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Text Box: विशेष रिपोर्ट - बरसों के निवासी, लेकिन सबूत नहीं
नवल किशोर कुमर
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पटना शहर के बीचों बीच स्लम का वह इलाका, जिसे सभ्य लोग कमला नेहरू नगर के नाम से जानते हैं। भले ही इसका नाम नगर हो लेकिन वास्तविकता यह है कि यह किसी नरक से कम नहीं है। सैंकड़ों लोग फ़ूस की झोपड़ियों में रहने का दावा करते हैं, लेकिन ऐसे बहुत कम ही हैं जिनके पास यह सबूत हो कि वे किस देश के वासी हैं।

 

असल में इस स्लम में रहने वाले अधिकांश बांग्लादेशी शरणार्थी हैं, जिन्हें तत्कालीन राज्य सरकार ने बसाया था। बांग्लादेश बनने के बाद भी इन शरणार्थियों को वापस भेजने की कोई पहल नहीं की गई। इस इलाके का नामकरण भी उस समय के रणनीतिकारों ने प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरु के नाम पर किया। परंतु आज तक इस इलाके को केवल भारतीय नाम ही मिला है, भारतीय होने का प्रमाण नहीं।

 

करीब 65 साल की वृद्धा रेशमा खातून बताती हैं कि उन्हें यहां रहते 40 साल से ऊपर हो गया है। उनकी शादी भी यही हुई और इनके सात बच्चों का जन्म भी यही हुआ। पति के गुजरने के 6 साल बाद भी न तो इन्हें कोई लाल कार्ड मिला है और न ही कोई फ़ोटो वाला कार्ड। यानि इन्हें वोटर पहचान पत्र भी नहीं मिला है। यह इस तथ्य को जाहिर करता है कि सरकार इन्हें भारतीय नहीं मानती है। इसलिये ये रहती तो पटना में हैं, लेकिन स्वयं को दावे के साथ नहीं कह सकती हैं कि ये अब हिंदुस्तानी हैं।

हांलाकि युवा पीढी को तो रिफ़्युजी शब्द का मतलब भी नहीं मालूम है। वे तो बस इतना ही जानते हैं कि यह नरक ही उनका अपना संसार है, जहां वे सभी प्रकार के कर्म कर सक्ते हैं। करीब 350 परिवारों का आशियाना वाले इस इलाके में लाईसेंसी शराब की दूकान भी है और गैर लाईसेंसी भी। इन दारु के अड्डों पर हर समय युवाओं की महफ़िल सजी रहती है। मो आबिद नामक एक युवक ने बताया कि वह ठेला चलाता है और जबसे उसे होश है, तबसे लेकर आजतक इसी इलाके में रहता आया है। बरसात के दिनों में पानी भर जाने के कारण पूरा परिवार सड़क पर आ जाता है। अपने पहचान के बारे में आबिद बताता है उसे भी वोट डालने का बहुत मन करता है, लेकिन पहचान पत्र नहीं रहने के कारण नहीं डाल पाता है।

 

गंदगी से बजबजाते इस कालोनी में कई ऐसे भी हैं जिनका पहचान पत्र जारी किया जा चुका है। इनमें से अधिकांश बांग्लादेशी शरणार्थी नहीं है और गैर मुस्लिम हैं। इस कालोनी में दूकान चलाने वाली एक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दो तीन महीना पहले कुछ सरकारी आदमी आये थे और 40-50 आदमी का नाम लिखकर ले गये थे। संभवतः वे जनगणना कर्मचारी रहे होंगे जिन्होंने नाम लिखने के एवज में प्रत्येक आदमी से 100 रुपये की उगाही भी की।