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अपना बिहार निष्पक्षता हमारी पहचान
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क्रुपाकरण की याद में शोक सभा आयोजित द हिन्दू के वरिष्ठ पत्रकार रहे दक्षिण भारतीय पी के क्रुपाकरण के निधन पर बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पत्रकारों ने शोकसभा का आयोजन किया। इस अवसर पर टाइम्स आफ़ इन्डिया के उप संपादक अरूण कुमार, वरिष्ठ पत्रकार अभय सिंह, पुष्पराज, समाज सेवी रुपेश, मौर्य टीवी के निदेशक मुकेश, नवेन्दू और अखतर हुसैन सहित अनेक वरिष्ठ पत्रकारों ने स्व क्रुपाकरण को बिहार का धर्म पुत्र करार दिया। सवाल केवल पेड न्यूज का ही नहीं नवल किशोर कुमार चुनावों के समय मीडिया में पेड न्यूज मीडिया के अस्तित्व के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। इसे लेकर आंदोलन कई रुपों में पिछले 40 सालों से चलता रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि जो इस कुरीति का विरोध करते हैं, वही पत्रकार जब अपने मीडिया हाऊस में निर्णायक की भूमिका में आते हैं, तो वह भी वही करते हैं जो अन्य करते हैं। इस संदर्भ में कई लोगों का नाम लिया जा सकता है, लेकिन नाम न लेना ही बेहतर होगा। कल पटना के एल एन मिश्रा संस्थान में एंटी पेड न्यूज फ़ोरम द्वारा आयोजित एंटी पेड न्यूज महासम्मेलन के अवसर पर जो कुछ देखने को मिला, उससे मेरे अनेक विश्वास टूटे। जिन लोगों को मैं आम आदमी मानता था, वे बहुरुपिये निकले। इनमें सबसे अधिक दुख मुझे प्रो नवल किशोर चौधरी और प्रो विनय कंठ के कारण हुआ। अब तक कई अवसरों पर मैंने इन दोनों को आम आदमी के लिये सत्ता से लड़ते देखा है। कल पहली बार अहसास हुआ कि बिहार में अधिक पढा लिखा और स्वयं को सबसे प्रगतिशील मानने वाला आदमी भी सामंती हो सकता है। दरअसल हुआ यह कि इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान सहित अनेक नेता अपना विचार व्यक्त करने आये। जैसे ही रामविलास पासवान ने बोलना शुरु किया, ये दोनों महानुभाव सभास्थल से निकल गये। यदि स्वभाविक तरीके से जाते तो कोई और बात होती, लेकिन इनके चेहरे पर नफ़रत का भाव स्पष्ट झलक रहा था। इससे पहले कार्यक्रम के शुरु में ही जब उद्घोषक पत्रकार नवेन्दु ने कहा कि इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और विजय कुमार चौधरी आने वाले हैं, तब सभा स्थल में उपस्थित लगभग सभी पत्रकारों के मुंह से निकला – अब चोर भी लेंगे चोरी न करने की कसम। मैं उनके इस कथन का आशय समझ रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्रा सहित श्याम रजक और निहोरा यादव जैसे नेता भी ऐसे भागे, मानों लालू प्रसाद नहीं, कोई अछूत अथवा उनका सबसे पराक्रमी दुश्मन आ रहा हो और उसका सामना करना उनके वश में नहीं। वास्तविकता यह है कि आज भी बिहारी समाज में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान अछूत हैं। हर सामंती चाहे वह बुद्धिजीवी हो या फ़िर आम आदमी इन नेताओं से दूर रहना चाहता है और इनके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है। इस रोग से मीडिया भी ग्रसित है। इसलिये केवल पेड न्यूज का विरोध करने का सवाल ही नहीं है, बल्कि यह तो इससे भी बड़ा सवाल है। अस्पृश्यता और भेदभाव का। बिहार टाइम्स और ग्रीनपीस के कार्यक्रम में नेताओं ने बताये अपने चरित्र वर्तमान में देश की राजनीति आम आदमी से दूर होती जा रही है। इस पेशे को अख्तियार करने वाला हर शख्स स्वयं को आम आदमी से अलग मानता है। इस परिस्थिति में ऐसे लोग आम लोगों के लिये नीतियां तो बनाते हैं, लेकिन उसपर अमल नहीं करते हैं। इसलिये बिहार् के विकास के बारे में टिप्पणी करने से पहले राज्य के नेताओं को अपने गिरेबां में झांककर देखना चाहिये। ये बातें प्रदेश कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता सह वर्ष 1957 में बिहार में मंत्री रह चुके एल पी शाही ने इन्टरनेट पत्रिका बिहार टाइम्स और ग्रीनपीस के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक कार्यक्रम में कहीं। आम आदमी का घोषणा पत्र विषयक विचार गोष्ठी में अपने संबोधन में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा सी पी ठाकुर ने आज के नेताओं के चरित्र का खुलासा करते हुए कहा कि घोषणापत्र केवल एक कर्मकांड की तरह है। इसपर कोई अमल नहीं करता है। बिहार में बिजली संकट के बारे में डा ठाकुर ने कहा कि इसके लिये ठोस उपाय ईमानदारी से किये जाने की जरूरत है। अपने संबोधन में राजद सरकार में 7 सालों तक बिजली मंत्री रह चुके और अब जदयू नेता श्याम रजक ने राज्य में बिजली संकट का सच बताते हुए कहा कि पहले केंद्र द्वारा घटिया श्रेणी के कोयले की आपूर्ति के कारण राज्य के कई बिजली उत्पादन इकाईयां खराब हो गईं, जिसके कारण बिहार में बिजली संकट की स्थिति विषम हो गई है। हांलाकि इन्होंने यह भी कहा कि पूर्व की सरकार के तुलना में नीतीश सरकार अधिक अच्छी है, क्योंकि इसने बिहार के विकास के लिये बहुत कुछ किया है। इससे पहले राज्य के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी मनोज कुमार श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में राजनेताओं पर जमकर प्रहार किया और आम आदमी के समस्याओं के निराकरण के लिये नीतियां बनाने से लेकर उनपर अमल करने के लिये ईमानदार पहल किये जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस अवसर पर उद्योगपति के पी एस केशरी ने कहा बिहार में कोई उद्योगपति नहीं, बल्कि सभी उद्यमी मात्र हैं। बिहार में करीब 25 लाख लोगों के पास विजली का वैध कनेक्शन है और इसमें से साढे बारह हजार कनेक्शन उन लोगों ने ले रखा है जो बेल्डिंग, आटा चक्की आदि का काम करते हैं। बड़ी मात्रा में बिजली का उपयोग करने वाले उद्यमियों की संख्या करीब 2500 हजार है। इसके बावजूद बजाय इसके कि बिहार सरकार अवैध कनेक्शनों पर कार्रवाई करते हुए कनेक्शनों की संख्या बढाये, सरकार ने उद्यमियों पर विद्युत अधिभार लागू कर दिया है। हांलाकि यह अधिभार आम लोगों पर भी लागू किया जायेगा जैसा कि सरकारी दस्तावेजों में उल्लेखित है। अभी यह इसलिये नहीं किया जा रहा है, क्योंकि बिहार में चुनाव होने हैं। गोष्ठी का संचालन बिहार टाइम्स के संपादक अजय कुमार ने किया। इस अवसर पर प्रो विनय कंठ, ग्रीनपीस के प्रतिनिधि रमापति कुमार, प्रो नवल किशोर चौधरी, माले नेता कमलेश शर्मा और समाजसेवी प्रदीप प्रियदर्शी सहित अनेक गणमान्यों ने अपने विचार व्यक्त किये। मुख्यमंत्री की पत्नी के नाम पर हो रहा लाखों का वारा-न्यारा बिहार में हजारों शिक्षिकायें हैं जो राज्य के विभिन्न स्कूलों में पढाती हैं। हर साल कुछ शिक्षिकायें मरती हैं, परंतु अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी शिक्षिका के नाम के नाम पर एक बोर्ड तक नहीं लगाया गया, जबकि मुख्यमंत्री की पत्नी स्व मंजू कुमारी सिन्हा की स्मृति में नीतीश कुमार ने अपने गांव कल्याण बिगहा में तो एक स्मारक बनवाया ही है, साथ ही पटना के गर्दनीबाग में नवनिर्मित कमला नेहरु उच्चतर बालिका विद्यालय में एक सभागार का निर्माण किया गया है, जिसका नामकरण स्व सिन्हा के नाम पर किया गया है। खास खबर यह है कि इस सभागार के निर्माण पर लाखों का वारा न्यारा किया गया है। झमाझम बरसा आसमान और किसानों के आंखों से पानी धान बोने का समय अब खत्म हो चुका है। अनावृष्टि के कारण किसान खेती नहीं कर सके हैं। ऐसे में जब कल आसमान से झमाझम पानी बरसा तो किसानों के आंखों से पानी निकल पड़ा। इनका कहना है कि अब इस बरसात से उन्हें क्या लाभ, यदि यही बरसात 15-20 दिन पहले हो गई होती, तो कुछ और बात होती। उधर बरसात के कारण पटना का शहरी जनजीवन अस्त व्यस्त रहा। जो लोग यह भूल गये थे कि पटना के सड़कों पर पानी कैसे जमता है, तो उनके लिये कल का नया अनुभव शानदार रहा। डा सहजानंद बने मेडिकल बोर्ड के राजिस्ट्रार प्राख्यात शल्य चिकित्सक डा सहजानंद प्रसाद सिंह को बिहार काऊंसिल आफ़ मेडिकल बोर्ड का राजिस्ट्रार नियुक्त किया गया है। राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के बाद डा सिंह ने पदभार ग्रहण कर लिया है। वर्तमान में डा सिंह पीएमसीएच के सर्जरी विभाग के सहायक प्रधानाध्याप्क एवं आईएमए के वरीय उपाध्यक्ष हैं। आजादी के बलिवेदी पर बिहारियों के कुर्बानी की सशक्त गाथा सन 1857 यानि वह साल जब पहली बार अंग्रेजों को भारतीय सपूतों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष में बिहारियों का संग्राम संघर्ष का एक बेमिसाल उदाहरण है। इसमें पूरा बिहार शामिल था। दानापुर, सुगौली, मुजफ़्फ़रपुर, नवादा, नालंदा, गया और शाहाबाद से लेकर रोहिणि, रामगढ, हजारीबाग एवं पलामू तक यह आग फ़ैली। इन इलाकों के गांव-गांव में संघर्ष छिड़ा था। इस संघर्ष की खासियत यह थी कि इसमें हिन्दू, मुसलमान, दलित और सवर्ण सभी अंग्रेजों के खिलाफ़ सीना ताने खड़े थे। अंग्रेजों का दमनचक्र भी चला और गांव के गांव जला दिये गये। असंख्य लोगों को फ़ांसी पर लटका दिया गया। दो साल में आंदोलन को कुचल दिया गया, लेकिन आजादी के दीवाने बिहारियों ने जन विद्रोह और सैन्य विद्रोह के साझा संघर्ष की नींव डाली। विस्तार से बात करें तो 1855 में ही जन विद्रोह की चिन्गारियं बिहार में जहां तहां फ़ूटने लगीं। इस आग में घी का काम कर रही थी अंग्रेजों द्वारा धार्मिक और सामाजिक रीति रिवाज में हस्तक्षेप करना। भागलपुर से संथाल परगना तक के आदिवासी और दलित आबादियां जमीन और जंगल पर ब्रिटिश कब्जे के खिलाफ़ संघर्ष के लिये उठ खड़ी हुईं। 30 जून 1855 को ही सिधो, कान्हू, चांद और भैरव नामक चार भाइयों के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ़ सशस्त्र जन विद्रोह फ़ूट पड़ा। इस विद्रोह में करीब दस हजार लोगों ने अपने प्राणों की आहूतियां दीं। 1857 के गदर से पहले ही बिहार में अंग्रेजों के खिलाफ़ आजादी के परवानों के कई संगठन सक्रिय थे। इन संगठनों का केंद्र आज का पटना था। इन संगठनों में आम नागरिक से लेकर मजदूर और पुस्तक विक्रेता आदि भी शामिल थे। आजाद भारत ने अपना बिहार के इन दिवानों को भूला दिया, जबकि अंग्रेजों के खिलाफ़ पटना के सड़क पर जुलूस निकालने की हिम्मत करने वाला वह साहसी पटना का पीर अली था जिसने 3 जूलाई 1857 को यह कारनामा दिखाया था। इस घटना के बाद अंग्रेजों ने इस दिवाने को हिरासत में ले लिया और 7 जुलाई को जब पीर अली को फ़ांसी की सजा सुनाई जा रही थी, तब उसके बदन से खून की धार उसे सजीव शहीद के अलंकरण से विभूषित कर रही थी। इससे पहले पटना प्रमंडल के कमिश्नर विलियम टेलर ने योजनाबद्ध तरीके से 19 जून 1857 को अपने आवास पर पटना के नागरिकों की एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में शहर के अनेक रईसों और प्रभावकारी लोगों को आमंत्रित किया गया था। इस बैठक के बहाने सभी को छल से गिरफ़्तार कर लिया गया। असल में टेलर दमन के सहारे जांबाज बिहारवासियों को दबाना चाहता था, लेकिन इसका परिणाम उलटा हुआ। 3 जुलाई 1857 को पटना के सड़कोंपर जन विद्रोह उठ खड़ा हुआ। आजादी के दीवाने पहली बार अंग्रेजों के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे थे। हर कोई अंग्रेजों के खिलाफ़ नारे लगा रहा था और आम नागरिकों को आवाज दे रहे थे – यारों मदद करो, यही मदद का वक्त है। इस प्रदर्शन को रोकने के लिये डा आर लायल नामक अंग्रेज पुलिस अधिकारी सिक्ख सिपाहियों को साथ लेकर जुलूस निकालने वालों को रोकने चला। दोनों ओर से गोलियां चलीं और डा लायल और एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। टेलर ने आदेश जारी कर पटना में रात के नौ बजे के बाद नागरिकों के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी। 5 जुलाई को बुक सेलर पीर अली को गिरफ़्तार कर लिया गया। उस दिन दो बजे दोपहर में खाजेक्लां के अंतर्गर रुस्तम अली की गली का चौकीदार नंदलाल बदहवास दौड़ता हुआ मेंहदीगंज चौकी के जमादार तोताराम के पास पहूंचा और सूचना दी कि खून से लथपथ एक डाकू भागा जा रहा है। तोताराम उस डाकू के पीछे दौड़ा। उस डाकू ने अपना नाम पीर अली लिखवाया। उसके एक हाथ में छुरा और दूसरे हाथ में अमरूद का डंडा था। डा लायल की हत्या और उपद्रव फ़ैलाने के जुर्म में कुल 43 लोगों को गिरफ़्तार किया गया। तीन बार मुकदमों की सुनवाई चली। 7 जुलाई, 13 जुलाई और 8 अगस्त 1857 को। इन मुकदमों में 19 लोगों को फ़ांसी की सजा मुकर्रर की गई। 5 को आजीवन कारावस, 2 को चौदह साल की सजा और 13 को दस साल की सजा, 1 को कोड़ा मारने की सजा और तीन को रिहा कर दिया गया। पीर अली को 7 जुलाई को ही फ़ांसी पटना के गांधी मैदान के उत्तरी पश्चिमी कोने पर पर पेड़ से लटका कर कर दे दी गई। आजादी के इस मतवाले को अंग्रेजों ने मौत की नींद सुला दिया। आज इस घटना के डेढ सौ साल के बाद जिस जगह पीर अली को शहादत दी गई, वहां एक पार्क बनाया गया है। इस पार्क का नियंत्रण अंग्रेजों के तर्ज पर काम करने वाले कुछ लोगों के हाथों में हैं, जहां गरीब और बेसहारा बच्चों के जाने की मनाही है और लज्जावश सरकार ने इसका नामकरण पीर अली के नाम पर कर दिया है। बहरहाल 1857 में फ़ांसी की सजा पाने वाले लोगों को अपना बिहार आज सम्मान करता है। वे हमारे बिहार के महानायक हैं। पीर अली खान, घसीटा खलीफ़ा, गुलाम अब्बास, नंदूलाल ऊर्फ़ सिपाही, जुम्मन, मदुआ, काजी खान, पीर बख्श, पीर अली (बगादू का पुत्र), वाहिद अली, गुलाम अली, महमूद अकबर, असरार अली खान, अवसाफ़ हुसैन, छेदी यादव, घसीटा, कल्लू खान, पैगम्बर बख्श यह अस्पताल है या फ़िर कुछ और? बिहार में स्वास्थ्य सुविधायें बदहाल हो गई हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत मसौढी अनुमंडल अस्पताल है। इस अस्पताल के जीर्णोद्धार पर पिछले साल 5 करोड़ 86 लाख रुपये का खर्च किया गया था और जीर्णोद्धार के उपरांत इसका उद्घाटन करते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने इस इलाके के लोगों को यह भरोसा दिलाया था कि यह मिनी पीएमसीएच है। परंतु एक साल के बाद यह अस्पताल अपनी बदहाली पर रो रहा है। डाक्टर नदारद रहते हैं, दवाईयों की भारी कमी और बिजली गुल रहने के कारण यहां इमरजेंसी जैसी सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं। इलाज के लिये आने वाले रोगी उलटे पांव या तो वापस चले जाते हैं या फ़िर कुकुरमुत्तों के जैसे खुल रहे निजी अस्पतालों के शरण में चले जाते हैं। सरकार की विफ़लता की कहानी – भाग एक आगामी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले ही राज्य सरकार ने अपना रिपोर्ट कार्ड जारी कर दिया है। अपने रिपोर्ट कार्ड में राज्य सरकार ने अपने उपलब्धियों की चर्चा की है। अपना बिहार इस मौके पर सरकार की विफ़लताओं की कहानी प्रकाशित कर रहा है। आज पहली कड़ी में प्रस्तुत है – पांच सालों में भी नहीं बन सका आईटी पालिसी राज्य में कोई आईटी पालिसी नहीं है। यही कारण है कि देश के कई नामी गिरामी कंपनियां पर्याप्त संख्या में मानव संसाधन होने के बावजूद अभी तक बिहार आने को इच्छुक नहीं है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में नया व्यवसाय शुरु करने के मामले में दिल्ली और मुम्बई सहित अनेक बड़े शहरों की तुलना में पटना को बेहतर बताये जाने के बावजूद बिहार में निवेश नहीं हो सका है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य सरकार के पास आईटी को लेकर कोई दूरदृष्टि ही नहीं है। बताते चलें कि पिछले तीन सालों से आईटी पालिसी का प्रारुप बनकर तैयार है, लेकिन इसे आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। स्वयं राज्य के आईटी मिनिस्टर डा अनिल कुमार इस सच्चाई को स्वीकारते हैं कि पिछले साल नवंबर में ही पालिसी का ड्राफ़्ट मुख्यमंत्री के पास पड़ा है। राज्य के जाने-माने आईटी विशेषज्ञ मनोज सर्राफ़ बताते हैं कि जब राज्य में पालिसी ही नहीं बनाई जा सकी है तो इस मामले में अन्य परियोजनाओं के बारे में बात करना है बेकार है। इनका यह भी कहना है कि राज्य सरकार की लालफ़ीताशाही के कारण वसुधा जैसी महत्वाकांक्षी योजना भी दम तोड़ती जा रही है। स्थानीय आईटी उद्यमियों को सरकार द्वारा कोई संरक्षण नहीं दिया जा रहा है। गिने-चुने जो परियोजनायें चल रही है, सभी की जिम्मेवारियां बड़ी कंपनियों को दे दी गई है। यहां तक कि डाटा इन्ट्री जैसे साधारण काम भी मल्टीनेशनल कंपनी को दे दिया गया है। वायस आफ़ बिहार का लोकार्पण कल राजधानी के होटल चाणक्या में एक भव्य कार्यक्रम में शाटगन यानि शत्रुघ्न सिन्हा ने वायस आफ़ बिहार नामक मासिक पत्रिका का लोकार्पण किया। इस अवसर पर श्री सिन्हा का साथ देने के लिये अनेक भारी भरकम नेता मौजूद थे। इनमें राजद नेता सह पूर्व केंद्रीय मंत्री ए ए फ़ातमी, जदयू विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू, लोजपा विधायक इजहार अहमद आदि उपस्थित थे। इस मौके पर एक मीडिया पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार को राज दूबे और एम जे वारसी सहित अनेक बुद्धिजीवियों ने भी संबोधित किया। “सुसाईड” से साबित हुई आत्महत्या की विवशता अभियान के कलाकारों ने प्रसिद्ध नाट्यकर्मी अनीश अंकुर के संयोजकत्व में युवा नाटककार मृत्युंजय कुमार द्वारा लिखित एवं राजू कुमार द्वारा निर्देशित नाटक सुसाईड की प्रस्तुति के दौरान देश के ग्रामीन किसानों की बदहाली का सजीव चित्रण किया। नाटक के कथा वस्तु में गरीबी और कर्ज के दोहरे मार का मार्मिक चित्रण किया गया। नाटक में सर्वज्ञ, अभिषेक, यूरेका, मृगांक, फ़िरदौस, गौतम, राजू कुमार, कुणाल और शोभा सहित अनेक कलाकारों ने भाग लिया। वैश्वीकरण का दोहरा वार, अवसर और भूखमरी साथ-साथ यह सही है कि वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में कार्यक्षेत्रों की परिधि में विस्तार हुआ है। आईटी, प्रबंधन और पर्यटन के क्षेत्र में असीम संभावनायें बनी हैं। बड़ी संख्या में युवा इन क्षेत्रों में कार्यरत भी हैं, लेकिन इसके साथ ही एक सच्चाई यह भी है कि वैश्वीकरण ने भूखमरीकी समस्या को भी समानांतर तरीके से भी पोषित किया है। ये बातें अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के वरिष्ठ विशेषज्ञ एरियल कास्त्रो ने पटना के ए एन सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान में एक कार्यक्रम के दौरान अपना बिहार स विशेष बातचीत में कहीं। श्री कास्त्रो न ने कहा कि हाल के वर्षों में आये विश्वस्तरीय आर्थिक संकट ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था तबतक अक्षुण्ण रहेगी, जबतक कि उस देश के श्रमिकों के अधिकारों को दमन न किया जाये। ब्राजील जैसा देश पूरे विश्व के लिये एक उदाहरण है, जहां उच्च मजदूरी और बेहतर उत्पादकता ने नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। फ़िलीपिंस के नागरिक श्री कास्त्रो ने कहा कि पूंजीवाद की पुरानी अवधारणा अब टूटने लगी है। मुनाफ़ाखोरी की बढती प्रवृति ने विश्व को ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकट में झोंक दिया है। आज स्थिति इतनी भयावह है कि यदि अभी से हरित उत्पादकता को बढाने की दिशा में पहल नही किया गया तब आने वाले वर्षों में पूरे विश्व के समक्ष अस्तित्व को बचाने की चुनौती होगी। विश्व स्तर पर छाई आर्थिक मंदी ने पूंजीवाद को ध्वस्त कर दिया है और लगभग अप्रसांगिक हो चले मार्क्सवाद के सिद्धांतों को सजीव कर दिया है। आज आवश्यकता यह हो गई है कि पूंजीवाद और मानववाद दोनों एक साथ चलें तभी संकट से बचा जा सकता है। बिहार के संबंध में श्री कास्त्रो ने कहा कि बिहार जैसे विकासशील राज्य के लिये मानव संसाधन सबसे बड़ा संसाधन है। यदि इस संसाधन को और अधिक प्रशिक्षित एवं स्वरोजगार की दिशा में बेहतर उपाय किये जायें तो निश्चित तौर पर बिहार ब्राजील जैसा एक ठोस उदाहरण प्रस्तुत कर सकेगा। ओबामा की नजर में स्पेशल है बिहार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नजर में बिहार भारत का स्पेशल राज्य है और इसका सबसे बड़ा कारण बिहार की तेजी से बदल रही तस्वीर है। ये बातें अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत रशद हुसैन ने आईआईबीएम परिसर में चल रहे अमेरिकन कार्नर में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहीं। अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में श्री हुसैन ने कहा कि अमेरिकी सरकार इराक और अफ़गानिस्तान पर विशेष निगरानी कर रही है और बहुत जल्द ही इराक के कुछ इलाकों से करीब 50 हजार अमेरिकी सैनिक स्वदेश लौटेंगे। इन देशों में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इसलिये अमेरिका ने इन देशों के आर्थिक और शैक्षणिक विकास को प्राथमिकता सूची में रखा है। आतंकवाद और इस्लाम के बीच संबंध की सम्भावनाओं पर सवाल करते हुए श्री हुसैन ने कहा कि इस्लाम कभी भी आतंकवाद का समर्थन नहीं करता है। हकीकत यह है कि इस्लाम केवल अमन-चैन और भाईचारे को बढावा देता है। अपने बिहार दौरे के अनुभवों को साझा करते हुए श्री हुसैन ने कहा कि 18 साल पहले भी वह बिहार आये थे, क्योंकि उनके पिता अकबर हुसैन का जन्म पटना में हुआ था। इन्होंने यह भी कहा कि वे अपने खानदानी घर भी गये। बिहार में बदलाव के बारे में श्री हुसैन ने कहा कि उन्हें पटना की चौड़ी सड़कों को देखकर बहुत खुशी हुई है और सब्जीबाग की तंग गलियों ने उनके पुराने दिनों की यादों को ताजा कर दिया है।
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