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Text Box: Tuesday, November 16, 2010
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शाबास चित्रांश, हमें नाज है तुमपर

17 साल के चित्रांश तिवारी की विशेषता यह है कि दूनिया के 102 देशों के प्रतिनिधियों ने इनके परियोजना को सबसे बेहतर करार दिया है। न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्रसंघ मिलेनियम डेवलपमेंट गोल रिव्यू समिट में वर्ल्ड समिट अवार्ड के अध्यक्ष पीटर ए ब्रक ने घोषणा किया है कि चित्रांश का प्रोजेक्ट ग्रीनब्रीज दूनिया के सबसे बेहतरीन परियोजनाओं में से एक है जिसके सहारे पूरी दूनिया को प्रदूषण से बचाया जा सकता है। बताते चलें कि इस अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में 102 देशों के 630 परियोजनाओं को शामिल किया गया था, जिसमें 18 परियोजनाओं को अंतिम चरण के लिये स्वीकृत पाया गया और इनमें चित्रांश के प्रोजेक्ट को सबसे बेहतर माना गया है। इससे पहले भी चित्रांश को नेचर यंग इको हीरो अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

खुदी को कर बुलंद इतना ………………………

जीवन से लबालब हैं ममता की आंखें

दोनों पैरों से विकलांग ममता भारती पटना आर्ट कालेज में छात्रा हैं। इन्होंने मधुबनी पेंटिंग में विशेषज्ञता हासिल की है। चुनौतीपूर्ण जीवन को चुनौती दे रही ममता बताती हैं कि उन्हें यह कला विरासत में अपने दादा जी से मिली है। ये बताती हैं कि इन्होंने मधुबनी पेंटिंग में फ़ाइन आर्ट को शामिल कर पारम्परिक चित्रकारी को एक नया स्वरूप प्रदान किया है। इन्होंने दो बार अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व किया है। अबतक एक दर्जन प्रदर्शनी लगा चुकी ममता को इस बात का कोई असंतोष नहीं है कि उसे चुनौतीपूर्ण जीवन मिला है। इन्हें खुशी है कि ईश्वर ने उनके हाथों में कला दी है।

मुझे बताइये, मंदबुद्धि क्या होता है

गौर वर्ण, लंबा सुडौल शरीर और शरीर पर आधुनिक वस्त्र पहने सुकान्त को देखकर यह कोई नहीं कह सकता कि वे मंदबुद्धि के शिकार हैं। अपने हाथों में रुमाल लपेटे सुकान्त बताते हैं कि यह उनका स्टाइल आईकान है। इनके माता-पिता दोनों कालेज में प्रोफ़ेसर हैं। सुकान्त को तैरना, क्रिकेट खेलना और गाड़ी चलाना अच्छा लगता है। 12वीं कक्षा के छात्र सुकान्त बताते हैं कि उन्हें नहीं पता कि मंदबुद्धि क्या होता है।

इकबाल को है नौकरी की दरकार

बैसाखी के सहारे जीवन की पथरीली राह तय करने वाले गया जिले के इकबाल हुसैन अशरफ़ को इस बात का मलाल है कि राज्य सरकार उनकी कोई मदद नहीं कर रही है। इकबाल ने दो बार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व किया है। इसके अलावे राष्ट्रीय स्तर के खेल प्रतियोगिता में तीन बार बिहार को पदक दिलाया है। ये दुख के साथ कहते हैं कि जीवन में 26 वसंत पार करने के बाद अब समस्या है दो वक्त के रोटी के जुगाड़ की। यदि सरकार नौकरी की व्यवस्था कर दे तो संभव है कि उनके निशक्त भी सशक्त बन सकें।

ओबामा से मिले इरफ़ान

देश में रिक्शावाला के नाम से मशहुर सम्मान फ़ाऊंडेशन के संस्थापक इरफ़ान आलम का कहना है कि वे खुशकिस्मत रहे हैं कि उन्हें केवल पांच महीने के अंदर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से दो बार मिलने का मौका मिला है। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के सभागार में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में श्री आलम ने बताया कि वे उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे जिसने विगत 6 नवंबर को ओबामा से मुलाकात की थी। इन्होंने बताया कि करीब 75 मिनट तक चली इस बैठक में इन्होंने बिहार की बदलती आर्थिक व्यवस्था और सम्मान फ़ाऊंडेशन की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के प्रतिक्रिया संबंधी सवाल पर श्री आलम ने कहा कि उन्होंने कहा कि “आप मुझसे अधिक कठिन काम कर रहे हैं।“

विदित है कि इरफ़ान आलम ने सम्मान फ़ाऊंडेशन के माध्यम से सूबे में रिक्शाचालकों के लिये अनेक क्रांतिकारी पहल किये हैं। श्री आलम ने बताया कि सम्मान फ़ाऊंडेशन का विस्तार अब देश के 8 राज्यों में हो चुका है। मध्यप्रदेश की सरकार ने तो बजाप्ता इनके माडल को सरकारी योजना के रुप में अंगीकृत किया है।

संवाददाता सम्मेलन के अवसर पर बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष एस पी सिन्हा ने कहा कि इरफ़ान बिहार के इकलौते उद्यमी हैं, जिन्हें ओबामा से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह पूरे सूबे के लिये गर्व का विषय है। इस अवसर पर टाइ, बिहार के अध्यक्ष प्रभात कुमार सिन्हा और बीआईए के उपाध्यक्ष रामलाल खेतान सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

राजेंद्र माथुर, साइकिल, प्रभास जोशी और उनके ठहाके

उन दिनों मेरी शादी को कुछ साल ही हुए थे। रोज रात को वे(प्रभास जोशी) और राजेंद्र माथुर दोनों अपनी साइकिल से अखबार के कार्यालय से घर लौटते और घर आने के बजाय घर के बाहर सड़क पर ही घंटों बहस किया करते थे। बीच-बीच में उनके ठहाकों से हम घरवालों का गुस्सा बढता जाता था, लेकिन हम सभी मजबूर थे। 11 दिसंबर 1963 से लेकर वर्ष 2009 तक हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाने वाले स्व प्रभास जोशी के साथ जीवन जीने वाली उषा जोशी की आंखों में उनके न रहने का दुख अवश्य है, लेकिन चेहरे पर एक संतोष भी है। संतोष इस बात का कि स्व जोशी ने अपना पूरा जीवन पूरी इमानदारी के साथ जिया और दूसरों को जीने का मौका भी दिया।

श्रीमती जोशी ने अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में कहा कि जब उनकी शादी हुई थी, तब उनकी उम्र केवल 16 साल की थी। उस समय प्रभास जोशी नई दूनिया में टेली प्रिंटर पर तैनात रहते थे। हांलाकि वे शादी के लिये तैयार नहीं थे और अपनी मां से कहा करते थे कि मेरे गर्दन पर छुरी चला दो, लेकिन शादी नहीं करूंगा। परंतु विनोबा भावे के समझाने के बाद उन्होंने हामी भरी। श्रीमती जोशी ने बताया कि प्रभास जी केवल क्रिकेट देखने और उसके बारे में लिखने को लेकर ही दीवाने नहीं थे, बल्कि वे क्रिकेट खेलते भी थे। छुट्टी के दिनों में अपने भाईयों और पड़ोसियों के साथ मिलकर खेलना, फ़िर हारने के बाद घर आकर झगड़ा करना और फ़िर साथ में चाय-नाश्ता करना उन्हें बेहद पसंद था।

पत्रकारिता के संबंध में पूछे जाने पर श्रीमती जोशी ने कहा कि वह केवल पत्रकारिता ही थी, जिसके लिये वे जन्मे थे। हांलाकि कभी भी वे बाहर के मुद्दों को घर में बहस का विषय नहीं बनाते थे, परंतु रहते-रहते मुद्दे हमरे जीवन का हिस्सा बन गये। जनसत्ता के मुख्य संपादक के रुप में उनकी दिनचर्या का आलम यह होता था कि एक बार जब वे घर से निकलते तो फ़िर घर को भूल ही जाते थे। जनसत्ता से अवकाश लेने के बाद अपने सबसे लोकप्रिय स्तंभ कागद-कारे लिखने के लिये वे पहले एक दिन पूरा आराम करते थे। यह पूछे जाने पर कि क्या कभी जोशी जी भयभीत हुए अथवा उन्हें डर लगा, श्रीमती जोशी ने कहा कि वे भयभीत तो कभी नहीं हुए, हां चिंतित अवश्य रहते थे। विशेषकर देश की राजनीति को लेकर वे हमेशा चिंतित रहते थे। जहां तक डरने की बात है तो एक बार खालिस्तान के मांग के विरोध में लिखे जाने पर पुलिस द्वारा उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की बात कही गई, जिसे हम सब परिजनों ने इन्कार कर दिया।

बिहार से जुड़ाव के बारे में श्रीमती जोशी ने कहा कि बिहार की धरती उनकी दूसरी मातृभूमि थी। शुरुआत में जेपी के कारण उनका लगाव बिहार से हुआ। बाद में डा रजी अहमद और स्व दिग्विजय सिंह के कारण उनका रिश्ता और मजबूत होता गया।

इन्होंने बताया कि अपने जीवन के अंतिम दिनों प्रभास जोशी पेड न्यूज के चलन को लेकर खासे चिंतित रहा करते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि इस गिरावट को दूर करने के लिये जल्द ही बहुत बड़े क्रांति की आवश्यकता है। यदि जल्द ही पत्रकारिता जगत में कारपोरेट हस्तक्षेप पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसका कुप्रभाव आने वाली पीढी को झेलना पड़ेगा।

प्रथम चरण में 154 उम्मीदवार दागी, सबसे अधिक दागी भाजपा के

बिहार विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण के चुनाव में कुल 47 सीटों पर चुनाव होना है। इसके लिये कुल 446 उम्मीदवार मैदान में हैं। खास बात यह है कि इनमें से 154 उम्मीदवार दागी हैं। यानि ये वे हैं जिनके खिलाफ़ कोई न कोई मामला न्यायालय में लंबित है। इसमें भी 98 ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके खिलाफ़ गंभीर आरोप जैसे हत्या और बलात्कार के मामले लंबित हैं। नेशनल इलेक्शन वाच के राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल ने ये जानकारियां कल संवाददाता सम्मेलन में दी। इन्होंने बताया कि प्रथम चरण के चुनाव में 3 ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनपर बलात्कार करने का मामला लंबित है। इनमें पूर्णिया सीट से भाजपा प्रत्याशी राज किशोर केसरी शामिल हैं। जबकि दो अन्य कोंचाधामन से मुमताज अहमद और सोनबरसा से मनोज कुमार पासवान हैं जिनपर दुष्कर्म करने का आरोप लंबित है।

श्री बैरवाल ने कहा कि बिहार की जनता को ही यह फ़ैसला लेना है कि उनका प्रतिनिधि एक अपराधी होगा या फ़िर एक स्वच्छ नेता। इसके लिये नेशनल इलेक्शन वाच उन्हें हर प्रकार की सहायता प्रदान करेगा। श्री बैरवाल ने कहा कि मतदाताओं की सुविधा के लिये एक टाल फ़्री हेल्पलाइन की शुरुआत की गई है। अब कोई भी व्यक्ति 1-800-110-440 पर संपर्क कर अपने विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी के बारे में विवरण जान सकता है। संवाददाता सम्मेलन में नेशनल इलेक्शन वाच के बिहार प्रभारी अंजेश कुमार सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

दल

कुल उम्मीदवार

दागी(प्रतिशत मे)

भाजपा

21

67

लोजपा

16

63

जदयू

26

46

कांग्रेस

47

43

राजद

31

39

बसपा

45

38

 

बिहार विधानसभा चुनाव, एक सच्चाई यह भी

· खजौली विधानसभा क्षेत्र से जेडीएस के उम्मीदवार हीरा प्रसाद मिश्रा सबसे अमीर उम्मीदवार है। इनके पास कुल 22 करोड़ 50 लाख 36 हजार 433 रुपये की संपत्ति है।

· सबसे गरीब उम्मीदवार पटवारी हांसदा हैं जो झामुमो के टिकट पर धमदाहा से अपना भाग्य आजमा रहे हैं। इनके पास संपत्ति के नाम पर केवल शून्य है।

· सबसे अधिक उम्मीदवारों के टाप टेन की सूची में राजद और कांग्रेस के तीन-तीन तो भाजपा के एक उम्मीदवार शामिल हैं।

· कांग्रेसी उम्मीदवारों में सबसे अधिक अमीर प्रदेश अध्यक्ष चौधरी महबूब अली कैसर हैं। इनके पास 3 करोड़ 39 लाख 22 हजार 288 रुपये की सम्पत्ति।

· पूर्णिया के कस्बा से भाजपा के उम्मीदवार प्रदीप कुमार दास सबसे बड़े कर्जदार हैं। इनके सिर पर 5 करोड़ 47 लाख 41 हजार रुपये का कर्ज है।

· 446 उम्मीदवारों में से केवल 113 ग्रेजुएट, 13 ग्रेजुएट प्रोफ़ेशनल, 50 पीजी, 16 डाक्टरेट, 92 बारहवीं पास, 71 दसवीं पास, 36 आठवीं पास, 5 पांचवीं पास, 30 साक्षर तो 3 निरक्षर भी जमे हैं चुनावी मैदान में।

 

उद्यमियों ने कहा – ह्म बदल सकते हैं बिहार

यदि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बेरोजगार युवकों को प्रशिक्षण, संस्थान और बाजार उपलब्ध कराया जाये तो निश्चित तौर पर इन क्षेत्रों मेम भी उद्यमिता की विकास गाथा लिखी जा सकती है। ये बातें राज्य के जाने-माने उद्यमी सह आम्रपाली समूह के स्वामी के पी एस केसरी ने बिरला इन्स्टीच्यूट आफ़ टेक्नोलाजी के सभागार में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में कहीं।

अपने संबोधन में सम्मान फ़ाऊंडेशन के संस्थापक सह युवा उद्यमी इरफ़ान आलम ने कहा कि उदयमी बनने के लिये यह आवश्यक नहीम है कि उन्हीं रास्तों को अख्तियार किया जाये, जिसके सहारे अन्य लोगों ने सफ़लता हासिल की हो। एक सफ़ल उद्यमी बनने के लिये हौसले और जज्बे का होना आवश्यक है।

राज्य में भूसे से बिजली बनाकर 259 गांवों को रौशन करने वाले ज्ञानेश पांडेय ने छात्रों के साथ अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होने बिजली से जुझते बिहार को रौशन की ठानी है। अगले 4 सालों में वे करीब 5000 गांवों में बिजली पहूंचाने में कामयाब होंगे।

आईआईटी खड़गपुर के उद्यमिता प्रोत्साहन योजना के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में बीआईटी एक्स्टेंशन सेंटर के निदेशक डा के के श्रीवास्तव और उपनिदेशक एस पी लाल सहित बड़ी संख्या में छात्र/छात्रायें उपस्थित थीं।

पटना में जब नहीं मिलेगा पीने का पानी

गंगा नदी के तट पर बसा पटना शहर के लोगों के जीवन का जलाधार मुख्य रुप से भूजल पर आश्रित है। मुख्य रुप से पटनावासी गहरे नलकूपों से निकाले गये पानी का ही उपयोग करते हैं। 70 के दशक में पटना का भूजल स्तर करीब 8 मीटर दूर था जो अब बढकर 14 मीटर के भी नीचे चला गया है। पिछले पांच सालों में इन आंकड़ों में जबर्दस्त गिरावट दर्ज की गई है। यह निश्चित रुप से पटनावासियों के लिये चिंता का सबब है। सबसे बड़ा सवाल है कि यदि अब भी पटना वासी जल का संरक्षण नहीं करेंगे तो निश्चित तौर पर वह दिन आने वाला है जब पटना में पीने का पानी नहीं मिलेगा।

यह चिंता केंद्रीय भूजल बोर्ड के मध्य पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय के वैज्ञानिकों ने जाहिर की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पटना नगर निगम के करीब 100 वर्ग किलोमीटर के दायरे में जनसंख्या का घनत्व 13700 व्यक्ति प्रति किलोमीटर है। इस कारण इस क्षेत्र में भूजल का सबसे अधिक दोहन किया जा रहा है। इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 1950 से लेकर वर्ष 1970 के बीच पटना का भूजल स्तर 7.85 मीटर थी, वहीं वर्ष 1970 से लेकर 1990 के बीच यह बढकर 10.25 मीटर हो गई। वर्तमान में यह दूरी 14.1 मीटर को पार कर गई है।

पिछले पांच सालों में कहां कितना घटा पानी

स्थान

भूजल में गिरावट

कांग्रेस मैदान, कदमकुआं

4 मीटर

मीठापुर

2.5 मीटर

करबिगहिया

2.88 मीटर

गोलघर

2.49 मीटर

बेगमपुर पटना सिटी

3.11 मीटर

अनिसाबाद

2.37 मीटर

खगौल

3.77 मीटर

खाजेकलां

3.16 मीटर

छज्जूबाग

2.7 मीटर

ए एन कालेज, बोरिंग रोड

2.15 मीटर

फ़तूहां

5.44 मीटर

फ़ुलवारीशरीफ़

2.46 मीटर

आलमगंज

0.48 मीटर

मनेर

2.67 मीटर

 

दूनिया ने देखा भारत का दम

पिछले एक साल से चौतरफ़ा आलोचना झेलने के बाद आखिरकार पूरी दूनिया ने भारत का दम देखा। कल जैसे ही प्रिंस चार्ल्स और राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने राष्ट्रमंडल खेल 2010 का उद्घाटन किया, पूरी दूनिया ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को खुली आंखों से देखा। इस अवसर भारतीय कलाकारों ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को जमकर सराहा। इस उद्घाटन समारोह का सबसे खास आकर्षण रहा 70 करोड़ का गुब्बारा। इस गुब्बारे को लेकर आलोचना झेल आयोजन समिति ने यह साबित कर दिया कि यह बेशकीमती गुब्बारा केवल पैसे की बर्बादी नहीं, बल्कि आयोजन की भव्यता को प्रमाणित करने के लिये कितना आवश्यक था। इस गुब्बारे में बेटन में लगे हजारों शीशों ने पूरे स्टेडियम को चकाचौंध कर रखा था। बहरहाल उद्घाटन के साथ ही अब पदकों की लड़ाई शुरू हो जायेगी, उम्मीद करें कि भारतीय खिलाड़ी भारत की शान में चार चांद लगायेंगे। इसके अलावा आलोचनाओं के बावजूद इतने अच्छे और भव्य आयोजन के लिये सुरेश कलमाड़ी को बधाई तो दिया ही जाना चाहिये।

पूंजीवाद के चंगूल में है मीडिया

भारतीय पत्रकारिता पर पूंजीवाद की पकड़ मजबूत हुई है। वर्ष 1990 के बाद देश में जारी उदारीकरण के दौर में भुगतान आधारित खबरों को छपने की कुप्रथा में वृद्धि हुई है। ये बातें अखिल भारतीय पत्रकार यूनियन के महासचिव के निवास रेड्डी ने बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन और सुरेंद्र प्रताप सिंह पत्रकारिता संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विशेष कार्यशाला में अपने संबोधन में कहीं। इन्होंने कहा कि पेड न्यूज से अखबारों की विश्वसनीयता घटती है और इसका प्रत्यक्ष असर पत्रकारों पर होता है। आम जनता प्रबंधन को कसूरवार न मानकर पत्रकारों को दलाल समझने लगती है। जबकि वास्तविकता इसके परे है।

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने कहा कि जबतक मीडिया हाऊसों में बड़े पूंजीपतियों का पैसा और नियंत्रण रहेगा, तबतक पेड न्यूज पर रोक लगाना असंभव है। इन्होंने कहा कि पूंजी लगाने वाला व्यक्ति अथवा समूह मुनाफ़ा कमाने के लिये पैसे लगाता है न कि समाज सेवा के लिये। इसलिये पेड न्यूज पर रोक लगाना वर्तमान में असंभव प्रतीत होता है। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार अरूण कुमार, चंद्रशेखर सिंह, शिवेंद्र नारायण सिंह, एक के नायक, समीर कुमार सिंह और उत्तम कुमार सिंह सहित बड़ी संख्या में गणमान्य उपस्थित थे।

आयोध्या मामले में कल फ़ैसला देगी इलाहाबाद कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ कल यानि 30 सितम्बर को अपराह्न 3 बजकर 30 मिनट पर आयोध्या मामले में अपना फ़ैसला सुनायेगी। इससे पहले रमेश चंद्र त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस एच कपाड़िया, न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम और न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन की विशेष खंडपीठ ने दो घंटे की सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट को आयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद जमीन विवाद के संबंध में फ़ैसला सुनाने का आदेश दिया। एक पंक्ति के आदेश में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हम इस एसएलपी को खारिज करते हैं और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर लगी रोक को वापस लेते हैं। श्री त्रिपाठी ने अपनी याचिका में मामले को सुलह के जरिये निपटाने के लिये समय देने के वास्ते फ़ैसला टाल्ने का अनुरोध किया था।

फ़ैसले के मद्देनजर राज्य में सुरक्षा व्यवस्था बढी

कल आने वाले आयोध्या फ़ैसले के मद्देनजर किसी प्रकार की अनहोनी को टालने के लिये राज्य में सुरक्षा व्यवस्था बढा दी गई है। पुलिस मुख्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य के सभी पुलिस स्टेशनों के अधिकारियों को यह सख्त आदेश दिया गया है कि वे संवेदनशील इलाकों में गश्त तेज कर दें। इसके अलावा इस संबंध में पुलिस के आला अधिकारियों की बैठक आज होनी तय है। इसमें राज्य के सुरक्षा व्यवस्था पर विचार विमर्श किया जायेगा।

बिहारियों ने कहा, न हो अब फ़ैसले में देरी

आयोध्या मामले में आज उच्चतम न्यायालय में सुनवाई होनी है। पिछले साठ सालों से विवादित जमीन की मिल्कियत को लेकर विचाराधीन फ़ैसले के संबंध में बिहारियों का मानना है कि अब फ़ैसले में देरी नहीं होनी चाहिये। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि यदि देश को विकास के रास्ते पर आगे बढना है तो इस तरह के जटिल सवालों के जवाब जल्द से जल्द सुलझाने होंगे।

इस संबंध में राजद के राज्यसभा सांसद जाबिर हुसेन ने कहा कि अभी भी इस मामले में देरी होने की उम्मीद है। इसका सबसे बड़ा करण यह कि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले को अपने पास रखा है। संभव उच्चतम न्यायालय इस मामले के तह में जाना चाहे। यदि ऐसा हुआ तो अभी इस मामले में निर्णय आने में देर लगेगी।

इमारत-ए-शरिया के जेनरल सेक्रेटरी अनिसुर रहमान कासमी ने कहा कि अब किसी भी सूरत में फ़ैसले में देरी नहीं होनी चाहिये। इन्होंने कहा कि भारत के मुसलमान हर हाल में न्यायालय के फ़ैसले का सम्मान करेंगे। इन्होंने केंद्र सरकार पर जानबुझकर फ़ैसले में देरी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह इस मामले को सुलझाना नहीं चाहती है।

उधर राजद के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी ने इस मामले में कोई भी टिप्पणी करने से इन्कार करते हुए कहा कि फ़ैसला चाहे कुछ भी हो, देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह भाईचारा बनाये रखे। इन्होंने यह भी कहा कि पूरा देश इस फ़ैसले का इंतजार कर रहा है। राज्य के आईटी व्यवसायी मनोज कुमार सर्राफ़ ने कहा कि आज के दौर में जब भारत विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है तो जटिल और लंबित समस्याओं का समाधान जल्द से जल्द हो जाना चाहिये ताकि देश अपने विकास पर केंदित कर सके। इस तरह आयोध्या मामले में आने वाला फ़ैसला अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। इसमें देरी नहीं होनी चाहिये। इन्होंने यह भी कहा कि चुंकि देश राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी कर रहा है, इसलिये यदि फ़ैसला खेलों के समापन के बाद आये तो बेहतर होगा।

युवा फ़िल्म निर्देशक आजाद आलम ने बताया कि जब पिछली बार एक हफ़्ते के लिये फ़ैसले को टाला गया था तो उन्हें अत्यंत ही निराशा हुई। इनका मानना है कि अब किसी भी सूरत में फ़ैसले को नहीं टाला जाना चाहिये। आलम ने यह भी कहा कि इस फ़ैसले को लेकर किसी भी पक्ष को पुर्वाग्रह का शिकार नहीं होना चाहिये और न ही इसे जीत या हार के नजरिये से देखा जाना चाहिये।

याद किये गये क्रुपाकरण

राज्य के मीडिया जगत के वरिष्ठ सदस्य पी के क्रुपाकरण की स्मृति में विशेष व्याख्यान का आयोजन स्थानीय गांधी संग्रहालय में किया गया। इस अवसर पर विभिन्न वक्ताओं ने स्व पी के क्रुपाकरण के सजीव और निष्पक्ष पत्रकारिता का स्मरण करते हुए उन्हें बिहार का धर्मपुत्र करार दिया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने कहा कि स्व क्रुपाकरण जी केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि राज्य के सैंकड़ों पत्रकारों के लिये गुरु समान थे। हर विषय पर पूरी जानकारी रखना और उन्हें निष्पक्ष खबर के रुप में प्रस्तुत करने की जो इच्छाशक्ति उनमें थी, उसे आज के पत्रकारों में जागृत करने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर गांधीवादी डा रजी अहमद ने स्व क्रुपाकरण को याद करते हुए कहा कि 1974 के आंदोलन के समय इन्होंने लोकनायक जय प्रकाश नारायण के साथ मिलकर एक इकाई के रुप में काम किया। उन दिनों पूरे पटना में केवल इंडियन एक्स्प्रेस के कार्यालय में टेलीप्रिंटर हुआ करता था, जिसके माध्यम से पूरे देश की खबरें पटना पहूंचती थीं और फ़िर वे खबरें लोकनायक तक पहूंचती थी।

इस अवसर पर वयोवृद्ध समाजवादी नेता इंद्र कुमार ने बताया कि स्व क्रुपाकरण जितने बड़े विद्वान थे, उससे अधिक वे सरल हृदय के स्वामी भी थे। उन्होंने पत्रकारिता धर्म का पालन आजीवन किया। व्याख्यान में वरिष्ठ पत्रकार अरूण सिन्हा, प्रो नवल किशोर चौधरी, पुष्पराज, अख्तर हुसैन, अनीश अंकुर सहित अनेक लोगों ने भाग लिया।

व्यवस्था परिवर्तन समय की मांग

आजादी के 6 दशक बीतने के बाद भी देश और बिहार में चुनौतियां घटने के बजाय बढी हैं। आज के दौर में परिवर्तन समय की मांग हैं और ऐसा करना एक वैज्ञानिक पहल भी होगा। ये बातें पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा एस मोहिउद्दीन ने स्थानीय तारामंडल सभागार में आयोजित एक विचार गोष्ठी में कहीं।

भारत के उद्धार के लिये इसकी शासन व्यवस्था परिवर्तन की अनिवार्यता, देश की पुकार और एक आहवान” विषयक संगोष्ठी में अपने संबोधन में वीर कुंवर सिंह विवि के पूर्व कुलपति डा आई सी कुमार ने आज के वैश्वीकरण के युग में व्यवस्था में हुए परिवर्तनों का जिक्र करते हुए कहा कि 1990 के बाद राज्य में विद्वेष बढा है और इसके कारण भ्रष्टाचार बढा है। इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि देश और राज्य की जनता लोकतांत्रिक तरीके से व्यवस्था परिवर्तन के लिये पहले करे।

इस अवसर पर पटना विवि के पूर्व कुलपति डा एस एन पी सिन्हा, राजद नेता डा रामवचन राय, मगध विवि के पूर्व कुलपति डा आर के महतो, एन आई टी के पूर्व प्राचार्य टी प्रसाद सहित बड़ी संख्या में गणमान्य उपस्थित थे।

प्रजा को नहीं मिला नागरिक अधिकार – वृंदा ग्रोवर

आजादी के 6 दशक बीतने के बाद भी भारत के नागरिकों को केवल प्रजा माना गया है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह कि देश के कानून में अनेक प्रावधान ऐसे हैं जो देश के नागरिकों और प्रजा में विभेद स्थापित करते हैं। ये बातें देश की जानीमानी मानवाधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर ने वर्ष 1997 में मारे गये क्रांतिकारी नेता चंद्रशेखर के ज्न्म दिवस के अवसर पर बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन सभागार में आयोजित व्याख्यामाला में अपने संबोधन में कहीं।

सुश्री ग्रोवर ने ”भारतीय लोकतंत्र में प्रजा से नागरिक का सफ़र” विषयक व्याख्यान में कहा कि शब्दों के हिसाब से पब्लिक सर्वेंट का मतलब जनता का सेवक होना चाहिये, परंतु देश के कानून की नजर में इसका मतलब सरकारी नौकर होता है। इसके दायरे में जनप्रतिनिधि, फ़ौज के अफ़सर, पुलिस और नौकरशाह होते हैं। सुश्री ग्रोवर आर्म्ड फ़ोर्सेज एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में पत्थर की जगह गोलियां बरसायी जा रहीं हैं, लोगों को शक के आधार पर ही मारा जा रहा है और पूरे जम्मू कश्मीर में करीब 8000 लोग गायब हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि फ़ौज के अफ़सरों के खिलाफ़ मुकदमा चलाने के लिये केंद्र सरकार के संबंधित विभाग से अनुमति लेना आवश्यक होता है।

सुश्री ग्रोवर ने बिहार के भागलपुर में पुलिस की बर्बरता का उदाहरण देते हुए कहा कि अंग्रेजों के समय पब्लिक सर्वेट को सर्वेंट टू द क्राउन कहा जाता था और आजाद भारत में भी उसी कानून को बिना फ़ेरबदल के लागू कर दिया गया है। इन्होंने बताया कि राज्यसभा में एक विशेष बिल लाने की तैयारी की चा रही है, जिसके अनुसार पुलिस कर्मियों को टार्चर के नाम पर हाथ काटने से लेकर कोई एक अंग भंग करने का अधिकार होगा और तभी उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ़ मुकदमा चलाया जा सकेगा, वह भी अनुमति लेने के बाद।

इन्होंने कहा कि देश में कानून का उपयोग राज्य की सुरक्षा के नाम पर किया जा रहा है। लेकिन जीने का अधिकार तक छीनने वाले ये सरकारी नौकर किसकी सुरक्षा कर रहे हैं। आखिर देश में लोकतंत्र है। सुरक्षा लोगों की होनी चाहिये न कि राज्य की, क्योंकि भारतीय संविधान में नागरिक सबसे महत्वपूर्ण हैं। इसी संविधान के प्रस्तावना में समता का अधिकार भी है, लेकिन देश का अंग्रेजी कानून अपने ही संविधान की खुली अवहेलना कर रहा है।

इन्होंने यह भी कहा कि प्रजा को नागरिकों का अधिकार मिले, इसके लिये राजन्तीतिक पहल करने की आवश्यकता है और इसके लिये पूरे देश की प्रजा को एक होना होगा। इस अवसर पर प्रोफ़ेसर नवल किशोर चौधरी, अरशद अजमल, रुपेश, विनोद और अपूर्वानन्द सहित बड़ी संख्या में गणमान्य उपस्थित थे।

विकास से बहुत दूर है बिहार

विश्व के मानचित्र पर बिहार पहचान अभी भी बीमारू राज्य में ही है। इसी पहचान को बदलने के लिये राज्य के कई स्वयंसेवी संगठनों ने राज्य के नेताओं से एमडीजी अपनाने और बिहार को विकसित बनाने की अपील की है। सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य यानि मिलेनियम डेवलपमेंट गोल का निर्धारण पहली बार वर्ष 2000 में किया ग्या था। पूरे विश्व के करीब 189 देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने गरीबी को दूर करने के लिये 15 सालों की अवधि कुछ विशेष लक्ष्य निर्धारित किये। इसके बाद सभी देशों ने अपने-अपने स्तर से अपनी जरूरतों के हिसाब से लक्ष्य निर्धारित किया। ये बातें राज्य के प्राख्यात शिक्षाविद प्रो विनय कंठ ने कौटिल्य विहार में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहीं।

प्रो कंठ ने एमडीजी के संदर्भ में जन घोषणा जारी काते हुए कहा कि बिहार में तीन लक्ष्यों पर विशेष जोर दिया जाना चाहिये। शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन्। इन्होंने कहा कि यदि बिहार वर्ष 2015 तक एमडीजी के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में अग्रसर होना चाहता है तो इसके लिये शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के सकल घरेलु उत्पाद का 30 फ़ीसदी शिक्षा के क्षेत्र में और 10 फ़ीसदी स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवंटित किया जाना चाहिये। श्री कंठ नेकहा कि मनरेगा सहित अन्य रोजगारपरक योजनाओं को इमानदारी से लागू किये जाने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर समाजसेवी प्रमोद कुमार सिंह ने कहा कि बिहार को विकास के रास्ते पर लाने के लिये हल्ला बोल कार्यक्रम चलाया गया है। पिछले तीन दिनों में पूरे राज्य में कार्यक्रमों के जरिये लोगों को एमडीजी के लक्ष्यों के बारे में जागरूक बनाने का प्रयास किया गया है। संवाददाता सम्मेलन में डा शकील, संजय पांडेय, मुख्तारुल हक और यूएनएमसी के प्रतिनिधि रमाकांत सप्तथी सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

प्रकृति का अनमोल तोहफ़ा है ओजोन परत

वह ओजोन परत ही है जो सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है और धरती पर रहने वाले मनुष्यों को सुखदायक प्रकाश देती है। ये बातें राज्य के जाने माने पर्यावरणविद प्रोफ़ेसर राजमणि ने श्री कृष्ण विज्ञान केंद्र में विश्व ओजोन परत संरक्षण दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहीं। इस अवसर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में अनेक स्कूलों से आये बच्चों ने भाग लिया। इन प्रतियोगिताओं में सब जूनियर वर्ग में चिल्ड्रेन हेवेन एकेडमी के पांचवीं कक्षा के छात्र अभिषेक को प्रथम पुरस्कार, पटना सेंट्रल स्कूल के छात्र आकाश चंदन को दूसरा और संत माइकल हाई स्कूल के छात्र इशान वत्स को तीसरा स्थान मिला। वहीं जूनियर ग्रुप में संत कैरेंस के छात्र किसलय को प्रथम स्थान, संत माइकल की छात्रा अनुराधा को दुसरा और संत कैरेंस स्कूल की छात्रा आस्था प्रिया को तीसरा स्थान हासिल हुआ। सभी विजेताओं को प्रोफ़ेसर राजमणी प्रसाद ने इनाम देकर पुरस्कृत किया। इस अवसर पर श्री कृष्ण विज्ञान केंद्र के परियोजना निदेशक अनुराग कुमार सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

बहरों को सुनाने के लिये क्या अभी भी धमाकों की जरूरत है?

हमारा देश आजाद है। हम आजाद हैं और हम पूरी आजादी के साथ खुली हवा में सांस ले सकते हैं। संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का लाभ ले सकते हैं। लेकिन ये सभी किताबी बातें है जो किताबों में ही अच्छी लगती हैं। बिहार भारत का वह प्रांत है जहां सरकार की निरंकुशता ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिये हैं।

राज्य सरकार की निरंकुशता का सबसे बड़ा प्रमाण यह कि बुधवार यानि 15 सितंबर 2010 को पटना में एक व्यक्ति दयानंद राम ने वेतन नहीं मिलने के कारण आत्मदाह कर लिया। हांलाकि इस प्रयास में श्री राम बुरी तरह झुलस गये हैं और इनका इलाज पीएमसीएच में चल रहा है। पटना नगर निगम के जलापूर्ति शाखा में दैनिक पारिश्रमिक पर काम करने वाले पंप चालक दयानंद राम ने जलापूर्ति शाखा के मुख्य द्वार पर आत्मदाह का प्रयास किया। श्री राम अपने बकाये वेतन की मांग कर रहे थे। अब सरकारी निरंकुशता का एक और प्रमाण देखिये। वेतन के अभाव में आंदोलन कर रहे पंप चालकों ने निगम प्रशासन को पूर्व में इसकी सूचना दे रखी थी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे आत्मदाह करेंगे। लेकिन इसके बाद भी निगम प्रशासन निरंकुश बना रहा, संचिकाओं को लेकर टालमटोल किया जाता रहा।

आज की महंगाई में घर चलाना कितना मुश्किल होता है, इसका अनुमान हर महीने हजारों रुपये मोटी पगार पाने वाले लोगों से भी जाना जा सकता है और वे जिन्हें पिछले 22 महीने से वेतन नहीं दिया गया हो, उन गरीबों के लिये आत्मदाह के अलावा और क्या विकल्प हो सकता था?

अब इस घटना का सबसे मजेदार पहलू। दयानंद राम ने जिस वक्त आत्मदाह किया, उस समय जलापूर्ति शाखा कार्यालय के मुख्य द्वार पर भारी भीड़ थी। लोग नारे लगा रहे थे और दयानंद राम अपने उपर किरासन तेल उड़ेल रहे थे। मीडिया वाले आये, पुलिस के लोग सामने खड़े थे, निगम के अधिकारी खड़े थे और दयानंद राम के साथी भी वहां खड़े थे। इन सबके सामने दयानंद राम ने अपने बदन में आग लगया। प्रेस फ़ोटोग्राफ़रों ने जमकर फ़ोटो खींचे, दयानंद राम के साथियों ने उत्साहित होकर नारे लगाये, निगम अधिकारियों के पसीने छुट गये। यह सब हुआ और थोड़ी ही देर में एक आदमी जमीन पर गिरा पड़ा था। वह आंशिक रुप से इतना जल चुका था कि वह उठ नहीं सकता था। उसके साथियों ने एम्बुलेंस को बुलाया और उसे पीएमसीएच लाया गया, जहां उसका इलाज चल रहा है।

यह पूरी घटना एक नहीं, अनेक संदेश देती है। सबसे पहला संदेश तो यह कि बिहार में केवल सरकार ही निरंकुश नहीं, बल्कि बिहारी समाज भी निरंकुश हो गया है। दूसरा संदेश यह कि आज भी समाज में बलि का बकरा एक दलित अथवा पिछड़ा अथवा गरीब ही बनता है। आखिर पटना नगर निगम के जलापूर्ति शाखा में सैंकड़ो दैनिक मजदूर हैं, फ़िर एक अकेले दयानंद राम को ही आत्मदाह क्यों करना पड़ा?

प्रश्न उठता है और इसका उठना लाज्मी है। जो काम पिछले 3 महीने से चल रहा आंदोलन न कर सका, वह अकेले दयानंद राम ने कर दिखाया। कल यानि गुरुवार को नगर निगम आयुक्त ने सभी दैनिक वेतन भोगियों के बकाये वेतन का भुगतान किया। निरंकुश सरकार ने निरंकुशता की सारी हदों को पार करते हुए ऐलान किया है कि दयानंद राम के इलाज का सारा खर्च सरकार उठायेगी।

सवाल उठता है कि क्या अभी भी बहरों को सुनाने के लिये ब्मों के धमाके की आवश्यकता है? क्या आजाद बिहार के आजाद लोगों को भी भगत सिंह सरीखा कुर्बानी देना होगा?

लक्ष्मण राम पर चला डंडा, मिली के के पाठक का विरोध करने की सजा

आखिरकार वही हुआ, जिसका पूर्वानुमान लगाया जा रहा था। वित्त विभाग में अंकेक्षक लक्ष्मण राम पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इन सस्पेंशन से संबंधित आदेश पत्र में भले ही के के पाठक का जिक्र न किया गया हो, परंतु जो आरोप लगाये गये हैं, वे सभी उसी प्रकरण से जुड़े हैं। यानि श्री पाठक के हाथों मार खाने के बाद भी श्री राम को न्याय के बदले सस्पेंशन मिली। इसे ही कहते हैं समरथ को नहिं दोष गुसाईं।

येलो-येलो क्या है?

नवल किशोर कुमार

पत्रकार और चुनौतियों का संबंध चोली दामन का संबंध है। रिपोर्टिंग करते वक्त एक पत्रकार हमेशा इस बात का ख्याल रखता है कि वह कोई जनता का प्रतिनिधि नहीं है और न ही वह किसी घटना का प्रत्यक्षदर्शी। उसे हर घटना के बारे में थर्ड पर्सन के रुप में लिखना होता है। मसलन मान लिजीये कि पटना के किसी चौक चौराहे पर कोई हत्या हो रही हो। यदि उस जगह पर एक पत्रकार मौजूद हो तब भी उसे इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह अपनी रिपोर्ट में यह लिखे कि वह घटना उसके सामने घटी है। रिपोर्ट लिखते वक्त या तो उसे पुलिस के पास दर्ज एफ़ आई आर की प्रति चाहिये या फ़िर घटना स्थल पर मौजूद लोगों के विचार। एक विकल्प यह भी होता है कि वह पूरी घटना को इस तरह लिखे।

पटना के अमूक चौराहे पर हत्या

“कल बीती रात अपराधियों ने अमूक चौराहे पर एक आदमी की हत्या कर दी। हत्या को अंजाम देने के बाद अपराधी हवाई फ़ायरिंग करते हुए भाग निकले। अबतक मिली जानकारी के अनुसार पुलिस ने लाश को अपने कब्जे में ले लिया है और इस मामले में किसी के गिरफ़्तारी की सूचना नहीं है। (पुलिस के निष्क्रिय रहने की स्थिति में यह भी लिखा जा सकता है कि अवतक मिली जानकारी के अनुसार हत्या के घंटों बाद भी पुलिस घटना स्थल पर नहीं पहूंच सकी है।)”

पत्रकारिता के अपने-अपने रंग होते हैं। जो उजले रंग की पत्रकारिता करने हैं, उनके लिये उपरोक्त उदाहरण एक सर्वोत्तम उदाहरण है। जो अन्य रंगों की पत्रकारिता करते हैं, उनका तरीका कुछ और हो सकता है। मसलन यदि कोई पत्रकार इस मामले में मसाला डालना चाहे तो वह बड़े आराम से लिख सकता है कि भीड़ के सामने अपराधियों ने खेला खूनी खेल। वह यह भी लिख सकता है कि अपराधियों के खूनी खेल पर मुकदर्शक बनी पुलिस।

अब बात करें एक विशेष रंग की। यह रंग है येलो यानि पीत पत्रकारिता की। इस रंग की पत्रकारिता का सबसे बड़ा आधार झुठ होता है। अक्सर इस शैली का उपयोग राजनीतिक पत्रकारिता के लिये किया जाता है। इस तरह की पत्रकारिता में एक पत्रकार किसी न किसी रुप से किसी खास नेता से प्रभावित होता है। चाहे वह जात का असर हो या फ़िर धर्म का या फ़िर वर्ग का। कभी-कभार लिंग की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इन सभी से महत्वपूर्ण होता है पर्दे के पीछे अथावा आफ़लाइन होने वाले लेन-देन की।

चुनाव के समय बिहार में इन दिनों पीत पत्रकारिता का चलन बढ गया है। हांलाकि इसका उपयोग होने पर जहां एक नेता खुश होता है तो दूसरा नाराज। कल इसी तरह की पत्रकारिता से रुबरु होने का सुअवसर मिला। दरअसल हुआ यह कि एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस के एक बड़े नेता ने मुझसे कहा कि रमई राम कांग्रेस में वापसी करेंगे। आप इस खबर को छाप दिजीये। इस संबंध में मैंने जब उनसे इसका प्रमाण मांगा तो रमई राम द्वारा कांग्रेसी अध्यक्षा को लिखा गया पत्र और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भेजा गया त्यागपत्र दिखाया। मैंने खबर पर विश्वास किया और इसके लिये दोनों पत्रों की प्रति मांगी। उस नेता ने मुझे एक चिट्टी (मुख्यमंत्री वाली चिट्ठी) दी और साथ में मुझे खरीदने की कोशिश भी की। मैं बिका नहीं, लेकिन मुझे खबर में दम लगा।

कार्यालय पहूंचकर मैंने इस संबंध में अपने वरिष्ठ सहयोगियों से बात किया। लोगों ने पहले मेरी बेवकूफ़ी पर हंसी उड़ाई। मुझे इसका अनुमान पहले से ही था। इसलिये मैं विचलित नहीं हुआ। मैंने रमई राम से उनके मोबाईल पर बात की। उन्होंने पूरे मामले से इनकार किया और आजीवन नीतीश कुमार के नेतृत्व में काम करने की कसम खाई। अब मेरे सामने दो चीजें थीं। पहली उनकी चिट्ठी जो उनके झुठ का पर्दाफ़ाश कर रही थी, दूसरा उनका रिकार्डेड बयान। मैंने खबर लिखा- कांग्रेस में घर वापसी कर सकते हैं रमई राम। खबर बिकाऊ माल थी, सो बिकी। सुबह के 9 बजते-बजते मेरे पास दर्जनों फ़ोन आये। जिस कांग्रेसी नेता ने मुझे वह चिट्ठी उपलब्ध कराया था, उसने थैंक्स कहा तो रमई राम की नजर में मैं खलनायक था। जदयू वाले लोग मुझपर पीत पत्रकारिता करने का आरोप लगाने लगे। आम तौर पर मैं इस तरह की आलोचना को सहज भाव में लेता हूं। इसका सबसे बड़ा कारण यह होता है कि मैंने आजतक अपनी पत्रकारिता के साथ कोई बेईमानी नहीं की। लेकिन नये शब्द पीत पत्रकारिता ने मुझे आकर्षित किया।

मुझे लगा पेड न्यूज का ही दूसरा स्वरुप है पीत पत्रकारिता। कल एक निजी टेलीविजन चैनल पर भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने एंकरिंग कर रहे पत्रकार पर पीत पत्रकारिता का आरोप लगाया। उन दोनों के बीच जमकर बहसा-बहसी हुई। इस गर्मागर्म बहस को टीवी पर दिखाया गया। आज जब मुझपर यह आरोप लगा तो मैं नहीं समझ सका कि मुझपर पीत पत्रकारिता का आरोप लगाने वाला शख्स क्या जानता है, पीत पत्रकारिता किस बला का नाम है? मैंने दुबारा उस नेता को फ़ोन किया और जानना चाहा तो उसने मुझसे कहा किसी भी कारणवश बिना किसी आधार के किसी को बदनाम करने के लिये लिखा जाना ही पीत पत्रकारिता है। मैंने कहा – चलो, आज दर्शन हुआ पीत पत्रकारिता का। अबतक इस समाज ने शूद्रों की बौद्धिकता को अनेक नाम दिये हैं, एक नाम यह भी सही।

 

आज हिन्दी दिवस है

भारत पर्वों का देश है। यहां हर दिन कोई न कोई पर्व मनाया जाता है। बात उन पर्वों की नहीं जो हिंदू धर्म के ग्रंथों में वर्णित हों अथवा अन्य धर्मों के संस्कार में निहित हों। हम आज बात कर रहे हैं उन पर्वों की जो आजादी के बाद हमारे समाज में जुड़ते जा रहे हैं। फ़ादर्स डे, मदर्स डे, वैलेंटाइन डे, फ़्रेंडशिप डे और वर्ल्ड लिट्रेसी डे आदि डे सेलिब्रेट करने में कोई परेशानी नहीं है। इसी बेसिस पर हिन्दी डे सेलिब्रेट करने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिये। असल में ग्लोबलाइजेशन ने हमारे समाज को यही दिशा दी है। हम जिसके दिल के सबसे करीब होते हैं, उसीसे सबसे अधिक दूर भी होते हैं और इसी दूरी को कम करने के लिये इस ग्लोबलाइजेशन ने “डे” नामक तरीका ईजाद किया है।

हम बात कर रहे हैं हिन्दी की। चुंकि मैं हिन्दी अखबार का रिपोर्टर हूं। इसलिये हिन्दी के बारे में लिखना और लंबी-लंबी फ़ेंकना मुझे भी अच्छा लगता है। कभी-कभी मुझे लगता है मुझ जैसे असंख्य लोगों की वजह से ही आज हिन्दी रसातल में पहूंच गई है। हम हिन्दीभाषियों ने ही हिन्दी की इतनी दुर्गति कर दी है। हम हिन्दी की क्सम खाते हैं और हमारे बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढते हैं। व्यक्तिगत तौर पर जब मुझे मेरे बच्चे डैडी कह कर संबोधित करते हैं, तो मैं सपत्नीक खुशी से फ़ूले नहीं समाता। मुझे आज भी याद है मगही में पिताजी को बाबू कहकर संबोधित किया जाता है और मां को मैय्या। बचपन में जबतक मैं बच्चा था, मैंने इन्ही दो शब्दों का इस्तेमाल किया। उस समय भी जब मैं रोता था तो मेरी तुतली जबान से “मैय्या गे” ही निकलता था। वक्त बदला, मेरे बाबूजी कब पापा बन गये और मेरी मैय्या कब मम्मी बन गई, इसका पता ही नहीं चला। ठीक उसी प्रकार जैसे मैं पापा से डैडी बन गया।

मुझे लगता है हिन्दी सबसे प्यारी मां है। यह अपने संतानों के सभी दोषों को माफ़ कर देती है। इसने हम सभी को स्वतंत्रता दी है। जब इसने हमें इतना प्यार दुलार दिया है, तो हमारा फ़र्ज भी है कि हम इसका सम्मान करें। लेकिन इसके लिये केवल एक दिन नहीं, बल्कि हमें हर दिन को हिन्दी दिवस के रुप में मनाना होगा। हिन्दी में शोध् किये जायें, शोध किये गये पत्रों का प्रकाशन हिन्दी में किये जायें, हिन्दी को रोजगार परक बनाया जाये और हिन्दी को विश्वस्तर पर स्थापित करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय पुस्तकों का प्रकाशन किया जाये आदि वे तरीके हो सकते हैं, जिनके द्वारा हम अपनी प्यारी हिन्दी को समृद्ध बना सकते हैं।

 

जय हिन्दी, जय हिन्द

 

संपादक

के के पाठक पर 25 हजार का जुर्माना

अदालत की अवहेलना करने के जुर्म में राज्य के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी के के पाठक पर पटना उच्च न्यायालय ने 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। न्यायाधीश नवनीति प्रसाद सिंह ने मामले की सुनवाई करते हुए श्री पाठक को अदालत में सदेह उपस्थित होने का आदेश दिया था। अदालत द्वारा कई बार आदेश जारी करने के बाद भी जब श्री पाठक अदालत में उपस्थित नहीं हुए, तब बाध्य होकर अदालत ने उन्हें नयायालय की अवहेलना का दोषी करार देते हुए 25 हजार रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया है। हांलाकि श्री पाठक की मुश्किलें केवल जुर्माना भर देने मात्र से ही हल नहीं हो जायेंगी, बल्कि आगामी 27 सितम्बर को एक दूसरे खंडपीठ द्वारा पूरे मामले पर बहस की जायेगी। यदि श्री पाठक को दोषी पाया गया, तो इन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।

अपना बिहार की खबर का हुआ असर, मुख्यमंत्री विहीन हुआ बिहार?

कुछ दिन पहले ही अपना बिहार ने खबर प्रकाशित किया था कि राज्य सरकार ने अपने वेबसाइट के माध्यम से अपना प्रचार कर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया है। इस खबर का असर यह हुआ कि बिहार को मुख्यमंत्रीविहीन बना दिया गया है। वैसे तो आगामी 27 नवंबर तक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हर हाल में रहेंगे, लेकिन बिहार सरकार के वेबसाइट से मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों का नामो-निशान मिटा दिया गया है। इस वेबसाइट को देखने के बाद यह प्रतीत होता है कि बिहार में राष्ट्रपति शासन चल रहा हो।

इस संबंध में चुनाव आयोग के अधिकारी कुमार आंशुमाली ने जानकारी दी कि आचार संहिता के कारण यह संभव है कि मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों के नाम और चित्र हटा दिये गये हों, लेकिन ऐसा किया जाना आवश्यक नहीं है। आचार संहिता के अनुसार राज्य सरकार की उपलब्धियों और नये घोषणाओं का प्रकाशन ही वर्जित है।

हांलाकि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के प्रधान सचिव राजेश भूषण का कहना है कि उनके जिम्मे केवल सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का वेबसाइट की जिम्मेवारी ही है और उनके विभाग ने आदर्श आचार संहिता का पालन करते हुए मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के नाम हटा दिये हैं।

बहरहाल यह पूरा मामला पेचीदा हो गया है और कोई भी अधिकारी स्पष्ट तौर पर बोलने से इन्कार कर रहे हैं कि बिहार सरकार के मुख्य वेबसाइट पर बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम रहना चाहिये अथवा नहीं।

सवाल केवल पेड न्यूज का ही नहीं

नवल किशोर कुमार

चुनावों के समय मीडिया में पेड न्यूज मीडिया के अस्तित्व के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। इसे लेकर आंदोलन कई रुपों में पिछले 40 सालों से चलता रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि जो इस कुरीति का विरोध करते हैं, वही पत्रकार जब अपने मीडिया हाऊस में निर्णायक की भूमिका में आते हैं, तो वह भी वही करते हैं जो अन्य करते हैं। इस संदर्भ में कई लोगों का नाम लिया जा सकता है, लेकिन नाम न लेना ही बेहतर होगा।

कल पटना के एल एन मिश्रा संस्थान में एंटी पेड न्यूज फ़ोरम द्वारा आयोजित एंटी पेड न्यूज महासम्मेलन के अवसर पर जो कुछ देखने को मिला, उससे मेरे अनेक विश्वास टूटे। जिन लोगों को मैं आम आदमी मानता था, वे बहुरुपिये निकले। इनमें सबसे अधिक दुख मुझे प्रो नवल किशोर चौधरी और प्रो विनय कंठ के कारण हुआ। अब तक कई अवसरों पर मैंने इन दोनों को आम आदमी के लिये सत्ता से लड़ते देखा है। कल पहली बार अहसास हुआ कि बिहार में अधिक पढा लिखा और स्वयं को सबसे प्रगतिशील मानने वाला आदमी भी सामंती हो सकता है। दरअसल हुआ यह कि इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान सहित अनेक नेता अपना विचार व्यक्त करने आये। जैसे ही रामविलास पासवान ने बोलना शुरु किया, ये दोनों महानुभाव सभास्थल से निकल गये। यदि स्वभाविक तरीके से जाते तो कोई और बात होती, लेकिन इनके चेहरे पर नफ़रत का भाव स्पष्ट झलक रहा था।

इससे पहले कार्यक्रम के शुरु में ही जब उद्घोषक पत्रकार नवेन्दु ने कहा कि इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और विजय कुमार चौधरी आने वाले हैं, तब सभा स्थल में उपस्थित लगभग सभी पत्रकारों के मुंह से निकला – अब चोर भी लेंगे चोरी न करने की कसम। मैं उनके इस कथन का आशय समझ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्रा सहित श्याम रजक और निहोरा यादव जैसे नेता भी ऐसे भागे, मानों लालू प्रसाद नहीं, कोई अछूत अथवा उनका सबसे पराक्रमी दुश्मन आ रहा हो और उसका सामना करना उनके वश में नहीं।

वास्तविकता यह है कि आज भी बिहारी समाज में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान अछूत हैं। हर सामंती चाहे वह बुद्धिजीवी हो या फ़िर आम आदमी इन नेताओं से दूर रहना चाहता है और इनके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है। इस रोग से मीडिया भी ग्रसित है। इसलिये केवल पेड न्यूज का विरोध करने का सवाल ही नहीं है, बल्कि यह तो इससे भी बड़ा सवाल है। अस्पृश्यता और भेदभाव का।

 

 

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