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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

जल प्रबंधन में ब्रिटेन देगा बिहार का साथ

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - बिहार सरकार के निश्चय हर घर नल का जल देने की योजना में इंग्लैंड की संस्था वाटर एड भी सहयोग देगी। वाटर एड और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के बीच तकनीकी सहयोग के मुद्दे पर करार हुआ है। यह संस्था वर्ष 2019 तक जल निश्चय योजना में अपनी भूमिका निभाएगी। समझौता पत्र पर हस्ताक्षर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के मुख्य अभियंता (नागरिक) सह सदस्य सचिव बिहार राज्य जल एवं स्वच्छता मिशन वीरेंद्र कुमार और वाटर एड के इंडिया के मुख्य कार्यपालक अधिकारी वीडीएस माधवन ने किया। करार के मुताबिक वाटर एड बिहार के 3378 ग्राम पंचायतों में जल सुरक्षा एवं जल गुणवत्ता की समस्या से निदान की दीर्घकालिक उपायों की समुदाय आधारित रणनीति बनाने में मदद करेगी।

Text Box: साहित्य और समाज

संपादकीय : शहाबुद्दीन तुम्हें सलाम…

दोस्तों, संपादकीय का शीर्षक आलोच्य है। आलोच्य इसलिए कि मैं भी यह मानता हूं कि किसी भी अपराधी का महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन संदर्भ दूसरा है। असल में शहाबुद्दीन अब केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया है। वह एक स्टैंडर्ड बन गया है। हालत यह हो गयी है कि एक शहाबुद्दीन के कारण सरकार, न्यायपालिका, विधायिका और पत्रकारिता यानी लोकतंत्र के चारों स्तंभों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा हो गया है। अन्य स्तंभों को उनके हाल पर छोड़ यदि पत्रकारिता जगत की बात करें तो देश के तमाम लिखक्कड़ों ने शहाबुद्दीन को केंद्र में रखकर अपने मन की भड़ास जरुर निकाली है। मानों शहाबुद्दीन ने उन्हें देश की सभी व्यवस्थाओं को गाली देने का मंत्र दे दिया है। मुझ जैसा अल्पज्ञ भी एक शहाबुद्दीन के आधार पर समाज में हो रहे बदलाव को महसूस करने की चेष्टा कर रहा है।

सबसे अधिक दयनीय हालत तो उन पत्रकारों की है, जिनके रगों में कथित तौर पर सवर्ण खून दौड़ता है। जाने किस मिट्टी के बने हैं वे। एक पत्रकार ने हद ही कर दी। उसे शहाबुद्दीन की टी शर्ट नजर आती है। गनीमत है कि उसने शहाबुद्दीन के अंतः वस्त्रों के दर्शन नहीं किये। सबसे मजेदार तो यह है कि भारत के गरीब जनता की कमाई से दस लाख का सोने का सूट पहनने वाला प्रधानमंत्री उसे भगवान सरीखा लगता है। गरीबों को लूटकर अरबों रुपए कमाने वाला अनंत सिंह उसके लिए प्रातः स्मरणीय है।

खैर पसंद अपनी-अपनी। पत्रकारिता में भी यह बात लागू है। किसी को शहाबुद्दीन का टीशर्ट नजर आता है तो किसी को कुछ और। किसी को वह शहाबुद्दीन नजर आता है जो बकरीद के दिन अपने गांव-जवार के लोगों को गले लगाता है। जितने पत्रकार उतना शहाबुद्दीन। मानों हरि अनंत, हरिकथा अनंता। वैसे पत्रकारिता आज जैसी है, वैसी पहले भी थी या नहीं, सही-सही नहीं कहा जा सकता है। लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि इस एक शख्स ने पत्रकारिता की मानक रेखा खींच दी। जिस पत्रकार ने शहाबुद्दीन की आलोचना की, वह सवर्ण लोगों(आप चाहें तो भाजपाई भी कह सकते हैं) को सबसे बड़ा पत्रकार और वह पत्रकार जिसने आंखों-देखी सच्चाई बयां की, वह उनके लिए किसी दलाल से कम नहीं है।

शहाबुद्दीन की महिमा से लोकतंत्र के अन्य स्तंभ भी अछूते नहीं हैं। विधायिका तो वैसे ही राजनीति के अपराधीकरण को लेकर बदनाम है। मतलब साफ़ है कि हर पार्टी को शहाबुद्दीन और अनंत सिंह जैसे लोग चाहिए। यह अलग बात है कि राजनीति में बयानबाजी यह देखकर नहीं की जाती है कि बयान देने वाले में कितना खोट है। राजनेता "चलनी" के समान हैं जिसमें हजार छेद होते हुए भी "सूप" को दोषी करार देते हैं। यही राजनेता होने का सबसे बड़ा सबूत है। बिहार और देश की जनता को शहाबुद्दीन के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए कि केवल उसके कारण बिहार की ठंढी पड़ चुकी राजनीति एकाएक गरमा गयी। सारे बुनियादी मुद्दे केवल शहाबुद्दीन के कारण ठंढे बस्ते में चले गये। हालत तो यह हो गयी कि पप्पू यादव जैसा नेता भी शहाबुद्दीन की रिहाई के विरोध में प्रदर्शन करता है। वहीं पप्पू यादव जिसपर अजीत सरकार की हत्या का आरोप था और सबूत के अभाव में रिहा हो गया।

शहाबुद्दीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उसने विपक्ष को राजनीतिक संजीवनी प्रदान कर दी। मंगल पांडे और सुशील मोदी जैसे नेताओं के भी पर निकल आये हैं। अन्य नेताओं के मुंह में भी जुबान आ गयी है। मानवता के नाते ही इन नेताओं को शहाबुद्दीन के प्रति आभार जरुर व्यक्त करनी चाहिए।

कार्यपालिका सत्ता के शीर्ष का अनुगामी होता है। जब सत्ता के शीर्ष ने चाहा शहाबुद्दीन गिरफ़्तार किया गया। जेल भेजा गया। जेल में भी उसने कम ऐश नहीं किये। उसकी कहानियां आज भी लोग चटखारे लेकर कहते और सुनते हैं। वैसे इन सबके बीच शहाबुद्दीन ने पीएचडी की डिग्री हासिल की। करीब डेढ सौ किताबें पढ डाली। कुछ लोगों को यह कमाल की बात लग सकती है।

अंत में बात न्यायपालिका की। शहाबुद्दीन को मिली जमानत ने न्यायपालिका पर सवाल खड़ा कर दिया। दिलचस्प यह है कि यह सवाल तब नहीं खड़ा किया गया जब बिहार में दलितों और पिछड़ों का नरसंहार कराने वाला ब्रह्मेश्वर मुखिया बाइज्जत बरी हो गया। जिन रक्तपिपासुओं ने दिनदहाड़े दलितों और पिछड़ों को मौत के घाट उतारा, उन्हें बाइज्जत बरी करने पर आज न्यायपालिका की नैतिकता की दुहाई देने वालों के न तो मुंह से कोई शब्द निकला था और न ही उनकी कलम से। अब तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया है। नीतीश कुमार ने अपनी छवि बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है तो प्रशांत भूषण जैसे दिग्गज वकील भी सीवान के चंदा बाबू के पक्ष में खड़े हो चुके हैं। वैसे दिलचस्प बात यह है कि वह प्रशांत भूषण ही थे जिन्होंने बाथे-बथानी के पीड़ितों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में लड़ने से इन्कार कर दिया था।

बहरहाल शहाबुद्दीन सचमुच में मानक बन चुका है। एक सजीव मानक। इस एक मानक ने सभी की सीमाओं को सार्वजनिक कर दिया है। जाहिर तौर पर शहाबुद्दीन का न सही, इस मानक को सलाम देना तो बनता ही है।

खास रिपोर्ट : जातिवाद से पीड़ित 42.2 फीसदी शिक्षक मानते हैं कि पढ़ने में कमजोर होते हैं दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चे

पटना(अपना बिहार, 7 सितंबर 2016) - जाति सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई है। हालत यह है कि सूबे के 42.2 फीसदी शिक्षक भी इससे पीड़ित हैं और वे मानते हैं कि दलित व पिछड़ी जाति बच्चे पढ़ने में कमजोर होते ही हैं। यह आंकड़ा बिहार सरकार के शिक्षा विभाग शोध एवं प्रशिक्षण निदेशालय द्वारा कराये गये सर्वे पर आधारित है। विश्व बैंक के सौजन्य से कराये गये इस सर्वे के पीछे विभाग की मंशा सूबे में शिक्षकों को होने वाली समस्या के बारे में जानना और कमियों में सुधार करना था। सर्वे की रिपोर्ट का यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में सामान्य वर्ग यानी गैर आरक्षित वर्ग के शिक्षकों की संख्या 26.9 फीसदी है और शेष शिक्षक आरक्षित वर्गों से हैं।

जब इस सर्वे की रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी गयी थी तब राज्य सरकार ने शिक्षकों की अध्यापन कुशलता में वृद्धि के लिए कई कार्यक्रम तय किये थे। इसके कई मानदंड भी थे। लेकिन पूरी योजना धरी की धरी रह गयी। हालांकि विभाग द्वारा शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु विशेष पहल अवश्य किये गये हैं।

वहीं सर्वे रिपोर्ट में बताये गये आंकड़े सूबे में शिक्षकों की अकार्यकुशलता को प्रदर्शित करता है। मसलन 45 फीसदी शिक्षक केवल इंटर पास हैं। वहीं राज्य सरकार द्वारा हाल में किये गये शिक्षक नियोजन के कारण स्थिति में सुधार आया है और स्नातक पास शिक्षकों की संख्या 32 फीसदी हो सकी है। वहीं पीजी पास शिक्षकों की संख्या करीब 16 फीसदी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि स्नातक व स्नातकोत्तर उत्तीर्ण शिक्षकों को उच्च वर्गों में अध्यापन की जिम्मेवारी होती है जबकि वर्ग सात से नीचे के वर्गों में पढ़ाने की जिम्मेवारी गैर स्नातक शिक्षकों की है। जबकि सात फीसदी शिक्षकों की योग्यता केवल मैट्रिक पास है।

सर्वे की रिपोर्ट को आधार मानें तो शिक्षकों की अधिक उम्र भी एक बड़ी समस्या है। मसलन 77.2 फीसदी पुरूष शिक्षकों की उम्र चालीस पार है।  हालांकि उम्र के लिहाज से शिक्षिकायें अधिक जवान हैं। केवल 22.8 फीसदी शिक्षिकाओं की उम्र चालीस वर्ष से अधिक है। यह स्थिति राज्य सरकार द्वारा शिक्षक नियोजन में महिलाओं को प्राथमिकता दिये जाने के कारण हुआ है।

बहरहाल शिक्षा विभाग के मुताबिक शिक्षकों की कार्यकुशलता में संवर्द्धन के लिए कई तरह की योजनायें चलायी जा रही हैं। इनमें नियमित प्रशिक्षण के अलावा शिक्षकों का मूल्यांकन भी शामिल है। इसी मूल्यांकन के आधार पर शिक्षकों को सम्मानित करने की योजना भी  शामिल है।

अपनी बात : प्यारी रात के नाम

रात की बात बड़ी निराली होती है। दिन के उजाले में जो नजर नहीं आता, अक्सर रात के अंधेरे में साफ़-साफ़ नजर आता है। वैसे रात का महत्व अलग-अलग समय के हिसाब से अलग-अलग होता है। मसलन बचपन में मां की कहानी सुनने के लिए रात का इंतजार तो आज भी मन को कचोटता है। मां तब कितनी कहानियां कहती थी। तेल लगाने के बाद। कभी-कभी तो कहानियों के बगैर खाने का मन भी नहीं होता तो मां एक-एक कौर खाना खिलाती और साथ में कहानी भी सुनाती। अक्सर ऐसा रात के अंधकार में ही होता था। ढिबरी की रोशनी रहती थी तब। मां का चेहरा दिखता था और आंगन में घुप्प अंधेरा।

मां जब भूत की कहानी सुनाती तो लगता जैसे सचमुच भूत आ जाएगा। परियों की कहानी सुनाती तो आसमान में टिमटिमाते तारे परियों के होने का अहसास कराते। मन कभी डरता तो कभी खुश होता। डरने और खुश होने के बीच मन में बात बैठी रहती कि पहले मां कहानी सुनाये फ़िर आंखें बंद करुं। हालांकि उन दिनों आंखों पर इतना नियंत्रण कहां होता था। कब कहानी सुनते-सुनते मां की गोद में नींद आ जाती, पता ही नहीं चलता था।

रात से अपना रिश्ता तो तभी से है। अब मां बुढी हो गयी हैं और मैं भी जीवन के मई-जून की तेज दुपहरी झेल रहा हूं। रात अब भी आती है। अपने साथ दिनभर की बातें और कल आने वाली चुनौतियों का संदेश लेकर। लेकिन रात भी मां की तरह है। कभी बिना कहानी सुनाये और खाना खिलाये छोड़ती नहीं। हर रात यही होता है। अब भी जबकि मैं भी यह सच जानता हूं कि न भूत होते हैं और न ही परियां। अब तो राजा भी नहीं होते। हां हाथी-घोड़े जरुर होते हैं, लेकिन उनमें अब वैसी दिलचस्पी नहीं रही। अक्सर दिन के उजाले में वे भी हम इंसानों के जैसे दिन के बीतने का इंतजार करते हैं ताकि रात आये। अपनी प्यारी रात। मां के जैसी प्यारी रात।

मोदी की बनियागिरी

- गौरव अरण्य

आज अखवारों में रिलाइंस जियो के फुल पेज प्रचार में पीएम मोदी की तस्वीर ने हंगामा खड़ा कर दिया। दूसरी तरफ आज केंद्रीय व्यापर संघ का आज भारत बंद था। इस तस्वीर ने पूरा ध्यान हड़ताल से हटा दिया। मुकेश अंबानी ने रिलाइंस जियो 4G सर्विस के उद्घाटन के मौके पर पीएम मोदी की तस्वीर लगाई हुई थी, उद्घाटन हो गया, लेकिन अखवार में पीएम की तस्वीर विरोधियो को नहीं पचि। जबकि मुकेश अंबानी ने जियो के लॉन्चिंग को पीएम के डिजिटल क्रांति के सपने से जोड़ अपना पक्ष साफ रखा है।

 

पीएम और जियो के इस संबंध को समझना है तो आपको भूतकाल में जाना होगा। दरसल यह पूंजीवाद का आधुनिक तस्वीर है, जिसे घोर पूंजीवाद कहते है। घोर पूंजीवाद को समझने के लिए आपको कैपिटलिस्म पर अंग्रेजी में लिखी महंगी किताब पढ़ने की जरुरत नहीं है। आप घोर पूंजीवाद को ठेठ भाषा में समझ सकते/सकती है।

 

वैसे महात्मा गांधी ने अंग्रेजो को भगा कर पूंजीवादियों को भगा दिया था लेकिन पूंजीवाद ने मनमोहन सिंह के आर्थिक क्रांति (जो नब्बे के दसक में हुआ ) के साथ रूप बदल कर अपन कदम देश में रखा। अब सरकारी कंपनियों को घाटे में दिखा निजी हाथों में देने का दौर शुरू हुआ। इसका शुभारंभ हमारे प्राधनमंत्री अटल विहारी बाजपई ने किया, एक नया विभाग खोल विनिवेश विभाग( disinvestment Department)। जिसका मुख्य कार्य घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों का निजीकरण करना था। तब से आज तक कई कंपनियों का निजीकरण कर दिया गया। दरसल पूंजीवादी सरकार निजी कंपनियों के साथ मिलकर यह खेल खेलती है कि पहले सरकारी कंपनियों को घाटे दिखा कर उनका बना बनाया इंफ्रास्ट्रक्चर के बल पर लाभ उठाया जा सके। इनमे अधिकतर कंपनियों का निजीकरण कौड़ी के भाव में कर दिया गया। जनता को समझा दिया जाता है कि सरकारी नौकरी वाले काम नहीं करते है, जिसके कारण कंपनियों को नुकसान होता है। अब यह खेल रेलवे और बीएसएनएल जैसी सरकारी कंपनियों के साथ खेला जा रहा है। जैसे यह कहा जाता है कि राजनितिक दबाब के कारण यात्री भाड़े नहीं बढ़ाने के कारण रेलवे को नुकसान होता है।

अब बीएसएनएल के मामले को समझिये, मोदी सरकार भारत में डिजिटल क्रांति लाना चाहते है, सौभाग्य से उनके पास बीएसएनएल है लेकिन नहीं उनको रिलाइंस के साथ मिलकर डिजिटल क्रांति लानी है। मोदी एक मजबूत शासक है। पीएम चाहते तो बीएसएनएल के जरिये डिजिटल क्रांति कर एक मिसाल कायम कर सकते थे। वह मनमोहन और बाजपई सराकर से अलग कर अपना ट्रेड मार्क छोड़ सकते थे। लेकिन पीएम भी वही निकले पूंजीवादियों की कठपुतली मात्र। रिलाइंस के जियो लांच होने के बाद एयरटेल, आईडिया जैसे टेलिकॉम कंपनियों को भाड़ी नुकसान उठाना पड़ा। अब सभी यह जानना चाहते है कि ये कंपनियां रिलाइंस जियो को जबाब क्या देंगे लेकिन इस लड़ाई में बीएसएनएल कही नज़र नहीं आ रहा है। सरकार यह नहीं बता रही है कि इस डेटा क्रांति में बीएसएनएल का क्या प्लान है? बात साफ़ है, घोर पूंजीवाद, मोदी जिसका एक चेहरा मात्र है। यह ध्यान देने वाली बात है की मोदी नब्बे के दसक में आर्थिक क्रांति लाने वाले के भविष्य ही है। जिसे आज हम अखवारों में देख रहे है। इसलिए चौके नहीं , स्वीकार करे , क्योंकि मोदी चले जायँगे, दूसरे प्राधनमंत्री आ जाएंगे लेकिन तस्वीर यही रहेगी जो आप देख रहे है।

28 अगस्त को जयंती पर विशेष : आज यदि राजेन्द्र यादव जीवित होते

दोस्तों, साहित्य समाज का हिस्सा है। सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से इस पर मनन करें तो यह स्थापित भी होता है। हालांकि अब फ़िजा बदलने लगी है। वंचितों का साहित्य अब असर दिखाने लगा है। खास बात यह है कि जिस व्यक्ति की साहसिक सामाजिक उद्यमिता के कारण यह संभव हो पाया है, वह आज मरणोपरांत भी उपेक्षा का शिकार है। जब वे जीवित थे तब अपनी उपेक्षा उन्हें कभी प्रभावित नहीं करती थी। हालत यह होती कि जब लोग उनकी आलोचना(सही मायने में गालियां) करते तब वे ठठाकर हंसते थे। प्रगतिशीलता के नाम पर सामंती ताकतों की दलाली करने वाले साहित्यकार उन्हें कभी जातिवादी साहित्यकार कहकर गलियाते तो कभी कोई उन्हें महज मसखरा कह अपने मन की भड़ास निकालता था। और वे थे जो सिगार के धुंए में आलोचनाओं को उड़ा दिया करते थे।

जी हां हम बात कर रहे हैं राजेन्द्र यादव जी की। वहीं राजेन्द्र यादव जिन्होंने दलितों के साहित्य और नारी साहित्य को माता-पिता दोनों का प्यार व संरक्षण दिया। ओबीसी साहित्य को लेकर उनके मन में कई सवाल थे। ये सवाल संभवतः इस वजह से भी रहे होंगे क्योंकि जिन दिनों वे तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य जो कि मूलरुप से सामंती ताकतों का साम्राज्य स्वरुप था, में वंचितों के लिए अधिकार सुनिश्चित कर रहे थे, उन दिनों ओबीसी वर्ग के साहित्यकार इस स्थिति में नहीं थे कि वे कोई पृथक रुप से चुनौती पेश कर पाते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उन्होंने ओबीसी साहित्य को अपना दुलार नहीं दिया। जैसे उन्होंने दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को साहित्य के केंद्रीय विषय के रुप में स्थापित किया, वैसे ही उन्होंने ओबीसी विमर्श को भी स्थापित करने का प्रयास किया।

असल में राजेन्द्र यादव जी सही मायने में सजग चिंतक थे। वे दूर दृष्टि रखते थे। वे मानते थे कि मुख्य धारा का साहित्य स्वयं ही अपनी मौत मरेगा और वंचित पूरी मजबूती के साथ अपनी बात रखेंगे।

आज उनका कहा सच हो रहा है। दलित, पिछड़ों और महिलाओं पर केंद्रित विमर्श साहित्य में अपनी पूरी भव्यता के साथ स्थान पा रहा है। असल में राजेन्द्र यादव वंचितों के साहित्य को सकारात्मक रुप से स्थापित करना चाहते थे। आजीवन उन्होंने यही किया। यह अलग बात है कि जब महिलायें उनके संरक्षण में बेबाकी से अपने विषयों पर बोलने लगीं तो तथाकथित रुप से मुख्य धारा के साहित्यकारों ने उन्हें रसिया से लेकर मसखरा तक की संज्ञा दी।

लेकिन इन सबसे बेखबर राजेन्द्र यादव की लेखनी न तो खामोश रही और न ही किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त। बदलते समाज के साथ साहित्य को भी समाजोन्मुख बनाने की कोशिश की। यही राजेन्द्र यादव जी की खासियत थी। वैसे यह बात भी सही है कि जो काम राजेन्द्र जी ने किया, उनके बदले किसी ब्राह्म्ण ने किया होता तो अबतक उसे भारत रत्न की उपाधि तो मिल ही जाती।

बहरहाल आज यदि राजेन्द्र यादव जीवित होते तो अपनी आंखों से देखते कि किस तरह वंचित समाज आज देश की राजनीति में अपना स्थान सुरक्षित कर रहा है। मुख्य धारा का साहित्य अपनी मौत मर रहा है और अपनी मौत टालने के लिए वह अपने विमर्श में वंचितों के विषयों को शामिल कर रहा है। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि उनके जाने के बाद देश के द्विज साहित्यकारों ने उनके योगदानों की हत्या करने का षडयंत्र रचना शुरु कर दिया है। यह महज संयोग भी नहीं है। इतिहास गवाह है जिन-जिन लोगों ने वंचितों के पक्ष में आवाज उठायी, उन्हें एक-एक कर भुलाने की जबरन कोशिश की गयी। जोतिबा फ़ुले से लेकर बाबा साहब आम्बेडकर और अब राजेन्द्र यादव तक।

ब्राह्म्णवाद का अंत सुनिश्चित करती एक किताब

- नवल किशोर कुमार

ब्राह्म्णवादी मिथकों की परेशानी यह है कि वे स्वयं एक-दूसरे का न केवल विरोध करते हैं बल्कि समाज में तर्क की परंपरा को ही पूरी तरह खत्म कर देते हैं। एक मिथक राम और रावण का भी है। ब्राह्म्णों के अनुसार एक स्वयं भगवान और दूसरा भगवान का सबसे बड़ा भक्त था। फ़िर भी दोनों के बीच लड़ाई हुई और लड़ाई का फ़लाफ़ल क्या हुआ, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह जानना कि असल में इस लड़ाई का मकसद क्या था?

 

अजय एस शेखर एसएस केरल के एसएस विश्वविद्यालय, कलदी में अंग्रेजी के सहायक प्रोफ़ेसर हैं। वे लिखते हैं : रामायण और महाभारत जैसे हिन्दू महाकाव्यों में श्रीलंका के अपमानजनक संदर्भ का संबंध उसके बौद्ध देश होने से है। श्रीलंका सम्राट अशोक के काल से ही बौद्ध धर्म का अनुयायी है। आश्चर्य नहीं कि रावण जो कि श्रीलंका का बौद्ध सम्राट था, उसने हिन्दू साम्राज्यवाद का विरोध किया था, तो उसे दानव या असुर के रुप में चित्रित किया गया। मौर्य सम्राट अशोक की संतानों महेंद्र और संघमित्रा ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में सिलोन का शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक ढंग से मतांतरित करवाया। सिलोन का बौद्ध वृतांत महावंश भी इस बात का जिक्र करता है कि स्वयं बुद्ध लंका गये थे। उन्होंने अपने 65000 उपदेशों में से कुछ वहां भी दिये थे। संभव है कि अशोक ने बुद्ध द्वारा प्रवचन दिये जाने वाले स्थानों पर धम्म के प्रतीक स्तूप एवं स्तंभ भी बनवाये हों, जिनके शीर्ष पर सिंह उत्कीर्ण हो। (थापर, 1998:68)।

 

श्री शेखर उन युवा विचारकों में शामिल हैं जिन्होंने अबतक थोपे गये ब्राह्म्णवादी विचारों को खुलकर चुनौती दी है। इन युवा विचारकों में प्रमोद रंजन, संजीव चंदन, कर्मानंद आर्य, अश्विनी कुमार पंकज, पूजा सिंह और संजय जोठे भी शामिल हैं। इनके अलावा युवा राजनेताओं यथा राज्यसभा सांसद डा मीसा भारती ने भी अपने विचारों को मजबूती के साथ रखा है कि देश का बहुसंख्यक समाज अब बदलाव को तैयार है। अब वह केवल सुविधानुसार गढे गये मिथकों में विश्वास नहीं करेगा।

फ़ारवर्ड प्रेस और द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "महिषासुर : एक जननायक" (संपादक : प्रमोद रंजन) एक सार्थक प्रयास के रुप में सामने आया है। इसमें शामिल किये गये लेख व अन्य सामग्रियां सामाजिक चैतन्यता की शून्यता को समाप्त करने का प्रयास करती हैं।

 

मसलन पुस्तक के संपादक प्रमोद रंजन के इस विचार से सहमत हुआ जा सकता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सुव्यवस्थित इतिहास लेखन की परंपरा नहीं रही है। इसलिए महिषासुर के जीवनकाल अथवा शहादत का ठीक-ठीक काल निर्धारण बहुत कठिन है। दुर्गा की एक कथा मार्कण्डेय पुराण में है। इतिहासकारों ने इस पुराण का लेखन काल 250-500 ईसवी के बीच माना है। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महिषासुर का काल इससे पूर्व रहा होगा। लेकिन महिषासुर से संबंधित संस्कृति को समझने के लिए मार्कण्डेय पुराण मात्र एक सहायक ग्रंथ है, जिससे मिलने वाली जानकारियां प्रायः विकृत हैं। दूसरी ओर इस संबंध में बहुजन गाथाओं और लोक परंपराओं में अधिक विश्वसनीय जानकारियां उपलब्ध है। इनसे साफ़ तौर पर मालूम चलता है कि महिषासुर एक ऐतिहासिक चरित्र रहा होगा, मिथकीय नहीं।

 

अतएव इस परंपरा की बेहतर समझ के लिए ब्राह्म्णेत्तर परंपराओं, संस्कृतियों की पड़ताल की जानी चाहिए। प्रसिद्ध इतिहासकार डी डी कौशंबी ने महिषासुर को पशुपालकों का आराध्य बताया है, जिसकी हत्या ब्राह्म्ण धर्म में महिशासुर मर्दिनी करती है। प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता(राजकमल प्रकाशन)। दूसरी ओर देवी प्रसाद चटोपध्याय ने 1959 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ "लोकायत : अ स्टडी इन एनसिएंट इंडिया मेटरलिज्म" के उप अध्याय "दुर्गापूजा का मूल स्रोत" में सप्रमाण साबित करते हुए लिखा है कि दुर्गापूजा में ऐसी बात नहीं है जिससे स्पष्ट रुप से अध्यात्मिक या धार्मिक कहा जा सके। यह कृति संबंधी जादू-टोना मात्र है। विभिन्न स्रोतों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि एक देवी के रुप में दुर्गा वास्तव में मिथकीय चरित्र है। ब्राह्म्णों की कल्पना मात्र है। जबकि महिषासुर एक वास्तविक चरित्र है, जो एक प्रतापी समतावादी जननायक था।

 

असल में जब प्रमोद रंजन या इनके जैसे अन्य विचारक ऐसा कहते हैं तो इसके पीछे बड़ी वजह यही है कि देश के बहुसंख्यक समाज को मिथकों में उलझाकर रखा गया है। एक मान्यता के मुताबिक हिन्दू धर्म में 99 हजार से अधिक देवी-देवता हैं। वह वर्ग जो आजतक मुट्ठी भर द्विजों का आतंक झेल रहा है, वह अब बदलने लगा है। प्रमोद रंजन एवं अन्य विचारकों व लेखकों का यह साझा प्रयास इसी का परिचायक है।

 

कदापि यह संभव है कि इस नये विचार में कुछ खामियां हों लेकिन ये खामियां किसी साजिश के कारण नहीं बल्कि सम्पूर्ण, समग्र व खुले दिमाग के साथ ब्राह्म्णेत्तर इतिहास का नहीं लिखा जाना संभव है। "महिषासुर : एक जननायक" न केवल इस मांग को आगे बढाता है बल्कि वह एक चुनौती भी देता है। एक ऐसी चुनौती जिसका जवाब द्विज समाज के पास सिवाय "साजिश" के बिल्कुल भी नहीं है। देश के संसद में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी इस साजिश का प्रदर्शन कर चुकी हैं। उनकी इस साजिश को बेनकाब करने का सार्थक प्रयास करने वाली और ब्राह्म्णवाद के खात्मे की वैज्ञानिक उद्घोषणा करने वाली इस पुस्तक की कीमत केवल सौ रुपए है। इसे फ़ारवर्ड प्रेस के वेबसाइट से आनलाइन भी खरीदा जा सकता है।

 

 

 

दोस्तों, आज का संपादकीय अत्यंत ही महत्वपूर्ण विषय पर केंद्रित है। इसका मकसद केवल इतना है कि हम सभी देशवासी अपने प्यारे बहादुर सैनिकों पर विश्वास बनाये रखें और देश की मौजूदा राजनीतिक सत्ता की आंख में आंख डाल कर सवाल कर सकें। याद रखिए सैनिक हमारे अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण हैं। वे कोई और नहीं हमारे-आपके अपने परिजन हैं। यदि देश की मौजूदा राजनीतिक ताकत उनका बेजा इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए करती है तो हमें सवाल पूछने ही होंगे। जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में आतंकियों के हमले में देश के 17 जवान शहीद हो गये। इस हमले में घायल एक और जवान की मौत इलाज के दौरान होने की सूचना मिली है। इस आतंकी हमले के बाद पूरा देश एक साथ दिखा और सभी ने सरकार से आतंकियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की मांग की। देशवासियों की यह एकता भारत की बुनियाद है। इसे राजनीतिक रुप देना न केवल मुर्खता है बल्कि देश के साथ गद्दारी भी।

खैर उड़ी आतंकी हमले के बाद भारतीय मीडिया ने तमाम तरह की खबरें दिखायीं। इनमें पाकिस्तान सीमा में लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर आतंकियों को मारे जाने की खबरें भी शामिल थी। दिलचस्प यह था कि हर बार भारतीय सेना द्वारा इसका खंडन किया गया।

इस बीच बीते बुधवार को एक खबर दिल्ली से आयी। खबर थी कि घूसकांड मामले में सीबीआई जांच झेल रहे डी जी बंसल ने अपने बेटे के साथ खुदकुशी कर ली। इसके पहले उनकी पत्नी और बेटी भी खुदकुशी कर ली थी। बंसल ने मरने से पहले अपने सुसाइड नोट में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का नाम लिखा। इस तथ्य को भारतीय मीडिया ने पूरी तरह गायब कर दिया। हालांकि सोशल मीडिया पर तोते यानी सीबीआई के गिद्ध बनने की बातें खूब उछली।

गुरुवार की सुबह दिल्ली में भारतीय सैन्य पदाधिकारी ने इस बात का खुलासा किया कि भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर के हिस्से में घुसकर आतंकियों के सात कैंप नष्ट कर दिया। भारतीय सेना द्वारा इस कार्रवाई को सर्जिकल अटैक की संज्ञा दी गयी। उसने दावा किया कि इस कार्रवाई में 38 आतंकी मारे गये। बताते चलें कि इससे पहले सर्जिकल अटैक तब चर्चा में आया था जब अमेरिकी सेना ने पाकिस्तान की धरती पर जाकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि तब अमेरिकी सेना ने अपने द्वारा दिये गये अंजाम की वीडियो को सार्वजनिक किया था। लेकिन भारतीय सेना ने अपनी कार्रवाई का कोई वीडियो अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है। जबकि सेना का कहना है कि पूरी कार्रवाई की वीडियो रिकार्डिंग की गयी है।

दूसरी ओर पाकिस्तान ने भारतीय सेना के इस दावे का खंडन किया है कि भारतीय सैनिकों ने पीओके में घुसकर सर्जिकल अटैक जैसी कोई कार्रवाई की है। उसका कहना है कि सीमा पर गोलीबारी दोनों ओर से हुई है। इसमें उसके दो सैनिक शहीद हुए हैं।

अब इस पूरे घटनाक्रम के सभी पहलूओं पर नजर डालें तो कहा जा सकता है कि सीमा पर हरकत तेज हुई है। संभव है कि भारतीय सेना सच कह रही हो। यदि ऐसा हुआ है तो निश्चित तौर पर हम सभी भारतीयों को अपने सैनिकों पर गर्व होना चाहिए। लेकिन सवाल का उठना लाजमी है। सवाल इसलिए कि जब भारतीय सेना यह कह रही है कि उसने पाकिस्तानी सेना और नागरिकों के खिलाफ़ कार्रवाई न करके केवल आतंकियों को मारा है तो उसे वीडियो रिलीज कर देना चाहिए। ताकि पूरी दुनिया भारतीय जांबाजों की जांबाजी देख सके। पाकिस्तानी सैनिक भी भारतीय सपूतों की बहादुरी देख दहल जायें। लेकिन भारतीय फ़ौज द्वारा ऐसा नहीं किया जा रहा है। इसके संबंध में तर्क दिये जा रहे हैं। अधिकांश तर्क संदेह को बढाने वाले हैं। सबसे पहली बात तो यह कि आखिर भारतीय सेना को तामझाम करने की जरुरत क्यों महसूस हुई। बीबीसी के अनुसार भारतीय सैनिकों द्वारा पूर्व में भी सर्जिकल आपरेशन अंजाम दिये गये हैं। लेकिन पूर्व की कार्रवाईयों को इस तरीके से जनमानस के बीच प्रस्तुत नहीं किया गया था। दूसरी बात तो यह कि आखिर भारतीय सेना ने इस पूरी कार्रवाई के सबूत क्यों जुटाने के प्रयास किये। सेना का कहना है कि पूरी कार्रवाई की वीडियो रिकार्डिंग की गयी। ड्रोन कैमरे का इस्तेमाल किया गया। आखिर भारतीय सेना को डर किस बात का है। क्या उसे देशवासियों से मिल रहे समर्थन पर अविश्वास है?

सेना में ब्रिगेडियर रह चुके एक व्यक्ति ने पूछने पर बताया कि भारतीय फ़ौज के लिए सर्जिकल अटैक कोई नया शब्द नहीं है। लेकिन इस तरह के अटैक एक बार में एक ही जगह पर होते हैं। एक साथ सात अलग-अलग जगहों पर सर्जिकल अटैक को अंजाम नहीं दिया जा सकता है। खासकर आजकल के अत्याधुनिक संचार तंत्र के जमाने में। फ़िर इस बात से कैसे इन्कार किया जा सकता है कि भारतीय सेना जब पीओके में घुस रही होगी तब पाकिस्तानी सैनिकों ने उनका विरोध नहीं किया हो। इसके अलावा जब आतंकी कैंपों को भारतीय सेना तबाह कर रही होगी तब क्या आतंकी खामोश बूत बन अपने मारे जाने का इंतजार कर रहे होंगे।

बहरहाल भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव अब गंभीर स्थिति में आ गया है। ऐसे में भारत सरकार को पूरी संवेदनशीलता के साथ पहल करनी चाहिए। उसे पूरे देश की जनता को अपने विश्वास में लेना चाहिए ताकि हर भारतीय अपनी सेना के पीछे खड़ी रहे और पाकिस्तान भी यह समझ ले कि भारत अब मौन बैठने वाला नहीं है। लेकिन इसके लिए उसे करारा जवाब मिलना चाहिए, कोई काल्पनिक जवाब नहीं।

काटजू के विवादित बयानों की नहीं रही है कोई सीमा

पहले भी उड़ा चुके हैं बिहार का मजाक, चीफ जस्टिस भी रहे हैं काटजू के निशाने पर

दोस्तों, पाकिस्तान को कश्मीर से बिहार का कम्बो आॅफर देने वाले सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश सह प्रेस काउंसिल आॅफ इन्डिया के पूर्व अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू के लिए विवाद कोई नयी बात नहीं है। बिहारियों का अपमान करने से पहले इसी महीने में वे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी. एस. ठाकुर पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा चुके हैं। जस्टिस टाकुर पर आरोप लगाने के क्रम में जस्टिस काटजू ने यह कहते हुए न्यायपालिका पर सवालिया निशान खड़ा किया है कि सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए कम से कम प्रति वर्ष 20 करोड़ रुपए की आय जरूरी है।

जस्टिस काटजू ने इस महीने की 18 सितंबर को अपने ब्लॉग पर जस्टिस ठाकुर से प्रत्यक्ष तौर पर सवाल खड़ा किया कि कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के दौरान ही उन्होंने एक भूखंड अपने नाम आवंटित कराया था। जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग पर लिखा कि किसी भी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश न्यायालय का कर्मी नहीं होता है। फिर आपने न्यायालय के कर्मियों के लिए आवंटित जमीन अपने नाम से क्यों आवंटित करवा लिया। श्री काटजू ने यह भी कहा कि क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है।

चीफ जस्टिस के खिलाफ जस्टिस काटजू यही नहीं रूके। अपने एक दूसरे संदेश में उन्होंने लिखा कि जस्टिस ठाकुर को संबोधित अपने कथन को उन्होंने सुप्रीम के वरिष्ठ अधिवक्ताओं के पास ईमेल से भेजा, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। इस पर चुटकी लेते हुए जस्टिस काटजू ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट में मोरों की भरमार है जो चीफ जस्टिस को देखते ही नाचने लगते हैं। इतना ही नहीं जस्टिस काटजू ने यह भी लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के कई वकीलों की वार्षिक आय बीस करोड़ रुपए से कम नहीं है और ऐसा क्यों है, यह सभी जानते हैं।

बहरहाल बिहार का मजाक उड़ाने का कारनामा वह पहले भी कर चुके हैं। तब सूबे में जदयू-भाजपा की सरकार थी और श्री काटजू प्रेस काउंसिल आॅफ इन्डिया के अध्यक्ष। 23 फरवरी 2012 को जस्टिस काटजू ने बिहार में अघोषित रूप से प्रेस पर सेंसरशिप लागू होने की बात कही थी। दिलचस्प यह कि उन्होंने अपना यह बयान बिहार में पे्रेस पर सेंसरशिप लागू है या नहीं, इसकी जांच के लिए एक टीम गठित करने से पहले दिया था। हालांकि बाद में तीन सदस्यीय जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में श्री काटजू के कथन का समर्थन किया था।

समाज में जहर घोल रहे भाजपाई : मीसा

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - राजद सांसद डा. मीसा भारती ने भाजपा के नेताओं पर समाज में जहर घोलने का आरोप लगाया है। अपने बयान में उन्होंने कहा कि हाल ही में दिल्ली कनॉट प्लेस में जब एक दाढ़ी वाले व्यक्ति ने एक ढाबे में अपने लिए खाना मांगा तो उससे कहा गया कि जल्दी है तो पाकिस्तान चले जायें। इस आशय से संबंधित एक समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार का हवाला देते हुए श्रीमती भारती ने कहा कि आजकल बात बात पर पाकिस्तान भेजने या जाने के लिए कहने और पाकिस्तान में पटाखे फुटवाने का चलन कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है, पर जब यही पाकिस्तानी सीना ताने देश को चुनौती देते हैं तब ये संघी और भाजपाई बगले झाँकने लगते हैं, बहाने और जुमले गढ़ने लगते हैं, शांतिप्रियता और रणनीतिक प्रतिरोध की आड़ में छुपने लगते हैं। उन्होंने कहा कि दोष एक ढाबे में काम करने वाले सम्भवत: कम शिक्षित गरीब कर्मचारी की नहीं है, बल्कि उन गैर जिम्मेदार राजनेताओं और मंत्रियों की है जो अनाप शनाप कुछ भी बयान देते हैं जिसका सीधा सीधा असर देश की सोच, आम जन मानस के जनजीवन और देश की एकता व अखण्डता पर पड़ता है।

बचाव के लिए शहाबुद्दीन के वकील ने मांगा वक्त, अगली सुनवाई 28 सितंबर को, शहाबुद्दीन के खिलाफ एक और याचिका दायर, चंदा बाबू की पत्नी ने भी लगाया सुप्रीम कोर्ट से गुहार

नयी दिल्ली / पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - पटना हाई कोर्ट द्वारा राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को हत्या के एक मामले में जमानत देने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई दो दिनों के लिए टल गयी क्योंकि शहाबुद्दीन के लिए जिरह करने वाले मशहूर वकील राम जेठमलानी आज कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए. न्यायमूर्ति पीसी घोष और न्यायमूर्ति अमिताभ राय की पीठ ने मामले पर सुनवाई बुधवार के लिए तय की और कहा कि उसे दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाये रखना है. शहाबुद्दीन का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वकील ने आग्रह किया कि मामले पर शुक्रवार को सुनवाई की जाए क्योंकि जेठमलानी मौजूद नहीं हैं और उपयुक्त बचाव के लिए मामले के बड़े केस रिकॉर्ड को पढ़ने की जरुरत है. पीठ ने कहा कि चूंकि मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा रहे हैं इसलिए दोनों पक्षों की बात सुने बगैर हम आदेश पारित नहीं करेंगे. हम इसे बुधवार यानि 28 सितंबर के लिए तय कर रहे हैं.'

शहाबुद्दीन की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील शेखर नफाडे ने कहा कि उनका मुवक्किल मीडिया ट्रायल से पीड़ित है और उसे अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए. शहाबुद्दीन को सात सितंबर को पटना हाई कोर्ट ने जमानत दे दी थी. जिसके बाद दस सितंबर को वह भागलपुर जेल से रिहा हो गये थे. वह दर्जनों मामलों में 11 वर्ष से जेल में बंद थे.

इससे पहले पूर्व राजद सांसद मो शहाबुद्दीन को मिली जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की गयी है. चंद्रकेश्वर प्रसाद की पत्नी कलावती देवी की ओर से दायर इस याचिका में पटना हाइकोर्ट के इस साल दो मार्च को आये फैसले को चुनौती दी गयी है, जिसमेंं कोर्ट ने शहाबुद्दीन को अपील लंबित रहने के दौरान स्थायी जमानत दी थी. उनकी याचिका पर संभवत: सोमवार को सुनवाई हुई. जिस मामले में शहाबुद्दीन को हाइकोर्ट से जमानत मिली है, उसमें उन्हें पहले ही उम्रकैद की सजा दी जा चुकी है.

कलावती के तीन युवा बेटों को बर्बर तरीके से मौत के घाट उतार दिया था. आरोप है कि महिला के दो बेटों की हत्या के चश्मदीद तीसरे बेटे को बाद में कथित तौर पर शहाबुद्दीन की शह पर मारा गया था. सीवान की सत्र अदालत ने दोहरे हत्याकांड में शहाबुद्दीन को फिरौती के लिए अपहरण व हत्या का दोषी पाकर उम्रकैद की सजा दी थी, जबकि चश्मदीद युवक की मौत के मामले में मुकदमा चल रहा है.

कलावती देवी ने अपनी याचिका में दावा किया है कि हाइकोर्ट ने इस तथ्य पर जरा भी गौर नहीं किया है कि शहाबुद्दीन एक खतरनाक अपराधी है, जिसे कानून की जरा भी परवाह नहीं है. इसमें आगे कहा गया है कि हत्या, अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के दोषी को जमानत भी दे दी गयी, जबकि उसके खिलाफ कई और मामलों में मुकदमे अभी चल ही रहे हैं, यह तो न्याय का उपहास करने के समान है. 

कलावती के पति चंद्रकेश्वर प्रसाद की ओर से दायर एक अलग याचिका में 19 सितंबर को शीर्ष अदालत ने शहाबुद्दीन से जवाब मांगा था. इसके अलावा पत्रकार राजदेव रंजन की पत्नी की ओर से दायर मामले को दिल्ली स्थानांतरित करने की याचिका की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट कर रही है. कलावती देवी ने बिहार सरकार द्वारा शीर्ष अदालत में दिये गये हलफनामे के हवाले से अपनी याचिका में कहा है कि नवंबर, 2014 तक शहाबुद्दीन के खिलाफ कम-से-कम 38 मामलों में मुकदमे लंबित थे. ये मामले हत्या, हत्या की कोशिश, खतरनाक हथियार से दंगा करना, वसूली करने समेत कई गंभीर अपराधों से संबंधित हैं. याचिका में दावा किया गया है कि दोहरे हत्याकांड मामले के लंबित रहने के दौरान जून, 2014 को रोशन की भी कथित तौर पर शहाबुद्दीन के कहने पर हत्या कर दी गयी.

खास खबर : पांच वर्षों बाद आयी उर्दू की याद

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - करीब पांच वर्ष पहले राज्य सरकार ने उर्दू को हिन्दी एवं अंग्रेजी के समान महत्व देने के लिए अधिसूचना जारी की थी। इसके तहत सभी विभागों, सरकारी कार्यालयों में बोर्ड व होर्डिंग उर्दू में लिखे जाने का निर्देश दिया गया था। इस आशय से संबंधित एक विभागीय पत्र 31 जनवरी 2011 को जारी किया गया था। तब से लेकर राज्य सरकार तब तक नींद में सोयी रही जबतक कि 3 मई 2016 को विधायक नेमतुल्लाह ने इस संबंध में विधानसभा में प्रश्न नहीं उठाया। उनके द्वारा प्रश्न उठाये जाने के बाद अब जाकर सरकार की नींद खुली है।

नतीजतन राज्य के सभी सरकारी महकमों में अब उर्दू का दबदबा बढ़ने वाला है। आने वाले दिनों में इस भाषा को भी हिन्दी के समान महत्व दिया जाएगा। पत्राचार उर्दू में भी होंगे। महत्वपूर्ण दस्तावेजों का हिन्दी के आलावा उर्दू में भी अनुवाद किया जाएगा। मंत्रिमंडल सचिवालय के उर्दू निदेशालय ने इस बाबत कई जरूरी निर्देश सभी विभागों, बोर्ड-निगम आदि को भेजा है। भवन निर्माण समेत विभिन्न निर्माण कार्य विभागों ने इस निर्देश पर अमल करने की पहल की है। दिए गए निर्देश के तहत सभी सरकारी भवनों/कार्यालयों, अफसरों से लेकर सड़कों के नामपट्ट व संकेतपट्ट हिन्दी के आलावा उर्दू में लिखे जाएंगे।

सभी सरकारी योजनाओं के बैनर, होर्डिंग्स, शिलापट्ट, सूचनापट्ट भी हिन्दी के साथ उर्दू में होंगे। यही निर्देश सभी जिलाधिकारियों, आयुक्तों, क्षेत्रीय पुलिस अफसरों, मुख्य अभियंताओं, सिविल सर्जन, शिक्षा पदाधिकारियों को भेजा गया है। निदेशालय के प्रधान सचिव ने साफ कर दिया है कि सभी विभागों में उर्दू भाषा में आने वाली अर्जियों के उत्तर भी उर्दू में दिए जाएंगे। उर्दू निदेशालय ने हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी दोनों भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था कर दी है। निदेशालय ने कहा है कि किसी भी संस्थान या पदाधिकारी को यदि उर्दू में आवेदन मिलता है तो उसका जवाब तैयार करने के लिए उर्दू निदेशालय मदद करेगा। ऐसा उर्दू को राज्य में मिले द्वितीय राजभाषा का दर्जा वास्तविक रूप से दिलाने के लिए किया जाएगा। भवन निर्माण विभाग के अवर सचिव सूर्यकांत मणि ने सभी मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता, कार्यपालक अभियंता समेत संबंधित अफसरों को सरकार की इस भाषा नीति के अनुरूप कार्य करने की हिदायत दी है।

संपादकीय : राजनीतिक बयानबाजी में मर्यादायें तार-तार

दोस्तों, राजनीति में बयानबाजी अप्राकृतिक नहीं है। खासतौर पर पक्ष और विपक्ष के बीच नोंक-झोंक से ही राजनीति आगे बढ़ती है। लेकिन हाल के दिनों में बयानबाजी का नया स्वरूप सामने आया है। पहले वरिष्ठ राजनेताओं के बयान का जवाब वरिष्ठ नेता ही दिया करते थे। कम वरिष्ठ नेतागण ऐसे मामलों में चुप ही रहते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब न तो वरिष्ठ अपनी वरिष्ठता का ख्याल रखते हैं और न ही नये राजनेता वरिष्ठ नेताओं के प्रति कोई सम्मान। सूबे में इन दिनों यही चल रहा है।

एक ताजा उदाहरण पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का बयान है जिसमें उन्होंने कहा है कि लालू का परिवार कभी नहीं सुधरेगा। गौरतलब है कि सुशील मोदी सूबे के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। लेकिन राजनीति में वरिष्ठता कोई मायने नहीं रखती है। कम से कम तब जबकि सूबे में लालू प्रसाद नीतीश कुमार के साथ परोक्ष रुप से सत्ता में हैं। उनका कहना है कि लालू प्रसाद का परिवार कभी सुधरने वाला नहीं है। उन्होंने कहा है कि पटना हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद के छोटे बेटे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव के खिलाफ कड़ी टिप्प्णी की है तो बड़े बेटे स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।

बात पहले तेजस्वी यादव की। गौरतलब है कि पटना हाईकोर्ट ने भवन निर्माण विभाग से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उपमुख्यमंत्री के लिए ‘ग्रीन हार्न’ शब्द का इस्तेमाल किया है। इस शब्द का मतलब एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास अनुभव न हो और बड़ी जिम्मेवारी हो। जाहिर तौर पर उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के पास अनुभव का अभाव है। जिस मामले में हाईकोर्ट ने इस शब्द का इस्तेमाल किया है वह एक पदाधिकारी के स्थानांतरण से जुड़ा है। मिली जानकारी के मुताबिक जिस पदाधिकारी के स्थानांतरण किये जाने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है, वह लंबे समय तक एक ही पद पर पदस्थापित थे।  वहीं सीवान के पत्रकार रहे राजदेव रंजन की विधवा आशा रंजन के द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तेजप्रताप यादव को नोटिस जारी किया है। वजह  यह कि राजदेव की हत्या का एक आरोपी मो कैफ के साथ तेज प्रताप की एक तस्वीर वायरल हुई थी। सबसे दिलचस्प यह कि मो कैफ केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के साथ भी जश्न मनाता दिखा था। लेकिन उमके खिलाफ आशा रंजन ने कोई शिकायत नहीं की। ऐसे में उनकी मंशा पर सवाल उठना लाजमी है।

बहरहाल मौजूदा दौर में राजनीतिक बयानबाजी में मर्यादाओं के गिरने का ही परिणाम है कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने भी श्री मोदी को अफवाह मियां की उपाधि दी है। गौरतलब है कि श्री मोदी ने अपनी राजनीति लालू प्रसाद के साथ शुरू किया था। तब वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ में सेक्रेटरी और श्री प्रसाद अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे।

बिहार में हो रहा सकारात्मक बदलाव : रूबी, प्रकाशोत्सव के पहले नीतीश आयें कनाडा, मोदी जी के कारण विश्व स्तर पर भारत की छवि बदली, हिलेरी बनें राष्ट्रपति, लेकिन सहानुभूति के आधार पर नहीं

डा. रूबी ढाला वर्ष 2004-2011 के दौरान कनाडा के हाउस आफ कामन्स की सदस्या रहीं। सबसे पहले वे सुर्खियों में तब आयी थीं जब दस वर्ष की उम्र में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर आपरेशन ब्लू स्टार के समय सिक्ख समुदाय के निर्दोषों पर जुल्म नहीं करने की प्रार्थना की थी। उनके पत्र को इंदिरा गांधी ने गंभीरतापूर्वक लेते हुए जवाब भी दिया था। डा. रूबी ढाला कनाडा में समलैंगिकों के संबंध में एक विधेयक को समर्थन देने को लेकर चर्चा में रही थीं। हालांकि वर्ष 2011 में उन्हें इस कारण हार का सामना भी करना पड़ा था। इसके अलावा डा. रूबी ढाला ने एक फिल्म में अभिनय भी किया था। साथ ही वे वर्ष 1993 में मिस इन्डिया कनाडा प्रतियोगिता में दूसरे नंबर रही थीं। वर्ष 2008 में मशहूर पत्रिका मैक्जिम ने उन्हें दुनिया की तीसरी सबसे खुबसूरत महिला राजनीतिज्ञ करार दिया था। वह अंतरराष्ट्रीय सिक्ख समागम के दौरान पटना में थीं। इस मौके पर संपादक नवल किशोर कुमार से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश -

पटना (अपना बिहार, 25 सितंबर 2016) - डा. रूबी ढाला कनाडा की पूर्व सांसद हैं। इनका मानना है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सकारात्मक बदलाव आ रहा है। जिस दिशा में बिहार आगे तेजी से बढ़ रहा है, कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आने वाला समय बिहार का होगा। तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सिक्ख समागम में भाग लेने को कनाडा से बिहार आने वाली डा. ढाला ने विशेष बातचीत में कहा कि बिहार गुरू गोविंद सिंह की जन्मस्थली है और इस कारण विश्व के हर कोने में रहने वाले सिक्ख समुदाय के हर व्यक्ति के लिए तीर्थ स्थल है। यहां आकर मैंने गुरू गोविंद सिंह जी के जन्मस्थली का दर्शन किया। यह मेरे लिए एक सपने के सच होने के समान है। उन्होंने कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कनाडा आने के लिए आमंत्रित करती हूं। वे प्रकाशोत्सव के पहले अपने शिष्टमंडल के साथ आयें। वहां बिहार के विकास के लिए विशेष माहौल बनेगा।

वहीं राजद प्रमुख लालू प्रसाद के बारे में डा. रूबी ढाला ने बताया कि भारतीय राजनीति में लालू प्रसाद जी की अलग पहचान है। हालांकि उनसे कभी मुलाकात नहीं हो पायी, उन्हें केवल टेलीविजन पर देखा है। लेकिन जितना मैंने उनके बारे में जाना-समझा है, उसके हिसाब से वे आम जनता से सीधे जुड़ने वाले राजनेता हैं। इसी खासियत के कारण श्री प्रसाद कनाडा ही नहीं बल्कि कई देशों में लोकप्रिय हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में पूछने पर कनाडा की पूर्व सांसद ने कहा कि मोदी जी के कारण भारत ने वैश्विक स्तर पर नयी करवट बदली है। अब यूरोप के देशों में गोरे भी भारत की बदलती छवि की प्रशंसा करते हैं। श्री मोदी द्वारा शुरू किया गया मेक इन इन्डिया कार्यक्रम अत्यंत ही प्रभावकारी है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। वहीं सबसे बड़ा बदलाव विश्व स्तर पर भारत के प्रति सोच में आया है। इसके लिए नरेंद्र मोदी को बधाई दी जानी चाहिए।

विश्व स्तर पर राजनीति में आधी आबादी की भागीदारी के सवाल पर डा. रूबी ढाला ने कहा कि महिलायें राजनीति के क्षेत्र में आगे आयें। वे भी समाज की हिस्सेदार हैं। उन्होंने कहा कि उनके अपने परिवार में पहले किसी का भी संबंध राजनीति से नहीं रहा। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने राजनीति को अपनाया। वर्ष 2004 से लेकर वर्ष 2011 तक कनाडा की सांसद रहने वाली डा. रूबी ढाला ने बताया कि वे स्वयं को जनता का सेवादार मानती हैं। उन्होंने कहा कि भारत और कनाडा की राजनीति में बहुत बढ़ा अंतर है। मसलन यहां कई लाख लोगों के लिए एक सांसद होते हैं जबकि हमारे यहां एक संसदीय क्षेत्र में 10-15 हजार निर्वाचक होते हैं।

यह पूछने पर कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में वे किसे अपना समर्थन देंगी और क्यों देंगी, डा. ढाला ने कहा कि हिलेरी जीतें। यह विश्व स्तर पर महिलाओं के नेतत्व को स्थापित करेगा। लेकिन यह केवल इस आधार पर नहीं हो कि हिलेरी महिला हैं। बल्कि आधार उनकी कार्यकुशलता और क्षमता हो। डा. ढाला ने कहा कि विश्व स्तर पर राजनीति में महिलायें उपेक्षित हैं। महिलाओं के प्रति सभी देशों के राजनीतिक दलों में उपेक्षा का भाव है। यह कहीं अधिक कहीं ज्यादा जरूर है। लेकिन राजनीतिक दलों को पारंपरिक सोच छोड़कर राजनीति में महिलाओं को अधिक से अधिक भागीदारी देनी चाहिए। इसके लिए उनका प्रोत्साहन किया जाना चाहिए।

बहरहाल यह पूछे जाने पर कि गुरू गोविन्द सिंह जी की 350वीं जयंती के मौके पर आयोजित होने वाले प्रकाशोत्सव के संबंध में बिहार सरकार द्वारा की जा रही तैयारियों से संतुष्ट हैं, डा. ढाला ने कहा कि असंतुष्टि का कोई सवाल ही नहीं है। बिहार सरकार पूरी गंभीरता के साथ सारे आयोजन कर रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं पूरे आयोजन की मेजबानी कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में उनके अन्य सहयोगी व विभाग सभी आपसी समन्वय के कारण प्रकाशोत्सव को ऐतिहासिक बनाने में सफल होंगे।

बुढे व्यक्ति ने खोली भारतीय फ़ौज की पोल, कहा - मेरा बेटा आर्मी में जाने को था तैयार, पर मांगी थी पांच लाख घूस

पटना(अपना बिहार, 24 सितंबर 2016) - आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए नायक सुनील कुमार विद्यार्थी के बुलंद हौसले की चर्चा हर चौक-चौराहे व गांवों के चौपालों पर हो रही है. ऐसा ही एक चौपाल गुरुवार की दोपहर शहीद सुनील के गांव बोकनारी के पास स्थित हसपुरा रेलवे गुमटी के पास लगा था. एक पेड़ की छांव में बैठे रेलवे गैंगमैन से रिटायर्ड 72 वर्षीय महावीर यादव कहते हैं कि उनका बेटा देवानंद यादव आर्मी में है. मेरठ में पोस्टेड है. लेकिन, जिस दिन से आर्मी ज्वाइंन की, वह मेरा बेटा नहीं रहा. वह देश का बेटा हो गया. तनिक भी फिक्र नहीं होती है कि मेरा बेटा शहीद हो जायेगा. देश का बेटा है, देश के लिए शहीद हो जायेगा तो इससे और गौरव की बात क्या होगी.

श्री यादव बताते हैं कि उनकी बहू शारदा देवी (देवानंद की पत्नी) को कभी भी यह गम नहीं होता है कि उनके पति शहीद हो जायेंगे. दूसरे बेटे रामदयाल यादव  को भी आर्मी में भेजना चाहता था, लेकिन भ्रष्टाचार के भंवर में फंस गया. आर्मी के आॅफिसरों से सांठ-गांठ रखनेवाले दलालों ने उनके बेटे से पांच लाख घूस मांगी थी. आर्मी में भरती होने के लिए पांच लाख घूस देना उन्हें उचित नहीं लगा. यह काम उनके जमीर के खिलाफ था. न घूस दिया और न ही बेटा आर्मी में बहाल हो सका. व्यवस्था में सुधार की जरूरत है.

श्री यादव बताते हैं कि जवानों की शहादत पर पूरा देश मर्माहत है. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आर्मी बहाली में घूसखोरी को बंद कराने के लिए भी ठोस कदम उठाएं. यह  कलंक की बात है कि हमारा बेटा आर्मी में बहाल होकर देश के लिए शहीद होना चाहता है और उससे पांच लाख रुपये घूस मांगी जाती है.  सुनील उनके गांव-ज्वार का बेटा था. उसको श्रद्धांजलि तभी होगी, जब प्रधानमंत्री एलान करें कि आर्मी बहाली में अब किसी बेटे को घूस नहीं देनी पड़ेगी. आर्मी बहाली की प्रक्रिया को और सरल करें, ताकि बहाली के नाम पर दलालों की चांदी न कट सके. पूरी जिंदगी इस बात का ममाल रहेगा कि घूसखोरी के कारण बेटा आर्मी में बहाल नहीं हो सका. बेटा घर में मरेगा तो उसे कौन जानेगा. अगर वह देश के लिए मरता तो पूरा देश उसे जानता. उसका जीता-जागता उदाहरण सुनील है. आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी गौरव-गाथा से आनेवाली पीढ़ियां प्रभावित होंगी.

अपनी बात : रेल बजट का महत्व

दोस्तों, अपने दो वर्षों के कार्यकाल में भारतीय रेल व्यवस्था में कितना सुधार हुआ है, इससे पूरा देश परिचित है। अलबत्ता बीते दो वर्षों में रेल किराये में वृद्धि ही की गयी है और इसका असर आम आदमी की जेब से लेकर रसोई तक में देखा जा सकता है। बुलेट ट्रेन को लेकर चहल-पहल जरुर बढी है। लेकिन इनके अलावा (मसलन प्रीमियम ट्रेनों के जरिए सरकारी स्तर पर टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग) कोई और बहुत बदलाव हुआ है तो वह यह कि अब रेल बजट संसद में पेश नहीं किया जाएगा। अब इसे मुख्य बजट का हिस्सा बना दिया गया है।

सरकार की निगाह से देखें तो कई फ़ायदे हैं इसके। मसलन सरकार को अलग से माथा खपाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। रेल किराया बढा तो भी वाह-वाह और घटा तो भी तालियां। न तो aनये रेलों की घोषणा करने की मजबूरी और न ही एक ही दिन में देश की जनता से तमाम वायदा करने की मजबूरी रहेगी।

अब यदि जनता की निगाह से इस बदलाव को देखें तो कहना aपड़ेगा कि सरकार ने कमाल का फ़ैसला लिया है। अब जैसे प्रति सप्ताह पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढती हैं। आने वाले समय में रेल का किराया भी बढता-घटता रहेगा। जनता को किसी चीज की उम्मीद नहीं रहेगी। उम्मीद नहीं रहने का मतलब जब घोषणायें नहीं होंगी तो उम्मीद कैसा। सरकार के मन में जब कोई बात आयेगी, योजनायें घोषित की जा सकेंगी। हालांकि उन राज्यों को लाभ जरुर मिल सकता है जहां चुनाव होंगे। मसलन 2020 में बिहार में अगला विधानसभा चुनाव होगा, तब रेल मंत्रालय चुनावी वर्ष में रेवड़ियां बांटेगा। तबतक बिहार? नो प्रोब्लेम।

बहरहाल रेल बजट के शामिल होने का एक भावार्थ यह भी कि भारतीय रेल अब केवल भारतीयों की लाइफ़ लाइन ही नहीं बल्कि दुधारु गाय बन चुकी है। दुधारु गाय की उपमा गलत लगे तो इसे जनता को लूटने का माध्यम भी कहा जा सकता है। वह दिन दूर नहीं जब रेल में देशी-विदेशी पूंजी निवेश होंगे और अलग-अलग कंपनियों की रेलगाड़ियां हवा से बातें करेंगी जबकि भारतीय रेल की पारंपरिक गाड़ियां किसी आउटर पर खड़े रहकर मल्टीनेशनल रेलगाड़ियों का चेहरा देखेंगी। रही बात जनता की तो उसका तो काम ही है देखना, देखना और केवल देखना।

आतंकवाद के खात्मे के लिए पाकिस्तान से युद्ध आवश्यक नहीं

- ओम थानवी

उड़ी हमले के परिप्रेक्ष्य में एक अनुभवी और जिŢम्मेदार नागरिक ने - जो मेरे मित्र भी हैं - अपने विचार मुझसे साझा किए हैं। उनका कहना है कि इस विकट घड़ी में जुमलों, राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों और उन्मादी मीडिया के विलाप से हटकर विवेक बनाए रखने की चरम आवश्यकता है; ‘युद्ध केवल और केवल अंतिम उपाय है, तभी जब बाकी सभी तरीके विफल हो चुके हों’। मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। वे अपना नाम नहीं देना चाहते, पर उनकी बात मुझे इतनी सारगर्भित और अहम लगी कि उनकी सम्मति से उनका मजमून आपसे जस-का-तस साझा कर रहा हूँ:

1. खयाल करें, पंजाब, असम, मिजोरम आदि में आतंकवाद पाकिस्तान पर हमले के बगैर काबू किया गया था।

2. कश्मीर में भी पिछले साल तक हालात काफी सामान्य हो गए थे। घाटी पर्यटकों से भरी थी और पिछले पाँच साल में घाटी में आतंकवादी घटनाएँ बहुत ही कम हो गई थीं।

3. आतंकवाद को पालने-पोसने के कारण पाकिस्तान आज एक विफल राष्ट्र है।

4. आतंकवाद पालना किसी भस्मासुर को पैदा करने जैसा है। पाकिस्तान में आए दिन बम विस्फोट और आतंकवादी हमले जगजाहिर हैं।

5. कभी भारत ने भी भस्मासुर पालने की कोशिश की थी। भिंडरावाले और एलटीटीई के रूप में। उसकी हमने भारी कीमत अदा की ।

6. यह बात अपनी जगह सही है कि जब बात सुरक्षा और राष्ट्रहित की हो, तो कई बार युद्ध जरूरी हो जाता है।

7. पिछले सत्तर सालों में सैन्य शक्ति का विकास, परमाणु शक्ति, मिसाइलों का विकास, युद्धपोतों, पनडुब्बियों, उपग्रहों, राकेटों आदि की प्रगति युद्ध की तैयारी का ही हिस्सा है।

8. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि युद्ध केवल और केवल अंतिम उपाय है। तभी जब बाकी सभी तरीके विफल हो चुके हों।

9. आतंकवाद को पालने और समर्थन देने के कारण ही आज पाकिस्तानी पासपोर्ट को पूरी दुनिया में शक की नजर से देखा जाता है।

10. अपने नैतिक स्टैंड और आर्थिक, शैक्षिक तरक़्की की वजह से ही भारतीय पासपोर्ट की पूरी दुनिया में इज्जत है और भारतीय न सिर्फ़ दूसरे देशों में आराम से रह रहे हैं, बल्कि सम्मान भी पाते हैं।

11. यदि सिर्फ़ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जवाबी तरीके अपनाए गए, तो विश्व में भारतीय पासपोर्ट के प्रति क्या नजरिया पनपेगा, खास तौर पर तब जब पूरी दुनिया हिंसा और आतंकवाद से त्रस्त है?

12. पाकिस्तान आज भारत से बहुत पीछे है। भारत की यह तरक़्की ही हमारी असली विजय है।

13. पाकिस्तान की तमाम कोशिशें भारत की इस तरक़्की को रोकने के लिए हैं। इसलिए जो भी जवाबी कार्रवाई हो, वह विकास के इस सफर को न तो ब्रेक लगाए, न पीछे की और मोड़े।

14. यदि जवाबी कार्यवाही के चलते भारत के विकास को भारी नुकसान हुआ तो पाकिस्तान हार कर भी जीत जाएगा।

15. पाकिस्तान की 'हम तो डूबे हैं सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे' की नीति को सफल होने का मौका नहीं देना चाहिए।

16. पिछले सात आठ सालों से भारत की स्पेशल फोर्स चुपचाप बदला लेती रही है। सौरभ कालिया और उसके साथियों का बदला भी इसी तरह लिया गया था। हाँ, वह सब मीडिया और जनता से साझा नहीं किया जाता था, क्योंकि राष्ट्रहित में की गई हर कार्यवाही जनता को दिखाने के लिए नहीं की जाती।

17. लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए बहुत सी बातें कही जाती हैं और भावनाएँ उभारी जाती हैं। वह सब लोकतांत्रिक खेल का हिस्सा है। लेकिन राष्ट्रीय हित के सामरिक फैसले न तो चुनावी बातों के बंधक हो सकते हैं, न भीड़तंत्र से निर्देशित हो सकते हैं, न भावनाओं के वशीभूत हो सकते हैं।

18. निपट शक्ति प्रदर्शन से न तो अमेरिका जैसा देश इराक, अफगानिस्तान, सीरिया आदि पर पूरा नियंत्रण कर सका है, न ही इजरायल कभी फिलिस्तीन को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर सका है।

19. हाँ, भारत जरूर अपने कई हिस्सों से आतंकवाद का पूरी तरह खात्मा करने में कामयाब हुआ है। हमारा अनुभव और रेकार्ड दूसरे देशों से कहीं बेहतर रहा है। आज जरूरत अपने सफल अनुभवों को समझने की है।

20. सामरिक फैसले जनता की राय से नहीं, जानकारों से मशविरे के बाद किए जाते हैं। ये जानकार सिस्टम के भीतर भी होते हैं और पुरानी सरकारों के नुमाइंदे भी इस मशविरे में साथ लिए जा सकते हैं ।

21. राष्ट्रहित के मामलों में सरकार को भीड़तंत्र के दबाव से मुक्त रखना खुद सरकार की, विपक्ष की और मीडिया की - सबकी - सामूहिक जिŢम्मेदारी है, ताकि निर्णय विवेक से, सलाह से और जानकारों की सहमति से हो। और जब ऐसा फैसला हो जाए तो सब एकजुट, चट्टान की तरह खड़े हों।

22. सबसे पहले, इस घड़ी में, देश में अंदरूनी एकता के लिए सामाजिक विभेद और तनाव को कम करने की हर सम्भव कोशिश होनी चाहिए।

23. और अंत में: यह हमेशा याद रखें कि पिछले सत्तर साल में भारत ने हर अंदरूनी-बाहरी चुनौती का सफलता से मुकाबला किया है। इन सत्तर सालों में भारत बिखरा नहीं, बल्कि इसने मजबूती और एकजुटता से उन्नति की है । यकीन रखें कि नारों, चुनावी आरोपों-प्रत्यारोपों और उन्मादी मीडिया के विलाप से परे भारत एक सशक्त और सफल राष्ट्र है। जय हिंद।(ओम थानवी "जनसत्ता" के पूर्व संपादक हैं। यह आलेख हम उनके फ़ेसबुक अकाउंट से साभार प्रकाशित कर रहे हैं)

जनता तो सवाल पूछेगी ही मिस्टर पीएम

अपनी बात : कौन है निर्दोष भारतीय सैनिकों की हत्या का जिम्मेवार?

दोस्तों, यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके अंधभक्तों को बुरी लग सकती है। लेकिन सच्चाई यही है। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि केवल चार आतंकी पूरे आर्मी बेस को तबाह कर दें। ऐसा केवल फ़िल्मों में ही होता आया है। लेकिन दुर्भाग्य से रविवार को जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर स्थित आर्मी के कैंप बेस में यही हुआ। अब इस मामले में गलती किसकी थी और आर्मी इंटेलिजेंस के वे कौन लोग थे जिनके कारण इतनी बड़ी चूक हुई, इसकी जानकारी भारतीय जनता को कभी नहीं मिलेगी। वजह यह कि कोई चाहकर भी भारतीय फ़ौज से जानकारी नहीं ले सकता है।

खैर देश के राजा नरेंद्र मोदी हैं। उनके ही कबीना के मंत्री गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार मंत्रिमंडल का सदस्य रहते हुए एक बार कहा था कि ताली सरदार को तो गाली भी सरदार को। इस कारण भी जवाबदेही नरेंद्र मोदी की बनती है। इसके अलावा नरेंद्र मोदी वही शख्स हैं जो पीएम बनने से पहले एक-एक भारतीय जवान के बदले पांच-पांच पाकिस्तानियों का सिर काटने का दंभ भरते थे। हालांकि उरी आतंकी हमले के बाद ट्वीट करते हुए नरेंद्र मोदी ने कड़े फ़ैसले लेने की बात कही है। दूसरी ओर उनके अंध समर्थक पारंपरिक और सोशल मीडिया में उन्हें तरह-तरह से सीधे-सीधे पाकिस्तान पर हमला करने को उकसा रहे हैं।

निश्चित तौर पर भारतीय सैनिकों की जान गयी है। पूरा देश मर्माहत है। लेकिन जज्बात के आगोश में बहने से पहले यह तो विचार किया ही जाना चाहिए कि आज जो जम्मू-कश्मीर में हालात हैं, उनके लिए कौन जिम्मेवार हैं? क्या ऐसे ही हमारे देश के सैनिक जान गंवाते रहेंगे? वहीं लगे हाथ यह भी विचार किया जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर की जनता में जो असंतोष बड़ी तेजी से बढता जा रहा है, उसका समाधान क्या हो?

कभी-कभी तो हंसी आती है यह सोचकर कि हम ऐसे देश के वासी हैं, जहां सत्ता के शीर्ष पर बैठने वाले अपनी आत्मा के साथ-साथ देश भी बेच डालते हैं। इस तल्ख टिप्प्णी की वजह यह है कि आजादी के बाद से लेकर आजतक भारत की तरफ़ से यह कहा जाता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है लेकिन जम्म-कश्मीर के लोगों को खुले दिल से अपनाने की कोई पहल नहीं की गयी। लगभग हर हुकूमत ने इस विवाद को जिंदा रखा है। नरेंद्र मोदी का विशेष उल्लेख इसलिए कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने की बात कहकर पीएम बनने की अपनी मुहिम की शुरुआत की थी। धारा 370 ही वह धारा है जिसके तहत भारत में जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है।

बहरहाल हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि झेलम और गंगा दोनों नदियों का पानी बहुत बह चुका है। पाकिस्तान अब वह पाकिस्तान नहीं रहा जिसपर सीधे हमला बोलकर उसे परास्त किया जा सकता है। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। यदि युद्ध की नौबत आयी तो खामियाजा दोनों देशों के लोगों को भोगना पड़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है जब भारत को पूरी संवेदनशीलता के साथ कश्मीर विवाद को सुलझाने की पहल करनी चाहिए और यह केवल बातचीत के जरिए ही संभव है। पाकिस्तान पर हमला कर तो बिल्कुल भी नहीं। यह बात पाकिस्तानी हुक्मरानों को भी गांठ बांध लेनी चाहिए।

अपनी बात : पक्ष या विपक्ष का दलाल नहीं बने मीडिया

दोस्तों, बात केवल बिहार की नहीं है। दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल ने इन्डियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता को लेकर ओछी टिप्पणी की है कि यदि उन्हें राजनीति करनी है तो खुलकर करनी चाहिए। कम से कम पत्रकारिता को गंदा न करें। जबकि शेखर गुप्ता ने केवल इतना ही लिखा था कि दिल्ली में सरकार के तमाम दावों के बावजूद लोगों की मौतें मलेरिया, चिकुनगुनिया आदि रोगों के कारण हो रही हैं। यह पूरे परिदृश्य का एक पक्ष है।

दूसरा पक्ष बिहार से लिजीये। पूर्व सांसद शहाबुद्दीन को हाईकोर्ट से मिली जमानत के बाद बिहार की राजनीति में भूचाल तो आ ही गया है और इस भूचाल की असली वजह मीडिया की कारिस्तानी है। कारिस्तानी इसलिए कि बुधवार को पहले एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक व्यक्ति को मो शहाबुद्दीन के साथ दिखाया गया, जिसपर पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या का शक जताया गया है। इसके बाद बिहार की राजनीति उस समय गरमा गयी जब एक और फ़ोटो वायरल हुआ। नयी तस्वीर में वही व्यक्ति जिसका नाम मो कैफ़ बताया जा रहा है, स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव को बुके भेंट कर रहा है। फ़ोटो वायरल होने का सिलसिला यहीं नहीं रुका। शाम होते-होते एक और तस्वीर वायरल हुई, जिसमें मो कैफ़ राजदेव रंजन के साथ एक समारोह में शामिल था।

जैसे-जैसे फ़ोटो वायरल हुए मीडिया का रुख बदलता रहा। लेकिन जब आखिरी तस्वीर सामने आयी तब अधिकांश मीडिया वालों ने अपनी आंखें बंद कर लीं। जाहिर तौर पर यह इस कारण भी हुआ क्योंकि मीडिया का पक्षपाती चेहरा जगजाहिर हो चुका था और उसके पास स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के इस कथन का कोई जवाब नहीं था कि उनसे मिलने वालों की संख्या रोजाना बहुत अधिक होती है और हर व्यक्ति का बायोडाटा रखना संभव नहीं है। तेज प्रताप यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक पोस्ट मीडिया और विपक्ष के नेताओं के मुंह पर दे मारा। अपने पोस्ट में उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी की तस्वीर साझा की जिसमें वे एक सेक्स रैकेट चलाने के आरोपी से बधाई स्वीकार कर रहे हैं।

खैर, यह कहना गलत नहीं है कि बिहार में मीडिया और देश में मीडिया में कोई खास अंतर नहीं है। इसकी वजह भी है। देश की अधिकांश मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों पर अम्बानी समूह का कब्जा है, जिसे केवल दो ही काम आते हैं। पहला पीएम नरेंद्र मोदी का गुणगाण करना और दूसरा देश में आरएसएस के एजेंडे को आगे बढाते हुए रोजाना हिन्दू-मुसलमान के बीच खाई बढाना। बिहार में वहीं मीडिया सीधे उलट जाती है। बिहार सरकार उसे विलेन नजर आती है और विपक्ष सच्चा संत।

बहरहाल यह भी महत्वपूर्ण है कि मीडिया लोगों में परसेप्शन को बढाता है। शहाबुद्दीन के बाद जिस तरह की खबरें हवा में छोड़ी जा रही हैं, उनसे तो यही लगता है कि देश में कोई न्यायालय नहीं है। कम से कम बिहार में तो न्यायपालिका बिहार सरकार की दासी है। आश्चर्य यह भी कि जो लोग आज न्यायपालिका को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं, वहीं उस समय जश्न मना रहे थे जब पटना हाईकोर्ट ने बिहार के कसाई ब्रहमेश्वर मुखिया को बरी करने का आदेश दिया था। इसके बाद जश्न उस समय भी मनाया गया जब कोर्ट ने लालू प्रसाद को चारा घोटाले में दोषी करार दिया। जश्न मनाने का सिलसिला हर बार जारी रहा जब विभिन्न नरसंहारों के आरोपियों को बाइज्जत बरी किया गया।

अपनी बात : शहाबुद्दीन अपराधी है मसीहा, तय करे जनता

दोस्तों, वहीं हुआ जिसकी संभावना उसी दिन से जताई जा रही थी, जब पटना हाईकोर्ट ने पूर्व सांसद व तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मामलों में आरोपी शहाबुद्दीन को जमानत दे दी। जमानत मिलने के साथ ही यह तय हो गया था कि शहाबुद्दीन जेल से बाहर आएगा। शनिवार की सुबह उसे छोड़ा गया और जेल के बाहर हजारों लोगों ने उसका आगे बढकर स्वागत किया। हजारों की भीड़ किसी अपराधी के लिये फ़ूलों का हार लिये खड़ी हो, ऐसी दृश्य की कल्पना की जा सकती है। यदि सचमुच ऐसा ही हो तो सवाल केवल अपराधी होने तक सीमित नहीं हो सकता है। यह बात तो दावे के साथ कही जा सकती है। अलबत्ता यह संभव है कि जिस व्यक्ति का इतना शानदार स्वागत किया जा रहा हो वह समाज के एक तबके के लिए मसीहा और दूसरे तबके के लिए विलेन हो। Read More>>>

कहानी के आगे की कहानी : "शराब" का दारोगा

- नवल किशोर कुमार

दोस्तों, प्रेमचंद ने लिखा था - नमक का दारोगा। जब उन्होंने यह लिखा था तब देश में नमक बनाने के लिए हुकूमत से अनुमति लेनी पड़ती थी और बदले में लगान भी देना पड़ता था। यानी उन दिनों नमक तक पर हम भारतीयों का अधिकार नहीं था। बाद में महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह शुरु किया। प्रेमचंद गांधी जी के सत्याग्रह-वत्याग्रह से अलग उस समय सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और समाज में भ्रष्टाचार की मान्यता पर सवाल उठाते हैं। उनकी कहानी के मूल में वंशीधर है जो नमक का दारोगा है। नमक की तस्करी के आरोप में एक दिन वह पंडित आलोपीदीन को पकड़ता है और कोर्ट में आरोप साबित करने में हार जाता है। परिणाम यह होता है कि वह अपनी नौकरी छोड़ कर अपने घर चला जाता है। इसके बाद की कहानी भी आप सभी जानते ही हैं।

 

बिहार में इन दिनों "शराब का दारोगा" लिखा तो नहीं जा रहा है लेकिन इसे सचमुच पैदा किया जा रहा है। दारोगाओं के दारोगा हैं के के पाठक। वहीं के के पाठक जिन्होंने सचिवालय में पंडों के माथे पर टीका देखकर बवाल काटा था और कटवाया भी था। जिस विभाग में रहे, उल्लेखनीय काम किया। लेकिन यह भी सच्चाई है कि हर विभाग से वे बड़े बेआबरु होकर बाहर निकले। कई बार निकाले भी गये।

 

इस बार उन्होंने खुद वह महकमा छोड़ दिया है जिसके जिम्मे बिहार को शराब मुक्त बनाने की जिम्मेवारी है। इसे भी अजीब संयोग ही कहिए कि जिस सख्त कानून को बनाने के लिए के के पाठक ने दिन-रात एक कर दिया। तमाम तरह की आलोचनायें झेलीं, वह विधानमंडल की स्वीकृति के बाद राज्यपाल के ठंढे बस्ते से अंततोगत्वा सजीव बाहर आया। लेकिन के के पाठक नहीं रहे।

 

इसके मूल में भी एक आलोपीदीन है। वह भी मुख्यमंत्री के गृह जिले के हरनौत का। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि वह जदयू का नेता है। यानी एक तो रसगुल्ला और उसपर क्रीम से भरपूर। नालंदा के शराब वाले दारोगा ने सूबे के शराब दारोगा के कहने पर जदयू नेता के घर में छापेमारी कर दी। कुल 68 बोतलें अंग्रेजी शराब मिलीं।

 

मामला इतना आसान नहीं था। शिकायत सूबे के राजा तक पहुंची। राजा ने शराब के मुख्य दारोगा को डांटा। साथ ही काउंटर केस के जरिए नालंदा वाले दारोगा को भी गिरफ़्तार कर लिया गया। उस पर साजिश के तहत कार्रवाई का आरोप लगाया गया। वह तो गनीमत रही कि कोर्ट ने उसे जमानत दे दी, वर्ना यह लोकतांत्रिक इतिहास में पहली घटना साबित होती जब जुर्म करने वाला और पकड़ने वाला दोनों जेल में बंद होते। न्यायपालिका ने इंसाफ़ की लाज रख ली।

 

इस पूरी घटना ने शराब के दारोगा के के पाठक की आंखें खोल दी। पहले एक सप्ताह के लिए छुट्टी पर गये और फ़िर दस दिनों के लिए। फ़िलहाल जो बात सामने आ रही है, वह यह कि जिस प्रकार प्रेमचंद के आलोपीदीन ने वंशीधर को मनाने की सफ़ल कोशिश की थी, के के पाठक को भी मनाने की कोशिशें की जा रही हैं। जबकि पाठक टस से मस नहीं हो रहे। फ़िलहाल इस मामले में क्लाइमेक्स बाकी है।

 

बहरहाल शराब का दारोगा कहानी का एक भाग पूरा हो चुका है। आलोपीदीन की पहचान को लेकर संकट है। सवाल यही है कि आज का आलोपीदीन कौन है? हरनौत का जदयू नेता या फ़िर सूबे का राजा, जिसने पूरे बिहार को शराब मुक्त बनाने का संकल्प ले रखा है?

खास खबर : शहाबुद्दीन की रिहाई से दहशत की असली वजह

दोस्तों, राजनीति का अपराधीकरण  क्यों और कब से शुरू हुआ और इसकी वर्तमान स्थिति क्या है, इस प्रश्न का जवाब लगभग सभी पार्टियों के पास नहीं है। लेकिन यह पहली बार नहीं हो रहा है कि संगीन मामलों में जेल में बंद रहने वाले व्यक्ति ने लोकतांत्रिक राजनीति में अपने आपको स्थापित किया है। मधेपुरा सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, वैशाली सांसद रामाकिशोर सिंह और कुख्यात सुरजभान सिंह जैसे राजनेताओं की इस सूची में मो. शहाबुद्दीन भी एक नाम है। करीब 12 वर्ष जेल में गुजारने के बाद उन्हें जमानत पर रिहाई मिली है। जाहिर तौर पर इसके राजनीतिक मायने हैं और उनके बाहर रहने पर राजनीतिक असर का होना भी लाजमी ही है।

इसकी वजह यह है कि शहाबुद्दीन सबसे पहले वर्ष 1996 में सीवान के सांसद चुने गये थे। तब जनता दल उम्मीदवार के रूप में उन्होंने भाजपा के जनार्दन तिवारी को हराया था। इस चुनाव में शहाबुद्दीन को 52.56 फीसदी वोट मिले थे। जबकि इसके पहले वर्ष 1991 में जनता दल के बृषिण पटेल जीते थे और तब उन्होंने जनता पार्टी के उमाशंकर सिंह को हराया था। दोनों के बीच 145892 वोटों का अंतर था।

वर्ष 1996 में सांसद बनने के बाद शहाबुद्दीन ने तबतक हार का मुंह नहीं देखा जबतक कि उन्हें जेल नहीं भेज दिया गया। मसलन वर्ष 1998 में उन्होंने भाजपा के विजय शंकर दूबे को हराया था। इस चुनाव में दोनों के बीच 120484 वोटों का अंतर रहा। वहीं वर्ष 1999 में शहाबुद्दीन ने सीपीआई एमएल के अमर नाथ यादव को हराया था और दोनों के बीच वोटों का अंतर 129840 था। शहाबुद्दीन ने वर्ष 2004 में भी अपनी जीत सुनिश्चिित की। इस चुनाव में उन्होंने जदयू के ओम प्रकाश यादव को परास्त किया और दोनों के बीच अंतर 103578 वोटों का रहा।

लेकिन बिहार में सत्ता बदलते ही शहाबुद्दीन पर शिकंजा कसा और उन्हें जेल भेज दिया गया। उनके उपर कई संगीन मामले लंबित थे। उनके जेल जाते ही सीवान पर उनका कब्जा खत्म हो गया। हालत यह हो गयी कि वर्ष 2009 में निर्दलीय ओम प्रकाश यादव ने शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब जो राजद की उम्मीदवार थीं, उन्हें 63430 वोटों के अंतर से पराजित कर दिया। शहाबुद्दीन की अनुपस्थिति का असर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी दिखा। निर्दलीय के बाद भाजपा के टिकट पर ओम प्रकाश यादव ने हिना शहाब को एक बार फिर 113847 मतों के अंतर से हराया।

बहरहाल, मो. शहाबुद्दीन के जेल से बाहर आने पर सीवान के राजनीतिक समीकरण बदलेंगे। साथ ही इसका असर अन्य पड़ोसी जिलों पर भी पड़ेगा। इस संभावना से न तो आंकड़े इन्कार करते हैं और न ही सूबे में चल रहा मौजूदा राजनीतिक समीकरण। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि मधेपुरा में जेल से बाहर निकलने के बाद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के कारण हुआ। श्री यादव ने शरद यादव जैसे धाकड़ नेता तक को पिछले दरवाजे से संसद पहुंचने पर मजबूर कर दिया। अब बारी शहाबुद्दीन की है।

संपादकीय : औद्योगिक विकास की शर्त्तें

दोस्तों, एक बार फ़िर बिहार सरकार ने सूबे में औद्योगिक विकास को लेकर नयी नीति का निर्धारण कर दिया है। हालांकि नयी और पूर्ववर्ती नीति में बहुत अधिक बदलाव नहीं किये गये हैं। लेकिन इसके बावजूद यदि उम्मीद बनती दिख रही है तो इसकी वजह बिहार सरकार द्वारा शुरु की गयी स्टार्ट अप योजना है। इस योजना के तहत राज्य सरकार 500 करोड़ रुपए का फ़ंड बनायेगी, जिसका उपयोग नये उद्यमियों को उद्यम स्थापित करने में मदद करना होगा। इसके अलावा नयी औद्योगिक नीति में महिलाओं को विशेष प्राथमिकता दिया जाना भी सराहनीय पहल माना जा सकता है। बशर्ते कि राज्य सरकार का तंत्र अपनी कार्य संस्कृति में बदलाव लाते हुए पूरी गंभीरता से अमल करे।

अब यदि औद्योगिक विकास की बातें करें तो मौजूदा राज्य सरकार को यह समझना पड़ेगा कि यह प्रोफ़ेशनल युग है। वह दौर चला गया जब देश में उत्पादकों के बीच प्रतिस्पर्धा नाम मात्र की हुआ करती थी। अब विश्व स्तर के उत्पाद बिहार के सुदूर ग्रामीण इलाकों तक में सहज ही उपलब्ध हैं। इसलिए इस बात का विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए कि बिहार में केवल वे उद्यम ही स्थापित किये जायें जिनका मानक अंतरराष्ट्रीय मानक के समकक्ष हो। राज्य सरकार को इसमें बड़ी भूमिका का निर्वहन करना पड़ेगा। दूसरी सबसे अहम शर्त है पूर्व के नकली उद्यमियों से बिहार को मुक्ति दिलाना। आज बिहार के अधिकांश औद्योगिक क्षेत्रों के भूखंडों पर वैसे लोग काबिज हैं जिनका उद्यम से कोई लेना-देना नहीं है। कम कीमत में बेशकीमती जमीनें लेकर ये नकली उद्यमी औद्योगिक विकास के सबसे बड़े बाधक हैं। इनके कारण नये उद्यमियों को राज्य सरकार जमीन उपलब्ध नहीं करा पाती है। आज हालत यह है कि यदि कोई पटना औद्योगिक क्षेत्र में कोई उद्यम लगाना चाहे तो कोई भूखंड उपलब्ध नहीं है। कुछ भूखंड उपलब्ध भी हैं तो वे उन इलाकों में हैं जहां परिवहन और कानून-व्यवस्था आज भी यक्ष प्रश्न हैं।

खैर राज्य सरकार ने कलस्टर निर्माण को लेकर संजीदगी का प्रदर्शन किया है। अधिकांश कलस्टर कृषि पर आधारित हैं। लेकिन इसमें एक प्रोफ़ेशनल एप्रोच का अभाव भी दिखता है। वजह यह है बिहार केवल कृषि प्रधान राज्य ही नहीं बल्कि मानव संसाधन प्रधान राज्य भी है। जब हमारे यहां के मजदूर देश के अन्य राज्यों में गैर कृषि आधारित औद्योगिक इकाइयों को बुलंदी पर पहुंचा सकते हैं तो वे अपने राज्य में ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं। इसलिए केवल यह कहा जाना कि बिहार में कृषि आधारित उद्योग ही संभव हैं, सरासर बेवकूफ़ी है। सरकार को इस तरह की बेवकूफ़ी से बचना चाहिए।

 

संपादकीय : कश्मीर का सवाल और देसी हिटलर

दोस्तों, कल्पना करिए कि कोई आपकी एक आंख फ़ोड़ दे और वह हर समय आपके सामने रहे तो आपके मन में क्या विचार आयेंगे? आपके घर में घुसकर आपके परिजनों के साथ हथियार के बल बलात्कार करने वाले आपके इर्द-गिर्द मौजूद रहे तो आप कैसा व्यवहार करेंगे? इन सवाल को थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर बात करें तो कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। यह कहावत अब बहुत पुरानी और बेमतलब की हो चुकी है। यह जुमला भारतीय शासकों द्वारा शेष भारत के वाशिंदों को जम्मू-कश्मीर से जोड़े रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। आज भी दिल्ली में बैठी सरकार का हर नुमाइंदा यहीं कहता है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।

असल में देश को आजाद हुए अब लंबा समय बीत चुका है और इतने लंबे समय में भी यदि भारत कश्मीर मुद्दे का समाधान नहीं कर पाया है तो इसके पीछे राजनयिक विफ़लता ही कही जाएगी। फ़िलहाल सच्चाई यह है कि कश्मीर आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है और वहां अबतक का सबसे लंबा कर्फ़्यू जारी है। वह भी तब जबकि जम्मू-कश्मीर में वहीं भाजपा सत्ता में साझेदार है जो दिल्ली में बैठकर पूरे देश पर राज कर रही है और उसकी बुनियाद में ही धर्म के नाम पर देश को बांटना है।

दरअसल जम्मू-कश्मीर की समस्या आज की नहीं है। जब देश आजाद हुआ था तभी स्वर्ग से सुन्दर इस घाटी पर विवाद चल रहा है। उस समय वहां के राजा हरि सिंह हिन्दू थे और रियाया में अधिकांश मुसलमान। हरि सिंह स्वयं चाहते थे कि जम्मू और कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहे। जबकि पाकिस्तान उसे हड़पने की कोशिश कर रहा था और दूसरी ओर भारत की भी यही मंशा थी। लेकिन जवाहर लाल नेहरु ने कुटनीतिक चाल चलते हुए जम्मू-कश्मीर को पूर्णतः स्वतंत्रता को प्रदान नहीं कि लेकिन धारा 370 के जरिए उसे देश के अन्य राज्यों से पृथक जरुर कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हरि सिंह ने भारत सरकार के साथ समझौता कर लिया।

अब जो विवाद है उसके मूल में कश्मीरियों की वही तड़प है। एक ओर पाकिस्तानी हुक्मरान कश्मीर हड़पने की अपनी लालसा का त्याग नहीं कर सके हैं और दूसरी ओर हिन्दुस्तान भी कश्मीरियों को आश्वस्त नहीं कर सका है कि वह उनका पूरा ख्याल रख सकेगा। असलियत यही है कि दोनों मुल्कों को कश्मीर से मतलब है न कि कश्मीरियों से। नतीजा सामने है। कश्मीर में परिस्थितियां विषम से विषमतर होती जा रही है। एक तबका वह है जिसके लिए कश्मीर की आजादी का मतलब पाकिस्तान का हिस्सा होना है। वहीं उससे भी बड़ा तबका वह है जिसने जम्मू-कश्मीर में हुए चुनावों में हिस्सा लिया है और उसे भारतीय लोकतंत्र में पूरी तरह आस्था है लेकिन वह इस बात से नाराज है कि कश्मीर को देश के अन्य राज्यों के जैसा न तो सम्मान हासिल है और न ही विकास के समान अवसर। वह चाहता है कि कश्मीर में भारतीय फ़ौज का का आतंक खत्म हो जाय। विकास के अवसर मिलें। ऐसा चाहने वालों की बड़ी आबादी है जिसे मानवीय दृष्टिकोण से गलत नहीं कहा जा सकता है।

अब सवाल उठता है कि इसका समाधान क्या है। क्या भारत को कश्मीर पर से अपना दावा खत्म कर देना चाहिए? यदि ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर कश्मीर पर पाकिस्तान का नियंत्रण हो जाएगा और वह केवल कश्मीर भर से ही खामोश नहीं रहेगा। वजह यह है कि दोनों देशों की सियासत में एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी एक बड़ा फ़ैक्टर है। फ़िर समाधान क्या है? यह सवाल देश के शासकों को है। लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि आज कश्मीर के हालात के लिए केंद्र में बैठी सरकार ही जिम्मेवार है। वजह यह कि आरएसएस और भाजपा ने ही कश्मीर की स्वायत्ता पर सबसे अधिक सवाल उठाये हैं। अब जवाब भी उसे ही देना चाहिए। खास बात यह है कि जम्मू-कश्मीर देश का वह राज्य है जहां मुसलमान सबसे अधिक हैं। ऐसे में वहां की बहुसंख्यक आबादी की बातों को सुने-समझे बगैर कोई समाधान संभव ही नहीं है। कम से कम पैलेट गनों के जरिए उनकी आंखें फ़ोड़ने, उनकी बहू-बेटियों की इज्जत लूटने से तो बिल्कुल ही नहीं।

जगदेव बाबू की हत्यारों की हो पहचान

दोस्तों, जगदेव बाबू बिहार की राजनीति में तब थे जब सामंती ताकतें शीर्ष पर थीं। समाज में दलित या पिछड़ा होना किसी अभिशाप से कम नहीं था। मुंह खोलने की आजादी नहीं थी। जगदेव बाबू ने उन दिनों कहा था : अबकी सावन भादो में, गोरी कलाईयां कादो में। कल्पना करिए कि जब उन्होंने यह बात कही होगी तब सामंती ताकतों की प्रतिक्रिया क्या रही होगी। हालांकि सामंती ताकतों ने जगदेव बाबू की हत्या कर दी। कसूरवार कौन था, आजतक बिहार पुलिस ने खुलासा नहीं किया।

जगदेव बाबू यह जानते थे और शायद यही वजह रही कि वे यह कहते थे कि आज जो मैं काम कर रहा हूं, उसका दूरगामी असर होगा। पहली पीढी को लोग मारे जायेंगे। दूसरी पीढी के लोग जेल भेजे जायेंगे और तीसरी पीढी राज करेगी। यही हुआ भी। जगदेव बाबू की हत्या हुई। लालू प्रसाद जेल भेजे जा चुके हैं और अब तीसरी पीढी राज कर रही है।

इन सबके बीच महत्वपूर्ण यह है कि क्या जगदेव बाबू के हत्या किसने की, इस सवाल का जवाब नहीं खोजा जा सकता है? संभव है कि जिस किसी ने वंचित समाज के सबसे बड़े नेता को मौत के घाट उतारा, वह स्वयं काल के गाल में समा गया हो। लेकिन यदि इस बात का खुलासा हो जाये तो संभव है कि सामंती ताकतों का षडयंत्र वंचितों के समझ में आये और वे सामंती ताकतों का पुरजोर विरोध करें। फ़िलहाल तो हो यह रहा है कि जगदेव बाबू का नाम जपने वालों में वे भी शामिल हैं जो उनकी हत्या के लिए जिम्मेवार थे।

राजनीति नही, बाढ पर हो तथ्यपूर्ण वास्तविक चिंतन : जगदानंद

बाढ के संबंध में बात करने का आधार यदि भावनात्मक हो तो कुछ भी कहा जा सकता है लेकिन यदि वास्तविक तथ्य के आधार पर बात करें तो बिहार और बाढ दोनों एक-दूसरे से अपरिचित नहीं हैं। जब हम बाढ की बात करते हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि बाढ की असली परिभाषा क्या है। किसी भी नदी में बाढ तो तब आती है जब नदी में आने वाला पानी उसकी संग्रहण क्षमता से अधिक हो। मैं यह मानता हूं कि बिहार जैसे राज्य के लिए बाढ का आना उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितना कि यहां की नदियों में पानी का अभाव। Read More>>>

शिक्षा दिवस के अवसर पर कड़वा सच

दोस्तों, भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सवर्णों का कब्जा आजादी के करीब सात दशक बाद भी यदि बरकरार है तो इसके पीछे लंबी साजिश है। वहीं साजिश जिसकी बुनियाद मनुस्मृति है और तुलसीदास ने भी लिखा - समरथ को नहिं दोष गुसाईं। तुलसीदास ने रामायण इसलिए नहीं लिखा था कि उसे अपनी पत्नी से विरक्ति और राम से लगाव हो गया था। यदि कबीर ने अपनी रचनाओं से उस समय के समाज में उथल-पुथल नहीं मचाया होता तो तुलसीदास को अवधी में रामायण लिखने की जरुरत ही नहीं पड़ती। बाकी तो सब जैसे कहानियां हैं और हर कहानी में वहीं साजिश।

इसी साजिश के बू्ते ब्राह्म्णवर्ग आज भी अपनी राजनीतिक और सामाजिक सत्ता को बचाये रखने में कामयाब हो रहा है। जबकि बहुसंख्यक बहुजन आज भी शोषण झेल रहे हैं। एक उदाहरण डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है, जो भारत के राष्ट्रपति हुए। इनकी होशियारी का प्रमाण यह कि ये जब देश के शिक्षा मंत्री हुए तब इन्होंने अपने जन्मदिन को शिक्षा दिवस के रुप में घोषित कर दिया। जबकि इसके ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हैं कि एक सिवाय गीता के अंग्रेजी रुपांतरण के उन्होंने कुछ नहीं किया।

खैर यह परंपरा के विरुद्ध है कि किसी भी व्यक्ति की मरणोपरांत आलोचना की जाय, वह भी उसकी जयंती के दिन। लेकिन बहुजन जो अभी भी अंधकार में हैं, उन्हें ब्राह्म्ण वर्ग की साजिश के बारे में बताना और जागरुक करना हमारा उद्देश्य है। इसलिए आज का कड़वा सच नेशनल दस्तक के संपादक महेंद यादव ने लिखा है। उनका यह आलेख हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं। - नवल, संपादक

जिसके नाम पर शिक्षा दिवस, उसी ने की थी शिक्षा की अनोखी चोरी

- महेंद्र यादव

भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे राधाकृष्णन की सारी प्रसिद्धि उनकी पुस्तक इंडियन फिलॉसॉफी के कारण है। आपको यह जानकारी हैरानी होगी कि ये दोनों भाग चुराए गए थे। राधाकृष्णन के लिखे नहीं थे।

मूल रूप से वह एक छात्र जदुनाथ सिन्हा की थीसिस थी। राधाकृष्णन उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। थीसिस उनके पास चेक होने आई थी. उन्होंने थीसिस पास करने में दो साल की देरी कर दी। बड़े प्रोफेसर थे, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया।

 

इन्हीं दो सालों में उन्होंने इंग्लैंड में अपनी किताब इंडियन फिलॉसॉफी प्रकाशित करवाई, जो कि उसे बेचारे जदुनाथ सिन्हा की थीसिस ही थी। उस छात्र की थीसिस से राधाकृष्णन की किताब बिलकुल हूबहू है...एक कॉमा तक का अंतर नहीं है। जब उनकी किताब छप गई तभी उस छात्र को पीएचडी की डिग्री दी गई। यानी राधाकृष्णन की किताब पहले छपी...अब कोई यह नहीं कह सकता था कि उन्होंने चोरी की। अब तो चोरी का आरोप छात्र पर ही लगता।

हालांकि जदुनाथ सिन्हा ने हार नहीं मानी। उसने कलकत्ता हाईकोर्ट में केस कर दिया। छात्र का कहना था, “मैंने दो साल पहले विश्वविद्यालय में थीसिस जमा करा दी थी। विश्वविद्यालय में इसका प्रमाण है। अन्य प्रोफेसर भी गवाह हैं क्योंकि वह थीसिस तीन प्रोफेसरों से चेक होनी थी – दो अन्य एक्जामिनर भी गवाह हैं। वह थीसिस मेरी थी और इसलिए यह किताब भी मेरी है। मामला एकदम साफ है...इसे पढ़कर देखिए...."

राधाकृष्णन की किताब में अध्याय पूरे के पूरे वही हैं जो थीसिस में हैं। वे जल्दबाजी में थे, शायद इसलिए थोड़ी बहुत भी हेराफेरी नहीं कर पाए। किताब भी बहुत बड़ी थी- दो भागों में थी। कम से कम दो हजार पेज। इतनी जल्दी वे बदलाव नहीं कर पाए...अन्यथा समय होता तो वे कुछ तो हेराफेरी कर ही देते।

मामला एकदम साफ था लेकिन छात्र जदुनाथ सिन्हा ने कोर्ट के निर्णय के पहले ही केस वापस ले लिया क्योंकि उसे पैसा दे दिया गया था। मामला वापस लेने के लिए छात्र को राधाकृष्णन ने उस समय दस हजार रुपए दिए थे। वह बहुत गरीब था और दस हजार रुपए उसके लिए बहुत मायने रखते थे। दूसरी बात, राधाकृष्णन इतने प्रभावशाली हस्ती थे कि कोई उनसे बुराई मोल नहीं लेना चाहता था। ऐसे में वास्तविक न्याय की उम्मीद जदुनाथ को नहीं रही।

राधाकृष्णन ने अपने छात्र की थीसिस चुराकर इंडियन फिलॉसफी किताब छपवाई। इसमें कलकत्ता की मॉडर्न रिव्यू में छात्र जदुनाथ सिन्हा और उनके बीच लंबा पत्र व्यवहार छपा। राधाकृष्णन सिर्फ यह कहते रहे कि यह इत्तफाक है...क्योंकि शोध का विषय एक ही था..राधाकृष्णन पर लिखी तमाम किताबों में इस विवाद का जिक्र है..एक अन्य प्रोफेसर बी एन सील के पास भी थीसिस भेजी गई थी..ब्रजेंद्रनाथ सील....उन्होंने पूरे मामले से अपने को अलग कर लिया था...बहुत मुश्किल से राधाकृष्णन ने मामला सेट किया..जज को भी पटाया...जदुनाथ को समझाया ...तब मामला निपटा..पहले तो ताव में उन्होंने भी मानहानि का केस कर दिया था...पर समझ में आ गया कि अब फजीहत ही होनी है...इसलिए कोर्ट के बाहर सेटलमेंट करने में जुट गए..बड़े बड़े लोगों से पैरवी कराई,मध्यस्थता कराई। मध्यस्थता कराने वाले एक बड़े दिग्गज श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, जो तब कलकत्ता यूनिवर्सिटी के कुलपति थे। इतने दबाव के बीच गरीब जदुनाथ सिन्हा कहां टिकते।

थीसिस चोरी के जवाब में राधाकृष्णन सिर्फ इतना ही कहते रहे कि इत्तफाक से जदु्नाथ की थीसिस और मेरी किताब की सामग्री मिलती है..तर्क वही कि स्रोत एक था, विषय एक था...आदि आदि...अपनी किताब को जदुनाथ की थीसिस से अलग साबित नहीं कर पाए...ये मॉडर्न रिव्यू में छपे जदुनाथ के लेखों और राधाकृष्णन के प्रकाशित जवाबों से स्पष्ट होता है। अदालत के बाहर मामला सेटल करा लिया लेकिन जदुनाथ सिन्हा की थीसिस और राधाकृष्णन की किताब में पूरी पूरी समानता ऑन द रिकॉर्ड है। इससे वे इन्कार कर ही नहीं सकते थे। बाद में उन्होंने प्रकाशक से मिलकर (बहुत बाद में, एकदम शुरू में नहीं) यह साबित कराने की कोशिश की, कि किताब पहले छपने के लिए दे दी थी...पर प्रकाशक ने काम बाद में शुरू किया।

यानी सामग्री उनकी किताब की वही थी जो जदुनाथ की थीसिस में थी। एक अन्य प्रोफेसर बी एन सील को भी थीसिस एक्जामिन करने के लिए दी गई थी। उन्होंने पूरे मामले से खुद को अलग कर लिया..क्या करते..राधाकृष्णन के पक्ष में बड़े बड़े लोग थे, सबसे दुश्मनी हो जाती..और अंतरात्मा ने जदुनाथ के दावे का विरोध करने नहीं दिया। नववेदांत के दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य भी जदुनाथ सिन्हा के रीडर थे,पर राधाकृष्णन से कौन टकराए।

जदुनाथ के साथ तो अन्याय हुआ, पर जब वो खुद पीछे हट गए तो मामला खत्म ..हमारी आपत्ति ऐसे व्यक्ति को भारत रत्न देने और उसके जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाने पर है। थीसिस चोर डा. सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन के जन्‍मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिन्‍हें ब्रिटिश सरकार से ठीक उसी वर्ष 'सर' की उपाधि मिली थी, जिस वर्ष भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा हुई थी। राष्‍ट्रीय आंदोलन में तो यह व्‍यक्ति पूरी तरह से नदारद था ही। 1892 में वीरभूम जिले में जन्मे जदुनाथ सिन्हा का देहांत 1979 में हुआ। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं संपादक हैं.)

जियो की कहानी, देश के डेमोक्रेटिक दलाल की जुबानी(काल्पनिक)

भाईयों एवं बहनों। भारत माता की जय। आप सभी जानते हैं कि मैं प्रधानमंत्री नहीं बल्कि प्रधान सेवक के रुप में आपकी और देश की सेवा कर रहा हूं। भारत के करोड़ों गरीबों का माथा गर्व से ऊंचा रहे, इसके लिए मैंने आगे बढकर दस लाख का सूट पहनकर ओबामा तक को दिखा दिया कि हमारे देश में गरीब जरुर हैं, लेकिन उनका दिल अमेरिकी नागरिकों से कितना बड़ा है। वे भूखों मर सकते हैं, लेकिन इज्जत नहीं गंवा सकते हैं।

 

आप सब जानते हैं कि मैं तो चाय बेचने वाले का बेटा हूं। बेचना ही मेरा काम है। जब छोटा था तो चाय बेचता था। बड़ा हुआ तो अखबार बेचने लगा। और बड़ा हुआ तो अपना जमीर बेच संघी बन गया। अब जबकि मैं आप सभी का प्रधानमंत्री हूं, देश का विकास मेरी पहली प्राथमिकता है। इसलिए सबसे पहले मैंने देश की संप्रभूता बेच दी। रक्षा के क्षेत्र में शत प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश की मंजूरी दी। इसके बाद मैंने "मेक इन इंडिया" का नारा देकर जमीन बेचने का फ़ैसला किया। विदेशी आयेंगे। वे हमारे यहां फ़ैक्ट्रियां लगायेंगे भाईयों-बहनों। इससे हमारी गरीबी दूर होगी। रही बात अपने देश के उद्यमियों की तो उनके लिए हमलोगों ने स्टार्ट अप योजना बनाया है। अभी तो वे स्टार्ट अप करेंगे। आप ही बताइये क्या मैंने गलत किया?

 

भाईयों एवं बहनों, मैंने गुजरात में दूध की नदियां बहा दी। वह गुजरात जो भूखों मरता था, आज पूरे देश का गौरव है। लोग दंगों की बात करते हैं। मैं कहता हूं वह दंगा नहीं, भारत का नवनिर्माण था। अगर दंगा नहीं होता तो क्या गुजरात ऐसा होता और क्या मैं होता।

 

विरोधी मेरी उपलब्धियों से जलते हैं भाईयों-बहनों। उन्हें क्या पता कि मैंने कावेरी-गोदावरी बेसिन में क्या कमाल किया है। ठीक है कुछ हजार करोड़ रुपए सरकारी खजाने से अंबानी भाई को दे दिया मैंने। क्या हो गया। सरकार करोड़ों लोगों को मुफ़्त में अनाज देती है। बदले में क्या मिलता है। विरोधियों को मेरे और परम आदरणीय अम्बानी जी पर सवाल उठाने से पहले खुद से पूछना चाहिए।

 

अब जियो की बारी। मुझे पता था यही होगा। लेकिन मैं आपका सेवक हूं भाईयों एवं बहनों। मैं जानता था इसलिए मैंने परम आदरणीय अम्बानी जी को कहा था कि जियो का प्रारंभ उसी दिन हो जिस दिन देश को कंगाली की राह पर ले जाने वाले वामपंथी मजदूरों के नाम पर देश में हड़ताल करेंगे।

 

लेकिन मैं डरुंगा नहीं। मुझे तो आपका सपना पूरा करना है। प्रिय अडाणी और परम आदरणीय अम्बानी जी का सपना पूरा करना है। आप भूखे रहें। कोई बात नहीं। आप बेरोजगार हों, कोई बात नहीं। आप बीमारी से मर रहे हों, कोई बात नहीं। जियो आपकी सेवा में हाजिर है। भारत डिजीटल हो रहा है। देश के महापुरुष गोलवलकर जी का सपना पूरा हो रहा है।

 

अंत में भाईयों-बहनों, अपने दोनों हाथ उठाकर जोर से बोलिये मेरे साथ - भारत माता की जय।

ताकि बाढ मुक्त बने बिहार

-बिहार भीषण बाढ़ की चपेट में है. बिहार के बारह जिले बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. जिसमे खासकर पटना, बेगुसराई, खगरिया, कटिहार और वैशाली जिले हैं. एक अनुमान के अनुसार लगभग दस लाख लोग बाढ़ से पीडित हैं. इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक नयी बहस को जन्म दिया है. उन्होंने बाढ़ के लिए फरक्का बराज को दोषी ठहराया है. Read More>>>

बीफ के मामले में भाजपाशासित राज्य आगे : मीसा, आरटीआई से खुलासा

पटना(अपना बिहार, 2 सितंबर 2016) - राजद सांसद डा. मीसा भारती ने आरोप लगाया है कि भाजपा केवल राजनीतिक लाभ के लिए गाय की राजनीति करती है। जबकि असलियत यह है कि देश में सर्वाधिक उन राज्यों में बूचड़खाने हैं जहाँ जहाँ भाजपा की सरकार है। उन्होंने कहा कि हाथी के दाँत खाने के कुछ, और दिखाने के कुछ और ही हैं। हिंदुत्व के एजेंडे का इस्तेमाल भाजपा सिर्फ चुनावों को जीतने, दलित अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के लिए और जनता को बरगला कर समाज का ध्रुवीकरण करने के लिए करती है, पर सत्ता में आते ही बिजनेस घरानों का हित देखती है और तेजी से बूचड़खाने खुलवाती है।

उन्होंने बताया कि फरीदाबाद निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता रविंद्र चावला ने केंद्रीय कृषि मंत्रालय के पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग में आरटीआई डालकर पूछा था कि किस राज्य में कितने स्लॉटर हाउस हैं। उनमें पशुओं के काटने के नियम क्या हैं। इसका जो जवाब आया वह हैरान करने वाला था। क्योंकि मांसाहार को भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताने वाली भाजपा के शासन वाले राज्यों में सबसे ज्यादा स्लॉटर हाउस हैं। देश भर में कुल 1623 स्लॉटर हाउस बताए गए हैं जिनमें से 675 तो भाजपा के शासन वाले राज्यों में हैं। अकेले महाराष्ट्र में ही 316 कसाईखाने हैं। 285 इकाइयों के साथ यूपी दूसरे नंबर पर है लेकिन ऐसे टॉप टेन राज्यों में महाराष्ट्र को छोड़कर भाजपा शासित तीन और राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब शामिल हैं। डा. भारती ने कहा कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सार्वजनिक रूप से बयान दे चुके हैं कि बीफ खाने वाले उनके राज्य में न आएं लेकिन 21 जिले वाले इस छोटे से राज्य में भी 36 बूचड़खाने चल रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह क्षेत्र गुजरात में भी 38 इकाइयों में पशुओं का मांस निकालने का काम किया जाता है।

अपनी बात : भाजपा में रहकर आरएसएस से बैर

दोस्तों, कभी देश के जाने-माने दलित चिंतक और अब भाजपा के सांसद उदित राज ने अपने नये बयान से खलबली मचा दी है। उन्होंने कहा है कि ओलंपिक खेलों में शानदान प्रदर्शन करने वाले जमैका के बोल्ट बहुत गरीब थे। उनके ट्रेनर ने उन्हें बीफ़ खाने की सलाह दी। उदित राज का मानना है कि नियमित तौर पर बीफ़ खाने के कारण ही बोल्ट ओलंपिक खेलों में इतिहास रचने में कामयाब हो सके।

उदित का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा में इन दिनों आत्म मंथन का दौर चल रहा है। इस क्रम में कौन क्या कह रहा है, इससे न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ़र्क पड़ रहा है और न ही उनके आका यानी आरएसएस चीफ़ भागवत को। हालांकि उनकी यह खामोशी इसलिए भी है क्योंकि उनलोगों ने यह अब महसूस कर लिया है कि उनके अस्तित्व के लिए उदारवादी छवि अनिवार्य हो गयी है। यदि ऐसा नहीं होता तो भाजपा उदित राज को उनके इस बयान के लिए दंडित कर चुकी होती। वहीं किसी मुसलमान ने यह बात कही होती तो संभव था कि वह अबतक या तो मारा जा चुका होता या फ़िर उसे जेल में डाल दिया गया होता।

अब सवाल उठता है कि उदित राज ने अब जाकर ऐसा क्यों महसूस किया। जबकि खाद्य संस्कृति को लेकर अज्ञानता फ़ैलाना भाजपा के एजेंडे में रहा है। एक गाय के सहारे उन्होंने अपनी पूरी राजनीति को फ़ोकस कर दिया है और इसके शिकार दलित हो रहे हैं। संभवतः उदित भी यह समझ चुके हैं कि जिस दलित चिंतन के कारण वे देश में जाने गये, भाजपा की पृथकतवादी छवि के कारण अब बदनाम हो रहे हैं।

हालांकि इसकी संभावना बहुत कम है कि उदित राज और रामविलास पासवान जैसे दलित यह सच स्वीकारें और देश के दलितों से माफ़ी मांगें कि सत्ता का लाभ पाने के लिए उन्होंने ऐसी ताकत के साथ हाथ मिलाया जिसकी बुनियाद में दलितों व पिछड़ों का शोषण है। 

बहरहाल उदित राज का बयान दिलेरी वाला बयान है। उन्होंने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है जो यह साबित करता है कि आरएसएस के शिकंजे में फ़ंसने के बावजूद उनमें इंसान होने का अहसास बाकी है। यह सकारात्मक है। देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में उदित राज, रामदास अठावले और रामविलास पासवान दलितों के कल्याणार्थ प्राथमिकताओं को छोड़ भाजपा के साथ कबतक बने रहते हैं। वजह यह कि भाजपा में रहकर आरएसएस से बैर सचमुच दिलचस्प है।

रंग लायी तेजस्वी की सक्रियता, शेष बिहार से कटने से बच गया भागलपुर

पटना(अपना बिहार, 31 अगस्त 2016) - उपमुख्यमंत्री सह पथ निर्माण विभाग के मंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव की सक्रियता एक बार फिर रंग लायी है। उन्होंने बताया कि विदेश दौरे से लौटने के बाद उनके संज्ञान में यह मामला आया कि भयंकर बाढ़ के कारण भागलपुर के विक्रमशिला सेतु का पहुँच पथ लगभग टूटने के कगार पर है। सड़क के नीचे से पानी जा रहा है।स्थिति विकट है। भारी वाहनों का परिचालन बंद कर दिया गया है। सड़क कभी भी बह सकती है।

श्री यादव ने बताया कि जानकारी मिलते ही उन्होंने सोचा कि बाढ़ के कारण लोग पहले ही झुझ रहे है अगर सेतू का पहुँच पथ टूट जाएगा तो परिस्थितियां और कठिन हो जायेगी। इस बाबत उन्होंने तुरन्त विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसी भी सूरत में इसे टूटने से बचाया जाए अन्यथा भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों का शेष बिहार से सम्पर्क टूट जायेगा और बाढ़ राहत कार्यों में अधिक कठिनाई आयेगी। किसी भी हाल में इसका समाधान होना चाहिए।

श्री यादव ने बताया कि विभागीय अधिकारियों और प्रशासन के सहयोग से दिन रात एक करके तुरन्त इसका मरम्मत किया गया और इसे पब्लिक के लिए खोल दिया गया। उन्होंने इसके लिए सभी पदाधिकारियों और अभियंताओं के प्रति आभार प्रकट किया। श्री यादव ने कहा कि अगर कहीं कोई समस्या है तो तुरंत सम्बंधित विभाग, प्रशासन और सरकार के संज्ञान में लायें। सरकार बिहार की जनता की सेवा करने को प्रतिबद्ध है।

ब्राह्म्णवाद की देन है डायन कुप्रथा

दोस्तों, अंधविश्वास और धर्म के बीच गहरा रिश्ता है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब हो जाती है जब धर्म को स्थापित करने के लिए अंधविश्वास को जायज ठहराया जाता है और जायज ठहराने के क्रम में मानवीय मूल्यों की सारी सीमायें लांघी जाती हैं। ऐसा ही एक अंधविश्वास "डायन कुप्रथा" है। यह एक ऐसी कुप्रथा है जिसके कारण पूरे हिन्दी पट्टी राज्यों में हर पांच मिनट पर एक महिला इसका शिकार होती है। पीड़ित महिलाओं के साथ प्रताड़ना का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि अधिकांश मामलों में उन्हें सार्वजनिक तरीके से मारा-पीटा जाता है और हालत तो उस समय असह्य हो जाती है जब उन्हें अर्द्धनग्न कर, बाल मुंड़कर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इससे भी समाज का मन नहीं भरता है तो उन्हें जबरन मल तक पिलाया जाता है।

डायन कुप्रथा खत्म हो, इसके लिए आवश्यक है कि इस समस्या के सभी आयामों पर ईमानदारी से चिंतन-मनन हो। यह केवल सरकार के स्तर पर नहीं बल्कि समाज को भी यह सच स्वीकारना होगा। यदि इसके विभिन्न आयामों की बात करें तो सबसे पहला आयाम इस कुप्रथा का धर्म से जुड़ाव है।

बंगाल से है डायन कुप्रथा का जुड़ाव

हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ़ इस धर्म में महिलाओं को देवी माना जाता है तो दूसरी ओर उन्हें इसका शिकार भी होना पड़ता है। सबसे अधिक शक्ति की देवी यानी दुर्गा की पूजा पश्चिम बंगाल में होती है। नवरात्र के दौरान यहां के दुर्गा मंदिरों में भूत-पिशाच का खेल खेला जाता है। पश्चिम बंगाल का काला जादू भी इसी से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्यों में भी इसका खूब प्रसार हुआ है। एक उदाहरण असम का कौड़ी कामख्या मंदिर है, जो जादू-टोने से लेकर भूत-पिशाच आदि के लिए कुख्यात है।

इस्लाम भी देता है अंधविश्वास को बढावा

बिहार और उत्तरप्रदेश के कई हिस्सों में यह अत्यंत ही सामान्य बात है कि बड़ी संख्या में हिन्दू धर्मावलम्बी मजारों पर जाते हैं। दिलचस्प यह है कि उनकी यह आस्था इसलिए नहीं होती कि उन्हें इस्लाम कबूल होता है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए वे मजारों पर जाते हैं और ऐसा करने वालों में अधिकांश गरीब हिन्दू परिवारों की महिलायें होती हैं। इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि धर्म को अपना बिजनेस बनाने वाले मुल्ला इन महिलाओं को जमकर बेवकूफ़ बनाते हैं और वहां भी महिलाओं के शरीर से भूत उतारने की प्रक्रिया बखूबी की जाती है। एक दिलचस्प उदाहरण यह भी बिहार की राजधानी पटना के जिलाधिकारी आवास में एक मजार है और यहां सरकार की आंखों के सामने रोजाना सैंकड़ों भूतों का कल्याण किया जाता है।

केवल महिलायें ही क्यों कहलाती हैं डायन?

यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है कि डायन की उपाधि पाने वाली केवल महिलायें होती हैं। पुरुष कभी भी डायन नहीं होते। कई समाजशास्त्री मानते हैं कि इस कुप्रथा के जरिए पुरुष समाज में महिलाओं पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि किसी महिला को अकारण ही बांझ कहा जाता है जबकि नपुंसकता उसके पति में होती है। पुरुष कभी भी इस तथ्य को स्वीकार ही नहीं करना चाहता है कि वे नपुंसक भी हो सकते हैं।

दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की महिलायें होती हैं डायन

एक अध्ययन बताती है कि पूरे देश में डायन कुप्रथा की शिकार महिलाओं में अधिकांश दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की होती हैं। यह इसलिए भी संभव है क्योंकि इन वर्गों में सामाजिक चेतना का विकास अभी उस स्तर को नहीं प्राप्त कर पाया है जैसी चेतना उच्च जाति वर्ग में हुआ है। अशिक्षा भी वंचित वर्गों की महिलाओं में सबसे अधिक है।

क्या कहता है कानून?

भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में ही हर किसी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार निहित है। महिलाओं को डायन कहकर प्रताड़ित करने वालों के खिलाफ़ कानून भी है। अंग्रेज इसके लिए बधाई के पात्र हो सकते हैं क्योंकि उन्होंने ही यह कानून 1857 में बनाया था। उस समय जोतिबा फ़ुले का आंदोलन भी महत्वपूर्ण कारण था, जिनके कारण महिलाओं को पढने का अधिकार हासिल हुआ था। आजाद भारत में भी अंग्रेजों के इस कानून को स्वीकार किया गया और डायन कहकर किसी को प्रताड़ित करने के लिए अधिकतम 7 वर्षों तक की सजा का प्रावधान है।

क्या है कानून की लाचारी?

असल में जब किसी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित किया जाता है तब ऐसा करने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं होता है। कई मौकों पर तो यह भी बात सामने आती है कि महिलाओं पर जुल्म करने वाले लोगों में उसके अपने परिजन भी शामिल होते हैं। ऐसे में पुलिस भी गांववालों या स्थानीय समाज पर कार्रवाई करने के बदले चुप रहना ही बेहतर समझती है।

क्या है समाधान?

शिक्षा और जागरुकता डायन कुप्रथा को समाप्त करने के लिए अनिवार्य है। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि सरकार कानून में संशोधन करे। ठीक वैसे ही जैसा शराबबंदी कानून बनाकर बिहार सरकार ने किया है। इस कानून के हिसाब से यदि किसी गांव या कस्बे में शराब का व्यवसाय होता है तो सामूहिक जुर्माना का प्रावधान है। इसी प्रकार डायन कहकर प्रताड़ित करने के मामले में किसी एक व्यक्ति को दंडित करने के बदले पूरे समाज को दंडित किया जाय। यह एक संशोधन अनिवार्य है। वजह यह है कि डायन कुप्रथा सामाजिक बुराई है और इसके लिए सजा भी पूरी सामाजिक व्यवस्था को दी जानी चाहिए।

How Can There Be an Indian Lincoln Mr Udit Raj?

- RAM PUNIYANI

Dalit activist and the ruling Bharatiya Janata Party (BJP) member of parliament in the Lok Sabha, Udit Raj, in his recent article in the Indian Express titled"‘Where is The Indian Lincoln" highlights some pertinent questions and brings forth the issue of the caste related atrocities. But he goes on to hide things which are more crucial to the process of caste annihilation.

 

He is on the dot when he says that atrocities against Dalits are due to a mindset which regards them inferior. While this explains how such acts have been taking place earlier as well as now, he undermines the fact that this mindset is due to a political ideology which upholds the caste system in a subtle way.

 

What he hides is the fact that such atrocities have gone up during past two years. What he does not state is that the Jhajjar violence in Haryana was legitimised by late Vishva Hindu Parishad (VHP) leader Acharya Giriraj Kishore, who belonged to Udit Raj’s political family called Sangh Parivar.

 

It is true that many countries in Europe could do away with birth based hierarchy of class and gender due to industrial revolution ushering in a journey towards substantive democracy.

 

India could not achieve such a desirable goal due to the objective restraints imposed by the colonial rule. The industrial revolutions of the West did away with the feudal classes along with their feudal mindset which was justifying the birth-based hierarchies.

 

In India due to the colonial rule, we have seen the birth of modern institutions along with the foundation of modern society. The foundation and the growth of Indian nationalism did aspire for the formal equality of all irrespective of caste, religion and gender.

 

Colonial masters in India were least interested in doing away with feudal powers. ‘Feudal-Clergy’ nexus persisted and gave rise to nationalism in the name of religion. Both Muslim nationalism and Hindu nationalism thrived.

 

The pace of change in colonies is not comparable to the other places where the industrial class along with workers and women combine overthrows the social and political alliance of the feudal-clergy combine.

 

So in colonies the process of secularization remains arrested and in post colonial societies the feudal mindset persists with the patronage of the certain sections of society.

 

In these societies the meaning of the word revolution has to be restricted to social transformation. The day to day efforts for social transformation are the revolutionary steps in that sense. India had its own trajectory.

 

Starting with Jotirao Phule, the Dalits started a slow and long journey towards equality. The journey for women’s equality begins with Savitribai Phule. These streams are totally opposed by the conservative religious elements. These conservatives later crystallize themselves as Muslim League on one side and Hindu Mahasabha-RSS on the other.

 

The march of Indian nationalism accommodates Ambedkar in some form. While he struggles for social democracy through means of temple entry (Kalaram Mandir), access to public spaces (Chavdar Talao), he goes on to support the burning of Manusmriti and states his resolve for the social equality. We can’t be mechanistic in understanding revolution in diverse societies.

 

These steps like those of Jotirao, Saviritibai and Ambedkar, Periyar are revolutionary. These are hesitantly supported by Indian nationalism and totally opposed by Hindu nationalism.

 

Gandhi, a symbol of Indian nationalism, did his best to oppose untouchability, while his stand on reserved constituency can be questioned. Nehru, the architect of modern India, later oversees Ambedkar formulate a Constitution which not only gives formal equality to all but also affirmative reservations to the Dalits.

 

Nehru’s attempt to bring in reforms like the Hindu Code bill are sabotaged by conservatives within his party and conservatives and Hindu nationalists outside his party.

 

The persistence of subordination of Dalits is mainly due to the persistence of mindset of Hindu nationalism, which even had opposed the Indian Constitution when it was being formed.

 

The Hindu nationalists have been strong opponents of reservations all through; this is what led to anti Dalit riots in Ahmedabad in 1981 and the anti OBC violence again in Ahmedabad in 1986.

 

The Hindu nationalist BJP intensified its Ram Temple movement in the wake of Mandal Commission implementation.

 

Udit Raj is right that those perpetrating crimes have not been punished, but that again is due to the prevalent mindset, which has its roots in Hindutva ideology, which spills beyond the parties and organisations working for a Hindu Rashtra (nation) directly.

 

While longing for revolution is good, ignoring the revolutionary changes at slow speed is disastrous and the likes of Udit Raj sitting in the lap of the BJP, which has been the vehicle of counter revolution as far as social changes are concerned, is a big setback to the process of social change.

 

Since BJP is the political arm of RSS, which aspires for a Hindu nation, Hindutva via Hindu nationalism, Raj is contributing precisely to the processes which are hampering the transition of caste equations towards those of equality.

 

If he wakes up to realise as to how mindsets are formed, he will realise that among other things his party has been transforming national institutions towards the values which will promote an anti-Dalit mindset.

 

Just one example from many such incidents is the one where the BJP has appointed one Sudarshan Rao as head of Indian Council of Historical Research (ICHR). Rao argues that the caste system had no problems and nobody had complaints against that.

 

RSS, BJP’s ideological patron, goes on to say that all castes were equal and problems came in due to the invasion of Muslim kings!

 

All this is putting the wool in the eyes of society to perpetuate the ideology which is inherently castiest and leads to the strengthening of mindset which looks down upon Dalits.

 

So a Rohith Vemula or a Una violence happens.

 

If Indian Nationalist movement was a mini revolution, the present politics being unfolded by Hindu nationalism is a counter revolution, duly supported by the likes of Udit Raj.

 

And lastly, if one concedes that there has been no Lincoln in India, one can also look forward to the post Rohith Vemula-Una upsurge of youth, Dalits and non-Dalits, which is going in the direction of caste annihilation!

 

 

सीधी बात : जज साहब, मत भूलिये यह लोकतंत्र है

दोस्तों, शराब के पक्ष में या विरोध में खूब सारे तर्क दिये जा सकते हैं। साहित्यिक रचनायें लिखी जा सकती हैं। अर्थशास्त्र के नये सिद्धांतों का सृजन किया जा सकता है। राजनीति की जा सकती है। लेकिन शराब के पक्ष में इंसाफ़ का तराजू भी डोल सकता है, ऐसा पहली बार हुआ है। पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के शराबबंदी कानून को गलत कहा है। वह कानून जिसने बिहार की बड़ी आबादी जिसमें महिलायें और वे लोग शामिल हैं जो शराब को बर्बादी का कारण मानते हैं। अब इस जमात में वे भी शामिल हो चुके हैं जिन्हें शराब पीने की बुरी लत थी।

खैर कानून का काम करने का तरीका अलग होता है। पटना हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत जज के अनुसार अदालतें वैसे नहीं सोचती हैं जैसे हम इंसान सोचते हैं। मसलन तराजू के दो पलड़े पर समान वजन के लोहे के बाट और रुई हो तो आम आदमी की नजर में रुई अधिक महसूस होगा। लेकिन अदालत घटना के आकार, प्रचार, प्रसार और परसेप्शन के आधार पर कार्य नहीं करता है। वह वजन देखता है।

यह तो हुई एक जज के हिसाब से इंसाफ़ का मतलब। अब जरा पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इकबाल अंसारी और न्यायाधीश नवनीति प्रसाद सिंह के हिसाब से "शराब का इंसाफ़" देखिए। 30 सितंबर 2016 को शराबबंदी पर दिये अपने फ़ैसले के पेज संख्या 24 के अनुच्छेद 40 में जस्टिस अंसारी कहते हैं My learned borther(Justice Navniti Prasad Singh) has observed that what one will choose to eat or "drink" is his decision and cannot be iterfered with by the state and that in support of these observations a reference has been made to the case of Ramlila Maidan incident, In re, reported in (2002) 5 Supreme Court Case 1, whereas paragraph 318, reads as under :

 

"318 . Thus, it is evident that right of privacy and the right to sleep have always been treated to be a fundamental right like a right to breathe, to eat, to "drink", to blink, etc."

मतलब साफ़ है कि इस देश में हर किसी को पीने का अधिकार है। इतना ही नहीं हर किसी को अपनी पसंद का खाना खाने का अधिकार भी है। सोने का अधिकार भी है। सोना छोड़िये ब्लिंक करने का भी अधिकार है। ब्लिंक का शब्दार्थ मेरी समझ से पलकें झपकाना हो सकता है। अब इसे कोई "आंख मारना" समझ ले तो यह मेरा कसूर तो नहीं ही कहा जाना चाहिए। सवाल उठता है कि जब इतने सारे अधिकार हैं तो फ़िर अखलाक की हत्या क्यों कर दी गयी। क्यों पूरे देश में बीफ़ पर हल्ला मचाया जा रहा है। देश के कई राज्यों ने बीफ़ पर पूर्णतया रोक लगा रखी है। क्या बीफ़ खाने वालों की अपनी मर्जी नहीं होती है। खाना छोड़िये। चैन से सोने की बात करते हैं। वैसे सोने का एक मतलब और भी होता है। यह भी पीने के जैसा द्विअर्थी है। पानी पीना भी "पीना" है और दुध पीना भी। साथ ही शराब पीना भी इसी कैटेगरी में शामिल है। जहर पीना किस कैटेगरी में आयेगा। यह सवाल जनता को पटना हाईकोर्ट से पूछना चाहिए। वजह यह कि अधिकांश मामलों में जहर पीने वाला भी अपनी मर्जी से ही पीता है।

कोई क्या खाएगा या क्या पियेगा या फ़िर कैसे जियेगा, इसके संबंध में कोई नियम-कानून है या नहीं? रुकिए, पटना हाईकोर्ट के विद्वान जज यह भी बताते हैं। अपने फ़ैसले के 22वें पन्ने पर 37वें अनुच्छेद में वे इसका खुलासा करते हैं। देखिए :

37. Bearing in mind what is pointed out above, let me, now, come to Article 47 of Constitution of India, which is at the centre of controversy in the present set of writ petitions. Article 47 reads thus :

 

"47. Duty of the State to raise the level of nutrition and the standard of living and to improve public health. - The state shall regard the raising the level of nutrition and the standard of living of its people and the improvements of public health as among its primary duties and, in particular, the state shall endeavour to bring about prohibition of the consumption except for medicinal purposes of intoxiating drinks and of drugs which are injurious to health."

ऐसा जज महोदय ही कह रहे हैं कि राज्य को यह तय करने का अधिकार है कि उसके लोग स्वस्थ कैसे हों। किस तरह के पोषक तत्वों का उपभोग करें। फ़िर बिहार सरकार ने क्या किया है जज महोदय? आपने शराबबंदी कानून को किस आधार पर गलत कह दिया?

 

ओह मैं तो भूल ही गया। आपने इसका जिक्र भी अपने फ़ैसले में किया है। अपने फ़ैसले के पृष्ठ संख्या 19 के अनुच्छेद 28 में आपने ही लिखा है :

28.  No different is my view on the conlusions reached by my learned brothe(Justice Navniti Prasad Singh) , I, so far as third issue, namely, 'Notification in conflict with notified pollicy guidelines', is concerned, which is to the effect that the impugned notification, being clearly in conflict with notified  New Excise Pollicy 2015, cannot in the facts and attending circumstances' of the case, be sustained.

आपके हिसाब से बिहार सरकार की एक गलती यह है कि उसने शराबबंदी की अधिसूचना जारी करने में कई तरह की गलतियां की। पहले वर्ष 2015 में नयी उत्पाद नीति बनाया। शराब दुकानों की बंदोबस्ती करवायी। वर्ष 2016 में शराबबंदी के पहले भी उसने इसी नीति के आधार पर विज्ञापन भी प्रकाशित करवाये। दुकानों की बंदोबस्ती भी हुई।

लेकिन यही तो खुबसूरती है लोकतंत्र की। सरकारें राजनीति के हिसाब से अपना एजेंडा तय करती हैं और वह अपने ही बनाये कानूनों, नीतियों और नियमों में बदलाव करती है। यह परिस्थितिजन्य भी होता है। मसलन पहली बार जब बिहार में शराबबंदी लागू हुई तो उसका भी विरोध हुआ था। विरोध करने वाले कौन थे? तब कर्पूरी जी की सरकार थी और जनसंघ उनके साथ था। शराबबंदी और कालाबाजारी पर जब तत्कालीन राज्य सरकार ने एक्शन लेना शुरु किया, जनसंघियों ने सरकार को ही चलता कर दिया था। नीतीश कुमार भी जब भाजपा के साथ सरकार में थे, उनके हिसाब से भी नीतियां बनती थीं। शराब को घर-घर पहुंचाने का दोष अकेले केवल नीतीश कुमार का नहीं था। उनके इस दोष में भाजपा भी भागीदार थी। समय बदला तो राजनीति भी बदली। नीतीश कुमार राजद के साथ आये। फ़िर नीति भी बदली। इसे किस रुप में आप आकलित करते हैं, यह तो आपका कानून जाने जज साहब। लेकिन देश में और बिहार में लोकतंत्र है। लोकतंत्र में चंद मुट्ठी भर लोगों के लिए नीति और नियम नहीं बनाये जाते हैं। लेकिन आपने तो मुट्ठी भर शराब कंपनियों और माफ़ियाओं के हक में फ़ैसला सुनाया। इन कंपनियों में विजय माल्या की कंपनी भी है जज साहब। वहीं विजय माल्या जो देश का 9000 करोड़ रुपए लेकर देश से भाग चुका है।

शहाबुद्दीन और शराब मामलों में अदालती फैसले से विपक्ष गदगद

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की जमानत याचिका खारिज किये जाने और पटना हाईकोर्ट द्वारा बिहार में विदेशी शराब को प्रतिबंधित किये जाने संबंधी राज्य सरकार की अधिसूचना को निरस्त किये जाने पर विपक्ष गदगद हो गया है। मसलन बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता डा. प्रेम कुमार ने कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की जमानत रद्द किया, यह फैसला स्वागत योग्य है। एक बार फिर लोकतंत्र की जीत हुई है। शहाबुद्दीन का दिल्ली के तिहार जेल में रखा जाए, सारे मुकदमें एक जगह रख कर इसकी सुनवाई दिल्ली में स्पीड ट्राइल के तहत की जाए। शहाबुद्दीन के मामले में सरकार बेनकाब हुई। नीतीश जी अब अपने पद से इस्तिाफा दे देना चाहिए। डा. कुमार ने कहा कि राज्य की वर्तमान नीतीश कुमार की विफलताओं के कारण ही शहाबुद्दीन जिस पर 56 मुकदमें चल रहे है, बेल मिला। सरकार अपनी इज्जत बचाने के लिए अंत में सुप्रीम कोर्ट गयी, जहां दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट से फटकार भी लगी।

वही पटना हाईकोर्ट द्वारा शराबबंदी कानून के संबंध में फैसले पर डा. प्रेम कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी आपने शराबबंदी पर नया ताबिलानी कानून लाया, जिसे पटना हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। नीतीश जी यहां लोकतंत्र है, तानाशाही नहीं चलेगी, जो बेगुनाह जनता को परेशान करने वाला नया शराबबंदी कानून लगा दिया, जिसका भाजपा शुरू से लगातार विरोध करती आ रही थीं, यह लोकतंत्र की जीत है।

डा. कुमार ने कहा कि बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद विधेयक 2016 में जो कानून लाए गये हैं, उसमें शराब पीने या नशे में रहने पर 7 साल की सजा और 10 लाख का जुर्मना। किसी परिवार या मकान में मादक या शराब मिलने पर 18 वर्ष के उपर के सभी लोगों को जेल भेजा जाएगा, यह कैसा कानून है। शराब कोई पीये और पूरा गांव व शहर के लोगों को इसके लिए सामूहिक जुमार्ना व सजा भोंगें क्यों ? डा. कुमार ने कहा कि इसके अलाव दोगुनी सजा, सामूहिक जुर्मना, तड़ीपार जैसे कठोर कानून लाया गया है। वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री कहते हैं कि ह्यनष्ट हो जाऊं, दुनिया से चला जाऊं पर सख्ती में रियात नहीं करूगा। साथ ही यह भी कहते हैं कि हां, मुझे शराबबंदी का नशा है, जो पीए बिना नहीं रह सकते वे कहीं और जाएं।

वहीं वरिष्ठ भाजपा नेता सह लोक लेखा समिति के सभापति नंदकिशोर यादव ने कहा कि अदालती फैसलों से सूबे की सरकार और सरकार के मुखिया नीतीश कुमार लगातार बैकफुट पर हैं। यह साबित हो गया कि भाजपा, नीतीश राज में बने जिन कानूनों और कारगुजारियों का विरोध करती रही, वह सच में संविधान सम्मत नहीं है। चाहे शराबबंदी पर बना तुगलकी कानून हो, या फिर बाहुबली शहाबुद्दीन की जमानत का विरोध। अदालत का फैसला न्याय की जीत है। यह जीत सिर्फ चंदा बाबू की नहीं, बल्कि अपराध और दहशत के साये में जी रहे हर बिहारी की जीत है। यह जीत नीतीश जी के काले कानून से त्रस्त हर मजबूर बिहारवासी की है। श्री यादव ने कहा कि भाजपा ने जनभावनाओं को देखते हुए ही महागठबंधन की सरकार के हर तुगलगी फरमान और कारनामों का विरोध किया। नीतीश जी और लालू जी के झांसे में आकर ठगी गयी जनता तो भाजपा के संघर्ष में साथ खड़ी ही है, अब अदालत ने भी अपने फैसले से जनभावनाओं की जीत पर मुहर लगा दी।

श्री यादव ने कहा कि शहाबुद्दीन प्रकरण में जिस तरह से ट्रायल शुरू करने में सरकारी स्तर पर कोताही बरती गयी, वह राजनीतिक -अपराधी गठजोड़ का बड़ा नमूना है। सरकार के ही एक घटक के शीर्ष नेता के दबाव में राजद के सांसद शहाबुद्दीन के पैरोकार बने रहे। पर अदालत सबकुछ देखता है। जीत न्याय की ही होती है। वही हुआ भी। इसी तरह शराबबंदी कानून के मामले में भी नीतीश जी के तुगलकी कानून को अदालत ने आइना दिखा दिया।

शहाबुद्दीन की जमानत याचिका खारिज, गये जेल

नयी दिल्ली/पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - सुप्रीम कोर्ट ने आज राजद नेता और पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की जमानत रद्द कर दी है. कोर्ट के इस फैसले के बाद राजद नेता ने सीवान कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया है. इसके साथ ही उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है. आपको बता दें कि बाहुबली नेता शहाबुद्दीन की जेल से रिहाई के खिलाफ दायर अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली थी. एक हत्याकांड में पटना हाइकोर्ट से शहाबुद्दीन को दी गयी जमानत को चुनौती देने वाली दो अपीलों पर कोर्ट ने गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद राजद नेता शहाबुद्दीन को हत्या के एक मामले में जमानत देने का पटना हाइकोर्ट का आदेश आज रद्द कर दिया. कोर्ट ने राजद नेता को 'तत्काल' समर्पण करने या फिर बिहार पुलिस को उन्हें तुरंत हिरासत में लेने का आदेश दिया. न्यायमूर्ति पीसी घोष और न्यायमूर्ति अमिताव राय की पीठ ने बिहार सरकार और निचली अदालत को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि राजीव रोशन हत्याकांड के मुकदमे की सुनवाई कानून के प्रावधानों के तहत शीघ्र पूरी हो. शहाबुद्दीन को दोहरे हत्याकांड में उम्र कैद की सजा मिल चुकी है जबकि पटना हाई कोर्ट ने इस मामले में उसे जमानत भी दे दी है.

शहाबुद्दीन ने न्यूज एजेंसी एएनआइ से एक सवाल के जवाब में नीतीश कुमार का नाम लिये बिना कहा है कि चुनाव में उनके समर्थक उन्हें बता देंगे कि क्या होना है. उनसे पत्रकार ने सवाल पूछा था कि आपने बिहार सरकार के खिलाफ बोला उसके बाद ऐसा हुआ, अगर आप नीतीश जी पर नहीं बोले होते तो...इस पर शहाबुद्दीन ने कहा कि जो सच है उसे बोलने में मुझे परवाह नहीं है और मेरे समर्थक आने वाले चुनाव में उन्हें बता देंगे कि क्या होना है.

शीर्ष अदालत ने शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं पर कल सुनवाई पूरी की थी. कोर्ट ने हाई कोर्ट सहित विभिन्न न्यायिक मंचों पर तमाम मामलों में राजद के इस बाहुबली की जमानत का विरोध करने के प्रति बिहार की नीतीश सरकार के ढुलमुल रवैये की आलोचना की थी.

वहीं, सुनवाई की जानकारी देते हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि दोनों (पीड़ित के पिता चंदा बाबू और बिहार सरकार की अपील) बेल खारिज करने की याचिका को कोर्ट ने आज अनुमति दे दी है. कोर्ट ने बिहार सरकार से कहा है कि शहाबुद्दीन को जेल में डाले और राजीव रौशन केस पर ट्रायल करे और जल्दी करे. प्रशांत भूषण ने कहा कि मैं एक और याचिका दायर करके शहाबुद्दीन के बिहार से बाहर की जेल में भेजे जाने और विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई की गुजारिश करूंगा.

उधर, फैसला आने के बाद चंदा बाबू की आंखों से आंसू झलक आए और उन्होंने कहा कि मीडिया के कारण ऐसा हो सका. यदि मीडिया ने इस मुद्दे को नहीं उठाया होता तो शायद सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नहीं आता. उन्होंने कहा कि कई पार्टियों ने उनका साथ दिया. मैं उनका धन्यवाद देना चाहता हूं. बिहार सर?कार का भी सहयोग मिला.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान फिर सवाल किया कि राजीव रोशन हत्याकांड के 17 महीने बाद भी शहाबुद्दीन को आरोप-पत्र की प्रति क्यों नहीं मुहैया करायी गयी. राजीव अपने दो छोटे भाइयों की हत्या का चश्मदीद गवाह था, जिसकी हत्या अदालत में उसकी गवाही से कुछ ही दिनों पहले कर दी गयी थी.

शराबखोरी के पक्ष में पटना हाईकोर्ट! राज्य सरकार की अधिसूचना पर लगी रोक

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - बिहार सरकार को झटका देते हुए पटना हाई कोर्ट ने राज्य में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी उसकी अधिसूचना को संविधान के प्रावधानों के अनुरुप नहीं होने का हवाला देते हुए आज इसे निरस्त कर दिया. मुख्य न्यायाधीश इकबाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति नवनीति प्रसाद सिंह की खंडपीठ ने राज्य में शराब की खपत और इसकी बिक्री पर रोक संबंधी राज्य सरकार की पांच अप्रैल की अधिसूचना को निरस्त कर दिया.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पांच अप्रैल को जारी अधिसूचना संविधान के अनुरुप नहीं है इसलिए यह लागू करने योग्य नहीं है. नीतीश कुमार सरकार ने कड़े दंडात्मक प्रावधानों के साथ बिहार में शराब कानून लागू किया था जिसे चुनौती देते हुए ह्यलिकर ट्रेड एसोसिएशन' और कई लोगों ने अदालत में रिट याचिका दायर की थी और इस पर अदालत ने 20 मई को अपना फैसला सुरक्षित रखा था.

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार ने सबसे पहले एक अप्रैल को देशी शराब के उत्पादन, बिक्री, कारोबार, खपत को प्रतिबंधित किया, लेकिन बाद में उसने राज्य में विदेशी शराब सहित हर तरह की शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था.

शराब, भारत में निर्मित विदेशी शराब :आईएमएफएल: के साथ देशी शराब के कारोबार, उत्पादन और खपत पर पूर्ण प्रतिबंध संबंधी राज्य सरकार की पांच अप्रैल की अधिसूचना को अदालत ने आज निररस्त कर दिया. आबकारी कानून के क्रियान्वयन के दौरान के अनुभव के आधार पर राज्य सरकार ने जेल की सजा की अवधि, जुमार्ने की राशि, शराब बरामद होने की स्थिति में घर के वयस्क सदस्यों की गिरफ्तारी और सामुदायिक जुमार्ना में बढोत्तरी जैसे संशोधनों के जरिए कुछ अतिरिक्त प्रावधान शामिल किये थे.

राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने भी इसे संस्सुति प्रदान की थी. संशोधित शराब कानून के आगामी दो अक्तूबर को अधिसूचित होने की संभावना थी. संशोधित शराब कानून के भविष्य के बारे में पूछे जाने पर अतिरिक्त महाधिवक्ता ललित किशोर ने बताया कि अदालत ने पांच अप्रैल को जारी अधिसूचना आज निरस्त कर दी. उन्होंने कहा, ह्यह्यअदालत के आदेश को देखने के बाद ही मैं इस विषय पर कुछ कह पाउंगा.'' आबकारी आयुक्त एके दास ने कहा, ह्यह्यइस वक्त मैं कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मैंने अदालत का फैसला देखा नहीं है.'' बिहार सरकार की ओर से जाने माने वकील राजीव धवन ने 20 मई को अदालत में इस शराब कानून का बचाव किया था.

बिहार वापस लौटे शिक्षा मंत्री

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - करीब एक पखवारे के बाद शिक्षा मंत्री डा. अशोक चौधरी अमेरिका से वापस अपने राज्य लौटे वे। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में दलित सशक्तिकरण विषय पर अपना शोध प्रस्तुत करने गये थे। शुक्रवार को पटना पहुंचने पर सूबे के कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया। इस अवसर पर शकीलूर रहमान, एच.के. वर्मा, डा. हरखू झा, लाल बाबू लाल, विनोद कुमार सिंह यादव, सुमन कुमार मल्लिक, राजेश राठौड़ आदि उपस्थित रहे।

पूर्व सांसद युवराज के निधन से लालू-नीतीश दुखी

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - समाजवादी विचारधारा के नेता रहे पूर्व सांसद युवराज के निधन पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद प्रमुख लालू प्रसाद, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव, सांसद डा. मीसा भारती सहित अनेक नेताओं ने दुख व्यक्त किया है। अपने शोक संदेश में मुख्यमंत्री ने कहा है कि अपने दीघार्यू जीवन में स्व0 युवराज जी ने बिहार में समाजवाद एवं राजनीति के विभिन्न आयामों को मजबूत आधार प्रदान किया था। उनकी मृत्यु 103 वर्ष की आयु में हुई है, उनका समाजवाद एवं राजनीति के क्षेत्र में अहम योगदान है, जिसे भूलाया नहीं जा सकता है। वे युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्त्रोत थे।अपने शोक संदेश में राजद प्रमुख ने कहा  कि युवराज जी के निधन के समाचार से उन्हें गहरा दुख हुआ है तथा बिहार को खासकर समाजवाद एवं राजनीति के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुयी है। उल्लेखनीय है कि युवराज जी कटिहार के रहने वाले थे तथा वे कटिहार से सांसद रह चुके है। उनका अंतिम संस्कार आज पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जायेगा। कटिहार के प्रभारी मंत्री अवधेश कुमार सिंह को राजकीय सम्मान में शामिल होने के लिए कटिहार जाने का निर्देश मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया है।

दलित-आदिवासी छात्रों के साथ नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी की नाइंसाफ़ी

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - पश्चिम चंपारण की नौ दलित-आदिवासी छात्राओं ने नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी पर पक्षपातपूर्ण तरीके से परीक्षाफल प्रकाशित करने का आरोप लगाया है। आरोप लगाने वाली छात्राओं में शीतल कुमारी मांझी, रेखा कुमारी मांझी, सोनम कुमारी मांझी, कौशल्या कुमारी(अनुसूचित जनजाति), शैनुमा कुमार (अनुसूचित जनजाति), सुमन कुमारी (पिछड़ा वर्ग), सुष्मिता कुमार (अनुसूचित जनजाति) और हनीसा कुमारी(अनुसूचित जनजाति) शामिल हैं। स्थानीय संत जेवियर स्कूल में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में इन छात्राओं ने बताया कि वे विश्वविद्यालय में स्नातक की छात्रा हैं और परीक्षा में प्रश्नों का सही-सही उत्तर दिये जाने के बावजूद उन्हें बार-बार अनुत्तीर्ण घोषित कर दिया जाता है। यहां तक कि विश्वविद्यालय द्वारा दिये गये एसाइनमेंट में भी उन्हें कम से कम अंक दिये जाते हैं ताकि वे उत्तीर्ण न हो सकें। छात्राओं ने बताया कि विश्वविद्यालय के द्वारा उन्हें बताया गया है कि दिये गये परीक्षा के उत्तर पुस्तिकाओं की जांच को चुनौती देने का कोाई प्रावधान विश्वविद्यालय में नहीं है। इन छात्राओं ने बताया कि हर बार उनलोगों कोई न कोई विषय में फेल कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस मामले में संज्ञान ले और उनकी उत्तर पुस्तिकाओं की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराये ताकि उनका भविष्य अंधकारमय होने से बच जाये। छात्राओं ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा की जा रही कथित मनमानी के खिलाफ उनलोगों ने पटना हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर किया है। वहीं इन बच्चियों को अपने छात्रावास में रखकर पढ़ाने वाले रीड संस्था के निदेशक फादर जोसेफ सबास्टियन और फादर फिलिप मंथरा ने भी राज्य सरकार से बच्चियों के बेहतर भविष्य के लिए इस मामले में संज्ञान लेने का अनुरोध किया है।

एक दिन बाद आयी वामपंथियों को सर्जिकल स्ट्राइक, सीपीआई नेताओं ने दी सेना को बधाई

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पिछले बुधवार की रात्रि में पूंछ के इलाके में नियंत्रण रेखा के बाहर भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक की कार्रवाई की कामयाबी के लिए भारतीय सेना को बधाई दी है। पार्टी की राज्य सचिवमंडल ने कहा कि कष्मीर के पूंछ इलाके में नियंत्रण रेखा से बाहर जाकर भारतीय सेना ने अपने सर्जिकल स्ट्राइक कार्यक्रम के द्वारा सात आतंकी अड्डों सहित कम से कम 38 आतंकियों को ढ़ेर कर आतंकवाद के खिलाफ एक महत्वपूर्ण और सराहनीय काम किया है। राज्य सचिवमंडल ने कहा है कि भारतीय सेना की कार्रवाई से पाकिस्तान को चेत जाना चाहिए और अपनी जमीन से तमाम आतंकी गतिविधियों को समाप्त करने की दिषा में ईमानदार, विष्वसनीय और ठोस कार्रवाई करनी चाहिए ताकि आगे भी भारत को ऐसी कार्रवाई करने की जरूरत न हो। राज्य सचिवमंडल ने भारत सरकार से भी अपील की है कि भारत-पाक के बीच के तनाव को कम करने के लिए कुटनीतिक और राजनीतिक प्रयास हर संभव करना चाहिए तथा दोनों देषों के बीच बातचीत का मार्ग खुला रखना चाहिए ताकि सीमा पार से आतंकवाद को समाप्त किया जा सके।

नीतीश राज में पहली बार न्यायपालिका और विधायिका आमने-सामने

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - एक बार फिर सूबे में न्यायपालिका और विधायिका आमने-सामने है। पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा सूबे में पूर्ण शराबबंदी के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी पूर्ण शराबबंदी के आधार पर पूरे देश में अपने राजनीतिक मुहिम छेड़ रखा है। न्यायपालिका द्वारा अपने मुख्यमंत्रित्व काल में पहली बार चुनौती मिलने पर नीतीश कुमार ने भी सूबे में नया कानून लाने का निर्णय लिया है। मिल रही जानकारी के अनुसार आगामी दो अक्टूबर को वे राज्य में नये शराबबंदी कानून का एलान कर सकते हैं।

हालांकि राज्य सरकार के पास पटना हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प भी है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में विलंब के कारण शराबबंदी पर प्रभाव न पड़े, इसके लिए सरकार अध्यादेश के जरिए इस समस्या हल निकालेगी। इस संबंध में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को पटना हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद संबंधित पदाधिकारियों एवं विधि विशेषज्ञों के साथ कई दौर की बैठकें की।

बताते चलें कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार ने सबसे पहले एक अप्रैल को देशी शराब के उत्पादन, बिक्री, कारोबार, खपत को प्रतिबंधित किया, लेकिन बाद में उसने राज्य में विदेशी शराब सहित हर तरह की शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। बाद में भारत में निर्मित विदेशी शराब के साथ देशी शराब के कारोबार, उत्पादन और खपत पर पूर्ण प्रतिबंध संबंधी राज्य सरकार की पांच अप्रैल की अधिसूचना को अदालत ने निररस्त कर दिया।

इस संबंध में विशेषज्ञों की मानें तो तकनीकी रूप से सरकार द्वारा सूबे में शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि अदालत ने 5 अप्रैल को राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को निरस्त किया है न कि उसने विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किये गये शराबबंदी विधेयक पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया है। इस विधेयक में राज्य में देशी शराब के उत्पादन, बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया गया था। बाद में मानसून सत्र के दौरान राज्य सरकार ने अपने पुराने शराबबंदी कानून में नये प्रावधान करते हुए अंग्रेजी शराब पर प्रतिबंध को भी विधेयक में शामिल कर लिया गया। इस नये विधेयक को राज्यपाल रामनाथ कोविंद की स्वीकृति मिल चुकी है और आगामी 2 अक्टूबर को यह विधेयक अधिसूचित हो जाएगा। लिहाजा सूबे में चल रही शराबबंदी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

बहरहाल कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि राज्य सरकार के पास अब सिवाय सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। पारंपरिक तौर पर यदि किसी विषय विशेष के मामले में अदालत ने कोई फैसला दिया हो तो राज्य सरकार के पास उसी विषय पर अध्यादेश लाने का अधिकार नहीं है।

राजबल्लभ को मिली जमानत, आज होंगे रिहा

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - पटना हाइकोर्ट ने आज कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगायी. शराबबंदी कानून को असंवैधानिक करार देने के बाद पटना हाइकोर्ट ने अपने एक और फैसले में नाबालिग से रेप के मामले में जेल में बंद राजद विधायक राजबल्लभ यादव को जमानत दे दी है. गौरतलब हो कि राजबल्लभ यादव ने पुलिस के साथ काफी लुका छुपी खेलने के बाद दस मार्च को कोर्ट में आत्मसमर्पण किया था. नावादा विधानसभा क्षेत्र से विधायक राजबल्लभ यादव ने एक नाबालिग छात्रा को एक महिला के सहयोग से अपने कमरे पर लागकर जबरन रेप करने का आरोपी है. मामले की जांच में राज बल्लभ पर आरोप सही पाया गया था. उसके बाद पुलिस ने राजबल्लभ की गिरफ्तारी के लिये बहुत छापेमारी की लेकिन वह पकड़ में नहीं आया. जबकि पुलिस ने राजबल्लभ तक लड़की पहुंचाने वाली सुलेखा और बाकी सहयोगियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. पुलिस ने राजबल्लभ यादव के घर की कुर्की जब्ती की थी और राजबल्लभ के नाम से जारी हथियारों के लाइसेंस को भी रद्द कर दिया था. पुलिस ने राजबल्लभ की पत्नी के नाम से खनन के पट्टों को भी रद्द कर दिया था. इस घटना के बाद बिहार सरकार की काफी फजीहत हुई थी और राजद ने रेप का आरोप लगने के बाद राजबल्लभ को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इस मामले में पटना हाइकोर्ट ने आज विधायक को जमानत दे दी है.

घायल जवान के निधन से मुख्यमंत्री दुखी, परिजनों को 11 लाख रुपए की सहायता राशि

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते दिनों जम्मू कश्मीर के उरी आतंकी हमले में घायल बिहार के रहने वाले बिहार रेजिमेंट के नायक राजकिशोर सिंह के दिल्ली में इलाज के दौरान मृत्यु होने पर गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने शहीद नायक राजकिशोर सिंह के निकटतम आश्रितों को राज्य सरकार की तरफ से 11 लाख रुपए देने की घोषणा की। शहीद नायक राजकिशोर सिंह का अंतिम संस्कार भोजपुर जिला प्रशासन द्वारा पुलिस सम्मान के साथ किया जायेगा। इस अवसर पर राज्य सरकार की तरफ से राज्य सरकार के मंत्री भी उपस्थित रहेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहीद हुये नायक राजकिशोर सिंह की शहादत पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुये कहा कि वे सच्चे देशभक्त थे और उनकी शहादत को भारत वर्ष कभी नहीं भूल पायेगा। उनके शहादत को हमेशा याद रखा जायेगा। मुख्यमंत्री ने वीर सपूत नायक राजकिशोर सिंह की शहादत पर उनके परिजनों को दुख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की है। उन्होंने कहा है कि पूरा बिहार शहीद के परिवार के साथ है।

पंकज जी को रिहा करे सरकार, मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने की मांग

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने राज्य सरकार से पश्चिम चंपारण में भूमिहीनों के लिए संघर्ष करने वाले समाजवादी चिंतक पंकज जी और उनके साथियों को रिहा करने की मांग की है। पटना में संवाददाता सम्मेलन में श्री सिंह ने कहा कि राज्य सरकार ने बिहार को शराबमुक्त बनाने का संकल्प लिया है, इसके लिए वह बधाई की पात्र है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को बिहार को सुखाड़ मुक्त बनाने का भी अभियान चलाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाजवादी पंकज जी अपने साथियों के साथ पश्चिम चंपारण में भूमिहीनों को भूमि अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन भूमाफियाओं ने उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल में डलवा दिया है। राज्य सरकार को उनकी रिहाई के मामले में पहल करनी चाहिए। साथ ही पश्चिम चंपारण के भूमिहीनों को भूमि अधिकार मिले, इसके लिए भी ठोस पहल करनी चाहिए। संवाददाता सम्मेलन में सामाजिक कार्यकर्ता रूपेश जी, सौरव जी सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

शिक्षा विभाग के कार्यालय में लगी आग, उठे कई सवाल

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - पटना सचिवालय के विकास भवन स्थित शिक्षा विभाग के कार्यालय में गुरुवार की सुबह आग लग गयी. जिससे अफरा-तफरी मच गयी. शिक्षा विभाग के साथ ही ऊपर की मंजिल पर स्थित स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय को भी आग ने अपनी चपेट में ले लिया. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक आज सुबह ही कार्यालय के कमरे से धुंआ निकलता दिखा और कुछ देर के बाद आग की लपटें दिखने लगी. इसकी जानकारी तुरंत फायर ब्रिगेड की टीम को दी गयी. जानकारी मिलते ही मौके पर दमकल की कई गाड़ियां पहुंच गयी और आग पर काबू पाने के प्रयास में जुट गयीं. सूचना पर सचिवालय थाने की पुलिस और विभाग के कई वरीय अधिकारी भी मौके पर पहुंच गये. घटना के पीछे शॉट सर्किट को वजह बताया जा रहा है. आग की वजह से विकास भवन की बिजली आपूर्ति बंद कर दी गयी. आग से काफी क्षति होने की संभावना व्यक्त की जा रही है. दिलचस्प यह कि इससे पहले कुछ दिनों पहले भी शिक्षा विभाग के कार्यालय मे आग लग चुकी है. साथ ही स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय में भी आग लगी थी.

बिहार सरकार ने की अतिरिक्त सुरक्षा बल की मांग

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - दुर्गा पूजा और मोहर्रम पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए बिहार पुलिस ने अर्द्धसैनिक बलों की सात कंपनी की मांग केन्द्र से की है। राज्य सरकार के जरिए यह मांग की गई है। यदि अर्द्धसैनिक बल मिलते हैं, तो इन्हें त्योहारों के दौरान राज्य के विभिन्न इलाकों में प्रतिनियुक्त किया जाएगा। संवेदनशील इलाकों में गश्त का भी काम लिया जा सकता है। अर्द्धसैनिक बल मिलते हैं तो उनकी तैनाती 7 से 12 अक्टूबर तक के लिए की जाएगी। पटना के अलावा भागलपुर, सीतामढ़ी, किशनगंज, नालंदा और सीवान आदि जिलों में इनकी तैनाती की योजना है। मोहर्रम तक यह प्रतिनियुक्ति रहेगी। विधि-व्यवस्था के लिहाज से अधिक संवेदनशील स्थानों पर इन्हें रखा जाएगा। इसके अलावा जिला पुलिस बल भी मुस्तैद रहेगा। त्योहरों को देखते हुए विभिन्न स्थानों पर प्रशिक्षण ले रहे प्रशिक्षु सिपाहियों को भी उनके जिला बल में वापस भेजा जा रहा है। कुछ दिनों के लिए वह जिला बल में रहेंगे। जरूरत के मुताबिक उनकी मदद जिले में विधि-व्यवस्था बनाए रखने में ली जाएगी। त्योहार के बाद वापस प्रशिक्षु जवान वापस ट्रेनिंग सेंटर में चले जाएंगे।

शताब्दी वर्ष समारोह मनाने से कुलपति ने किया इंकार, छात्रों ने लिया फैसला - खुद मनायेंगे

पटना(अपना बिहार, 1 अक्टूबर 2016) - प्रतिष्ठित पटना विश्वविद्यालय की स्थापना का शताब्दी वर्ष शनिवार को पूरा होगा। इस खास मौके के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई आयोजन नहीं किया जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन की उदासीनता को देखते हुए अब छात्रों और कर्मियों ने ही अपने स्तर से एक समारोह आयोजित करने का निर्णय लिया है। वह भी खास अंदाज में। मुख्य समारोह विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में पटना विश्वविद्यालय के योगदान अतीत, वर्तमान एवं भविष्य की चर्चा होगी। इसमें सभी छात्र, शिक्षक एवं कर्मचारियों, पूर्ववर्ती छात्रों को भी आमंत्रित किया गया है। छात्रों कार्यक्रम की सूचना वि.वि. अधिकारियों को भी भेजी है।

मुख्यमंत्री ने की भारतीय सेना के कार्रवाई की सराहना

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केन्द्र सरकार और भारतीय सेना के आतंकवाद के विरूद्ध की गई कार्रवाई का समर्थन करते हुये भारतीय सेना को बधाई दी है। उन्होंने कहा है कि भारतीय सेना पर हमें गर्व है और हम उनके शौर्य एवं पराक्रम की सराहना करते हैं।

उपमुख्यमंत्री ने की समीक्षा बैठक

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - जनसंवाद यात्रा के पहले चरण में भागलपुर के दो दिवसीय भ्रमण के दूसरे दिन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने गुरूवार को भागलपुर के जिला ग्रामीण अभिकरण के सभागार मे पथ निर्माण ,भवन निर्माण एवं पिछड़ा/अति पिछड़ा विभाग से सम्बंधित अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। उन्होंने भागलपुर प्रमंडल में चल रही पथ निर्माण, पुल निगम, भवन निर्माण की योजनाओं की प्रगति का जायजा लिया । उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि किसी भी प्रोजेक्ट में देरी बर्दाश्त नहीं की जायेगी। उन्होंने पिछड़ा/अति पिछड़ा विभाग के अधिकारियों की जमकर क्लास ली। और कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने कड़ा निर्देश दिया। समीक्षा बैठक के बाद उपमुख्यमंत्री ने जनसंवाद सभा को सम्बोधित किया।

सरहद पर कार्रवाई का सभी दलों ने किया स्वागत

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - बुधवार की रात पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर भारतीय सेना द्वारा किये गये सर्जिकल स्ट्राइक की सभी दलों नेताओं ने स्वागत किया। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने बयान में कहा कि भारतीय फौज की यह कार्रवाई अत्यंत ही माकूल है और इसके लिए हम फौज को बधाई देते हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को सबक मिलना जरूरी है। वहीं वरिष्ठ भाजपा नेता सह लोक लेखा समिति के सभापति नंदकिशोर यादव ने कहा कि सीमा पार पाकिस्तानी आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना की कार्रवाई देश की जनभावना के अनुरूप है। इसके लिए भारतीय सेना और देश का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बधाई के पात्र हैं। श्री यादव ने कहा कि पूरा देश एक स्वर में भारतीय सेना की कार्रवाई की सराहना कर रहा है। पाकिस्तान पूरी तरह से अलग-थलग पड़ चुका है। ऐसा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के धैर्य और रणनीतिक सफलता के परिणामस्वरूप संभव हो सका। नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व की वजह से भारतीय सेना का हौसला और जोश परवान चढ़ा।

जबकि बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता डा. प्रेम कुमार ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी और भारतीय सेना ने उरी का जबाव पाक को दिया है। इसके लिए प्रधानमंत्री को धन्यावाद और भारतीय सेना को सलाम करता हंू। भारतीय कमांडों ने पीओके में घूस कर पाक आतंकवादियों के 7 ठिकानों को नष्ट करते हुए लगभग 37 आतंकवादियों को मार गिराया। पाक को करारी जबाव देने के लिए भारतीय सेना को कोटी-कोटी धन्यवाद और सलाम करता हंू। डा. कुमार ने कहा कि भारत पाक को ईंट का जबाव पत्थर से देना जानता है। पाकिस्तान आज दुनिया का आतंकवादी देश बना हुआ है, जिसे भारत ही जबाव दे रहीं है। इस मौके पर राज्यवासियों से अपील करते हुए डा. कुमार ने कहा कि शांति और सद्भाव बनाये रखेने की अपील की है।

राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की राष्ट्रीय सचिव सीमा सक्सेना ने भारतीय सेना के पैरा कमांडोज की साहसिक कार्रवाई की प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि जिस हौसले के साथ भारतीय जांबाजों ने सिर्फ आतंकवादियों के लांचिंग पैड्स को तबाह किया, उससे पाकिस्तान को ये संदेश मिल गया है कि आतंकवाद अब और अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने सेना की इस घोषणा का स्वागत किया कि फिलहाल इस आॅपरेशन को जारी रखने का इरादा नहीं है, लेकिन हर स्थिति का सामना करने में भारतीय सेना सक्षम है। रालोसपा सचिव ने कहा कि भारत हमेशा से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का शिकार रहा है। बार-बार सबूत दिए जाने के बावजूद पाकिस्तान ने अपनी जमीन पर आतंकवाद को शह देना बंद नहीं किया और पाकिस्तानी आतंकवादी भारत में घुसपैठ करके यहां दहशतगर्दी फैलाते रहे, खूनी खेल खेलते रहे। भारत ने हमेशा संयम बनाए रखा, पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाता रहा। इस बार भी भारतीय सेना को नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक इसलिए करनी पड़ी क्योंकि आतंकवादियों का गुट भारत में घुसपैठ करने की तैयारी में था। अगर भारतीय सेना कार्रवाई नहीं करती तो आतंकवादी घुसपैठ कर सकते थे।

वहीं जदयू प्रवक्ता नवल शर्मा ने कहा कि पाकिस्तान में आतंकी कैम्पों पर भारत का सर्जिकल स्ट्राइक स्वागतयोग्य कदम है। जदयू का प्रारम्भ से ही मानना रहा है कि राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता सर्वोपरि है और इससे खिलवाड़ करनेवालों को माकूल जवाब मिलना चाहिए । भारतीय सेना ने जिस कुशल रणनीति और शौर्य का प्रदर्शन किया उसके लिए वह बधाई की पात्र है । राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं पर राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए उठाये गए  प्रत्येक कदम के पीछे जदयू पूरी मजबूती से खड़ी है।

शराब पर टैक्स माफ, रोटी, कपड़ा, मकान महंगा : प्रेम

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता डा. प्रेम कुमार ने कहा कि मुुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक तरफ शराबबंदी का ढ़ोंग कर रहे हैं, वहीं राज्य के अंदर बन रहे विदेशी शराब के निर्यात पर कोई टैक्स नहीं लगाने की घोषणा की है। जब कि राज्य के अंदर वैट लगा कर नीतीश जी आपने रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई, दवा, मिठाई सभी महंगी कर दी। शराबबंदी को लेकर देशव्यापी दौरा कर रहे हैं, लेकिन शराब पर आपकी दोहरी नीति का पर्दा-फास हो गया, जनता सब जान चूकी है। यह राजनीति ड्रामा बंद करें।

डा. कुमार ने कहा कि राज्य की जनता पर महंगाई की मार वैट बढ़ा कर कर दी है। बच्चों की पढ़ाई का सामान हो या बुजुर्गों की दवाई सब महंगी कर दी। वैट के दायरे में पांच प्रतिशत आने वाले रोजाना उपभोक्ता की बस्तुएं मसलन दवा, बर्तन, होजरी, मसाला, माचिस, मोमबत्ती, बच्चों की पेंसिल, कॉपी, कंघी, केरोसिन, चश्मा सहित 150 वस्तुओं पर वैट लगा कर वस्तुओं की कीमत बढ़ा दी।

बेहतर बन रहे सूबे के अस्पताल :तेजप्रताप, धोती-कुरता पहन 'संवाद' कार्यक्रम में शामिल हुए स्वास्थ्य मंत्री

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव ने कहा की पुरे बिहार में महागठबंधन की सरकार बहुत बढ़िया काम कर रही है। अस्पतालों की व्यवस्था को भी और दुरुस्त किया जा रहा है।उन्होंने कहा की समस्याओं के समाधान के लिए पूरी ताकत लगाई जायेगी।

गुरुवार को वह राजद प्रदेश कार्यालय में 'संवाद'कार्यक्रम के तहत कार्यकतार्ओं और आम जनता से रूबरू हुए। इस मौके पर प्रमण्डलवार कार्यकताओं की बैठने की व्यवस्था थी। स्वास्थ्य मंत्री खुद सभी के पास जाकर उनकी बात सुनी और सभी का आवेदन लिया।कार्यकतार्ओं ने स्वास्थ्य, वन एवं पर्यावरण और लघु जल संसाधन विभाग से जुडी समस्याओं और सुझावों से मंत्री जी को अवगत कराया।इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री ने कहा की उन्हें स्वास्थ्य सहित कई विभागों से सम्बंधित आवेदन मिले हैं।कई जगह से अस्पताल में डॉक्टर ना होने का मामला सामने आया है। सभी समस्याओं पर वह गंभीरता से गौर करेंगे और इसका हरहाल में समाधान कराएँगे।उन्होंने राजद कार्यालय में सुव्यवस्थित कार्यक्रम के आयोजन के लिए सभी को धन्यवाद दिया। मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा की सभी आवेदन पर विभागवार सुनवाई होगी।कहीं भवन की समस्या है तो उसे भी देखेंगे।चिकनगुनिया और डेंगू से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा की सभी अस्पतालों में इससे लड़ने की व्यवस्था की गई है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष डॉ रामचंद्र पूर्वे ने की और स्वागत प्रधान महासचिव मुंद्रिका सिंह यादव ने किया।इस अवसर पर प्रदेश उपाध्यक्ष विनोद कुमार यादवेन्दु, रामनारायण मंडल, रामजी मांझी, महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष आभलता , प्रदेश प्रवक्ता प्रगति मेहता, चितरंजन गगन, मनीष यादव, मृत्युंजय तिवारी, पटना जिलाध्यक्ष देवमुनि सिंह यादव, छात्र राजद प्रदेश अध्यक्ष अजित यादव, प्रदेश महासचिव नंदू यादव, बल्ली यादव, देवकिशुन ठाकुर, संजीव यादव, प्रकोष्ठ अध्यक्षों में सुनील यादव, सुरेन्द्र कुमार, अशोक सिंह, विजय यादव,कुमार आशीष, रामश्रेष्ठ दीवाना, सनोज यादव,कार्तिक प्रसाद सहित अन्य पार्टी नेता उपस्थित थे।

बड़े भाई के दबाव में नीतीश : पांडेय

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पाण्डेय ने कहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कानून का राज का दावा जनता को सरासर धोखा देने वाला है । असलियत यह है कि बड़े भाई के दबाव में काम कर रहे नीतीश कुमार अपराध नियंत्रण के मुद्दे पर बिल्कुल असहाय और लाचार साबित हो रहे हैं।

शहाबुद्दीन अंदर रहेंगे या बाहर, आज होगा फ़ैसला

नयी दिल्ली / पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - राजद के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन की जमानत के खिलाफ दायर याचिका पर गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गयी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार तक फैसला सुरक्षित रखा है. दो घंटे चली दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कल सुनाने की बात कही है. मामले की सुनवाई गुरुवार की सुबह 10.30 बजे से शुरू हुई. शहाबुद्दीन की ओर से वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी आज भी सुनवाई के दौरान बहस में शामिल नहीं हुए है. उनके वकील शेखर नाफरे ने आज सुप्रीम कोर्ट में शहाबुद्दीन का पक्ष रखा.

मिली जानकारी के मुताबिक सुनवाई के दौरान शहाबुद्दीन ने कोर्ट से गुहार लगायी है कि मेरी जमानत रद ना करें. मैं बिहार से बाहर जाने के लिए भी तैयार हूं और कहीं भी रह लूंगा.

बताते चलें कि इस मामले में बुधवार को भी सुनवाई हुई थी और कोर्ट ने तीन याचिकाओं पर दलीलें सुनीं फिर सुनवाई गुरुवार को भी जारी रखने के आदेश दिए थे. सुप्रीम कोर्ट में शहाबुद्दीन की ओर से केस लड़ रहे वकील शेखर नाफ्रे ने शहाबुद्दीन का पक्ष रखते हुए कहा कि चार्जशीट में उनको आरोपी नहीं बनाया गया है. उन्होंने कहा कि शहाबुद्दीन की चार्जशीट और पूरक चार्जशीट कोर्ट में भी कमी पाई गयी है. उनकी चार्जशीट कोर्ट को क्यों नहीं सौंपी गयी. उन्हें बिना कानूनी वजहों के ही सिवान जेल से भागलपुर जेल शिफ्ट किया गया. इससे पहले बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को इस बात के लिए कड़ी फटकार लगायी कि उसने पटना हाइकोर्ट के समक्ष तथ्य क्यों नहीं रखा.

वहीं, पीड़ित चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने शहाबुद्दीन को जमानत देने के पटना हाइकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाये और कहा कि हिस्ट्रीशीटर को जमानत पर छोड़ना न्याय का मजाक है. सुनवाई गुरुवार को भी होगी. न्यायमूर्ति पी सी घोष और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय के पीठ ने बिहार सरकार से पूछा, ह्यक्यों आपने उसकी (शहाबुद्दीन की) रिहाई के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया? क्या उसके जमानत पाने तक आप सोये हुए थे? यह एक विचित्र मामला है. लेकिन, सवाल है कि यह अनोखापन किसके इशारे पर किया गया है और कौन इसके पीछे है? पीठ ने कहा, ह्यआपने 45 मामलों में शहाबुद्दीन को जमानत दिये जाने को चुनौती क्यों नहीं दी? क्यों उसके जेल से बाहर आने के बाद ही आपको यह महसूस हुआ? अगर सब कुछ निष्पक्ष था, तो क्यों यह मामला हमारे पास आया? पीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब बिहार सरकार की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने की मांग करते हुए  कहा कि रिहाई का हाइकोर्ट का आदेश अनुचित था. द्विवेदी ने कहा, ह्यमैं विसंगतियों की बात मानता हूं. मैं राज्य सरकार के कृत्यों को किसी तरह से उचित नहीं ठहरा रहा हूं.  हम उस समय पंगु थे. लेकिन, मेरी दलील है कि मामले में प्रासंगिक सामग्री की  अनदेखी की गयी है.' पीठ ने तब उनसे पूछा, आप क्यों पंगु होंगे. आप राज्य हैं. आपका यह कर्तव्य था कि हाइकोर्ट को सूचित  करें कि शहाबुद्दीन ने सत्र अदालत में पुनरीक्षण याचिका दायर की है. आपने उस वक्त हाइकोर्ट को क्यों नहीं बताया?' पीठ ने कहा, ह्यहम मामले की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों को देख कर सिर्फ इस बात का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि वह किस तरह का व्यक्ति है. उसके खिलाफ कितने मामले लंबित हैं. वह चार बार सांसद और दो बार विधायक रह चुका है. हम सिर्फ यह सोच रहे हैं कि आम आदमी की सोच क्या है. उसके खिलाफ इतने सारे मामले हैं और इतने सारे जमानत के आदेश हैं.' द्विवेदी ने कहा कि शहाबुद्दीन को पहली बार 2005 में जेल भेजा गया था और तब से वह जेल के भीतर से अपराध कर रहा है. इसी वजह से उसे सीवान जेल से भागलपुर जेल स्थानांतरित किया गया. उन्होंने कहा कि राजद नेता को ज्यादातर मामलों में बरी कर दिया गया, क्योंकि गवाहों ने उसके खिलाफ गवाही देने से मना कर दिया. सीवान निवासी चंदा बाबू की तरफ से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी शहाबुद्दीन की जमानत रद्द करने की मांग की और कहा कि उसे जमानत पर छोड़ना न्याय का मजाक है. भूषण ने कहा कि एक हिस्ट्रीशीटर को जमानत देकर हाइकोर्ट ने गलती की. दो मामलों में शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा और  दूसरे अन्य  मामलों में 30 साल की सजा हुई है. ऐसे अपराधी  को जमानत पर  रहने का हक नहीं मिलना चाहिए.  शहाबुद्दीन की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाडे ने कहा कि उनका मुवक्किल मीडिया ट्रायल का शिकार है. राज्य सरकार को निष्पक्ष होना होगा और व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता.

सीवान शहर में हाइअलर्ट का असर, एसटीएफ करता रहा गश्त

सीवान/पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - सर्वोच्च न्यायालय में मो. शहाबुद्दीन की जमानत के विरुद्ध सुनवाई को लेकर जारी रेड अलर्ट का असर गुरूवार को शहर में हर तरफ दिखा. सुरक्षा व चौकसी के लिहाज से एसटीएफ के जवान बाइक से दिन भर गश्त करते रहे. दूसरी तरफ 22 मजिस्ट्रेटों की देखरेख में तैनात पुलिस पदाधिकारियों व सिपाहियों की नजर सुरक्षा पर रही. दोपहर बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अधूरी रहने के चलते कोई निर्णय नहीं होने की खबर आने के बाद सुरक्षा में लगे जवानों ने राहत की सांस ली.

 काटजू पर चले देशद्रोह का मुकदमा : शरद

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - बिहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू द्वारा की गयी टिप्पणी पर अपना विरोध जताते हुए जदयू सांसद शरद यादव ने कहा कि उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिहार के खिलाफ की गयी टिप्पणी की मैं निंदा करता हूँ। कड़े कानून के तहत मामला दर्ज होने के बाद भविष्य में काटजू सावधान हो जायेंगे। ऐसे व्यक्ति से इस तरह की टिप्पणियों की उम्मीद नहीं की जाती, जो न्यायपालिका में जिम्मेदार पद पर रह चुका है। विभिन्न विषयों पर वह जो बोलते और लिखते हैं वो आम तौर पर हमेशा हास्यास्पद होता है।

स्टुडेंट क्रेडिट कार्ड योजना के लिए बैंकों से करार

पटना(अपना बिहार, 30 सितंबर 2016) - राज्य सरकार के सुशासन कार्यक्रम 2015-20 के अंतर्गत विकसित बिहार के सात निश्चय के अधीन आर्थिक हल युवाओं को बल के तहत बिहार सरकार एवं विभिन्न बैंको के बीच समझौता ज्ञापन पर मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, विकासायुक्त शिशिर सिन्हा एवं प्रधान सचिव, शिक्षा आर.के. महाजन की मौजूदगी में हस्ताक्षर हुआ। इस अवसर पर प्रधान सचिव शिक्षा ने बताया कि एचडीएफसी, बैंक आॅफ बड़ोदा,  इंडियन बैंक, इलाहाबाद बैंक, बिहार मध्य ग्रामीण बैंक, आई0डी0बी0आई, भारतीय स्टेट बंैक, एक्सीस बैंक, आईसीआईसीआई, ओरियेंटल बैंक, यूको बैंक, बिहार ग्रामीण बैंक, पंजाब नेषनल बैंक, स्टेट बैंक आॅफ बिकानेर एण्ड जयपुर तथा यूनाईटेड बैंक आॅफ इंडिया से समझौता हुआ है। इस योजना के अंतर्गत 12वीं कक्षा उतीर्ण विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इससे पूर्व छात्र स्वंय बैंक से सीधे संपर्क साधकर ऋण लेते थे परन्तु अब सरकार के द्वारा  बैंको से छात्र ऋण हासिल कर सकेंगे। उच्च शिक्षा में राज्य का सकल नामांकन अनुपात वर्तमान में 13 प्रतिशत है। जबकि राष्ट्र स्तर पर ये 24 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर से बराबरी करने में स्टुडेंट क्रेडिट कार्ड योजना सहायक होगा।

हो परेशानी तो सीधे करें शिकायत : मुख्यमंत्री

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - अब राज्य के अंदर या बाहर से कोई भी व्यक्ति किसी तरह की शिकायत पुलिस से सीधे कर सकता है. बुधवार से 24७7 काम करने वाले इस पुलिस हेल्प लाइन नंबर का शुभारंभ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सीएम सचिवालय के सभाकक्ष में आयोजित एक कार्यक्रम में किया. उन्होंने इस हेल्प लाइन नंबर को सुशासन के कार्यक्रम को पुख्ता और सशक्त तरीके से लागू करने का सबसे उचित माध्यम बताया. पुलिस महकमा से कहा कि वे इस हेल्प लाइन नंबर को ठीक से चलाये, आम लोगों का भरोसा जीतने के साथ-साथ पुलिस के प्रति विश्वास और भरोसा बढ़ाने का काम करेगा. इस हेल्पलाइन पर कोई व्यक्ति पुलिस के खिलाफ या किसी तरह के मामले की शिकायत कर सकते हैं. शिकायत का क्या हुआ, किसके स्तर पर निपटारा करने में देरी या लापरवाही हुई, इसका पूरा रिकॉर्ड रहेगा.

श्री कुमार ने कहा कि कोई पदाधिकारी अपनी जिम्मेवारी से मुकर नहीं सकते. उन्होंने कहा कि इस तरह की हेल्पलाइन में पहले कुछ लोग फोन करके इसे टेस्ट करेंगे कि काम कर रहा है या नहीं. परंतु इससे परेशान नहीं होना है. इसमें काम करने वाले को प्रशिक्षित करें, ताकि इस बहुआयामी सुविधा से लोगों को लाभ मिले. फोन करने वालों के साथ अच्छा व्यवहार करें. सीएम ने इस दौरान बांका पुलिस लाइन और 48 थाना समेत 151 पुलिस भवनों का भी उद्घाटन रिमोट के जरिये किया. साथ ही अलग-अलग जिलों में 29 पुलिस भवनों का भी शिलान्यास तथा 559 थानों में दो महिला शौचालय और स्नानागार का भी लोकार्पण किया. राज्य में आठ थाने ऐसे हैं, जिसमें महिला शौचालय का निर्माण जमीन विवाद के कारण नहीं किया जा सका है.

सीएम ने मजकिया लहजे में कहा कि थाने की जमीन को लेकर विवाद है, यह आश्चर्य है. थाना तो जहां विवाद नहीं होता है, वहां विवाद खड़ा कर देता है. फिर ऐसा कैसे हो गया, लगता है 'रुतबा एकबाल' में कमी हो रही है. उन्होंने कहा कि सभी थानों में महिला शौचालय और थाना भवन बनाने की मुहिम स्कूल के भवन निर्माण की मुहिम की तरह चलाने की जरूरत है. इसके लिए सभी संबंधित थानों के थानेदार को ही इस निर्माण कार्य की जिम्मेवारी सौंप दी जाये. उन्होंने कहा कि थानेदार के हाथ में निर्माण की जिम्मेवारी होगी, तो उस बाजार में हर कोई इस काम में पूरे मन से मदद नहीं करेगा. बढ़िया मैटेरियल मिलेगा, हर कोई थाना से रिश्ता अच्छा बनाकर रखना चाहता है. सीएम ने कहा कि पहले थाना भवनों की खराब हालत को देखकर दूर से ही पता चल जाता था. अब हालत काफी बेहतर हुई है.

राज्य की सभी जिलों में एक-एक पोस्टमार्टम हॉउस बनाया जायेगा. इस योजना की स्वीकृति दे दी गयी है. पोस्ट मार्टम हाउस की हालत बेहद खराब है. कटिहार की कुछ दिनों पहले की घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक नष्ट हुई लाश का पोस्टमार्टम करने से वहां के डॉक्टरों ने मना कर दिया था. इस तरह की घटना मीडिया में आने के बाद मन को काफी तकलीफ होती है. दिन भर काम करने पर ऐसा कुछ होने से मन दुखी हो जाता है. थानों में गाड़ी समेत ऐसी अन्य जरूरतों के लिए थाना के हिसाब से 25, 15 और 10 हजार रुपये मुहैया करायी जाती है. उन्होंने कहा कि ऐसी फोटो तेजी से 'वायरल' हो जाता है. ऐसे वायरल बड़ी खराब बीमारी होती है, लेकिन आजकल तो फोटो वायरल होने लगा है.

सीएम ने कहा कि बिहार मजाक उड़ाने लायक नहीं, यहां से बहुत कुछ सीखने लायक है. आजकल बाहरी लोग नहीं, बल्कि राज्य के ही लोग इस तरह का काम करने लगे हैं. यह कैसी मानसिकता है, बेहद अफसोसजनक स्थिति है. अपने ही राज्य की छवि को खराब करने में जुटे हैं. हाल में एक बाहरी व्यक्ति ने मजाक उड़ाया था, जिसका उन्हें अच्छा खासा जवाब मिल गया. उन्होंने कहा कि मैं काम के जरिये जवाब देना चाहता हूं. बहुत चीजों का उत्तर नहीं देना ही अच्छा होता है.

अदालती आदेश पर बंद हो राजनीति : तेजस्वी

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - दो दिवसीय दौरे पर भागलपुर पहुंचे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने शहाबुद्दीन मामले पर विपक्ष के लगाए जा रहे आरोपों के जवाब में कहा कि सीवान के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन के मामले को विपक्ष जानबूझकर हौवा बना रहा है। यह बिहार सरकार को बदनाम करने की साजिश है। अदालत और सरकार अपना काम कर रही है। इसलिए अदालत के आदेश पर राजनीति बंद होनी चाहिए।

भागलपुर परिसदन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान तेजस्वी यादव विपक्ष पर आक्रामक दिखे। पूछा-शहाबुद्दीन को जमानत मिलना कोई पहला मामला तो है नहीं? भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित साह पर भी कई गंभीर आरोप थे। अदालत ने उन्हें बरी किया तो भाजपा अपील में क्यों नहीं गई? असीमानंद मामले में विपक्ष चुप क्यों है? अनंत सिंह पर हुई कार्रवाई पर भाजपा क्यों नहीं कुछ नहीं बोल रही है? अदालत के आदेश का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा तेजप्रताप यादव को भेजे गए नोटिस पर उपमुख्यमंत्री ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में नोटिस का जवाब दिया जाएगा।

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष बताए कि बिहार में जंगलराज कहां है? देश में आपराधिक घटनाओं में बिहार 22वें पायदान पर है। इससे अधिक अपराध भाजपा शासित राज्य महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हो रहे हैं। दिल्ली की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। भाजपा सिर्फ अफवाह फैलाने में लगी है। जनता इसका मुंहतोड़ जवाब देगी।

उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान वर्तमान पीएम नरेन्द्र मोदी और एनडीए के नेताओं ने उनकी पार्टी व पिता के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया। सुशील मोदी ने बड़े मियां और छोटे मियां तक की संज्ञा दे डाली। अब जब सरकार बन गई है तो जनादेश का सम्मान करना चाहिए। भाजपा और आरएसएस उनकी पार्टी और परिवार के लिए क्या साजिश रच रही है, इसकी जानकारी है। सही समय आने पर जवाब दिया जाएगा। पूरे बिहार में प्रमंडलवार जनसंवाद कार्यक्रम चलाकर जनता की राय ली जाएगी। अभी सरकार केवल तरक्की और विकास पर ध्यान दे रही है। युवाओं के भविष्य को लेकर काम किया जा रहा है।

शराबबंदी कानून के हित में है सरकार का निर्णय, आमिर सुबहानी ने दी सफाई

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - राज्य सरकार द्वारा पूर्ण नशाबंदी लागू होने के बाद विदेशी शराब एवं बीयर की खरीद-बिक्री एवं उपभोग पर रोक है परन्तु उसका विनिर्माण या बोटलिंग पर शतप्रतिशत छूट को लेकर लिये गये निर्णय पर विवाद के सफाई में प्रधान सचिव उत्पाद एवं मद्य निषेध आमिर सुबहानी ने कहा है कि यह शराबबंदी कानून के हित में है। उन्होंने कहा कि राज्य में पूर्ण नशाबंदी लागू होने के बाद विदेशी शराब एवं बीयर की खरीद-बिक्री एवं उपभोग पर रोक है परन्तु उसका विनिर्माण या बोटलिंग प्रतिबंधित नहीं है। राज्य में भारत निर्मित विदेशी शराब और बीयर का बोटलिंग प्रतिबंधित नहीं होने के कारण राज्य में स्थापित विदेशी शराब एवं बीयर की ईकाइयों द्वारा बोटलिंग किया जा रहा है किन्तु राज्य में इनका व्यापार प्रतिबंधित होने के कारण इनके उत्पाद की बिक्री नहीं हो रही है। इन इकाइयों के समक्ष दूसरे राज्यों में निर्यात के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत निर्मित विदेशी शराब और बीयर के बोटलिंग प्लांट में राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों द्वारा काफी पूंजी निवेश किया गया है। वर्तमान में बीयर बनाने वाली तीन ब्रिवरिज और बारह विदेशी शराब के बोटलिंग प्लांटस हैं जो क्रमश: बीयर बनाती है और बोटलिंग तथा कम्पाउडिंग करती है। इन कंपनियों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ है। इन कंपनियों के द्वारा उत्पादित बीयर तथा विदेशी शराब के स्टॉक को राज्य के बाहर भेजने की आवश्यकता है ताकि शराब का स्टॉक राज्य में पड़ा न रहे।

उन्होंने कहा कि इस कारण राज्य सरकार के निर्णयानुसार विदेशी शराब एवं बीयर को राज्य से बाहर ले जाने की अनुमति तथा निर्यात शुल्क एवं बोटलिंग फी में छूट देने का निर्णय  लिया है। उन्होंने कहा कि निमार्ताओं द्वारा उत्पाद जिस ट्रक से बाहर भेजा जायेगा उस पर ळच्ै - क्पहपजंस स्वबा अपने खर्चे पर लगाया जायेगा तथा ैमबनतपजल ।हमदबल की सुरक्षा में माल को गंतव्य स्थान तक पहुँचाया जायेगा। वे जो माल बाहर भेजेंगे उसका विस्तृत ब्यौरा उत्पाद विभाग को उपलब्ध करायेंगे। अगर उसमें से कोई भी उत्पाद बिहार के क्षेत्र में कहीं भी पाया जाता है तो उनके विरूद्ध कार्रवाई की जायेगी। साथ ही ये शराब के पुराने स्टाक को लेबल बदलकर 3 माह में निर्यात करना सुनिश्चित करेंगे। अगर वे पुराने स्टॉक निकालने की गांरटी नहीं देते हैं तो उन्हें निर्यात की अनुमति/परमिट नहीं दी जायेगी। निर्यातक को एक करोड़ रुपये की बैंक गारंटी प्रतिवर्ष प्रतिभूति के तौर पर रखनी होगी।

71 फीसदी दलित अशिक्षित : चौधरी, अमेरिका के हार्वर्ड विवि में बोले शिक्षा मंत्री

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एक व्याख्यान को संबोधित करते हुए सूबे के शिक्षा मंत्री डा. अशोक चौधरी ने कहा कि राज्य के 71 फीसदी दलित अशिक्षित हैं। अपने व्याख्यान की शुरूआत में उन्होंने भारत में दलित की ऐतिहासिक स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि दलित की बहुत सी जातियाँ जो घूम-घूम कर षिकार करती थीं तथा जो उस समय के ब्राह्मणवादी समाज में घुल-मिल नहीं सकी, उन्हें समाज में अछूत करार दिया गया, तथा गुप्ता शासन के अंततक उनसे समाज के निम्नतम वर्ग का काम लिया जाता था। उन्होंने कहा कि सरकार के कई प्रयासों के बाबजूद दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अभी बहुत दयनीय है। डा. चौधरी ने कहा कि बिहार में करीब दो-तिहाई दलित गरीब हैं एवं 71 प्रतिशत अशिक्षित है। राज्य में केवल चार प्रतिशत दलित ही स्नातक एवं उससे अधिक की शिक्षा प्राप्त कर सके हैं। अगर उन्हें सरकारी नौकरी हासिल होती है तो उन्हें चतुर्थ वर्ग में ही नौकरी मिलती है। उन्होंने कहा कि कुछ अध्ययन में पता चला है कि शत-प्रतिशत सफाई कर्मचारी अनुसूचित जाति के हैं एवं इसमें करीब 82.54 प्रतिषत दलित वर्ग के चार जातियाँ, डोम, मेहतर, बँफोड़ एवं भंगी से आती हैं। इस आंकड़ा से स्पष्ट है कि सदियों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था अनुसूचित जाति के प्रति क्या दृष्टिकोण रखती है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गतिशील नेतृत्व में दलितों के उत्थान के लिये कई कार्यक्रम चलाये गये हैं। महादलित विकास मिषन के अन्तर्गत कई योजनाएं चलायी गयी हैं, जिसमें महादलित जमीन, घर बास के लिये दशरथ मांझी कौशल विकास योजना, मैला ढोने की प्रथा की समाप्ति, कम्यूनिटी हाल एवं कार्यस्थल पर विश्राम स्थल का निर्माण, विकास मित्र योजना एवं जिला तथा प्रखण्ड स्तरीय रिसोर्स सेन्टर का निर्माण, जहां ट्रेनिंग और शोध की व्यवस्था है।

जदयू प्रखंड अध्यक्ष को बचाने में जुटे सीएम : सुमो

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने आरोप लगाया है कि पहले के के पाठक जैसे ईमानदार और कर्मठ आईएएस अधिकारी को कुर्बान करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब उत्पाद विभाग के एसआई दीपक सिंह को दुबारा निलम्बित कर यह साबित कर दिया है कि अपनी पार्टी के एक प्रखंड अध्यक्ष को बचाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में लगने वाले नए उद्योगों के लिए सभी तरह की रियायतों को समाप्त करने वाले नीतीश कुमार ने राज्य में उत्पादित विदेशी शराब और बीयर की बोटलिंग व निर्यात को पूर्णतया टैक्स फ्री कर दिया है। अब नीतीश कुमार किस मुंह से झारखंड में जाकर शराबबंदी का प्रचार करेंगे?

श्री मोदी ने कहा कि उत्पाद विभाग के अधिकारी को बलि का बकरा बनाने वाले नीतीश कुमार बतायें कि क्या किसी को फंसाने के लिए एक बोतल शराब ही काफी नहीं है? जब एक बोतल शराब रखने से ही कोई फंस सकता है तो फिर 168 बोतल शराब कोई क्यों रखेगा? हरनौत जदयू प्रखंड अध्यक्ष के मामले के अलावा शराबबंदी से जुड़े और कितने मामलों की डीएम-एसपी ने संयुक्त जांच की है? क्या अपनी पार्टी के एक नेता को बचाने के लिए नीतीश कुमार नियम-कानून के परे किसी भी हद तक जा सकते हैं?

पूर्व उपमुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार से झारखंड में 7 लाख 91 हजार बल्क लीटर बीयर भेजी गई है। क्या नीतीश कुमार अब भी झारखंड में जाकर शराबबंदी का प्रचार करेंगे? शराब को अनैतिक कारोबार मानने वाले नीतीश कुमार में अगर थोड़ी भी नैतिकता बची हो तो अविलम्ब बिहार के शराब कारखानों को बंद करें। अपने किसी प्रिय को बचाने के लिए उत्पाद विभाग के अधिकारियों को बलि का बकरा बना कर उनका मनोबल नहीं तोड़ें।

अदालत परिसरों में बहाल होंगी जन-सुविधायें

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - पटना हाईकोर्ट द्वारा निर्देश मिलने के बाद एक बार फिर राज्य सरकार सजग हुई है। राज्य सरकार के भवन निर्माण विभाग ने सभी अदालतों में जन-सुविधायें बहाल करने के संबंध में अपने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है। अपने निर्देश में विभाग ने कहा है कि पटना हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन के क्रम में सभी अदालत परिसरों में पेयजल, शौचालय, वृद्धों के लिए लिफ्ट, दिव्यांगों को लिए रैम्प आदि का निर्माण कराया जाना है। इसके लिए विभाग ने अपने पदाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस मद में 15 लाख रुपए तक की राशि वे अपने स्तर से उपयोग कर सकते हैं। बताते चलें न्यायालय परिसरों में जन सुविधाओं के अभाव को लेकर एक जनहित याचिका की सुनवाई के क्रम में पटना हाईकोर्ट ने बीते सात सितंबर को राज्य सरकार को निर्देश जारी किया था।

सात निश्चय के नाम पर खेल रहे नीतीश, नंद किशोर यादव ने लगाया आरोप

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - वरिष्ठ भाजपा नेता सह लोक लेखा समिति के सभापति नंदकिशोर यादव ने कहा कि राज्य सरकार सात निश्चय के नाम पर कित-कित खेलना बंद करे। नीतीश जी की सरकार बने साल भर होने को हैं, पर अभी तक सात निश्चय की भूमिका ही तैयार की जा रही है। दस माह के पूरे कार्यकाल में नीतीश सरकार ने शेल-विल के अलावा कुछ नहीं किया। योजनाएं लागू होंगी और कार्यक्रम शुरू होंगे जैसी भाषणबाजी से इतर कुछ हुआ नहीं। चुनाव के समय जो लोकलुभावन वायदे नीतीश जी ने किये थे, उसका संकलन सात निश्चय भी दूर-दूर तक जमीन पर उतरता नहीं दिख रहा है। केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को ही सात निश्चय के रुप में प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। उसका भी कार्यान्वयन अब तक प्रारंभ नहीं हुआ। दस माह बीतने के बाद सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए योजनाओं की लांचिंग और इनोग्रेशन समारोह कराये जा रहे हैं। बेहतर होगा कि दिखावे करने के बजाय नीतीश जी योजनाओं को जमीन पर उतारने की कार्रवाई करें। श्री यादव ने कहा कि महागठबंधन की सरकार की प्राथमिकता में विकास है ही नहीं। सरकार आपसी खींचतान से गुजर रही है। तथाकथित महागठबंधन के दो धड़ों के नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने में लगे हुए हैं। संवादहीनता की स्थिति है। सरकार के मुखिया खींचतान और टकराव से ध्यान हटाने के लिए जनता के पैसे का दुरुपयोग कर सिर्फ समारोह आयोजित कर रहे हैं।

श्री यादव ने कहा कि सात निश्चय को लेकर ही सरकारी स्तर पर अब तक कई समारोह हो चुके हैं। समारोहों के जरिये नीतीश जी सुर्खियां भले बटोर रहे हैं, जनता खुद को ठगा ही महसूस कर रही है। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी शासन काल के छह माह बाद से ही कार्यों का हिसाब मांगने वाले नीतीश जी में अगर थोड़ी भी नैतिकता बची है तो दस माह में जमीन पर उतारी गयी एक भी योजना का नाम बता दें।

जनता को धोखा देने के लिए सात निश्चय : प्रेम

पटना(अपना बिहार, 29 सितंबर 2016) - बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता डा. प्रेम कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय जनता को सिर्फ धोखा देने के लिए हो रहा है, जमीन पर काम होने में शक बना हुआ है। क्यों की नीतीश कुमार की सरकार घोषणाओं की सरकार बन गयीं है। नीतीश जी आपने पहले जितनी घोषणाएं की वह आज तक पूरी नहीं हुई और आए दिन नई घोषणाएं करते जा रहे हैं।

डा. कुमार ने कहा कि नीतीश जी आपने कई घोषणाएं की, जिनमें कृषि रोड मैप, कोसी ़त्रास्दी से नुकसान की क्षतिपूर्ति की बातें कहीं, बाढ़ पीड़ितों हर राहत देने की बातें कहीं, लेकिन कोई पूरा नहीं हुआ। नीतीश जी आपकी सरकार की लापरवाहियों के कारण 2300 करोड़ रुपये की परियोजनाएं रूक गयीं है। नीतीश जी आपने शिक्षकों की बहाली और नियमित वेतन देने की बातें कही आज तक शिक्षकों को कुछ नहीं मिला। नई औद्योेगिक नीति लायीं, सिर्फ हाथी के दांत दिखाने वाली नीति बन कर रह गयीं। यहां उद्योग की लिए आधारभूत संरचना नहीं है।

जानिये किस कारण अनंत सिंह पर लगा सीसीए

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) - गृह विभाग ने जेल में बंद मोकामा विधायक अनंत सिंह पर सीसीए (क्राइम कंट्रोल एक्ट) लगाने से संबंधित प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है. मंगलवार को इस प्रस्ताव पर सहमति प्रदान करने से संबंधित मामले की पुष्टि विभागीय प्रधान सचिव आमिर सुबहानी ने की. उन्होंने कहा कि इस मामले पर आपत्ति जताते हुए पटना डीएम से जो सवाल पूछे गये थे, उससे विभाग पूरी तरह से संतुष्ट है. इसके मद्देनजर सीसीए लगाने के प्रस्ताव पर सहमति दे दी गयी है. इससे पहले भी पटना डीएम ने विधायक पर सीसीए लगाने से संबंधित प्रस्ताव तैयार करके गृह विभाग को भेजा था. परंतु गृह विभाग ने यह कह कर इस प्रस्ताव को लौटा दिया था कि जो व्यक्ति पहले से ही जेल में बंद है, उस पर सीसीए लगाकर फिर से जेल में बंद करने का क्या औचित्य है.

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, गृह विभाग के इस सवाल का ठोस जवाब तैयार करके जिला प्रशासन ने विभाग को सौंपा है, जिसके बाद सीसीए लगाने का फैसला लिया गया है. जिला प्रशासन ने अपनी दलील में कहा है कि विधायक के बाहर आने से राज्य की खासकर शहर की विधि-व्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ेगा. इन्हें जल्द ही बेल मिलने जा रही है, जिसके बाद ये बाहर आ जायेंगे और इनके बाहर आते ही कई तरह की आपराधिक गतिविधि शुरू होने की पूरी आशंका है. इतना ही नहीं इन्होंने जेल के अंदर से भी कई अपराधिक मामलों को अंजाम दिया है. जेल में रहने के दौरान ही इन्होंने अपने मुकदमा में कई गवाहों को धमकी दी है. जेल के अंदर से ही डीएसपी को भी धमकी दी है, जिसकी शिकायत भी डीएसपी ने करवायी है. सीसीए लगने के बाद अब विधायक को कम से कम एक वर्ष के लिए जेल में रहना पड़ सकता है. नियमानुसार, दो महीने के अंदर हाइकोर्ट में आरोपी सीसीए के आदेश को चुनौती दे सकता है. इस पर डीएम को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर सीसीए लगाने का सही और ठोस कारण बताना होगा. इसके बाद ही यह अधिकतम एक वर्ष के लिए बरकरार रह सकता है. अगर न्यायालय को सीसीए लगाने का कारण उचित प्रतित नहीं हुआ, तो आरोपी पर लगा सीसीए निरस्त भी हो सकता है और वह बाहर भी आ सकता है.

बिहार के माई-बाप न बनें कोई : मुख्यमंत्री, काटजू पर किया पलटवार

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायधीश माकंर्डेय काटजू की बिहार को लेकर की गयी टिप्पणी पर आज कड़ी आपत्ति जतायी और कहा कि वह प्रदेश के माई बाप बन रहे हैं. पटना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नीतीश ने काटजू की बिहार को लेकर की गयी टिप्पणी पर उनका नाम लिए बिना कहा कि घर बैठे बिहार के माई..बाप बन रहे हैं. नीतीश ने काटजू के खिलाफ उक्त प्रतिक्रिया उनके द्वारा फेसबुक के जरिए की गयी उक्त टिप्पणी हम पाकिस्तान को हम कश्मीर एक शर्त पर दे सकते हैं, पाक को कश्मीर के साथ-साथ बिहार भी लेना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि आजकल कुछ लोगों को छपने की बीमारी होती है, न तो बिहार पर कुछ-कुछ बोल देंगे.

उन्होंने कहा कि सुना है कि एक आदमी ने कुछ बोला है, कश्मीर के साथ बिहार को भी देने को तैयार हैं, लगता है वे बिहार के माई-बाप हैं, मालिक हैं क्या, तरह-तरह का बात बोलते हैं.  मुख्यमंत्री ने बिहार जो कि भगवान बुद्ध, महावीर, चाणक्य और शून्य का अविष्कार करने वाले आर्यभट्ट की धरती रही है. उसके गौरवशाली इतिहास की चर्चा करते हुए कहा कि मगध शासक जिनका शासन क्षेत्र पूरा देश था उनकी राजधानी पाटलीपुत्र रही है. उल्लेखनीय है प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष पर रहने के दौरान काटजू ने नीतीश कुमार के बिहार में पिछले शासन काल के दौरान प्रेस की आजादी नहीं होने का आरोप लगाया था.

बिहार सरकार का अजीबोगरीब फ़ैसला, शराब पीना बंद, बनाने को मिलेगी ढेर सारी सहुलियतें

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) - राज्य सरकार ने अजीबोगरीब फ़ैसला लिया है। नये फ़ैसले के अनुसार बिहार में शराब पीने और बेचने पर पाबंदी तो है लेकिन शराब के औद्योगिक उत्पादन के लिए सरकार हर संभव सहायता करेगी। इस आशय की जानकारी मंत्रिमंडल सचिव ब्रजेश मेहरोत्रा ने मंगलवार को मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में दी। उन्होंने कहा कि निबंधन, उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग के अन्तर्गत राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करने के पश्चात् विदेशी शराब एवं बीयर के व्यापार में संलग्न उद्योग/प्रतिष्ठानों के द्वारा उत्पादित भारत निर्मित विदेशी शराब और बीयर के निर्यात शुल्क तथा बोटलिंग फी में शत-प्रतिशत छूट के संबंध में नीतिगत निर्णय की स्वीकृति दी गई। उनहोंने बताया कि चूँकि राज्य में शराबबंदी कानून के तहत विदेशी शराब के भी व्यापार एवं उपयोग पर संपूर्ण राज्य में रोक है लेकिन उसके विनिर्माण या वोटलिंग पर प्रतिबंध नहीें है। अत: उनके उत्पाद को संरक्षण के संदर्भ में दूसरे राज्यों में निर्यात की राहत सुगम की गई है। इससे उन्हें निर्यात की सुविधा मिलने से बाजार सुलभ हो सकेगा।

इससे पहले राज्य सरकार ने अपने निश्चयों को तरजीह देते हर घर नल का जल योजना के लिए कुल 239.10 करोड़ रुपए मंजूर किये हैं। उन्होंने बताया कि बैठक में कुल 30 एजेंडों पर निर्णय लिए गये। उन्होंने बताया कि आज के निर्णयों में सबसे पहले खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग के अन्तर्गत डोर स्टेप डिलेवरी योजना-2016 के अन्तर्गत वित्तीय वर्ष 2016-17 में संभावित कुल व्यय रूपए 153212 लाख (एक लाख तिरपन हजार दो सौ बारह लाख रुपए) व्यय की स्वीकृति दी गई। वहीं नगर विकास एवं आवास विभाग के अन्तर्गत केन्द्र प्रायोजित अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन योजना के अंतर्गत किशनगंज (फेज-1), बेगुसराय, बिहारशरीफ (फेज-1), एवं दरभंगा नगर निकायों के जलापूर्ति योजना के कार्यान्वयन हेतु कुल 239.1090 करोड़ रूपए (दो अरब उन्नचालीस करोड़ दस लाख नब्बे हजार रूपए) मात्र अनुमानित लागत व्यय एवं योजना की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई।

श्री मेहरोत्रा ने बताया कि जल संसाधन विभाग के अन्तर्गत औद्योगिक, व्यावसायिक एवं म्युनिसिपल उपयोग हेतु जल प्रभार दर में वृद्धि के प्रस्ताव पर स्वीकृति दी गई। तदनुसार पूर्व में अप्रैल 1998 से प्रभावी 4.50 रुपए प्रति हजार गैलन की जगह पर अब 18 रुपए प्रति हजार गैलन का नया जल प्रभार दर लागू होगा। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के अन्तर्गत बिहार लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण अंचलीय लिपिकीय संवर्ग (भर्ती एवं सेवा शर्त्तें) नियमावली-2016 की स्वीकृति तथा लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के ही तहत विभाग में कार्यपालक अभियंता (यांत्रिक) वेतनमान रुपए 15,600-39,100 $ ग्रेड वेतन रु0 6600/-से अधीक्षण अभियंता (यांत्रिक) वेतनमान रुपए 37,400-67,000 $ ग्रेड वेतन रु0 8700/-के पद पर प्रोन्नति की स्वीकृति दी गई।

साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के अन्तर्गत एमसीआई आपत्तियों के निराकरण हेतु इन्दिरा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, शेखपुरा, पटना के मेडिकल कॉलेज के विभिन्न विभागों में फैकल्टी के अतिरिक्त 71 (एकहत्तर) पदों के सृजन की स्वीकृति तथा स्वास्थ्य विभाग के अन्तर्गत डा० रामानुज सिंह, तत्कालीन प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, कोईलवर अतिरिक्त प्रभार प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, बड़हरा, भोजपुर (सम्प्रति निलंबित) को सेवा से बर्खास्त करने का प्रस्ताव की स्वीकृति दी गई।

मंत्रिमंडल विभाग के प्रधान सचिव ने बताया कि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अन्तर्गत राज्य सरकार के सात निश्चय कार्यक्रम के अन्तर्गत हर घर नल का जल योजना के क्रियान्वयन हेतु सरकारी/विभागीय भूमि उपयोग करने संबंधी नीति की स्वीकृति दी गई। साथ ही शिक्षा विभाग के अन्तर्गत वित्तीय वर्ष 2016-17 में गैर योजनान्तर्गत राज्य के विश्वविद्यालयों के शिक्षक/शिक्षकेत्तर पदाधिकारी एवं कर्मचारियों के मार्च, 2016 से फरवरी, 2017 तक के लिए वेतनादि/पेंशनादि, जुलाई, 2015 से फरवरी, 2016 तक की अवधि के लिए बकाये महंगाई भत्ता/महंगाई राहत एवं विभिन्न न्यायालीय वादों में न्यायादेश के तहत अनुमान्य बकाया राशि के भुगतान के लिए कुल रुपए 2219,99,38,166/-(दो हजार दो सौ उन्नीस करोड़ निन्यानवे लाख अड़तीस हजार एक सौ छियासठ) मात्र सहायक अनुदान की स्वीकृति एवं विमुक्ति तथा उक्त स्वीकृत राशि में से माह मार्च, 2016 से मई, 2016 तक के लिए स्वीकृत एवं विमुक्त राशि रुपए 506,18,20,305/- (पाँच सौ छ: करोड़ अठ्ठारह लाख बीस हजार तीन सौ पाँच) मात्र का सामंजन एक मुश्त करने की स्वीकृति तथा शिक्षा विभाग के ही तहत राज्य के अराजकीय प्रस्वीकृत 205 मदरसों में कार्यरत शिक्षक/शिक्षकेत्तर कर्मियों को वित्तीय वर्ष 2016-17 के नियत मानदेय भुगतान हेतु 15,00,00,000/-(पन्द्रह करोड़) रुपए मात्र सहायक अनुदान की स्वीकृति दी गई।

खास खबर : कृषि रोड मैप की निकली हवा, बंजर हो रही बिहार की धरती

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) - यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित सभी ने एक स्वर में कहा है कि देश में दूसरी हरित क्रांति देश के पूर्वी राज्यों में होगी और इसका मुख्य केंद्र बिहार होगा। इसकी वजह यह है कि गंगा बेसिन के कारण बिहार में सबसे अधिक उर्वर धरती है। संभवत: यही वजह रही कि राज्य सरकार ने भी कृषि को समुन्नत बनाने के लिए कृषि रोड मैप बनाया। पहले रोड मैप की समयसीमा समाप्त होने के बाद राज्य सरकार ने दुबारा रोड मैप बनाकर सूबे के कृषि विकास के प्रति अपने संकल्प को दुहराया। कृषि विकास को लेकर राज्य सरकार के संकल्पों में से एक रासायनिक उर्वरकों के प्रति निर्भरता को कम करना था। राज्य सरकार ने आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने की बात कही थी ताकि खेतों में उत्पादन बढ़े और साथ ही मिट्टी की उर्वरता भी बरकरार रहे।

 परंतु इन सबसे अलग सच्चाई यह है कि बिहार की धरती भी पंजाब के जैसी होती जा रही है जहां रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में गुणोत्तर वृद्धि हो रही है। मसलन केंद्रीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में बिहार में रासायनिक उर्वरकों की प्रति हेक्टेयर खपत 201.07 किलोग्राम रही। जबकि राष्ट्रीय औसत पर यह आंकड़ा केवल 128.34 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहा। वहीं पंजाब में प्रति हेक्टेयर खपत 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही। अन्य राज्यों की बात करें तो गुजरात में 109.58 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, आंध्रप्रदेश में 189.30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, हरियाणा में 207 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, पड़ोसी राज्य झारखंड में 158.22 किलोग्राम और उत्तरप्रदेश में 183.23 किलोग्राम प्रति हेक्टयेर रही।

वहीं बिहार के लिए सबसे अधिक चिंतनीय यह है कि रासायनिक उर्वरकों की खपत में प्रति वर्ष वृद्धि हो रही है। मसलन बिहार में वर्ष 2011-12 में 163.81 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, वर्ष 2012-13 में 183.76 प्रति हेक्टेयर, वर्ष 2013-14 में 150.20 किलोग्राम प्रति हेक्टयेर, वर्ष 2014-15 में 160 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और वर्ष 2015-16 में 201.07 प्रति हेक्टेयर रही। वहीं वर्तमान वित्तीय वर्ष में 250 किलोग्राम से अधिक होने की संभावना है।

बहरहाल रासायनिक उर्वरकों की खपत में कमी होने की एक वजह वर्षानुपात में कमी होना भी माना जाता है। परंतु सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मौसम की अनुकूल व प्रतिकुल परिस्थितियों के बावजूद सूबे में खेती की स्थिति में सुधार आया है। यानी एक ओर खेती का विस्तार हुआ है तो दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों की खपत में वृद्धि भी हुई है। यह वृद्धि अब राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है, इसलिए चिंतनीय स्थिति बनती जा रही है।

काटजू की बदजुबानी पर तेजस्वी गरम, नीरज और नंदकिशोर ने भी जताया विरोध

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) -  पाकिस्तान को कश्मीर के साथ बिहार लेने की सलाह देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस और प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन जस्टिस माकंर्डेय काटजू के बयान पर उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने उन्हें आड़े हाथों लिया है। उन्होंने ट्वीट कर तीखी प्रतिक्रिया में कहा है कि काटजू जी, बिहार ने देश को अच्छे और बुरे वक्त में रास्ता दिखाया है।

अपने एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा कि बिहार भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, गुरु गोविंद सिंह और देवी माता सीता समेत अन्य सुफी संतों की पवित्र भूमि रही है। बिहार में चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, विक्रमादित्य और शेर शाह सूरी जैसे शासकों ने शासन किया है। बिहार आर्यभट्ट और चाणक्य जैसे विद्वानों का घर रहा है। बिहार के चंपारण सत्याग्रह को कभी नहीं भूला जा सकता है। उन्होंने कहा कि बिहार के लोगों की कार्यक्षमता, बुद्धि व हिम्मत पर कभी उंगली नहीं उठाया जा सकता है। यहां के लोगों में किसी भी परिस्थिति से लड़ने की भरपूर क्षमता है।

वहीं जदयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने काटजू के विवादित पोस्ट पर बोलते हुए कहा कि हे प्रभु इन्हें माफ कर दो। उन्होंने कहा है कि काटजू नहीं जानते कि ये कौन सा अपराध कर रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बिहार का अविस्मरणीय योगदान रहा है, साथ ही साथ गांधी के चंपारण सत्याग्रह से लेकर सामाजिक सदभाव के लिए चले आंदोलन में बिहार की अहम भूमिका रही है। ऐसी स्थिति में बिहार के विरासत को बिना जाने जस्टिस काटजू द्वारा की गयी टिप्पणी काफी अशोभनीय है।

वहीं भाजपा नेता नंद किशोर यादव ने पहले तो जस्टिस काटजू के टिप्पणी को तवज्जो ही नहीं दी। हालांकि उन्होंने कहा कि कश्मीर को लेकर विवादित बयान देना किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है और कश्मीर के साथ बिहार का नाम जोड़ना बिहार का अपमान करना है। इसके लिए बिहार किसी हालत में काटजू को माफ नहीं करेगा।

जनसंवाद यात्रा के दौरान सोशल मीडिया के लोगों से मिलेंगे तेजस्वी

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) - उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव आगामी 28-29 अक्टूबर को अपने जनसंवाद कार्यक्रम में पहले चरण में भागलपुर पहुंचेंगे। इस दौरान वे विभागीय कार्यों की समीक्षा,अनेक विकास कार्यों का शिलान्यास एवं उदघाटन करेंगे। साथ ही वे  जनप्रतिनिधियों, कार्यकतार्ओं एवं सोशल मीडिया के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे।

शराबबंदी पर फ़ंसे भाजपा नेता प्रेम कुमार, कहा - अकेले श्रेय ले रहे सीएम

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) - शराबबंदी कानून केवल बिहार सरकार और बिहार की जनता के लिए ही बड़ी चुनौती नहीं है। बल्कि विपक्ष के लिए भी यह बड़ा सवाल है। इस सवाल के फ़ेर में भाजपाई बार-बार फ़ंसते नजर आ रहे हैं। मसलन बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता डा. प्रेम कुमार ने एक ओर कहा कि भाजपा शुरू से शराबंदी के समर्थन में रहा है, लेकिन दूसरी ओर उसने शराबबंदी कानून को तालिबानी कानून करार दिया। डा. कुमार ने कहा शराबबंदी कानून को लेकर नीतीश जी पूरे देश के अंदर घूम-घूम कर राजनीति कर रहे हैं। शराबबंदी कानून का भाजपा सहित एनडीए के लोगों ने पूर्ण समर्थन किया और महागठबंधन के लोग के साथ होने के कारण यह लागू हुआ। लेकिन नीतीश जी ने शराबबंदी पर तालिबानी कानून लाने के पहले सत्ताधारी दल सहित विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं लिया और यह कानून लागू कर दिया। शराबबंदी का पूरा श्रेय नीतीश जी खुद लेने की राजनीति करना बंद करे, इसका श्रेय भाजपा सहित सभी दलों को जाता है, लेकिन नीतीश जी ऐसा नहीं किया। शराबबंदी कानून का पूरा श्रेय लेकर देश भ्रमण कर अपनी राष्ट्रीय छवि बनाने की राजनीति करना बंद करें।

नीरज कुमार ने दर्ज कराया मुकदमा

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) -  विधान पार्षद सह जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने प्रेस काउंसिल आॅफ इन्डिया के पूर्व अध्यक्ष सह पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराया है। स्थानीय शास्त्री नगर थाने में अपनी शिकायत में श्री कुमार ने कहा कि श्री काटजू ने बिहार का अपमान किया है। उनका कथन देशद्रोह से ओतप्रोत है, लिहाजा उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाय।

ट्रांसपोर्टरों ने टाला हड़ताल

पटना(अपना बिहार, 28 सितंबर 2016) -  शराबबंदी को लेकर पुलिस द्वारा दबिश बढाने के विरोध में बिहार राज्य मोटर ट्रांसपोर्ट फेडरेशन ने 2 अक्टूबर को होने वाली हड़ताल स्थगित कर दी है। यह हड़ताल बसों में शराब पकड़े जाने पर बस आॅपरेटरों पर हो रही कार्रवाई के विरोध में की जा रही थी। फेडरेशन के अध्यक्ष उदय शंकर प्रसाद सिंह ने बताया कि इस संबंध में फेडरेशन का एक प्रतिनिधिमंडल विधानसभा अध्यक्ष विजय चौधरी से मुलाकात की। चौधरी ने बताया कि राज्य सरकार की ओर से 2 अक्टूबर को कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में हड़ताल करना उचित नहीं होगा। उन्होंने ट्रांसपोर्टरों को यह भी आश्वासन दिया कि शराब को लेकर बस आॅपरेटरों पर हो रही कार्रवाई को लेकर सभी जिला मुख्यालयों में सूचना भेज दी गई है। शराबबंदी को बढ़ावा देने के लिए सभी बसों में पोस्टर लगाए जाएंगे, ताकि वैसे लोग जो बसों के माध्यम से शराब ले जा रहे हैं वे सचेत हो सकें।

हमें आता है गठबंधन धर्म निभाना : नीतीश, एक-दो पैग पीने के लिए पढ़े-लिखे कर रहे शराबबंदी का विरोध, शराबबंदी से गरीबों के घर में आयी खुशहाली, गरीबों की खुशी नहीं देखना चाहता है विपक्ष

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - विपक्ष द्वारा बार-बार महागठबंधन की एकता पर सवाल उठाये जाने के संदर्भ में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि हम गठबंधन धर्म का पालन करना जानते हैं। हर बड़ा फैसला महागठबंधन के शिखर नेताओं से बातचीत कर ही लेते हैं। सात निश्चय, शराबबंदी हो या कोई और निर्णय, मेरे अकेले का निर्णय नहीं है। महागठबंधन को भरोसा दिलाते हैं कि आगे भी मेरी ओर से कोई कमी नहीं आएगी। रवीन्द्र भवन में जदयू की राज्य परिषद की बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकसभा चुनाव से अधिक भाजपा ने विस चुनाव में प्रचार के बल पर नकली माहौल बनाने की कोशिश की। प्रचार तंत्र का ही परिणाम था कि चुनाव में हमें हाशिए पर धकेले जाने के बाद नतीजे के दिन भी सत्ता से बेदखल होने की बात कही गई। लोगों ने तो मेरा मिनट टू मिनट कार्यक्रम जारी कर बताया कि कब हम राजभवन जाकर इस्तीफा देंगे। महागठबंधन को जनता ने जबर्दस्त जनादेश दिया है, सरकार कारगर ढंग से चल रही है। हमारा यूएसपी कानून का राज है और लोगों को भरोसा दिलाते हैं कि यह कमजोर नहीं होगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव के पहले शराबबंदी की बात की थी, उसे लागू किया। इसकी आय अनैतिक व्यापार है और इसका नफा कोई मायने नहीं रखता। सरकार को खजाने में भले ही पांच हजार करोड़ कम आएंगे, लेकिन लोगों के 10 हजार करोड़ बचेंगे। कुछेक अमीर व पढ़े-लिखे आहत लोग एक-दो पैग के लिए समाज में कायम सदभाव, प्रेम व भाईचारे को बिगाड़ने में लगे हैं। गांव-कस्बों में जाकर महिलाओं से पूछना चाहिए कि शराबबंदी से उनके जीवन में किस तरह से सुख, शांति व समृद्धि आई है। गाढ़ी मेहनत की कमाई को लोग दारू पीकर गंवा रहे थे। विधानमंडल में शराब न पीने और पीने के लिए प्रेरित नहीं करने का संकल्प लेने वाले लोग भी विरोध कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वे और लोग हैं जो समाज को तोड़ते और असहिष्णुता फैलाते हैं। लोकतंत्र गोली से नहीं, बोली से चलती है। लेकिन न बोलने वाले को अहमियत नहीं मिलती। उन्हें टेकेन फॉर ग्रांटेड मान लिया जाता है। इसलिए कम बोलने वाले कार्यकतार्ओं को बोलने के लिए प्रेरित कीजिए। अभिवंचित तबका को मुख्य धारा में लाएं और उन्हीं से कहलवाएं कि शराबबंदी से क्या लाभ हुआ। 16 व 17 अक्टूबर को राजगीर में होने वाली राष्ट्रीय परिषद की बैठक में पार्टी का लक्ष्य बताया जाएगा।

श्री कुमार ने कहा कि पार्टी के सक्रिय सदस्यों के लिए प्रबोधन कार्यक्रम चलाएं। सदस्यता अभियान जारी रखें। कार्यकर्ता सरकार के कामकाज पर फीडबैक दें। साम्प्रदायिक सदभाव बिगाड़ने वालों, दंगा-फसाद करने वालों और कनफुंकवा लोगों से कार्यकर्ता सचेत रहें। कोई संवादहीनता नहीं रहेगी। शराबबंदी के पक्ष में आगामी दो अक्टूबर को प्रभात फेरी निकालें। साथ ही शराबबंदी का संकल्प लें। सीएम के इस प्रस्ताव को प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह ने स्वीकार किया।

किसी भी संगठन के लिये अनुशासन ज़रूरी : तेजप्रताप

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - समस्या है तो उसका निदान होना चाहिए ,पूरी ताक़त लगा कर समस्याओं का निदान खोजा जाना चाहिए। संगठन को मजबूत करने के लिये अनुशासन ,आपसी एकता और सदभाव को बनाए रखना आवश्यक है। सभी को आदर और सम्मान दें। किसी को छोड़े  नहीँ सबको साथ ले कर चलें। किसीको भी हीन भावना से न देखें। ये बातें स्वास्थ मंत्री तेज प्रताप यादव अपने आवास 3 देश रत्न मार्ग मे पटना विश्विद्यालय राजद छात्र संघ द्वारा आयोजित छात्र संघ चुनाव परिचर्चा को संबोधित करने के दौरान कही।

स्वास्थ मंत्री ने कहा कि धार्मिक एवम जातीय भेद भाव से छात्र राजद अपने को दूर रखे ,निस्वार्थ भाव से लोगों कि सेवा को अपने जीवन का आदर्श बनाये ,धर्म निरपेक्षता और सामाजिक न्याय के आदर्श को मज़बूत करें। इसमें बड़ी ताक़त है। नकारात्मक राजनीति न करें। उनहोंने आरएसएस की ओर इशारा करते हुए कहा कि बीजेपी और आरएसएस सामाजिक सदभाव को बिगाड़ना चाहती है। हमें उनकी साजिशों को नाकाम करना है। परिचर्चा को प्रदेश राजद छात्र संघ के अध्यक्ष अजित यादव ,पटना विश्वविद्याय छात्र राजद अध्यक्ष उमर फरूक सहित कई छात्र नेताओं ने भी समारोह को सम्बोधित किया।

किशोर बच्चियों ने दिखाया हौसला

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - गरीब परिवारों की किशोरी बच्चियों ने भी अब समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए सार्थक प्रयास शुरू कर दिया है। स्वयं सेवी संस्था क्रिआ के बैनर तले गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच, पटना और मुजफ्फरपुर की नारी निधि संस्थान एवं आकांक्षा सेवा सदन की बच्चियों ने राजधानी पटना के आईएमए सभागार में नाटकों के जरिए समाज के समक्ष अपनी बातें रखी। बच्चियों ने अपनी-अपनी आपबीती सुनाया और कहा कि परेशानियों व चुनौतियों के बावजूद उनलोगों ने अब आवाज उठाना शुरू कर दिया है। कार्यक्रम के दौरान ही एक किशोरी ने यह कहकर लोगों को स्तब्ध कर दिया कि उसके स्कूल के शिक्षक उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं और महिला प्रधानाध्यापक से शिकायत करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गयी। वहीं एक बच्ची ने बताया कि उसके पिता उसे पढ़ने नहीं देना चाहते हैं। इसके लिए वे कई तरह की बाधायें खड़ी करते हैं। इसके बावजूद उसने स्कूल जाना नहीं छोड़ा है। कार्यक्रम में गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच की ओर से पूजा, नाज परवीन, कोमल कुमारी, रंजू कुमारी और मुजफ्फरपुर की आकांक्षा सेवा सदन की सोनाली, मोनाली, अलका, रूबी, सुलेखा के अलावा नारी निधि संस्थान मुजफ्फरपुर की शालिनी कुमारी, प्रीति कुमारी, भावना कुमारी, काजल कुमारी सहित अनेक किशोरी बच्चियों ने अपनी-अपनी आपबीती सुनायी। इस मौके पर प्रतिमा पासवान, संजना सहित कई गणमान्य उपस्थित थे।

राजद नेताओं ने दी बशिष्ठ सिंह को बधाई

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - बशिष्ठ नारायण सिंह के  निर्विरोध पुन: जनता दल (यू) के प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित होने पर राष्ट्रीय जनता दल नेताओं ने उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी है। राजद प्रदेश अध्यक्ष डॉ रामचंद्र पूर्वे, प्रधान महासचिव मुंद्रिका सिंह यादव, उपाध्यक्ष डॉ तनवीर हसन, प्रदेश प्रवक्ता प्रगति मेहता एवं चितरंजन गगन सहित अन्य पार्टी नेताओं ने श्री सिंह को बधाई दी है। राजद नेताओं ने कहा है कि वशिष्ठ बाबू के नेतृत्व में जदयू महागठबंधन के तीनों दलों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का काम करेगा।

जल्द से जल्द चकाचक हों पटना साहिब की सड़कें, प्रकाशोत्सव की तैयारी को लेकर उपमुख्यमंत्री ने की समीक्षा बैठक

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की 350वीं  जयन्ती को ध्यान मे रख कर जिन पथ के निर्माण ,उन्नयन का कार्य प्रारम्भ किया गया है ,उनको पूरे गुणवत्ता के साथ समय सीमा के अन्दर पूरा किया जाए। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव  ने पथ निर्माण विभाग के वरीय अधिकारियों के साथ पथ निर्माण विभाग के सभागार मे उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान स्पष्ट निर्देश दिये। बैठक मे पथ निर्माण विभाग के परामर्शी सुधीर कुमार ,सचिव पथ पंकज कुमार,जिला पदाधिकारी पटना संजय कुमार अग्रवाल सहित पथ निर्माण विभाग के वरीय अधिकारियों ने भाग लिया।

बैठक मे पथ प्रमंडल पटना सिटी ,न्यू केपिटल  और पटना पश्चिम की लगभग 29 पथों  जिनके निर्माण ,उन्नयन मरम्मति का कार्य प्रकाश उत्सव को ध्यान मे रख कर  प्रारम्भ किया गया है, की समीक्षा की गयी। इस संबंध में उपमुख्यमंत्री ने निदेश दिया कि निर्माण कार्यों को निर्धारित समय सीमा के अन्दर पूरा किया जाए ताकि श्रद्धालुओं को आवागमन मे कोई कठिनाई नहीं हो। इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि लाखों कि संख्या मे देश विदेश से श्रद्धालू आयेंगे। बैठक में पटना नगर मे निमार्णाधीन पुलों कि प्रगति कि भी समीक्षा की गई और निदेश दिया गया कि प्रकाश पर्व के प्रारम्भ होने से पूर्व सभी मुख्य सड़कों को आवागमन के लिय ठीक कर लिया जाये और सड़कों को अवरोध मुक्त कर लिया जाए। साथ ही पार्किग स्थल बाईपास थाना जाने के लिये  बनाए जा रहे अस्थायी सड़क निर्माण की प्रगति की भी समीक्षा की गई। वहीं अशोक राज पथ के महेँद्रू से दीदारगंज रोड मे विशेष मरम्मती कार्य को 16 नवम्बर तक पूरा कर लिये जाने का निर्देश दिया गया।

अपने गिरेबां में झांककर आरोप लगायें नीतीश : प्रेम

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता डा. प्रेम कुमार ने कहा कि बिहार के किसान हो रहे बदहाल और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी केन्द्र पर आरोप लगा रहे हैं, नीतीश जी पहले अपने गिरेवान में झांक कर देख फिर केन्द्र पर आरोप लगाएं। करनाल की रैली में नीतीश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों से किये वादों को पूरा नहीं किया। इसी के जबाव में डा. कुमार ने ये बातें कहीं।

डा. कुमार ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने जो वादा  किया, उसे पूरा किया देश के अंदर अनेकों योजनाओं को शुरू किया। किसानों के लिए फसल बीमा योजना लागू करने में नीतीश जी भागते रह, लेकिन देश के सभी राज्यों ने लागू कर दिया और केन्द्र सरकार के दबाव के बाद आपने भी इसे लागू किया। राज्य के किसानों के लिए आपने जितनी घोषणाएं की आज तक लागू नहीं किया।

दिव्यांग छात्रों को भ्रमण कराएगा पर्यटन मंत्रालय

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - भारत पर्यटन पटना, पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा विश्व पर्यटन दिवस (27 सितंबर) के अवसर पर दिव्यांग छात्रों के लिए पटना स्थित दर्शनीय स्थलों के भ्रमण का आयोजन करेगा। इसके अलावा भारत पर्यटन पटना द्वारा इस अवसर पर विभिन्न होटलों, ट्रेवल आॅपरेटरों, शैक्षणिक संस्थानों आदि के सहयोग से राज्य के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाएगा।

 गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन (यूएनडब्ल्यूटीओ) द्वारा प्रत्येक वर्ष 27 सिंतबर को विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है। इस अवसर यूएनडब्ल्यूटीओ द्वारा निर्धारित एक निश्चित प्रसंग (थीम) पर विश्व भर में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ज्ञातव्य हो कि विश्व की कुल आबादी का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी प्रकार के शारीरिक अयोग्यता के शिकार हैं जिसके कारण उन्हें विभिन्न संस्कृतियों, प्राकृतिक भू-दृश्यों व अन्य रोमांचक दृश्यों के अनुभवों से महरूम होना पड़ता है।

 इसी आलोक में भारत पर्यटन पटना, पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर राज्य भर में विभिन्न गतिविधियों का आयोजन करेगा ताकि पर्यटन के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन द्वारा इस वर्ष हेतु निर्धारित थीम के प्रति लोगों में जागरूकता का समावेशन किया जा सके।

साइकिल से पप्पू यादव निकालेंगे जन संवाद यात्रा

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - जन अधिकार पार्टी (लो) के राष्ट्रीय संरक्षक व सासंद राजेश रंजन उर्फ पप्पूू यादव के नेतृत्व में पार्टी की ओर से मगध की धरती से नवंबर के दूसरे सप्ताह में साइकिल से जनसंवाद यात्रा निकाली जाएगी। इस दौरान जनता के बीच राज्य सरकार की विफलताओं से अवगत कराया जाएगा। इस आशय की जानकारी जापलो प्रदेश अध्यक्ष श्रीभगवान सिंह कुशवाहा ने दी। उन्होंने बताया कि पार्टी के जिलाध्यक्षों, जिला प्रभारी और प्रमंडलीय पर्यवेक्षकों की विशेष बैठक पटना के होटल कौटिल्या संपन्न हुई। इस दौरान पार्टी के सदस्यता अभियान समेत अन्य कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक के बाद श्री कुशवाहा ने राज्य सरकार पर बाढ़ और सूखाड़ से प्रभावित लोगों को अनदेखा करने का आरोप लगया। उन्होंने कहा कि दोनों भाईयों ने बिहार की जनता को ठगने का काम किया है। राज्य में सत्ता संरक्षित अपराध के लिए भी दोंंनो भाई जिम्मेवार है। उन्होंने नीतीश कुमार और लालू यादव को अहंकारी बताते हुए कहा कि दोनों का गठजोर पूरी तरह से फ्लॉप हो चुका है।

टॉपर घोटाले के तीन आरोपियों को मिली जमानत

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - बहुचर्चित टॉपर घोटाला के तीन आरोपियों को हाईकोर्ट ने सोमवार को जमानत दे दी है। इसमें हाजीपुर स्थित केंद्र के अधीक्षक शैल कुमारी, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के कर्मचारी अजय कुमार सिंह एवं संस्कृत शिक्षा बोर्ड के क्लर्क संदीप कुमार झा शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी की एकलपीठ ने तीनों को जमानत दी। वहीं, एक अन्य मामले में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के सचिव हरिहर नाथ झा की जमानत अर्जी पर न्यायमूर्ति हेमंत कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने केस डायरी की मांग की।

लड्डन की जमानत याचिका पर सुनवाई टली

सीवान/पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन हत्याकांड के मुख्य आरोपित अजहरुद्दीन बेग उर्फ लड्डन मियां की जमानत याचिका पर सुनवाई की तिथि टल गई। जिला एवं सत्र न्यायधीश ओमप्रकाश राय की अदालत में सोमवार को जमानत याचिका पर सुनवाई की तिथि निर्धारित थी। सुनवाई के दौरान लोक अभियोजक हरेन्द्र सिंह व बचाव पक्ष के अधिवक्ता ईष्टदेव तिवारी मौजूद थे। इस दौरान लोक अभियोजक ने निचली अदालत से आए केस डायरी, चार्जशीट व अन्य रिकॉर्ड को कोर्ट से रिसीव किए और उसे अध्ययन करने के लिए समय की मांग की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि रिकॉर्ड को पढ़ने के लिए समय चाहिए। इस पर कोर्ट ने समय दे दिया और सुनवाई की अगली तिथि मुकर्रर कर दी। लड्डन मियां शहर के रामनगर मोहल्ले का रहने वाला है। वह राजदेव रंजन हत्याकांड का मुख्य आरोपित है। वह पहले भी जमानत याचिका सीजेएम के कोर्ट में दाखिल किया था। जहां पर सुनवाई के बाद जमानत याचिका खारिज हो चुकी है। इसके बाद जिला एवं सत्र न्यायधीश के कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की गई है। जहां पर सुनवाई चल रही है। राजदेव रंजन की हत्या 13 मई की रात स्टेशन रोड फलमंडी के पास गोली मारकर कर दी गई थी।

दुष्कर्म का आरोपी हम नेता निष्कासित

पटना(अपना बिहार, 27 सितंबर 2016) - हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के शेखपुरा जिलाध्यक्ष महेंन्द्र साव के दुष्कर्म मामले में गिरफ्तार होने के बाद सोमवार को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वृशिण पटेल ने उन्हे दल से निष्कासित कर दिया है। यह जानकारी मीडिया प्रभारी अमरेंद्र कुमार त्रिपाठी ने दी। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वृशिण पटेल ने राजीव नयन सिंह को पार्टी के कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ का प्रदेश अध्यक्ष मनोनीत किया है। उनके मनोनयन पर पार्टी के उपाध्यक्ष बीएल वैश्यंत्री, अनामिका पासवान, विजय यादव आदि ने बधाई दी है ।

अपनी बात : अनुभवी सुशील मोदी की आधारहीन दलील

दोस्तों, सुशील मोदी सूबे के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। लेकिन राजनीति में वरिष्ठता कोई मायने नहीं रखती है। कम से कम तब जबकि सूबे में लालू प्रसाद नीतीश कुमार के साथ परोक्ष रुप से सत्ता में हैं। हालत यह हो गयी है कि सुशील मोदी जैसे वरिष्ठ और तथ्यपरक बातें कहने वाले नेता भी आधारहीन बातें करने में लग गये हैं।

एक उदाहरण यह है कि उन्होंने लालू प्रसाद से अपनी खुन्नस निकालने के लिए उनके पूरे परिवार पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि लालू प्रसाद का परिवार कभी सुधरने वाला नहीं है। उन्होंने कहा है कि पटना हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद के छोटे बेटे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव के खिलाफ़ कड़ी टिप्प्णी की है तो बड़े बेटे स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।

बात पहले तेजस्वी यादव की। गौरतलब है कि पटना हाईकोर्ट ने भवन निर्माण विभाग से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उपमुख्यमंत्री के लिए "ग़्रीन हार्न" शब्द का इस्तेमाल किया है। इस शब्द का मतलब एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास अनुभव न हो और बड़ी जिम्मेवारी हो। जाहिर तौर पर उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के पास अनुभव का अभाव है लेकिन उनके पास विजन है और इसी के जरिए अपने विभागों में उन्होंने इसे साबित किया है। फ़िर चाहे वह बिहार में सड़कों के निर्माण का सवाल हो या फ़िर बाढ राहत जैसे महत्वपूर्ण सवाल। पटना हाईकोर्ट की टिप्प्णी भी पक्षपातपूर्ण है। हाईकोर्ट को टिप्प्णी करने से पहले वास्तुस्थिति का ख्याल तो रखना ही चाहिए। वजह यह है कि केंद्रीय कैबिनेट में "ग्रीन हार्न्स" की लंबी सूची है और आये दिन यह उजागर भी होता रहता है। स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी की कई बातें उन्हें कटघरे में खड़ा करती हैं।

अब बात तेज प्रताप यादव की। सीवान के पत्रकार रहे राजदेव रंजन की विधवा आशा रंजन के द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तेजप्रताप यादव को नोटिस जारी किया है। वजह  यह कि राजदेव की हत्या का एक आरोपी मो कैफ़ के साथ तेज प्रताप की एक तस्वीर वायरल हुई थी। सबसे दिलचस्प यह कि मो कैफ़ केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के साथ भी जश्न मनाता दिखा था। लेकिन उमके खिलाफ़ आशा रंजन ने कोई शिकायत नहीं की। असल सवाल मंशा का है।

बहरहाल अखबारों में बयानबाजी कर राजनेता के रुप में स्थापित हो चुके सुशील मोदी के लिए राजनीतिक मर्यादाओं की कोई सीमा है भी या नहीं, यह तो वे ही बता सकते हैं। लेकिन उनकी अनुभवहीन टिप्पणियों से उनके तथाकथित तौर पर वरिष्ठता की पोल तो खुलती ही है। रही बात न्यायपालिका की तो यह पहली बार नहीं हो रहा है। लालू प्रसाद के कार्यकाल में भी न्यायपालिका जनमत के साथ नहीं था और आज भी नहीं है। वह तो अपने सामाजिक सामंती विचारधारा के आधार पर कार्य करता है। यही सच्चाई है, जिसे बिहार की जनता भी खूब समझती है।

लालू प्रसाद ने वशिष्ठ नारायण सिंह को दी शुभकामना

पटना(अपना बिहार, 26 सितंबर 2016) - राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने प्रदेश जदयू के अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह के पुन: निर्विरोध जदयू का प्रदेश अध्यक्ष चुने जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की है। राजद प्रमुख ने वशिष्ठ नारायण को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए हुए उनके स्वस्थ, सफल और दीर्घ जीवन की भी कामना की है। श्री प्रसाद ने कहा है कि वशिष्ठ बाबू के नेतृत्व में जदयू महागठबंधन के तीनों दलों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का काम करेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव, स्वास्थ मंत्री तेज प्रताप यादव ने भी श्री वशिष्ठ नारायण सिंह के निर्विरोध प्रदेश जदयू अध्यक्ष चुने जाने पर उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी है तथा उनके राजनैतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन की सफलता की कामना की है।

बौखला गये हैं अफ़वाह मियां सुशील मोदी : राजद

पटना(अपना बिहार, 26 सितंबर 2016) - राजद के प्रदेश प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी प्रगति मेहता ने भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी पर पलटवार करते हुए कहा की जब से राजद ने अफवाह फैलाने की उनकी झूठी महारत को "अफवाह मियॉँ" के रूप में प्रचारित किया है। वो सच जानकर वो बौखला गए है और अनाप-शनाप बक रहे है। बेसिर पैर का बोलना उनकी आदत हो गई है। उनको बीजेपी ही गंभीरता से नहीं लेती।

उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय और गरीब-गुरबों के विकास से घबराये सूमो को अब लालू जì