बिहार की समृद्ध संस्कृति ने देश और दुनिया को हमेशा आकर्षित किया है। यहां की अनूठी संस्कृति ने उपेंद्र महारथी जैसे महान शिल्पकार और चित्रकार को इतना प्रभावित किया कि वे आजीवन बिहार के ही बनकर रह गये। वर्तमान में बिहार को सौभग्य से एक बेटी मिली है, जिसने उसके गर्भ से भले ही जन्म नहीं लिया, लेकिन आज वह बिहार के सौभाग्यशाली मस्तक पर बिंदिया की तरह चमक रही है। बिहार की इस दत्तक बेटी का नाम है कल्पना पटवारी।

वही कल्पना, जिसने कभी “गवनवा ले ल राजा जी” और “एगो चुम्मा ले ल राजा जी” जैसे द्विअर्थी गीत गाकर लोकप्रियता के सारे रिकार्ड तोड़े थे। बाद में कल्पना ने भोजपुरी संगीत संसार को अपनी सुमधुर आवाज से सजाया संवारा। आज भोजपुरी संगीत की चर्चा होती है तो कल्पना का नाम किसी अतिथि के रुप में नहीं, बल्कि बिहार की बेटी के रुप में ही होती है। वैसे कल्पना मूल रुप से आसाम की रहने वाली हैं। पिछले एक दशक से इन्होंने दिल को छूने वाली आवाज और भोजपुरी के प्रति समर्पण के बूते नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

आज के राक और तथाकथित सोलो म्यूजिक के दौर में भी कल्पना ने शतायु बिहार को अपनी ओर से एक साहसी तोहफ़ा दिया है। साहसी इस मायने में कि कल्पना ने भिखारी ठाकुर की परंपरा को अपनी आवाज के सहारे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। अपने नवीनतम एलबम “द लीगेशी आफ़ भिखारी ठाकुर” के जरिये कल्पना ने भिखारी ठाकुर के उन गीतों को अपनी आवाज से सजीव बनाया है, जो उनके जीवनकाल में तो सजीव थे, लेकिन बाद में काल के गाल में समा गये थे।

अपना बिहार के साथ बातचीत में कल्पना बताती हैं कि एलबम के निर्माण से पहले उन्होंने भिखारी साहित्य का गहनपूर्वक अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान इन्होंने पाया कि भिखारी ठाकुर ने आज के वर्तमान की सच्चाई को अतीत में ही अपनी नाटकों में वर्णित किया था। हालांकि कल्पना की कल्पना भी ब्राह्मणवाद के पाखंड के मायाजाल में सीमित रह जाती है और वह भिखारी ठाकुर के द्वारा बतायी गयी सामाजिक सच्चाई को भी उसी चश्मे से देखती हैं। इसका प्रभाव गीतों के चयन और प्रस्तुतियों में सुनाई पड़ता है। एलबम की कीमत 195 रुपए है और इस दृष्टिकोण से यह महंगा अवश्य है, लेकिन भिखारी ठाकुर को समर्पित गीतों को कल्पना की आवाज के लिहाज से इसे महंगा नहीं कहा जाना चाहिए।

बहरहाल, सौ साल पूरा होने पर बिहार की दत्तक बेटी कल्पना ने बिहारवासियों को अनमोल तोहफ़ा दिया है। सारंगी के प्रयोग ने प्रस्तुति को और अनूठा बना दिया है। सबसे अधिक कल्पना की चंचल और शोख आवाज ने भिखारी ठाकुर के गीतों को 21वीं सदी में सजीव बनाने में सफ़ल हुई हैं। इसके लिये ये बधाई की पात्र हैं। अपना बिहार भी इनके इस संगीतमय प्रयास को सलाम करता है।

गया में ही बनेगा बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय

नई दिल्ली (अपना बिहार, 19 मई 2012) – जी हां, गया जिले में ही स्थापित होगा बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय। राज्य सरकार के कड़े विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने बिहार के गया स्थित पंचनपुर में बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का फैसला किया है इस आशय की जानकारी मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री अहमद ने पिछले दिनों राज्यसभा को बताया कि बिहार सरकार ने मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन स्थल चयन समिति ने इस स्थान को उपयुक्त नहीं पाया क्योंकि यहां आवश्यक सामाजिक एवं भौतिक बुनियादी सुविधाओं का अभाव हैउन्होंने तरुण विजय के प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि राज्य सरकार ने कोई वैकल्पिक स्थान का प्रस्ताव नहीं दिया था। मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय के परामर्श से गया के पंचनपुर में बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए 300 एकड रक्षा भूमि की पहचान की है। इस जगह का रेल, सडक एवं हवाई संपर्क है। साथ ही गया भौतिक एवं सामाजिक बुनियादी सुविधाओं से संपन्न है। अहमद ने बताया कि केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिहार की स्थापना दो मार्च 2009 को की जा चुकी है और यह पटना स्थित बीआईटी के अस्थायी परिसर से काम कर रहा है।

8वीं अनुसूची में जल्द शामिल होगी भोजपुरी

पटना(अपना बिहार, 19 मई 2012) – देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली आंचलिक भाषा “भोजपुरी” को जल्द ही 8वीं अनुसूची में शामिल किया जायेगा। इस आशय की जानकारी पिछले गुरुवार को केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने लोकसभा में दी। आमतौर पर अंग्रेजी भाषा में अपनी बात कहने वाले श्री चिदम्बरम ने भोजपुरी भाषा में बोलते हुए जब ये बातें कहीं, तब सदन में मौजूद सभी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर अपनी सहमति दी। इधर श्री चिदंबरम के आश्वासन से सूबे के कलाकार और साहित्यकार सभी गदगद हैं। प्राख्यात लोक गायिका शारदा सिन्हा ने अपना बिहार को बताया कि 8वीं अनुसूची में शामिल किये जाने से भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति को नयी पहचान मिलेगी। प्राख्यात गायिका और बिहार की दत्तक पुत्री कल्पना पटवारी ने भी भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में शामिल किये जाने के आश्वासन पर खुशी का इजहार किया है। इन्होंने बताया कि अब हमारी भोजपुरी को उसका वाजिक हक मिल सकेगा।

सुशासन की खोज – सब बयां कर रही है पीएमसीएच की बदहाली

पटना(अपना बिहार, 19 मई 2012) – यदि आप बिहार में सुशासन की खोज करना चाहते हैं तो निश्चित रुप से आपको पीएमसीएच यानी पटना मेडिकल कालेज अस्पताल जाना चाहिए। कहने को तो यह सूबे का सबसे बड़ा अस्पताल है और सरकार के दावे भी आपको यह सोचने पर मजबूर कर देंगे कि सरकारी दावे सच हैं या फ़िर वह जो आप अपनी आंखों से देख रहे हैं।

बात करते हैं पीएमसीएच के इमरजेंसी की। यहां लोगों को इमजरेंसी में भर्ती किया जाता है। यहां इलाज कैसे होता होगा, इसका अनुमान आप इसी मात्र से लगा सकते हैं कि सीटी स्कैन दो वर्षों से और एमआरआई मशीन पिछले एक वर्ष से खराब पड़ा है। इलाज की मुकम्मल व्यवस्था नहीं होने के कारण आये दिन इमरजेंसी वार्ड में मरीजों के मर जाते हैं। बेचारे परिजन इसे भगवान की माया समझकर अपने स्वजनों की लाश लेकर चले जाते हैं। आये दिन परिजन हंगामा भी करते हैं।

अस्पताल में सिटी स्कैन दो वर्षो से खराब पड़ी है। बावजूद इसके स्वास्थ्य विभाग अस्पताल प्रशासन ने अभी तक मरीजों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की है। मशीन खराब होने के कारण देर रात इलाज के लिए मरीजों को जब गंभीर हालत में सिटी स्कैन कराने की जरूरत पड़ती है, तो वे बाहर जाते हैं या किसी निजी अस्पताल में चले जाते हैं। अस्पताल में लगभग डेढ़ साल पहले 2010 में एमआरआइ मशीन लगायी गयी, जो छह माह बाद ही बंद हो गयी थी। खास बात यह कि यह मशीन किन कारणों से बंद है, यह बात असपताल प्रशासन नहीं बताना चाहता है।

चलते-चलते एक नजारा इमरजेंसी वार्ड के आपरेशन थियेटर पर भी डाल लें। यहां एक मशीन जिसका नाम सी-आर्म इमेज इंटेसिफायर टीवी सिस्टम है। यह एक अत्याधुनिक मशीन है, जिसके सहारे ही ऑपरेशन थियेटर में कई महत्वपूर्ण कार्यों को निष्पादित किया जाता है। खास बात यह कि यह मशीन भी पिछले एक साल से खराब है।

शराबी पति की नृशंस हत्या

पटना (अपना बिहार, 19 मई 2012) - गया जिले में एक महिला ने तंग आकर अपने ही पति की नृशंस हत्या कर दी। मिली जानकारी शहर के सिविल लाइंस थाना के रमना मुहल्ले में रहनेवाली बबली देवी ने पिछले मंगलवार को अपने शराबी पति मुकेश कुमार को ईंट और पत्थर से इतना मारा कि उसके प्राण पखेरु उड़ गये। बाद में पुलिस को दिये अपने बयान में बबली देवी ने बताया कि मुकेश रोज शराब पीकर उसे मारता पिटता था। मंगलवार को जब वह घर आया तो उसने शराब के नशे में उसे मारना शुरु कर दिया। इस बीच दोनों के बीच हाथापाई हो गयी और पत्थर से चोट लगने के कारण मुकेश की मौत हो गई। हालांकि स्थानीय ग्रामीण इसे प्रेम प्रसंग का मामला बताते हैं। उनका कहना है कि अपने ही हाथों अपने पति की हत्या कर बबली देवी ने अपने प्यार के सबसे बड़े बाधक का काम तमाम कर दिया है। जबकि स्थानीय पुलिस अधिकारी का कहना है कि वे सभी मामलों की जांच कर रहे हैं। बबली देवी को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया है।

किताबों के बगैर पढने की मजबूरी

पटना(अपना बिहार, 16 मई 2012) - बिहार में शिक्षा विभाग की मुस्तैदी का आलम यह है कि अभी तक 85 फ़ीसदी बच्चों को स्कूल की किताबें नहीं मिल सकी हैं, जबकि नये सत्र की पढाई अप्रैल के पहले सप्ताह में ही शुरु हो चुकी है। किन कारणों से बच्चों को किताबें नहीं मिल सकी हैं, इस सवाल का जवाब तो शिक्षा विभाग के पास है और ही बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कारपोरेशन के पास जिनके जिम्मे किताबों का वितरण करने की जिम्मेवारी है। किताबें नहीं रहने के कारण बच्चों की पढाई बाधित हो रही है। इस संबंध में जब अपना बिहार ने शिक्षा मंत्री पी के शाही से जानना चाहा तब उन्होंने कहा कि किताबों को भेजने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है और बहुत जल्द ही बच्चों को उनकी किताबें मिल जायेंगी। बताते चलें कि पिछले वर्ष भी किताबों के वितरण का कार्य भी केवल 53 फ़ीसदी ही पुरा हो सका था।

फ़िर से हर साल करोड़पति होंगे बिहार के विधायक

पटना(अपना बिहार, 16 मई 2012) – तीन साल पहले विधायकों को करोड़पति से खाकपति बनाने पर देश-विदेश में सुर्खियां हासिल करने के बाद एक बार फ़िर नीतीश सरकार ने विधायकों को हर साल करोड़पति बनाने का निर्णय लिया है। कल हुई कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी कि विधायक पहले की तरह हर साल अपने क्षेत्र के विकास के लिए एक-एक करोड़ रुपए खर्च करेंगे। कैबिनेट सचिव रविकांत ने इस आशय की जानकारी देते हुए बताया कि खर्च करने के लिए एक नयी नियमावली बनायी जा रही है और कैबिनेट ने इसके लिए मुख्यमंत्री को अधिकृत किया है।

बताते चलें कि तीन साल पहले नीतीश सरकार ने एमएलए फ़ंड को यह कहते हुए समाप्त कर दिया था कि इस योजना के क्रियान्वयन में जनप्रतिनिधि व्यापक रुप से कमीशनखोरी करते हैं। इसके बाद सरकार ने मुख्यमंत्री क्षेत्रीय विकास योजना का सूत्रपात किया। इसके तहत जिलास्तर पर एक टीम का गठन किया गया था, जो विकास के लिये अनुशंसायें भेजती थी और फ़िर सरकार उस योजना को अमल में लाती थी। वैसे सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या नीतीश सरकार की नजर में जो विधायक 3 साल पहले कमीशनखोर थे, वे आज पूरी तरह इमानदार हो गये हैं या फ़िर यह सरकार की मजबूरी है, जो विधायकों ने उत्पन्न कर दी है। आने वाले समय में इन सवालों का जवाब भी देगा।

 

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बिहार में अपराध

अपना बिहार और राज्य में प्रकाशित विभिन्न अखबारों में प्रकाशित खबरों के अनुसार कल दिनांक 18 मई 2012 को घटित घटनाओं की संख्या

 

 

 

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दोस्तों, पिछले दिनों जब मुझे दिल्ली में बनवास से अस्थायी मुक्ति मिली और मैं पटना आ रहा था, तब एक दिलचस्प घटना घटी। मैं जिस डब्बे में सवार था, उस डब्बे के लोग राजनीतिक रुप से अधिक जागरुक थे। उनकी जागरुकता के कारण ही देर रात तक मुझे अनचाहे वचन सुनने पड़े। सुबह होने पर उनका व्याख्यान शुरु हो गया। हालांकि देर रात के राजनीतिक प्रवचन की तुलना में सुबह में हो रही वार्तालाप कुछ अधिक कर्णप्रिय लगी। वे बथानी टोला के बारे में बात कर रहे थे। सभी नीतीश सरकार के उस बयान का विरोध कर रहे थे जिसमें सरकार ने बथानी टोला के फ़ैसले के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी।

अपनी आदत के अनुसार मैं एक अच्छा श्रोता बना रहा। जैसे ही ट्रेन ने डुमरांव स्टेशन को पार किया, मैंने बथानी टोला जाने का निश्चय किया। करीब एक घंटे के बाद ट्रेन आरा स्टेशन पर खड़ी थी और मैं आरा स्टेशन के बाहर चाय का आनंद ले रहा था। सोच रहा था कि बथानी जाने का कौन सा तरीका अपनाया जाये। इसी उधेड़बुन में मैंने 5-6 लोगों से बथानी टोला जाने के लिए बस या किसी अन्य सवारी गाड़ी के बारे में पूछा। मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब लोगों ने बथानी टोला के बारे में अनिभिज्ञता प्रकट की।

मेरे एक मित्र संदीप, जो मेरे हमपेशा हैं, मैंने उन्हें फ़ोन पर बथानी टोला जाने के बारे में बताया। ठीक दस मिनट के अंदर ही वो मेरे सामने अपने अग्निदूत यानी मोटरसाइकिल के साथ हाजिर थे। एक बार फ़िर चाय का आनंद लेने के बाद हम बथानी टोला के रास्ते पर अग्रसर थे। खेतों में गेहूं काटा जा चुका था। गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को रह रहकर झुलसा देती थी।

करीब डेढ घंटे की यात्रा के बाद हम बथानी टोला के बाहर खड़े थे। संदीप ने मुझे इशारा किया। कुछ लोग गांव की सीमा के बाहर बैठे थे। उनके हाथों में रायफ़लें थीं। संदीप ने बताया कि ये लोग बड़का खड़ाऊं टोला गांव के हैं। जबसे बथानी टोला नरसंहार का फ़ैसला आया है, तबसे बड़का खड़ाऊं के लोग बथानी टोला आने-जाने वाले हर आदमी पर “निगाह” रखते हैं।

मुझे उनसे कोई लेना-देना नहीं था और मैंने संदीप को आगे बढने को कहा। बथानी टोला की सीमा में प्रवेश करने के साथ ही एक स्मारक पर नजर पड़ी। यह स्मारक माले द्वारा बथानी टोला नरसंहार में मारे गये लोगों की स्मृति में स्थापित किया गया था। स्मारक के नीचे बने शिलापट्ट पर मारे गए सभी लोगों के नाम लिखे थे। मैं कुछ आवश्यक जानकारियां नोट ही कर रहा था कि कुछ लोग आ गये। न तो उनके चेहरे पर बथानी टोला का दर्द नहीं था और न ही उनकी वाणी में ही।

वे मुझसे कह रहे थे कि मैं कैसा पत्रकार हूं, जिसके पास कैमरा नहीं है। मुझसे पहले संदीप ने जवाब दे दिया था। मैंने लखिया देवी के बारे में पूछा। एक किशोर ने उसके बारे में कहा कि अभी वह अपने घर में होगी। मैंने उस किशोर से लखिया देवी के घर का रास्ता पूछा। बथानी टोला की उबड़खाबड़ गलीनुमा सड़क पर चलते हुए हम उसके घर के दरवाजे पर खड़े थे और वह अपने घर के अंदर बच्चों के साथ खाना खा रही थी।

हम बाहर खड़े रहे। मुझे आश्चर्य हो रहा था। लखिया देवी के घर को छोड़कर अधिकांश लोगों के घर पक्के थे। इससे पहले कि मेरा मन कुछ और सोच पाता लखिया देवी घर के बाहर आ चुकी थी। उसने अपने घर के आगे बने बथानी में एक खटिया पर बैठने का आग्रह किया। थोड़ी देर के बाद उसने हमें पानी पीने को दिया।

टेलीफ़ोन से हुई बातचीत का हवाला देते हुए मैंने अपना परिचय उसे दिया। फ़िर उसका घर पक्का होने के बजाय कच्चा होने के बारे में पूछा। उसने सवालिया लहजे में जवाब दिया कि जो लोग मारे गये, सरकार ने केवल उनके परिजनों को ही 2 लाख रुपए मुआवजा और सरकारी नौकरी दी। चूंकि उसके परिवार में कोई मरा नहीं, इसलिए वह मुआवजे और नौकरी दोनों से वंचित रह गई। बताते चलें कि 16 साल पहले रणवीर सेना के नरपिशाचों ने लखिया देवी का स्तन काट लिया।

लखिया देवी ने बताया कि वह खुद भी खेती करती है और पति दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। 5 बेटियां और एक बेटा है। सभी स्कूल में पढने के लिये 3 किलोमीटर दूर जाते हैं। संदीप ने सवाल किया कि बड़का खड़ाऊं टोला में तो प्राथमिक विद्यालय है ही, फ़िर दूर क्यां? लखिया देवी ने कहा कि हम लोगों को बड़का खड़ाऊं जाने की इजाजत नहीं है। मैंने जब इस इजाजत के बारे में विस्तार से पूछा तब उसकी आंखें भर आईं। मैं समझ गया था।

लखिया देवी के घर पर सत्तु पीने के बाद हम लालचंद चौधरी के घर पर पहूंचे। लालचंद जी आरा गए हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में कोई बताने वाला नहीं था। उपस्थित लोगों से मैंने उस दरवाजे को देखने की इच्छा प्रकट की, जहां रणवीर सेना के जुल्म का गवाह आज भी जिंदा है। अलकतरा से पेंट किये गये दरवाजे को दिखाते हुए लोगों ने उस सुराख को भी दिखाया जहां गोली धंसी है। मैंने दिल को संतुष्ट करने के लिये सुराख को साफ़ कर झंकने की कोशिश की। गोली स्पष्ट तौर पर दिख गयी।

मैंने बथानी टोला के लोगों से बड़का खड़ाऊं जाने की बात कही। अधिकांश लोगों ने कहा कि आप वहां नहीं जायें। वहां के लोग बड़े बदमाश हैं। अभी हाल ही में एक पत्रकार को उनलोगों ने खूब मारा-पीटा था। संदीप इस खबर के बारे में जानते थे, इसलिए उसने सिर हिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मैंने कहा कि चलो आज हम भी मार खाकर देखते हैं। पहले तो संदीप ने इन्कार किया, लेकिन वह मेरे साथ हो गए।

हम बड़की खड़ाऊं जा रहे थे। रास्ते में कर्बला की उस जमीन को भी देखा, जिसके कारण रणवीर सेना ने रक्तपात मचाया था। एक ऊंचे टीले पर हरा झंडा लहरा रहा था और उसी जमीन पर के भगवा झंडा भी पूरी मुस्तैदी से लहरा रहा था। मैंने संदीप से पूछा तो उसने बताया कि कर्बला की जमीन पर प्रशासन ने मुसलमानों को हरा झंडा और बड़का खड़ाऊं के लोगों को भगवा फ़हराने की इजाजत दे रखी है। वैसे इस जमीन पर आजतक धारा 144 लगा हुआ है। लेकिन यहां कानून कोई नहीं मानता है।

बड़की खड़ाऊं पहूंचने पर एक दालान के पास हम रुके। लोग ताश खेल रहे थे। मैंने उनके मतलब की बात से बातचीत की शुरुआत की। वे नरसंहार को जायज ठहरा रहे थे। जायज ठहराने के क्रम में वे बथानी टोला के दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को गालियां भी दे रहे थे। जब मैंने उनसे कहा कि नीतीश सरकार ने फ़ैसले कि खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है, तब वे हंस रहे थे। एक के बाद एक 6-7 कद्दावर भूमिहार नेताओं का नाम लेते हुए लोगों ने कहा कि नीतीश कुमार की औकात नहीं है कि वह फ़ैसले के बारे में कोई बात कहे। आजतक उसने कभी कुछ कहा है इस बारे में?

बड़की खड़ाऊं टोला में भूमिहारों की ठसक उनके बाप-दादाओं के ठसक सरीखा ही है। कुछ नहीं बदला है। भूमिहारों ने बथानी टोला का बहिष्कृत कर रखा है। कोई राजनीतिक दल अब बथानी टोला नहीं जाता। यहां तक कि चुनाव में भी कोई वोट मांगने नहीं जाता।

हम लौट रहे थे। रास्ते में हम सोच रहे थे कि बथानी की पीड़ा और फ़िर भूमिहारों की ठसक का इलाज क्या हो सकता है। क्या कभी लखिया देवी को इंसाफ़ मिल पायेगा? अगर किसी को सजा मिल भी गयी तो क्या वह अपने सुनहरे दिनों को जी पाएगी जो उसने खो दिया।? ऐसे अनेकों प्रश्न दिमाग में उठापटक कर रहे थे और मैं इंटरसिटी ट्रेन में सवार होकर अपने लिए एक जगह तलाश कर रहा था। (नवल किशोर कुमार)

 

पटना(अपना बिहार, 19 मई 2012) - उत्तर बिहार के राबिन हुड यानी पप्पू यादव के जीवन में इन दिनों बदलावों का दौर जारी है। माकपा नेता अजीत सरकार की हत्या के आरोप में जेल की सजा काट रहे श्री यादव ने अपने वजन को भी कम कर लिया है। आजकल वे बेऊर जेल में अपना अधिकांश समय पठन-पाठन में लगा रहे हैं। मिली जानकारी के अनुसार वे इन दिनों अपनी आत्मकथा भी लिख रहे हैं, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उनकी आत्मकथा बिहार में राजनीति और अपराधियों के बीच सांठ-गांठ के अंदरुनी रहस्यों को जगजाहिर करेगा। बताते चलें कि श्री यादव ने अपने जीवन के 47 साल पूरे कर लिये हैं। इन्होंने अपनी आत्मकथा का शीर्षक भी यही रखा है। “लाइफ़ बिगिन्स एट 47”। इस किताब के बारे में स्वयं श्री यादव का कहना है कि यह उनके जीवन के विभिन्न पहलूओं को पूरे पारदर्शी तरीके से लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर पाने में सफ़ल होगी। श्री यादव चार बार सांसद रह चुके हैं। दो बार निर्दलीय, एक बार समाजवादी पार्टी और एक बार राजद के टिकट पर उन्होंने लोक्सभा पहुंचने में सफ़लता हासिल किया है।

संपादकीय - 795 महिलाओं के साथ बलात्कार, 2569 का अपहरण और 1257 दहेज हत्यायें

महत्वपूर्ण खबरें

· चिंटू को जिंदा जलाने वाले अभी भी पुलिस की गिरफ़्त से बाहर

· गया में ही बनेगा बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय

· 8वीं अनुसूची में जल्द शामिल होगी भोजपुरी

· सुशासन की खोज – सब बयां कर रही है पीएमसीएच की बदहाली

· शराबी पति की नृशंस हत्या

· किताबों के बगैर पढने की मजबूरी

· सुशासन की खोज – चुनौती बना ब्लेडमैन

· रोहतास एसपी मनु महाराज पर जानलेवा हमला

· पत्नी के साथ जबरदस्ती करने पर पति गिरफ़्तार

· एसएलबीसी की बैठक में सीएम की दहाड़

· सीएम ने लिया एम्स निर्माण का जायजा

· 400 करोड़ रुपये के बावजूद कूपोषित है गेट्स दंपत्ति का “बेटा”

· समय से साक्षात्कार : मैं हिन्दू धर्म हूं

· अलग-अलग आजादी, अलग-अलग लड़ाईयां

 

अपना बिहार

Born to Win

मासूम पर सुशासन की मार

पटना(अपना बिहार, 19 मई 2012) - 11 वर्षीय इस मासूम को उसके शिक्षक ने लोहे के राड से मारा है। राजधानी पटना से सटे मनेर प्रखंड के एक सरकारी स्कूल में पढने वाले इस मासूम पर शिक्षक ने आरोप लगाया है कि इसने मिड डे मिल का अनाज चुराने का अपराध किया है। वैसे इस मामले में स्थानीय थाने में एक प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है। खास बात यह कि अभी तक आरोपी शिक्षक को गिरफ़्तार नहीं किया गया है।

फ़ोटो - साभार, फ़ारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली

बथानी टोला की पीड़ा और भूमिहारों की ठसक

अपनी बात

बिहार की दत्तक बेटी का अनूठा प्रयास

विशेष रिपोर्ट

जेल में जीवन की नई शुरुआत कर रहे हैं पप्पू यादव

महज एक मुलाकात मयस्सर नहीं इस पहर के लिए,

मुझे साथ चाहिए उनका जिंदगी भर के लिए।

अधूरी इक लौ से ये शब ना जलेगी,

चिरागों की महफ़िल मांगता हूं मैं पल-पल के लिए।

कि इंतजार में उनके आंखें पथरा सी गई हैं,

इक तीर-ए-नजर मांगता हूं दिल में हलचल के लिए।

शफ़्फ़ाक महजबीं से शब-ए-महताब हो गई फ़ीकी,

उस हमनशीं की आरजू है अपने तारीकी-महल के लिए।

बस के हसरत में उनकी ना बीत जाए ये जिंदगानी,

‘यश’ इतना तसव्वुर काफ़ी है इक मुकम्मिल गजल के लिए।

(इस गजल के रचनाकार यश मौर्य मूल रुप से बिहार के हैं। वर्तमान में ये सूरत, गुजरात में चार्टर्ड अकाउंटेंट के रुप में कार्यरत हैं।)

कविता - फ़ास्ट लोकल जो पकड़नी है…

(राजेश कुमार सिन्हा)

जिन्दगी से तेज भागने की

कोशिश में बजाये पैरों के

जेहन में छाले पड़ गए है

दिमाग में भी सुजन है

चिकित्सक की राय है

आपको अपनी रफ़्तार

कम करने की कोशिश करनी चाहिए 

मै परेशान हूँ

और स्तब्ध भी

अगर इस रफ़्तार के बावजूद

क्रेडिट और डेबिट का संतुलन

नहीं बन सका तो

इससे कम रफ़्तार में क्या होने वाला है?

आज  मन और तन दोनों ही

मुझसे इतफाक नहीं रखने

पर अमादा है मन बार बार

कुछ पाने की 'जिजीविषा' की दुहाई देता है तो

तन चिकित्सक की सलाह की

इसी उहापोह में/नजर

घड़ी की तरफ जाते ही

सब कुछ फिर से यंत्रवत चलने लगता है

आखिर नौ बजे की

"फास्ट लोकल" जो पकड़नी है.

(कवि राजेश कुमार सिन्हा मूल रुप से बिहार के हैं और वर्तमान में मुंबई में रह रहे हैं।)

नवल की कवितायें

तुम जयकारा लगाओ

जय शेरावाली मां… जय पहाड़ावाली मां…

तुम अगर चाहो तो

जय श्री राम के गगनभेदी नारे भी लगा सकते हो।

न तो तुम्हें देश का कानून रोकेगा

और न ही तुम्हारा समाज।

तुमने जन्मजात आजादी पायी है

तुम्हें अपनी आजादी का पूरा अधिकार है।

संभवतः सदियां और गुजरेंगी

जब हमें आजादी मिलेगी

अभी असंख्य लाशों का गिरना शेष है

जख्मों के संघर्ष से बेड़ियों को घिसने में

समय तो लगता ही है।

मगर वक्त है कि

सवाल करता है रह-रहकर

जब कोई इसके पीठ पर कोड़े बरसाता है

वह चीख-चीख कर कहता है

उसने कुछ नहीं किया

वह तो आर्यों का गुलाम था

और गुलाम रहेगा।

अगर ऐसा नहीं हुआ

और धर्म का नाश हुआ तब,

फ़िर कोई न कोई अवतरित होगा

वह अप्ने अत्याधुनिक तीर-धनुषों से

हमारे कलेजे को खोखला कर देगा।

कोई बात नहीं

हम फ़िर भी जिंदा रहेंगे

हमें जिंदा रखना तुम्हारी मजबूरी भी तो है

वर्ना कौन तुम्हारी रानियों के कंचूकियों को साफ़ करेगा,

कौन तुम्हारा मल अपने सिर पर लादेगा

कौन अपना श्रम लगाकर

तुम्हें भरपेट अनाज खिलायेगा।

लेकिन अब ऐसा नहीं होगा

तुम तीर चलाओ कलम चलाओ

हम लाठी के सहारे लड़ेंगे

लड़ेंगे और जीतेंगे

क्योंकि जीत पर अब हमारा

एकमात्र अधिकार है।

हां, वह इंसान ही तो है

उसके हाथ में बंदूक है

पेट में आग है

दिल में लड़ने का संतोष है

चेहर पर जीतने का जोश है

हां, वह इंसान ही तो है।

वह कहता है

वह लड़ता है

अपने आने वाले के लिए

हर पल जीता-मरता है

अपने सुनहरे भविष्य के लिए

वह इसलिए कि

वह भी एक इंसान ही तो है।

हां, वह एक इंसान है

इसलिए हंसता है

जब उसका दुख उससे जीतता है

वह रोता है

जब वह दुखों से जीतता है

क्योंकि तब

उसे लाशों के सिवा

कुछ भी हासिल नहीं होता।

कुछ खादीधारी

उसे सांत्वना देने जरुर चले आते हैं

और वह चुपचाप उनकी बातें सुनता है

क्योंकि,

सुनना उसकी मजबूरी है।

वह चाहे भी तो बंदूक नहीं चला सकता

वह चाहे तब भी तो

वक्त की रफ़्तार नहीं रोक सकता

उसे वक्त के साथ चलना होगा

यह वह भी जानता है

लेकिन उसके हाथों में बंदूक है

क्योंकि

वह भी हमारे या तुम्हारे जैसा

एक इंसान ही तो है।

इस हफ़्ते यश मौर्य की गजल

जिंदगी भर के लिए…

हत्यायें

लूट/चोरी

बलात्कार

अपहरण

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