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अपना बिहार निष्पक्षता हमारी पहचान
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उपलब्धि - अमेरिकी प्रकाशक ने छापी यतीन की किताब |
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पटना(अपना बिहार, 18 दिसंबर 2011) - वे बिहार सरकार में कामर्शियल टैक्स आफ़िसर हैं। अभी पिछले ही वर्ष इन्होंने बिहार सिविल सर्विसेज की परीक्षा पास की और इन्हें बिहार राज्य वित्त सेवा में बतौर अधिकारी काम करने का मौका मिला है। वैसे इससे पहले वे अंतरराष्ट्रीय बैंक यूबीएस के कर्मचारी के रुप में लंदन में भी काम कर चुके हैं। मूल रुप से पटना के रहने वाले यतीन कुमार सुमन की पहचान केवल यही नहीं है। इनकी एक पहचान और भी है। ये एक लेखक भी हैं। हालांकि त्रासदी यह है कि इनकी प्रतिभा को अपनों ने नहीं, बल्कि गैरों ने समझा। गैर मतलब एक अमेरिकी प्रकाशक ने। दूरभाष पर “अपना बिहार” के साथ विशेष बातचीत में यतीन ने बताया कि उनकी पहली किताब “लव इन ए वुडेन बाक्स” का प्रकाशन अमेरिकी प्रकाशक कंपनी लीड स्टार्ट पब्लिकेशन कंपनी ने फ़्राग बुक श्रृंखला के तहत किया। श्री सुमन ने बताया कि उनकी यह किताब एक काल्पनिक उपन्यास है, जिसका आधार उनके व्यक्तिगत जीवन से भी जुड़ा है। गौतम, संदीप, परेश और दीपक नामक चार दोस्तों के इर्द-गिर्द घुमती यह कहानी आधुनिक युग के द्वंद्वातमक संघर्ष का चित्रण करती है। इस उपन्यास की मूल खासियत यह है कि इसमें बिहारी संस्कृति का सकारात्मक उल्लेख किया गया है। इन्होंने यह भी बताया कि अंग्रेजी में लिखे गये इस उपन्यास की एक और खासियत यह है कि इसमें यथार्त को बरकरार रखने के लिये हिन्दी के कुछ शब्दों को उसी स्वरुप में लिखा गया है। श्री यतीन बताते हैं कि उनका यह उपन्यास विश्व स्तर पर पसंद किया जा रहा है और अबतक 5000 से अधिक प्रतियां केवल इन्टरनेट के जरिये बिक चुकी हैं। इन्होंने यह भी कहा कि अब बिहार के प्रति लोगों की सोच बदली है और आने वाले समय में बिहारी लेखकों को भी वही सम्मान मिलेगा जो अन्य राज्यों के युवा लेखकों को मिलता है। बियाडा मामले में एक और खुलासा – इंडस्ट्रीयल एरिया में जमीन की मची लूटपाट का एक और प्रमाण पटना (अपना बिहार, 7 दिसंबर 2011) – बिहार सरकार द्वारा अगले वर्ष फ़रवरी माह में एक ग्लोबल कान्क्लेव का आयोजन किया जा रहा है। ग्लोबल कान्क्लेव यानी सरकार दुनिया भर में रहने वाले बिहारियों को आमंत्रित करेगी और उन्हें सूबे के विकास में आगे आने के लिये कहेगी। यह कोई प्रथम अवसर नहीं होगा, जब सरकार ऐसा करेगी। हर साल बिहार सरकार केंद्र सरकार के द्वारा आयोजित होने वाले प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में बिहार का स्टाल इस आस में लगाती है कि विदेशों में रहने वाले बिहारी बिहार आयेंगे और पूंजी निवेश करेंगे। इस बार भी राज्य सरकार की यही सोच है। अब दूसरी सच्चाई की बात करते हैं। बिहार राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण की मानें तो पटना के आसपास के इलाके में सरकार के पास जमीन ही नहीं है। जमीन नहीं होने का मतलब यह है कि इंडस्ट्रीयल क्षेत्रों की जमीनें किसी न किसी को आवंटित की जा चुकी हैं। इसका एक प्रमाण बियाडा के वेबसाइट पर उपलब्ध है। आप भी देखिये।
इस सूची से स्पष्ट है कि यदि कोई उद्यमी पूंजी निवेश करना भी चाहे तो उसके पास केवल एक ही विकल्प है। वह विकल्प यह है कि वह औरंगाबाद और कोपाकलन के जंगलों में जाकर अपनी फ़ैक्ट्रियां लगाये। वर्तमान परिस्थिति में इन इलाकों पर नक्सलियों का कब्जा है। इसलिये इन इलाकों में पूंजी निवेश होगा, इसकी संभावना कम ही दिखती है।
अब इसी कहानी के अगले स्वरुप के बारे में बात करते हैं। बियाडा द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गई है। यह रिपोर्ट हर इंडस्ट्रीयल एरिया के लिये पृथक रुप से जारी की गई है। अब पटना स्थित पाटलीपुत्र इंडस्ट्रीयल एरिया की बात ही ले लिजीये। कुल 128 लोगों को इसकी जमीनें आवंटित की गई हैं। इन जमीनों का आवंटन 60 के दशक में प्रारंभ किया गया था। मसलन आनंद सिंह नामक एक व्यक्ति, जिसका मुख्य कारोबार इलेक्ट्रीकल्स का था, उसे दिनांक 13 जून 1966 को 15000 वर्ग फ़ीट जमीन का आवंटन किया गया था। वर्तमान में इस जमीन पर कैटल फ़ीड यानी पशुओं के लिये चारा का उत्पादन किया जाता है। एक दूसरा उदाहरण यह भी देखिये।
जमीन आवंटन के सारे नियमों को शिथिल कर बिहार सरकार की ओर से पूरी प्रक्रिया को न्याय सम्मत बनाते हुए पाटलीपुत्र इंड्स्ट्रीयल एरिया में 58066 वर्ग फ़ीट जमीन का आवंटन मेसर्स पी एंड एम इन्फ़्रास्ट्रचर लिमिटेड को मल्टीप्लेक्स बनाने के लिये दे दिया गया। देने की वजह यह रही कि इस कंपनी के मालिक कोई और नहीं बल्कि जाने-माने फ़िल्म निर्देशक प्रकाश झा हैं। अब एक तीसरा उदाहरण देखिये। मेसर्स बिहार मार्बल को पहली बार 11 अक्टूबर 1969 को मार्बल फ़ैक्ट्री लगाने के लिये 6776 वर्ग फ़ीट जमीन दी गई थी। वर्षों तक जब इस जमीन पर कोई उत्पादन शुरु नहीं हुआ तब तत्कालीन राजद सरकार ने इनसे जमीन वापस ले ली। मामला कोर्ट में गया और कोर्ट ने मेसर्स बिहार के पक्ष में फ़ैसला दिया। वर्तमान में इस जमीन पर मार्बल की जगह अखबार का उत्पादन हो रहा है।
एक तरफ़ बिहार सरकार कहती है कि पाटलीपुत्र इंडस्ट्रीयल एरिया में उसके पास जमीन नहीं है। वही एक सच्चाई यह भी है कि यहां की बेशकीमती जमीनों पर माफ़ियाओं का कब्जा है। इसका एक उदाहरण यह है कि सरकार ने मेसर्स रेकान के मालिक प्रभात कुमार को 29 जनवरी 2010 को इसी इंडस्ट्रीयल एरिया में 44766 वर्ग फ़ीट जमीन आईटी पार्क स्थापित करने के लिये दिया। इस पार्क का निर्माण बीरबल की खिचड़ी के रिकार्ड को तोड़ने के लिये प्रयासरत है। सरकार की बेईमानी का एक प्रमाण यह भी कि 29 जनवरी 2010 को ही प्रभात कुमार को इसी इंडस्ट्रीयल एरिया में 45337 वर्गफ़ीट जमीन इसलिये आवंटित किया गया ताकि वे इंडस्ट्रीयल एरिया में फ़ाईवस्टार होटल खोल सकें।
तो दोस्तों, यह है बिहार के पाटलीपुत्र इंडस्ट्रीयल एरिया की असली सच्चाई। ऐसी ही सच्चाईयां अन्य इंड्स्ट्ड़ीयल क्षेत्रों की भी हैं। बिहार की आम जनता जो अभी भी रोजी-रोटी के लिये संघर्षरत है, उसे बड़े स्तर की बेईमानी से कोई लेना देना नहीं हो और वह इसका विरोध नहीं कर रही है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बिहार में जमीन के नाम पर खुलेआम बेईमानी की जा रही है। मौजूदा समय में सबसे अधिक बेईमानी तो उन उद्यमियों के साथ की जा रही है, जिन्हें बियाडा द्वारा यह कहकर टरकाया जा रहा है कि इंडस्ट्रीयल क्षेत्रों में जमीन नहीं है। ऐसे में सरकार द्वारा ग्लोबल मीट अथवा कान्क्लेव करना महज नौटंकी नहीं तो और क्या है? बदलता बिहार - रंग लाया ग्रामीणों का आविष्कार मोतिहारी जिले के मीना बाजार स्थित हनुमान मंदिर के पास लोहे का ग्रिल बनाने की दूकान चलाने वाले अशोक ठाकुर सूबे 10 करोड़ लोगों से अलग हैं। अलग इस मायने में कि इन्होंने मेधा का इस्तेमाल कर चलंत धुआं रहित चूल्हे का आविष्कार किया है। इनके इस चूल्हे की खासियत यह है कि धान के भूसे से आम उपभोक्ता एलपीजी गैस वाली सुविधा पा सकते हैं। केवल एक रुपये के खर्च में पूरे परिवार का खाना बना सकते हैं। इनके चूल्हे की खासियत यह भी है कि इनका चूल्हा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पा चुका है। इन्होंने अपने आविष्कार का पेटेंट भी करवा लिया है। अपने आविष्कार के बारे में श्री ठाकुर बताते हैं कि प्रति चूल्हा पांच सौ रुपये की कीमत पर स्थानीय बाजारों में बेचते हैं। ये अपने चूल्हे का औद्योगिक उत्पादन करना चाहते हैं और इसके लिये सरकार से सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। स्थानीय ए एन सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान के परिसर में दो दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने आये अशोक ठाकुर अकेले नहीं हैं। गोपालगंज के मीरगंज के रहने वाले शिवजी शर्मा का आविष्कार भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इन्होंने पेट्रोल से चलने वाले बुलेट गाड़ी को डीजल से चलाया है। हालांकि यह प्रक्रिया कारों के माध्यम से बाजारों में आ चुकी है। लेकिन इनके आविष्कार की खासियत यह है कि इसके उपयोग से एक बुलेट मोटरसाइकिल एक लीटर डीजल में 75 से 80 किलोमीटर की दूरी तय करती है। ये बताते हैं कि यदि इनके आविष्कार का उपयोग 100 सीसी वाली मोटरसाइकिलों में लगाया जाये तो माइलेज में आश्चर्यजनक वृद्धि हो सकती है। फ़िलहाल शिवजी शर्मा अपने आविष्कार को पेटेंट कराने के लिये प्रयत्नशील हैं। आविष्कारकों में एक वीरेंद्र कुमार सिन्हा भी शामिल हैं। ये भी मोतिहारी जिले के ही रहने वाले हैं। इनकी खासियत यह है कि इन्होंने काजल प्रदूषण निरोधी यंत्र का आविष्कार किया है। इनके उपकरण का इस्तेमाल डीजल से चलने वाले किसी भी जेनरेटर के साथ किया जा सकता है। जोड़ने से लाभ यह होता है कि इससे धुआं तो खत्म हो ही जाता है, साथ ही जेनरेटर से निकलने वाला ध्वनि प्रदूषण समाप्त हो जाता है। श्री सिन्हा भी उन भाग्यशाली लोगों में से एक हैं, जिनके उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट किया गया है। मोतिहारी के ही सुनील कुमार ने केवल मैट्रिक की परीक्षा पास की है। उम्र भी 20 वर्ष से कम ही है। इसके बावजूद इनकी काबलियत का अनुमान इसी मात्र से लगा सकते हैं कि इन्होंने स्वचालित पोटैटो ग्रेडर का आविष्कार किया है। इनका ग्रेडर आलू उपजाने वाले किसानों के लिये आविष्कार सरीखा हो सकता है। इसकी वजह यह है कि ट्रैक्टर से चलने वाला इनका ग्रेडर आलू के खेतों से आलू निकाल कर आकार के आधार पर उनकी छंटाई कर बोरे में पैकिंग भी कर देता है। हालांकि सुनील ने अभी तक इसे संपूर्ण मूर्त नहीं दिया है। इन्हें कबाड़ से जुगाड़ कर एक ट्रैक्टर का माडल बनाया है और इसके साथ ग्रेडर को भी बनाया है। इनका माडल एक बैट्री से चलता है। सुनील चाहते हैं कि उनका यह आविष्कार हकीकत बने और किसानों की सहायता करे। यही इनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। बहरहाल, बिहार के इन ग्रामीण आविष्कारकों के आविष्कार को देखने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमिता विकास संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक डी के सिंह भी पहूंचे। इन्होंने सभी आविष्कारकों को उनके उल्लेखनीय प्रयास के लिये बधाई दी। इन्होंने अशोक ठाकुर और बीरेंद्र सिन्हा को बताया कि भारत सरकार की ओर से उन आविष्कारकों को 25 हजार से 1 लाख रुपये तक की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जिनके आविष्कार को पेटेंट मिल चुका है। इन्होंने सभी आविष्कारकों को अपने कार्यालय आने और भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ लेने के लिये आमंत्रित किया। विशेष रिपोर्ट - दम तोड़ रहा एक सपना पटना (अपना बिहार, 8 नवंबर 2011) – सम्मान फ़ाऊंडेशन के संस्थापक इरफ़ान आलम का सपना अब दम तोड़ने लगा है। मिली जानकारी के अनुसार इस संस्था के सदस्य रिक्शाचालकों की संख्या में गुणोत्तर कमी आती जा रही है। सम्मान फ़ाऊंडेशन के सदस्य और फ़तुहां के निवासी रिक्शाचालक रामजी महतो के अनुसार फ़ाऊंडेशन में अब लूट मची हुई है। इन्होंने बताया कि वर्ष 2009 में इन्होंने फ़ाऊंडेशन की सदस्यता ली थी और फ़िर फ़ाऊंडेशन के सहयोग से इन्हें एक रिक्शा भी मिला था। इसके लिये उन्होंने अपनी गाढी कमाई का 6000 रुपया नकद जमा कराया था। उस समय यह वायदा किया गया था कि दो वर्षों तक किस्त जमा करने के बाद रिक्शा उनकी हो जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। श्री महतो बताते हैं कि उन्होंने हर महीने फ़ाऊंडेशन को किस्त का भुगतान किया। अभी हाल ही में फ़ाऊंडेशन के सदस्यों द्वारा उनके रिक्शा पर कब्जा कर लिया गया है और कहा जा रहा है कि 3 हजार रुपये के भुगतान के बाद ही रिक्शा उन्हें वापस दी जायेगी। नौबतपुर के निवासी रामेश्वर राम ने बताया कि एक साल पहले ही उन्होंने फ़ाऊंडेशन की सदस्य्ता ली थी और रिक्शा चला रहे हैं। कहा गया था कि उनके नाम से एक अकाउंट खोला जायेगा और एक रिक्शा किस्त के आधार पर दिलवायी जायेगी। इसके बाद उन्हें एक पुराना रिक्शा दे दिया गया और प्रतिदिन के हिसाब से 50 रुपये देने को कहा गया। बताया गया था कि 3 साल तक रिक्शा का पैसा देने के बाद वे रिक्शा के मालिक हो जायेंगे। श्री राम ने बताया कि अभी हाल ही में जब वे छठ मनाने गांव चले गये थे और जब वापस लौटे तो उन्हें 2 हजार रुपये देने को कहा गया। नहीं देने पर उन्हें रिक्शा नहीं दिया गया और उनके साथ मारपीट की गई। श्री राम वर्तमान में राजेंद्रनगर इलाके के एक व्यक्ति का रिक्शा भाड़ा पर लेकर रिक्शा चला रहे हैं। बहरहाल, रामजी महतो और रामेश्वर राम के जैसे अनेक गरीब रिक्शाचालक हैं जो सम्मान फ़ाऊंडेशन के जुल्म का शिकार हुए हैं। इनकी परेशानी यह है कि कोई इनकी सुनने वाला नहीं है। हालांकि इस संबंध में अपना बिहार के प्रतिनिधि द्वारा सम्मान फ़ाऊंडेशन के अधिकारियों से बातचीत करने का प्रयास किया गया। इस पर सम्मान फ़ाऊंडेशन के अधिकारियों ने कुछ भी स्पष्ट तौर पर बताने से इन्कार कर दिया। नई कोशिश - “मेड इन बिहार” को साकार करने का सपना उनका नाम विभूति विक्रमादित्य है। पेशे से वह एक इलेक्ट्रानिक इंजीनियर हैं। ये दक्षिण कोरिया में एक विश्व प्रसिद्ध इलेक्ट्रानिक कंपनी में चीफ़ चिप डिजायनर रह चुके हैं। पिछले 3-4 सालों से ये अपने गृह राज्य को समुन्नत बनाने की कोशिशों में जूटे हैं। इनकी कोशिशों में हर वर्ष आयोजित होने वाला बिहार साईंस कांफ़्रेंस एक उदाहरण है। इन्होंने बिहार ब्रेन्स सोसायटी का गठन किया है। वैसे इनकी नई कोशिश “मेड इन बिहार” को ब्रांड बनाने की है। इस कड़ी में इस जीनियस उद्यमी ने टी-कैम नामक एक सुरक्षा उपकरण बनाया है। यह सुरक्षा उपकरण लोगों को केवल 30 हजार रुपये में ही घर और कार्यालय आदि की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगा। इनके इस उपकरण की खासियत यह है कि किसी भी अवांछित घटना के घटित होने पर यह अपने अधिकृत उपभोक्ता को उसके मोबाइल और ईमेल के माध्यम से घटना की जानकारी दे देगा। इसके अलावा कोई भी उपभोक्ता इंटरनेट पर जाकर अपने घर में लगे कैमरे के जरिये यह देख सकता है कि अभी उसके घर में क्या हो रहा है। इस संबंध में श्री विक्रमादित्य बताते हैं कि उनके इस उपकरण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न्यूनतम 1000 घंटे की निर्बाध रिकार्डिंग के अलावे बिहार में बिजली व्यवस्था को देखते हुए वैकल्पित ऊर्जा श्रोत (बैट्री) के की व्यवस्था भी की गई है। निजी खर्चे पर सरकारी यात्रा बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष एस पी सिन्हा और बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष ओ पी साह उस प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे, जिसने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में चीन का दौरा किया। खास खबर यह है कि इन दोनों उद्यमी प्रतिनिधियों को सरकारी यात्रा में शामिल होने के लिये अपनी जेब से खर्च करना पड़ा। इस तथ्य की स्वीकारोक्ति बिहार इण्डस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्य्क्ष एस पी सिन्हा ने संवाददाता सम्मेलन में की। इन्होंने बताया कि वे सरकारी शिष्टमंडल के सदस्य अवश्य थे, परंतु, इसके लिये उन्हें अपनी जेब से पैसे खर्च पड़े। बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष ओ पी साह ने भी श्री सिन्हा के कथन पर अपनी सहमति व्यक्त की चीन से उद्यमिता सीखे बिहार चीन के विकास का एकमात्र महत्वपूर्ण कारण यह है कि चीनी नागरिक कर्म को सबसे अधिक प्रधानता देते हैं। यही वजह है कि चीन के शहरों में लोग सड़कों पर घूमने के बजाय कार्य पर जोर देते हैं। बिहार जैसे विकासशील राज्य को चीन से उद्यमिता सीखनी चाहिये। इस आशय की जानकारी बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष एस पी सिन्हा और बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के अध्य्क्ष ओ पी साह ने चीन से लौटने के बाद संवाददाता सम्मेलन में दी। श्री सिन्हा ने चीन यात्रा को सफ़ल बताते हुए कहा कि उन्हें इस यात्रा के दौरान बहुत कुछ सीखने को मिला। इन्होंने यह भी कहा कि शैंडांग में वहा के उद्यमियों के साथ गोलमेज सम्मेलन में तकनीकी हस्तांतरण पर विचार विमर्श किया गया। इसका लाभ बिहार में औद्योगिक विकास के लिये किया जा सकता है। इन्होंने बताया कि चीन की आधारभूत संरचना अन्य एशियाई देशों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट और विश्व स्तरीय है। इसके अलावे चीन में सौर ऊर्जा के प्रयोगों को अपनाया जाना चाहिये। चीनी उद्यमियों को मिलनी वाली सरकारी एवं नीतिगत सहायता के संबंध में श्री सिन्हा ने कहा कि वहां उद्यमियों को कई स्तर पर रियायत हासिल है। इसके अलावे वहां बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाता है। इस कारण वहां लागत मूल्य में बहुत कमी आ जाती है। संवाददाता सम्मेलन में ओ पी साह ने बताया कि चीन का कृषि विकास अत्यंत ही प्रशंसनीय है। चीन सरकार ने अपने देश की मिट्टी की ऊर्वरा शक्ति को बनाये रखने हेतु अनेक प्रयोग किये हैं। इसके तहत चीन में जैविक खेती की प्रधानता है। खत्म होगा आईटी पालिसी का इंतजार माइक्रोसाफ़्ट, आरेकल, इन्फ़ोसिस, इन्टेल और सत्यम जैसी जानी-मानी कंपनियां निवेश करने के लिये उत्साहित हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आईटी के क्षेत्र में सूबे में अधिक संख्या में मानव बल कम कीमत पर उपलब्ध हैं। हालांकि जिस कारण से इन कंपनियों का पदार्पण बिहार में नहीं हो सका है, अब उस कारण का अंत होने वाला है। अब बिहार के माथे से यह कलंक मिटने वाला है कि राज्य के पास अपना आईटी पालिसी नहीं है। जी हां, अब बिहार में आईटी पालिसी का इंतजार खत्म होने वाला है। मिली जानकारी के अनुसार यदि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चीन नहीं गये होते तो अबतक इस नीति की घोषणा हो गई होती। वैसे उम्मीद लगायी जा रही है कि श्री कुमार के वापस लौटते ही इस नीति की अधिकारिक घोषणा कर दी जायेगी। सूबे की आईटी पालिसी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सूबे के जाने-माने आईटी विशेषज्ञ प्रभात कुमार सिन्हा ने बताया कि अघोषित पालिसी में सभी के लिये कुछ न कुछ दिया गया है। सबसे म्हवत्पूर्ण यह है कि सूबे में आईटी के विकास के लिये 100 करोड़ रुपये के कारपस फ़ंड का निर्माण किया जायेगा। इसके अलावा जो कंपनियां बाहर से आकर बिहार में निवेश करेंगी, उन्हें आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में होने वाले खर्च पर नकद अनुदान भी दी जायेगी। मसलन जो कंपनियां अपने दम पर बिजली हेतु जेनन्रेटर लगायेंगी, उन्हें पूरी कीमत की 60 फ़ीसदी राशि दी जायेगी। हाल ही में घोषित नई औद्योगिक नीति के तहत जो सुविधायें अन्य निवेशकर्ताओं को मिलेंगी, वे सारी सुविधायें आईटी उद्यमियों को भी मिलेंगी। इन्होंने यह भी बताया कि नई आईटी पालिसी में इस बात का पूरा इंतजाम किया जा रहा कि जो कंपनियां बिहार में अपनी सेवायें देंगी अथवा उत्पाद बेचेगी, उन्हें अपना क्षेत्रीय कार्यालय सूबे में स्थापित करना अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि ऐसा होने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और सूबे में निवेश का माहौल बनाने में सहायता मिलेगी। नई आईटी पालिसी में बाहरी कंपनियों को लुभाने के सारे इंतजाम तो किये ही गये हैं और साथ ही स्थानीय उद्यमियों को भी विशेष रुप से प्रोत्साहित करने की भी योजना है। इस योजना के तहत सरकारी कार्यों में स्थानीय उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 10 फ़ीसदी तक की रियायत मिलेगी। वैसे जानकारों का मानना है कि स्थानीय उद्यमियों को जो रियायत मिलेगी, वह ऊंट के मुंह में जीरा के समान ही होगा। इसके बावजूद सभी को इंतजार है एक अदद आईटी पालिसी का। आने वाले कुछ दिनों में यह इंतजार खत्म हो जायेगा। वैसे सूबे में आईटी पालिसी बनाने की प्रक्रिया को 3 साल से अधिक समय व्यतीत हो चुका है। औद्योगिक नीति से गदगद हुए सूबे के उद्यमी, चीन जायेगा बिहारी उद्यमियों का दल आगामी 12 जून से चीन की यात्रा पर जा रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ बिहारी उद्यमियों का एक दल भी चीन जायेगा। इस आशय की जानकारी बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष एस पी सिन्हा ने बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के सभागार में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में दी। इन्होंने बताया कि बिहार के उद्यमी चीन में उद्योगों के विकास के बारे में जानकारी हासिल करेंगे और फ़िर औद्योगिक विकास को बिहार में साकार करने की कोशिश करेंगे। इससे पहले श्री सिन्हा ने नई औद्योगिक नीति को मंजूरी प्रदान करने के लिये बिहार सरकार को साधूवाद दिया। इन्होंने बताया कि सूबे की नई औद्योगिक नीति देश में उपलब्ध औद्योगिक नीतियों में सबसे बेहतरीन औद्योगिक नीति है। इन्होंने बताया कि सूबे की नई औद्योगिक नीति के निर्माण में हर संभव पारदर्शिता बरती गई है। इसके लिये बिहार के उद्यमियों के साथ भी विचार विमर्श भी किया गया है। इसके अलावे सूबे में निवेश को बढावा देने के लिये अनेक प्रोत्साहन योजनाओं को शुरु करने का निर्णय लिया गया है। श्री सिन्हा ने बताया कि नई औद्योगिक नीति 2011 में नई औद्योगिक इकाइयों के साथ कार्यरत औद्योगिक इकाइयों एवं बंद/रुग्ण इकाइयों के लिये भी प्रोत्साहन का प्रावधान है, ताकि राज्य में स्थायी औद्योगिक निवेश एवं विकास हो। बंद एवं रुग्ण इकाइयों के पुनर्वास के लिये कारपस फ़ंड का प्रावधान किया जाना स्वागत योग्य है। चैंबर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष ओ पी साह ने इस अवसर पर जानकारी दी कि 1 जुलाई 2011 से लागू होने जा रही औद्योगिक प्रोत्साहन नीति 2011 में दी जाने वाली प्रोत्साहन सुविधाओं को दो श्रेणियों में रखा गया है। पहला उत्पादन पूर्व सुविधा तथा दूसरा उत्पादन बाद सुविधा। श्री साह ने कहा कि वर्तमान औद्योगिक प्रोत्साहन नीति में उत्पादन पूर्व सुविधा को जारी रखते हुए उद्योगों की स्थापना के लिये खरीदे जाने वाले भूमि पर लगने वाले स्टांप शुल्क तथा निबंधन शुल्क में शतप्रतिशत छूट दिये जाने का प्रावधान एक बार फ़िर किया गया है। औद्योगिक नीति 2011 घोषित कल राज्य मंत्रिमंडल ने सूबे की नई औद्योगिक नीति 2011 को मंजूरी दे दी। वैसे इस संबंध में अपना बिहार ने पूर्व में ही खबर प्रकाशित किया था कि राज्य की नई औद्योगिक नीति को बिना किसी विचार विमर्श के ही राज्य मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी मिल जायेगी। इसलिये यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि बिहार सरकार की कैबिनेट के बैठक महज एक औपचारिकता मात्र है। वास्तविकता यह है कि इस बैठक में वही होता है जो मंजूरे नीतीश कुमार होता है। मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को किसी भी योजना के बारे में टिप्पणी करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता। इसकी पुष्टि कल राज्य कैबिनेट की बैठक में भी देखने को मिली। जब इस नीति को मंजूरी के लिये प्रस्तुत किया गया तो अनेक सदस्य जमीन अधिग्रहण के मैकेनिज्म के सवाल पर अपनी असहमति व्यक्त करना चाहते थे, लेकिन उन्हें इसका अवसर तक नहीं मिला। खैर, बिहार की नई औद्योगिक नीति को मंजूरी मिल गई है। इसमें 9 विशेष क्षेत्रों को चिन्हित किया गया। इसे अपना बिहार की खबर का परिणाम कहा जा सकता है कि राज्य सरकार ने अंतिम समय में कम्प्यूटर हार्डवेयर को भी विशेष औद्योगिक क्षेत्र के रुप में स्वीकृति प्रदान किया है। इसके अलावा इस नई नीति के बारे में सरकार द्वारा यह कहा गया है कि यह देश के सबसे उत्कृष्ट औद्योगिक नीतियों में से एक है। हालांकि जिस औद्योगिक नीति का इंतजार बिहारवासी और बिहार के बाहर रहने वाले उद्यमी कर रहे थे, वसुतः अब जबकि इसे राज्य कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे खेतों में हल चलाने वाला किसान उत्साहित हो। अब यह अलग बात है कि राज्य सरकार द्वारा कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना के लिये उद्योगपतियों को चार तरह की सुविधायें उपलब्ध करायी गई है। बताते चलें कि राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित उद्यमी प्रोत्साहन योजना को चार स्वरुपों में विभाजित किया गया है। इसमें उत्पादन पूर्व सुविधायें, व्यावसायिक उत्पादन के बाद की सुविधायें, कर संबंधी सुविधायें और अन्य विशेष सुविधायें शामिल हैं। विस्तार से बात करें तो उत्पादन पूर्व सुविधाओं की श्रेणी में स्टाम्प ड्युटी एवं पंजीकरण शुल्क शामिल है। इसके अलावा बिहार सरकार की ओर से लैंड बैंक की स्थापना की जा रही है। जो वस्तुतः किसानों से जमीन लेकर उसका वितरण उद्यम की स्थापना करने की इच्छा रखने वाले उद्यमियों के बीच की जायेगी। नई प्रस्तावित औद्योगिक नीति के तहत उद्यम हेतु जमीन खरीदे जाने अथवा लीज पर लिये जाने हेतु उद्यमियों को स्टाम्प ड्युटी से मुक्त रखे जाने की संभावना है। यानि उन्हें जमीन खरीदने वक्त या लीज पर लेते समय राजिस्ट्री के मद में कोई शुल्क नहीं देना होगा। वैसे उद्यमी जिन्होंने पहले से ही अपनी इकाई स्थापित कर रखा है तो क्षमता विस्तार के लिये आवश्यकता पड़ने पर जमीन खरीदते समय केवल 50 फ़ीस्दी राशि का भुगतान स्टाम्प ड्युटी के रुप में करना होगा। इतना ही नहीं यदि किसी उद्यमी उक्त लाभ नहीं मिल सका तो स्टाम्प ड्युट के रुप में जमा की गई राशि निबंधन विभाग द्वारा वापस कराये जाने पर भी गहन विचार मंथन चल रहा है। अब बात करते हैं दूसरे तरह के सुविधा की। सरकारी शब्दावली में व्यावसायिक उत्पादन बाद सुविधायें यानि पोस्ट प्रोडक्शन फ़ैसिलिटी नाम दिया गया है। इसके तहत परियोजना प्रतिवेदन, आधारभूत संरचना निर्माण हेतु अनुदान, तकनीकी जानकारी हेतु शुल्क पर आर्थिक सहायता और जेनरेटर से बिजली पैदा करने पर होने वाले खर्च का 50 फ़ीसदी हिस्सा भी राज्य सरकार वहन करेगी। उद्यमियों को इन सुविधाओं के अलावा वैट प्रवेश कर को भी मुक्त करने का प्रावधान किया जा रहा है। हालांकि इसके लिये यू टर्न के जैसे पहले उद्यमियों को कर का भुगतान करना होगा और फ़िर राज्य सरकार उनके द्वारा भुगतान की राशि को प्रतिपूर्ति के रुप में वापस कर देगी। जबकि अन्य सुविधाओं की श्रेणी में वैसे उद्यमियों को लाभान्वित किये जाने की तैयारी की जा रही है, जिनका उद्यम रुग्न हो चुका है या फ़िर जिनका उत्पादन ठप्प हो गया है। ऐसे उद्यमियों के लिये एक एक्जिट पालिसी भी बनाई जा रही है। बहरहाल, संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह देश की सबसे सर्वश्रेष्ठ औद्योगिक नीति होगी। संभावना यह भी व्यक्त किया जा रहा है कि इसके अस्तित्व में आने से सूबे में उद्योगों का जाल बिछेगा। वैसे राज्य के उद्योग मंत्री डा रेणु देवी कुशवाहा की मानें तो बिहार सरकार को लगभग 1 लाख 99 हजार करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। इसके अलावा एक सच्चाई यह भी कि पिछले साढे पांच सालों में बिहार में अबतक केवल 2000 करोड़ रुपये का निवेश ही हो सका है। इन सबसे अलग एक सच्चाई यह कि नई औद्योगिक नीति में किसानों की बेहतरी के लिये कोई उपाय नहीं किये जा रहे हैं। हालांकि उद्योग नीति में किसानों की बेहतरी का कोई प्रश्न उठता भी नहीं है, लेकिन यह सवाल तो उठता ही है कि कृषि को समुन्नत और इंडस्ट्री ओरियेंटेड बनाने हेतु पहल किये जाना निश्चित रुप से अनिवार्य था और बिहार का दुर्भाग्य यह कि ऐसा नहीं किया जा रहा है। इस कारण नई औद्योगिक नीति से अभी बहुत अधिक उम्मीद लगाना बेमानी होगी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह कि जब वर्ष 2006 में नीतीश सरकार ने औद्योगिक नीति लागू किया था तब भी बिहार में उद्योगों का जाल बिछ जाने की बात कही गई थी। खूब ताम-झाम के साथ सिंगल विंडो सिस्टम को भी पेश किया गया, नतीजा आज सामने है। आजतक सिंगल विंडो सिस्टम केवल कागजों पर ही काम कर रहा है। बिजली दर में वृद्धि से विकास होगा बाधित बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन और बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स ने बिजली दरों में 20 फ़ीसदी की वृद्धि पर चिंता व्यक्त की है। बीआईए के अध्यक्ष सुभाष पटवारी ने बताया कि केवल 6 माह के अंदर ही बिजली दरों में 20 फ़ीसदी की वृद्धि अनुचित है। इस कारण बिजली दर अन्य पड़ोसी राज्यों से अधिक हो जायेगी। इससे सूबे में निवेश की प्रक्रिया को गहरा झटका लगेगा। इन्होंने यह भी कहा कि हाई टेंशन उपभोक्ताओं के लिये राज्य सरकार द्वारा न्यूनतम रखरखाव शुल्क की जगह औसतन रखरखाव शुल्क का प्रावधान किया जाना सही कदम माना जा सकता है, परंतु राज्य सरकार ने इसे पूर्णतः समाप्त करने का वादा किया था। ईंधन अधिभार वसूले के कारण पहले से ही बिजली की दरों में अधिक इजाफ़ा हो गया था और अब दूबारा कीमतें बढने से महंगागी बढेगी और इसका असर आम लोगों के जीवन पर पड़ेगा। उधर बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष ओ पी शाह ने बिजली दरों में 20 फ़ीसदी की वृद्धि किये जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बिहार राज्य बिजली बोर्ड की नाकामी का खमियाजा आम उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है। जहां एक ओर बोर्ड अत्याधिक स्थापना खर्च, संचरण लागत, बिजली चोरी और बिजली वितरण में होने वाली हानि पर नियंत्रण पाने में असफ़ल रहा, वही दूसरी ओर इसने अपनी नाकामी का बोझ उपभोक्ताओं के सिर पर डाल दिया है। बोर्ड की इस कार्रवाई से सूबे में औद्योगिक विकास की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है। हार्डवेयर हब बन सकता है बिहार कम्प्यूटर सोसायटी आफ़ इन्डिया के ताजा तरीन रिपोर्ट के अनुसार बिहार में कम्प्यूटर उपभोक्ताओं की संख्या में प्रत्येक वर्ष करीब 1-87 गुणा वृद्धि हो रही है। यानि कम्प्यूटर जानने वालों और उसका उपयोग करने वालों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। इसका प्रभाव सूबे के कम्प्यूटर बाजार पर भी पड़ा है। लेटेस्ट माडल के कम्प्यूटरों की मांग बढने का ही परिणाम है कि आज सूबे में लेटेस्ट मादल के कम्प्यूटर आसानी से उपलब्ध हैं। जाहिर तौर पर यह ट्रेंड इशारा करता है कि सूबे में हार्डवेयर का डिमांड बढा है। इसका एक कारण और भी है कि सरकारी महकमों में तेजी से कम्प्यूटरीकरण किया जा रहा है। इस परिस्थिति में जबकि सूबे में हार्डवेयर का डिमांड बढा है और सूबे में हार्डवेयर इंडस्ट्री के लिये अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध है। इसके बावजूद ताज्जुब यह है कि सरकार द्वारा बनाये जा रहे आईटी पालिसी में हार्डवेयर को कोई जगह नहीं दी जा रही है। दक्षिण कोरिया में विश्व प्रसिद्ध कंपनी सैमसंग बतौर चिप डिजायनर काम कर चुके विभूति विक्रमादित्य बताते हैं कि हार्डवेयर के प्रति नकारात्मक रवैया न केव्ल बिहार में है, बल्कि पूरे भारत में है। सभी केवल साफ़्टवेयर को ही आईटी का पर्याय मानते हैं। जबकि भारत में हार्डवेयर के क्षेत्र में असीम संभावनायें है। विशेषकर बिहार में मानव संसाधन की कोई समस्या ही नहीं है। आसानी से कम्प्यूटर के अकुशल जानकारों को प्रशिक्षण देकर मानव संसाधन की कमी को दूर किया जा सकता है।` दक्षिण भारत के राज्य साफ़टवेयर हब के रुप में स्थापित हो चुके हैं। जबकि उत्तर भारत के राज्यों में हार्डवेयर को प्रोत्साहित किया जाये तो निश्चित तौर पर असीम संभावनायें दिखती हैं। दिल्ली में तो परोक्ष रुप से सभी तरह के इलेक्ट्रानिक उत्पादों की नकल की जाती है। सवाल यह है कि जब नकल किया जा सकता है तो फ़िर नये उत्पादों का सृजन क्यों नहीं किया जा सकता है? श्री विक्रमादित्य का यह भी कहना है कि हार्डवेयर के क्षेत्र में असेम्बलिंग यानि विभिन्न उत्पादों का संयोजन कर देश से बाहर जाने वाली मुद्रा बचाई जा सकती है। इसका उदाहरण देते हुए इन्होंने कहा कि देश में अनेक कम्प्यूटर कंपनियां हैं जो केवल असेम्बलिंग का ही काम करती हैं और अच्छा मुनाफ़ा कमाती हैं। बताते चलें कि श्री विक्रमादित्य पहले बिहारी हैं जिन्होंने वीएलएसआई तकनीक पर आधारित माइक्रोचिप का निर्माण किया है। सूबे के उद्योग मंत्री का नया धंधा यह कोई आरोप नहीं है और इस मामले में हम राज्य सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह पूरे मामले की जांच कराये और समुचित न्यायसम्मत कार्रवाई करे। आखिर राज्य सरकार स्वयं भी कहती है कि वह सूबे में न्याय के साथ विकास कर रही है। मामला सूबे के उद्योग मंत्री डा रेणु देवी कुशवाहा से जुड़ा है। अपना बिहार के संपादक को लिखे एक पत्र में एक बिहारवासी ने डा कुशवाहा पर घुस मांगने का आरोप लगाया है। शिकायतकर्ता ने बताया है कि वह एक रुग्न औद्योगिक इकाई के मालिक हैं और अपनी इकाई को फ़िर से स्थापित करना चाहते हैं। इस संबंध में रुग्नता प्रमाण पत्र दिये जाने के बावजूद जब सूबे के उद्योग विभाग से उन्हें कोई सहायता नहीं मिली तब शिकायतकर्ता ने इस संबंध में उद्योग मंत्री से गुहार लगाया। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि माननीया मंत्री के साथ उनके अच्छे संबंध हैं और इसी संबंध के आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया था कि वह उनके साथ न्याय करेंगी। परंतु, दो दिनों के बाद उन्हें मंत्री जी के आवास से एक फ़ोन किया गया कि 10 लाख रुपये दे दिजीये, आपका काम हो जायेगा। बहरहाल, यह खबर हम इसलिये प्रकाशित कर रहे हैं ताकि कार्रवाई हो सके। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कथित तौर पर जो कदम उठाये जाने के दावे किये जा रहे हैं, उसकी पुष्टि हो सके। संभव है कि जब इस मामले की जांच होगी तो अनेक मामले निकलकर सामने आयेंगे। संभव है कि यदि बिहार सरकार द्वारा इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई की गई तो सूबे के व्यवसायियों का विश्वास सरकार पर बढेगा। जाहिर तौर पर इसका लाभ तो बिहार को ही मिलेगा। बिहार में उद्योग लगायें, जमीन मुफ़्त में पायें बिहार सरकार सूबे में औद्योगिक निवेश के प्रति कृतसंकल्पित है। इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार अब उद्यमियों को खुला आफ़र देने जा रही है। सरकार की नई पेशकश के अनुसार अब सूबे में उद्योग लगाने वालों को राज्य सरकार की ओर से तमाम सुविधाओं के साथ-साथ जमीन भी मुफ़्त में दी जायेगी। वैसे यह अलग बात है किय सुविधा केवल उन्हीं उद्यमियों को मिलेगी, जो सूबे में 500 करोड़ रुपये से अधिक निवेश करेंगे। राज्य सरकार द्वारा बनाई गई औद्योगिक नीति 2011 अंतिम चरण में है। विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो कुछ दिनों के अंदर ही इसे राज्य मंत्रिमंडल में पेश किया जायेगा और इसे शतप्रतिशत मंजूरी मिलने के आसार हैं। विचाराधीन नयी औद्योगिक नीति में राज्य सरकार उद्यमियों के हितों की रक्षा के लिये हर सीमा को पार करने को तैयार है। इसका एक उदाहरण यह है कि सूबे में निवेश की इच्छा रखने वाले छोटे उद्यमियों(500 करोड़ रुपये से कम निवेश करने वाले) को भी राज्य सरकार द्वारा इकाई स्थापना हेतु जमीन क्रय किये जाने पर स्टाम्प शुल्क से मुक्त रखा गया है। इसके अलावा उन्हें पोस्ट प्रोडक्शन सुविधाओं से नवाजे जाने की फ़ुलप्रुफ़ तैयारी की गई है। इतना ही नहीं, नये औद्योगिक नीति में रुग्नता यानि उद्योग के नहीं चलने पर भी राज्य सरकार की ओर से उद्यमियों को अनेक प्रकार के राहत पैकेज दिये जाने की संभावना है। सरकार यह मानती है कि औद्योगिक रुग्नता औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया का एक अंग है। हालांकि इसके फ़लस्वरुप बेरोजगारी, पूंजी निवेश का अवरुद्ध होना, राजस्व की हानि एवं परिसम्पत्तियों का उपयोग नहीं हो पाता है। इसलिये राज्य सरकार भी यह मानती है कि रुग्न उद्योगों के पुनर्जीवन हेतु विशेष कदम उठाये जाने चाहिये। यही वजह है सरकार ने अपनी नई औद्योगिक नीति में कई सुधार किये हैं। मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार रुग्न हो चुके उद्योगों के पुनर्वास हेतु राज्य स्तरीय शीर्षस्थ कमेटी का निर्माण करेगी, जिसके अध्य्क्ष राज्य के औद्योगिक निदेशक होंगे। यह कमेटी सभी प्रकार के वैधानिक शक्तियों से लैस होगी। ताकि रुग्न उद्योंगों की समस्याओं का निराकरण किया जा सके। इसके लिये यह कमेटी एक निजी एजेंसी के चयन का अधिकार भी रखेगी, जो रुग्न उद्योगों के पुनर्जीवन पैकेज का निर्माण करेगी। नई नीति के अनुसार अब उद्यमियों को प्रत्येक वर्ष रुग्नता प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि पुनर्जीवन पैकेज के तहत ही इसकी सारी व्यवस्था निहित होगी। यह कमेटी बीमार उद्योगों की बीमारी का पहचान तीन माह के अंदर कर उसका औद्योगिक इलाज शुरु कर देगी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि रुग्न घोषित किये जा चुके औद्योगिक इकाइयों के पुनर्जीवन पैकेज का लाभ एक बार नहीं, बल्कि दो बार मिलेगी। इसका मतलब यह है कि यदि कोई उद्यमी अपने रुग्न इकाई को बंद कर नया उद्यम लगाना चाहेगा तो उसे पूर्व में रुग्न एवं बंद इकाई के रुप में प्राप्त सुविधाओं के तहत दी गई राशि की मात्रा अब नई नीति के तहत प्रस्तावित देय राशि में जो अंतर होगा, उसी का भुगतान करना पड़ेगा। बहरहाल, यह भी उल्लेखनीय है कि 500 करोड़ रुपये से अधिक निवेश करने वालों को पहले जमीन खरीदना होगा और उन्हें भी स्टांप शुल्क का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा राज्य सरकार उन्हें जमीन खरीदने में हुए खर्च की भरपाई प्रतिपूर्ति के रुप में करेगी। यह नीति और भी तर्क संगत होती अगर राज्य सरकार कुटीर और छोटे उद्योगों के लिये भी इसी प्रकार की नीति और संकल्पों का निर्धारण करती। रंग लायेगी किशनगंज की बिहारी चाय अगर आप आसाम और दार्जिलिंग की चाय पीते पीते बोर हो चुके हैं तो बहुत जल्द ही आपकी बोरियत दूर होने वाली है। इसकी वजह यह है कि राज्य में अब चाय को उद्योग का दर्जा मिलने जा रहा है और संभावना यह व्यक्त की जा रही है कि बहुत जल्द ही किशनगंज जिले में उत्पादित चाय बिहारी चाय की खुश्बू से आप दिन की बेहतर शुरुआत कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि राज्य के सीमांचल जिलों में बड़े पैमाने पर चाय की खेती होती है। हालांकि बिहार में उपजायी गई चाय का असली लाभ पश्चिम बंगाल की बड़ी कंपनियों को मिल जाता है। इसकी वजह यह है कि सूबे में चाय प्रसंस्करण की कोई इकाई नहीं है। चाय उद्योग को स्थापित करने के संबंध में जहां एक ओर सरकार भी संवेदनशील नजर आती है। वही उद्यमी संगठन भी बिहार की इस संभावना को सबसे अधिक फ़ायदेमंद बताते हैं। बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के पूर्व अध्यक्ष पी के अग्रवाल बताते हैं कि राज्य सरकार को चाय उद्योग को मान्यता प्रदान करना चाहिये और इसकी संभावना को देखते हुए इसके लिये अलग से प्रोत्साहन नीति बनाई जानी चाहिये। ये बताते हैं कि सीमांचल जिलों में मिट्टी चाय की खेती के लिये उपयुक्त है। इन जिलों में बंजर और बेकार पड़ी जमीन को चाय उत्पादन की इच्छा रखने वाले उद्यमियों को 90 वर्ष की लीज पर दे दी जानी चाहिये। हालांकि बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1961 के सेक्शन 29(2)(ब)(4) में उल्लेखित है कि चाय की खेती करने वाले किसानों को यह लाभ दिया जा सकता है। उधर राज्य सरकार भी चाय उद्योग की संभावना को देखते हुए सकारात्मक पहल करने जा रही है। संभावना यह है कि बहुत जल्द घोषित होने वाली औद्योगिक नीति में इस उद्योग के लिये विशेष कार्ययोजना बनाई जा सकती है। सरकारी नियमावली में चाय उद्योग के विकास के लिये चाय की खेती और उसकी पैकेजिंग को विशेष उद्योग का दर्जा हासिल होगा। इसके तहत चाय उद्यमियों को भी वही लाभ मिल सकेगा, जो अन्य क्षेत्रों के उद्यमियों को मिलता है। हालांकि यह सुविधा उन्हें उत्पादन प्रारंभ करने के बाद ही मिलेगी। बहरहाल, इस संबंध में उद्योग विभाग के प्रधान सचिव सी के मिश्रा का कहना है कि चाय प्रसंस्करण की इकाई की सफ़लता के लिये यह आवश्यक है कि कम से कम 250 से 300 एकड़ भूमि में चाय की खेती हो। परंतु, वर्तमान में अभी यह स्थिति नहीं है। लोग छोटे-छोटे आकार के खेतों में चाय की खेती करते हैं। इसके बावजूद ये चाय की संभावनाओं के प्रति आशावान हैं। स्थानीय उद्यमी ही बिहार के असली ब्रांड ऐम्बेस्डर स्थानीय उद्यमी ही बिहार के असली ब्रांड ऐम्बेस्डर हैं। इनकी सफ़लता से प्रभावित होकर ही बाहरी निवेशक सूबे में निवेश के लिये आकर्षित होंगे। यही वजह है कि राज्य सरकार सूबे के उद्यमियों की समस्याओं के निराकरण के लिये प्रतिबद्ध है। इस आशय की जानकारी राज्य के उद्योग विभाग के प्रधान सचिव सी के मिश्रा ने बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के विशेष बैठक में कहीं। इन्होंने स्वीकार किया कि राज्य सरकार की जिम्मेवारी केवल उद्यमियों की समस्याओं का निराकरण करना है। राज्य की मौजूद औद्योगिक नीति और बहुत जल्द घोषित होने नई औद्योगिक नीति दोनों देश के सर्वश्रेष्ठ औद्योगिक नीतियों में से एक है। सवाल औद्योगिक नीतियों का नहीं बल्कि नीतियों के क्रियान्वयन का है। इन्होंने सरकारी तंत्र की विफ़लता को स्वीकार करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा सिंगल विंडो सिस्टम लागू कर दिया गया, परंतु आजतक इसे मूर्त रुप नहीं दिया जा सका है। चैंबर आफ़ कामर्स के सदस्यों द्वारा उठाये गये सवालों के सबंध में श्री मिश्रा ने कहा कि कोई भी उद्योग सरकारी नीति पर ही आश्रित नहीं होती है। इन्होंने कहा कि सूबे के उद्योग जगत के समक्ष मुख्यतः दो प्रकार की समस्यायें हैं। इनमें 90 फ़ीसदी समस्यायें बिजली से जुड़ी हैं, जिसके निराकरण के लिये मुख्यमंत्री के द्वारा भी पहल किया जा रहा है। शेष समस्याओं के लिये बियाडा एवं अन्य संबंधित संस्थाओं को पारदर्शी बनाये जाने की कवायद की जा रही है। श्री मिश्रा ने उद्यमियों को भरोसा दिलाया कि नये औद्योगिक नीति में उनकी सभी समस्याओं के निराकरण का प्रयास किया गया है। इन्होंने उद्यमियों से अधिक से अधिक निवेश करने की अपील की ताकि सूबे में औद्योगिक निवेश में तेजी आये। इससे पहले चैंबर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष ओ पी शाह ने श्री मिश्रा का स्वागत करते हुए उन्हें बियाडा और बिजली के संबंध में उद्यमियों को होने वाली परेशानियों से अवगत कराया। पूर्व अध्यक्ष पी के अग्रवाल ने भी चैंबर की ओर से ज्ञापन सौंपते हुए विभिन्न समस्याओं के संबंध में प्रधान सचिव का ध्यान आकृष्ट किया। वही उद्यमी के एन वार्षणेय ने श्री मिश्रा को उद्यमियों को होने वाली जमीनी दिक्कतों के बारे में सविस्तार जानकारी दी। आंखों देखी - एक कोशिश अपनी किस्मत खुद लिखने की उस व्यक्ति का नाम अरूण कुमार है। इनकी खासियत यह है कि ये अपनी पत्नी और अन्य परिजनों के साथ मिलकर अपनी किस्मत खुद लिखने में लगे हैं। करीब 8 साल पहले इन्होंने लगभग 65 हजार रुपये की लागत से अपने घर में तुलिका फ़्रैग्नेंश नामक अगरबत्ती बनाने की फ़ैक्ट्री की स्थापना की। फ़िर बीच-बीच में मिले बैंकिंग सहायता के सहारे और अपनी मेहनत के बूते अरूण ने अपनी पहचान एक अगरबत्ती निर्माता के रुप में स्थापित कर ली है। आज इनकी पहचान बच चुका है गाय के गोबर से बनाया जाने वाला खास धूप, जो अपने आप में अनूठा है। वर्तमान में इनके उत्पाद दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, झारखंड और कर्नाटक आदि राज्यों में उपलब्ध हैं। वैसे इनके उद्यम की एक और खासियत यह है कि इन्होंने अपने आस-पास के लोगों को उद्यमी बना दिया है। अब लोग मजदूर के रुप में नहीं, बल्कि एक उद्यमी के रुप में अरूण के प्रयास को आगे बढाने में लगे हैं। इनकी सफ़लता प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी। उद्यमियों ने किया फ़्यूल सरचार्ज का विरोध राज्य के उद्यमियों ने बिहार राज्य विद्युत बोर्ड पर मनमाने तरीके से फ़्यूल सरचार्ज लगाये जाने के निर्णय का विरोध किया है। कल स्थानीय बीआईए सभागार में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में अध्यक्ष एस पी सिन्हा ने कहा कि बोर्ड द्वारा फ़्यूल सरचार्ज के नाम पर 99 पैसे प्रति युनिट की दर से चार्ज किया जा रहा है। इन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 1996-97 में तत्कालीन राज्य सरकार फ़्यूल सरचार्ज वसूला गया। जिसके कारण राज्य के सैंकड़ों औद्योगिक इकाइयां बंद हो गईं। एक बार फ़िर राज्य के उद्योगों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इन्होंने बताया कि बोर्ड द्वारा दिनांक 8 मार्च 2011 को सभी तरह के उपभोक्ताओं पर 99 पैसे प्रति यूनिट की दर से फ़्यूल सरचार्ज लिये जाने का आदेश जारी किया गया। इससे पहले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उद्यमियों की मांग पर सरकार द्वारा पूर्व से लगाये गये 69 प्रति यूनिट का फ़्यूल सरचार्ज वापस ले लिया गया था। श्री सिन्हा ने बताया कि बोर्ड 65 फ़ीसदी बिजली एनटीपीसी से खरीदती है जबकि 35 फ़ीसदी आपूर्ति जल विद्युत श्रोतों से होता है। एनटीपीसी के रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया है कि पिछले 6 सालों में एनटीपीसी प्रति युनिट ईंधन के खर्च में कुल वृद्धि केवल 48 पैसे हुई है। इन्होंने यह भी बताया कि बिहार राज्य विनियामक समिति द्वारा बिजली दरों में केवल 5 पैसे प्रति यूनिट की दर से वृद्धि की गई। जबकि बोर्ड द्वारा अलग से 99 पैसे प्रति यूनिट की दर से सरचार्ज लिया जा रहा है, जो पूर्णतया गलत है। इस अवसर पर बिहार चैम्बर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष ओ पी शाह, पूर्व अध्यक्ष पी के अग्रवाल, बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष के पी झुनझुनवाला, महासचिव रामलाल खेतान और संजीव चौधरी सहित अनेक उद्यमी उपस्थित थे। बिहारी उद्यमिता की नई मिसाल - हवा के सहारे चांद को छुने का सपना उसका नाम रमेश राजभर है। वह बक्सर जिले के लालगंज छावनी का निवासी है। उसकी शैक्षणिक योग्यता न के बराबर है। इसके बावजूद उसकी आंखों में एक सपना है। सपना है हवा के सहारे चांद पर जाना। इनका कहना है कि चांद पर जाने में एक स्पेसयान में कितना ईंधन खर्च होता होगा, यदि उनसे आविष्कार को अमल में लाया जाये तो इस प्रकार के किसी ईंधन की आवश्यकता ही नहीं होगी और आदमी केवल हवा के सहारे चांद पर जा सकता है। दरअसल रमेश ने इंजन का एक माडल विकसित किया है। इस माडल की खासियत यह है कि इसमें हवा के दबाव से इंजन को गतिमान किया जा सकता है। इनके माडल में एक हवा टैंक है, बिल्कुल वैसे ही जैसे बड़े वाहनों में होते हैं और ब्रेक काम करते हैं। इस टैंक से एक पाइप के सहारे हवा निकलने का प्रयास करती है, और जैसे अंतः दाह्य इंजन में धुएं के दबाव के कारण पिस्टन गतिमान हो जाता है। इसी प्रकार रमेश के इंजन में लगा पिस्टन भी गतिमान हो जाता है। अंतर केवल इतना है कि सामान्य स्थितियों मे धुएं को बाहर उत्सर्जित कर दिया जाता है, जबकि रमेश ने निकलने वाली हवा को एक दूसरे पाइप के सहारे फ़िर से वापस टैंक में भेज दिया है। इस प्रकार जितनी हवा टैंक से निकलती है, ठीक उतनी ही हवा टैंक में वापस चली जाती है। इस प्रकार हवा के निकलने और वापस आने के क्रम में पिस्टन अनंतकाल तक चलाया जा सकता है। रमेश राजभर की खासियत यह है कि उसने ये थ्योरी के बजाय सचमुच का इंजन बनाया है। इस इंजन में डायनेमो लगाकर बिजली पैदा कर रमेश ने बिजली संकट से जुझ रहे बिहार को एक नया संदेश देने का प्रयास किया है। इनका कहना है कि यदि इनके आविष्कार पर अमल किया जाये तो देश में पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जायेगी और इससे पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होगा। कैंसर के इलाज में सिरमौर बन सकता है बिहार आने वाले समय में यदि सबकुछ सही रहा तो निश्चित तौर पर जानलेवा कैंसर पर विजय पाया जा सकता है। इस विजय का श्रेय बिहार को मिल सकता है। रोहतास के रहने वाले आयुर्वेदिक चिकित्सक डा के पी सिन्हा ने एक दवा का आविष्कार किया है। इस दवा की खासियत यह है कि इससे कैंसर पर विजय पाया जा सकता है। इससे पहले कि डा सिन्हा के दावों की बात करें, यह उल्लेखनीय है कि उनके प्रयास पर अब बिहार के विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों की नजर है। दवा के प्रभाव को देखने के बाद ही बिहार ब्रेन सोसायटी (जिसने सूबे में अंतरराष्ट्रीय स्तरीय विज्ञान कांफ़्रेंस का आयोजन किया था) के विशेषज्ञों की टीम ने डा सिन्हा को अभी हाल ही में मुजफ़्फ़रपुर के लंगट सिंह कालेज परिसर में आयोजित किये कांफ़्रेंस के दौरान पोस्टर प्रदर्शनी लगाने की अनुमति दी थी। इस संबंध में बिहार ब्रेन सोसायटी के संस्थापक एवं दक्षिण कोरिया में कार्य कर चुके इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियर विभूति विक्रमादित्य ने बताय कि उनकी दवा का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। इस कारण सोसायटी के सदस्यों ने डा सिन्हा की दवा को परीक्षण के लायक माना है। सोसायटी की ओर से इनकी दवा को भारतीय चिकित्सा शोध परिषद को भेजने की प्रक्रिया को अंतिम स्वरुप दिया जा रहा है। इन्होंने बताया कि दवा अचूक है अथवा नहीं या उपयोग के लायक है या नहीं, अभी कुछ भी कहना संभव नहीं है। भारतीय चिकित्सा पद्धति के वैज्ञानिक मानदंडों पर खरा उतरने के लिये अनेक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। सोसायटी की ओर से इस संबंध में डा सिन्हा को हर संभव सहायता दी जायेगी। वैसे दवा के आविष्कारक डा के पी सिन्हा ने बताया कि विज्ञान इस तथ्य को स्वीकारता है कि सजीव शरीर में रस और रक्त की अहम भूमिका होती है। यदि रस और रक्त का सामंजस्य बना रहे तो निश्चित तौर पर शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है। इसीसे सिद्धांत के आधार पर उन्होंने अपनी दवा को विकसित किया है। इन्होंने इस दवा का नाम गैंग्रीनाल फ़ोर्ट रखा है। इसके उपयोग के बारे में डा सिन्हा ने बताया कि इसका असर संक्रमित हिस्से पर लेप लगाने के आधे घंटे के बाद देखा जा सकता है। इसके अलावा शरीर के आंतरिक हिस्से में संक्रमण होने की स्थिति में इस दवा को पीने से भी समान लाभ मिलता है। यह कैंसर जनित दर्द को खत्म कर देता है। इसके अलावा इसके लगातार उपयोग से कैंसर से होने वाली मौत को टाला जा सकता है। डा सिन्हा के दावों के बारे में कैंसर विशेषज्ञ डा दिवाकर तेजस्वी ने बताया कि बिहार ब्रेन सोसायटी के विशेषज्ञ समिति का सदस्य होने के नाते उन्होंने इस उत्पाद के प्रभावों को देखा है। परंतु अभी इसके लिये भारतीय चिकित्सा शोध परिषद की स्वीकृति मिलना आवश्यक है। इन्होंने कहा कि यदि यह उत्पाद सभी प्रकार के मानदंडों को पूरा करने में सफ़ल होता है तो निश्चित तौर पर बिहार के लिये यह गर्व का विषय होगा। बहरहाल डा सिन्हा अपने उत्पाद को लेकर आशावान हैं और समाज से सहयोग की उम्मीद रखते हैं। इनका कहना है कि यह बिल्कुल गैर हानिकारक दवा है और अबतक इन्होंने कैंसर के सैंकड़ों मरीजों का सफ़ल इलाज किया है। ये भी चाहते हैं कि भारतीय चिकित्सा शोध परिषद उनके उत्पाद को जांचे-परखे तभी मान्यता प्रदान करे। जन्नत और जहन्नुम एक साथ, हाल हस्तकरघा उद्योग का विगत 16 फ़रवरी से सिन्हा लाईब्रेरी परिसर गुलजार है। इसके गुलजार होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि इन दिनों भारत सरकार और राज्य सरकार के संयुक्त तत्वावधान में हैंडलुम एक्सपो का आयोजन किया गया है। इस हाइप्रोफ़ाइल मेले में देश भर से अनेक बुनकर और हैंडलुम व्यापारी अपने-अपने उत्पाद लेकर आये हैं। इनकी कुल संख्या 65 है और इनमें बिहार के हैंडलुम उद्यमियों की संख्या भी 13 है। इस एक्सपो में जन्नत और जहन्नुम दोनों का नजारा एक साथ देखा जा सकता है। मसलन बुनकरों के हाथ का कमाल देखकर आप भी यही कहेंगे कि यह जन्नत है। मेले में सभी स्टालों पर लोगों की भीड़ आने वाले कल का सुखद संकेत देती है कि आज 21वीं सदी में भी सरकार चाहे तो देश में गांधी जी के चरखे को विकास के माडल में शामिल किया जा सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि इस मेले में प्रतिदिन 7 से 8 लाख रुपये के बीच की खरीद-फ़रोख्त हो रही है। मेले के संचालक सरकारी कर्मी ने बताया कि 23 फ़रवरी तक इस मेले में कुल 41 लाख रुपये की बिक्री हो चुकी है। हालांकि इसमें बिहार के बुनकरो के हिस्से में केवल 2 लाख 37 हजार रुपये ही आये हैं। बिहार के बुनकर व्यवसायियों की स्थिति के कारण ही इस मेले में जहन्नुम का भी दर्शन होता है। बांका जिले के अमरपुरा प्रखंड स्थित बुनकर केंद्र चलाने वाले मो असलम अंसारी ने बताया बिहार के बुनकरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रतिस्पर्द्धा में बने रहने की है। कच्चे माल की कमी, बिजली एवं पानी की कमी और सरकारी संरक्षण के अभाव में बुनकर बदहाली में जीने को विवश हैं। इन्होंने बताया कि उनके अमरपुरा में पहले 10000 से अधिक लोग इस व्यवसाय में लगे थे, लेकिन अब केवल 200-250 लोग ही रह गये हैं। राज्य में हस्तकरघा उद्योग के मामले में 3 फ़ीसदी की ॠणात्मक प्रगति की स्वीकारोक्ति राज्य सरकार द्वारा हाल ही में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में की गई है। हालांकि राज्य सरकार के अनुसार बिहार में बुनकरों की संख्या 1 लाख 4 हजार के आसपास है। इसके अलावे इस उद्योग के विकास हेतु अनेक योजनायें बाबा आदम के जमाने से ही चली आ रही हैं। इनमें रेशम के कीड़ों के पालन से लेकर बुनकरों `का प्रशिक्षण आदि शामिल हैं। बहरहाल बिहार बदल रहा है और इसके संबंध में अनेक दावे किये जा रहे हैं। परंतु, वास्तविक विकास के लिये यह आवश्यक है कि सरकार हस्तकरघा उद्योग को आगे बढाने के लिये सतही तरीके से कदम बढाये। मसलन कच्चे माल की आपूर्ति, डिजायनिंग तकनीक, सस्ते दर पर लोन, बुनियादी आवश्यकतायें यथा बिजली और पानी एवं सरकारी संरक्षण उपलब्ध कराने से संभव है कि आने वाले वर्षों में गया बंएक बार फ़िर मैनचेस्टर के रुप में स्थापित हो जाये। भागलपुर का सिल्क उद्योग पूरी दूनिया में बिहार का नाम ऊंचा कर सके। ऐसा जल्द हो, इसके लिये सरकार द्वारा इमानदार पहल की आवश्यकता है।
रिक्शा रैली निकालेंगे इरफ़ान क्रिकेट विश्वकप में भारत के खिलाड़ियों के उत्साहवर्द्धन के लिये सम्मान फ़ाउंडेशन और टाई के संयुक्त तत्वावधान में आज शहर में रिक्शा रैली आयोजन किया जायेगा। इस आशय की जानकारी फ़ाऊंडेशक के संस्थापक इरफ़ान आलम ने दी। इन्होंने बताया कि रैली में बारह रिक्शों पर सूबे के विभिन्न क्षेत्रों के चुनिंदा प्रतिनिधि शामिल होंगे। बताते चलें कि ढाका में आयोजित क्रिकेट विश्वकप के उद्घाटन समारोह के दौरान प्रतियोगिता में भाग ले रहे सभी टीमों के कप्तानों ने रिक्शे पर सवार होकर समारोह में भाग लिया था। इरफ़ान बताते हैं कि इससे पहले चीन में हुए ओलंपिक के दौरान भी उन्होंने रिक्शा रैली निकाला था और भारत को गोल्ड मिला था। आस्ट्रीक कम्प्यूटर को मिला सर्वश्रेष्ठ सेवा प्रदाता का सम्मान पूर्वी भारत में उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिये राज्य की प्रतिष्ठित कम्पूटर सेवा प्रदाता कंपनी आस्ट्रीक कम्प्यूटर को सर्वश्रेष्ठ सेवा प्रदाता का सम्मान दिया गया है। इस आशय की जानकारी कंपनी के संस्थापक प्रभात कुमार सिन्हा ने दी। इन्होंने बताया कि दुबई में आयोजित एक समारोह में उनकी कंपनी को यह सम्मान एप्सन की ओर से एप्सन इंडिया के प्रमुख कातो एजी द्वारा दी गई। हैकिंग भी दे सकता है आपके कैरियर को नई ऊंचाई – अंकित फ़ाडिया वर्तमान में भारत में जिस रफ़्तार से आर्थिक विकास हो रहा है, ठीक उसी रफ़्तार से हैकरों द्वारा सूचनायें चुराने और भारत के आर्थिक विकास पर रोक लगाने की साजिश भी की जा रही है। यही कारण है कि नैसकाम ने अपनी रिपोर्ट में प्रतिवर्ष 77 हजार इथिकल हैकर की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसलिये अब इथिकल हैकिंग केवल हाबी ही नहीं, बल्कि कैरियर के लिये भी महत्वपूर्ण बन गया है। ये बातें भारत के सबसे पहले इथिकल हैकर अंकित फ़ाडिया ने “अपना बिहार” से विशेष बातचीत में कहीं। अंकित ने बताया कि वे मूलतः गुजराती हैं। कम्प्यूटर से उनका जुड़ाव केवल 10 साल की उम्र में ही शुरु हो गई थी, जब उनके माता-पिता ने उन्हें उनके जन्मदिन पर एक कम्प्युटर तोहफ़े के रुप में दिये। दो साल के अंदर ही अंकित ने हैकिंग की दूनिया में कदम रखा और केवल 14 साल की उमर में ही वे भारत के सबसे पहले इथिकल हैकर बन गये और उन्होंने हैकिंग पर किताब लिखने वाले पहले भारतीय बन गये। इन्होंने पहली बार “द अन आफ़िशियल गाइड टू इथिकल हैकर” लिखा। वर्तमान में अंकित पूरी दूनिया में 1000 से अधिक सेमिनारों में भाग लेकर लोगों को हैकिंग से बचने के तकनीक सीखा चुके हैं। अंकित बताते हैं बिहार में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है और यदि राज्य सरकार समुचित इंतजाम करे तो निश्चित तौर पर बिहार के युवा भी अपने सूबे के विकास में आगे आ सकेंगे। इन्होंने बताया कि ये हैदराबाद पुलिस को साइबर क्राइम से निबटने के तकनीक सीखा चुके हैं। यदि बिहार सरकार चाहेगी तो वे बिहार पुलिस को भी साइबर क्राइम से संबंधित प्रशिक्षण देने को तैयार हैं। इससे इन्हें खुशी होगी। सरकारी नीति से परेशान आत्महत्या करने पर मजबूर है एक युवा उद्यमी उसका नाम अजय कुमार है और वह राजधानी पटना के बिहटा प्रखंड स्थित अमहारा गांव का निवासी है। उसने अमहारा में राइस मिल स्थापित करने हेतु बैंक से 44 लाख रुपये का ॠण लिया है। उसने पिछले साल जनवरी में ही बिजली कनेक्शन लेने के लिये आवेदन दिया था। परंतु, आजतक अजय को बिजली कनेक्शन नहीं मिला है और इस कारण इनका राइस मिल पूरी तरह तैयार रहने के बावजूद उत्पादन करने में असमर्थ है। इधर बैंक के कर्जे और ब्याज की बढती राशि को लेकर अजय निराश हैं। इन्होंने अपना बिहार को बताया कि बिजली कनेक्शन के लिये इन्होंने ऊपर तक आवेदन दिया है, लेकिन अभीतक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। इन्होंने कहा कि यदि जल्द ही उन्हें बिजली कनेक्शन नहीं दिया गया तो वे आत्महत्या करने पर मजबूर होंगे और इसकी पूरी जिम्मेवारी राज्य सरकार की होगी। विकसित बिहार के लिये सामूहिक प्रयास पर जोर सूबे में परिस्थतियां बदली हैं और कानून का राज स्थापित हुआ है। इस कारण राज्य के उद्यमियों का आत्मविश्वास बढा है। इससे राज्य में उद्योगों के क्षेत्र में निवेश का माहौल बना है। परंतु, विकसित बिहार का सपना सामूहिक प्रयास से ही संभव है। ये बातें राज्य की उद्योग मंत्री डा रेणु देवी कुशवाहा ने बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन के तत्तावधान में रूग्ण और बंद पड़े औद्योगिक इकाइयों के जीर्णोद्धार विषयक कार्यशाला में अपने संबोधन में कहीं। उद्योग मंत्री ने बिहार की बदहाली का ठीकरा राज्य के बैंकों पर फ़ोड़ते हुए कहा कि बैंक मैनेजर बदली हुई परिस्थिति में भी राज्य के उद्यमियों पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। अन्य राज्यों में ये बैंक जिस तरीके से वहां के विकास में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं, उस हिसाब से ये बिहार में दिलचस्पी नहीं लेते हैं। इन्होंने कहा कि बैंकों को कृषि के क्षेत्र में विकास हेतु आगे आना चाहिये, क्योंकि उद्योगों के लिये कच्चे माल का एकमात्र श्रोत कृषि हैं। इन्होंने जोर देते हुए कहा कि जबतक कृषि का विकास नहीं होगा, तबतक उद्योगों का विकास असंभव है। इससे पहले अपने संबोधन में राज्य के उद्योग विभाग के प्रधान सचिव सी के मिश्रा ने कहा कि बिहार में औद्योगिक इकाइयों के बंद होने के जिम्मेवार सभी घटक हैं। इसमें राज्य सरकार की नीतियों से लेकर बैंक और स्वयं उद्यमी भी जिम्मेवार हैं। इन्होंने बेबाकी से स्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी विभागों में निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने में अनिश्चितकालीन विलंब होता है। लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि जब कोई औद्योगिक इकाई बंद होती है अथवा बीमार होती है, तो इसका सबसे बड़ा कारक वित्तीय संस्थाओं का असहयोग और फ़िर उद्यमियों की इच्छाशक्ति भी जिम्मेवार होती है। इन्होंने एक्जिट पालिली को सुगम बनाने जाने पर जोर देते हुए कहा कि यदि कोई उद्यमी अपनी इकाई बंद करना चाहता है तो उसे इसकी पूरी आजादी मिलनी चाहिये, लेकिन इसके साथ ही एक नये उद्यम की शुरुआत भी होनी चाहिये, ताकि औद्योगिक संतुलन बना रहे। सूक्ष्म एवं लघु उद्यमिता विकास संस्थान, भारत सरकार के निदेशक डी के सिंह ने अपने संबोधन में जोर देते हुए कहा कि बीमार इकाइयों के जीर्णोद्धार के लिये गठित एपेक्स कमेटी की नियमित बैठक होनी चाहिये। इसके अलावा क्मेटी द्वारा दिये गये निर्देशों का समय सीमा के अंदर अनुपालन भी होना चाहिये। इन्होंने भी सरकारी कार्यशैली की आलोचना करते हुए कहा कि उद्यमियों को भी अपनी बंद पड़ी इकाइयों को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहल करना चाहिये। इस अवसर पर भारतीय रिजर्व बैंक के क्षेत्रीय निदेशक जी महालिंगम ने कहा कि वे बैंकों के खिलाफ़ शिकायत मिलने पर कार्रवाई करेंगे। इससे पहले बीआईए के अध्यक्ष एस पी सिन्हा ने कहा कि बिहार में बंद पड़े औद्योगिक इकाइयों के बारे में सविस्तार जानकारी दी और इसके लिये विशेष फ़ंड की व्यवस्था करने की मांग की। इस कार्यशाला में राज्य के बंद पड़े अनेक इकाइयों के संचालकों ने अपनी पीड़ा व्यक्त की। सभी ने एक स्वर में कहा कि जबतक सरकारी खरीद नीति में स्थानीय उद्यमियों को संरक्षण नहीं दी जायेगी, तबतक उद्योगों के बंद होने का सिलसिला नहीं रुकेगा। एन के सिंह ने दिये विकास के दस सूत्र जदयू के वरिष्ठ सांसद नंद कुमार सिंह ने कल बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन के तत्वावधान में आयोजित “कैटलाइजिंग इन्वेस्टमेंट इन बिहार” विषयक कार्यशाला में विकास के दस सुत्र प्रस्तुत किया। अपने सम्बोधन में श्री सिंह ने बताया कि सूबे के विकास के लिये यह आवश्यक है कि मानव संसाधन के बेहतर इस्तेमाल के लिये कौशल प्रशिक्षण आयोग का गठन किया जाये। ऐसोचेम द्वारा अनुसंशित विशेष औद्योगिक प्रक्षेत्रों यानि कल्स्टरों की चर्चा करते हुए श्री सिंह ने कहा कि प्रत्येक कलस्टर के लिये राज्य सरकार की ओर से विशेष टीम का गठन किया जाना चाहिये। इन्होंने कृषि आधारित उद्योगों को प्राथमिकता दिये जाने बात कहते हुए बताया कि इस सत्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि कृषि ही एकमात्र संसाधन है, जिसके द्वारा सूबे के विकास को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। श्री सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा देश में 20 विशेष शोध सह अन्वेषण विश्वविद्यालय खोलने की बात की जा रही है। इन्होंने मांग किया कि केंद्र बिहार में भी एक विश्वविद्यालय की स्थापना करे। राज्य के व्यापार को बढावा देने के लिये ड्राई पोर्ट यानि सूखा बंदरगाह बनाये जाने की जरूरत पर जोर देते हुए श्री सिंह ने कहा कि इसे निकटतम समुद्री बंदरगाह से जोड़ दिया जाना चाहिये। पीपीपी माडल को विकास के लिये आवश्यक मानते हुए श्री सिंह ने कहा कि सामाजिक क्षेत्रों में इस माडल को अपनाकर सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सकता है। हालांकि इन्होंने यह भी कहा कि पीपीपी माडल आम लोगों की सहमति के आधार पर ही क्रियान्वित होनी चाहिये। इन्होंने यह भी कहा कि बिहार के विकास के लिये आवश्यक है कि बिहार की ब्रांडिंग हो और इसके लिये हम सभी बिहारियों को आगे आना होगा। इससे पहले बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष एस पी सिन्हा ने अपने संबोधन में बिहार के उद्यमियों की ओर से उन्हें होने वाली विभिन्न परेशानियों का जिक्र किया। इन्होंने कहा कि सिंगल विंडो सिस्टम पूरी तरह अपना काम नहीं कर रहा है। औद्योगिक नीतियों और योजनाओं के ससमय पूरा नहीं किये जाने के कारण निवेश प्रभावित हो रहा है। इन्होंने गुणवत्तायुक्त बिजली की उपलब्धता का भी सवाल उठाया। इस अवसर पर सीआईआई के अध्यक्ष सत्यजित सिंह ने कहा कि बिहार के स्थानीय उद्यमियों के हितों की रक्षा होनी चाहिये। इसके लिये सरकारी खरीद नीति में भी बदलाव किये जाने की आवश्यकता है। इन्होंने बैंकों की बेरूखी का जिक्र करते हुए बताया कि बिहार का साख जमा अनुपात केवल 30 फ़ीसदी है, जबकि गुजरात में यह 200 फ़ीसदी किये जाने की बात कही जा रही है। इसके लिये कहीं न कहीं राज्य सरकार की नीतियां भी जिम्मेवार हैं। अपने संबोधन में आद्री के संस्थापक शैबाल गुप्ता ने कहा कि मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और प्रधान सचिवों के स्तर पर तो स्थिति बदली है, लेकिन निचले स्तर पर अभी भी अराजकता का माहौल है। जबकि एक निवेशक को केवल सीएम या फ़िर सचिवों के साथ ही नहीं, बल्कि नीचे के अधिकारियों से भी उलझना पड़ता है। इन्होंने भी सिंगल विंडो सिस्टम के फ़ेल होने की बात कही। इस अवसर पर केपीएस केसरी, विजय कोचर, राम लाल खेतान और सुनील सिंह सहित अनेक जाने-माने उद्योगपति उपस्थित थे। सामाजिक उद्यमी जीत सकते हैं 50,000 अमेरिकी डालर बिहार, राजस्थान और उड़ीसा के 13 सामाजिक उद्यमियों को वर्ल्ड बैंक प्रत्येक को 50,000 अमेरिकी डालर देगी। इस आशय की जानकारी इन्टरनेशनल फ़ाइनांस कारपोरेशन के आपरेशन आफ़िसर सुब्रतो बर्म्न ने कल संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वर्ल्ड बैंक द्वारा प्रायोजित इस प्रतियोगिता में वे सभी सामाजिक उद्यमी भाग ले सकते हैं, जो पिछले दो साल से काम कर रहे हैं। इन्होंने बताया कि प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये आवेदन की अंतिम तारीख 23 जनवरी मुकर्रर की गई है और इसे www.dm-india.com पर दर्ज किया जा सकता है। सभी चयनित विजेताओं को आगामी 7 अप्रैल को जयपुर में आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कृत किया जायेगा। अपनी बात – जनता दरबार है या फ़िर कुछ और? बहुत दिनों से सुन रखा था कि बिहार के राजा अपने यहां दरबार लगाते हैं, बिल्कुल उन राजाओं की तरह जो दंतकथाओं में नजर आते हैं। मैं एक छोटा सा उद्यमी हूं और मैंने समस्तीपुर जिले में अगरबत्ती बनाने की एक छोटी सी यूनिट लगा रखा है। चुंकि यूनिट छोटी है, इसलिये मेरी आय भी छोटी है। एक साल पहले मैंने स्थानीय बैंक में लोन के लिये आवेदन किया था। आवेदन देने के 8 महीने बाद तक कोई कार्रवाई होने के बाद मैं निराश हो चुका था। पिछले दिनों मैंने अखबारों के माध्यम से जाना कि केंद्र प्रायोजित एक योजना के मुताबिक एक उद्यमी को 1 करोड़ रुपये तक का लोन बिना किसी गारंटर के दिया जा सकता है। यह उद्घोषणा थी राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी। संभवतः उन्होंने राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की समीक्षा बैठक के दौरान इसकी घोषणा की थी। खैर मैं अपने लोन के बदले गारंटी देने को तैयार हूं। लेकिन आजतक मुझे लोन नहीं मिला। इस कारण मैं अपनी यूनिट का विस्तार करने अक्षम हूं। पिछले दिनों दिसंबर के अंत में ही मैंने निर्णय लिया था कि मैं अपनी समस्या को सूबे के राजा के पास रखूंगा। लेकिन दुर्भाग्य्वश उनकी माता का निधन हो गया और फ़िर मैंने मंगलवार को जनता दरबार में शामिल होने का निर्णय लिया। करीब 5 घंटे तक ठंढ में लाइन में खड़े रहने के बाद मुझे जनता दरबार में अंदर जाने का मौका मिला। मेरे और सूबे के सुशासक के बीच की दूरी नहीं थी। लोग अपने हाथों में आवेदन लेकर उनके पास जा रहे थे। कुछेक मामलों को मुख्यमंत्री देखते और बाद में उसे अपने अधिकारियों के सुपूर्द कर देते थे। इसी बीच झारखंड से आयी एक युवती को सभी मीडियावालों ने घेर लिया। लोग कह रहे थे कि इस युवती के साथ झारखंड के एक आला पुलिस अधिकारी ने सेक्स किया है। यह झारखंड सरकार से निराश होकर बिहार सरकार के पास गुहार लगाने आई है। बाद में मालुम चला कि उसका नाम सुषमा बड़ाईक था। स्वयं मुख्यमंत्री ने भी आगे बढकर उसकी समस्या को ध्यान से सुना और हरसंभव मदद करने की बात कही। मेरा हौसला बढा। करीब पौन घंटे के बाद मेरा नंबर आया। मैं मुख्यमंत्री यानि बिहार के सुशासक को अपना आवेदन देने से पहले अपनी यूनिट द्वारा उत्पादित उत्पादों का एक गिफ़्ट देना चाहता था, लेकिन वह तो बाहर ही सुरक्षा गार्डों ने रखवा लिया था। मैंने सुशासक के समक्ष अपनी पीड़ा रखनी चाही। आदेश मिला कि अप्लीकेशन दिजीये और आगे बढिये। मुख्यमंत्री जी को जाना है। थोड़ी देर के लिये मैं रुका और फ़िर मैंने अपना आवेदन अपनी जेब के हवाले किया। मैं जनता दरबार से बाहर आ गया था। लेकिन मैं निराश नहीं था। निराश इसलिये नहीं था कि बिहार के सुशासन ने मेरी पीड़ा नहीं सुनी, बल्कि भगवान ने मुझे स्वयं को नीचे गिराने से बचा लिया था। अब मैंने निर्णय लिया है कि मैं अपनी छोटी यूनिट का उत्पादन बढाऊंगा और इस हद तक बढाऊंगा कि अपनी दूसरी यूनिट लगा सकूं। थैंक्यू मिस्टर सुशासक। थैंक्यू……। (लेखक सर्वानंद सिंह समस्तीपुर जिले के अगरबत्ती वयवसायी हैं) नये संकल्प के साथ संपन्न हुआ उद्यमिता महोत्सव अवसर था बिहार के उद्यमिता महोत्सव का। आयोजक थी “द इंडस इंटरप्रेन्योर्स” यानि टाई की पटना शाखा। सभा स्थल था होटल मौर्य का कौटिल्य हाल। सभा में शामिल थे कुछ सरकारी अधिकारी, कुछ उद्यमी और पत्रकार बंधु। उद्यमियों की श्रेणी में शामिल रहीं बालीवुड में बिहार के महिलाओं की पहचान नीतू चंद्रा और इनके भाई नीतिन चंद्रा। |