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फ़िल्म समीक्षा - ग्लोबलाइजेशन को मूंह चिढाती “सिल्क स्मिता” क्ल देश के सिनेमाघरों में विद्या बालन यानी 21वीं सदी की सिल्क स्मिता का जादू सिर चढकर बोलने लगा है। ग्लोबलाइजेशन के दौर में एक अबला के सबला बनने की कहानी लोगों को खूब भा रही है। लोगों को विद्या बालन की हसीन अदायें प्रभावित कर रही हैं तो इस फ़िल्म की कहानी के तीन पुरुष पात्रों के माध्यम से पुरुष समाज के दंभ को तोड़ने की कोशिश की गई है। मिलन लुथरिया, जिन्होंने पूर्व में कच्चे धागे जैसी फ़िल्म बनाकर लोगों में अपनी निर्देशन क्षमता के बूते अपनी पहचान स्थापित की थी। इस बार विद्या बालन की “द डर्टी पिक्चर” को लेकर मैदान में उतरे हैं। मनमोहक और कामोत्तेजक दृश्यों के कारण इस फ़िल्म के वीडियो प्रोमो बहुत पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं। अब लोगों को पूरी फ़िल्म देखने का मौका मिल रहा है तो लोग सिनेमाघरों की ओर टूट पड़े हैं। वैसे फ़िल्म की कहानी पूर्ण रुप से नारी संघर्ष की महागाथा है। हालांकि इस कहानी में उसे अपना बदन तीन मर्दों को परोसना पड़ता है और फ़िर एक दिन जब ग्लोबलाइज्ड वुमैन बन जाती है तब पुरुष समाज उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता है। एक दिन उसकी हत्या हो जाती है। फ़िल्म के हर फ़्रेम में विद्या का जादू है। जादू इस मायने में कि पूंजीवाद के दौर में अपने आपको सफ़ल बनाने के लिये एक महिला को किस तरह के समझौते करने पड़ते हैं, इसका नायाब प्रदर्शन विद्या ने किया है। रही बात फ़िल्म के पुरुष कलाकारों की तो वे विद्या के नारी अस्तित्व के आगे बौने नजर आते हैं। हालांकि नसीरुद्दीन शाह ने अपनी ढल चुकी उम्र में भी आज के युवा अभिनेताओं को शर्माने पर मजबूर कर दिया है। वही तुषार कपूर ने भी एक लेखक के रुप में अपनी भूमिका को जीवंत किया है। इमरान हाशमी को इस बार भी देह सुख लूटने का मौका मिला है और आन स्क्रीन इस कार्य को करने में इन्हें तो महारत हासिल है। वैसे पूरी फ़िल्म की कहानी ही ऐसी है कि विद्या ने किसी के लिये कुछ भी छोड़ा ही नहीं है। यानी पूरी फ़िल्म के दौरान दर्शक केवल उल्लाला उल्लाला कहकर चिल्लाने को मजबूर हो रहे हैं। उस समय भी जब पर्दे पर विद्या का देह दिखाई देता है और उस समय भी जब उसका अंत एक लाश के रुप में दिखाई देता है। कुल मिलाकर फ़िल्म पूरी गंभीरता के साथ देखने योग्य है। रजत अरोड़ा के गीत और विशाल शेखर के संगीत को तो जैसे विद्या ने जीवनदान दे रखा हो। इसलिये वे भी कर्णप्रिय ही हैं। 9 दिसंबर को रिलीज होगी “देसवा” पटना(अपना बिहार, 2 दिसंबर 2011) – मशहूर सिने अभिनेत्री नीतू चंद्रा के होम प्रोडक्शन चंपारण टाकीज की पहली फ़िल्म “देसवा” आगामी 9 दिसंबर को बिहार के अलावे उत्तरप्र्देश, दिल्ली, झारखंड, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के सिनेमा घरों में रिलीज की जायेगी। इस आशय की जानकारी फ़िल्म निर्माता नीतू चंद्रा ने “अपना बिहार” को दूरभाष पर दी। इन्होंने बताया कि उनकी यह फ़िल्म भोजपूरी फ़िल्मों के इतिहास के मामले में एक मील का पत्थर साबित होगा। इन्होंने बताया कि मौजूदा दौर में यह पहली ऐसी भोजपूरी फ़िल्म है, जिसे सभी अपने परिवार के साथ मिलकर देख सकते हैं। इस फ़िल्म के संगीत के बारे में नीतू ने बताया कि इसे सोनू निगम, मीका सिंह, भरत शर्मा व्यास और पद्मश्री शारदा सिन्हा जैसे जाने माने लब्ध प्रतिष्ठित गायकों ने अपनी आवाज से सजाया है। इन्होंने यह भी बताया कि बिहार में इस फ़िल्म के वितरण की जिम्मेवारी मुन्ना दमानी ने ली है, जो भोजपूरी फ़िल्मों के सबसे प्रतिष्ठित वितरक रहे हैं। हालांकि लंबे समय से भोजपूरी फ़िल्मों में आये विकार के कारण इन्होंने भोजपूरी फ़िल्मों के वितरण के कारोबार से स्वयं को अलग कर लिया था। वे अब “देसवा” के साथ पुनर्वापसी कर रहे हैं। एक नई उम्मीद के रुप में उभरे चिराग, पूरे देश में रिलीज हुई “मिले न मिले हम” पटना (अपना बिहार, 5 नवंबर 2011) – बिहार के युवाओं ने बालीवुड में धूम मचाना शुरु कर दिया है। पहले शत्रुघ्न सिन्हा और शेखर सुमन जैसे उम्दा कलाकारों के बाद मनोज वाजपेयी, नीतू चंद्रा तो बहुत पहले ही अपने आपको स्थापित कर चुके हैं। अब सोनाक्षी सिन्हा एवं चिराग पासवान ने अपने जौहर दिखाने शुरु कर दिये हैं। लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान की पहली फ़िल्म “मिले न मिले हम” कल पूरे देश में रिलीज हुई। बिहार में भी रिलीज हुए इस फ़िल्म में चिराग के काम को प्रशंसा मिल रही है। चिराग का अभिनय प्रशंसनीय है। प्रशंसनीय इसलिये कि इन्होंने अपनी पहली ही फ़िल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया है। फ़िल्म में चिराग के अलावे कंगना राणावत, सागरिका और नीरू बाजवा की तिकड़ी है तो दूसरी ओर पुनम ढिल्लो और कबीर बेदी जैसे स्थापित कलाकार भी इस फ़िल्म में अपने कला के जौहर दिखा रहे हैं। फ़िल्म की कहानी मूल रुप से चिराग के इर्द-गिर्द ही घूमती है। फ़िल्म में चिराग कबीर बेदी और पुनम ढिल्लो के पुत्र बने हैं। दोनों लंबे समय से एक-दूसरे से अलग-अलग रहते हैं। चिराग अपने पिता के आदर्शों पर चलकर टेनिस खिलाड़ी बनना चाहते हैं तो उनकी मां उन्हें सफ़ल बिजनेस मैन बनाना चाहती है। फ़िल्म की कहानी छोटी है और निर्देशन पक्ष भी अपेक्षाकृत कमजोर है। चिराग अपने हिस्से में आये कई इमोशनल दृश्यों में इमोशन दिखा पाने में असफ़ल रहे हैं। अलबत्ता इनके डांस ने लोगों को प्रभावित किया। फ़िल्म की जान बनी है कंगना राणावत, कबीर बेदी और पुनम ढिल्लो का सशक्त अभिनय। बहरहाल, अपनी पहली फ़िल्म में ही चिराग ने अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता हासिल कर ली है। अब इनके सामने अपने अभिनय को और निखारने की चुनौती है। अब देखना है कि इन्हें अपनी पहली फ़िल्म “मिले न मिले हम” में सफ़लता मिलती है या नहीं। वैसे भी चिराग में एक संभावना तो दिखती ही है। विशेष बातचीत - चन्द्रमा के दाग को धोने की कोशिश है “देसवा” पटना (अपना बिहार, 5 नवंबर 2011) – चन्द्रमा बेदाग नहीं है। यह स्थिति आदिकाल से चली आ रही है। लेकिन कलाकारों और क्ल्पनाशील साहित्यकारों द्वारा चंद्रमा को बेदाग बनाने की कोशिश की जाती रही है। ऐसा ही एक प्रयास है “देसवा”। इसके अलावे फ़िल्में समाज का दर्पण होती हैं। इसी सच को समाज के सामने रखने की कोशिश का भी नाम है “देसवा”। इस फ़िल्म का निर्माण जानी-मानी अभिनेत्री नीतू चंद्रा की कंपनी चंपारण टाकीज ने किया है। फ़िल्म का निर्देशन इनके भाई नीतिन चंद्रा ने किया है। जबकि सहायक निर्देशक की भूमिका अभिषेक चंद्रा ने निभाया है। यानी चंद्रा परिवार की अथक मेहनत का परिणाम है “देसवा”। फ़िल्म की खुबसूरती यह है कि भोजपुरी में बनी यह पहली प्रयोगधर्मी फ़िल्म है। पूरी कहानी बिहार पर आधारित है और एक आशीष विद्यार्थी और मुख्य नायिका आरती पुरी को छोड़ दें तो फ़िल्म के सभी कलाकार बिहार के विभिन्न रंगमंच से जुड़े हैं। फ़िल्म का सबसे खुबसूरत हिस्सा है फ़िल्म का संगीत पक्ष। फ़िल्म के गीतों को कर्णप्रिय बनाया है भोजपुरी सम्राट भरत शर्मा व्यास, बिहार कोकिला शारदा सिन्हा, मीका सिंह, सोनू निगम और सुनिधि चौहान जैसे कलाकारों ने। अपनी फ़िल्म के बारे में “अपना बिहार” के साथ विशेष बातचीत में नीतिन चंद्रा ने बताया कि इस फ़िल्म को बनाने की बात उन्हें तब सूझी जब वे पूणे विश्वविद्यालय से पढाई पूरी करने के बाद मुम्बई की गलियों में चक्कर काट रहे थे। उन दिनों भोजपूरी फ़िल्मों के लेकर एक नई बहस छिड़ चुकी थी। कथित तौर पर अपसंस्कृति फ़ैलाने वाली फ़िल्में सबसे अधिक बिहार में ही बनती हैं। इसी सोच को बदलने के लिये नीतिन ने “देसवा” का निर्माण करने की ठानी। अपने पैतृक जिले बक्सर में बैठकर “देसवा” की पटकथा लिखने वाले नीतिन बताते हैं कि आज लोग भोजपूरी से दूर होते जा रहे हैं। यहां तक कि भोजपूरी अंचल में रहने वाले लोग भी अब भोजपूरी बोलने में शर्म महसूस करते हैं। यह अत्यंत ही चिंतनीय विषय है। इससे भी बड़ी सच्चाई यह कि भोजपुरी भाषी ही भोजपुरी फ़िल्मों से दूर होने लगे। फ़िल्म की कहानी के बारे में बताते हुए नीतिन बताते हैं कि उनकी फ़िल्म समाज में फ़ैले भ्रष्टाचार और अपराध से शुरु होकर बिहार के नये निर्माण पर आधारित है। यह फ़िल्म लोगों के अंदर सकारात्मक सोच का निर्माण करेगी। नागार्जुन को समझने के लिये समाज को समझना जरुरी, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो मैनेजर पांडेय से विशेष बातचीत पटना (अपना बिहार, 5 नवंबर 2011) – नागार्जुन को समझना है तो उसके लिये सबसे पहले आपको समाज को समझना होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह कि नागार्जुन ने जो कुछ भी लिखा, वह समाज के लिये लिखा। उनके शब्दों में समाज दिखता था। समाज का दर्द ही उनकी रचनाओं का मूल भाव हुआ करता था। इसलिये यह आवश्यक है कि पहले आप समाज को समझें। बाबा की कवितायें आपको खुद ब खुद ही समझ में आ जायेंगीं। यह कहना है सूबे के प्राख्यात प्रगतिशील साहित्यकार प्रो मैनेजर पांडेय का। विदित है कि कल बाबा की पुण्यतिथि थी और इस अवसर पर पटना विश्वविद्यालय में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रो पांडेय के अलावे विधान परिषद के सभापति पंडित ताराकांत झा, वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति शंभूनाथ सिंह ने अपने विचार व्यक्त किये। श्री सिंह ने कहा कि पटना विश्वविद्यालय बाबा नागार्जुन की स्मृति में नागार्जुन पीठ की स्थापना करेगा। बाद में “अपना बिहार” के साथ विशेष बातचीत में प्रो मैनेजर पांडेय ने कहा कि यह कटु सच्चाई स्वीकार कर लेना चाहिये कि बाबा नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर और फ़णिश्वरनाथ रेणु जैसी हस्तियां बार-बार जन्म नहीं लेतीं। जबतक ऐसा नहीं होता है तबतक समाज को इन महान विभूतियों की सुखद स्मृतियों के सहारे वर्तमान एवं भविष्य की रुपरेखा तय करनी चाहिये। वैसे भी समाज केवल जीवित इंसानों के सहारे ही नहीं चलता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि समाज स्वयं ही ऐसी विभूतियों को जन्म देता है। प्रो पांडेय ने कहा कि साहित्य की भाषा में नकारात्मक परिवर्तन हुआ है। इसके अलावे इस सच को पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकारा जाना चाहिये कि अभी भी सूबे में शिक्षा का घोर अभाव है। इसके अलावे साहित्यकारों की भाषा भी इतनी जटिल है कि जन सामान्य इसे सहज तरीके से समझ नहीं पाता है। इसलिये आवश्यकता ऐसे भाषा और शैली की है जो सहज ही समझने योग्य हो। प्रो पांडेय ने बताया कि आज के मनुष्य को अपने कान अधिक से अधिक खोले रखने चाहिये। इसकी वजह यह है कि आंखों पर पूंजीवादी शक्तियों का क्ब्जा हो चुका है। विस्तार से बताते हुए प्रो पांडेय ने कहा कि टेलीविजन चैनलों में पूंजीवाद के बढते वर्चस्व के कारण आम जनता उस सच को नहीं जान पा रही है जो वास्तव में घटित हो रहा है। इन्होंने कहा कि सच को पहचानना, सच को समझना, सच को लिखना और किसके लिये सच लिखा जाये, यह जानना अत्यंत आवश्यक है। यह दुविधा साहित्यकारों के लिये भी है। सूबे में विकास के सवाल पर प्रो पांडेय ने दो टूक शब्दों में कहा कि जितना विकास हुआ नहीं है, उससे अधिक ढोल पीटा जा रहा है। यह अत्यंत ही चिंतनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है। हिन्दी सिनेमा में हिन्दी खोजने की मजबूरी जब कोई समाज अथवा देश लंबे समय तक पराधीन रहता है तो पराधीनता उसकी एक पहचान बन जाती है। एक ऐसी पहचान, जिसे खत्म होने में कई पीढियां बीत जाती हैं। सामान्य जनजीवन में यह पहचान मिटती चली जाती है। उदाहरणस्वरुप आजादी मिलने के बाद देश में जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम चलाया गया। बड़े-बड़े राजा और जमींदार आम आदमी की श्रेणी में शामिल हो गये। उनके पूर्व की पहचान अब लगभग खत्म ही हो चुकी है। बिहार के गांवों में भी यह परिवर्तन देखा जा सकता है। अब यह कहा जा सकता है कि बाघ और बकरी एक साथ पानी पीते हैं। मतलब यह कि लालू प्रसाद के कारण सूबे में पिछड़ों और दलितों में व्यापक जागरूकता हुई और आज हालत यह है कि अधिकांश इलाकों में सवर्ण और गैर सवर्ण दोनों एक साथ कुर्सी अथवा चौकी पर बैठते हैं। लेकिन पहचान अभी भी नहीं बदली। आज भी एक चमार का बेटा चमार ही है। यादव के बेटे के साथ राजपूत या भूमिहार अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता। सवाल पहचान की है। यही हालत आज हिन्दी की है। हिन्दी की पहचान पराधीनता का पर्याय बन चुकी है। जब मुसलमान शासक थे तब इसपर उर्दू और अरबी संस्कृति राज करती थी। बेचारी हिन्दी को कहा गया कि हिन्दी सबसे अधिक लचीली भाषा है, बिल्कुल पानी के जैसे। जिस बर्तन में डाल दो, उसका आकार और रंग धारण कर लेती है। इससे पहले आर्यों ने भी मूल भारतीयों की भाषा के बारे में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किये थे। नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे मूल भारतीयों की भाषा ही समाप्त हो गई और फ़िर रह गई तो केवल हिन्दी। एक ऐसी हिन्दी, जिसमें हिन्दीपन का सर्वथा अभाव है। मेरे हिसाब से हिन्दी को अहिन्दी बनाने के लिये सबसे अधिक दोष अंग्रेजों को नहीं बल्कि हिन्दुस्तानियों को दिया जाना चाहिये। अंग्रेजों ने तो अपनी संस्कृति और अपनी भाषा का प्रसार किया। यह जिम्मेवारी भारतीयों की थी कि वे अपनी भाषा को सुरक्षित रखने की कोशिश करें। लेकिन शायद ही कोई ऐसा नेता रहा हो, जिसने अंग्रेजीयत के आगे अपने घुटने नहीं टेके। महात्मा गांधी भी इसके अपवाद नहीं हैं। खैर, आजादी के बाद हिन्दी सिनेमा ने हिन्दीपन को और अधिक नुकसान पहुंचाया। कल मोहल्ला लाइव और प्रबंधन संस्थान सिमेज के संयुक्त तत्वावधान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। विषय था हिन्दी सिनेमा। इस कार्यक्रम में अपने संबोधन में मशहूर फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ने बताया कि आजादी के पहले हिन्दी सिनेमा के तीन केंद्र हुआ करते थे। पहला कलकत्ता, दूसरा लाहौर और फ़िर तीसरा बम्बई। आजादी के पहले ही कलकत्ता और लाहौर से हिन्दी को खत्म कर कर दिया गया। विभाजन के बाद वैसे भी लाहौर में हिन्दी का नाश तो होना ही था सो हो गया। लेकिन बम्बई में हिन्दी सिनेमा में लाहौर और सिंधियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। हालांकि इसका एक प्रभाव यह हुआ कि हिन्दी सिनेमा में हिन्दी का पंजाबीकरण हो गया। वही इस अवसर पर पिंजर फ़िल्म के निर्देशक डा चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि हिन्दी भाषी अब हिन्दी सिनेमा में अपने लिये जगह तलाश रहे हैं। यह संकोच का विषय नहीं, बल्कि इसे बढती भागीदारी का प्रतीक माना जाना चाहिये। इन्होंने यह भी कहा कि केवल हिन्दी में बनने वाली फ़िल्मों को ही हिन्दी नहीं कहा जाना चाहिये। वस्तुतः कन्नड़, तेलुगू, पंजाबी और उड़िया आदि भाषाओं में बनने वाली फ़िल्मों को भी हिन्दी सिनेमा का ही अंग माना जाना चाहिये। इस अवसर पर मोहल्ला लाइव के संपादक अविनाश दास, मशहूर अभिनेता विनीत कुमार और तहलका के स्थानीय पत्रकार निराला तिवारी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालय मशहूर रंगकर्मी अनीश अंकुर ने किया।-नवल किशोर कुमार रघुवीर यादव को भाया बिहार देश के जाने-माने अभिनेता रघुवीर यादव को भी भा गया बिहार। कल अपना बिहार के साथ विशेष बातचीत में श्री यादव ने कहा कि बिहार अब बदल चुका है और बड़ी-बड़ी इमारतें और चौड़ी सड़कें इसकी पहचान बन चुकी हैं। इन्होंने बताया कि पहली बार वे 1970 के दशक में बिहार आये थे,भूमितब उस समय यहां गंगा नदी में स्टीमरें चला करती थीं। श्री यादव ने बताया कि दिल को छूनेवाली भूमिकायें ही उन्हें पसंद आती हैं। गांधी टू हिटलर फ़िल्म के प्रोमोशन के सिलसिले में पटना आये श्री यादव ने बताया कि हिटलर की भूमिका अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण थी। चुनौतीपूर्ण इसलिये कि हिटलर के नकारात्मक व्यक्तित्व को सकारात्मक रुप में महात्मा गांधी के समतुल्य प्रस्तुत करना था। इसलिये जब इन्हें यह स्क्रिप्ट मिली तब इन्होंने सबसे पहले हिटलर के वीडियो फ़ुटेज देखे। हिटलर के हावभाव के जरिये उसके वास्तविक चरित्र को समझने का प्रयास किया। वैसे बताते चलें कि यह फ़िल्म के निर्देशक राकेश रंजन और लेखक सह अभिनेता नलिन सिंह दोनों बिहार के ही रहने वाले हैं। इस फ़िल्म में नेहा धुपिया ने हिटलर की प्रेमिका की भूमिका का निर्वाह किया है। जबकि महात्मा गांधी की भूमिका अविजीत सिंह ने निभायी है। |