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अपना बिहार निष्पक्षता हमारी पहचान
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सुशासकों द्वारा लोकतंत्र की हत्या, एकतरफ़ा कार्रवाई में संपूर्ण विपक्ष निलंबित जी हां, बिहार में सुशासन के राज में भी लोकतंत्र की हत्या सुशासकों द्वारा की जा चुकी है। हिटलर समेत पाकिस्तान के तानाशाहों को भी पीछे छोड़ते हुए राज्य सरकार के मुखिया नीतीश कुमार के आदेश पर पूरे विपक्ष को निलंबित कर दिया गया है और सभी विपक्षी सदस्यों के सत्र के दौरान विधानमंडल परिसर में प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। इससे पहले कल जैसे ही विधानमंडल के दोनों सदनों की कार्रवाई शुरु हुई। सत्ता पक्ष के सदस्य विपक्ष के आंदोलनरत सदस्यों को चुनौती देने लगे। इनमें से एक बिहार सरकार के मंत्री गिरिराज सिंह ने विपक्षी सदस्यों को यहां तक कर दिया कि चाहे जमीन उठा लिजिये या आसमान, कुछ नहीं बिगड़ेगा हमारा। उलटा मिट्टी आपही का पलीद होगा। एक विधान पार्षद संजय कुमार सिंह ने भी विधान परिषद के राजद सदस्यों पर फ़िकरे कसे। विधानसभा के अध्यक्ष उदय नारायन चौधरी ने सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए विपक्षी सदस्यों को निलंबित करने की धमकी दी। इस दौरान सत्ता पक्ष और विपक्षी सदस्य दोनों कबड्डी खेल रहे थे। इसके बावजूद एक धृतराष्ट्रवत व्यवहार करते हुए श्री चौधरी ने एक बार फ़िर विपक्ष के सदस्यों को धमकाया। इससे उत्तेजित होकर विप्क्ष के एक सदस्य ने चप्पल फ़ेंककर विधानसभाध्यक्ष को चेतावनी दी। इसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच अमर्यादित टीका टिप्पणी हुई। लेकिन श्री चौधरी ने पहले तो राजद के तीन विधायकों अब्दुल बारी सिद्दीकी, डा शकील अहमद खां और अजय बुलगानिन को मार्शल आऊट का आदेश दिया। उनके आदेश का पालन करते हुए इन तीनों सदस्यों को घसीटते हुए परिसर से बाहर कर दिया गया। इसके बाद भी श्री चौधरी जैसे यह ठानकर ही आये थे कि आज विधानसभा में तानाशाही को स्थापित करना है, इन्होंने संपूर्ण विपक्ष को पूरे सत्र के लिये निलंबित कर दिया। उधर विधानपरिषद में भी उस समय कोहराम मच गया जब राजद के पार्षद संजय प्रसाद ने माईक तोड़कर उसे सभापति ताराकांत के सामने फ़ेंक दिया। इससे पहले भी विधानपरिषद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच माईक को गेंद बनाकर क्रिकेट खेलने का अभ्यास चल रहा था। लेकिन जैसे ही संजय प्रसाद ने माईक सभापति की ओर फ़ेंका, सतापक्ष के पार्षद नीरज कुमार की अगुआई में एक और पार्षद ने राजद पार्षद पर जानलेवा हमला किया। इसी बीच राजद के सदस्यों ने नीरज कुमार की विधान परिषद के अंदर की गुंडागर्दी देख ली और फ़िर दोनों ओर से लात-घुंसे चलने लगे। इसके बाद सुरक्षा प्रहरियों के बीच बचाव से इस गुंडागर्दी पर रोक लगी। अब माईक तोड़ना और उसे सभापति की ओर फ़ेंकने की सजा तो मिलनी ही थी, सो संजय प्रसाद को सजा मिली। लेकिन सत्तापक्ष के उन पार्षदों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो इस पूरे गुंडागर्दी के नायक थे। बहरहाल बिहार में विपक्ष को निलंबित कर दिया गया है, और राज्य सरकार के लिये पूरा मैदान है। लेकिन बिहार के लोकतांत्रिक इतिहास में यग पहला मौका है जब सदन की कार्रवाई विपक्ष की अनुपस्थिति में होगी। ऐसे भी चाहे 1 अणे मार्ग हो या फ़िर विधानमंडल, कब्जा तो उसी का होगा न, जिसके पास नीरज कुमार, किशोर कुमार मुन्ना, अनंत सिंह, सुनील पांडेय जैसे विश्वप्रसिद्ध गुंडे हों। ये विधानसभा अध्यक्ष हैं या फ़िर ? बिहार विधानसभाध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने कल अपनी वफ़ादारी का एक और सबूत देते हुए एक नियमन को जारी किया। इस नियमन के अनुसार यदि कोई मामला विधानमंडल के पास विचाराधीन है, तो उस मामले में न्यायालय को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि न्यायालन हस्तक्षेप करता है तो उसे विधायिका के अधिकार क्षेत्र का हनन समझा जायेगा। यानि हाल ही में अप्ने जिस आदेश में पटना उच्च न्यायालय ने राज्य में 11 हजार 412 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच की जिम्मेवारी सीबीआई को देने का निर्णय लिया, विधानसभा अध्यक्ष का कहना था कि चुंकि ये मामला बिहार विधानसभा के लोक लेखा समिति के पास विचाराधीन है, इस परिस्थिति में हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। इस संबंध में अपना बिहार ने लोक लेखा समिति के एक सदस्य सह वामपंथी नेता रामदेव वर्मा से विशेष बातचीत की। इस बातचीत के दौरान श्री वर्मा ने साफ़ शब्दों में कहा कि राज्य सरकार की विफ़लता के बाद शिकायत प्राप्त होने पर न्यायालय को हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है और यह किसी भी दृष्टिकोण से विधायिका के कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण नहीं है। इसलिये विधानसभाध्यक्ष द्वारा दिये गये नियमन व्यर्थ दिया गया नियमन है। इसके विपरीत विधानसभाध्यक्ष ने यह नियमन जारी कर यह साबित कर दिया है कि उन्हें विधासभाध्यक्ष के पद की मर्यादा की कोई फ़िक्र नहीं है और वे राज्य सरकार की वकालतगिरी कर रहे हैं। श्री वर्मा ने बताया कि संविधान के अनुसार विधायिका का काम बजट बनाना और उसे पास करना है। जबकि बजट में उद्घोषित योजनाओं के क्रियान्य्वयन की जिम्मेवारी कार्यपालिका की होती है। चुंकि विधायिका कार्यपालिका के कार्यों का अनुसरण प्रत्यक्ष तरीके से नहीं सकता, इसलिये कानून में महालेखाकार की नियुकित की गई है ताकि कार्यपालिका द्वारा किये गये वित्तीय लेन-देन पर नजर रखा जा सके। महालेखाकार वित्तीय लेखों का अनुश्रवण कर अपना प्रतिवेदन लोक लेखा समिति को समर्पित करती है। इस समिति का गठन विधानसभा द्वारा की जाती है। प्रतिवेदन प्राप्त होने समिति प्राप्त शिकायतों पर विचार करती है और जांचोपरांत अपना प्रतिवेदन विधानसभा के पटल पर प्रस्तुत करती है। श्री वर्मा ने बताया कि अबतक 312 प्रतिवेदन विधानसभा के पटल पर रखे जा चुके हैं, लेकिन एक भी प्रतिवेदन पर राज्य सरकार ने कोई अमल नहीं किया। इस परिस्थिति में यदि शिकायत प्राप्त होने पर न्यायालन ने हस्तक्षेप किया है तो निश्चित तौर जायज है। राजद के एक और वरिष्ठ सदस्य डा रामचंद्र पूर्वे ने भी अपना बिहार को बताया कि न्यायालय का हस्तक्षेप विधायिका के अधिकार अतिक्रमण नहीं है। इन्होंने बताया कि जब भी कोई मामला व्यापक रुप से जनजीवन से जुड़ा हो तो वैसे किसी भी मामले में शिकायत प्राप्त होने पर न्यायालय का हस्तक्षेप विधायिका के अधिकारों का हनन नहीं माना जाता। है। ऐसे कई मामले पूर्व में हो चुके हैं। डा पूर्वे ने चारा घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय यह मामला भी लोक लेखा समिति के विचाराधीन था और न्यायालय ने हस्तक्षेप किया था। उस समय शिकायतकर्ता के रुप में स्वयं सुशील कुमार मोदी और शिवानंद तिवारी थे। जबकि इस बार 11,412 करोड़ के ट्रेजरी घोटाले के मामले में बिहार के एक आम आदमी न्यायालय से गुहार लगाई है। डा पूर्वे ने भी कहा कि विधानसभाध्यक्ष द्वारा नियमन प्रस्तुत करने से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। यह मामला न्यायालय के अधीन है और राज्य सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई होना है। इन्हें विश्वास है कि न्यायालय निष्पक्ष रुप से अपना निर्णय देगी। आज लगी है न्यायपालिका की साख दांव पर राज्य सरकार ने सीबीआई की जांच से बचने के लिये उच्च न्यायालय में पुनर्विचर याचिका दायर किया था। आज इस माम्ले की सुनवाई होनी है। अपने पहले के आदेश में न्यायालय ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था। कई यह कयास लगा रहे हैं कि न्यायपालिका भी शायद इस बार राज्य सरकार के समक्ष घुटने टेके दे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि बिहार न्याय का मतलब ही बिकाऊ न्याय है। परंतु एक सच्चाई यह भी है कि यदि आज का फ़ैसला सरकार के विरोध में गया तो राज्य सरकार के पास सिवाय सुप्रीम कोर्ट जाने के कोई विकल्प नहीं बचेगा और दो दिनों से जारी राजनीतिक अराजकता की जिम्मेवारी भी राज्य सरकार को लेनी होगी।
बिहार के लोकतंत्र का काला दिन, रणभूमि में तब्दील हुई विधानसभा, मुख्यमंत्री ने दी विपक्षी विधायकों को गाली, 30 विधायक हुए जख्मी आवहूं रोवहूं सब बिहारी भाई, बिहार दुर्गति देखी न जाई। प्रसिद्ध साहित्यकार भारतेंदू हरिश्चंद्र की पंक्तियों पर आधारित ये वाक्य आहवान करती हैं करोड़ों बिहारियों का। कल जो कुछ भी बिहार विधानसभा में हुआ, वह बिहार के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन साबित करने के लिये काफ़ी था। कल विधानसभा में जैसे ही कार्रवाई शुरू हुई लगभग सभी विपक्षी सदस्य मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफ़े को लेकर मांग करने लगे। मांग के दौरान विपक्षी सदस्यों ने खजाना चोर, गद्दी छोड़ आदि नारे लगाये। साढे ग्यारह हजार करोड़ रुपये के ट्रेजरी घोटाले को लेकर उत्तेजित विपक्ष ने विधानसभा अध्यक्ष की एक न सुनी। नतीजतन विधानसभा की बैठक 2 बजे तक के लिये स्थगित कर दी गई। इसके बाद जैसे ही विधानसभा की कार्रवाई शुरु हुई, एक बार फ़िर सारा विपक्ष वेल में उतर गया। इस बार खासियत यह थी कि सत्ता पक्ष भी वेल में उतर गया। जदयू और भाजपा के विधायक केंद्र सरकार के इस्तीफ़े की मांग करने लगा। इसी बीच विपक्ष के कुछ सदस्यों ने एक बार फ़िर खजाना चोर गद्दी छोड़ का नारा बुलंद किया। इससे उत्तेजित होकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सभी मर्यादाओं को तोड़ते हुए अपने पक्ष के विधायकों को ललकारते हुए कहा कि मारो सालों को। इसके बाद पूरा विधानसभा कुरूक्षेत्र में तब्दील हो गया। दोनों दलों के सदस्यों के बीच जमकर हाथा पाई हुई और कुर्सियां चलीं। इस मारपीट में करीब 30 विधायक जख्मी हुए। इनमें राजद के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी, डा शकील अहमद खां, पिताम्बर पासवान, उदय मांझी और भाकपा(माले) के विधायक अमरनाथ यादव, अरूण कुमार सिंह आदि नेता शामिल थे। इसके अलावा भाकपा कानून बनाने वाले लोग कानून तोड़ने लगे। मौके की नजाकत को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने विधानसभा की कार्रवाई पूरे दिन के लिये स्थगित कर दी। विधानमंडल पर विपक्षी सदस्यों का कब्जा संभवतः बिहार के लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहली घटना है जब पूरे विपक्ष ने विधानमंडल में कैंप कर रखा है। सरकार के तानाशाह रवैये को देखते हुए विपक्षी सदस्यों ने विधानमंडल में आंदोलन करना शुरु कर दिया है। इसी क्रम में लगभग सारे विपक्षी सदस्य पूरी रात विधानमंडल में मौजूद रहे। इस दौरान सदन के प्रवेश द्वारों को बंद कर दिया गया था और सभी सदस्य बरामदे में ही जमीन पर सोये। इस संबंध में राजद के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी ने दूरभाष पर अपना बिहार को बताया कि या तो जबतक तानाशाह सरकार उन्हें उठाकर सड़कों पर नहीं फ़ेंक देगी या जबतक सरकार इस्तीफ़ा नहीं देगी, तबतक वे लोग विधानमंडल में जमे रहेंगे। 14 विपक्षी पार्षद निलंबित उधर विधानपरिषद का नजारा ही कल कुछ अलग-अलग था। विपक्ष के अनेक सदस्य अपनी कुर्सी छोड़ सभापति के सामने वेल में बोरिया बिस्तर के साथ जमीन पर लेटे थे। सभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे। इसके अलावा विपक्ष के सदस्य कोई बात करने को तैयार नहीं थे। हांलाकि इस पूरे मामले को लेकर पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी नोंक-झोंक भी हुई। विपक्ष के इस व्यवहार को देख सभापति ताराकांत झा ने सदन के उपनेता गंगा प्रसाद(भाजपा) द्वारा दिये गये निलंबन प्रस्ताव पर एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए विपक्ष के 14 विधानपार्षद को पूरे सत्र के लिये निलंबित कर दिया। सत्ता पक्ष के सदस्यों का अरोप है कि विपक्षी सदस्यों ने परिषद को महतो जी का दालान समझ रखा है, जो यहां सोने आये हैं। जबकि विपक्षी नेताओं का कहना था कि जबतक मुखयमंत्री इस्तीफ़ा नहीं देंगे, तबतक वे नहीं उठेंगे। खैर जिन पार्षदों को निलंबित किया गया, उनमें विधानपरिषद के प्रतिपक्ष के नेता गुलाम गौस, मुन्द्रिका प्रसाद यादव, तनवीर हसन, बादशाह प्रसाद आजाद, नवल किशोर यादव, मिश्रीलाल राय, रमा भारती(सभी राजद), महाचंद्र प्रसाद सिंह, चंदन बागची, डा ज्योति (सभी कांग्रेस), इस्माईल राईन, राजू यादव और राजेन्द्र राय (सभी लोजपा) शामिल हैं। पहली बार सील हुआ विधानसभा, लालू को विधानसभा जाने से रोका बिहार विधानमंडल के परिसर में दोनों सदनों के विपक्षी सदस्य आंदोलन कर रहे थे। इसी बीच विधानमंडल सुरक्षा अधिकारियों को जानकारी मिली कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद विधानसभा पहूंचने वाले हैं। इससे पहले कि श्री प्रसाद विधानसभा पहूंचते, विधानसभा को सील कर दिया। करीब 5 बजे श्री प्रसाद विधान मंडल के मुख्य गेट पूर्वी गेट पर पहूंचे तब सुरक्षा प्रहरियों ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया। पूछने पर बताया गया कि चुंकि वे बिहार विधानसभा के सदस्य नहीं हैं और न ही कोई अधिकारी, इसलिये उन्हें अंदर जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। हांलाकि इसके बावजूद श्री प्रसाद ने वहां करीब ढाई घंटे तक खड़े रहे। जबतक श्री प्रसाद वहां खड़े रहे, पुरा विधानमंडल सजीव हो उठा। इस अवसर पर श्री प्रसाद ने अपना बिहार को बताया कि मुख्यमंत्री ने तानाशाह होने के सारे सबूत दे दिये हैं। विपक्षी विधायकों के लिये रखे गये नाश्ते की ओर इशारा करते हुए श्री प्रसाद ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध करना सभी का अधिकार है। एक तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इशारे पर विपक्षी सदस्यों को मारा-पीटा गया, एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए चौदह विधान पार्षदों को निलंबित कर दिया गया, अब जबकि विपक्षी सदस्य आंदोलन कर रहे हैं, तो यह सरकार उन्हें भूखे-प्यासे रखकर मारने का षडयंत्र कर रही है। अध्यक्ष अंदर उपाध्यक्ष बाहर अब इसे तानाशाही का दूसरा सबसे बड़ा सबूत माना जाना चाहिये कि विधानसभा में अध्यक्ष अंदर अपने कक्ष में थे और उपाध्यक्ष बाहर गेट पर खड़े थे। रात के करीब 8 बजे राजद सुप्रीमो के बाद गेट पर आंदोलन करने की जिम्मेवारी विधानसभा के उपाध्यक्ष शकुनी चौधरी ने संभाल ली। जब इन्होंने सुरक्षा प्रहरियों से गेट को खोलने का आदेश दिया तब सुरक्षा प्रहरियों ने विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण का तुगलकी फ़रमान सुनाते हुए कहा कि अभी किसी को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं है। इससे आहत होकर जब श्री चौधरी ने अध्यक्ष से उनके दूरभाष पर बात की तो उन्हें कहा गया कि कार्यालय बंद हो चुका है, कल आईये। बंद कमरे में दूबकी रही सरकार एक ओर जहां विधानमंडल में विपक्षी सदस्य आंदोलनरत थे और पूरे विधानमंडल को सील कर दिया गया था, वही दूसरी ओर राज्य सरकार अपने कमरे में दूबकी रही। यहां तक कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी पत्रकारों से बात करना मुनासिब नहीं समझा। अलबत्ता एक प्रेस विज्ञप्ति सूचना एवं जनसंपर्क के माध्यम से मुख्यमंत्री द्वारा जारी की गई जिसमें सारा दोष विपक्षी सदस्यों पर मढते हुए कहा गया कि पता नहीं विपक्ष ऐसा क्यों कर रह रहा है। जबकि सुशील कुमार मोदी ने लालू प्रसाद को विधानमंडल के अंदर जाने देने से रोकने के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा कि किसी भी बाहरी को अंदर कैसे आने दिया जा सकता है। राजनीतिक अराजकता का केंद्र बना बिहार बिहार में मची उथल पुथल के बाद राज्य में राजनीतिक अराजकता व्याप्त हो गई है। सारा नियंत्र्ण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने हाथों में ले लिया है। कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। पूर्व विधायक विद्याभूषण सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार ने बर्बरता की सारी हदों को पार कर दिया है। बिहार की जनता इस तानाशाह को उखाड़ फ़ेंकेंगी। इन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि आखिर श्री कुमार सीबीआई जांच से क्यों डर रहे हैं। यदि इन्होंने घोटाला नहीं किया है तो इन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिये ताकि पूरे माम्ले की निष्पक्ष जांच हो सके। हांलाकि विपक्षी नेता इस पूरे मामले में चुप्पी साधे बैठे हैं। जदयू नेता डा निहोरा प्रसाद यादव ने पहले तो यह कहा कि सदन में अराजकता बर्दाश्त नहीं की जायेगी और लालू प्रसाद के रोके जाने को सही ठह्राते हुए कहा कि जब वे सदस्य ही नहीं हैं तो वे किस अधिकार से विधानसभा में जायेंगे। लेकिन जब डा यादव से यह पूछा गया कि किस आधार पर विधानसभा के उपाध्यक्ष को रोका जा रहा है तो इन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि क्या उपाध्यक्ष को भी रोक दिया गया है? |