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कुलपति के खिलाफ़ जांच के सवाल पर बिफ़रे शिक्षक

पटना(अपना बिहार, 31 जनवरी 2012) - पटना विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षकों के लिखित शिकायत पर बिहार सरकार ने पटना विश्वविद्यालय और मगध विश्वविद्यालय के कुलपतियों के खिलाफ़ जांच कराये जाने के निर्णय के खिलाफ़ शिक्षकों में गहरा असंतोष व्याप्त हो गया है। पटना विश्वविद्यालय के डीन डा भारती एस कुमार, विधि विषय के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर राकेश शर्मा, प्रो आशुतोष कुमार, प्रो एस एम अशोक और उमेश मिश्रा ने सरकार के इस निर्णय को गलत करार दिया है और इसे पटना विश्वविद्यालय अधिनियम का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन बताया है। इन शिक्षकों ने बताया कि सरकार ने यह निर्णय स्वयं को नेता बताने वाले कुछ छात्रों के द्वारा शिकायत किये जाने पर लिया है। सरकार को चाहिये कि सबसे पहले वह उन छात्रों के पृषठभूमि की जांच होनी चाहिये। इन शिक्षकों ने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों से ये छात्र विश्वविद्यालय की शांति को भंग करते आये हैं और उनके कहने पर सराकार ने जांच का आदेश देकर केवल कुलपति ही नहीं, बल्कि पूरे विश्वविद्यालय का अपमान किया है। बिफ़रे शिक्षकों ने यह भी कहा कि सरकार ने कुलपति के मामले की जांच का आदेश जिन लोगों को दिया है वे रैंक के हिसाब से नीचे हैं और ऐसा कर सरकार ने विश्वविद्यालय के प्रोटोकाल का भी उल्लंघन किया है।

शिक्षा का बाज़ारीकरण

बाज़ारीकरण की आर्थिक नीति को अपनाने के बाद निजी शिक्षण संस्थानों या कहें शिक्षा की दुकानों का तेज़ी से प्रसार हुआ है। स्कूल स्तर पर फलता-फूलता शिक्षा का व्यवसाय अब निजी विश्वविद्यालयों तक फैल गया है। शिक्षा जो संपूर्ण समाज के विकास और परिवर्तन का माध्यम है, अब शुद्ध रूप से एक बिकाऊ माल बन कर रह गई है।

संविधान के माध्यम से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा देने का दायित्व राज्य सरकार को दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक $फैसले में माना है कि शिक्षा जीवन के अधिकार का ही एक भाग है। सरकार ने जीवन के अधिकार की इस विस्तृत व्याख्या को सीमित करने के लिए 83वां संविधान संशोधन किया और शिक्षा को केवल 6-14 वर्ष तक के बच्चों का ही मौलिक अधिकार माना है। यानी 6 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा के दायित्व से सरकार ने पल्ला झाड़ लिया, दूसरी तर$फ उसने 6-14 वर्ष की शिक्षा का दायित्व परिवार और समुदाय पर थोप दिया। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव ला कर सरकार ने शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है।

आज शिक्षा एक खरीदने-बेचने की वस्तु और पूंजीपतियों की संपत्ति को बढ़ाने का साधन बन चुकी है। जिसकी जेब में जितना पैसा होगा, उसी स्तर की शिक्षा को उसे बेचा जायेगा।

शोषण आधारित वर्तमान शिक्षा व्यवस्था तीन तरह से समाज का शोषण करती है - पहला अभिभावकों एवं विद्यार्थियों का, दूसरा शिक्षकों एवं कर्मचारियों का, तीसरा संपूर्ण समाज का। निजी स्कूल-कॉलेज अपनी चमक-दमक के माध्यम से एक ऐसा वातावरण प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं कि वे ही बेहतर शिक्षा दे सकते हैं। अंग्रेज़ी ही शिक्षा का एकमात्र माध्यम हो सकती है। व्यावसायिक शिक्षा के जरिये वे ही विद्यार्थी को स्वावलंबी बना सकते हैं। अभिभावकों को अपने चंगुल में फंसाने के लिए वे प्रचार-प्रसार के सभी तरीके अपनाते हैं।

अभिभावकों की माली हालत के हिसाब से अलग-अलग स्तर के स्कूल-कॉलेजों में हर तरह के माल बिक रहे हैं। गली-नुक्कड़ों पर खुले गैर मान्यताप्राप्त स्कूलों से लेकर पांच-सितारा वातानुकूलित स्कूल तक सबका अपना-अपना बाज़ार है।

आज अभिभावक चाहे वह सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजता हो या विश्वस्तरीय पब्लिक स्कूलों में, हर अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई पर अपनी औकात भर पैसा खर्च करता है।

सवाल यह उठता है कि इतना खर्च करने पर भी क्या उसे बेहतर शिक्षा मिल पाती है या उसे ठगा जाता है? यदि अभिजात वर्ग के बच्चों को उच्च कोटि की शिक्षा देने के लिए खोले गये पांच-सितारा स्कूलों को छोड़ दें तो मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा के नाम पर सि$र्फ ढकोसलेबाजी ही मिलती है। चूंकि इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम उन पर थोपी गई अंग्रेज़ी भाषा होती है, इसलिए विद्यार्थी पर रटने का अनावश्यक दबाव बनता है। शिक्षा के जरिये विद्यार्थियों की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ाने के बजाय इन स्कूलों में केवल उनमें रटने की क्षमता को ही बढ़ावा दिया जाता है। अर्थात् बिना समझे उन बातों को रटना जिनका जि़ंदगी की वास्तविकता से कोई लेना-देना न हो। ये स्कूल सी.बी.एस.ई., एन.सी.ई.आर.टी. के पाठ्यक्रम अपनाने का बढ़-चढ़ कर दावा करते हैं, लेकिन पाठ्यक्रम एक जैसा होते हुए भी अलग-अलग वर्ग के विद्यार्थी को अलग-अलग माल बिकता है। जो विद्यार्थी शिक्षा के इन निजी दुकानों तक नहीं पहुंच पाते, उनके लिए भी इस व्यवस्था में जगह दी गई है। सरकार ने उनके लिए भी स्कूल खोले हैं, जिनमें खिचड़ी-चावल के साथ विद्यार्थियों को सि$र्फ घटिया दर्जे की साक्षरता ही मिल पाती है। यानी उच्च वर्ग के लिए खोले गये विश्वस्तरीय स्कूलों को छोड़ दें तो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अधिकांश आम घरों की संतानों को शिक्षा का घटिया माल ही मिल रहा है। तामझाम और भडक़ीले प्रचार-प्रसार करके स्कूलों के मालिक अभिभावकों को केवल झूठे ख्वाब ही दिखाते हैं। शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों को प्राप्त करने के स्थान पर विद्यार्थियों को रटंत विद्या प्रदान कर ये संस्थायें विद्यार्थियों का मानसिक शोषण और उनके अभिभावकों का आर्थिक शोषण करती हैं।

निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के शोषण की कोई सीमा नहीं। औने-पोने दामों पर उन्हें नियुक्त किया जाता है। सोचिये, जो शिक्षक अपनी आय से अपनी न्यूनतम जरूरतें  पूरी नहीं कर पाता, वह भला दूसरों को किस प्रकार की शिक्षा देगा? मानसिक तनाव से ग्रस्त शिक्षक मानसिक रूप से विकृत विद्यार्थियों को ही तैयार कर सकता है। शिक्षकों का शोषण करने में सरकारी क्षेत्र निजी क्षेत्र से पीछे नहीं है। हर राज्य में शिक्षकों के हज़ारों पद खाली पड़े हैं। उन पर स्थायी नियुक्ति करने के स्थान पर अस्थायी शिक्षकों, कॉन्ट्रैक्ट टीचरों, गेस्ट टीचरों, शिक्षा मित्रों आदि की नियुक्ति की जाती है। इन शिक्षकों को स्थायी शिक्षकों के वेतन का एक-चौथाई भी नहीं दिया जाता है जबकि स्थायी शिक्षकों के संपूर्ण काम की जि़म्मेदारी अस्थायी शिक्षकों पर थोप दी जाती है। यह व्यवस्था केवल अस्थायी शिक्षकों का शोषण ही नहीं करती, बल्कि परोक्षत: निजी शिक्षण संस्थानों को शिक्षक वर्ग का शोषण करने के लिए सरकारी प्रोत्साहन भी है।

पब्लिक स्कूल अथवा निजी स्कूल के शिक्षकों की निगाह हमेशा इसी बात पर टिकी रहती है कि वे किस तरह विद्यार्थियों को अपने कोचिंग सेंटर तक खींच लायें, क्योंकि उनकी आजीविका ट्यूशन से होने वाली आय पर ही निर्भर करती है। आज बहुत से स्कूल मालिक शिक्षकों को इस कार्य के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनमें से कुछ तो उनसे कमीशन भी लेते हैं। जाहिर है कि शिक्षक चाहे निजी शिक्षण संस्थानों में कार्यरत हो या सरकारी सकूलों में अस्थायी नियुक्ति पर, आज अधिकांश शिक्षकों को कम तनख्वाह, नौकरी से निकाले जाने का भय, सामाजिक असुरक्षा और समाज में दयनीय और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। मु_ी भर स्थायी सरकारी शिक्षकों और अभिजातवर्गीय पब्लिक स्कूलों को छोड़ दें तो हर जगह शिक्षकों में असंतोष और कुंठा व्याप्त है।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था समाज को रसातल की ओर ले जा रही है। मानसिक तनावग्रस्त और असंतुष्ट शिक्षक व अद्र्धशिक्षित विद्यार्थी भला कैसे समाज का निर्माण कर सकते हैं? निजी शिक्षण संस्थान सरकार से औने-पौने दामों पर ज़मीन और अन्य संसाधन ले लेते हैं, परंतु बदले में समाज को अस्वस्थ बनाने और अपना मुना$फा बटोरने के सिवा क्या करते हैं? इन शिक्षण संस्थानों के मालिक इन दुकानों के जरिये अपनी दौलत दुगुनी-तिगुनी कर रहे हैं। उस दौलत की बदौलत वे ऊंचे ओहदे वाले राजनेताओं और नौकरशाहों से संपर्क स्थापित करते हैं जो इन संस्थानों को संरक्षण प्रदान करते हैं। दिखावे के लिए हमारी सरकार सर्वशिक्षा अभियान का ढोल पीटती है, परंतु इन सरकारों को चलाने वाले नेता और नौकरशाहों का व्यक्तिगत फायदा निजी शिक्षण संस्थानों के प्रसार में ही है।

आज अभिभावक, विद्यार्थी और शिक्षकों को ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज को इन शिक्षण संस्थानों की मनमानी और दुव्र्यवस्था के खिलाफ संघर्ष छेडऩा होगा। शोषण और लाभ पर आधारित इस शिक्षा व्यवस्था की जगह ‘समान शिक्षा व्यवस्था’ को स्थापित करना जरूरी है। एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जहां समाज का हर वर्ग एक साथ शिक्षा ग्रहण कर सके। एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों का समग्र विकास और समाज की प्रगति होनी चाहिए, न कि मुट्ठी भर लोगों के मुनाफे और निजी लोभ-लाभ का जरिया। - अश्विनी कुमार

शिक्षक नियोजन की अजब-गजब कहानी

पटना(अपना बिहार, 1 जनवरी 2012) – बिहार में शिक्षा के नाम पर तरह-तरह के खेल खेले जा रहे हैं। इसकी एक बानगी यह कि एक ऐसे व्यक्ति को बिहार सरकार शिक्षक बनाने जा रही है, जिसने वर्ष 1976 में जन्म लिया और वर्ष 1986 में बी एड की उपाधि हासिल कर ली। एक महानुभाव को ऐसे हैं जिन्होंने जन्म लेने से पहले ही बीएड की पढाई पूरी कर ली थी। एक महिला हैं। इनके पति एक दैनिक हिन्दी अखबार में बहुत बड़े पत्रकार हैं। इन्होंने वर्ष 1981 में इंटर की परीक्षा पास की और वर्ष 1982 में बीएड की उपाधि हासिल कर ली। अब बिहार सरकार इन्हें भी शिक्षक बनाने जा रही है। वैसे बिहार सरकार के पास कहने के लिये बड़ा सुंदर बहाना है कि जिन 34 हजार 450 शिक्षकों को वह बहाल करने जा रही है, उसकी सूची सुप्रीम कोर्ट द्वारा अभिप्रमाणित है। सवाल बिहार के छात्र-छात्राओं का है। जब शिक्षक ही ऐसे होंगे तो निश्चित तौर शिक्षा की बदहाली निश्चित है। वैसे इस मामले को लेकर कुछ समाजसेवियों ने फ़िर से अपनी आवाज बुलंद की है। अब एकबार फ़िर से यह मामला कोर्ट के गलियारे में जायेगा।

टेट के बाद अब “स्टेट” की बारी

पटना(अपना बिहार, 29 दिसंबर 2011) – जी हां, टेट के बाद अब “स्टेट” की बारी है। टेट यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा के बाद अब बिहार सरकार माध्यमिक एवं उच्च विद्यालयों में शिक्षकों की नियुकित के लिये “स्टेट” यानी सेकेंडरी टीईटी परीक्षा का आयोजन करेगी। यह परीक्षा आगामी 17 फ़रवरी को ली जायेगी। मानव संसाधन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस परीक्षा में करीब 5 लाख अभ्यर्थी भाग लेंगे। इसके लिये जल्द ही फ़ार्म निकाला जायेगा और उसका वितरण किया जायेगा।

अस्तित्वहीन हुआ मानव संसाधन विकास विभाग

पटना (अपना बिहार, 4 दिसंबर 2011) – जी हां, बिहार का मानव संसाधन विकास विभाग अब अस्तित्वहीन हो गया है। इसे अस्तित्वहीन बनाने का निर्णय कल राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया। दरअसल इतिहास में अपना नाम लिखवाने के लिये भूखी नीतीश सरकार ने यह निर्णय केवल अपने भूख को शांत करने के लिये ही लिया। बताते चलें कि पहले जब शिक्षा विभाग का नाम बदलकर मानव संसाधन विकास विभाग किया गया था तब सरकारी मंशा यह थी कि भारत में मनुष्य एक संसाधन की तरह हैं और उनके सर्वांगीण विकास के जरिये इस संसाधन का उपयोग देश के विकास में किया जा सकता है। लेकिन दो दशक तक मानव संसाधन विकास तो नहीं हो सका, अब अखबार में नाम छपवाने के तर्ज पर सरकार ने एक और दिखावटी कदम उठाया है। इसके बारे में जब राज्य के शिक्षा मंत्री पी के शाही से पूछा गया तब इन्होंने स्पष्ट रुप से कहा कि यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इच्छा है। इसके अलावे इन्होंने कोई और कारण नहीं बताया।

महिला वैज्ञानिकों की खोज में छुटा पसीना

पटना (अपना बिहार, 4 दिसंबर 2011) – राज्य में महिलायें विज्ञान के क्षेत्र में आगे नहीं आ रही हैं और महिला वैज्ञानिकों की तलाश में आयोजकों का छुट गया पसीना। इसका प्रमाण देखने को मिला भारत सरकार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सौजन्य से बीएमडी कालेज वैशाली के तत्वावधान में स्थानीय होटल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान।

दरअसल केंद्र सरकार के द्वारा देश के सभी राज्य में महिला शोधार्थियों की पहचान कर उन्हें आर्थिक सहायता दिये जाने की योजना शुरु की गई है। बिहार में इस वर्ष कार्यक्रम की मेजबानी बीएमडी कालेज को दी गई। कार्यक्रम का आगाज धूमधाम से किया गया। राज्य सरकार के कैबिनेट सचिव रविकांत ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि राज्य सरकार ने महिलाओं में विज्ञान के प्रति समझ विकसित करने के लिये अनेक योजनाओं की शुरुआत की है। पिछले 6 वर्षों में सरकार की ओर से स्कूलों में प्रयोगशालाओं का विकास किया गया है। अब बच्चे स्कूलों में विज्ञान की अच्छी समझ हासिल कर रहे हैं। इन्होंने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि बिहार की बेटियां विज्ञान के क्षेत्र में भी अपनी विशेषज्ञता साबित करें।

इस अवसर पर भीमराव आंबेदकर विश्वविद्यालय के कुलपति डा विमल कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि इस तरह के आयोजन से महिलाओं में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा बढेगी और महिलाओं के विज्ञान के क्षेत्र में आगे आने से समाज का भी कल्याण होगा। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में बीएमडी कालेज के प्रधानाचार्य डा ओम प्रकाश ने भी अपने कालेज की खूबियों की सविस्तार जानकारी दी।

उद्घाटन सत्र के बाद राज्य के विभिन्न कालेजों से आयी छात्राओं ने अपनी अपनी प्रस्तुतियां दीं। प्रस्तुतिकरण के दौरान अधिकांश छात्राओं ने उन परियोजनाओं की चर्चा की, जिन्हें लेकर बहुत पहले ही कार्य प्रारंभ हो चुका है। अधिकांश छात्राओं ने जल प्रदूषण एवं औषधीय पौधों के उपयोग के संबंध में कार्य करने की बात कही। निर्णायक मंडली के रुप में मंच पर विराजमान देश के विभिन्न हिस्सों से आये विशेषज्ञों ने भी अफ़सोस व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य में विज्ञान संबंधी संरचनाओं का विकास किया जाना अति आवश्यक है। इन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं में वैज्ञानिक समझ और शोध के प्रति दिलचस्पी जगाये जाने की आवश्यकता है।

मुसलमानों के साथ विश्वासघात है मौलाना मजहरुल हक अरबी फ़ारसी विश्वविद्यालय

पटना (अपना बिहार, 15 नवंबर 2011) – बिहार में एक विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की एक खासियत है। इसकी खासियत यह है कि यह केवल कागजों पर ही दिखता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं मौलाना मजहरूल हक अरबी फ़ारसी विश्वविद्यालय की। पूरे सूबे में केवल एक जगह पर इस विश्वविद्यालय का अस्तित्व दिखता है। यह स्थान है राजधानी पटना के बेली रोड के किनारे बने एक खंडहरनुमा भूतबंगला। बंगले के आगे एक बोर्ड लगा है, जिसपर इस विश्वविद्यालय का नाम लिखा है।

अब इसकी अन्य विशेषताओं की बात करें तो कागजी तौर पर यह एक मुकम्मिल विश्वविद्यालय है। इसके एक कुलपति और अन्य पदाधिकारी भी मौजूद हैं। विश्वविद्यालय की मानें तो उसके पास करीब 25 हजार छात्र/छात्रायें हैं। अब जरा इस विश्वविद्यालय की दूसरी खासियत को भी देखें। इस विश्वविद्यालय के छात्र हवा में पढते हैं। हवा में पढने का मतलब यह कि इस विश्वविद्यालय का अपना कोई कालेज नहीं है। जब कोई कालेज ही नहीं है तो फ़िर पढाई होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। विश्वविद्यालय प्रशासकों का कहना है कि पूरे बिहार में विश्वविद्यालय के नालेज रिसोर्स सेंटर हैं। इनका यह भी कहना है कि इन सेंटरों के जरिये पठन-पाठन का काम चलता है। लेकिन एक सच्चाई यह है कि विश्वविद्यालय की तरह ही ये सेंटर भी केवल कागजों में ही नजर आते हैं।

अब इस विश्वविद्यालय की दूसरी सच्चाई से रुबरु होते हैं। राज्य सरकार ने राजधानी पटना में अंतरराष्ट्रीय स्तरीय म्यूजियम बनाने का निर्णय लिया है। यह म्यूजियम विश्वविद्यालय को वर्तमान में दिये गये ठिकाने को मिटाकर बनाया जायेगा। सरकार की मानें तो इसके लिये ग्लोबल टेंडर निकाला गया है और पैसे भी जारी कर दिये गये हैं। विश्वविद्यालय को भी पटना के ग्रामीण इलाके में नेऊरा में 25 एकड़ जमीन दे दी गई है। कोई आश्चर्य नहीं कि यह जमीन आवंटन भी कागजी ही है। मिली जानकारी जमीन के वास्तविक मालिकों ने जमीन देने से इन्कार कर दिया है।

बहरहाल मौलाना मजहरुल हक अरबी फ़ारसी विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 1992 में हुई थी और अपने स्थापना वर्ष से ही यह विश्वविद्यालय जमीनी स्वरुप हासिल करने के लिये लालायित है। लेकिन आजतक इसे यह स्वरुप नहीं दिया गया। अब चुंकि विश्वविद्यालय केवल कागज में ही चल रहा है, इसलिये यहां अनेक तरह के खेल चलते हैं। इन खेलों में एक खेल डिग्रियां बांटने का भी है। इस खेल की एक कीमत है। बस कीमत दीजिये और डिग्री लिजीये। सबसे महत्वपूर्ण यह कि  मुसलमानों के साथ विश्वासघात है मौलाना मजहरुल हक अरबी फ़ारसी विश्वविद्यालय। लेकिन इससे भी बड़ा आश्चर्य यह कि बिहार के मुसलमानों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।

संपादकीय – गिनती में आगे, गुणवत्ता में पिछड़े बिहारी बच्चे

जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय बाल विज्ञान प्रदर्शनी के इतिहास में यह पहला अवसर है जब इस राष्ट्रीय स्तरीय प्रदर्शनी में सबसे अधिक बिहार के बच्चों ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। संख्या इतनी है कि सभी बिहारी अपने बाल वैज्ञानिकों पर गर्व कर सकें। परंतु एक कटु सत्य यह है कि गिनती में आगे रहने की सकारात्मकता को छोड़ दें तो गुणवत्ता के मामले में गैर बिहारी छात्रों ने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

गुणवत्ता के मामले में फ़र्क का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि अधिकांश बिहारी छात्रों ने जो प्रदर्शित किया है, उसके संबंध में उन्हें विषय की सही-सही जानकारी ही नहीं है। इसके अलावे प्रजेंटेशन यानी प्रस्तुतिकरण के मामले में भी गैर बिहारी छात्र बीस साबित हुए हैं। इसकी एक बानगी यह है कि कोलकाता के मार्टिमियर ब्वायज स्कूल के छात्र ओंकार सिंह गुजराल ने रोबोटिक व्हील चेयर का प्रदर्शन किया। ओंकार का यह व्हील चेयर विकलांगों के मष्तिष्क द्वारा दिये गये संकेतों को समझकर उनकी सहायता करेगा। ओंकार की खासियत यह है कि उसने अपनी परिकल्पना को मूर्त रुप प्रदान किया है। इसके अलावे उसने अपने परिकल्पना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत भी करा रखा है। ओंकार बताते हैं कि उपकरण के सर्किट डिजायन से लेकर कम्प्यूटर प्रोग्राम तक का डेवलपमेंट उसने स्वयं किया है।

अब बिहारी छात्रों की बात करें तो मखदुमपुर हाई स्कूल के छात्र आदित्य ने स्वचलित रेलवे क्रासिंग सिस्टम का विकास किया है। विषय की पूरी जानकारी नहीं रहने की वजह से आदित्य अपने ही द्वारा बनाये गये प्रोजेक्ट की व्याख्या नहीं कर पाते हैं। हालांकि यह भी एक कटु सत्य है कि इसके लिये केवल बिहारी छात्रों को ही दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिये। इस संबंध में विज्ञान प्रदर्शनी घूमने आये पुनाईचक निवासी डा रामेश्वर प्रसाद सिंह बताते हैं कि सरकारी स्कूलों में विज्ञान केवल किताबी बात है। सरकारी स्कूलों में प्रयोगशालायें केवल कागज पर ही दिखाई देते हैं।

बहरहाल, 38वां राष्ट्रीय बाल विज्ञान प्रदर्शनी बिहार के छात्र/छात्राओं के लिये अत्यंत ही महत्वपूर्ण साबित हुआ है। वे भी गैर बिहारी छात्रों से प्रेरणा ले रहे हैं। अब उम्मीद की जानी चाहिये कि सूबे का सरकारी तंत्र भी बिहारी बच्चों की प्रतिभा को समझेगा और उन्हें विकसित बनाने में भरपूर मदद देगा।

सुशासन का सच बता रहे स्कूली शिक्षक

पटना (अपना बिहार, 13 नवंबर 2011) – जी हां, स्कूली शिक्षक बता रहे हैं सूबे में सुशासन का सच। अगर यकीन न हो तो चले जाइये राजधानी पटना और आरा को विभाजित करने वाले कोइलवर पुल के पास। इस पुल को पार करने पर एक रास्ता उस इलाके में जाता है जो छपरा के इलाके में पड़ता है। यानी यह इलाका पटना, आरा और छपरा जिला का एकमात्र संगम है। इस इलाके में एक स्कूल ऐसा है जहां के शिक्षक प्रतिदिन सुशासन का पाठ पढाते हैं।

हम जिस शिक्षक महोदय की बात कर रहे हैं, उनकी पत्नी जिला पार्षद सदस्या हैं। बिहार के स्कूलों में एक नई परंपरा शुरु की गई है। इस परंपरा के अनुसार शिक्षक दिन भर पढाने के बाद एक डायरी में इस बात का उल्लेख करते हैं कि उन्होंने बच्चों को क्या-क्या पढाया। हम जिस शिक्षक महोदय का जिक्र कर रहे हैं, उनकी खासियत यह है कि वे हर दिन अपनी डायरी में तीन सवालों का जिक्र करते हैं। पहला सवाल – देश का सबसे अधिक प्रलापी मुख्यमंत्री कौन है? दूसरा सवाल – देश का सबसे अधिक डींग हांकने वाला शिक्षा मंत्री कौन है? और तीसरा सवाल- बिहार का सबसे अधिक भ्रष्ट आईएएस कौन है? शिक्षक महोदय केवल इन सवालों को ही नहीं लिखते, बल्कि वे इन सवालों का जवाब भी लिखते हैं।

हाल ही में इस बात की जानकारी सुशासन के अधिकारियों को मिली। जब अधिकारियों ने उक्त शिक्षक महोदय से बातचीत की तब शिक्षक महोदय ने साफ़-साफ़ कह दिया कि वे बच्चों को सच पढाते हैं। यदि सरकार उन्हें बर्खास्त करना या निलंबित करना चाहती है तो बेशक कर दे। शिक्षक महोदय की निर्भिकता की सच्चाई यह है कि ये जिस स्कूल में पढाते हैं, उस स्कूल में करीब 300 बच्चे पढते हैं और शिक्षकों की कुल संख्या 8 है। लेकिन केवल 3 शिक्षक ही जमीनी शिक्षक हैं और शेष केवल कागजी। ऐसे में पूरा दरोमदार सच पढाने वाले शिक्षक महोदय के जिम्मे है। वैसे उनके समर्थन में स्कूली बच्चे भी शामिल हैं।

शिक्षा दिवस पर विशेष रिपोर्ट - स्वर्ग के बच्चों का पटना में आगमन

पटना में स्वर्ग के बच्चों का आगमन हुआ है। स्वर्ग यानी देवभूमि भारत के बच्चे। 38वें जवाहरलाल नेहरु राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर स्थानीय गांधी मैदान में एनसीईआरटी, भारत सरकार के सौजन्य से किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से आये अद्भूत बच्चों ने भाग लिया।

अद्भूत इसलिये कि बच्चों ने विज्ञान का सकारात्मक उपयोग करते हुए कल के भारत के सुनहरे भविष्य की रुप-रेखा तय की है। ऐसे ही एक अद्भूत उदाहरण हैं केरल के एरणाकुलम जिले के श्री नारायण विलासम संस्कृत हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्र निजिन जोसेफ़। इन्होंने स्वचलित रेलवे सुरक्षा उपकरण का इजाद किया है। अपने समूर्त प्रोजेक्ट के बारे में जोसेफ़ बताते हैं कि इनका उपकरण रेल की पटरियों पर लगा होगा। यह उपकरण देश के 21 हजार 800 मानव रहित फ़ाटकों पर स्वचलित तरीके से सुरक्षा प्रदान करेगा। इस उपकरण के जरिये ट्रेन जब पांच किलोमीटर की दूरी पर रहेगी तब मानव रहित फ़ाटाक पर सायरन बजने लगेगा और जब ट्रेन 3 किलोमीटर दूर होगी तब रेलवे का फ़ाटक अपने आप बंद हो जायेगा। ट्रेन गुजरने के बाद फ़ाटक अपने-आप खुल भी जायेगा। जोसेफ़ बताते हैं कि उनका यह यंत्र ट्रेनों के टकराव को भी रोकने में मदद करेगा। ये बताते हैं कि इस उपकरण के उपयोग से यदि ट्रेन का ड्राइवर गलती से बिना सिग्नल के आगे बढेगा तब ट्रेन का इंजन अपने-आप बंद हो जायेगा।

पंजाब के पटियाला से आये गुरुविंदर सिंह की प्रतिभा भी अद्भूत है। अद्भूत इस मायने में कि इन्होंने विकलांग लोगों के लिये एक सरल मशीन का आविष्कार किया है। इस सरल मशीन की खासियत यह है कि इसका उपयोग करके वे लोग भी किताबें पढने का आनंद उठा सकते हैं, जो दोनों हाथों से विकलांग हैं। गुरविंदर बताते हैं कि उनके इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका इस्तेमाल वे लोग भी कर सकते हैं जिनके पास पैर नही है। इसके लिये कंधे से उपयोग किये जाने वाले लीवर भी बनाये गये हैं।

देश के टूरिज्म कैपिटल गोवा से आयी किरणशा विलिंगकर भी नन्ही परी जैसी है। इस नन्ही परी का कमाल यह है कि इसने अपने जादू से पहाड़ी इलाकों से गुजरने वाली नदियों के जल को प्राकृतिक तरीके से शुद्ध करने का तरीका इजाद किया है। ये बताती हैं कि पहाड़ी नदियों में बेतरतीब ढंग से धातुओं का मिश्रण हो जाता है। इस कारण पर्यावरण पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक तरीके से पेड़ लगाने पर इस समस्या से निजात पाया जा सकता है।

महाराष्ट्र के रत्नागिरी स्थित जीजीपीएस हाई स्कूल में छठे वर्ग की छात्रा ओवि दिनेश डोके ने भी विकलांगों के लिये एक कुर्सी का आविष्कार किया है। इनके व्हील चेयर की विशेषता यह है कि इसका उपयोग कर विकलांगों को सीढियों पर चढाया और उतारा जा सकता है।

अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के गवर्नमेंट गर्ल्स सिनियर सेकेन्डरी स्कूल की छात्रा जास्मीन जोसेफ़ ने अपनी सहेलियों वर्षा गणेश, दीक्षा और रुबी टिर्की के सहयोग से मिलकर एक ऐसे फ़िल्टर का आविष्कार किया है, जो कच्चे तेल के शोधन के दौरान खतरनाक रासायनिक पदार्थ को स्वतः ही उपयोगी पदार्थ के रुप में बदल देता है। बहरहाल, गांधी मैदान में आये इन बच्चों ने अपनी प्रतिभा का जबर्दस्त प्रदर्शन किया है। वैसे यह तो बानगी मात्र है कल के सुनहरे और खुबसूरत भारत की

 अस्तित्व के लिये तरस रहा सिमुलतल्ला आवासीय विद्यालय

जमुई (अपना बिहार, 23 अक्टूबर 2011) – एक साल पहले बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने उग्रवाद प्रभावित जमुई जिले में सिमुलतल्ला आवासीय विद्यालय की स्थापना की। सरकार की मुहिम यह थी कि इसे नेतरहाट और नवोदय के रुप में स्थापित किया जाये। लेकिन अपनी स्थापना के एक साल के बाद भी कथित तौर पर हाइटेक आवासीय विद्यालय उपेक्षित है। इसकी उपेक्षा इसलिये भी उल्लेखनीय है कि इस स्कूल में गरीबों के बच्चे नहीं पढते। इस स्कूल में पढने वाले अधिकांश बच्चे नौकरशाहों की संतान हैं।

स्कूल की उपेक्षा की बात करें तो स्कूल द्वारा एक साल पूरा होने पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया है। इस स्मारिका के संपादकीय में स्कूल के प्रिंसिपल डा शंकर कुमार ने स्कूल की बदहाली का जिक्र किया है। इन्होंने अपने संपादकीय में लिखा है कि अभी तक सिमुलतल्ला आवासीय स्कूल किराये के मकान में चल रहा है और स्कूल कैंपस के निर्माण के लिये कोई कोशिश शुरु नहीं की गई है। इन्होंने इसका जिक्र भी किया है कि स्कूल के सभी शिक्षक प्राइवेट स्कूलों के जैसे अनुबंध पर बहाल किये गये हैं, जिनका मानदेय भी सम्मानजन्क नहीं है। एक साल पूरा होने के बावजूद भी अभी तक शिक्षकों की सेवा शर्तों का निर्धारण नहीं किया गया है। हालांकि डा शंकर ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त किया है कि तमाम प्रतिकुलताओं के बावजूद स्कूल के शिक्षकों की लगन के बूते बच्चों ने एक मिसाल पेश किया है। बताते चलें कि स्कूल में प्रत्येक वर्ष 60 लड़कों और 60 लड़कियों का चयन कर उन्हें निशुल्क स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराया जाना है। स्कूल में आधारभूत संरचनाओं की कमी के कारण दूसरे वर्ष में बच्चों का प्रवेश नहीं लिया जा रहा है। वैसे खास बात यह है कि स्कूल के पास अपना कोई वाहन भी नहीं है जो आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को अस्पताल भी ले जा सके।

बहरहाल, खास खबर यह है कि सिमुलतल्ला आवासीय स्कूल के नाम पर 7 करोड़ रुपये की लूट हो चुकी है। इस संबंध में एक मामला सीएजी की रिपोर्ट में भी उल्लेखित है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार इस लूट की जांच करवाने का साहस करेगी। मिली जानकारी के अनुसार शिक्षा के नाम पर होने वाले इस लूट में स्कूल प्रबंधन से लेकर मुख्यमंत्री तक शामिल हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिमुलतल्ला आवासीय स्कूल में पढ रहे बच्चों का भविष्य क्या होगा?

शिक्षा विभाग में महिला अधिकारी का यौन शोषण

पटना (अपना बिहार, 10 सितम्बर 2011) – कल सूबे के मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह ने अपने कार्यालय में जनता दरबार का आयोजन किया था। सबकुछ सामान्य तरीके से चल रहा था। अंजनी कुमार सिंह बता रहे थे कि राजधानी पटना में कुल 122 विद्यालय ऐसे हैं, जिनके पास न तो अपना जमीन है और न ही अपना भवन। यानि ये 122 स्कूल हवा में चल रहे हैं। सरकार की ओर से अब ऐसे स्कूलों को किराये के मकान में चलाये जायेंगे। जब श्री सिंह ये बातें मीडिया कर्मियों को समझा रहे थे, तभी एक महिला ने पूरे शिक्षा महकमे की पोल खोल दी। उस महिला अधिकारी ने बताया कि सेवाकाल के दौरान पति की मृत्यु के बाद उसे अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली है। महिला ने बताया सेक्शन सात के बड़ा बाबू उस पर बूरी निगाह रखते हैं। आये दिन वे जबरन मेरे पीठ पर हाथ फ़ेरते रहते हैं। महिला ने प्रधान सचिव को बताया कि उस बड़ा बाबू ने आज उसके साथ फ़िर वही हरकत करना शुरु किया तो विरोध करने पर बड़ा बाबू ने अश्लील गालियां दीं। यह सब सुनकर जनता दरबार में मौजूद सभी लोग सन्न रह गये। स्वयं प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि इस मामले में कड़ी कार्रवाई होगी।

कोर्ट ने कतरे कुलपतियों के पर

पटना (अपना बिहार, 10 सितम्बर 2011) – मैदान में जमे हैं पक्ष और विपक्ष के सभी खिलाड़ी। विपक्ष की ओर से कप्तानी कर रहे सूबे के मानव संसाधन विकास मंत्री पी के शाही के इशारे पर एक अजनबी खिलाड़ी ने बालिंग की और गेंद सीधे बैटिंग कर रहे कुलपतियों के पीछे स्टंप पर जा लगी। विकेट के पीछे खड़े अंपायर ने खेल रोक दिया है। अंपायर ने कहा कि यह खेल अब आगामी 24 अक्टूबर को शुरु होगी और तबतक खेलने वाले सभी लोग मैदान पर बने रहेंगे। जी हां, यह सच्चाई है, क्रिकेट की कमेंटरी नहीं। दरअसल पटना हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाल ही में राज्यपाल सह कुलाधिपति द्वारा नियुक्त किये गये कुलपतियों के कार्य करने पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दिया है। रामतवक्या सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट के जज एस के कटरियार और ए अमानुल्लाह ने कुलपतियों के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता ने अपने याचिका में कहा है कि चुंकि राजभवन द्वारा कुलपतियों की नियुक्ति के पहले राज्य सरकार से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया है, इसलिये कुलपतियों की नियुक्ति असंवैधानिक है। कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 24 अक्टूबर मुकर्रर तय किया है।

 शिक्षक दिवस के दिन बूट पालिश कर शिक्षकों ने किया नीतीश का स्वागत

पटना(अपना बिहार, 06 सितम्बर 2011) -शिक्षक दिवस यानि भूतपूर्व राष्ट्रपति डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जन्मतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में जहां एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में सीखें-समझें कार्यक्रम का आगाज किया और शिक्षकों के लिये पेंशन दिये जाने की घोषणा की। वही दूसरी ओर वेतन के लिये तरस रहे नवनियोजित शिक्षकों ने स्थानीय डाकबंगला चौराहे पर बूट पालिश कर एवं भिक्षाटन कर सरकारी आयोजन की पोल खोल दी। एस के मेमोरियल हाल में आयोजित सरकारी कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सरकार की प्रतिबद्धता के बारे में कहा कि अब बिहार में भ्रष्टाचारियों के लिये कोई जगह नहीं है। जो भ्रष्टाचार करेगा, उसकी संपत्ति जब्त कर उसमें स्कूल खोला जायेगा। आईएएस आफ़िसर एस एस वर्मा के मकान को अधिग्रहित किये जाने के संबंध में श्री कुमार ने कहा कि इस कार्रवाई से समाज में सकारात्मक सोच बनेगी। इस सरकारी कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, मानव संसाधन विकास विभाग मंत्री पी के शाही और विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह भी उपस्थित थे। इससे पहले नवनियोजित शिक्षक संघ के बैनर तले बड़ी संख्या में नवनियोजित शिक्षकों ने राज्य सरकार की दमनकारी शिक्षा नीति के विरोध में प्रदर्शन किया। अपने बांह पर काली पट्टी बांधे शिक्षकों ने बूट पालिश एवं भिक्षाटन करते हुए मार्च किया। बाद में आंदोलनरत शिक्षक आर ब्लाक पहूंचे। इस अवसर पर जनसभा को संबोधित करते हुए शिक्षकों ने इस लड़ाई को आगे भी जारी रखने का निर्णय लिया। शिक्षकों के इस विरोध मार्च का नेतृत्व बिहार पंचायत नगर शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष हरेराम महतो, उपाध्यक्ष प्रदीप मेहता और फ़ूलन सिंह आदि ने किया।

बहरहाल, सबसे बड़ी समस्या परिसर की है। यह विद्यालय जिस भूखंड में स्थापित है, वहां अनेक गड्ढे हैं। इन गड्ढों में पानी जमा रहने के दोपहर के खाने में पिल्लू देख भड़के छात्र

बिहार के गरीब बच्चों को पौष्टिक मिड डे मिल यानि दोपहर के भोजन के दौरान परोसी जा रही पौष्टिकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि खगड़िया जिले के बेलदौर प्रखंड के मुख्यालय स्थित मध्य विद्यालय के छात्र खाने में पिल्लू देखकर भड़क उठे। इसके बाद सभी छात्रों अपने-अपने घर जाकर अपने अभिभावकों से इसकी शिकायत की। अभिभावकों ने आक्रोश में आकर स्कूल में हंगामा किया। लोगों ने सरकार से स्कूल की बदहाली को दूर करने की गुहार लगाई है।

अप्रशिक्षित शिक्षकों की बहाली का रास्ता साफ़

जी हां, बिहार के नौनिहालों को पढायेंगे अप्रशिक्षित शिक्षक यानि झोलाछाप शिक्षक। सबसे बड़ा आश्चर्य यह कि राज्य में प्राथमिक विद्यालयों में अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति के राज्य सरकार के प्रस्ताव पर केंद्र ने अपनी सहमति दे दी है। इसके साथ ही प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक के रुप में प्रशिक्षित शिक्षकों के साथ ही अप्रशिक्षित अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ़ हो गया है। यहां यह तथ्य रेखांकित करने योग्य है कि शिक्षा का अधिकार कानून के तहत प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में 30 बच्चों पर एक शिक्षक नियुक्त किया जाना है। इस अनुपात के हिसाब से प्रदेश में तकरीबन 3 लाख शिक्षकों की और आवश्यकता है। लेकिन राज्य सरकार की मुश्किल यह है कि प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में शिक्षक के पदों के लिये प्रशिक्षित अभ्यर्थी हैं ही नहीं। इसके मद्देनजर राज्य सरकार ने केंद्र के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि वह प्रदेश में शिक्षक के पदों पर प्रशिक्षित अभ्यर्थियों के साथ ही अप्रशिक्षित अभ्यर्थियों की नियुक्ति की अनुमति दे। अपने इस प्रस्ताव पर केंद्र की सैद्धांतिक सहमति राज्य सरकार को पहले ही मिल गई थी। अब राज्य सरकार के पास बजाप्ता केंद्र की लिखित सहमति भी आ चुकी है।

मानव संसाधन विकास का मतलब मानव निर्माण

मानव संसाधन विकास का मतलब मानव निर्माण है। इस आशय की जानकारी राज्य के मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह ने सीआईआई के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में दी। इन्होंने कहा कि एक बेहतर समाज के निर्माण के लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य अपनी क्षमताओं से परिचित हो। आज के बदलते दौर में यह तभी संभव है जब मानव संसाधन के विभिन्न आयामों का अनुपालन किया जाये। बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर रहन-सहन और बेहतर शिक्षा के बदौलत ही बेह्तर मनुष्य ही बेहतर संस्थान का निर्माण कर सकते हैं।

इस अवसर पर अपने संबोधन में केंद्रीय विश्वविद्यालय पटना के कुलपति डा जनक पांडेय ने कहा कि एक संस्थान के लिये जितना महत्वपूर्ण मानव संसाधन विकास एवं प्रबंधन है उतना ही महत्वपूर्ण एक मनुष्य के लिये कार्य एवं व्यवहार कुशल होना है। इन्होंने कहा कि बिहार में अब परिस्थितियां बदली हैं। मानव संसाधन विकास को सही मायने में जमीन पर उतारा जा रहा है। इस अवसर पर सीआईआई के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल्या घोषाल, डा यू के सिंह, अमित सरावगी, पीयूष गुप्ता और प्रभात भारती सहित अनेक गणमान्य लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये।

आईआईटी में सफ़ल, लेकिन बिहार बोर्ड की परीक्षा में चूक गया साजिद

पश्चिम चंपारण के कोतराहा गांव का मो साजिद आईआईटी की परीक्षा में सफ़ल हो गया। लेकिन उसके भविष्य पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया है। दरअसल साजिद को बिहार बोर्ड द्वारा ली ली गई परीक्षा में 60 प्रतिशत से केवल 9 अंक कम अंक प्राप्त हुए हैं और इस कारण इनका नामांकन आईआईटी में नहीं हो सकता है। इस संबंध में साजिद ने कल बिहार के मानव संसाधन विकास विभाग के मंत्री के जनता दरबार में हाजिरी लगाई। विभागीय मंत्री पी के शाही की अनुपस्थिति में सचिव एस शिवकुमार ने साजिद के आवेदन को स्वीकृत करते हुए जल्द ही कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।

इंटर कला की परीक्षा में बेटियों का दबदबा

बिहार में महिला सशक्तिकरण का प्रभाव दिखने लगा है, इसका परिचायक परीक्षा परिणामों में लड़कों की तुलना में लड़कियों को मिल रही अधिक सफ़लता है। वैसे एक सच्चाई यह भी कि बिहार के उन कालेजों के छात्रों को वह सफ़लता नहीं मिल सकी है जहां नियमित रुप से पढाई होती है। सबसे अधिक सफ़लता उन कालेजों के छात्र/छात्राओं को मिली है, जहां छात्र एवं छात्रायें केवल फ़ार्म भरती हैं। इंटर विज्ञान की परीक्षा में भी बेगूसराय जिले के चमथा स्थित वित्त रहित कालेज को स्वर्णिम सफ़लता हासिल हुई थी, जिसके बारे में यह स्त्यापित हो चुका है कि इसका प्रत्यक्ष संबंध राज्य के मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह से है।

खैर, जहां तक इंटर कला की परीक्षा परिणाम का सवाल है तो करीब 88 फ़ीसदी बच्चों को सफ़लता मिली है। कटिहार के सुर तुलसी कालेज की छात्रा प्रणीता सरीन को 425 अंक प्राप्त हुआ है और इन्होंने सूबे में पहला स्थान हासिल किया। समस्तीपुर के विद्यापतिनगर स्थित विद्यापति कालेज की खुश्बू कुमारी ने 421 अंक लाकर दूसरा स्थान हासिल किया। शिवहर के रामावतार रामदेव कालेज की नोयदा खातून एवं बेगूसराय के मेघौल स्थित एम आर डी आई एम कालेज की रिंकू कुमारी ने 417 अंक लाकर संयुक्त रुप से तीसरा स्थान हासिल किया। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष प्रो राजमणि प्रसाद सिंह ने इंटर कला परीक्षा के नतीजे जारी किये। इस अवसर पर समिति के सचिव अनूप कुमार सिन्हा सहित सभी संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

बहरहाल एक सुखद समाचार यह कि टाप 15 में राज्य के कुल 44 परीक्षार्थियों का नाम शामिल है और इसमें भी 40 स्थानों पर छात्राओं ने बाजी मारी है। इससे भी आश्चर्य यह कि अधिकांश छात्र और छात्राओं का सम्बन्ध वित्तरहित कालेजों से है। जबकि यह एक स्थापित सत्य है कि अधिकांश वित्त रहित कालेजों के पास न तो अपना भवन है और न ही पढाने योग्य अनुभवी शिक्षक। ऐसे में जो परीक्षा परिणाम सामने आया है, उससे एक बड़ा सवाल तो उठता ही है। आखिर बिहार सरकार द्वारा संपोषित कालेजों में क्या वाकई पढाई नहीं होती या यह किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं?

रिटायरमेंट के बाद बकाया लेना है तो लगाइये निगरानी विभाग के चक्कर, सेवानिवृत शिक्षिका की व्यथा

उनका नाम शांति कुमारी है। वह पटना जिला के तोप दनियांवा में शिक्षिका थीं। करीब साल भर पहले ही वे अपनी सेवा अवधि के दौरान उन्होंने अपने छात्र/छात्राओं को सच बोलने और उच्च आदर्शों का पालन करने का पाठ पढाया करती थीं। लेकिन बिहार में व्याप्त भ्रष्टाचार ने उन्हें घूस देने पर मजबूर कर दिया और भ्रष्टाचार का आलम यह कि घूस देने के बाद भी उन्हें रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला लाभ नहीं मिल सका है। बिहार में व्याप्त भ्रष्टाचार की यह सच्ची दास्तान कल बिहार के मानव संसाधन विकास विभाग के मंत्री प्रशांत कुमार शाही के दरबार में सामने आई।

शांति कुमारी अपने पति के साथ बड़ी बेचैनी के साथ श्री शाही के दरबार में शामिल होने के लिये हाजिर हुई थीं। इन्हें उस वक्त निराशा हुई जब इन्हें जानकारी मिली कि आज के दरबार में न्याय करने वाले ही दिल्ली प्रवास पर गये हुए हैं। दरअसल श्री शाही की अनुपस्थिति में मानव संसाधन विकास विभाग के संयुक्त सचिव प्रकाश चंद्र सिंह अन्य वरीय पदाधिकारियों के साथ दरबार में आये लोगों की फ़रियाद सुन रहे थे। इसी बीच शांति कुमार ने कहा कि वह पांचवीं बार इस दरबार में अपना दुखड़ा सुनाने आई हैं। वह एक बार मुख्यमंत्री के जनता दरबार में हाजिरी लगा चुकी हैं। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले वाजिब लाभ को हासिल करने के लिये मजबूरी में घूस भी दिया, लेकिन इतनी क्सरतों के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल सका। दरबार में उस समय सभी भौंचक्क रह गये जब शांति कुमारी ने दरबार में न्याय कर रहे पदाधिकारियों से ही पूछा कि बताइये इससे बड़ा भी कोई और दरबार है क्या? हांलाकि जब उन्होंने घूस देने की बात कही तो वहां उपस्थित पदाधिकारियों ने उन्हें निगरानी विभाग से भ्र्ष्ट पदाधिकारी को पकड़वाने की बात कही।

इस बीच दरबार में तशरीफ़ लाये मानव संसाधन विभाग के सचिव। संयुक्त सचिव ने अनहोनी को टालने के इरादे से शांति कुमारी के मामले को संबंधित पदाधिकारियों के पास रेफ़र कर दिया। वहां पदाधिकारी ने शांति कुमारी के सामने ही पटना के जिला शिक्षा पदाधिकारी से उनके मोबाइल पर बात किया और इस मामले में जानकारी ली। जिला शिक्षा अधिकारी ने जानकारी दी कि शांति कुमार को देय दो लाभ दिये जाने का आदेश जारी किया जा चुका है। परंतु, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी के छुट्टी पर चले जाने के कारण इस आदेश के क्रियान्वयन में देर हो रही है। इन्होंने यह भी बताया कि प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी ने अपनी छुट्टी की अवधि बढा ली है, इस स्थिति में किसी अन्य अधिकारी को प्रभार दिया जायेगा और शांति कुमारी के संबंध में दिये गये आदेश का अनुपालन किया जायेगा।

बहरहाल, मानव संसाधन विकास विभाग के दरबार से निकलते हुए शांति कुमारी ने बताया कि उन्हें अपनी बेटी की शादी करनी है जो केवल इस कारण लंबित पड़ी है कि उन्हें रिटायरमेंट का लाभ नहीं मिल सका है। इन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके साथ न्याय नहीं किया गया तो जल्द ही वे फ़िर दरबार में हाजिरी लगायेंगी। सबसे बड़ा सवाल यही कि पूरा जीवन काम करने के बाद क्या शिक्षकों अथवा अन्य कर्मियों को अपना रिटायरमेंट लाभ लेने के लिये निगरानी विभाग का चक्कर लगाना पड़ेगा?

इंटर विज्ञान की परीक्षा में अंजनी कुमार सिंह का जलवा

कल इंटरमिडियट की विज्ञान और वाणिज्य की परीक्षा का परिणाम जारी किया गया। सूबे के मानव संसाधन विकास मंत्री पी के शाही ने परीक्षाफ़ल को इन्टरनेट पर जारी किया। जारी रिपोर्ट के अनुसार इंटर में बड़ी संख्या में छात्र / छात्राओं ने सफ़लता हासिल की। इंटर वाणिज्य में 94 फ़ीसदी छात्र एवं छात्राओं ने सफ़लता हासिल की। मधुबनी के एन डी जे कालेज के छात्र शशिकृष्ण कुमार को 417 अंक प्राप्त हुआ है और वे पूरे सूबे में टापर बने हैं। वही बेतिया के गुलाब मेमोरियल कालेज के अमन हुसैन ने 414 अंक लाकर सूबे में दूसरा स्थान हासिल किया। जबकि गया कालेज गया के छात्र उदय कुमार ने 413 अंक लाकर तीसरा स्थान हासिल किया।

अब बात करते हैं इंटर विज्ञान की। राज्य में 91 फ़ीसदी बच्चों ने इस  संकाय में सफ़लता हासिल किया है। इस मामले में बेगूसराय जिला के छात्र / छात्राओं को स्वर्णिम सफ़लता हासिल हुई है। बेगूसराय जिले के चमथा स्थित एस एन एन आर कालेज की छात्रा शाम्भवी ने 431 अंक लाकर सूबे में पहला स्थान हासिल किया है। इसी कालेज के छात्र शुभम शांडिल्य ने 424 अंक लाकर दूसरा स्थान हासिल किया। मजे की बात यह कि इसी कालेज की छात्रा अनामिका ने 423 अंक लाकर तीसरा स्थान हासिल किया।

बेगूसराय जिला के एस एन एन आर कालेज की सफ़लता निस्संदेह सराहनीय है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह कि एक तो बिहार के प्रथम 15 स्थान हासिल करने वालों में 7 छात्र/ छात्रा बेगूसराय जिला के हैं। इसमें 4 एक ही कालेज यानि एस एन एन आर कालेज के। बताते चलें कि यह कालेज वित्तरहित कालेज है और अति विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो इस कालेज के साथ राज्य के मानव संसाधन विकास विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह का डायरेक्ट कनेक्शन है। हम इस कनेक्शन की असलियत सामने लाने की कोशिश में जूटे हैं। हमारा मकसद सफ़लता पाने वाले छात्र / छात्राओं की सफ़लता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करना नहीं, बल्कि इस सवाल का जवाब ढुंढना है कि आखिर किन वजहों के कारण केवल एस एन एन आर कालेज के छात्र / छात्राओं को ही यह स्वर्णिम सफ़लता हासिल हुई ? और यदि वाकई इस सफ़लता में सच्चाई है तो निस्संदेह यह पूरे बिहार के लिये अनुकरणीय है। निस्संदेह यदि इसमें भ्रष्टाचार संलिप्त है तो यह बिहार का दुर्भाग्य ही होगा। ईश्वर करे बिहार के युवाओं की यह सफ़लता बिहार के लिये सकारात्मक हो।

लंदन में दिखेगा बिहारी प्रतिभा का जलवा

आगामी अगस्त माह में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में पूरी दूनिया एक बार फ़िर बिहारी प्रतिभा का लोहा मानेगी। एक बार फ़िर पूरी दूनिया के लोग यह जान सकेंगे कि सामाजिक, आर्थिक और तकनीक रुप से पिछड़े बिहार में भी प्रतिभा कूट कूट कर भरी है। बताते चलें कि आगामी अगस्त माह में लंदन में रायल जियोग्राफ़िकल सोसायटी के तत्वावधान में विकासशील देशों में पानी समस्या विषयक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया है। इस आयोजन में भाग लेने के लिये बिहार के दो विशेषज्ञ डा अशोक कुमार घोष और डा नुपूर बोस मित्रा को आमंत्रित किया गया है।

यह पहला अवसर होगा जब इस स्तर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार में बिहारी विशेषज्ञ न केवल अपनी बात बतौर वक्ता के रुप में रखेंगे, बल्कि वे पूरे सत्र की अध्यक्षता भी करेंगे। ये दोनों विशेषज्ञ वर्तमान में मगध विश्वविद्यालय के अनुग्रह नारायण सिंह कालेज में प्रोफ़ेसर हैं। इस संबंध में डा अशोक कुमार घोष ने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अन्य बिहारी विशेषज्ञ भी भाग लेंगे। सबसे महत्वपूर्ण मिट्टी में आर्द्रता प्रबंधन विषय पर बिहार के बांका जिले के चांदन प्रखंड में चलाई जा रही परियोजना की जानकारी दी जायेगी। इस विषय पर इन्डियन रुरल एसोसिएशन के कौशल कुमार शर्मा और नाबार्ड के अधिकारी नवीन कुमार राय अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा नीदरलैंड के डेल्फ़ यूनिवर्सिटी आफ़ टेक्नोलाजी के छात्र अजय जी भट्ट गंगा और सोन नदी के किनारे बसे इलाकों में आर्सेनिक एवं अन्य जहरीले अवयवों एवं इसके निराकरण के संबंध अपनी बात रखेंगे। जबकि स्थानीय ए एन कालेज के छात्र राजीव कुमार इस अवसर पर बिहार के आर्सेनिक प्रभावित जिलों में पानी की कमी के बारे में सविस्तार जानकारी देंगे। जबकि वर्मी कल्चर की उपयोगिता के संबंध में अस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन शहर में स्थित ग्रीफ़िथ विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ एवं मूल रुप से बिहारी डा राजीव कुमार सिन्हा और पटना के ए एन कालेज के विशेष्ज्ञ डा अशोक कुमार घोष संयुक्त रुप से जानकारी देंगे।

ग्रामीण महिलायें भी सीखेंगी कम्प्यूटर

आने वाले एक महीने के अंदर बिहार सरकार राज्य की महिलाओं को कम्प्यूटर साक्षर बनाने हेतु विशेष योजना की शुरुआत करेगी। इस आशय की जानकारी राज्य के सूचना एवं प्रावैधिकी विभाग के प्रधान सचिव अरुण कुमार सिन्हा ने बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन और टाई के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक विशेष कार्यशाला में दी।

इन्होंने बताया कि सूबे में इन्डस्ट्रीयल पालिसी जारी होने के साथ ही आईटी पालिसी की भी घोषणा की जायेगी। इस घोषणा के तहत सूबे के हरेक परिवार की एक महिला को कम्प्यूटर की जानकारी दी जायेगी। इसके अलावा सूबे के सभी स्कूलों और कालेजों में कम्प्यूटर शिक्षा को अनिवार्य बनाया जायेगा। इन्होंने यह भी बताया कि बिहार में सूचना एवं प्रावैधिकी संबंधी कार्यकलाप 4 साल पहले शुरु हुआ। इन चार वर्षों में बिहार ने अपेक्षाकृत अधिक तरक्की की है। इस दौरान ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में बिहार ने सराहनीय सफ़लता हासिल की है। सूबे में आईटी उद्योग के लिये अनुकूल संभावनायें हैं। इन संभावनाओं को मजबूत करने के लिये राज्य सरकार सूबे के युवाओं को गूणवत्ता युक्त कम्प्यूटर प्रशिक्षण उपलब्ध कराने हेतु प्रतिबद्ध है।

इससे पहले अपने संबोधन में विभागीय मंत्री शाहिद अली खान ने बताया कि सूबे में स्वतंत्र आईटी विभाग की स्थापना वर्ष 2008 में हुई। कम समय में विभाग ने अनेक कार्यकर्मों की शुरुआत हुई। हालांकि इन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि असीम संभावनाओं के बावजूद अभीतक इस क्षेत्र में बहुत कुछ नहीं किया जा सका है। संभावना व्यक्त करते हुए इन्होने कहा कि नई पालिसी आ जाने से सूबे के आईटी उद्योग को नई गति मिलेगी। इस अवसर पर टाई के प्रदेश अध्य्क्ष पी के सिन्हा ने कहा कि देश और विदेश के लोगों की निगाह में बिहार एक असीम संभावनाओं वाला राज्य बनकर उभरा है। यह सुखद संकेत है। इन्होंने राज्य सरकार से उम्मीद जताते हुए कहा कि सरकार सूबे के आईटी उद्यमियों की तकलीफ़ को समझेगी और सबकी बेहतरी के लिये बेहतर आईटी पालिसी जारी करेगी। इस अवसर पर बीआईए के अध्यक्ष एस पी सिन्हा, उपाध्यक्ष एस पटवारी, पूर्व अध्यक्ष केपीएस केसरी, रत्नाकर मिश्रा,, संजय गोयनका सहित बड़ी संख्या में गणमान्य उपस्थित थे।

शाबास शालिनी, हमें तुम पर नाज है

दोस्तों, कल का दिन बिहार के युवा किशोर और किशोरियों के लिये खास रहा। कल जहां एक ओर मैट्रिक की परीक्षा का परिणाम आया तो दूसरी ओर आईआईटी परीक्षा के परिणाम को लेकर भी खास गहमागहमी बनी रही। कल शाम में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के कार्यालय में सूबे के शिक्षा मंत्री पी के शाही ने समिति के नवनियुक्त अध्यक्ष प्रो राजमणि प्रसाद की उपस्थिति में इंटरनेट पर परीक्षाफ़ल को जारी किया। इस अवसर पर श्री शाही ने सफ़ल छात्रों के सुनहरे भविष्य की कामना की।

मिली जानकारी के अनुसार सूबे के 67.21 प्रतिशत छात्रों ने मैट्रिक परीक्षा में सफ़लता हासिल की। सबसे पहला स्थान मिला है राजधानी पटना के खगौल इलाके के घनश्याम बालिका हाई स्कूल की छात्रा शालिनी यादव को। बिहार की इस बेटी ने कुल अंक 500 में से 460 अंक प्राप्त कर अपनी श्रेष्ठता साबित की। वही शिवहर जिले के परसौनी चौक स्थित जनता हाई स्कूल के छात्र कुंदन ने बालकों की श्रेणी में पहला स्थान प्राप्त किया।

हालांकि पूर्व की अपेक्षा इस बार सफ़लता में थोड़ी कमी आई। विशेषकर प्रथम श्रेणी में सफ़लता हासिल करने वाले छात्र/छात्राओं की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। माना जा रहा है कि इस कमी का वजह नवीनतम पाठ्यक्रम है। वैसे इसे केवल एक बहाना ही कहा जा सकता है। असलियत यह है कि बिहार के सरकारी हाईस्कूलों में पढाई होती ही कहां है? यह सवाल बिहार के भविष्य के साथ जुड़ा और आज मौका भी है कि राज्य सरकार भी अपने कागजी दावों की हकीकत जान ले कि किस प्रकार सूबे के सरकारी हाईस्कूलों में पढाई नहीं के बराबर होता है। कभी इलेक्शन तो कभी जनगणना तो कभी कुछ और्। करीब 150 से 200 दिनों तक बिहार के सरकारी हाईस्कूल बंद रहते हैं। शेष दिनों में जब पढाई होती है तो कभी शिक्षक क्लास रुम के अंदर होते हैं और छात्र बाहर। लेकिन अधिकांशतः स्थिति विपरीत ही होती है। छात्र अपने-अपने क्लास रुम में बैठकर अपने शिक्षक के आने का इंतजार करते हैं।

पर्याप्त मात्रा में शिक्षक नहीं हैं। कई स्कूलों में इतिहास पढाने वाले शिक्षक भौतिकी और अंगरेजी पढाते नजर आते हैं। स्कूलों में लैबोरेटरी है, लेकिन लेबोरेटरी को समझ सकें, वैसे टीचर्स नहीं हैं। सूबे के अधिकांश बड़े हाईस्कूलों में पुस्तकालय भी हैं, जिसके दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिये बंद रहते हैं। इस अवस्था में शालिनी और कुंदन जैसे लाखों बच्चों ने सफ़लता हासिल की, इसके लिये वे बधाई के पात्र हैं। अपना बिहार सभी सफ़ल छात्रों के उज्जवल भविष्य की कामना करता है। वैसे हम बिहार सरकार से भी उम्मीद करते हैं कि वह अपने कागजी व्यवहार में परिवर्तन लाये, ताकि आने वाले समय में बिहार के बच्चे वास्तव में पढ सकें। यदि बच्चे पढेंगे, तभी उनकी सफ़लता का प्रतिशत बढेगा और बिहार भी आगे बढेगा। लेकिन इसके लिये राज्य सरकार को भी याद रखना होगा कि केवल साइकिल बांट देना ही शिक्षा का पर्याय नहीं है।

आनंद और अभयानंद ने मारी बाजी

आईआईटी सुपर 30 के खेल में गणितज्ञ आनंद और पुलिस पदाधिकारी अभयानंद ने बाजी मार ली है। आईआईटी प्रवेश परीक्षा में आज घोषित हुए रिजल्ट के बाद सभी अपने-अपने सफ़लता के दावे कर रहे हैं। जहां एक ओर आनंद ने 24 छात्रों के सफ़ल होने का दावा किया है, वही अभयानंद ने 34 छात्रों के सफ़ल होने का दावा किया है। वही राजधानी पटना के दर्जनों शिक्षण संस्थानों ने भी सफ़लता के दावे किये हैं। सबसे सुखद यह है कि आईआईटी के प्रवेश परीक्षा में बड़ी संख्या में बिहारी छात्रों ने सफ़लता हासिल किया है। अपना बिहार की ओर से सभी छात्रों को ढेर सारी शुभकामनायें।

छात्रों ने पोलिटेक्निक कालेज को किया आग के हवाले

परीक्षा केंद्र बदले जाने से गुस्साये परीक्षार्थियों ने गया जिले के पोलिटेक्निक कालेज में जमकर हंगामा मचाया और पूरे कालेज में आग लगा दी। बताते चलें कि कालेज परिसर में ही सीआरपीएफ़ जवानों कैम्प भी है, इसके बावजूद जबतक उन्हें इस बात की भनक मिलती, तबतक छात्रों ने कालेज को आग के हवाले कर दिया था। गुस्साये परीक्षार्थियों ने बताया कि पोलिटेक्निक के पहले, दूसरे और चौथे साल के सेमेस्टर की परीक्षा 21 दिसंबर से 30 दिसंबर तक पटना स्थित पोलिटेक्निक कालेज में ली जानी थी, लेकिन स्टेट टेक्निकल बोर्ड द्वारा परीक्षा के दो दिन पूर्व परीक्षा केंद्र बदल दिया गया। इसके कारण उन्हें आने-जाने में अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ा।

राज्य के 30 कालेज बनेंगे सेंटर आफ़ एक्लिलेंस

पिछले पांच सालों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आयी गिरावट को दूर करने के लिये राज्य सरकार ने सूबे के 30 कालेजों को सेंटर आफ़ एक्सीलेंस के रुप में विकसित करने का निर्णय लिया है। इस आशय से संबंधित निर्णय मुख्यमंत्री द्वारा मानव संसाधन विकास विभाग की समीक्षा बैठक में ली गई। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय के 3-3 कालेजों का उद्धार किया जायेगा। इस अवसर पर विभागीय मंत्री पी के शाही, विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह सहित अनेक पदाधिकारी मौजूद थे।

नीतीश जी, शिक्षा की दुर्गति देखनी है\ तो चलें कटिहार

कटिहार जिले के बारसोई प्रखंड में शिक्षा की दुर्गति का अंदाजा इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि यहां के अधिकांश सरकारी स्कूलों के बच्चे ठंढ में भी खुले आसमान के नीचे पढने को बेबस हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस प्रखंढ में 222 विद्यालय हैं। इनमें 53 मध्य विद्यालय, 134 प्राथमिक और 35 मदरसे हैं। इनमें से नया प्राथमिक विद्यालय जोकलबाड़ी, पूरब टोला, बछवाड़ी टोला स्शित प्राथमिक विद्यालय, कर्णपुर स्थित सरकारी स्कूल और गोविन्दपुर स्थित मध्य विद्यालय सहित कुल 38 विद्यालयों के पास अपना भवन है ही नहीं। इसके अलावा इन विद्यालयों में शिक्षकों की भी भारी कमी है।

बदलनी होगी विकास की परिभाषा – दरभंगा में बिना जमीन के चल रहा स्कूल

हम दरभंगा शहर के बीचों-बीच खड़े हैं, यहां से थोड़ी ही दूरी पर मिर्जापुर इलाके में श्याना मध्य विद्यालय है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां स्कूल का बोर्ड तो है, लेकिन कोई स्कूल नहीं है। हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि यह स्कूल इसी इलाके के एक मंदिर में चल रहा है। हम लोगों ने इस स्कूल की प्राध्यापिका शकुंतला झा से बातचीत की। इन्होंने बताया है कि भूमिविहीन यह स्कूल पिछले 30 सालों से चल रहा है। बच्चे मंदिर परिसर में बने दो कमरों में पढते हैं। ये कमरे भी ऐसे हैं, जिन्हें देखकर जब हम जैसे बड़े सहम गये हैं, तो सोचिये इन बच्चों का क्या हाल होता होगा। हमने इस मंदिर के पुजारी महंथ जी से मुलाकात की। इन्होंने बताया कि उन्हें केवल हर महीने किराये से मतलब होता है। इन्होंने शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि राज्य सरकार शिक्षा के नाम पर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन इस मंदिर परिसर के विकास के लिये आजतक कुछ नहीं किया। स्थानीय लोगों की मानें तो स्थानीय विधायक ने अपने कोष से इस परिसर में बच्चों के लिये शौचालय और दो अतिरिक्त कमरे बनाने के लिये अनुसंशा की थी, जिसे ठेकेदार और महंथ ने मिलकर हड़प लिया। नतीजतन कमरे और शौचालय तो बने, लेकिन बच्चों के लिये नहीं, बल्कि महंथ और उसके परिवार के लिये। (दरभंगा से अपना बिहार के प्रतिनिधि आनंद झा की आंखों देखी रिपोर्ट) 

शिक्षा दिवस पर शिक्षा की उड़ी धज्जियां

शिक्षाविद अबुल कलाम आजाद के जन्म दिवस पर आयोजित शिक्षा दिवस के अवसर पर बिहार सरकार ने शिक्षा की जमकर धज्जियां उड़ाईं। गांधी मैदान में आयोजित कार्यक्रम में आलम यह रहा कि इस अवसर पर मनोरंजन के नाम पर बिहार कोकिला शारदा सिन्हा के गीत परोसे गये। वही शिखा धरे की नृत्य ने पूरे माहौल को शिक्षामय के स्थान पर मेलामय बना दिया था। समारोह में भाग लेने आये लोगों ने भी इस नौटंकी का जमकर लाभ उठाया।

इससे पहले राज्यपाल देवानंद कुंवर ने समारोह का उद्घाटन करते हुए कहा कि प्रौढ साक्षरों को शिक्षित करने की आवश्यकता है। इन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा से सूबे का विकास संभव है। इस अवसर पर गणितज्ञ आनंद को अबुल कलाम आजाद सम्मान से समानित किया गया। समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में राज्य से शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि हाल के वर्षों में सूबे में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं।

स्कूल में जहरीला भोजन खाने से 4 बच्चे मरे, 30 घायल

स्कूलों में दिया जाने वाला मध्याहन भोजन के जहरीला होने के कारण सूबे में कल 4 बच्चों के मरने की सूचना प्राप्त हुई है। मुजफ़्फ़रपुर जिले के पारू स्थित एक स्कूल में जहरीला भोजन खाने से 4 बच्चों की मौत से अभिभावकों में हड़कंप मच गया है। हांलाकि इस संबंध में न तो शिक्षा विभाग के आला अधिकारी अपना मुंह खोल रहे हैं और न ही मुजफ़्फ़रपुर जिले के आला अधिकारी। उधर जहरीला भोजन खाने से जहानाबाद जिले के काको प्रखंड के दमुहा उत्क्रमित विद्यालय में करीब 30 बच्चे गंभीर रुप से घायल हो गये हैं। जैसे ही घटना की जानकारी मिली, अभिभावकों ने शिक्षकों को अपने कब्जे में ले लिया। बाद में सूचना मिलने पर आला अधिकारियों ने शिक्षकों को कब्जे से मुक्त कराया।

93 साल का हुआ पटना विवि

पूर्वी भारत का आक्सफ़ोर्ड कहे जाने वाला ऐतिहासिक पटना विश्वविद्यालय आज अपनी स्थापना का 93 साल पूरा करने जा रहा है। इस अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन भी किया जा रहा है, जिसमें राज्यपाल देवानंद कुंवर मुख्य अतिथि होंगे।

अतीत की बात करें तो इस विवि की स्थापना वर्ष 1917 में की गई थी। 1 अक्टूबर 1917 को पटना विवि अधिनियम लागू किया गया था। प्रो जे पी जेनिंग्स इसके प्रथम कुलपति बने। वर्ष 1920 में दरभंगा महाराज ने पटना में मेडिकल कालेज स्थापित करने के लिये 5 लाख रुपये का दान दिया। वर्ष 1954 में पटना विवि ने महाराजा रामेश्वर सिंह के भतीजे कामेश्वर सिंह से दरभंगा हाऊस को 7 लाख रुपये में खरीदा, लेकिन कामेश्वर सिंह ने दो लाख रुपये इस शर्त्त पर छोड़ दिये कि पटना विवि में स्नातकोत्तर विभाग के भवन को दरभंगा हाऊस के नाम से जाना जायेगा।

आज पटना विवि का वर्तमान अतीत को मुंह दिखा रहा है। इसके गौरवमयी अतीत को पुनरस्थापित करने का प्रयास भी राज्य सरकार नहीं कर रही है। हालत यह है कि विवि में शिक्षकों के आधे से अधिक पद रिक्त हैं। ऐतिहासिक भवन देखरेख के अभाव में ढह रहा है। छात्रावासों पर अवैध छात्रों का कब्जा है। विवि परिसर मे आये दिन हल्ला हंगामा होता रहता है। कभी शिक्षक छात्र को पीटते हैं तो छात्र शिक्षक पीटे जाते हैं। हर साल घोटाला का खेल चलता है। इन सबके बीच न तो छात्रों का सिलेबस पुरा होता है और न ही उनका कैरियर। खैर यही सुशासन है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सुशासन में शिक्षा, ना बाबा ना।

शिक्षक दिवस के अवसर पर नीतीश का तोहफ़ा

राज्य सरकार सभी 27 हजार मिडिल स्कूलों में एक-एक संस्कृत शिक्षकों की नियुक्ति करेगी। इसके अलावा सभी स्कूलों में एक ऊर्दू शिक्षक की बहाली भी की जायेगी। शिक्षक दिवस के अव्सर पर राजकीय पुरस्कार से सम्मानित 8 शिक्षकों को पुरस्कृत करने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये घोषणायें की। इन्होंने यह भी कहा कि राज्य में ढाई सौ बांग्ला शिक्षक भी नियुक्त किये जायेंगे।

पटना विवि में नामांकन घोटाला

पटना विवि के विभिन्न कालेजों एवं स्नातकोत्तर विभागों में नामांकन घोटाला किये जाने का मामला प्रकाश में आया है। कहीं निर्धारित सीटों से अधिक छात्रों का नामांकन लिया गया है तो कहीं आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया गया है। मानव संसाधन विकास विभाग ने निर्धारित सीटों से अधिक लिये गये नामांकन को रद्द करने का आदेश दिया है। इस निर्देश के बाद सैंकड़ों छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया है, वहीं इस पूरे मामले में विवि पदाधिकारियों पर कार्रवाई होना तय है।

शिक्षकेत्तर कर्मियों की हड़ताल समाप्त होने के बाद कालेजों में लौटी रौनक

50 दिनों तक चले शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के हड़ताल के समाप्त होने के बाद कल लंबे समय के बाद राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों सहित 250 अंगीभूत कालेजों में रौनक लौट गई है। हांलाकि गुरूवार के देर रात में ही राज्य सरकार की ओर से मानव संसाधन विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह और शिक्षकेत्तर कर्मचारी महासंघ की ओर से डा विमल कुमार सिंह और महामंत्री गंगा प्रसाद झा ने 19 सुत्री मांगों के समर्थन में समझौते पर हस्ताक्षर किया। इस समझौते के मुताबिक 1 जनवरी 1996 से प्रभावी पंचम वेतनमान मे विभिन्न पदों दिनचर्या लिपिक, शार्टर, पुस्तकालय सहायक, पत्राचार लिपिक एवं सहायक के वेतनमान में हुई विसंगति का निराकरण करते हुए इस संबंध में राज्यादेश निर्गत किया जायेगा। इसके अलावे समझौते में राज्य सरकार द्वारा किये गये सभी दंडात्मक कार्रवाईयों को वापस ले लिया गया है।

पैंसठ बाद रिटायर होंगे विवि शिक्षक

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के विवि शिक्षकों सेवा निवृति की सीमा को बढाते हुए 62 साल से 65 साल कर दिया है। न्यायाधीश नवनीत प्रसाद सिंह की एकल पीठ ने अपने फ़ैसले में अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि जो विवि शिक्षक 30 जून 2010 के पहले रिटायर हो चुके हैं, उन्हें यह लाभ नहीं मिल सकेगा।

शिक्षकों का हड़ताल समाप्त

राज्य के राजकीयकृत माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल समाप्त हो गई है। इसके साथ ही हड़ताली शिक्षकों को जेल भरो आंदोलन भी समाप्त हो गया है। राज्य सरकार और बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ एवं बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के बीच लिखित समझौते के बाद हड़ताल समाप्ति की घोषणा की गई। इस समझौते के तहत सभी 11 सूत्री मांगों के संबंध में राज्य सरकार ने विचार करने का आश्वासन दिया है। इसके अलावा हड़ताली शिक्षकों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जायेगी।

शिक्षा का अधिकार में हो समेकित समावेश

शिक्षा का अधिकार कानून जैसे अनेक सरकारी दस्तावेज सामाजिक कुव्यवस्थाअ का मुंह चिढाने के लिये काफ़ी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है क्या वाकई में समाज के सभी तबके के लोग इस अधिकार के प्रति सजग हैं। जबतक इस बुनियादी समस्या को सुलझाने के लिये समाज के सभी लोग सामूहिक पहल नहीं करेंगे और समेकित समावेश को क्रियान्वित नहीं किया जायेगा, तबतक कानून को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता है। ये बाते राज्य के प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो विनय कंठ ने शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के संदर्भ में आयोजित एक कार्यशाला में कहीं।

इस अवसर पर प्रो डेजी नारायन ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कई अनेक बुनियादी समस्याओं से जुड़ा है। इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि सभी समस्याओं को एक नजरिये से देखा जाये। इन्होंने यह भी कहा कि जबतक शिक्षा में अंतर रहेगा यानि सरकारी और सुविधा संपन्न परिवार के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में और राज्य 80 प्रतिशत गरीब बच्चे सरकारी सुविधाविहीन विद्यालयों में पढेंगे, तबतक शिक्षा का अधिकार कानून एक दस्तावेज मात्र है। इस अवसर पर विजय कांत सिन्हा, संजीव राय, जदयू नेता गुलाम रसूल बलियावी, विनोदानंद झा, प्रदीप प्रियदर्शी और रघुपति जी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।

बिहार सरकार का एक और फ़रमान, 1000 शिक्षकेत्तर कर्मचारी निलंबित, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों को भी मिली धमकी

पिछले पौने दो महीने से चली आ रही राज्य विभिन्न विश्वविध्यालयों के शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की मांगों को दरकिनार करते हुए बिहार सरकार ने 1000 शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। मानव संसाधन विकास विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार शिक्षकेत्तर कर्मचारियों से बातचीत करने का प्रयास विफ़ल रहा है और इस कारण जो अभी तक अपने कार्य स्थल से अनुपस्थित पाये गये हैं, उन्हें निलंबित किया जाता है। उधर शिक्षकेत्तर कर्मचारी भी इन्कलाबी मुद्रा में हैं। इनके एक प्रतिनिधि ने अपना बिहार को बताया कि अपने हक के लिये वे फ़ांसी पर भी झुलने को तैयार हैं। राज्य के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो नवल किशोर चौधरी ने राज्य सरकार के द्वारा लिये गये कदम को बर्बरतापूर्ण कार्रवाई की संज्ञा दी है। इसके अलावा आंदोलनरत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों पर भी सरकारी तलवार लटकने लगा है। विभाग से एक अधिसूचना जारी कर दी गई है। अनुपस्थित पाये जाने वाले शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया जायेगा।

बेकार गया सरकारी फ़रमान

पिछले 39 दिनों से राज्य के 250 कालेजों में ताले लगे हैं और छात्र पेशोपेश में है कि कब उनकी पढाई शुरू हो। इससे इतर राज्य सरकार और हड़ताली शिक्षकेत्तर कर्मचारी दोनों अपने-अपने जिद पर अड़े हैं। हांलाकि राज्य सरकार ने साम, दाम, दण्ड और भेद चारों नीतियों को अमल में लाकर देख चुकी है। कल राज्य सरकार ने दण्ड की नीति के तहत आदेश जारी किया कि यदि हड़ताली शिक्षकेत्तर कर्मचारी काम पर लौटें नहीं उन्हें निलंबित कर दिया जायेगा। मानव संसाधन विभाग के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह ने सभी विश्वविद्यालयों को आदेश दिया है कि सभी कर्मचारियों की उपस्थिति पुस्तिका प्रति दिन विभाग को भेजेंt ताकि अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के खिलाफ़ कार्रवाई की जा सके।

उधर शिक्षकेत्तर कर्मचारी भी मर-मिटने की घोषणा कर रहे हैं। इन कर्मचारियों ने राज्य सरकार से दो टूक शब्दों में कहा है कि जबतक वह पिछले समझौतों के कार्यान्व्यन के लिये राज्यादेश जारी नहीं करेगी, तबतक एक भी शिक्षकेत्तर कर्मचारी न तो काम पर लौटेंगे और न ही सरकारी फ़रमान के आगे घुटने टेकने वाले हैं।

बहरहाल अंदरूनी खबर यह है कि दोनों यानि राज्य सरकार और हड़ताली कर्मचारी इलेक्शन ईयर के कारण मजबूर हैं। राज्य सरकार द्वारा हड़ताली शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के आगे नाक रगड़ने और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का भाव खाना तो यही साबित करता है कि अब सरकार सरकार न रहे और कर्मचारी भी जान गये हैं कि आखिर इलेक्शन ईयर में सरकार के पास विकल्प भी क्या है। चाहे भले ही इनके तकरार से लाखों युवाओं का भविष्य खराब हो जाये तो हो जाये। सरकार को कुर्सी तो कर्मचारियों को केवल माल से मतलब है।

सुपर थर्टी इज़ रियली सुपर – रशद

अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत रशद हुसैन ने कल सुपर थर्टी का भ्रमण किया और वहां अध्ययनरत छात्रों के साथ अनुभवों को साझा किया। इस अवसर पर सुपर 30 के संचालक आनंद को बधाई देते हुए श्री हुसैन ने कहा कि यह वाकई काबिले तारीफ़ है कि गरीब और मजलुमों के बच्चे भी उच्च कोटि के इंजीनियर बन सकते हैं।

शिक्षा विभाग ने किया कमाल, स्वर्गवासी को किया बहाल

राज्य का मानव संसाधन विकास विभाग के पैर इन दिनों जमीन पर नहीं है। इसके अलावा चुनाव की घोषणा नजदीक देख राज्य सरकार की हड़बड़ी का एक कमाल यह कि मगही सहित सभी विभिन्न अकादमियों का पुनर्गठन के बहाने अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को कुर्सी देने के फ़िराक में एक स्वर्गवासी जदयू नेता को मगही अकादमी की 12 सदस्यीय कार्यसमिति का सदस्य बना दिया। चार अगस्त की तारीख में सरकार के उपसचिव ओंकारनाथ आर्य के हस्ताक्षर से जारी अधिसूचना के अनुसार इस कार्यसमिति के एक सदस्य रामनगीना सिंह “मगहिया” का नाम भी शामिल है, जिनकी मृत्यु पिछले साल एक अगस्त को हो गया है।

 

जीवन से भरी हैं ज्योतिविहीन आंखें, उपेक्षा के बावजूद जीना सीख रही बेटियां

पूजा की आंखों में जीवन है। वह देख नहीं सकती है। इसके बावजूद सपने देखती है। वह आगे पढकर उन लोगों की सेवा करना चाहती है, जो उसकी तरह अपने तन की आंखों से दूनिया को नहीं देख सकते। मूलतः छपरा जिले के दिघवारा प्रखंड के बतरौली गांव के निवासी रामशरण सिंह और सुदामा देवी की बेटी पूजा पिछले 8 वर्षों से राजधानी पटना के कुम्हरार पार्क के पास अवस्थित अंतर्ज्योति बालिक आवासीय विद्यालय की दसवीं कक्षा की छात्रा है। पूजा बताती है कि उसके जैसी करीब 65 बच्चियां इस स्कूल में रहकर जीवन जीने की कला सीखती हैं।

निभा, सीमा, प्रेरणा, निधि, शांति और गुड़िया आदि सभी बिहार के अलग-अलग जिलों की रहने वाली हैं। इन सबके बीच साझा खासियत यह है कि ये मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी चुनौती का मुकाबला एक साथ कर रही हैं। हालांकि इनका स्कूल वर्ष 1993 में स्थापित हुआ था। वह भी बिना किसी सरकारी प्रयास के समाज के कुछ जागरुक लोगों ने इसकी स्थापना की। आज भी इनके स्कूल में शिक्षक हैं, जो इन्हें पढाते हैं। स्कूली पढाई के अलावे स्पोकेन इंग्लिश, गायन और डांस आदि सिखाया जाता है।

इन सबके अलावे इन बेटियों को समस्यायें भी झेलनी पड़ती है। खाने की समस्या से लेकर अनेक छोटी-मोटी जरुरतें हैं। समस्यायें बहुत सारी हैं। संभवतः स्कूल परिसर में स्कूल अधिकारियों की मौजूदगी में ये बेटियां अपने दिल की बात नहीं कह पातीं। हालांकि स्कूल की हास्टल वार्डेन रेणु देवी बताती हैं कि चुंकि यह स्कूल सरकारी नहीं है और समाज के कुछ जागरुक लोगों द्वारा स्वेच्छा से दिये गये दान के द्वारा चलाया जाता है। इसके बावजूद बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल की जाती है। हर पंद्रह दिन पर एक चिकित्सक आते हैं और सभी छात्राओं के स्वास्थ्य की जांच करते हैं।

कारण पूरे विद्यालय में मच्छरों का प्रकोप है। इन सारी समस्याओं के बावजूद बिहार की इन बेटियों के आंखों में सपने हैं। सपने आगे बढने की। समाज और देश में अपनी भूमिका खुद तय करने की। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बेटियां अपने लक्ष्य को पाने के लिये सफ़ल कोशिश कर रही हैं।

सुशासन की खोज – यहां बच्चों के पढने के लिये कमरे नहीं हैं

राजधानी में एक विश्वविद्यालय है। चाणक्या नेशनल ला यूनिवर्सिटी यानी चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय। राज्य सरकार की समस्या यह है कि इस विश्वविद्याल को सजीव हुए अब 4 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, लेकिन आजतक सरकार को शिक्षक नहीं मिले हैं। हालांकि विश्वविद्यालय द्वारा नेशनल लेवल यानी राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन निकाला गया, लेकिन विश्वविद्यालय को आजतक शिक्षक नहीं मिले। नतीजतन बेचारे छात्र फ़िर भी पढे जा रहे हैं और जब अपने हक की मांग करते हैं तो सरकार उन्हें उलटा लटका देती है।

खैर, राजधानी पटना में एक स्कूल ऐसा भी है, जहां शिक्षक भी हैं और शिक्षार्थी यानी स्टूडेंट्स भी। मसौढी अनुमंडल से करीब 1 किलोमीटर दूर अवस्थित है दहीभत्ता गांव। इस गांव के स्कूल में दो कमरे और एक बरामदा है। एक कमरे में प्रिंसिपल का कार्यालय है तो दूसरे को भंडार गृह बना दिया गया है। बच्चों के लिये एक बरामदा है। बरामदे में जितने बच्चे बैठ सकते हैं, बैठ जाते हैं और शेष बच्चे बाहर बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर पढते हैं। स्कूल में शौचालय नहीं है। पीने के पानी की सुविधा तो है लेकिन पिछले 2 वर्षों से चापाकल खराब पड़ा है। स्कूल के प्रिंसिपल बताते हैं कि हर महीने वे जब स्कूल की रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी को भेजते हैं तब इन विषमताओं का जिक्र करते हैं, लेकिन कोई सुनता ही नहीं है।

बहरहाल, कहा जा रहा है कि शिक्षा के क्षेत्र में आमूल परिवर्तन हुए हैं और फ़िर शिक्षा के क्षेत्र में सुशासन कायम हो गया है। वैसे खास जानकारी यह कि राजधानी में दर्जनों स्कूल ऐसे हैं, जिनके पास न तो अपनी जमीन है और न ही कोई छत। फ़िर भी सूबे में सुशासन है। है न कमाल की बात?

सुशासन का प्रमाण - सूबे के 89 फ़ीसदी स्कूलों में रुटीन नहीं

बिहार में सुशासन है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह कि सूबे के 89 फ़ीसदी सरकारी स्कूलों में कोई रुटीन फ़ौलो नहीं किया जाता है। सुशासन का दूसरा प्रमाण यह कि सूबे के 65 फ़ीसदी शिक्षक ब्लैक बोर्ड का उपयोग नहीं करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बिहार दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है, इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह कि 85 फ़ीसदी कक्षाओं में पाठ संबंधित कोई कार्रवाई नहीं होती है। इसके अलावे 97 फ़ीसदी शिक्षकों को अपने दायित्व यानि उनकी कक्षाओं के शैक्षिक लक्ष्य की जानकारी नही है। यह सब सुशासन के प्रमाण हैं और इन सारे प्रमाणों को कल यूनिसेफ़ द्वारा संपोषित कार्यक्रम समझे-सीखें के दौरान सामने आये। बताते चलें कि आगामी 15 अगस्त से बिहार सरकार शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक सुशासन लाने के इरादे से इस कार्यक्रम को पूरे राज्य में लागू करेगी। इस कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य बिहार के शिक्षकों को गुणवान बनाना है।

भवनहीन हैं पटना के 120 सरकारी स्कूल

जी हां, यह एक सच्चाई है बिहार की शिक्षा व्यवस्था की। अकेले केवल पटना में ही 120 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जिनके पास अपना भवन तक नहीं है। इस स्थिति के बावजूद ये सभी स्कूल चल रहे हैं। कुछ हकीकत में कुछ केवल कागजों में। बताते चलें कि बिहार में वर्ष 1980 के बाद खोले गये इन स्कूलों के लिये अभी तक अपना जमीन मयस्सर नहीं हो सका है। बिहार के शिक्षा विभाग के भूतपूर्व प्रधान सचिव स्व मदन मोहन झा ने इस समस्या को दूर करने की एक दूरगामी पहल की योजना बनाई थी, जो उनके निधन के बाद आजतक कचरे के डिब्बे में पड़ा हुआ है। रही बात स्कूलों की तो उसकी एक बानगी यह कि पटना हाई स्कूल यानि शहीद राजेंद्र प्रसाद सिंह राजकीय प्लस टू स्कूल के परिसर में नवस्थापित माध्यमिक स्कूल चल रहा है। मुख्य हाई स्कूल में करीब 3000 छात्र पढते हैं। जबकि जमीनविहीन स्कूल में केवल 70 बच्चे ही पढाई करते हैं। जबकि सरकार चाहे तो इस स्कूल को उन इलाकों में स्थापित कर सकती है, जहां हाईस्कूल की आवश्यकता है। इस संबंध में एक दूसरा उदाहरण यह कि बोरिंग रोड के इलाके में बच्चियों की पढाई के लिये एक गर्ल्स हाई स्कूल खोला गया। लेकिन जमीन के अभाव में आज भी यह स्कूल डाकबंगला स्थित विद्यालय निरीक्षिका के कार्यालय परिसर में चल रहा है। नतीजतन इसका लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है, जिनके लिये इसे स्थापित किया गया है। इस संबंध में शिक्षा विभाग के मौजूदा प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह का कहना है कि पूर्व में जमीन विहीन स्कूलों की संख्या 300 के पास थी, जो अब घटकर केवल 120 रह गई है। सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिये गंभीर है।

वाह क्या शिक्षा व्यवस्था है नरपतगंज में ?

अररिया जिले के नरपतगंज में शिक्षा व्यवस्था की दाद देनी होगी। वह इसलिये कि यहां के सरकारी स्कूलों में पहुंचने वाला एमडीएम खाद्यान्न यानी मिड डे मिल का अनाज स्कूल से पहले ही किराना दूकानों में पहुंच जाता है और बच्चों को दी जाने वाली पाठ्य पुस्तकें स्कूल पहुंचने के पहले ही कबाड़ी दूकानों की शोभा बन जाती हैं। इस सच का पर्दाफ़ाश अभी हाल ही में हुआ। जब नरपतंज पुलिस ने एक किराना व्यापारी के यहां छापा मारकर मिड डे मिल का अनाज जब्त किया। फ़िर जब जांच शुरु हुई तो यह सच भी सामने आया कि वर्ष 2010 में बिहार स्टेट टेक्स्टबुक पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशित पाठ्य पुस्तकें कबाड़ी वालों के यहां कौड़ियों के भाव में बेच दी गई है। थोड़ा और जांच किया गया तो यह सच भी सामने आया कि इस पूरे खेल में केवल एक प्रखंड मुख्यालय स्थित क्न्या मध्य विद्यालय के प्रिंसिपल और शिक्षक ही शामिल नहीं, बल्कि प्रखंड के लगभग सभी सरकारी स्कूलों की हालत एक जैसी ही है। बहरहाल, आम जनता के बीच सर्व शिक्षा अभियान के तहत दी रही सुविधाओं की पोल खुल चुकी है। अब सबको उम्मीद है कि शायद सुशासन सरकार नरपतगंज में चल रहे इस लूट को रोके।