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बिहार की अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक नुकसान प्रत्येक साल होने वाले बाढ के कारण होता है। इस बार भी बिहार में बाढ ने दस्तक दे दिया है। अपना बिहार के सदस्यों के नेटवर्क के जरिये हम आपको बिहार में बाढ – 2010 के माध्यम से हर छोटी-बड़ी घटना की जानकारी देंगे। पर्याप्त समय के बावजूद बहीं हुआ कोई प्रबंध, टूट गया महानंदा का तटबंध अब इसे राज्य सरकार की अकर्मण्यता कहें या फ़िर असंवेदनशीलता कि पर्याप्त समय और साधन रहने के बावजूद महानंदा नदी के पश्चिमी तटबंध को बचाया नहीं जा सका। गुरूवार की रात पूर्णिया के वायसी अनुमंडल डगरूआ प्रखंड के उसी स्थान पर करीब 2000 मीटर यानि दो किलोमीटर तक तटबंध में कटाव हुआ है, जहां वर्ष 1987 और 1989 में हुआ था। इस कटाव के कारण पूर्णिया के कई प्रखंडों में बाढ का पानी घुस गया है। लोग सुरक्षित स्थानों की भाग रहे हैं। इतना कुछ होने के बावजूद भी अभी तक राज्य सरकार की आंखें नहीं खुली हैं। खबर लिखे जाने तक किसी भी सरकारी पदाधिकारी के घटनास्थल पर पहूंचने की खबर प्राप्त नहीं हुई है। कोशी के गर्भ में समाया 250 घर सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड में पूर्वी कोशी तटबंध में कटाव के कारण 250 से अधिक घर कोशी में विलीन हो गये। प्रखंडे के अलानी पंचायत के अलानी गोठ टोला में विगत दो सप्ताह से बाढ का पानी फ़ैला है और लोग सुरक्षित स्थानों पर चले गये हैं। लेकिन लोगों की दुश्वारियां कम नहीं हुई हैं। सरकारी सहायता लोगों के लिये सपना बना हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कटाव को रोकने के लिये अभी तक कोई पहल नहीं की गई है। यदि यही हालात रहे तो जिस रफ़्तार से बाढ का पानी फ़ैलता जा रहा है, उसे देखते हुए पूरे जिले में एकबार फ़िर कोशी मौत तांडव नृत्य करेगी। कोशी में 50 घर विलीन, महानंदा ने मचाया कोहराम (26 जुलाई 2010) राज्य में बाढ की स्थिति दिन प्रति दिन विषम होती जा रही है। कोशी, महानंदा, बागमती और गंडक आदि नदियों का जल्स्तर बढने के कारण इन नदियों पर बने तटबंधों पर अनेक जगह भीषण कटाव शुरु हो गया है। मिली जानकारी के अनुसार कोशी नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि से खगड़िया के गोगरी प्रखंड के लोंगा गांव में 50 से अधिक घर कोशी के गर्भ में विलीन हो गये हैं। इसके अलावा सैंकड़ो एकड़ खेत में लगी फ़सल बर्बाद हो गई है। जिला बाढ नियंत्रण कक्ष से प्राप्त जानकारी के अनुसार वलतारा में कोशी नदी खतरे के निशान से 162 सेमी उपर बह रही है। नदी में तेज कटाव के कारण बलतारा पंचायत के लोंगा एवं फ़ुलवड़िया गांव के अरूना देवी, नरेश सिंह, दिलीप सिंह, मीना देवी, मंगल सिंह, अनिल सिंह सहित चार दर्जन से अधिक लोगों का घर नदी में विलीन हो गया है। उधर महानंदा में उफ़ान आने से बारसोई प्रखंड के दर्जनों गांवों में भी पानी घुसने का समाचार प्राप्त हुआ है। लोग अपने घरों को छोड़ सुरक्षित ठिकाने की तलाश में भाग रहे हैं। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि अब तक आये बाढ के कारण करीब 27 लोगों के मारे जाने की पुष्टि सरकारी अधिकारियों ने की है और करीब 5 लाख लोगों की आबादी बाढ में फ़ंसे होने की सूचना है, इसके बावजूद राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से कुछ भी नहीं किया जा रहा है। पूर्णिया, कटिहार और अररिया में बाढ का पानी फ़ैला 25 जुलाई 2010 - राज्य सरकार के तमाम दावे झूठे साबित हो रहे हैं। राज्य एक बार फ़िर बाढ की चपेट में है। कटिहार, पूर्णिया और अररिया आदि जिलों में बाढ का पानी तेजी से फ़ैलने लगा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार महानंदा नदी के जलस्तर में तेजी से वृद्धि जारी है। इस नदी के दायें तटबंध के आजमनगर, झौआ, दूर्गापुर और भोलाझारी में पानी का दबाव बना हुआ है। इसके अलावा त्टबंध में दरार रहने के कारण कदवा, डंडाखोरा, प्राणपुर और अमदाबाद आदि प्रखंडों में बाढ का पानी घुस चुका है। उधर पूर्णिया के बौसा प्रखंड में महानंदा और कनकई नदी के जलस्तर अचानक बढने से सैंकड़ों परिवारों का घर बाढ के पानी में विलीन हो गया है। इस प्रखंड के बैरिया, सिरसी, पोखरिया, महुआ टोली, हिजली, उफ़रैल, बेरहान, हाटगाछी, कनफ़लिया, काशीबाड़ी आदि कई पंचायत बाढ में बूरी तरह प्रभावित हैं। अबतक प्राप्त जानकरी के अनुसार 7 लोगों के डूबकर मरने की आशंका जतायी जा रही है। वही अररिया जिले में बाढ के कारण दो लोगों के मरने की सूचना प्राप्त हुई है। जिले के पलासी प्रखंड में बहने वाली बकरा नदी ने 55 वर्षीय राम प्रसाद और एक महिला की मौत हो चुकी है। बिहार में आ गया बाढ, केंद्र के कहने पर राज्य सरकार की नींद खुली बिहार के अनेक जिलों के कई प्रखंडों में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है। परन्तु अबतक राज्य सरकार कान में तेल डालकर सो रही थी। कल जैसे ही गृह मंत्रालय का एक फ़ैक्स राज्य सरकार को मिला, जिसमें कोशी के जलस्तर में वृद्धि और कई जिलों में बाढ आने की संपुष्टि की गई है, राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव ब्यास जी ने आनन फ़ानन में अपने कुछ विश्वासपात्र पत्रकारों को अपने कार्यालय में बुलाया और जानकारी दी कि बाढ प्रभावित क्षेत्रों पर राज्य सरकार ध्यान रख रही है। इसके अलावा एनडीआरएफ़ की एक टीम प्रभावित इलाके में भेजी जा रही है।बाढ पीड़ितो कों एक-एक क्विंटल अनाज, प्लासिट्क का शीट, किरासन तेल और 2250 रुपये नकद बांटने की तैयारी अंतिम चरण में है। महानंदा और गंगा बौराईं, लोगों में छाया दहशत, बेफ़िक्र सो रही सरकार कटिहार जिले में गंगा, कोशी, महानंदा और बरण्डी नदियां बौरा गई हैं और बाढ की आशंका के मद्देनजर लोग सुरक्षित स्थानों की ओर रुख कर चुके हैं। लेकिन राज्य सरकार और बाढ नियंत्रण विभाग के कर्मचारी चैन की बंसी बजा रहे हैं। सरकारी अधिकारियों कहना है कि सभी नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से नीचे है और सभी तटबंध सुरक्षित हैं। लेकिन स्थानीय निवासियों का कहना है कि गंगा और महानंदा के जलस्तर में बहुत अधिक वृद्धि हुई है और करीब एक दर्जन स्थान पर त्टबंधों में कटाव जारी है। प्राणपुर प्रखंड के 5 गांवों में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है। उधर कटिहार जिले के अमदाबाद के बंकु टोला में कटाव में काफ़ी तेजी की सूचना प्राप्त हुई है। अंचलाधिकारी अशोक गुप्ता ने अपना बिहार को बताया कि अब तक 170 परिवार कटाव के कारण विस्थापित हो चुके हैं। इसके अलावा बेलगच्छी, लखनपुरा, दिवानगंज के इलाके में भी कटाव जारी रहेने की सूचना प्राप्त हुई है। बिहार पर बाढ का संकट भले ही राज्य सरकार यह दलील देती फ़िर रही है कि राज्य में अभी तक बाढ नहीं आया है, लेकिन वे जो बाढ के बीच जी रहे हैं, उन लोगों ने अब सरकारी मदद की आस छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाना शुरु कर दिया है। मसलन कटिहार जिले में गंगा, कोशी और महानंदा आदि नदियों के जलस्तर में निरंतर वृद्धि और त्टबंधों में हो रहे कटाव के कारण लोग भयभीत हैं और सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार सीमांचल अररिया जिले में लगातार हो रही भारी बारिश के कारण जहां एक ओर जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है, वहीं दूसरी ओर सुरसर नदी, गेरवा नदी, सीताधार और परमान धार में जलस्तर बढने से बाढ का संकट मंडराने लगा है। फ़ारबिसगंज जिले के लोग भी बाढ की आशंका से भयभीत हैं। इनकी आशंका बेवजह नहीं है क्योंकि जिले में बहने वाली परमान नदी और सिंधिया नदी में कटाव जारी है। इसके अलावा पलासी प्रखंड में बहने वाली बकरा नदी एवं रतवा नदी में भी कटाव जारी है। मिली जानकारी के अनुसार बकरा नदी के किनारे बसे जरियाखारी, भट्टाबारी, धर्मगंज, ककोड़वा आदि दर्जनों गांव में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है। जबकि स्थानीय सरकारी पदाधिकारी को इस घटना की कोई जानकारी नहीं है। जो खोया उसे पाने की कोशिश में जूटी सरकार बिहार के अनेक जिलों में बाढ दस्तक दे चुका है और अब राज्य के जल संसाधन विभाग के पदाधिकारी कहते फ़िर रहे हैं कि जो खोया है उसे पाया जायेगा। गुरुवार को विभाग के प्रधानसचिव अजय नायक ने बताया कि विभाग वर्ष 2012 तक 8 लाख एकड़ जमीन को वापस लायेगी। इनके कहने का मतलब यह है कि जो जमीन बाढ के कारण नदी में शामिल हो गई है, उसे फ़िर से खेत बनाया जायेगा। हांलाकि जब इन्से पूछा गया कि इतना महत्वपूर्ण काम और व्यापक काम केवल एक साल में कैसे और किस प्रकार किया जायेगा, तब श्री नायक ने केवल इतना ही कहा कि कोशी क्षेत्र के कुसहा तटबंध की मरम्मति के लिये सरकार ने अबतक 87 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। इसके अलावा इन्होंने यह भी बताया कि कोशी नहर प्रणाली के जीर्णोद्धार के लिये 750 करोड़ रुपये का बजट बनाया गया है। बिहार में नदियों का उत्पात जारी राज्य में महानंदा, गंडक, कोसी और बागमती नदियों का उत्पात जारी है। अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार कुरसेला में तटबंध का कटाव तेजी से जारी है। वहीं किशनगंज में महानंदा नदी में बढे जलस्तर के कारण कोचाधामन प्रखंड में कटाव तेजी से हो रहा है। सीवान जिले में भी कटाव के समाचार प्राप्त हुए हैं। हांलाकि इस संबंध में पटना स्थित राज्य मुख्यालय में तटबंधों के कटाव से इनकार किया गया है। सभी तटबंध सुरक्षित बताये गये हैं। अब महानंदा हुई खतरे के निशान से ऊपर महानंदा के जलग्रहण क्षेत्र में पिछले तीन दिनों से हो रही भारी बारिश के कारण कटिहार जिले में महानंदा नदी का जलस्तर अनेक स्थानों पर खतरे के निशान को पार कर गया है। कटिहार में बाढ नियंत्रण विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार महानंदा नदी खतरे के निशान से झऊआ में 11 सेमी, बहरखाला में 25 सेमी और कुरसेला में 95 सेमी ऊपर बह रही है। सरकारी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सभी तटबंध सुरक्षित हैं और इनपर चौकसी बरती जा रही है। बिहार में बाढ का तांडव शुरू – पिपरासी प्रखंड के दर्जनों गांवों में मचा हाहकार आखिरकार राज्य सरकार के सारे दावे झूठे साबित हुए और उत्तर बिहार के अनेक जिलों में बाढ ने अपना तांडव दिखाना शुरु कर दिया है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी बेतिया जिले के पिपरासी प्रखंड के के लोग गंडक का कहर झेलने को विवश हो गये हैं और सरकारी दावा खोखला साबित हो रहा है। सरकारी पदाधिकारी और कथित जनप्रतिनिधि मूंह चुराये फ़िर रहे हैं। पिपरासी एवं मधुबनी प्रखंड के दर्जनों गांवों में लोग अपना और अपने परिवार की जान बचाने के लिये मारे-मारे फ़िर रहे हैं। सरकारी दावा है कि जिले में 42 नावें उपलब्ध कराई गई है और पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न और दवाई का भंडार भी है, लेकिन सच्चाई यह है कि पिपरासी प्रखंड के भैसहिया, कांटी, बलओरा, टिकारा दियारा, बलुआ, मदरहवा, कमहवा, मधुबनी के बिरता, नैवहा, सिससी, बेड़हवा और गदियानी टोला में पिछले चार दिनों से पानी लबालब भरा है और ग्रामीण परेशान है। न कहीं सरकारी नाव दिखता है और न कहीं कोई सरकारी मुलाजिम्। बागमती उफ़ान पर बिहार में बाढ की स्थिति बनती जा रही है और इसका पुरा श्रेय राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जाता है। पड़ोसी देश नेपाल में भारी बारिश के कारण गागमती नदी में ज्बरदस्त जल वृद्धि दर्ज की गई है। सीतामढी के बेलसण्ड के चंदौली में बागमती का जलस्तर खतरे के निशान से 54-5 सेमी उपर हो गया है। भारी जलदबाव के कारण तटबंधों पर खतरा बना हुआ है। मुख्य अभियंता जी एल राम ने अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में बताया कि यदि बागमती नदी पर बना तटबंध टूटता है तो इसके लिये स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिम्मेवार होंगे क्योंकि इस तटबंध के सुदृढीकरण हेतु विभाग द्वारा अनुशंसित योजनाओं को मुख्यमंत्री द्वारा स्वीकृति नहीं मिल सकी और इसकी एक संचिका मुख्यमंत्री सचिवालय में लंबित पड़ी है। इन्होंने यह भी बताया कि विगत 1 मई 2010 को मुख्यमंत्री के विश्वास यात्रा के दौरान सीतामढी में हुए एक बैठक में कटौंझा पुल के मलवे की सफ़ाई के लिये प्रार्थना पत्र दिया गया था, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। यहां यह उल्लेखित करना आवश्यक है कि एनएच 77 पर बना कटौंझा पुल आधे भाग तक धंस गया है। पानी का दबाव बायें तटबंध पर इतना बढ गया है कि किसी भी समय बागमती तटबंध मराड़, चन्दौल अथवा भादाडीह के पास टूट सकता है। अररिया के पलासी के दर्जनों गांव में आया बाढ पिछले दो दिनों से हो रही लगातार बारिश और नेपाल द्वारा बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण अररिया जिले के पलासी प्रखंड से होकर गुजरने वाली बकरा नदी सारी सीमाओं को तोड़कर अब प्रखंड के दर्जनों गांवों में घुस गई है। जलमग्न होने वाले गांवों में धर्मगंज, जरियाखारी, पिपरा, भट्टाबाड़ी, सोहदी, बकनिया और बेलगच्छी आदि शामिल हैं। प्रखंड क्षेत्र में नदियों का जलस्तर बढने के कारण काढैली, धर्मगंज सड़क और बालूघाट डायवर्सन सहित अनेक सड़कों पर पानी 5 फ़ीट उपर बहने लगा हैं। इस कारण लोगों के पास अब केवल बांस की चचरी और निजी नावों का सहारा रह गया है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि अभी तक किसी भी सरकारी पदाधिकारी ने उनकी खोज खबर नहीं ली है। दरवाजे पर बाढ देख सरकार कर रही बोल्डरों का इंतजाम खगड़िया जिला राज्य के उन जिलों में से एक है जहां करीब आधा दर्जन नदियां गुजरती हैं। तटबंधों के बीच में बसे इस जिले में तटबंध सुरक्षा के नाम पर यहां भारी लूट खसोट जारी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अब जबकि बाढ दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, राज्य सरकार अभी भी बोल्डरों का इंतजाम कर रही है ताकि तटबंधों के टूटने की स्थिति में इनका उपयोग किया जा सके। कोसी बाढ – अभी तक मुआवजे का इंतजार कोसी नदी को शोक की नदी का दर्जा दिलाने में नदी में हर साल जमा होने गाद की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। कोसी नदी हिमालय से निकलने वाली नदियों में से एक है जिसमें प्रत्येक वर्ष गाद यानि बालू के कारण नदी भरता जा रहा है और सरकार इस समस्या का निदान करने के बजाय हाई डैम बनाने पर जोर देती है। खैर सरकार की यह नजरअंदाजी वर्षों पुरानी है। वर्ष 2008 में आये महाप्रलय के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार घोषणा किया था कि राज्य सरकार किसानों को उनके खेतों से गाद हटाने के लिये 5 से 15 हजार रुपये देगी। सुपौल के झाखरगढ गांव के अबु मोहम्मद का कहना है कि उसने अपने डेढ एकड़ जमीन पर 6 फ़ूट मोटी गाद को हटाने के लिये 6 आवेदन स्थानीय अधिकारियों को दिये, परंतु इसमें से किसी एक का भी जवाब इन अधिकारियों ने नहीं दिया और उलटा उसी पर दोषारोपण करते हैं कि उसने जमीन सम्बंधी गलत दस्तावेज प्रस्तुत किया है। हांलाकि बाढ पीड़ित किसानों ने अपने श्रम के सहारे बदली हुई परिस्थिति को काबू में करने का प्रयास किया है। परमानन्दपुर नामक गांव के किसानों ने कड़ी मेहनत कर अपने खेतों में जमे गाद को हटाकर मेड़ के किनारे लगा दिया है और इस साल थोड़ी खेती भी की गई है। परंतु गांव वालों का कहना है कि यह पहले से एक चौथाई मात्र है। सबसे बड़ी समस्या पानी नहीं मिलना है। अब इसे इन किसानों का दुर्भाग्य ही कहिये कि पहले तो इनकी खेती बाढ यानि अथाह जल ने बर्बाद किया और अब इनके खेतों के लिये पानी ही नहीं है। बाढ के कारण फ़ैले गाद की वजह से सुपौल, सहरसा और मधेपुरा आदि जिले बंजर होते जा रहे हैं। किसानों की मानें तो एक एकड़ जमीन पर 2 ईंच मोटी बालू की परत को हटाने का मतलब है कम से कम 6 महीने का श्रम। हांलाकि राज्य सरकार ने यह ऐलान था कि जो किसान अपने खेत का बालू मशीन से निकलवायेंगे उन्हें पचास प्रतिशत तक की छूट मिलेगी। इस संबंध में एक किसान सत्यनारायण मेहता, जिनके पास दो एकड़ जमीन है और इस जमीन के 70 प्रतिशत हिस्से में गाद जमा है। श्री मेहता ने बताया कि उनका आवेदन पिछले 8 महीने से लंबित पड़ा है। सहायता की बात तो दूर की रही, अभी तक कोई जवाब भी नहीं मिला है। मुख्यमंत्री द्वारा बेहतर कोसी बनाने का वादा इनके अन्य हवामहलों की तरह धाराशायी हो रहा है। बाढ पीड़ित गृहविहीन आज भी सड़क किनारे रहने को विवश हैं। वीरपुर प्रखंड के ग्रामीणों ने घर की मरम्मती आदि मांगों को लेकर प्रखंड कार्यालय पर धरना दिया था, जिसका जवाब उन्हें पुलिस द्वारा लाठी और गोली से मिला। क्या हुआ तेरा वादा? कोसी बाढ अभी तक मुआवजे का इंतजार भले ही राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोसी इलाके को सुन्दर और बेहतर कोसी बनाने की घोषणा एक बार नहीं अनेकों बार कर चुके हों, लेकिन एक सच्चाई है कि वर्ष 2008 में आये कोसी महाप्रलय में अपना सबकुछ गंवा चुके लोग अभी भी मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। बाढ के कारण खेत में जमा हुआ बालू वाला गाद की वजह से खेती बूरी तरह प्रभावित है। बाढ प्रभावित इलाके में कार्यरत अधिकारियों का कहना है कि गांव वाले इसलिये शिकायत करते हैं, क्योंकि वे औपचारिकताओं की अहमियत नहीं समझते हैं। मुआवजा का दावा करने के लिये उन्हें प्राथमिकी सूचना रिपोर्ट(एफ़ आई आर) एवं मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना आवश्यक है। अगर ग्रामीण ये सब जूटा भी लेते हैं तो अधिकारिक वक्तव्य आता है कि कागजी कार्रवाई में देरी हो रही है। जबतक खाना पूर्ति नहीं होगी तबतक बाढ प्रभावित लोगों की मुश्किलें जारी रहेंगी। सुपौल जिले का भरतपुर गांव, जो वर्ष 2008 में आये बाढ में करीब एक महीने तक 6 से 10 फ़ूट पानी में डूबा रहा। इसी गांव के एक आदमी महेंद्र शार्मा की मृत्यु जनवरी 2009 में भूख के कारण हो गई। इस इलाके के दो पत्रकारो ने इसकी सूचना मानवाधिकार आयोग को दी। जांच के बाद आयोग ने महेंद्र शर्मा की विधवा रानी देवी को पिछले साल अप्रैल में 2 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया था। परंतु इस विधवा को अभी तक यह राशि नहीं मिली और अपने दो बच्चों के साथ यह महिला भी भूख के कारण मरने के लिये विवश है। इसके पास खेत भी है लेकिन उपजा नहीं सकती। पहला कारण तो यह कि पति नहीं रहा और बच्चे इस लायक नहीं हैं कि वे खेत में काम कर सकें। इसके अलावा खेती शुरू करने के पहले खेत से गाद निकालना जरूरी है। इसी प्रकार सुपौल जिले के धिवारा गां की लक्ष्मी मंडल को डेढ लाख रुपये मुआवजा मिलना था, जो उसे आजतक नहीं मिला। उसके पति भूमिशंकर बाढ में बह गये थे। राज्य सरकार के मुआवजा नीति का हश्र तो देखिये। सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज के प्रखंड में 35 में से अभीतक केवल 5 और प्रतापगंज में 19 में से मात्र 3 परिवरों को मुआवजा मिला। खेती की संभावना क्षीण है और बाढ भी दस्त्क दे रहा है। इस परिस्थिति में लोग भूखों मरने को विवश हैं।
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