाचार युग। बेचारी आम जनता पेशोपेश में पड़ी है। खैर आपकी सहायता के लिये प्रस्तुत है कुछ आंकड़े-

 

वर्षवार अग्रिम आकस्मिक विपत्रों का सार(इतने पैसे राज्य सरकार ने ट्रेजरी से आपातकाल की स्थिति में निकाले)

वर्ष

राशि (करोड़ रुपये में)

2002-03

332-22

2003-04

549-41

2004-05

957-72

2005-06

2376-31

2006-07

3849-31

2007-08

3860-47

 

राज्य सरकार द्वारा निकाले गये पैसे जिसका हिसाब नहीं दिया गया है

वर्ष

राशि(करोड़ रुपये में)

2002-03

324-20

2003-04

513-28

2004-05

864-17

2005-06

2181-77

2006-07

3718-28

2007-08

3810-84

कुल

11,412-54