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इस तस्वीर में जो महानुभाव नजर आ रहे हैं, वे बिहार नहीं “बाढ” के मुख्यमंत्री हैं। बिहार में बाढ इनकी मर्जी से आती और फ़िर चली जाती है। वह तो दुर्भाग्य कहिये बिहारवासियों का कि जब बाढ आती है तो बिहारवासी तबाह हो जाते हैं, अफ़सर मालामाल हो जाते हैं और हमारे महानुभाव भगवान हो जाते हैं। अब कल की ही बात ले लीजिये। कल बिहार अर्थार्त बाढ के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने गंडक नदी के किनारे बसे छपरा, सिवान और बेतिया आदि इलाकों का हवाई दौरा किया।
बरसात के महीने में जब महानुभाव हवाई दौरा करने लगें तो समझ लिजीये कि बिहार पर विपत्ति आ चुकी है। सचमुच बिहार में विपत्ति का आगमन आ चुका है और इसका स्पष्ट प्रमाण है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी का हवाई दौरा। हालांकि पूरा बिहार इससे अंजान है क्योंकि बिहार के अखबारों के माननीय संपादकों की नजरों में भी बिहार का आगमन तभी होता है जब श्री कुमार की आंखें बाढ को देख लेती हैं। क्या कहा? आपको यकीन नहीं आता। याद किजीये वर्ष 2008 के अगस्त महीना की 18 तारीख। उस दिन कुशहा में कोशी नदी का तटबंध टूटा था। सैंकड़ों गांव बाढ के पानी में देखते ही देखते तबाह हो गये थे। किसी के पास कोई समय नहीं था। कितने लोग उस बाढ में मरे, इसकी जानकारी तो स्वयं सरकार के पास भी नहीं है। लेकिन मीडिया की नजरों में बाढ कब आया, जब 20 अगस्त 2008 की शाम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आकाशवाणी से प्रसारित अपने संदेश में कहा कि यह प्रलय नहीं महाप्रलय है। यानि वर्ष 2008 में बाढ का आगमन तब हुआ जब मुख्यमंत्री ने इसका उद्घोष किया। इससे पहले जब 9 अगस्त 2008 को वायरलेस पर यह संदेश भेजा जा रहा था कि कोशी का अफ़लक्स बांध टूटने वाला है, तब भी सरकार की नजर में वह बाढ का अंदेशा नहीं था।
खैर, अब जब सरकार का मुखिया इनता बड़ा महानुभाव हो तो फ़िर कुछ कहने का मतलब ही सूरज को दीया दिखाने के समान है। हम बात कर रहे हैं पिछले वर्ष यानि वर्ष 2010 में आये बाढ की और इस साल आये बाढ की। इन दोनों वर्षों में आये बाढ में एक समानता है। समानता यह है कि लगातार दो वर्षों से गंडक के इलाके में ही बाढ का आगमन हुआ है। इसके आगमन के कारणों की चर्चा हम बाद में करेंगे। पहले हम यह चर्चा करें कि कल यानि 7 अगस्त 2011 को क्या हुआ। अपने विशेष विमान से अपने सहयोगियों यथा जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी और विभाग के प्रधान सचिव अफ़जल अमानुल्लाह(वही अफ़जल अमानुल्लाह, जिनकी बेटी रहमत फ़ातिमा को बियाडा ने तोहफ़े में जमीन दे दिया है) के साथ करीब डेढ बजे बगहा पहुंचे। वहां उड़नखटोले से उतरने के बाद श्री कुमार ने बगहा पुलिस द्वारा दी गई परेड की सलामी ली। ठीक वैसे ही जैसे कोई अन्य देश का राजा जब भारत पहुंचता है, तब भारत के राष्ट्रपति भवन में भारत के जवान उसे सलामी देते हैं। सरकारी भाषा में इसे गार्ड आफ़ आनर कहा जाता है।
अपने ही राज्य में अपनी ही पुलिस से गार्ड आफ़ आनर लेने के बाद बिहार के महानुभाव नीतीश कुमार और इनके सहयोगियों ने पहले तो आधा घंटा सर्किट हाऊस में आराम किया और फ़िर उसके बाद ये अपने सहयोगियों के साथ उड़नखटोले पर सवार होकर बाढ का जायजा लेने निकले। बगहा, बेतिया, वाल्मिकीनगर, छपरा, सिवान और गोपालगंज आदि इलाकों का दौरा करने के बाद श्री कुमार ने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। इस अवसर पर श्री कुमार ने स्पष्ट शब्दों में बाढ को नहीं स्वीकारते हुए केवल इतना कहा कि गंडक नदी में जारी कटाव को रोकने के निर्देश दे दिये गये हैं और वे लोग जो विस्स्थापित हो गये हैं, उनके पुनर्वास के लिये राज्य सरकार जल्द ही कार्रवाई करेगी।
अब हम बताते हैं आपको गंडक नदी के तटबंधों में हो रही कटाव की असली वजह। दरअसल गंडक नदी पर बिहार राज्य पुल निर्माण निगम द्वारा एक पुल बनाया जा रहा है। इस पुल की लंबाई नदी पर केवल डेढ किलोमीटर रखी गई है। जबकि गंडक नदी सामान्य अवस्था में 4 से पांच किलोमीटर के विस्तार में बहती है। अब जबकि पुल की लंबाई केवल डेढ किलोमीटर रखी गई है तो इसका परिणाम यह हुआ है कि करीब 50 किलोमीटर तक गंडक नदी के विस्तार को धीरे धीरे कम करते हुए डेढ किलोमीटर तक लाया गया है। अब जबकि गंडक नदी का जलस्तर बढने लगा है, तब नदी के दोनों तटबंधों पर पानी का दबाव तेज हो गया। अब सुशासन का एक और प्रमाण देख लिजीये। पिछले वर्ष गोपालगंज और सीवान के इलाके में तटबंध टूटे थे। टूटे तटबंधों की मरम्मती के लिये राज्य सरकार ने राशि आवंटित किये और मजे की बात यह कि सरकार की नजर में काम हो भी गया। लेकिन तटबंधों की मरम्मती के नाम पर केवल प्रभावित स्थल पर बालू की बोरियां भरी गईं। सीएजी बिहार ने इस संबंध में अपनी आपत्ति पहले ही व्यक्त कर रखा है। अब जब प्रभावित यानी तटबंध के टूटे हिस्सों की ही मरम्मति नहीं हो सकी, तब भला पूरे तटबंध की मरम्मति कैसे होती। इसके अलावे गंडक नदी में इन दिनों दो से ढाई लाख क्यूसेक पानी का डिस्चार्ज अभी हो रहा है। ऐसे में तटबंधों का टूटना लाजमी ही है।
बहरहाल, एक बार फ़िर बिहार में बाढ का तांडव शुरु हो चुका है और हवाई यात्रा का लुत्फ़ लेकर सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेताओं के हवाई यात्राओं के नये दौर का शुभारंभ कर दिया है। अब देखना है कि हवाई यात्रा के मजे लेने वालो नेताओं में और कौन शामिल होंगे। फ़िलहाल कोसी, गंडक और बागमती के पीड़ितों को राहत का इंतजार है। मौजूदा सच्चाई यह है कि इन्हें अपनी जान बचाने के लिये नाव भी मयस्सर नहीं है।
दो पाटों के बीच पीसने को मजबूर है कोसी की जनता, मामला कोसी नदी पर बन रहे पुल का, 300 से अधिक गांवों के अस्तित्व पर आया संकट, वर्ष 2004 में बिहारी विशेषज्ञों ने जतायी थी आशंका कोसी नदी का आकार छोटा किया जा रहा है। इस कारण कोसी नदी के दोनों तटबंधों के बीच रहने वाले लोगों के जीवन पर सवालिया निशान लग गया है। इसकी मूल वजह यह है कि सरकार कोसी नदी पर एक रेल पुल और एक सड़क पुल का निर्माण करवा रही है। सुपौल जिले में कोसी नदी करीब 15 किलोमीटर चौड़ी है। कहीं-कहीं इसकी चौड़ाई 20 से 22 किलोमीटर भी हो जाती है। कोशी नदी की यह चौड़ाई उन लोगों के लिये वरदान है जो कोशी नदी पर बने पूर्वी और पश्चिमी तटबंधों के इलाके में रहते हैं। अब राज्य सरकार ने कोसी नदी पर दो पुलों का निर्माण कराने का निश्चय किया है।
निर्मली और भपटियाही के बीच एन एच 57 सड़क के लिये पुल और दूसरा रेल पुल बनाई जा रही है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इन पुलों के लिये जो लंबाई तय की गई है वह केवल 1.8 किलोमीटर ही रखी गई है। पुलों के निर्माण के लिये नदी की चौड़ाई को अफ़लक्स बांध बनाकर कम किया जा रहा है। जबकि राज्य सरकार की जल नीति की बात करें तो इसके अनुच्छेद 7-10 में स्पष्ट तौर पर उल्लेखित है कि राज्य सरकार के अधीन नदियां, जलमार्गों एवं इसके दोनो तटों पर किसी प्रकार के अवरोध उत्पन्न करने की अनुमति बिना जल संसाधन विभाग की अनुमति के नहीं दी जानी चाहिये। जलमार्गों में अथवा तटों पर किसी संरचना के निर्माण के पूर्व जल संसाधन विभाग की अनुमति आवश्य्क होगी तथा ऐसे उत्पन्न किये गये अवरोध अथवा निर्मित किये संरचना से यदि किसी प्रकार का व्यावधान उत्पन्न होता है तो इसके सुधार हेतु संबंधित निर्माणकर्ता की जवाबदेही होगी। अब जरा वर्ष 2004 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इंजीनियर गोकुल प्रसाद की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट तौर पर कहा था कि यदि एन एच 57 सड़क और रेल पुल के निर्माण हेतु अफ़लक्स और सुरक्षा बांध बनाये जाते हैं तो ऐसा करना तटबंध के बीच रहने वाले लोगों के लिये गले का फ़ंदा साबित होगा।
दुर्भाग्यवश यही हुआ। राज्य सरकार ने अपने ही विशेषज्ञों की अनुशंसा को नहीं मानते हुए कोशी नदी पर रेल पुल और सड़क पुल का निर्माण् करना शुरु कर दिया है। अब इस कारण जो हालात उत्पन्न हो गये हैं, उसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि कोसी नदी अपने मूल स्वरुप में 8 से 9 लाख क्यूसेक पानी को डिस्चार्ज करती है और वर्ष 1953-65 में बने तटबंध इस दबाव को आसानी से सहन कर सकते हैं। लेकिन अब जबकि पुलों के लिये नदी के विस्तार को घटाकर 1-8 किलोमीटर कर दिया गया है, तब इसका परिणाम भयावह होना निश्चित ही है। इसका असर पिछले वर्ष 2010 में देखा गया, जब कोसी नदी पानी का डिस्चार्ज केवल डेढ लाख क्यूसेक पानी था। तब निर्मली और भपटियाही के बीच नदी के अपस्ट्रीम में जलस्तर 3 से 4 मीटर ऊंचा हो गया था और इस इलाके के 52 गांवों के लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेना पड़ा था।
मौजूदा परिस्थिति में समस्या का निदान यह भी नहीं है कि सरकार इस इलाके में रहने वाले निवासियों को कहीं और विस्थापित कर दे। समस्या तो तब शुरु होगी जब पुल निर्माण के कारण प्रभावित इलाकों में लोगों के जीवन का मुख्य आधार कृषि पूरी तरह समाप्त हो जायेगा। स्थानीय लोग भी चाहते हैं कि कोशी नदी पर पुल बने, ताकि विकास की कुछ किरणें उनके इलाके में भी पहुंचे, लेकिन इसके लिये यदि नदी के बहाव को कम किया गया तो इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी होगी।
अब इस पूरे मामले की एक सच्चाई से और रुबरु होते हैं। दोनों पुलों के निर्माण की जिम्मेवारी दो बड़ी कंपनियों को दी गई है। इन दोनों कंपनियों ने जिस व्यक्ति को अपना मुख्य पेटी कांट्रैक्टर बनाया है, उसका नाम है गनपत यादव। यह वही गनपत यादव है, जिसके जिम्मे कुशहा में कोशी तटबंध की सुरक्षा की जिम्मेवारी थी और इसी व्यक्ति के कारण वर्ष 2008 में कोशी नदी का तटबंध टूटा। पाठकों को यह भी बता दें कि यह राज्य के ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र यादव के अपने सगे बहनोई हैं। अपने पहले कार्यकाल में श्री यादव राज्य के जल संसाधन मंत्री हुआ करते थे और इन्होंने कोसी तटबंध की सुरक्षा की ठेकेदारी अपने सगे बहनोई को तोहफ़े में दी थी।
बहरहाल, कोशी नदी पर बन रहे एक और अफ़लक्स बांध के कारण जो स्थिति उत्पन्न हो चुकी है, उसके संबंध में स्थानीय मीडिया खामोश है। उसके खामोश रहने की वजह भी गनपत यादव ही है। इस पूरे इलाके में इस आदमी की तुती बोलती है। स्थानीय नेताओं की तो बात ही करना फ़िजुल है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह कि अधिकांश नेता चाहे वे किसी भी दल के हों, सभी किसी न किसी रुप में ठेकेदार ही हैं। रह गई बेचारी जनता तो सुशासन में उसकी सुनता भी कौन है, जो उनके दुख तकलीफ़ को सुनेगा। लेकिन सच्चाई तो यही है कि आंखें मुंद लेने मात्र से ही खतरा दूर नहीं हो जाता है। |
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