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अपना बिहार निष्पक्षता हमारी पहचान
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क्रांति शब्द की परिभाषा बिल्कुल समाजवाद की परिभाषा के जैसे है। यानि यह एक ऐसी टोपी है जो सभी के सिर पर सुंदर दिखता है। इसे हम युं भी कह सकते हैं यह बिल्कुल पानी की तरह है जो कोई भी आकार ग्रहण अपने पात्र के अनुसार धारण कर सकता है और यदि पात्र टूट जाये तो कोशी का महाप्रलय भी साबित होता है। हिंसक क्रांति, वैचारिक क्रांति, अहिंसक क्रांति, राजनीतिक क्रांति, गैर राजनीतिक क्रांति, धार्मिक क्रांति, हरित क्रांति, लाल क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति के बारे में अब तक अनेकों बार पढ चुका और कई क्रांतियों का हिस्सा बनने का अवसर भी मिला। परंतु कल जिस क्रांति से मेरा साक्षात्कार हुआ वह मूक भले ही हो लेकिन निर्जीव नहीं था। इस मूक क्रांति के जनक ज्योति कुमार सिन्हा से मेरी मुलाकात मेरे अभिभावक रमेश यादव जी की प्रेरणा का परिणाम रहा। उनके ईमेल प्राप्त होने पर मुझे इस रहस्यमयी प्रकृति के इंसान के बारे में जानने की दिलचस्पी हुई। दिलचस्पी भी ऐसी कि मैंने एक अतिमहत्वपूर्ण कार्य को त्याग कर श्री सिन्हा के साथ करीब ढाई घंटे बिताये। इस दौरान उनकी सरलता ने तो पहले ही मुझे अहसास करा दिया कि मैं एक क्रांति का हिस्सा बनने जा रहा हूं। उनके घर में मौजूद एक कुत्ते ने मेरी ओर बड़े ध्यान से देखा मानों वह मेरी थाह लगा रहा हो। एकबारगी तो मुझे लगा जैसे उसका विशाल जबड़ा मेरे पैरों पर अपने निशान दे जायेगा, परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। रत्नाकर मिश्रा के साथ मैं उस विशाल हृदय के स्वामी के सम्मुख बैठा था। आमतौर पर पुलिसवालों के बारे में मैं अच्छी राय नहीं रखता हूं। इसके कई वाजिब कारण भी हैं, लेकिन कल मैंने पहली बार एक पुलिस पदाधिकारी रह चुके व्यक्ति के अंदर बिहार के विकास की एक ललक को देखा। ऐसा विकास जो आजतक सबसे अधिक शोषित हो चुके समुदाय को समाज के मुख्यधारा में ला सके। डीजी रैंक के पुलिस पदाधिकारी रह चुके ज्योति सिन्हा जी ने मुझे बताया कि उनके पिता और पितामह दोनों बिहार में पुलिस विभाग के आला पदाधिकारी रह चुके हैं। इनके एक भाई लेफ़्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा को आसाम और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों का राज्यपाल होने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। ज्योति सिन्हा जी की उम्र भी 65 के पार ही रही होगी, इस कारण मैं उनके अंदर एक विशाल अनुभव को महसूस कर रहा था। इन्होंने बताया कि वर्ष 1968 में जब ये पहली बार आईपीएस बने तब प्रशिक्षण के दौरान बिहटा में इनकी पहली पोस्टिंग हुई। इस दौरान इन्हें एक सूचना मिली कि एक अपराधी अपने घर में सोया हुआ है और उसे गिरफ़्तार कर चोरी गये सामान जब्त किये जा सकते हैं। श्री सिन्हा अपने दल बल के साथ उस गांव में आधी रात को पहूंचे। वहां एक ऐसे घर में उस अपराधी के होने की सूचना मिली, जिसकी छत की ऊंचाई केवल चार फ़ीट थी। टार्च की रोशनी में श्री सिन्हा ने घर में प्रवेश किया और अपने डंडे से गंदे कंबल को हटाया। एक सुअर के बोलने की आवाज आई। श्री सिन्हा ने कहा कि यहां तो सुअर है। लेकिन एक अन्य अधिकारी ने कहा कि इसके बगल में जो सोया है, वही अपराधी है। वह एक इंसान था जो सुअर के साथ सो रहा था। यही इस मूक क्रांति की शुरूआत थी। बाद में जब 1988-91 के बीच श्री सिन्हा स्पेशल ड्यूटी पर पेरिस स्थित भारतीय दूतावास में तैनात थे, तब वहां वीजा के लिये आवेदन करने वालों से इन्हें जानकारी मिली कि कई फ़्रांसीसी नागरिकों ने गुजरात और महाराष्ट्र में बच्चों को गोद लिया है और वे उन बच्चों को पढाने और आगे बढाने की जिम्मेवारी ले रखी है। यह मूक क्रांति के सजीव होने की शुरुआत थी। वर्ष 2005 में श्री सिन्हा सेवानिवृत हुए और दिल्ली में आराम करने के बजाय इन्होंने पटना को अपना वास बनाया और वर्तमान में खाजपुरा इलाके में एक छात्रावास चला रहे हैं जिसमें करीब 200 मुसहर बच्चे पढते हैं। श्री सिन्हा मानते हैं कि यदि हर साल 80 या फ़िर 100 मुसहर बच्चे इंजीनियर और डाक्टर अथवा बड़े अधिकारी बनेंगे तो संभव है कि आने वाले 50 सालों में वह हो सकेगा जो पिछले 2000 सालों में न हो सका और वर्तमान सरकारी नीतियों को देखते हुए अगले 2000 सालों में भी संभव नहीं है। |