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Thursday, 27 April 2017

Editor’s Column

कृषि आय को टैक्स दायरे में लाना निंदनीय : सदानंद

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - बिहार प्रदेश कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता सदानंद सिंह ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार कृषि आय को टैक्स दायरे में लाने के अदृश्य एजेंडे पर काम कर रही है। इसका खुलासा नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट से होता है। उन्होंने कहा कि अगर कृषि आय को टैक्स दायरे में लाया गया तो कांग्रेस इसका देशव्यापी जबरदस्त विरोध करेगी। श्री सिंह ने कहा कि एक तरफ किसानों को फसल की उपज का उचित कीमत नहीं मिल रहा है े उन्हें अपना कृषि उपज सडकों पर फेंकना पड़ रहा है। किसान कर्ज माफी के लिए धरना, प्रदर्शन कर रहे हैं।  कर्ज को नहीं चुकाने की वजह से वे आत्महत्याएँ करने पर मजबूर हो रहे हैं, तो दूसरी ओर मोदी सरकार किसानों को टैक्स दायरे में लाने के गुप्त एजेंडे पर काम कर रही है।

गांधीवादी अर्थशास्त्र बनाम दुनिया का अर्थशास्त्र

- शिवानंद तिवारी

गांधीवादी नरहरि पारिख ने आधुनिक अर्थशास्त्र के विकास को यूरोप द्वारा दुनिया की लूट के औचित्य को प्रतिपादित करने वाला शास्त्र कहा है : जिस रूप में और जिस पद्यति से आज इस विषय पर चरचा होती है, अर्थात आज जिसे अर्थशास्त्र कहा जाता है, उसका जन्म और विकास पिछले तीन सौ वर्षों में हुआ है।यूरोप के लुटेरे राष्ट्रों ने सात समुद्र पार कर के व्यापार के नाम पर दुनिया भर में जो लूट मचायी उसी के साथ इस शास्त्र का जन्म हुआ है।और यूरोप में कारखानो और पूँजीवाद का जो विकास हुआ, उसीके साथ इस शास्त्र का भी विकास हुआ। इसलिए भयंकर अत्याचार, अन्याय और शोषण के साथ वर्तमान अर्थशास्त्र के जन्म विकास का गहरा सम्बंध है। आर्थिक प्रगति के नाम पर यूरोप के अर्थशास्त्रियों ने यूरोप के राष्ट्रों ने इस अत्याचार, अन्याय और शोषण का बचाव भी किया है।

दरअसल, आधुनिक अर्थशास्त्र इस बुनियादी भ्रम का शिकार है कि मनुष्य केवल उपभोक्ता है और इस उपभोग के लिए उसे उत्पादन करना और क्रयशक्ति को अर्जित करना पड़ता है। इसका एक आवश्यक परिणाम यह होता है कि 'आर्थिक वृद्धि' मनुष्य के उपभोग को निरंतर बढ़ाते रहने पर आश्रित हो जाती है। सच तो यह है कि अपने को नैतिक-निरपेक्ष मानते हुए भी अर्थशास्त्र यहाँ नैतिक जगत में प्रवेश करता है--यद्यपि नैतिकता की संवृद्धि के लिए नहीं बल्कि उसका ह्रास करने के लिए--और उपभोग को एक जीवन मूल्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है।वह केवल माँग की पूर्ति ही नहीं करता, नयी माँगो की सृष्टि भी करता है--कृत्रिम माँगो की भी--क्योंकि उसके बिना आर्थिक प्रक्रिया का विकास रुकने लगता है, जिस का तात्पर्य होता है सम्पूर्ण अर्थ-व्यवस्था का ढह जाना। 'जरूरत' और 'खपत' के सिद्धांतकार अलफ्र̃ेड मार्शल को भी यह मानना पड़ा था कि 'आर्थिक संगठन का उद्देश्य जरूरतों को पूरी करना ही नहीं, नयी जरूरतों की सृष्टि करना भी है। मनुष्य को उपभोक्ता मान लेने और उसके उपभोग को बढ़ाते रहकर अपना विकास करती रहने वाली अर्थव्यवस्था ने बहुत सी सामाजिक-राजनीतिक हिंसा तो की ही, साथ ही प्रकृतिक संसाधनों के प्रति भी उसका रूख अत्यंत हिंसक रहा है।

क्या यह अर्थव्यवस्था हमारी जरूरतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाते रहे बिना जीवित रह सकती है ? क्या इन जरूरतों का निरंतर बढ़ते रहना और उनकी पूर्ति हमारे हिंसक हए बिना संभव है--अपने आप के प्रति हिंसक और अपने सामाजिक और प्रकृतिक परिवेश के प्रति हिंसक ? नंदकिशोर आचार्य की किताब 'सभ्यता के विकल्प' से।(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)

संपादकीय : देर से खुलीं माया-अखिलेश की आंखें

दोस्तों, लोकतांत्रिक राजनीति की एक परंपरा अत्यंत ही अनूठी है। वह यह कि एक हार बड़े जीत की बुनियाद होती है। मतलब यह कि हार अंततः हार नहीं होती है। हारने वाले ही जीतते हैं। एक उदाहरण यह कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अलग-अलग लड़कर भाजपा से मुंह की खाने वाले लालू-नीतीश ने विधानसभा चुनाव से पहले हाथ मिला लिया और परिणाम यह हुआ कि विधानसभा चुनाव में भाजपा के सारे सपने टूटकर बिखर गये। Read More>>>

आंबेडकर बनाम नेहरू

- कँवल भारती

‘आउट लुक पोल’ में गॉंधी के बाद महानतम भारतीय नेता के रूप में डा. बी. आर. आंबेडकर के नाम का उभरना देश के बहुत से लोगों को रास नहीं आ रहा है। रास इसलिये नहीं आ रहा है, क्योंकि वे उनकी अनुकूल वर्गीय फहरिस्त में नहीं हैं, जिनकी उन्हें आदत पड़ी हुई है। अगर लोकतन्त्र है, तो क्या दलित उनके सिर पर चढ़कर बैठ जायगा? एक दलित ब्राह्मण से आगे कैसे हो सकता है? यही बहस कबीर बनाम रामानन्द के मूल में है। कबीर जुलाहा ब्राह्मण रामानन्द से बड़ा कैसे हो सकता है? कबीर बनाम रामानन्द की लड़ाई आंबेडकर बनाम गॉंधी से होकर अब आंबेडकर बनाम नेहरू पर आ गयी है, क्योंकि गॉंधी को पहले ही महानतम मानकर पोल से बाहर रखा गया था। सवाल यह है कि इस तरह के पोल या सर्वे की आवश्यकता क्या थी? ऐसा सर्वे, जो समाज में महापुरुषों को श्रेणीबद्ध करे, न केवल बेमानी है, बल्कि अप्रासंगिक भी है। इससे भी ज्यादा बेमानी और अप्रासंगिक बात यह है कि गॉंधी के बाद महानतम कौन पोल में जे.आर.डी. टाटा, लता मंगेश्कर, मदर टेरेसा और सचिन तेंदुलकर को भी शामिल कर लिया गया। यह कैसे सम्भव है कि एक पँूजीपति, सामाजिक कार्यकर्ता, गायिका और खिलाड़ी गॉंधी-नेहरू के समकक्ष हो जायें? क्या होता, यदि सचिन तेंदुलकर या लता मंगेश्कर को सर्वाधिक वोटिंग हो जाती? ये पेशेवर लोग, जिनका समाज के निर्माण में रत्ती भर योगदान नहीं है, क्या गॉंधी के बाद महानतम मान लिये जाते? तब आंबेडकर को छोड़िए, नेहरू का क्या होता? यह अच्छा ही हुआ कि दूसरे चरण में जूरी ने अब्दुल कलाम, इन्दिरा गॉंधी, मदर टेरेसा, सचिन तेंदुलकर, लता मंगेश्कर और अटलबिहारी वाजपेयी को वोट नहीं किया, लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि जेआरडी टाटा को भी वोट नहीं करना था।

लेकिन अब हंगामा यह है कि इस पोलिंग में आंबेडकर नम्बर एक पर कैसे आ गये? वे नेहरू से बड़े कैसे हो सकते हैं? नेहरू ने देश को समाजवाद दिया, धर्मनिरपेक्षता दी। आंबेडकर ने क्या दिया? लोग कह सकते हैं कि नेहरू का समाजवाद फेल हो गया, तो इन्दर मल्होत्रा का जवाब है कि बाजार भी फेल हो गया। ह्यहिन्दूह्ण के प्रख्यात सम्पादक-पत्रकार एन. राम भी ठीक ही कहते हैं कि नेहरू यद्यपि दूसरों से आगे खड़े दिखाई देते हैं, उन्होंने हमारे विचारों का विश्व में प्रतिनिधित्व किया था। लेकिन आंबेडकर क्या थे? वे एक अद्भुत सुधारवादी विद्वान थे, जिनका निबन्ध ह्यजाति का उन्मूलनह्ण आज हममें से बहुतों के लिये एक ज्वलन्त आदर्श बना हुआ है और वे आज पहले से ज्यादा बड़े हो गये हैं। इस मायने में इस पोल की यह एक बड़ी उपलब्धि है कि इसने नेहरू और आंबेडकर के बीच एक वैचारिक बहस की शुरूआत कर दी है। पर, यह बहस आंबेडकर के साथ क्यों, जबकि वोटिग मे नेहरू चैथे स्थान पर हैं? दूसरे स्थान पर अब्दुल कलाम हैं और तीसरे पर सरदार पटेल हैं। इस तरह यदि नेहरू के साथ बहस का रिश्ता किसी से बनता है, तो वे अब्दुल कलाम और सरदार पटेल ही हो सकते हैं। क्या कलाम और पटेल नेहरू से महान हैं? अब बहस वस्तुत: इसी मुद्दे पर होनी चाहिए। पर, नेहरूवादियों की खुन्दक यह है कि आंबेडकर पहले नम्बर पर क्यों आ गये? जबकि चिन्ता उनकी यह होनी चाहिए कि कलाम और पटेल का स्थान नेहरू से पहले कैसे हो गया? सिर्फ जूरी ने अपने क्रम में नेहरू को पहला स्थान दिया है, जबकि मार्केट रिसर्च ने नेहरू को सचिन तेंदुलकर के भी बाद पॉंचवॉं स्थान दिया है। पर, पब्लिक वोटिंग में नेहरू सबसे अन्त में--दसवें स्थान पर चले गये हैं, जिसमें सचिन तेंदुलकर उनसे काफी ऊपर हैं। क्या नेहरूवादी इस सर्वे से सहमत हैं?

निस्सन्देह डा. आंबेडकर इस पोल के जरिए पहली दफा दलित दायरे से बाहर निकल कर एक व्यापक दायरे में स्वीकार किये गये हैं। हालांकि इसमें दलितों के सर्वाधिक मतों का योगदान भी है, क्योंकि देश भर में दलितों ने एक जुनून की तरह इस पोल में भाग लिया था, तथापि यह माना जाना चाहिए कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर आंबेडकर को ठीक से समझे जाने का एक रास्ता खुला है। इसमें कोई शक नहीं कि अब तक गॉंधी, आंबेडकर और नेहरू के सारे मूल्यॉकन एक पक्षीय हुए हैं। इसका कारण, जैसाकि मैं अपने स्तम्भ में पहले भी लिख चुका हँू, वह वर्णवादी मानसिकता है, जिसका निर्माण कॉंग्रेस की सत्ता और उसके टुकड़ों पर पलने वाले बुद्धिजीवियों ने किया था। कुछ अन्य राजनैतिक विचारधाराओं ने भी अपने-अपने गॉंधी, आंबेडकर और नेहरू गढ़े हैं। दलितों के भी न जाने कितने आंबेडकर हैं, जो समाजवादी से लेकर पूँजीवादी तक और सुधारवादी से लेकर हिन्दूवादी तक हैं। (

डा. आंबेडकर के विरोध में बहुत सी बातें ह्यआउट लुकह्ण (अगस्त 2012) में कही गयी हैं और अन्यत्र भी कही जायेंगी। उनमें कुछ आरोप तो ऐसे हैं, जो अक्सर उन पर लगाये जाते हैं। जैसे, डा. आंबेडकर पहले व्यक्ति नही थे, जिन्होंने जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। भक्ति-परम्परा के सन्त कवियों, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गॉंधी, नारायन गुरु और अन्य बहुत से लोगों ने जातिभेद के खिलाफ आवाज उठाई थी। इस पर किसी भी दलित बुद्धिजीवी को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन उन बहुत से लोगों और डा. आंबेडकर की लड़ाई में जो बुनियादी अन्तर है, उसे समझने की कोशिश नहीं की जाती। उन बहुत से लोगों में भी अनेक दलित वगचर््ं से थे, जिन्होंने दलित अस्मिता और मुक्ति की लड़ाई लड़ी थी। पर, आंबेडकर की लड़ाई उनसे इस मायने में भिन्न है, क्योंकि उन्होंने दलित वगचर््ं के मानवीय अधिकारों और उनकी स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष किया था। उन्होंने उन्हें वे सारे अधिकार दिलाये, जिनसे वे वंचित थे। उन मानवीय अधिकारों के लिये जो लड़ाई डा. आंबेडकर ने लड़ी, वैसी लड़ाई कोई अन्य नहीं लड़ सका, महात्मा गॉंधी भी नहीं। सुधीन्द्र कुलकर्णी जैसे विद्वानों को आंबेडकर की इस लड़ाई में विदेशी साजिश की बू आती है। उनका आरोप है कि हिन्दूधर्म के विरुद्ध उनका अभियान विदेशी धन से चलने वाले धर्मान्तरण की साजिश का हिस्सा था। विदेशी मिशन ने ही उन्हें अच्छी तरह हिन्दूधर्म का विघटन कराने के लिये तैयार किया था। वे कहते हैं कि यदि उनका समाज-सुधार निष्कपट होता, तो क्या वे इस्लाम और ईसाईयत में मौजूद बुराईयों पर साजिशन ढंग से इतने खामोश रहते? यह महोदय आंबेडकर का कितना गलत मूल्यॉंकन कर रहे हैं। ये आंबेडकर को समाज-सुधारक मान कर चल रहे हैं, जिन्हें सब धमचर््ं में मौजूद बुराईयों के खिलाफ लड़ना चाहिए था। ये इस बात को बिल्कुल नहीं समझ पा रहे हैं कि आंबेडकर की लड़ाई केवल हिन्दूधर्म से थी, न कि इस्लाम और ईसाईयत से। वे दलितों की लड़ाई लड़ रहे थे, न कि मुसलमानों और ई्रसाईयों की। दलितों को जिस धर्म ने मानवीय अधिकारों से वंचित करके रखा था, वह हिन्दूधर्म था, न कि इस्लाम या ईसाईयत। भला आंबेडकर के आन्दोलन को इस्लाम और ईसाईयत के खिलाफ क्यों होना चाहिए था, जबकि इन धमचर््ं से दलितों का कोई सम्बन्ध ही नहीं था? सुधीन्द्र कुलकर्णी को यह भी नहीं मालूम कि कोई भी धर्म अपनी ही कमजोरियों से टूटता है। अगर खुद में कमजोरी न हो, तो कोई साजिश किसी धर्म को नहीं तोड़ सकती। धन तो हिन्दू सेठों के पास भी कम नहीं है, उन्होंने इस्लाम और ईसाईयत को तोड़ने की कोशिश क्यों नहीं की? वे जानते हैं कि उन्हें नहीं तोड़ा जा सकता, क्योंकि वे मिशनरी धर्म हैं। क्या हिन्दूधर्म मिशनरी धर्म है? हिन्दूधर्म में तो जो जिस मंजिल में पैदा होता है, उसे उसी मंजिल में मरना होता है। बाहर से यदि कोई आता भी है, तो उसे नीचे की मंजिल में ही शामिल किया जा सकता है। ऐसे धर्म को अखण्ड कैसे रखा जा सकता है? यह मत डा. आंबेडकर का है, जो अपने समय में ही ऐसे आरोप का जवाब दे चुके थे।

कॉंगे्रसी बुद्धिजीवियों के आरोप तो अनन्त हैं। कुछ आरोपों का पिटारा सुधीन्द्र कुलकर्णी ने खोला भी है। एक आरोप का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि ह्यगॉंधी, नेहरू और हजारों अन्य कॉंग्रेसी नेताओं ने स्वतन्त्रता-संघर्ष के दौरान अनेक वर्ष ब्रिटिश जेलों में बिताये थे। क्या ब्रिटिश सरकार ने आंबेडकर को एक बार भी जेल भेजा? वे वायसराय की कौंसिल में क्यों शामिल हुए थे, जब गॉंधी जी के भारत छोड़ो आह्वान के बाद उसी वायसराय ने स्वतन्त्रता आन्दोलन के समर्थकों को जेल में डलवा दिया था?ह्ण इस बात से बिल्कुल भी इन्कार नहीं है कि आंबेडकर वायसराय-परिषद में ह्यश्रम सदस्यह्ण की हैसियत से शामिल हुए थे और यह भी सच है कि उन्होंने कॉंग्रेस और गॉंधी के स्वतन्त्रता-संग्राम में भाग नहीं लिया था। स्पष्ट है कि जब वे कॉंग्रेस और गॉंधी के साथ थे ही नहीं, तो उन्हें जेल भेजे जाने का सवाल ही नहीं उठता। इस तथ्य को दलित नजरिये से ही समझा जा सकता है कि आंबेडकर कॉंग्रेस के स्वतन्त्रता आन्दोलन के साथ क्यों नहीं थे? कॉंग्रेस का आन्दोलन हिन्दुओं का आन्दोलन था। ब्रिटिश हुकूमत में यदि किसी की स्वतन्त्रता खत्म हुई थी, तो वह हिन्दुओं की हुई थी। यदि किसी को सबसे ज्यादा परेशानी थी, तो ब्राह्मणों को थी। दलितों को क्या परेशानी थी, जो वे अ‍ँग्रेज को भगाने के लिये हिन्दुओं का साथ देते? दलितों के लिये तो अ‍ँग्रेज सरकार ने रोशनी की खिड़कियॉं खोली थीं। उन्हें अन्य नागरिकों के समान अधिकार देकर मनुष्य होने की गरिमा दी थी। अ‍ँग्रेज उनके लिये मुक्तिदाता बनकर आये थे। वे उनके विरुद्ध उस स्वतन्त्रता आन्दोलन में क्यों भाग लेते, जो दलितों के राजनैतिक अधिकारों को मानने तक को तैयार नहीं थे? आंबेडकर ने सही सवाल उठाया था कि हिन्दुओं को अ‍ँग्रेजों से आजादी मॉंगने क्या हक है, जो अपने ही देश में लाखों लोगों को अछूत बनाकर रखे हुए हैं? दलित नजरिये से भी भारत के आधुनिक इतिहास के ऐसे बहुत से सत्य हैं, जो अभी आने बाकी हैं।

इस सन्दर्भ में कॉंग्रेस के हवाले से सुधीन्द्र कुलकर्णी का यह सवाल या आरोप कोई महत्व नहीं रखता कि ह्ययदि भारत की सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था इतनी कठोर थी और यदि यह सत्य था कि अ‍ँग्रेजों के बाद दलितों को सत्ता से बाहर रखा जाता, तो गॉंधी और नेहरू ने आजादी के बाद आंबेडकर को मन्त्री मण्डल में शामिल करने का अवसर और सम्मान क्यों दिया? यह प्रतिभा का सम्मान था, जो उन्होंने किया। कॉंगे्रस को आंबेडकर की प्रतिभा से संविधान के निर्माण का काम लेना था, क्योंकि उनके सिवा उस महान काम को करने वाला कोई अन्य योग्य व्यक्ति कॉंगे्रस के पास नहीं था। उनके आलोचक जिन अलादि कृष्णास्वामी अय्यर और बी. एन. राव की बात संविधान निर्माण के सन्दर्भ में करते हैं, तो क्या कारण था कि नेहरू और गॉंधी ने उनमें से किसी को भी ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन नहीं बनाया? इस प्रश्न पर भी विचार क्यों नहीं किया जाता? डा. आंबेडकर के आलोचकों को मैं बताना चाहता हूँ कि दलितों के लिये आंबेडकर केवल संविधान-शिल्पी के रूप में महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि उस लड़ाई के लिये महत्वपूर्ण हैं, जो उन्होंने हजारों साल से अधिकार-वंचित अछूतों को आजाद कराने के लिये लड़ी थी।

सवाल बहुत सारे हैं, जिन पर, अब समय आ गया है कि स्वस्थ बहस हो। ज्ञान की गंगा में इन पैंसठ सालों में बहुत सारा नया ज्ञान आया है। दलित वगञर््ं में भी शैक्षिक वातावरण बदला है और ज्ञानोदय हुआ है। देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के मद्देनजर लोकतन्त्र ने भी जनता को जागरूक किया है। इसलिये गॉंधी हों या आंबेडकर, नेहरू हों या पटेल, सबका पुनर्मूल्यॉंकन जरूरी है। यदि नेहरू समाजवादी थे, तो निजी पूँजीवाद का रास्ता भी वहीं से शुरू होता है। जिस मिश्रित अर्थव्यवस्था को उन्होंने अपनाया था, शोषण पर आधारित आज का पूँजीवाद उसी की देन है।(लेखक प्रसिद्ध दलित चिंतक वह समाजशास्त्री हैं)

संपादकीय : अजान गुंडागर्दी तो भजन कीर्तन क्या?

दोस्तों, प्राख्यात गायक सोनू निगम ने मस्जिदों में अजान को गुंडागर्दी करार दिया है और देश के अंधभक्त हिन्दू इसे क्रांतिकारी बयान मानकर अल्पसंख्यकों को गालियां दे रहे हैं। वैसे यह पहला वाक्या नहीं है। प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग पहले भी इस तरह का जहर उगल चुके हैं। दिलचस्प यह है कि अब जहर उगलने वालों में फ़िल्मी कलाकार भी शामिल हो गये हैं। पहले अनुपम खेर और बाद में अभिजीत ने फ़िल्मी जगत के भगवाकरण का आगाज किया था। Read More>>>

बाबू राम दुसाध के सम्मान के साथ ही नीतीश कुमार ने रचा इतिहास, संबोधन में किया युवाओं से गांधी जी के आदर्शों को अपनाने का आहवान

पटना(अपना बिहार, 18 अप्रैल 2017) - राज्य सरकार दवारा आयोजित अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी सम्मान समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बिहार के स्वतंत्रता सेनानी बाबु राम दुसाध का सम्मान कर नया इतिहास रचा। सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर चलने वाली महागठबंधन सरकार ने सोमवार को कुल 1108 सेनानियों का सम्मान किया गया।

इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुये मुख्यमंत्री ने कहा कि आज से सौ वर्ष पूर्व महात्मा गाॅधी 10 अप्रैल को मुजफ्फरपुर पहुंचे थे। राजकुमार शुक्ल जी के निरंतर प्रयास के बाद गांधी जी चम्पारण आये थे और राजकुमार शुक्ल जी से उन्होंने कहा था कि स्वयं आकर किसानों की स्थिति का अध्ययन करने पर ही मैं अपनी बात रखूॅगा। तब बिहार के चम्पारण जिले में नील की खेती करने वाले किसानों पर बगान मालिकों एवं नीलहों का अत्याचार अनवरत जारी था। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह का सफर तय कर चुके गाॅधी जी के सत्याग्रह से लोग परिचित थे। बगान मालिकों और नीलहों के मन में यह भय सता रहा था कि गाॅधी जी एक सफल सत्याग्रही हैं। तब के दौर में पत्रकारिता राष्ट्रीय और अंग्रेजी मानसिकता के दो खेमों में बॅटे हुये थे। राष्ट्रवादी सोच वाले समाचार पत्रों में गाॅधी जी की सत्याग्रह और उनके गतिविधियों को प्रकाषित की जाने लगी। मोतिहारी में एसडीओ कोर्ट में 18 अप्रैल 1917 को गाॅधी जी ने अपना जुर्म कबूल किया और बाहर न जाने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि यह उनकी अंतर्रात्मा की आवाज है। उनकी अटल दृढ़निश्चय, विश्वास और लोकप्रियता के कारण गांधी जी को बिना जमानत के छोड़ना पड़ा और मुकदमा भी वापस लेना पड़ा। बाद में एक जांच कमिटी बनायी गयी। गांधी जी इसमें एक सदस्य के रूप में थे और तमाम दस्तावेज के आधार पर अंततोगत्वा घृणित तीनकठिया प्रथा की समाप्ति हुयी। सफल सत्याग्रह की नींव बिहार के चम्पारण में रखी जा चुकी थी। नीलहों के अत्याचार से किसानों को मुक्ति मिली। 1917 के चम्पारण सत्याग्रह ने जन आन्दोलन का स्वरूप ग्रहण किया। आगे आने वाले असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन को बल मिला। चम्पारण सत्याग्रह से आजादी की लड़ाई को नई गति तथा नई दिशा मिली और महज 30 साल के अंदर ही देष आजाद हो गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि शताब्दी समारोह कार्यक्रम को लेकर मैंने गांधीवादी विचार संगठनों से परामर्श किया, सर्वदलीय बैठक बुलायी। यह कार्यक्रम राजनीतिक उद्देश्य से आयेाजित कार्यक्रम नहीं है बल्कि राज्य सरकार का यह दायित्वपूर्ण कार्य है। ये कर्तव्य के प्रति जागरूकता का द्योतक है। हमारा कर्तव्य है कि उन स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित कर कृतज्ञ हों, जो जंगे आजादी की लड़ाई में भागीदार बने। देश के कोने-कोने से आये स्वतंत्रता सेनानियों का यहां आना एक महत्वपूर्ण क्षण है। सौ वर्ष बाद बापू को याद करने का एक अच्छा अवसर है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन सांकेतिक नहीं है। 12 अप्रैल से प्रचार वाहन ‘गांधी रथ‘ प्रत्येक पंचायतों में घूम-घूमकर फिल्म, गीत, वृत्तचित्र के माध्यम से गांधी जी के विचारों को जन-जन तक पहॅुचायेगी। स्कूलों में प्रार्थना के बाद प्रतिदिन गांधीजी से संबंधित कहानी सुनाई जायेगी। हमारा मानना है कि अगर नई पीढ़ी का दस प्रतिषत भी गांधी जी के विचारों के प्रति आकर्षित हो जाय तो आने वाले 10 से 15 साल में समाज बदल जायेगा।

इसके पूर्व समारोह का दीप प्रज्ज्वलित कर उद्घाटन किया गया। गाॅधी जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी गयी। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को अंगवस्त्र एवं प्रतीक चिह्न भेंट किया। इस अवसर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, राज्यपाल रामनाथ कोविंद, उप मुख्यमंत्री  तेजस्वी प्रसाद यादव, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, सांसद  वषिष्ठ नारायण सिंह, राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी, सीपीआई के राज्य सचिव  सत्यनारायण सिंह, अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संघ के सचिव सत्यानंद याजी, सभी विधायकगण, विधान पार्षदगण, पदाधिकारी उपस्थित थे।

संपादकीय : बाबा साहब ने दिया था दलितों-पिछड़ों को एक होने का संदेश

दोस्तों, बाबा साहब डा भीमराव आम्बेडकर पिछली सदी के सबसे बड़े महानायक थे। यहां तक कि महात्मा गांधी जैसे अनेक बाबा साहब के संघर्ष के आगे बौने साबित होते हैं। यह अलग बात है कि आज इस सच्चाई को वंचित वर्ग तो स्वीकार करता है लेकिन सवर्ण तबका अभी भी बाबा साहब को तुच्छ ही समझता है। इसकी वजह भी है। बाबा साहब ने दलित और पिछड़े दोनों वर्गों की मुक्ति के लिए सवर्णों से संघर्ष किया। महात्मा गांधी की तुलना में उनका संघर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि गांधी अंग्रेजों से केवल सत्ता हस्तांतरण की लड़ाई लड़ रहे थे तो बाबा साहब अपने ही देश के सवर्ण/सामंतों से।

यह बाबा साहब का संघर्ष ही था जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ बनाया। जिन दिनों देश में संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरु हुई, सवर्णों ने संविधान सभा पर कब्जा कर लिया। लेकिन योग्यता नहीं रहने के कारण बाबा साहब को संविधान बनाने की जिम्मेवारी देना उनकी बाध्यता थी। संभव यह ही है कि सवर्णों के मन में तब यह बात रही होगी कि यदि आंबेडकर संविधान बनायेंगे तो उन विषयों से दूर ही रहेंगे, जिसके लिए वे संघर्ष करते रहे हैं।

लेकिन बाबा साहब ने समय रहते सवर्णों की इस साजिश को समझा और देश में वंचितों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। वे चाहते थे कि पिछड़े वर्ग के नेता भी अपने वर्ग के लोगों के हक में आगे आयें, लेकिन उन दिनों सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे पिछड़े नेता स्वयं को पिछड़ा वर्ग का नेता मानने से भी इन्कार करते थे। नेहरु और अन्य तत्कालीन कांग्रेसी सवर्ण पहले से ही आरक्षण के पक्ष में नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि बाबा साहब पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर सके। लेकिन बाबा साहब ने पिछड़े वर्ग के लिए आयोग बनाकर एक विकल्प को जिंदा रखा। वे जानते थे कि इस देश का पिछड़ा वर्ग बहुजन परिवार का सबसे बड़ा सदस्य है। वह अपने अधिकार के लिए सजग होगा।

दिलचस्प यह कि यही हुआ भी। कांग्रेसी हुक्मरान एक बार फ़िर साजिश करने में कामयाब हुए। एक ब्राह्म्ण काका कालेलकर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया, जिसका मकसद पिछड़े वर्ग की शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक हालात का अध्ययन कर सरकार को अनुशंसायें देना था। कालेलकर बड़े चालाक निकले। इतिहास उन्हें बेईमान न कहे, इस कारण उन्होंने पंडित नेहरु को अपनी अनुशंसायें तो सौंप दी लेकिन साथ ही एक पत्र भी दिया, जिसमें अपनी ही अनुशंसाओं को लागू नहीं करने का अनुरोध भी किया।

खैर बाद के दिनों में बाबा साहब के निधन के बाद वंचितों का संघर्ष कमजोर पड़ता चला गया। लेकिन साथ ही एक दिलचस्प परिवर्तन यह भी आया कि वंचितों का संघर्ष नये स्वरुप में सामने आया। परिणाम यह हुआ कि मोरारजी देसाई सरकार को मंडल कमीशन बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। हालांकि इसके लिए उन्हें कुर्बानी भी देनी पड़ी। उन दिनों जय प्रकाश नारायण ने अपनी ही सरकार को खूब कड़वे वचन सुनाया था। इसके विरोध में पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में उनका तीखा विरोध भी हुआ था।

बहरहाल कटु सत्य यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद वंचित वर्ग बिखरा पड़ा है। दलितवाद और पिछड़ावाद दोनों राजनीतिक साजिश के शिकार हो रहे हैं। इसका लाभ सवर्ण उठा रहे हैं। आवश्यकता है कि देश का वंचित वर्ग बाबा साहब के संघर्ष को याद करे। यह भी समझे कि इस देश में बहुजनों का विकास कैसे हो सकता है, जिससे यह तबका आज भी वंचित है।

केवल याद रहे गांधी, हाशिए पर रहे गांधी के आदर्श

दोस्तों, चंपारण सत्याग्रह के 100 वर्ष पूरे होने पर राजधानी पटना सहित पूरे बिहार में राज्य सरकार द्वारा भव्य आयोजन किया गया। सबसे दिलचस्प यह है कि पूरे आयोजन का भार शिक्षा विभाग ने उठाया। वहीं शिक्षा विभाग जिसने नियोजित शिक्षकों से लेकर वित्त रहित शिक्षण संस्थानों के कर्मियों के बकाये का भुगतान नहीं किया है। परिणाम यह है कि शिक्षक इंटर की कापियों के मूल्यांकन कार्य का बहिष्कार कर रहे हैं।  वैसे चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष के पूरे होने पर आयोजित भव्य समारोह ने एक बात को स्थापित कर दिया कि राज्य सरकार को महात्मा गांधी याद रहे लेकिन उसने उनके आदर्शों को चलता कर दिया।

दो दिवसीय मुख्य आयोजन नवनिर्मित सम्राट अशोक ज्ञान भवन में किया गया। इस भवन के निर्माण में साढे̃ चार सौ करोड़ रुपए से अधिक की राशि व्यय की गयी है। यहां यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि ज्ञान भवन का निर्माण क्यों किया गया, बल्कि यह महत्वपूर्ण यह है कि महात्मा गांधी ने अपने सत्याग्रह के दिनों में चंपारण सहित राज्य के अनेक जिलों में कस्तूरबा विद्यालय की स्थापना की थी, उनका क्या हुआ। हालत यह है कि भितिहरवा आश्रम स्थित कस्तूरबा स्कूल आज भी सरकारी सहायता की बाट जोह रहा है।

चंपारण छोड़िए, राजधानी पटना में महात्मा गांधी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है। जिन दिनों देश आजाद हुआ था उन दिनों बिहार सांप्रदायिक दंगे की आग में जल रहा था। तब महात्मा गांधी ने पटना में करीब दो महीने तक कैंप किया था। राज्य सरकार ने वर्ष 2011 में इसकी अहमियत को समझते हुए जर्जर हो चुके भवन की मरम्मती के नाम पर एक करोड़ रुपए खर्च कर दिये। लेकिन आज भी इसकी बदहाली बदस्तूर जारी है। छत से पानी टपकने के कारण राज्य सरकार के किये कराये पर पानी फिर रहा है। इतना ही नहीं राज्य सरकार ने इस भवन महात्मा गांधी के नाम पर सत्य व अहिंसा शोध संस्थान को मंजूरी दी थी। इसके लिए ए एन सिन्हा शोध संस्थान को करोड़ों रुपए की धनराशि भी दी गयी लेकिन आज तक सत्य और अहिंसा शोध संस्थान साकार नहीं हो सका है।

बहरहाल चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी समारोह का अभी आगाज हुआ है। राज्य सरकार के द्वारा तय किये गये कार्यक्रमों के मुताबिक अभी भव्य कार्यक्रमों की लंबी सूची शेष है। जाहिर तौर पर इन कार्यक्रमों के नाम पर करोड़ों रुपए फूंके जायेंगे। लेकिन सवाल तो अब भी वही है कि महात्मा गांधी के सपनों का क्या होगा। हालांकि सरकार ने शराबबंदी लागू कर अपने लिए एक उपलब्धि जरूर हासिल कर ली है लेकिन शराबबंदी के अलावा भी बिहार में बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, भूमिहीनता और आर्थिक विषमता कई और समस्यायें मुंह बाये खड़ी हैं।

 

देश में सवर्णों के लिए बने आयोग : नीतीश ** दिल्ली एमसीडी चुनाव का परिणाम आते ही खुली महागठबंधन की पोल ** अलग-अलग लड़ने से मिली हार : लालू ** वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत सकते पीएम बनने का सपना देखने वाले नीतीश, मांझी ने बोला हमला ** वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा - हार से सीख लेने की जरूरत ** हर हाल में मिले वन्य प्राणियों को सुरक्षा : मुख्यमंत्री, बिहार राज्य वन्यप्राणी पर्षद की 7वीं बैठक संपन्न ** बालश्रम समाज के लिए धब्बा : विजय प्रकाश ** मुख्यमंत्री की दूरदर्शिता के बरक्स बिहार के सवाल ** आज फिर सुमो की पोल खोलेंगे मनोज झा ** राजद के आरोपों को सुमो ने नकारा, कहा - मेरा काम राजनीति है कोई व्यवसाय नहीं

· देश में सवर्णों के लिए बने आयोग : नीतीश

· दिल्ली एमसीडी चुनाव का परिणाम आते ही खुली महागठबंधन की पोल

· अलग-अलग लड़ने से मिली हार : लालू

· वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत सकते पीएम बनने का सपना देखने वाले नीतीश, मांझी ने बोला हमला

· वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा - हार से सीख लेने की जरूरत

· हर हाल में मिले वन्य प्राणियों को सुरक्षा : मुख्यमंत्री, बिहार राज्य वन्यप्राणी पर्षद की 7वीं बैठक संपन्न 

· बालश्रम समाज के लिए धब्बा : विजय प्रकाश

· मुख्यमंत्री की दूरदर्शिता के बरक्स बिहार के सवाल

· आज फिर सुमो की पोल खोलेंगे मनोज झा

· राजद के आरोपों को सुमो ने नकारा, कहा - मेरा काम राजनीति है कोई व्यवसाय नहीं

· राजनीति को इतना गंदा मत करिए मोदी जी, जगदानंद सिंह ने दी सलाह

· आंदोलनरत शिक्षक अभ्यर्थियों की मांगें माने सरकार : प्रेम

· चीफ़ सेक्रेटरी के खुलासे के बाद पराजित मोदी ने कहा - चीफ़ सेक्रेटरी नहीं कर सकते मंत्रियों की जांच, तेजस्वी ने बोला हमला

· बिहार को उसका हक दे केंद्र, नीति आयोग की बैठक में नीतीश ने दी गुजरात नहीं, पूरे देश का ध्यान रखने की सलाह

· खुलासा : दलित होने का दंश झेल रहे बीएसएससी के पूर्व अध्यक्ष सुधीर कुमार, हर हाल में दोषी साबित करने में जुटी एसआईटी

· विधान परिषद में महिला पार्षद से छेड़छाड़ करने वाले के बुलावे पर पटना आयेंगी पीएम की परित्यकता पत्नी

· मई के अंत में आएगा इंटर का रिजल्ट

· धान घोटाले के छह साल बाद खुली सरकार की नींद, पटना हाईकोर्ट के न्यायादेश के बाद पहल, एसआईटी का गठन

· जंग के दो वर्ष पहले ही चाचा-भतीजी के बीच युद्धाभ्यास शुरू

· जेल से निकलते ही लालू पर बरसे पप्पू

· लोकसेवक जनता के प्रति बनें संवेदनशील : मुख्य

· जनता की कमाई का पैसा दिल्ली में उड़ा रहे सरकार के मंत्री, नंदकिशोर ने लगाया आरोप

 

News Update

खास खबर : इनकी पत्नी की खबर छापिये, हो जायेगी बल्ले-बल्ले

दोस्तों, ब्रजेश मेहरोत्रा वरिष्ठ आईएएस पदाधिकारी हैं। इतने वरिष्ठ कि सीएम नीतीश कुमार ने इन्हें अपना खासमखास बना रखा है। कैबिनेट सेक्रेटरी के अलावा श्री मेहरोत्रा सूचना एवं जन संपर्क विभाग के प्रधान सचिव भी हैं। लिहाजा श्री कुमार द्वारा अघोषित सेंसरशिप पर नजर बनाये रखने और सीएम की शान में गुस्ताखी करने वालों पर कार्रवाई की जिम्मेवारी भी इनकी ही होती है। अभी हाल ही में प्रभात खबर का विज्ञापन रोक श्री मेहरोत्रा ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया था। खास बात यह है कि ये केवल सीएम के भक्त ही नहीं बल्कि पत्नी भक्त भी हैं। पत्नी भी कोई मामूली नहीं हैं। पटना में अमीरों के बच्चों के लिए चलने वाले फ़ाईव स्टार स्कूल की प्रिंसिपल हैं। श्री मेहरोत्रा पत्नी भक्ति के फ़ेर में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के संसाधनों का सही इस्तेमाल करते हैं तो बतौर प्रधान सचिव अपनी धौंस का भी। कल भी इन्होंने ऐसी ही धौंस का परिचय दिया। इनके एक विभागीय मातहत ने "अर्जेंट" प्रेस रिलीज भेजा। अटैचमेंट में इनकी पत्नी भक्ति का प्रदर्शन मात्र था। अपना बिहार ने श्री मेहरोत्रा से उनके पत्नी प्रेम और विभाग के सदुपयोग के बारे में पूछा तब उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

सुशील मोदी की काली कमाई की हो जांच : राबड़ी

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - पूर्व मुख्यमंत्री और विधान परिषद सदस्य राबड़ी देवी ने बीजेपी पर जमकर निशाना साधा है. उन्होंने कहा है कि भाजपा ने पहले मेरे भाइयों साधु और सुभाष को लेकर बदनाम किया और अब यह लोग मेरी बेटी और दामाद को बदनाम करने में लगे हुए हैं. राबड़ी ने साफ किया है कि उनके पास जो भी है वह जनता जानती है. राबड़ी देवी ने कहा कि बीजेपी के नेता सुशील मोदी द्वारा लगातार किये जा रहे हमले के बारे में कहा कि उनकी भी संपत्ति और काली कमाई की जांच होनी चाहिए. वहीं दिल्ली एमसीडी के चुनाव नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि सब लोग एक हो जायें और मिलकर जवाब दिया जाये.

लालू की शिकायत लेकर रेल भवन पहुंचे पप्पू

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - जन अधिकार पार्टी (लो) के संरक्षक और सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने लालू यादव के रेलमंत्री रहने के दौरान हुए सभी कार्यों और फैसलों की सीबीआई जांच कराने की मांग की। इस संबंध में उन्होंने एक ज्ञापन रेलमंत्री सुरेश प्रभु को सौंपा है। नई दिल्ली में रेलभवन जाकर रेलवे के वरीय अधिकारी से सांसद श्री यादव ने मुलाकात की और रेलमंत्री के नाम लिखे ज्ञापन उन्हें सौंपा। अपने ज्ञापन में सांसद ने कहा है कि 2004 से 2009 तक यूपीए सरकार में लालू यादव रेलमंत्री थे। इस दौरान रेलवे के ठेके, कायार्देश, रेलवे की परिसंपत्तियों की नीलामी और योजनाओं के लिए राशि के आवंटन पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है।

अपनी बात : गाय के नाम पर नरेंद्र मोदी का नया मजाक

दोस्तों, इतिहास गवाह है कि सत्ता की राजनीति में सांस्कृ्तिक कुटनीति की अहम भूमिका रही है। सत्ता पर काबिज हर शासक सत्ता पाने से लेकर उसे अक्षुण्ण बनाये रखने तक के लिये ऐसे तिकड़मों का सहारा लेता ही है। नरेंद्र मोदी की विशेषज्ञता यही है कि वह इस तरह के तिकड़मों के मामले में अबतक के सबसे बड़े उस्ताद साबित हो रहे हैं। फ़िर चाहे वह लव जिहाद का सवाल हो या फ़िर बीफ़ का सवाल या अब गायों को आधार कार्ड दिये जाने का।

वैसे आधार कार्ड की जिस प्रकार की परिभाषा केंद्र सरकार ने तय कर रखी है, उसके हिसाब से आधार कार्डधारी ही भारत का नागरिक है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का न्यायादेश भी केंद्र सरकार के ठंढे बस्ते में है, जिसमें आधार कार्ड को गैर अनिवार्य करार दिया गया  है। इसके बावजूद बैंक से लेकर तमाम सरकारी योजनाओं के मामले में आधार को नितांत आवश्यक बना दिया गया है।

खैर सवाल अब गायों का आधार कार्ड का है। परिभाषा के हिसाब से गायों को भी भारतीय होने का प्रमाण पत्र मिल सकेगा। यह कैसे होगा और इसके क्या लाभ सामने आयेंगे यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। परंतु इतना तय है कि गाय के नाम पर एक हास्यास्पद जुमलेबाजी के सहारे नरेंद्र मोदी ने पूरे देश को जुगाली करने का मौका दे दिया है। ताकि देशवासी बेरोजगारी, महंगाई, केंद्र सरकार के भष्टाचार, सीमा पर जवानों की समस्यायें व देश के अंदर अनियंत्रित होती कानून के राज के सवाल पर सोच भी नहीं सकें।

संपादकीय : रोटी की जगह ब्रेड खाने को रहें तैयार

दोस्तों, आज भारत की इकोनामी ऐसे रास्ते पर चल निकली है कि बहुत जल्द लोगों को रोटी की जगह ब्रेड खाने की आदत डाल लेनी होगी। वजह यह कि देश के अर्थशास्त्र में कृषि क्षेत्र की भूमिका दिनों-दिन न्यून होती जा रही है। इस कारण जहां एक ओर बड़ी आबादी के समक्ष खाद्य संकट तो सामने आयेगा ही वहीं दूसरी ओर देश की औद्योगिक उत्पादकता भी कुप्रभावित होगी।

बड़ी तेजी से बदतर हो रहे देश के इकोनामिक इंडिकेटर्स यह बताने को काफ़ी हैं कि केवल सर्विस सेक्टर के बूते देश के विकास की गाड़ी आगे नहीं चल सकती है। एक प्रमाण यह कि वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में बैंकों से कर्ज लेने के दर में वृद्धि अब घटकर 5 फ़ीसदी रह गयी है, जबकि दो वर्ष पहले यह 10 फ़ीसदी से अधिक थी।

अब यह आंकड़ा एक साथ सभी प्रमाण देने में सक्षम है। नरेंद्र मोदी सरकार का मेक इन इंडिया नारा फ़्लाप हो चुका है। स्टार्ट अप योजना अभी तक जुमला साबित हुआ है। किसान भी अब लोन लेने से इन्कार कर रहे हैं। वजह यही कि किसानों को उनकी लागत मिल नहीं पा रही है। खेती घाटे के व्यवसाय के रुप में बदनाम हो रही है।

खैर इस बदहाली का दूसरा पक्ष भी है और यह सेवा क्षेत्र से संबंधित है। अडाणी, अम्बानी, विजय माल्या जैसे सेवा क्षेत्र के बड़े खिलाड़ियों के लिए वर्तमान सरकार का कार्यकाल स्वर्ण युग के जैसा है। वैसे सरकार को भी इन बड़े खिलाड़ियों की ही चिंता है। दिलचस्प यह कि देश का उच्च आय वर्ग और मध्यम वर्ग दोनों ने रोटियों की जगह ब्रेड खाने की आदत डाल दी है। गरीब से गरीब भी दो मिनट में मैगी खाकर खुद को गर्वान्वित महसूस करते हैं। है न दिलचस्प परिवर्तन।

चुनाव पर रहेगी आयोग की सीधी नजर

पटना(अपना बिहार, 25 अप्रैल 2017) - राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त अशोक कुमार चौहान ने नगरपालिका चुनाव को लेकर तैनात प्रेक्षकों को निर्देश दिया कि वे आयोग के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव पर नजर रखेंगे। संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। श्री चौहान सोमवार को आयोग के सभागार में छह प्रमंडलों में नगर निकाय चुनाव को लेकर नियुक्त 46 चुनाव प्रेक्षकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने निर्देश दिया कि चुनाव के दौरान किसी प्रकार की गड़बड़ी पायी जाती है तो वे सीधे आयोग को इसकी सूचना देंगे। उपेंद्र कुशवाहा को मिली जमानत

पटना(अपना बिहार, 25 अप्रैल 2017) - कटिहार जिले की एक अदालत ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवहा को आठ साल पूर्व के चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के एक मामले में आज जमानत दे दी. अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रवि कुमार ने कुशवाहा के 2009 के लोकसभा चुनाव के समय चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के उक्त मामले में आज स्वयं अदालत के समक्ष उपस्थित होने पर दस हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी.

मानवता : लालू की बेटी ने की घायलों की मदद

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - एक बार फिर राजद प्रमुख लालू प्रसाद की सांसद बेटी डा. मीसा भारती ने मानवता का परिचय देते हुए सड़क दुर्घटना में घायल दो दर्जन से अधिक लोगों की मदद की। दरअसल हुआ यह कि नौबतपुर के दरियापुर पंचायत के अबगिल्ला गाँव से केदार सिंह की बेटी का तिलक औरंगाबाद के देव में जाने के क्रम में अरवल के बैदराबद में बस पलटने के कारण अवधेश सिंह के पुत्र प्रियांशू एवम बिनोद सिंह के पुत्र मुन्ना सिंह का देहांत हो गया।साथ ही लगभग 20 से 25 लोग घायल हुए। जैसे ही इस दुखद घटना की जानकारी सांसद को मिली, उन्होंने अरवल रेफरल अस्पताल में प्राथमिक उपचार से लेकर PMCH अस्पताल तक स्वास्थ्य मंत्रालय के सभी पदाधिकारियो को सूचित कर अपनी निगरानी में यथासंभव इलाज एवं मदद करने का निर्देश दिया। इसके बाद वे स्वयं  अबगिल्ला गाँव में जाकर मृतक मुन्ना सिंह के पिता एवम घायल लोगो से मिलीं।

सभापति पद को लेकर नीतीश बना रहे लालू पर दबाव

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - अवधेश नारायण सिंह एक बार फिर बिहार विधान परिषद के सभापति बनेंगे। बीते 24 अप्रैल को जीएसटी को अप्रुवल देने हेतु बुलायी गयी विशेष बैठक के दौरान बिहार विधान परिषद में जिस तरह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने श्री सिंह की सराहना की, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि सबसे बड़ा दल होने के बावजूद बिहार विधान सभा में भूमिहार विजय कुमार चौधरी को बर्दाश्त करने वाले राजद को अब बिहार विधान परिषद में भी एक बार फिर राजपूत अवधेश नारायण सिंह को बर्दाश्त करना पड़ेगा।

हालांकि इससे पूर्व बजट सत्र के दौरान जब यह मामला उठा था तब स्वयं राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव ने संकेतों में कहा था कि इस बार श्री सिंह की नहीं चलेगी। बताते चलें कि गया स्नातक क्षेत्र से निर्वाचन के बाद श्री सिंह ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विशेष कृपा प्राप्त है।

यह भी उल्लेखनीय है कि आगामी 8 मई को श्री सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और उसके पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यह ऐलान कर देना चाहते हैं कि विधान परिषद पर राजपूतों का कब्जा बरकरार रहेगा। सूत्र बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने राजद प्रमुख लालू प्रसाद को भी स्पष्ट रूप से बता दिया है।

बहरहाल राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने अभी तक इस मामले में अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि उनकी मजबूरी की एक वजह यह भी है कि विधान परिषद में राजद की ओर से सभापति के पद के योग्य वर्तमान में कोई पार्षद नहीं हैं। लिहाजा श्री प्रसाद ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है।

रघुनाथ झा को लेकर सुमो ने पूछे सवाल

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - राजद प्रमुख लालू प्रसाद पर निशाना साधते हुए सुशील मोदी ने बुधवार को रघुनाथ झा को लेकर सवाल पूछे. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि जिस समय रघुनाथ झा ने लालू प्रसाद के दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप को यह मकान दान में दिया था, उस समय उन दोनों की उम्र महज पंद्रह साल होगी. दस्तावेज के मुताबिक रघुनाथ झा ने लालू के दोनों पुत्रों को बेटे से बढ़ कर माना है और उनके मुताबिक उन दोनों के निष्भाव सेवा से प्रसन्न होकर ही उन्होंने यह मकान उन्हें दान में देने का निर्णय लिया.  भाजपा नेता सुशील मोदी ने सवाल करते हुए कहा कि अब तो लालू प्रसाद के दोनों बेटे ही बतायेंगे कि उन्होंने पंद्रह साल की उम्र में, जब वे किक्रेट खेल रहे थे, उस दौरान उन्होंने किस तरह से रघुनाथ झा की सेवा की थी. जिससे खुश होकर उन्होंने अपना कीमती मकान उन दोनों के नाम कर दिया.

राजद ने सुमो पर लगाया 512 करोड़ रुपए की मनी लांड्रिंग का आरोप

पटना(अपना बिहार, 27 अप्रैल 2017) - राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रो. मनोज झा ने बुधवार को सुशील मोदी के खिलाफ बड़ा खुलासा किया। राजद के प्रदेश कार्यालय में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि श्री मोदी के भाई राजकुमार मोदी की कंपनी ने एक ओर 512 करोड़ करोड़ रुपए की कंपनी का लोन लिया और इसी कंपनी ने अन्य कंपनियों को 186 करोड़ रुपए का कर्ज भी दिया। जबकि अपने बैलेंस शीट में कंपनी ने ब्याज के मद में एक भी राशि खर्च नहीं किये जाने का उल्लेख किया है। प्रो. झा ने कहा कि आशियाना लैंडक्राफ्ट में केवल पांच शेयर धारक हैं और 9 डिवेंचर होल्डर्स हैं। दिलचस्प यह कि ये सभी कंपनियां हैं। उन्होंने कहा कि कंपनी बनाकर शेयर और डिवेंचर्स में निवेश करने का यह मकड़जाल क्यों बिछाया गया। उन्होंने सवाल पूछा कि श्री मोदी को यह बताना चाहिए कि 512 करोड़ रुपए की राशि उनकी अपनी काली कमाई की है या फिर उनके किसी और रिश्तेदार की है।

अलग-अलग राज्यों के हिसाब से विकास की प्राथमिकतायें तय करे केंद्र, सीएम ने तेजस्वी को सराहा, डिप्टी सीएम ने इस वर्ष 4200 किमी सड़क निर्माण का लक्ष्य

पटना(अपना बिहार, 26 अप्रैल 2017) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार से अलग-अलग राज्यों के लिए विकास की प्राथमिकतायें तय करने का अनुरोध किया है। बिहार पथ निर्माण निगम के स्थापन दिवस समारोह को संबोधित करते हुए श्री कुमार ने उपमुख्यमंत्री की कार्यशैली की सराहना की। वहीं उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने कहा कि निगम ने विगत 8वर्षों मे काफी अछा काम किया है तथा पथ निर्माण एवम पथ के विकास का कीर्तिमान स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि चालू वर्ष मे 4200 किलोमीटर सड़क के निर्माण का टारगेट निर्धारित किया है। इस टारगेट को जल्द से जल्द पूरा कर लेने की कोशिश की  जा रही  है ताकि  राज्य के सुदूर इलाके से पटना पहुँचने मे अधिकतम 5 घंटे से अधिक का समय न लगे। 2035 तक का रोड मास्टर प्लान बना रहे हैं। इस अवसर पर प्रधान सचिव पथ निर्माण अमृत लाल मीणा सहित पथ निर्माण एवम bsrdc के वरीय अधिकारी गण उपस्थित थे।

चरम पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति, आर के मोदी सुशील मोदी के मौसा या फूफा, राजद प्रमुख ने किया ट्वीट

पटना(अपना बिहार, 25 अप्रैल 2017) - राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने सोमवार को सुशील मोदी पर बड़ा तंज कसते हुए उनसे पूछा कि आर के मोदी उनके कैसे रिश्तेदार हैं। इससे पहले ट्वीटर पर अपने संदेश में श्री मोदी ने अपने भाई राजकुमार मोदी को रिश्तेदार बताया था। इस पर जवाब में श्री प्रसाद ने ट्वीट किया कि श्री मोदी को बताना चाहिए कि आर के मोदी उनके कैसे रिश्तेदार लगते हैं। वे उनके रिश्ते में फूफा हैं या मौसा।

जीएसटी से पूरे देश को फायदा , बिल को विधान मंडल ने दी मंजूरी, जीएसटी के पक्ष में हमेशा अडिग रहे सीएम

पटना(अपना बिहार, 25 अप्रैल 2017) - सोमवार को बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से जीएसटी बिल को अपनी मंजूरी दे दी। विधानसभा में जीएसटी विधेयक पर राज्य के वाणिज्य कर मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव ने कहा कि देश में एक कर प्रणाली लागू होगी। छोटे व्यापारी, गांव-गिरांव, गरीब-गुरबों को लाभ होगा। देश को इससे फायदा होगा। बिहार देश का ही हिस्सा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जीएसटी के पक्ष में आरंभ से ही हैं। बिहार के लाभ के सवाल पर वह अडिग रहते हैं। भाजपा के साथ और भाजपा से इतर रहकर भी उन्होंने अपने वजूद का इस्तेमाल किया।

श्री यादव ने कहा कि निश्चित रूप से जीएसटी से देश को फायदा होगा और बिहार भी देश का हिस्सा है, इसलिए बिहार को क्या-क्या फायदे होंगे यह विमर्श का विषय नहीं है। उन्होंने कहा कि देश केवल एक दल का नहीं, हमारा-आपका और 120 करोड़ भारतीयों का है। भाजपा पर निशाना साधा कि कि आज देश में गुरीब-गुरबों की उन्नति पर राष्ट्रीय सहमति बनाने में एक दूरी दिखती है। देश में अनेक राजनीतिक दल और विविध संस्कृति है। इसको उन्होंने कहा कि 1935 में कर प्रणाली कानून का निर्माण हुआ था। अब 82 साल बाद एक नया कानून आया है। बिहार विधानसभा से इसे पारित कराना एक ऐतिहासिक पहल है।

वाणिज्यकर मंत्री ने कहा कि जीएसटी में पांच तरह का कर स्लैब निर्धारित किया गया है। शून्य, 5, 12,18 और 28 फीसदी। कृषि पर जहां शून्य फीसदी टैक्स होगा वहीं लग्जेरियस गुड्स पर 28 फीसदी कर होगा। कोई एक करोड़ की गाड़ी और लाखों का जेवर खरीदेगा तो अधिक कर तो लगना ही चाहिए।

जीएसटी समेत अन्य विधेयकों पर विधान परिषद में सदस्यों ने सदन में चर्चा करने की आवश्यकता जताई। भाजपा के विनोद नारायण झा ने जीएसटी पर कहा कि उच्च सदन में चर्चा होनी चाहिए। बिना पढ़े क्या संशोधन दे पाएंगे? विधायी कार्य को दोयम दर्जे का नहीं बनाना चाहिए। यह सौ पेज का विधेयक है। पढ़ने के लिए कम से कम एक घंटे का विराम दिया जाना चाहिए। भाकपा के केदारनाथ पांडेय ने माल भाड़ा समानीकरण से लेकर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात उठाई और सवालिया लहजे में कहा कि केन्द्रीय राजस्व से बिहार को दी जाने वाली राशि में ईमानदारी बरती जाएगी? नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी ने कहा कि जीएसटी पास होने के लिए सरकार समेत सभी दलों को श्रेय देना चाहिए। इससे बिहार जैसे उपभोक्ता राज्य को काफी फायदा होगा। मुख्यमंत्री इसके लिए बधाई के पात्र हैं।

शराबबंदी के बावजूद पर्यटकों की संख्या मे वृद्धि

पटना(अपना बिहार, 25 अप्रैल 2017) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने विरोधियों के उस आरोप कि प्रदेश में पूर्णशराबबंदी का प्रभाव यहां आने वाले पयर्टकों पर पड़ने को कुतर्क की संज्ञा देते हुए आज बताया कि राज्य में आने वाले देशी पर्यटकों की संख्या में 68 प्रतिशत और विदेशी पर्यटकों की संख्या में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुयी है.

बिहार विधानसभा स्थित अपने कक्ष में पत्रकारों से बातचीत करते हुए नीतीश ने कहा कि वर्ष 2015 में (शराबबंदी के पूर्व) बिहार में आने वाले देशी पर्यटकों की तुलना में वर्ष 2016 में इनकी संख्या में 68 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2015 में बिहार में जहां 1.69 करोड़ देशी पर्यटक आए जो वर्ष 2016 में बढ़कर 2.85 करोड़ हो गयी है.

मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2015 में बिहार में आने वाले विदेशी पर्यटकों की तुलना में वर्ष 2016 में इनकी संख्या में 9 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2015 में बिहार में जहां 9.2 लाख विदेशी पर्यटक आए, वहीं वर्ष 2016 में यह बढ़कर 10.01 लाख हो गयी है. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में राजस्व संग्रह में करीब 1000 रुपये की हानि हुयी और यह भी शराबबंदी लागू (अप्रैल 2016 में) किए जाने के कारण नहीं बल्कि नोटबंदी और अन्य कारणों के कारण हुआ.