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Text Box: विशेष संपादकीय - बिहार के विकास की कहानी, आंकड़ों की जुबानी
नवल किशोर कुमर
Text Box: विकास की खबरें

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सापेक्षवाद के सिद्धांत के आविष्कार ने दूनिया के अनेक समस्याओं को जन्म भी दिया है और अनेक समस्याओं का निराकरण किया है। बिहार के संदर्भ में सापेक्षवाद के नियमों का पालन करना कितना न्याय संगत होगा अथवा नहीं, यह अपने आप में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है। पिछले तीन सालों में अबतक अनेक ऐसी रिपोर्टें आईं हैं, जिन्होंने बिहार का विकास किसी न किसी के सापेक्ष में या तो विकास की दिशा में सबसे तेज गति से दौड़ लगाने वाला बताया। लेकिन क्या यह वाकई संभव है कि हर बिहार की तुलना गुजरात और महाराष्ट्र अथवा पंजाब या हरियाणा के सापेक्ष करें। सबसे पहला सवाल तो यही है कि समुद्री तटों के किनारे बसे राज्यों, जहां विकास ने सबसे पहले अपना डेरा जमाया और एक बिहार जहां विकास आज केवल राजनीतिक हथियार बनकर रह गया है। पंजाब और हरियाणा के साथ भी बिहार की तुलना करना निस्संदेह जायज नहीं होगा, क्योंकि केंद्र के दोहरी नीति की मार इन राज्यों को नहीं झेलनी पड़ी। इसका आशय यह है कि यदि केंद्र सरकार ने समान किराया अधिनियम बिहार पर जबरन नहीं थोपा होता, तो निश्चित तौर पर पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र वाले लोग हमारी तरह ही आज अपने राज्य के विकास को मापने के लिये बिहार का सहारा ले रहे होते।

 

खैर बिहारवासियों का अपना कार्य चरित्र है और इसी कार्य चरित्र के साथ बिहारियों ने अबतक के विकास की परिकल्पना को साकार किया है। ह्म बिहारवासियों को इसका मलाल अवश्य है कि हमारे राज्य में पिछले चार सालों में 120 लोगों की मौत भूख के कारण हुई है, लेकिन हमें इस बात की खुशी भी है कि हमारे राज्य के किसी भी किसान ने आत्महत्या नहीं की। बेशक हमारे राज्य में घोटाले की संस्कृति रही है और दुर्भाग्यवश बिहार का विकास बाधित रहा है। इसके बावजूद हमने पिछले साल 11 फ़ीसदी का जीडीपी वृद्धि दर हासिल किया। अब यह अलग सवाल है कि यह उपलब्धि प्रश्नवाचक है या नहीं?

 

अभी बिहार के विकास को समझने के लिये सबसे पहले हमें इस तथ्य को समझना आवश्यक होगा कि आखिर बिहार मे हो क्या रहा है। मसलन हमें यह जानने का प्रयास करना होगा कि बिहार में किस तरीके से धन आता है और किस तरीके से खर्च किया जाता है। इस साल विधानमंडल में उपस्थापित बजट में वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस तथ्य को रखा था। इनके अनुसार बिहार में 49.94 फ़ीसदी धन केंद्रीय करों में बिहार का हिस्से के रुप में प्राप्त होता है। इसके अलावा 21.65 फ़ीसदी धनराशि केंद्र सरकार के रहम यानि केंद्रीय सहायता के रुप में, लोक ॠण के रुप में 11.75 फ़ीसदी और 0.06 फ़ीसदी धनराशि उधार एवं अग्रिम के रुप में प्राप्त होती है। इसके बाद यदि बिहार के अपने संसाधनों की बात करें, तो सबसे बड़ी हिस्सेदारी राज्य का अपना कर राजस्व 15.46 फ़ीसदी और राज्य का कर भिन्न राजस्व 1.14 फ़ीसदी है। यानि कुल मिलाकर देखें तो राज्य के पास केवल 16.6 फ़ीसदी धनराशि ही जुटा पाने की क्षमता है।

 

अब यदि हम खर्च की बात करें तो आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया अथवा कर्ज लेकर घी पीने वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आ रही है। यानि 31.50 फ़ीसदी धनराशि आर्थिक सेवाओं पर खर्च कर दिया जाता है और सामान्य सेवा के नाम पर करीब 27.75 फ़ीसदी राशि खर्च की जाती है। सामाजिक क्षेत्र में सबसे अधिक 35.86 फ़ीसदी राशि खर्च की जाती है। इसके अलावा लोक ॠणों को चुकाने में 3.91 फ़ीसदी राशि खर्च की जाती है। यानि हम लोक ॠण लेते हैं 11.75 फ़ीसदी और चुकाते हैं केवल 3-91 फ़ीसदी। इस प्रकार हर साल करीब हमारे ऊपर 8 फ़ीसदी के दर से देनदारी ब्ढती जा रही है। यहां यह भी बताना आवश्यक है कि राज्य में करीब 18.19 फ़ीसदी धनराशि सरकारी कर्मचारियों के वेतनादि पर खर्च किये जाते हैं जो राज्य अपने संसाधन से भी अधिक है। वर्ष 2006-07 में बिहार में कुल कर्मचारियों की स्वीकृत संख्या 579210 थी। जाहिर तौर पर पिछले तीन सालों में जिस हिसाब से आंख मूंदकर बहाली की जा रही है, इस संख्या में जबर्दस्त उछाल आने की संभावना है। यहां यह भी बताना आवश्यक है कि 31 मार्च 2008 तक बिहार में कर्मचारियों की कुल संख्या कुल आवश्यकता का केवल 76 फ़ीसदी ही है।

 

वर्तमान बिहार सरकार ने बिहार का विकास आंकड़ों के शक्ल में आम जनता को दिखाये हैं। इस विकास की कहानी को समझने के लिये इस आंकड़े को देखना और समझना भी आवश्यक होगा।

 

 

यहां अन्य सारे तथ्यों को दरकिनार कर यदि प्रति व्यक्ति जीएसडीपी की बात करें तो वर्ष 2000 के बाद से इसमें 7.33 फ़ीसदी की दर से वृद्धि हुई है, जो पूरे बिहार में सबसे कम है। मसलन वर्ष 2005-06 में छत्तीसगढ में प्रति व्यक्ति एनएसडीपी 20151 रुपये है और झारखंड में भी यह 19066 रुपये है।

 

 

बहरहाल यह समय है सोचने का और समझने का। बिहार को जिस तरीके से दूनिया के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है, वह तरीका न केवल राजनीतिक लोमड़ियों को पोषकता प्रदान करने वाला है, बल्कि इससे बिहार का अहित हो रहा है। आम जनता कभी यह जान भी नहीं पाती है कि उसके बिहार को हुआ क्या है। यदि बिहार के लोग जान जायेंगे कि बिहार बिजली के क्षेत्र में क्यों पिछड़ा है और इसके निदान के और क्या=क्या उपाय हो सकते हैं तो संभव है कि बिहार के लोग इस दिशा में अपनी भूमिका निभा सकेंगे। लेकिन ऐसा नहीं होने देना ही यहां के राजनेताओं की चाल है। आजतक बिहार की जनता को यह मालूम ही नहीं है कि उनकी गाढी कमाई के पैसे से बिहार के सभी माननीय ऐश की जिन्दगी जीते हैं और 40 से 45 प्रतिशत तक की कमीशन भी खाते हैं। यह भी एक सच्चाई है बिहार की। बिहार विधानसभा और विधान परिषद के सभी सदस्यों को प्रत्येक साल एक करोड़ रुपये क्षेत्र के विकास के लिये अलग से दिये जाते हैं। हांलाकि खर्च करने की जिम्मेवारी सरकारी अधिकारियों के पास होती है, लेकिन कहां किया जाना है, इसका आदेश तथा कौन ठेकेदार करेगा, इसका आदेश माननीय जनप्रतिनिधि के रुप में लोकतंत्र के ये ठेकेदार देते हैं। इसके लिये 40-45 प्रतिशत तक का कमीशन ये अपने पसंदीदा ठेकेदारों से पहले ले लेते हैं।