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अपना बिहार निष्पक्षता हमारी पहचान
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सादगी और प्रतिभा के प्रतीक थे राजेंद्र बाबू बिहार की धरती ने अमेक महापुरूषों को जन्म दिया है। अपनी सादगी और प्रतिभा के बूते बिहारीपन को पूरे देश में स्थापित करने वाले राजेंद्र बाबू का जन्म जीरादेई में 3 दिसंबर 1884 को हुआ था। बाल अवस्था में ही कुशाग्र बुद्धि के स्वामी रहे राजेंद्र बाबू ने पहले तो वकालत को अपना पेशा बनाया था, परंतु महात्मा गांधी के आह्वान पर वकालत छोड़ कर देश सेवा में लग गये। प्रतिभा के कारण ही राजेंद्र बाबू संविधान सभा के अध्यक्ष बनाये गये और भारतीय गणतंत्र के प्रथम राष्ट्रपति बनाये गये। बचपन में मौलवी के द्वारा फ़ारसी और ऊर्दू की शिक्षा ग्रहण करने के बाद महज 12 साल की अवस्था में ही इनकी शादी रजवंशी देवी से हो गई। इसके बाद इन्होंने पढने के लिये पटना के टी के घोष एकेडमी में नामांकन लिया। यह इनकी प्रतिभा का ही परिणाम रहा कि वर्ष 1902 में इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और इन्हें प्रेसीडेंसी कालेज द्वारा 30 रुपये माहवार प्रोत्साहन राशि दी गई। उस समय भी राजेंद्र बाबू ने बिहारीपन को प्रोत्साहित करने के लिये वर्ष 1908 में बिहारी छात्रों का एक समूह बनाया था जिसका नाम बिहार स्टुडेंट्स कांफ़्रेंस रखा गया। वर्ष 1915 में राजेंद्र बाबू ने कानून की पढाई में मास्टर डिग्री हासिल की और बाद में इन्होंने डाक्टरेट की डिग्री हासिल किया। राजेंद्र बाबू ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के रुप में की। मास्टर डिग्री हासिल करने बाद इहोंने जुलाई 1908 में मुजफ़्फ़रपुर के भुमिहार ब्राम्हण कालेज में अध्यापक की नौकरी की। बाद में ये इस कालेज के प्रधानाचार्य भी बनाये गये। बाद में इन्होंने कानून की पढाई के चलते यह नौकरी छोड़ दी। हांलाकि कलकत्ता में भी इन्होंने अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रुप में पढाना जारी रखा। राजेंद्र बाबू ने अपनी वकालत वर्ष 1916 में बिहार-उड़ीसा उच्च न्यायालय में शुरु की। इनकी प्रतिभा के कारण न्यायाधीश भी इनका सम्मान करते थे। चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर राजेंद्र बाबू ने अपनी चलती वकालत पर लात मार दी और देश सेवा में जूट गये। अपने राजनीतिक जीवन में इन्होंने डा राहुल सांकृत्यायन के सान्निध्य में इन्होंने देश के लोकप्रिय समाचार पत्रों सर्चलाईट और देश के लिये चंदा किया और कई विशेष आलेख लिखे जिनका देश की राजनीति में व्यापक असर हुआ। वर्ष 1914 में बिहार में आये बाढ के दौरान इन्होंने पीड़ितों की खूब सेवा की। 15 जनवरी 1934 को बिहार में आये भूकंप के समय ये जेल में थे और दो दिनों बाद इन्हें जेल से छुट्टी दे दी गई। जेल छुटने के बाद राजेंद्र बाबू पीड़ितों के बीच पहूंचे और मानव सेवा का नया कीर्तिमान स्थापित किया। एक साल बाद यानि 1935 में पंजाब प्रांत(अब पाकिस्तान में) के क्वेटा में आये भूकंप के दौरान भी इन्होंने पीड़ितों की सेवा के लिये 38 लाख रुपये चंदा जूटाया और करीब एक साल तक रहकर उनकी सेवा की। अक्टूबर 1934 में ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बाम्बे अधिवेशन में पहली बार अध्यक्ष बनाये गये और बाद में वर्ष 1939 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के त्यागपत्र देने के बाद दूबारा अध्यक्ष बने। बाद में वर्ष 1950 में बाबूजी देश के पहले राष्ट्रपति बने। सादगी और प्रतिभा के अद्भूत प्रतीक इस मनीषी ने वर्ष 1962 में राजनीतिक संन्यास लिया और पटना में गंगा किनारे एक झोपड़ी में आकर रहने लगे, जहां इनका देहांत 28 फ़रवरी 1963 को हो गया।
अप्ना बिहार परिवार राजेंद्र बाबू को बिहार के महानायक के रुप में उनका स्मरण कर उनके सिद्धांतों पर चलने को प्रतिबद्ध है। |