Your Ad Here

Copy right reserved to apna bihar software solutions

Text Box: Your
Ad 
Here
Text Box: बिहार के महानायक
Text Box: Late Dr. Mohan Roy
Text Box: अपना विज्ञापन यहां दें। क्योंकि हम पहूंचते हैं दूनिया भर के बिहारी भाईयों के दिल में।

अपना बिहार

निष्पक्षता हमारी पहचान

 

Text Box: खबरे बिहार के उद्यमियों की
Text Box: विकास की खबरें

Home Page

Development News

Political News

News from Districts

Business

Entrepreneur

Educational News

Youth

Women's World

Job

Literature

Art & Culture

About us

Contact us

राहे-बाटे - विकास की नव परिभाषा गढता पूर्णिया जिले का चुनापुर गांव

आपने फ़नीश्वरनाथ रेणु की सुप्रसिद्ध कृति मैला आंचल अवश्य पढा होगा। यदि आपने नहीं पढा तब हम आपको बताते चलें कि इस उपन्यास के माध्यम से रेणु जी ने बिहार की मिट्टी की खुश्बु से पुरे विश्व से परिचय कराया था। हांलाकि यह उपन्यास पूर्णिया जिले के आजादी के पहले की आबोहवा बताती है, जहां राजनीति भी है, द्वेष भी है और आपसी प्यार भी।

 

वर्तमान में इस जिले का नाम पुरे विश्व में स्थापित करने वाले डा मोहन राय इसी जिले के चुनापुर गांव में जन्में और पले-बढे थे। इस संबंध में जब अपना बिहार चुनापुर पहुंचा तब अनेक ऐसे दृश्य मिले, जो विकास की नयी परिभाषा का सृजन करते हैं। प्रस्तुत है चुनापुर के कुछ दृश्य।

 

पहला दृश्य

करीब दोपहर के ढाई बज रहे होंगे जब हम चुनापुर के लिये रवाना हुए। हमारे मार्गदर्शक आनंद राय जी की कृपा रही कि हमें यह सफ़र पैदल तय नहीं करना पड़ा। उंची-नीची गड्ढों वाली सड़क जिन्हें पगडंडी भी कहा जाये तो गलत नहीं होगा। आनंद जी की सूमो धुल उड़ाती चली जा रही थी। खैर हम चुनापुर पहुंचे तब हमे सूमो को छोड़ना पड़ा क्योंकि आगे का सफ़र नाव से तय करना था। पुछने पर आनंद जी ने बताया कि यह कोसी नदी की एक धारा है। 3-4 नावें लगी थीं। इन नावों में एक खासियत थी। यह खासियत थी कि इनमें दुपहिया वाहनों के लिये विशेष रुप से इंतजाम किया गया था। जबतक हम नाव तक पहुंचते एक नाव कुछ बच्चियों को लेकर इस पार आ रहा था। पुछने पर बच्चियों ने बताया कि वे पढने जा रही हैं।

 

दूसरा दृश्य

जैसे ही ह्म नाव से उतर कर चुनापुर गांव की सीमा में दाखिल हुए हमारा सामना एक प्राचीन शिव मंदिर से हुआ। इस मंदिर के स्थापत्य कला में अनेक विशेषतायें हैं। यथा इसका गुम्बद और इसके पाये इसकी प्राचीनता का बोध कराते हैं। इसी मंदिर के एक कोने पर कुछ लोग बैठे मिले अर्द्ध नग्न हालत में। भीषण गर्मी ने इन सबकी हालत इतनी खराब कर दिया है कि बेचारे गांव वालों ने अपने आधे कपड़े उतार रखे थे। वैसे भी यह दृश्य आपको पूरे बिहार के गांवों में देखने को मिल सकता है।

 

तीसरा दृश्य

गांव में पहुंचते ही हमारा सामना गांव के स्कूल से हुआ, जो इस गांव में विकास का जनक रहा है। वर्ष 1936 में स्थापित इस विद्यालय ने बालक मोहन को विश्व का सुप्रसिद्ध सर्जन यानि डा मोहन राय बनाया। वर्तमान में इस विद्यालय की हालत खस्ता है। गांव वाले बताते हैं कि कभी डा राय ने अपना पैसा खर्चकर विद्यालय परिसर का निर्माण कराया था। इसीलिये इस स्कूल का नामकरण भी डा राय के माता-पिता के नाम से किया गया है। विस्तृत मैदान और खंडहर बज चुके इस सरकारी स्कूल से हमें और कोई विशेष आशा नहीं रही।

 

चौथा दृश्य

चुनापुर गांव में जाने के हमे तीन रास्ते बताये गये। लेकिन ह्म लोगों ने पग़डंडी के विकल्प का चयन किया। सुखद आश्चर्य हुआ जब एक महिला अपनी स्कूटी से कहीं जा रही थी। पुछने पर आनंद जी ने बताया कि यह महिला शिक्षक है।

 

पांचवा दृश्य

इस गांव के लोगों को अब गांव में आने के लिये नाव का सहारा नहीं लेना पड़ेगा, क्योंकि एक पुल का निर्माण किया जा रहा है। अपनी बुढी आंखों से सपने को सच होते देख गांव के वयोवृद्ध पूर्व मुखिया शम्भुनाथ राय हर दिन शाम को यहां आकर बैठते हैं और इस बात का इंतजार करते हैं कि कब वे इस पुल पर चढ्कर अपने गांव में आयेंगे।