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विशेष राज्य के दर्जे की मांग कर रहे हैं और वह 25 करोड़ भोजपुरियों के गौरव के प्रतीक भिखारी ठाकुर की एक अदद प्रतिमा लगवाने की मांग कर रही है। कल परियों की राजकुमारी सी वैष्णवी से मिलने का मौका मिला। लोहानीपुर के एक पुराने से मुहल्ले में उसके नाना एस पी वर्मा के घर पर। जब पहूंचा तब वह अपने भाई की लंबी आयु की कामना करने हेतु भैयादुज मनाने गयी थी। इसलिए थोड़ा सा इंतजार करना पड़ा। इस बीच उसके नाना एस पी वर्मा ने वर्मा होने का राज बताया। उन्होंने बताया कि वे जाति के स्वर्णकार हैं। वर्मा टाइटिल उन्होंने ऐसे ही अपने नाम के साथ जोड़ रखा है। बात जब वैष्णवी की शुरु हुई तो उनका चेहारा गर्व से चमक उठा। देखकर खुशी हुई कि जमाना बदल रहा है। बेटियां अब सचमुच गर्व प्रदान करने लगी हैं।

थोड़ी देर बाद वैष्णवी आयी। सीधा और सरल सा व्यक्तित्व। बातचीत का सिलसिला शुरु हुआ। उसने बताया कि वर्तमान में वह छपरा में सारण सेंट्रल स्कूल में नवीं वर्ग की छात्रा है। अभिनय की शुरुआत के बारे में पूछने पर उसने बताया कि पहली बार उसने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन महज 3 वर्ष की उम्र में किया था। तब रोटरी छपरा के द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम किसमें कितना है दम में उसने डांस प्रस्तुत किया था। इसके बाद बुगी-वुगी में भी उसने अपनी नृत्य प्रतिभा का लोहा मनवाया था। वैषणवी के अनुसार उसके पिता कृष्ण कुमार वैष्णवी ने उसे सबसे अधिक प्रोत्साहित किया।

उसने एक और राज का पर्दाफ़ाश किया जो सचमुच अनूठा ही है। अनूठा इसलिए कि भारतीय पुरुष प्रधान समाज में पुरुष अपना नाम महिलाओं पर थोपते हैं, लेकिन कृष्ण कुमार गुप्ता ने अपने नाम में अपनी बेटी का नाम जोड़ा और कृष्ण कुमार वैष्णवी बन गये। वैष्णवी ने बताया कि शुरुआत में उसने कई भोजपुरी वीडियो एलबमों में काम किया। मसलन देवी गीतों पर आधारित झुला सतरंगिया नामक म्यूजिक एलबम में उसने बाल कलाकार के रुप में कैमरे का सामना पहली बार किया। इसके बाद उसने कई भोजपुरी फ़िल्मों जय मईया अम्बे भवानी, बीए पास बहुरिया, हमार देवदास, जीना तेरी गली में और मैं नागिन तु नगीना में बाल कलाकार के रुप में काम किया।

वैषणवी ने बताया कि वह गाना भी गाती है। इस क्रम में उसने मां नामक एक म्यूजिक एलबम भी किया, जिसकी व्यापक सराहना हुई। पढाई को प्राथमिकता और अभिनय को अपना हाबी मानने वाली मासूम वैषणवी ने बताया कि अभिनय करना उसका शौक है। लेकिन वह खूब पढना चाहती है। वैष्णवी ने बताया कि आने वाले दिनों में वह दो हिंदी फ़िल्मों में भी नजर आयेगी। इसमें बिगनिंग आफ़ द लाईफ़ और राज हमराज शामिल है।

भिखारी ठाकुर की प्रतिमा के सवाल पर वह बड़े तर्कपूर्ण तरीके से कहती है कि भिखारी ठाकुर भोजपुरी के शेक्सपीयर थे। उनकी रचनाओं ने भोजपुरी को सजीव बनाया। रंगमंच को गौरव प्रदान किया। सचमुच यह चिंतनीय विषय है कि जब पटना के हर चौक चौराहे पर किसी न किसी महापुरुष की प्रतिमा स्थापित है फ़िर भिखारी ठाकुर के साथ यह भेदभाव क्यों? वैषणवी ने कहा कि मूल सवाल केवल भिखारी ठाकुर की प्रतिमा लगाने का नहीं है, सवाल भोजपुरी भाषा को समुचित सम्मान दिये जाने का है।

बहरहाल, वैष्णवी के तर्क आधारहीन नहीं हैं। यह सच भी है और मेरी निजी राय है कि यह सब जाति की राजनीति है। अगर भिखारी ठाकुर का संबंध वंचित तबके से नहीं होता तो निश्चित तौर पर उन्हें मरणोपरांत लौंडा कहकर उनका मजाक नहीं उड़ाया जाता। वैष्णवी जैसी मासूम बाल कलाकार के जेहन में यह बात आयी और उसने प्रभावी ढंग से अपनी बातों को रखा है। यह निश्चित तौर पर दिल को सुकून देने वाली है। उसके जज्बे को सलाम।

कटघरे में भारतीय सिनेमा का धर्म

दोस्तों, पूरे देश में संजय लीला भंसाली की फ़िल्म रामलीला चर्चा में है। चर्चा की वजह यह है कि संजय ने अपनी फ़िल्म में सदियों से जारी परंपरा के विपरीत पिछड़ी जाति के एक व्यक्ति को नायक के रुप में प्रस्तुत किया है। ब्राह्म्णवादी इसके लिए उनकी आलोचना कर रहे हैं। लेकिन इस आलोचना इतर सच्चाईयां और भी हैं।

आंखों के सामने एक सपनों की दुनिया सबके मन को भाती हैं। सिल्वर स्क्रीन पर दिखने वाली सपनों की दुनिया मनुष्यों द्वारा देखे जाने वाले सपनों की दुनिया के जैसे एकरंगी नहीं होती। तीन घंटे में एक पूर्ण जीवन होता समाहित होता है। कई बार तो कोई एक फ़िल्म असंख्य लोगों के जीवन का सार साबित होता है। मसलन वर्ष 1973 में एम एस सथ्यू की फ़िल्म गर्म हवा। यह फ़िल्म लाखों मुसलमानों के जीवन में लगी आग को बयां कर गयी जो दूसरे देश से आये गर्म हवा के कारण लगी।

ताज्जुब इस बात का है कि आज भी भारतीय फ़िल्मों में भारत का मुसलमान माइ नेम इस खान, बट आई एम नाट ए टेररिस्ट कहने को मजबूर है। वही हिन्दू भी एक बिंदू पर आकर यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि आखिर क्या वजह है कि सारे के सारे आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं।

असल में सथ्यू साहब ने अपनी फ़िल्म में जो दिखाया वह मुसलमानों की सच्ची त्स्वीर थी। आजादी से पहले तक भारत संपूर्ण रुप से धर्म निरपेक्ष राज्य था। इसकी मिसाल आजादी के पहले बनी फ़िल्में भी देती हैं। साहित्य जगत भी इसका साक्षी रहा है। आजादी के बाद स्थिति बदली। सत्ता अंग्रेजों के हाथों से निकलकर उन ब्राह्म्णों के हाथ में चली गयी, जिन्हें उपरी तौर पर मुसलमानों से कोई पहरेज नहीं था, लेकिन अंदर ही अंदर धर्म भ्रष्ट होने का खतरा बना रहता था। परिणाम वही होना था जो पूर्व से तय था। जो मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए उन्हें आज भी यह झेलना पड़ता है कि जब पाकिस्तान बन गया फ़िर यहां वे क्यों है? गर्म हवा में यह सब आंखों के सामने दिखता है।

बाद के दिनों में कई फ़िल्में ऐसी बनी जिनसे यह स्थापित किया गया कि यदि इस देश का कोई गुनाहगार है तो वह मुसलमान है। देश का कोई दुश्मन है तो वह पाकिस्तान है। आज तो हालत यह हो गई है कि हर फ़िल्म में एक आतंकवादी मुसलमान टोपी पहने विलेन के रुप में नजर आता है। उसे फ़िल्म का नायक वैसे ही मारता है जैसे हिन्दू धर्म ग्रंथों में कोई कोमलांगी देवी या फ़िर कोई देवता किसी राक्षस को मारता है। सबसे बड़ी बात यह कि मुसलमानों को दूसरे देश का नागरिक साबित करने के लिए देश में बनने वाली फ़िल्मों में मुसलमान महिलाओं को ही सबसे अधिक जिम्मेवार ठहराया जाता है।

अभी हाल ही में रिलीज हुई फ़िल्म रांझणा में एक हिन्दू लड़का एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता है। खुद को साबित करने के लिए वह अपने धर्म से परे होकर भी अपनी प्रेमिका को पाने की सफ़ल कोशिश करता है। पूरी फ़िल्म का लब्बोलुआब यह है कि भारतीय हिन्दू पुरुष शादी विवाह के मामले में भारतीय मुसलमान युवकों से अधिक श्रेष्ठ हैं। अगर धर्मनिरपेक्षता का लेबल चस्पा कर दिजीये तो शत प्रतिशत रुप से।

अधिकांश भारतीय धर्म आधारित फ़िल्मों में फ़िल्म का नायक अगर हिन्दू है तो नायिका निश्चित रुप से मुसलमान ही हो सकती है। वर्ष 2001 में एक फ़िल्म आयी थी। फ़िल्म का नाम था गदर : एक प्रेम कहानी। अनिल शर्मा की इस फ़िल्म का सार केवल इतना है कि एक हिन्दुस्तानी सिक्ख कैसे पूरे पाकिस्तान की सेना को अपनी मर्दानगी के बूते परास्त कर अपनी मुसलमान पत्नी को अपने वतन वापस लाने में कामयाब होता है। अब जरा दूसरी तस्वीर देखिये। अमृता प्रीतम की कालजयी कृति पिंजर पर बनायी गयी फ़िल्म। चाणक्य फ़ेम चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने अपनी फ़िल्म में पूरी इमानदारी बरती और फ़िल्म की नायिका (एक हिन्दू महिला) अपने पाकिस्तानी मुसलमान शौहर के साथ रहने का संकल्प लेती है। अब जरा इस अंतर को देखिए। सन्नी देओल की गदर भारत की चौथी और अपने समय में पहली फ़िल्म साबित हुई जिसकी आमदनी 288 करोड़ रुपए से अधिक हुई। जबकि पिंजर के कारण चंद्रप्रकाश द्विवेदी को अपने घर का आटा गीला करना पड़ा।

वर्ष 1992 में बम्बई में हुए दंगों पर दक्षिण भारत में एक फ़िल्म बनायी गयी। फ़िल्म का नाम भी बम्बई था और इसके निर्देशक थे मणिरत्नम। शेखर नामक एक तमिल ब्राह्म्ण शैला बानो नामक मुसलमान लड़की को दिल दे बैठता है पहली ही नजर में। फ़िर जैसे जैसे फ़िल्म की कहानी बढती है हिन्दू-मुसलमान के साथ-साथ समाज में दोनों के बीच बैर भी आगे बढता है। क्लाईमेक्स में एक दंगा होता है और एक बार फ़िर हिन्दू नायक जीत जाता है और सब मणिरत्नम की धर्मनिरपेक्षता पर ताली बजाते हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या यह ताली तब भी बजती जब एक मुसलमान युवक एक हिन्दू लड़की के साथ इश्क करता और उसे भगाकर शादी करता। क्या भारतीय दर्शक ताली तब भी बजाते जब क्लाईमेक्स में मुसलमान युवक जीतता। निश्चित तौर पर न तो फ़िल्म के गाने हिट होते और न ही फ़िल्म ही चलती। एक ताजा उदाहरण है विशाल भारद्वाज की फ़िल्म इश्किया। यह फ़िल्म वर्ष 2010 में आयी और सफ़ल साबित हुई। बावजूद इसके कि फ़िल्म में अरशद वारसी ने रज्जाक मियां के अवतार में कृष्णा वर्मा बनी विद्या बालन के साथ सेक्स किया। जरा सोचिए अगर फ़िल्म के निर्देशक ने कृष्णा वर्मा की जगह विद्या बालन का नाम कृष्णा चौबे रखा होता तो क्या तब भी फ़िल्म उतनी ही सुपरहिट होती। निश्चित तौर पर इसका जवाब नहीं होता। एक और उदाहरण्। वर्ष 2011 में आयी फ़िल्म :दबंग सुपरिहट रही। बाक्स आफ़िस पर आते ही फ़िल्म ने रिकार्ड कमाई किया। वजह यह थी कि फ़िल्म का नायक चुलबुल पांडेय था। अगर चुलबुल चमार या चुलबुल यादव होता तो परिणाम कुछ और ही होता।

असल में फ़िल्में समाज का आईना होती हैं। यह तथ्य भारतीय फ़िल्मों ने हमेशा सत्यापित किया है। जैसा समाज होगा, फ़िल्में भी वैसी ही बनेंगी। अभी पिछले ही साल एक और फ़िल्म आयी इशकजादे। एक हिन्दू लड़का एक मुसलमान सड़की के साथ सेक्स करता है और फ़िर उसे धोखा देता है। फ़िल्म के निर्देशक को लगता है कि ऐसा तो हर फ़िल्म में होता है। इसलिए उसने कहानी को जीवंत बनाये रखने के लिए दोनों के बीच फ़िर से प्यार को जन्म दिया और दोनों को कहानी के अंत में मार दिया यह सबक देने के लिए कि पाप का फ़ल हमेशा पाप ही होता है। भारतीय दर्शकों को यह फ़िल्म पसंद आयी। वजह यह रही कि फ़िल्म में हिन्दू का प्यार जीत गया और एक मुसल्ली ने खुद को प्यार की बलि पर कुर्बान कर दिया। आश्चर्य होता है जब फ़िल्म के एक डायलाग में हिन्दू नायक कहता है कि मुसल्ली यानी मुसलमान महिला को प्यार करने से स्वर्ग मिलता है और मुसलमान लड़की यह कहती है उसे जहन्नुम भी जाना पड़े तो वह पाप करने को तैयार है।

बहरहाल, फ़िल्में तो केवल एक बहाना मात्र हैं। असल में निशाने पर भारत का मुसलमान और देश की धर्मनिरपेक्षता है। सबसे बड़ी बात यह कि ब्राह्म्णवाद इन सबपर हावी है। आज का भारतीय हिन्दू समाज मुसलमानों को दूसरे देश का वासी मानता है। जो फ़िल्में यह संदेश देती हैं वह सफ़ल कही जाती हैं और इसके विपरीत संदेश देने वाली फ़िल्मों का हश्र भी जोधा-अकबर के समान होता है। मूल सवाल अब भी अनुत्तरित ही है कि आखिर ऐसा क्यों? देश की मौजूदा राजनीति या फ़िर देश के हिन्दूओं की सोच।

भोजपुरी सिनेमा परदा अभी गिरा नहीं है

बिहारी संस्कृति के अनेक छाप रहे हैं। कभी यह छाप मिट्टी के दीवारों पर दिखायी देती है तो कभी कोहबर में मारे लाज के सिमटती हुई प्रतीत होती है। कभी यह भोजपुरी में इठलाती है तो मैथिली में कोयल जैसी कुहुकती है। बोधगया के मठों में यह बुद्धं शरणम गच्छामि का संदेश देती है तो मनेर शरीफ़ में अल्लाह के साथ इंसान का रिश्ता जोड़ती है। मगर यह बदलते बिहार की बदलती संस्कृति का केवल एक रुप ही है।

आजादी के बाद पूरे देश में फ़िल्मों का चलन बढा और फ़िर फ़िल्मों ने बिहारी संस्कृति को भी अपनाया। राजकपूर की फ़िल्म तीसरी कसम इसका एक उदाहरण है। इससे पहले बिदेसिया में भी पूरे देश ने बिहारी संस्कृति को जी भरकर देखा। हालांकि बिहार की पहली भोजपुरी फ़िल्म थी गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो। कहा जाता है कि वर्ष 1960 में देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद ने उस समय के मशहूर विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी से अनुरोध किया कि वे भोजपुरी में एक फ़िल्म बनायें। वर्ष 1963 में राजेंद्र बाबू का सपना साकार हुआ जब विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी ने निर्मल पिक्चर्स के बैनर तले गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो का निर्माण किया। फ़िल्म के निर्देशक थे कुंदन कुमार। इस फ़िल्म में पहली बार बिहार की समृद्ध संस्कृति का समावेशन किया गया। इसके बाद एस एन त्रिपाठी के निर्देशन में बनी फ़िल्म बिदेसिया। इसमें उस समय के लोक कलाकार और बिहार के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के सबसे अधिक लोकप्रिय रचना को आधार बनाया गया।

इसके बाद भोजपुरी फ़िल्मों का प्रदर्शन लगातार होता रहा। मसलन लागी नहीं छूटे राम (1963), गंगा(1965), भौजी(1965), लोहा सिंह(1966), और अमर सुहागिन(1978) आदि उल्लेखनीय है। इसके बाद वर्ष 1979 में आई फ़िल्म बलम परदेसिया, जिसके नायक थे राकेश पांडे। इस फ़िल्म का एक गाना तो आज भी लोगों को जुबानी याद है। गोरकी पतरकी रे, मारे गुलेलवा जियरा उड़ी उड़ी जाय।

वर्ष 1980 के बाद भोजपुरी फ़िल्म ने उद्योग का स्वरुप धारण किया। विशेषकर कल्पतरु द्वारा वर्ष 1983 में बनाई गई फ़िल्म हमार भौजी आज भी देवर-भाभी के रिश्ते पर बनी सबसे बेहतरीन फ़िल्म मानी जाती है। वही वर्ष 1989 में राजकुमार शर्मा द्वारा निर्देशित फ़िल्म माई ने सबसे अधिक लोकप्रियता बटोरी। इस बीच वर्ष 1982 में गोविन्द मुनीस द्वारा निर्देशित फ़िल्म नदिया के पार इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी इसे एक मानक के रुप में देखा जाता है। अबतक के भोजपुरी फ़िल्मों का चरित्र देखें तो लगभग सभी फ़िल्मों का ताना-बाना एक जैसा यानी पारिवारिक ही था।

भोजपुरी फ़िल्मकारों में प्रयोगधर्मिता का अभाव था, जिसके कारण भोजपुरी फ़िल्म उद्योग अपने अस्तित्व को नहीं पा सका। धीरे-धीरे यह उद्योग बदहाल होता गया। कुछ लोग इसे लालू के शासनकाल में तथाकथित जंगलराज का परिणाम मानते थे। लेकिन वर्ष 2000 में बनी अभय सिन्हा द्वारा बनायी गयी फ़िल्म ससुरा बड़ा पईसावाला ने ऐसे लोगों की जुबान पर ताला लगा दिया और यह फ़िल्म भोजपुरी फ़िल्म की सबसे बड़ी सुपरहिट साबित हुई। वर्ष 2000 से लेकर आजतक भोजपुरी फ़िल्मों में प्रयोगों का दौर चल रहा है। जहां एक ओर हिंसा और सेक्स को आधार बनाकर फ़िल्में बनाई जा रही हैं और रुपये कमाये जा रहे हैं तो दूसरी ओर बालीवुड अभिनेत्री नीतू चंद्रा के होम प्रोडक्शन की फ़िल्म देसवा ने एक नया प्रयोग किया। राजनीतिक मुद्दों पर बनी इस फ़िल्म को आम दर्शकों ने पूरी तरह नकार भले ही दिया गया हो, लेकिन इसने एक नई परंपरा की शुरुआत अवश्य कर दी है। हाल के वर्षों में भोजपुरी फ़िल्मों में सवर्ण समुदाय के अभिनेताओं का वर्चस्व लगभग समाप्त हो चुका है। कभी सुपरस्टार कहलाने वाले मनोज तिवारी और रविकिशन आज नहीं बिकने वाले घोड़े साबित हो रहे हैं। उनकी जगह दिनेश लाल यादव ऊर्फ़ निरहुआ भोजपुरी सिनेमा के बेताज बादशाह बन चुके हैं। अब ऐसी परिस्थिति में सवर्णवादी फ़िल्म समीक्षक भोजपुरी फ़िल्मों के इस दौर को रसातल का दौर करार देने पर आमदा हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि परदा अभी गिरा नहीं हैनवल किशोर कुमार

फ़िल्म समीक्षा - ग्लोबलाइजेशन को मूंह चिढाती सिल्क स्मिता

क्ल देश के सिनेमाघरों में विद्या बालन यानी 21वीं सदी की सिल्क स्मिता का जादू सिर चढकर बोलने लगा है। ग्लोबलाइजेशन के दौर में एक अबला के सबला बनने की कहानी लोगों को खूब भा रही है। लोगों को विद्या बालन की हसीन अदायें प्रभावित कर रही हैं तो इस फ़िल्म की कहानी के तीन पुरुष पात्रों के माध्यम से पुरुष समाज के दंभ को तोड़ने की कोशिश की गई है। मिलन लुथरिया, जिन्होंने पूर्व में कच्चे धागे जैसी फ़िल्म बनाकर लोगों में अपनी निर्देशन क्षमता के बूते अपनी पहचान स्थापित की थी। इस बार विद्या बालन की द डर्टी पिक्चर को लेकर मैदान में उतरे हैं। मनमोहक और कामोत्तेजक दृश्यों के कारण इस फ़िल्म के वीडियो प्रोमो बहुत पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं। अब लोगों को पूरी फ़िल्म देखने का मौका मिल रहा है तो लोग सिनेमाघरों की ओर टूट पड़े हैं।

वैसे फ़िल्म की कहानी पूर्ण रुप से नारी संघर्ष की महागाथा है। हालांकि इस कहानी में उसे अपना बदन तीन मर्दों को परोसना पड़ता है और फ़िर एक दिन जब ग्लोबलाइज्ड वुमैन बन जाती है तब पुरुष समाज उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता है। एक दिन उसकी हत्या हो जाती है। फ़िल्म के हर फ़्रेम में विद्या का जादू है। जादू इस मायने में कि पूंजीवाद के दौर में अपने आपको सफ़ल बनाने के लिये एक महिला को किस तरह के समझौते करने पड़ते हैं, इसका नायाब प्रदर्शन विद्या ने किया है। रही बात फ़िल्म के पुरुष कलाकारों की तो वे विद्या के नारी अस्तित्व के आगे बौने नजर आते हैं।

हालांकि नसीरुद्दीन शाह ने अपनी ढल चुकी उम्र में भी आज के युवा अभिनेताओं को शर्माने पर मजबूर कर दिया है। वही तुषार कपूर ने भी एक लेखक के रुप में अपनी भूमिका को जीवंत किया है। इमरान हाशमी को इस बार भी देह सुख लूटने का मौका मिला है और आन स्क्रीन इस कार्य को करने में इन्हें तो महारत हासिल है। वैसे पूरी फ़िल्म की कहानी ही ऐसी है कि विद्या ने किसी के लिये कुछ भी छोड़ा ही नहीं है। यानी पूरी फ़िल्म के दौरान दर्शक केवल उल्लाला उल्लाला कहकर चिल्लाने को मजबूर हो रहे हैं। उस समय भी जब पर्दे पर विद्या का देह दिखाई देता है और उस समय भी जब उसका अंत एक लाश के रुप में दिखाई देता है। कुल मिलाकर फ़िल्म पूरी गंभीरता के साथ देखने योग्य है। रजत अरोड़ा के गीत और विशाल शेखर के संगीत को तो जैसे विद्या ने जीवनदान दे रखा हो। इसलिये वे भी कर्णप्रिय ही हैं।

9 दिसंबर को रिलीज होगी देसवा

पटना(अपना बिहार, 2 दिसंबर 2011) मशहूर सिने अभिनेत्री नीतू चंद्रा के होम प्रोडक्शन चंपारण टाकीज की पहली फ़िल्म देसवा आगामी 9 दिसंबर को बिहार के अलावे उत्तरप्र्देश, दिल्ली, झारखंड, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के सिनेमा घरों में रिलीज की जायेगी। इस आशय की जानकारी फ़िल्म निर्माता नीतू चंद्रा ने अपना बिहार को दूरभाष पर दी। इन्होंने बताया कि उनकी यह फ़िल्म भोजपूरी फ़िल्मों के इतिहास के मामले में एक मील का पत्थर साबित होगा। इन्होंने बताया कि मौजूदा दौर में यह पहली ऐसी भोजपूरी फ़िल्म है, जिसे सभी अपने परिवार के साथ मिलकर देख सकते हैं। इस फ़िल्म के संगीत के बारे में नीतू ने बताया कि इसे सोनू निगम, मीका सिंह, भरत शर्मा व्यास और पद्मश्री शारदा सिन्हा जैसे जाने माने लब्ध प्रतिष्ठित गायकों ने अपनी आवाज से सजाया है। इन्होंने यह भी बताया कि बिहार में इस फ़िल्म के वितरण की जिम्मेवारी मुन्ना दमानी ने ली है, जो भोजपूरी फ़िल्मों के सबसे प्रतिष्ठित वितरक रहे हैं। हालांकि लंबे समय से भोजपूरी फ़िल्मों में आये विकार के कारण इन्होंने भोजपूरी फ़िल्मों के वितरण के कारोबार से स्वयं को अलग कर लिया था। वे अब देसवा के साथ पुनर्वापसी कर रहे हैं।

एक नई उम्मीद के रुप में उभरे चिराग, पूरे देश में रिलीज हुई मिले न मिले हम

पटना (अपना बिहार, 5 नवंबर 2011) बिहार के युवाओं ने बालीवुड में धूम मचाना शुरु कर दिया है। पहले शत्रुघ्न सिन्हा और शेखर सुमन जैसे उम्दा कलाकारों के बाद मनोज वाजपेयी, नीतू चंद्रा तो बहुत पहले ही अपने आपको स्थापित कर चुके हैं। अब सोनाक्षी सिन्हा एवं चिराग पासवान ने अपने जौहर दिखाने शुरु कर दिये हैं। लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान की पहली फ़िल्म मिले न मिले हम कल पूरे देश में रिलीज हुई। बिहार में भी रिलीज हुए इस फ़िल्म में चिराग के काम को प्रशंसा मिल रही है। चिराग का अभिनय प्रशंसनीय है। प्रशंसनीय इसलिये कि इन्होंने अपनी पहली ही फ़िल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया है। फ़िल्म में चिराग के अलावे कंगना राणावत, सागरिका और नीरू बाजवा की तिकड़ी है तो दूसरी ओर पुनम ढिल्लो और कबीर बेदी जैसे स्थापित कलाकार भी इस फ़िल्म में अपने कला के जौहर दिखा रहे हैं। फ़िल्म की कहानी मूल रुप से चिराग के इर्द-गिर्द ही घूमती है। फ़िल्म में चिराग कबीर बेदी और पुनम ढिल्लो के पुत्र बने हैं। दोनों लंबे समय से एक-दूसरे से अलग-अलग रहते हैं। चिराग अपने पिता के आदर्शों पर चलकर टेनिस खिलाड़ी बनना चाहते हैं तो उनकी मां उन्हें सफ़ल बिजनेस मैन बनाना चाहती है। फ़िल्म की कहानी छोटी है और निर्देशन पक्ष भी अपेक्षाकृत कमजोर है। चिराग अपने हिस्से में आये कई इमोशनल दृश्यों में इमोशन दिखा पाने में असफ़ल रहे हैं। अलबत्ता इनके डांस ने लोगों को प्रभावित किया। फ़िल्म की जान बनी है कंगना राणावत, कबीर बेदी और पुनम ढिल्लो का सशक्त अभिनय। बहरहाल, अपनी पहली फ़िल्म में ही चिराग ने अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता हासिल कर ली है। अब इनके सामने अपने अभिनय को और निखारने की चुनौती है। अब देखना है कि इन्हें अपनी पहली फ़िल्म मिले न मिले हम में सफ़लता मिलती है या नहीं। वैसे भी चिराग में एक संभावना तो दिखती ही है।

विशेष बातचीत - चन्द्रमा के दाग को धोने की कोशिश है देसवा

पटना (अपना बिहार, 5 नवंबर 2011) चन्द्रमा बेदाग नहीं है। यह स्थिति आदिकाल से चली आ रही है। लेकिन कलाकारों और क्ल्पनाशील साहित्यकारों द्वारा चंद्रमा को बेदाग बनाने की कोशिश की जाती रही है। ऐसा ही एक प्रयास है देसवा। इसके अलावे फ़िल्में समाज का दर्पण होती हैं। इसी सच को समाज के सामने रखने की कोशिश का भी नाम है देसवा। इस फ़िल्म का निर्माण जानी-मानी अभिनेत्री नीतू चंद्रा की कंपनी चंपारण टाकीज ने किया है। फ़िल्म का निर्देशन इनके भाई नीतिन चंद्रा ने किया है। जबकि सहायक निर्देशक की भूमिका अभिषेक चंद्रा ने निभाया है। यानी चंद्रा परिवार की अथक मेहनत का परिणाम है देसवा। फ़िल्म की खुबसूरती यह है कि भोजपुरी में बनी यह पहली प्रयोगधर्मी फ़िल्म है। पूरी कहानी बिहार पर आधारित है और एक आशीष विद्यार्थी और मुख्य नायिका आरती पुरी को छोड़ दें तो फ़िल्म के सभी कलाकार बिहार के विभिन्न रंगमंच से जुड़े हैं। फ़िल्म का सबसे खुबसूरत हिस्सा है फ़िल्म का संगीत पक्ष। फ़िल्म के गीतों को कर्णप्रिय बनाया है भोजपुरी सम्राट भरत शर्मा व्यास, बिहार कोकिला शारदा सिन्हा, मीका सिंह, सोनू निगम और सुनिधि चौहान जैसे कलाकारों ने।

अपनी फ़िल्म के बारे में अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में नीतिन चंद्रा ने बताया कि इस फ़िल्म को बनाने की बात उन्हें तब सूझी जब वे पूणे विश्वविद्यालय से पढाई पूरी करने के बाद मुम्बई की गलियों में चक्कर काट रहे थे। उन दिनों भोजपूरी फ़िल्मों के लेकर एक नई बहस छिड़ चुकी थी। कथित तौर पर अपसंस्कृति फ़ैलाने वाली फ़िल्में सबसे अधिक बिहार में ही बनती हैं। इसी सोच को बदलने के लिये नीतिन ने देसवा का निर्माण करने की ठानी।

अपने पैतृक जिले बक्सर में बैठकर देसवा की पटकथा लिखने वाले नीतिन बताते हैं कि आज लोग भोजपूरी से दूर होते जा रहे हैं। यहां तक कि भोजपूरी अंचल में रहने वाले लोग भी अब भोजपूरी बोलने में शर्म महसूस करते हैं। यह अत्यंत ही चिंतनीय विषय है। इससे भी बड़ी सच्चाई यह कि भोजपुरी भाषी ही भोजपुरी फ़िल्मों से दूर होने लगे। फ़िल्म की कहानी के बारे में बताते हुए नीतिन बताते हैं कि उनकी फ़िल्म समाज में फ़ैले भ्रष्टाचार और अपराध से शुरु होकर बिहार के नये निर्माण पर आधारित है। यह फ़िल्म लोगों के अंदर सकारात्मक सोच का निर्माण करेगी।

नागार्जुन को समझने के लिये समाज को समझना जरुरी, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो मैनेजर पांडेय से विशेष बातचीत

पटना (अपना बिहार, 5 नवंबर 2011) नागार्जुन को समझना है तो उसके लिये सबसे पहले आपको समाज को समझना होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह कि नागार्जुन ने जो कुछ भी लिखा, वह समाज के लिये लिखा। उनके शब्दों में समाज दिखता था। समाज का दर्द ही उनकी रचनाओं का मूल भाव हुआ करता था। इसलिये यह आवश्यक है कि पहले आप समाज को समझें। बाबा की कवितायें आपको खुद ब खुद ही समझ में आ जायेंगीं। यह कहना है सूबे के प्राख्यात प्रगतिशील साहित्यकार प्रो मैनेजर पांडेय का। विदित है कि कल बाबा की पुण्यतिथि थी और इस अवसर पर पटना विश्वविद्यालय में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रो पांडेय के अलावे विधान परिषद के सभापति पंडित ताराकांत झा, वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति शंभूनाथ सिंह ने अपने विचार व्यक्त किये। श्री सिंह ने कहा कि पटना विश्वविद्यालय बाबा नागार्जुन की स्मृति में नागार्जुन पीठ की स्थापना करेगा।

बाद में अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में प्रो मैनेजर पांडेय ने कहा कि यह कटु सच्चाई स्वीकार कर लेना चाहिये कि बाबा नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर और फ़णिश्वरनाथ रेणु जैसी हस्तियां बार-बार जन्म नहीं लेतीं। जबतक ऐसा नहीं होता है तबतक समाज को इन महान विभूतियों की सुखद स्मृतियों के सहारे वर्तमान एवं भविष्य की रुपरेखा तय करनी चाहिये। वैसे भी समाज केवल जीवित इंसानों के सहारे ही नहीं चलता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि समाज स्वयं ही ऐसी विभूतियों को जन्म देता है।

प्रो पांडेय ने कहा कि साहित्य की भाषा में नकारात्मक परिवर्तन हुआ है। इसके अलावे इस सच को पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकारा जाना चाहिये कि अभी भी सूबे में शिक्षा का घोर अभाव है। इसके अलावे साहित्यकारों की भाषा भी इतनी जटिल है कि जन सामान्य इसे सहज तरीके से समझ नहीं पाता है। इसलिये आवश्यकता ऐसे भाषा और शैली की है जो सहज ही समझने योग्य हो। प्रो पांडेय ने बताया कि आज के मनुष्य को अपने कान अधिक से अधिक खोले रखने चाहिये। इसकी वजह यह है कि आंखों पर पूंजीवादी शक्तियों का क्ब्जा हो चुका है। विस्तार से बताते हुए प्रो पांडेय ने कहा कि टेलीविजन चैनलों में पूंजीवाद के बढते वर्चस्व के कारण आम जनता उस सच को नहीं जान पा रही है जो वास्तव में घटित हो रहा है। इन्होंने कहा कि सच को पहचानना, सच को समझना, सच को लिखना और किसके लिये सच लिखा जाये, यह जानना अत्यंत आवश्यक है। यह दुविधा साहित्यकारों के लिये भी है। सूबे में विकास के सवाल पर प्रो पांडेय ने दो टूक शब्दों में कहा कि जितना विकास हुआ नहीं है, उससे अधिक ढोल पीटा जा रहा है। यह अत्यंत ही चिंतनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है।

हिन्दी सिनेमा में हिन्दी खोजने की मजबूरी

जब कोई समाज अथवा देश लंबे समय तक पराधीन रहता है तो पराधीनता उसकी एक पहचान बन जाती है। एक ऐसी पहचान, जिसे खत्म होने में कई पीढियां बीत जाती हैं। सामान्य जनजीवन में यह पहचान मिटती चली जाती है। उदाहरणस्वरुप आजादी मिलने के बाद देश में जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम चलाया गया। बड़े-बड़े राजा और जमींदार आम आदमी की श्रेणी में शामिल हो गये। उनके पूर्व की पहचान अब लगभग खत्म ही हो चुकी है।

बिहार के गांवों में भी यह परिवर्तन देखा जा सकता है। अब यह कहा जा सकता है कि बाघ और बकरी एक साथ पानी पीते हैं। मतलब यह कि लालू प्रसाद के कारण सूबे में पिछड़ों और दलितों में व्यापक जागरूकता हुई और आज हालत यह है कि अधिकांश इलाकों में सवर्ण और गैर सवर्ण दोनों एक साथ कुर्सी अथवा चौकी पर बैठते हैं। लेकिन पहचान अभी भी नहीं बदली। आज भी एक चमार का बेटा चमार ही है। यादव के बेटे के साथ राजपूत या भूमिहार अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता। सवाल पहचान की है। यही हालत आज हिन्दी की है।

हिन्दी की पहचान पराधीनता का पर्याय बन चुकी है। जब मुसलमान शासक थे तब इसपर उर्दू और अरबी संस्कृति राज करती थी। बेचारी हिन्दी को कहा गया कि हिन्दी सबसे अधिक लचीली भाषा है, बिल्कुल पानी के जैसे। जिस बर्तन में डाल दो, उसका आकार और रंग धारण कर लेती है। इससे पहले आर्यों ने भी मूल भारतीयों की भाषा के बारे में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किये थे। नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे मूल भारतीयों की भाषा ही समाप्त हो गई और फ़िर रह गई तो केवल हिन्दी। एक ऐसी हिन्दी, जिसमें हिन्दीपन का सर्वथा अभाव है। मेरे हिसाब से हिन्दी को अहिन्दी बनाने के लिये सबसे अधिक दोष अंग्रेजों को नहीं बल्कि हिन्दुस्तानियों को दिया जाना चाहिये। अंग्रेजों ने तो अपनी संस्कृति और अपनी भाषा का प्रसार किया। यह जिम्मेवारी भारतीयों की थी कि वे अपनी भाषा को सुरक्षित रखने की कोशिश करें। लेकिन शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो, जिसने अंग्रेजीयत के आगे अपने घुटने नहीं टेके। महात्मा गांधी भी इसके अपवाद नहीं हैं।

खैर, आजादी के बाद हिन्दी सिनेमा ने हिन्दीपन को और अधिक नुकसान पहुंचाया। कल मोहल्ला लाइव और प्रबंधन संस्थान सिमेज के संयुक्त तत्वावधान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। विषय था हिन्दी सिनेमा। इस कार्यक्रम में अपने संबोधन में मशहूर फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने बताया कि आजादी के पहले हिन्दी सिनेमा के तीन केंद्र हुआ करते थे। पहला कलकत्ता, दूसरा लाहौर और फ़िर तीसरा बम्बई। आजादी के पहले ही कलकत्ता और लाहौर से हिन्दी को खत्म कर कर दिया गया। विभाजन के बाद वैसे भी लाहौर में हिन्दी का नाश तो होना ही था सो हो गया। लेकिन बम्बई में हिन्दी सिनेमा में लाहौर और सिंधियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। हालांकि इसका एक प्रभाव यह हुआ कि हिन्दी सिनेमा में हिन्दी का पंजाबीकरण हो गया।

वही इस अवसर पर पिंजर फ़िल्म के निर्देशक डा चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी भाषी अब हिन्दी सिनेमा में अपने लिये जगह तलाश रहे हैं। यह संकोच का विषय नहीं, बल्कि इसे बढती भागीदारी का प्रतीक माना जाना चाहिये। इन्होंने यह भी कहा कि केवल हिन्दी में बनने वाली फ़िल्मों को ही हिन्दी नहीं कहा जाना चाहिये। वस्तुतः कन्नड़, तेलुगू, पंजाबी और उड़िया आदि भाषाओं में बनने वाली फ़िल्मों को भी हिन्दी सिनेमा का ही अंग माना जाना चाहिये।

इस अवसर पर मोहल्ला लाइव के संपादक अविनाश दास, मशहूर अभिनेता विनीत कुमार और तहलका के स्थानीय पत्रकार निराला तिवारी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालय मशहूर रंगकर्मी अनीश अंकुर ने किया।-नवल किशोर कुमार

रघुवीर यादव को भाया बिहार

देश के जाने-माने अभिनेता रघुवीर यादव को भी भा गया बिहार। कल अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में श्री यादव ने कहा कि बिहार अब बदल चुका है और बड़ी-बड़ी इमारतें और चौड़ी सड़कें इसकी पहचान बन चुकी हैं। इन्होंने बताया कि पहली बार वे 1970 के दशक में बिहार आये थे,भूमितब उस समय यहां गंगा नदी में स्टीमरें चला करती थीं।

श्री यादव ने बताया कि दिल को छूनेवाली भूमिकायें ही उन्हें पसंद आती हैं। गांधी टू हिटलर फ़िल्म के प्रोमोशन के सिलसिले में पटना आये श्री यादव ने बताया कि हिटलर की भूमिका अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण थी। चुनौतीपूर्ण इसलिये कि हिटलर के नकारात्मक व्यक्तित्व को सकारात्मक रुप में महात्मा गांधी के समतुल्य प्रस्तुत करना था। इसलिये जब इन्हें यह स्क्रिप्ट मिली तब इन्होंने सबसे पहले हिटलर के वीडियो फ़ुटेज देखे। हिटलर के हावभाव के जरिये उसके वास्तविक चरित्र को समझने का प्रयास किया। वैसे बताते चलें कि यह फ़िल्म के निर्देशक राकेश रंजन और लेखक सह अभिनेता नलिन सिंह दोनों बिहार के ही रहने वाले हैं। इस फ़िल्म में नेहा धुपिया ने हिटलर की प्रेमिका की भूमिका का निर्वाह किया है। जबकि महात्मा गांधी की भूमिका अविजीत सिंह ने निभायी है।

उमर छोटी, बड़े-बड़े सपने

भोजपुरी बाल अभिनेत्री वैष्णवी से खास मुलाकात

दोस्तों, योग्यता उमर की मोहताज नहीं होती। हालांकि कोई यह सहसा यकीन नहीं कर सकता है कि इतनी छोटी उमर में कोई सदियों से जारी ब्राह्म्णवादी वर्चस्व को चुनौती देने का साहस दिखा सकता है। हम बात कर रहे हैं भोजपुरी बाल अभिनेत्री वैष्णवी की। उसके जज्बे का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है जब वह कहती है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 10 करोड़ बिहारियों के वास्ते