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रविवार, 4 दिसंबर 2016

पूसा दिखायेगा पूरे देश को रास्ता : राधामोहन

पटना(अपना बिहार, 4 दिसंबर 2016) - पूसा स्थित डा. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय आने वाले दिनों में बिहार सहित पूरे देश की कृषि शिक्षा को नयी दिशा और गति प्रदान करेगा। ये बातें केन्द्रीय कृषि एवं कृषि किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने डाक्टर राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह में कही।  उन्होंने कहा कि 3 दिसंबर को कृषि शिक्षा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय भारत सरकार ने लिया है और आज ही सारा देश, प्रथम कृषि मंत्री डा. राजेन्द्र प्रसाद के सम्मान में कृषि शिक्षा दिवस मना रहा है। कृषि मंत्री ने कहा कि भारत सरकार देश में कृषि शिक्षा मजबूत करने के लिए लगातार काम कर रही है क्योंकि कृषि की प्रगति और विकास, उच्च कृषि शिक्षा संस्थान और अनुसंधान संस्थानों पर निर्भर करता है।

Text Box: साहित्य और समाज

शराबबंदी के लिए बिहार को सलाम, मेघा पाटेकर से खास बातचीत

पटना(अपना बिहार, 3 दिसंबर 2016) - शराबबंदी देश को नशामुक्त बनाने की दिशा में अहम पहल है। जिस तरीके से बिहार सरकार और बिहारवासियों ने इसे सफलतापूर्वक लागू किया, वह सराहनीय है। हालांकि उन्होंने शराबबंदी के लिए बनाये कानूनी प्रावधानों को कड़ा प्रावधान बताते हुए कहा कि इस दिशा में सामाजिक स्वीकृति अधिक से अधिक हो, इसके लिए पहल किया जाना चाहिए। अपना बिहार से खास बातचीत में मेघा पाटेकर ने कहा कि जब-जब देश में राजनीतिक संकट आया है तब बिहार ने पूरे देश को नेतृत्व प्रदान किया है। एक बार फिर देश में राजनीतिक संकट है। केंद्र सरकार कारपोरेट ताकतों के साथ खड़ी है और गरीब हाशिये पर हैं। सरकार छद्म तरीके से गरीबों का विकास करने की बात करती है लेकिन उसका परिणाम उलटा हो रहा है। आज पूरे देश में महंगाई और बेरोजगारी कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। गरीब परिवारों के सामने अस्तित्व का संकट है। वहीं केंद्र सरकार देश में नोटबंदी लागू कर रही है। वह भी इस तरीके से कि इसका सबसे अधिक शिकार गरीब हो रहे हैं।

मेघा पाटेकर ने कहा कि आज पूरे विश्व में विकास की परिकल्पना बदली है और स्थिति कमोबेश वही है जिसके लिए लंबे समय से देश में संघर्ष चल रहा है। मसलन नदी प्रबंधन के मामले में अब अमेरिका में भी बड़े-बड़े बांधों को तोड़ा जा रहा है। इन बांधों के कारण नदियां खतरे में हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह बयान अति महत्वपूर्ण है कि फरक्का बराज जैसी संरचना को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी नदियों को जोड़ने की योजना के विरोधी रहे हैं। यह किसी भी स्थिति में न तो नदियों के अस्तित्व के पक्ष में है और न ही प्रकृति की रक्षा के लिए।

देश की मौजूदा राजनीति के बारे में पूछने पर मेघा ने कहा कि आज देश के हालात बहुत खतरनाक हैं। उन दिनों जब देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी तब महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और राजेंद्र बाबू सरीखे महानायक अपने-अपने हिसाब से लड़ाई लड़ रहे थे। यदि वे आज जीवित होते तो सभी एक साथ लड़ते। मेघा ने कहा कि आज के दौर में युवा सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। युवाओं को देश के राजनीतिक हालात को  पूरी गंभीरता के साथ समझना होगा और उन्हें आगे बढ़कर आंदोलनों का नेतृत्व करना होगा ताकि जाति और धर्म के नाम पर वोट की राजनीति बंद हो और देश में सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त हो।

देश में देशद्रोह के मामले में सामाजिक कार्यकर्ताओं को फंसाने के मामले में पूछने पर मेघा पाटेकर ने कहा कि हम संविधान की परिधि में रहकर संविधान प्रदत्त अधिकारों की मांग करते हैं। इसके बावजूद हमें यदि देशद्रोही कहा जाता है तो इससे हमारी लड़ाई खत्म नहीं हो जाती है। हम अहिंसक तरीके से अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे। यही हमारा सिद्धांत है और यही हमारी लड़ाई भी।

संपादकीय : इतने बेवकूफ़ तो नहीं होते सुप्रीम कोर्ट के जज

दोस्तों, इंसान इसलिए इंसान है क्योंकि उसमें सोचने, समझने और तार्किक तौर पर कार्य करने का गुण होता है। वह अच्छा बुरा सब सोच सकता है। इसलिए मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हालांकि जानवर भी सामाजिक ही होते हैं और वे भी सोचते समझते हैं। अंतर बस इतना है कि हम इंसान संसाधनों का अधिकाधिक दोहन करना जानते हैं।

कुल मिलाकर इंसान एक ऐसा प्राणी है जिसपर कोई भी बंदिश जबरन थोपा जाय तो वह अपना विरोध व्यक्त कर सकता है। फ़िर यह बंदिश चाहे सामाजिक हो या सरकारी। अब सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने यह न्यायादेश दिया है कि अब हर सिनेमा घर में शो शुरु होने के पहले राष्ट्रगाण का धुन बजाया जाय। जज को उम्मीद है कि ऐसा होने से देश के लोगों में देश के प्रति प्यार उमड़ेगा और संभव है कि वे देशभक्त बनेंगे।

इस अजीबोगरीब न्यायादेश के पीछे की मानसिकता को समझने की आवश्यकता है। आरएसएस कहता है कि यदि कोई भारत माता की जय नहीं कहता है तो वह भारतीय नहीं है। इसी तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाया है। लेकिन सच्चाई क्या है। बिना वंदे मातरम या भारत माता की जय कहे भी कोई भी भारतीय सच्चा देशभक्त हो सकता है। अब तक तो ऐसा ही होता आया है।

अब सवाल उठता है कि सिनेमा का शो शुरु होने से पहले देशभक्ति जबरन थोपने का असर क्या होगा। मुमकिन है कि लोग देशभक्त बनें ना बनें लेकिन राष्ट्रगान का मजाक जरुर बनेगा जब शो शुरु होते ही पर्दे पर तथाकथित लिप लाक और बेड सीन दिखलाये जायेंगे। खैर सुप्रीम कोर्ट के जज ने यह न्यायादेश दिया है तो इसका अनुपालन भी होगा ही। वैसे सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सचमुच में हम भारतीय देशभक्त नहीं है? क्या यह न्यायादेश देने वाला जज स्वयं देशभक्त है? सवाल तो उठेंगे ही। एक सवाल तो यह भी कि क्या सुप्रीम कोर्ट का जज इतना बेवकूफ़ भी हो सकता है?

खास खबर : सिसकियां भर रहा मगध का लाल गलियारा

- श्याम सुंदर

कभी बमों के धमाके तो कभी गोलियों की गूंज से आसमान गूंजायमान। भूख से तड़पते बच्चे। मार्च का महीना आते ही हलक बूझाने लायक पानी मयस्सर नहीं। एक तो गांवों में स्कूल का नामोनिषान नहीं, कहीं स्कूल दिख भी गये तो पढ़ाने लायक मास्टर नहीं। दवा और डाॅक्टर के अभाव में दम तोड़ते मरीज। यही पहचान रह गयी है मगध के नवादा, गया और औरंगाबाद के एंटी नक्सल अभियान चलाये जा रहे इलाकों की। वह मगध जिससे कभी दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाया था। बौद्धिक संपन्नता के लिये दुनिया मगध की ओर आकर्षित होती थी। नालंदा का बौद्ध विहार आज भी शोध का विषय बना हुआ है तो नये जमाने में मगध की पहचान भूख, अषिक्षा, गरीबी, कुपोषण के साथ ही मानवता को शर्मसार करने वाले कुकृत्यों से हो रहा है। आज मगध पहचाना जा रहा है जातीय जहर से। मगध की पहचान हो रही है साम्प्रदायिक उन्माद से। मगध पहचाना जा रहा है दलाल नेताओं से। गरीबों के शोषण से। मगध पहचाना जा रहा है सामंती उत्पीड़न से। मगध की पहचान हो गयी है लाष पर राजनीति करने वाले सियासतदानों से। अपने में गौरवषाली अतीत समेटे मगध पहचाना जा रहा है नक्सल के नाम पर गोलियों की तड़तड़ाहट से। बमांे के धमाकों से। देषद्रोह और देषभक्तों के वैचारिक संघर्षों से।

अपने गौरवषाली इतिहास पर इतराता मगध एक लाख वर्ष पहले से जाना जा रहा है। बात चाहे ऋग्वेद या अर्थववेद की करें या फिर द्वापर के कृष्ण और त्रेता के राम की। हर युग में मगध की अपनी पहचान रही है। प्यार-मोहब्बत से दुनिया पर राज करने वाला मगध सिसक रहा है। कराह रहा है। अपनों से। सियासतदानों से। कानून के रखवालों से। संविधान के रक्षकों से। लोकतंत्र के नाम पर तांडव मचाने वाले सियासतदानों से। सामंती देषभक्तों से। कू्रर नौकरषाहों से। मगध के जिन इलाकांे में सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन का विषेष नक्सल विरोधी अभियान चल रहा है, उस मगध में बेजुबानों पर बहादुर बन रही है सीआरपीएफ। कहीं गांवों में एंटी नक्सल के नाम पर झोपड़ियां उजाड़ी जा रही है। किषोरियों के साथ दुष्कर्म हो रहे हैं। बुर्जुगों को पीटा जा रहा है। महिलाआंे को माओवादियों की पत्नी बताया जा रहा है तो संविधान और मानवता की दुहाई देने वाले नौजवानों को नक्सली कह कर जेलों में ठूंसा जा रहा है। अघोषित कफ्र्यू लागू है मगध के जंगली और पहाडी इलाकों में। हद तो यह कि नक्सल आॅपरेषन से लौटते वक्त जवान गांवों से मुर्गियां और बकरे अपने साथ उठा ला रहे हैं। कभी गांवों में पुलिस की लाल टोपी देखते ही जंगलों और पहाड़ों में दुबकने वाले ग्रामीण आजादी के 70 वर्षों के बाद भी सैंकड़ों की संख्या में सीआरपीएफ को देख पहाड़ों को अपना बसेरा बना रहे हैं तो ऐसे ग्रामीणों को कोबरा और पारा मिलिटी के जवान नक्सल कह गोलियों से भून रहे हैं।

क्या देष का गृह मंत्री यह बता सकता है कि मगध के किस गांव और किस जंगली इलाके से माओवादियों के किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी हुई है? कब हुई? क्यों जंगलों में नहीं पकड़े जाते माओवादी चिंतक और कुख्यात माओवादी? जब माओवादी नेताआंे की गिरफ्तारी शहरों से हो रही है तो फिर क्यों माओवादियों के नाम पर जंगलों और पहाड़ों में खाक छान रही है पुलिस। अपनी बंदूकों से किसे डराना चाह रही है सीआरपीएफ? सवाल यह भी कि किस नेटवर्क से हथियारों का जखीरा पहुंच रहा है माओवादियों के पास। क्या 50 सालों के नक्सल विरोधी अभियान मंे यह बताने का साहस आला अधिकारी करेंगे कि किन रास्तों से असमाजित तत्वों तक पहंुच रहा है कारतूस, गोला-बारूद, डायना माइट और हथियारों का जखीरा? आखिर इन सवालों पर क्यों चूप्पी साध लेते हैं एंटी नक्सल आॅपरेषन में लगे अधिकारी और सियासतदान? आष्चर्य तो यह भी अब माओवादियों के पास राॅकेट लांचर तक की उपलब्धता बतायी जा रही है तो फिर सवाल है कि अािखर सरकार का खुफिया तंत्र कर क्या रहा है? क्यों नहीं खुफिया अधिकारियों को जानकारी हो पाती है माओवादी गतिविधियों की? इस चूक की वजह से आम लोग तो परेषान हैं ही। अर्द्ध सैनिक बलों के जवान भी मलेरिया जैसी भयंकर बीमारी से परेषान हो रहे हैं। कई जवानों की मौत मलेरिया से हो चुकी है।

सवाल कई हो सकते हैं। इस सबके बीच, जहां तक मुझे जानकारी है। माओवादी वर्ग-संघर्ष की राजनीति करते हैं। माओवादियों के सिद्धांत में एक वर्ग शोषकों का है तो दूसरा शासकों का। माओवादी मानते हैं कि दूसरा वर्ग गरीबों का दुष्मन है। कानून को अपने तरीके से चलाता है। संविधान को रौंदता है। देष में दिनोंदिन चैड़ी होती जा रही आर्थिक विषमता की खाई का हवाला देते हुए माओवादी कहते हैं कि देष की 90 फीसद अकूत संपत्ति पर एक फीसद लोगों का कब्जा है और यही एक फीसद लोगों की अर्थव्यवस्था 99 फीसद लोगों पर थोपी जा रही है। एक माओवादी चिंतक ने बताया कि पूंजीपतियों की रखैल बन चुके सियासतदान कहीं विषमता की खाई में देष को ही न डूबो दें!

बहरहाल, सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन पुलिसिया आंकडें बताते हैं कि देष में माओवादियों के एकाध-दो नेता को छोड़ किसी भी बड़े माओवादी की गिरफ्तारी जंगलों-पहाड़ों से नहीं हुई है। बात चाहे आॅक्सफोर्ड में रीडर रह चुके माओवादी प्रो कोबार्ड गांधी की हो या फिर तमिल साहित्य के बड़े जानकार व पोलित ब्यूरो सदस्य सुधाकर रेड्डी की। माओवादी प्रमोद मिश्रा की हो या फिर विजय कुमार आर्य, सुषील राय, नारायण सान्याल, शीला दीदी, पुलेंदू शेखर मुखर्जी, वाराणासी सुबह्णयम समेत दूसरे माओवादी चिंतकों की।

इस सबके बीच, एंटी नक्सल आॅपरेषन में लगे जवानों और अधिकारियों के अपने तरीके हैं। लेकिन क्या सरकार का कोई आला अधिकारी बता सकता है कि मगध के औरंगाबाद स्थित मदनपुर ब्लाॅक के पचरूखिया और लंगुआही समेत आस-पड़ोस के आधा दर्जन ग्रामीणों का क्या गुनाह है जिसकी वजह से सैंकड़ों लोग गांवों से पलायन कर चुके हैं। इन गांवों में रह रही हैं तो सिर्फ बूढ़ी महिलाएं। लाचार बुर्जुग। बिना दूध देने वाली कुछ गाय और भैंस। मुसहरों के जीविकोपार्जन का असली ताकत सुअर। औरंगाबाद के पत्रकार गणेष कुमार ने बताया कि पचरूखिया और लंगुआही समेत उस इलाके में जाने के कोई सीधे रास्ते नहीं हैं। एक बार पत्रकारों की टोली वायु सेना के हेलीकाॅप्टर से उस दुर्गम गांव में पहुंची थी। दुखद लेकिन रोमांचकारी आपबीती सुनाई गणेष कुमार ने। बतौर गणेष कुमार-इलाके को देखने से नहीं लगता यह मगध का कोई गांव है। लोगों के बदन पर कपड़े नहीं हैं। गांवों में घरों के नाम पर झोपड़ियां हैं। पहुंचने के रास्ते नहीं हैं। घरों में खाने को समुचित अन्न नहीं हैं। लोग आज भी पीने के पानी पाॅच किलोमीटर दूर गैलन में भरकर लाते हैं। लोगों की सूखी अंतड़िया हैं। शरीर की बनावट ऐसी मानों कंकाल हो।

इस सबके बीच, आजादी के 70 वर्षों के बाद भी इस इलाके में न तो पीडीएस सिस्टम का नामोनिषान है और न ही पीने के पानी मयस्सर है। स्कूल और अस्पताल अबतक ग्रामीण नहीं देख पाये हैं। गरीबों के लिये सरकारी योजनाएं होती क्या है? इसकी भनक लोग नहीं जानते।

आष्चर्य तो यह कि पिछले करीब 26 वर्षों से सूबे में सामाजिक न्याय की सरकार है। इस सरकार के रहते लगातार इलाके से नक्सल के नाम पर हो रहे इंतहां जुर्म से आजीज आ चुके ग्रामीणों का होता पलायन यह बताने के लिये काफी है कि सामाजिक न्याय औरंगाबाद के पंचरूखिया, लंगुआही, गया के रजौल, फुलवरिया डैम के अंदर बसे दर्जनों गांव, इमामगंज, बांकेबाजार, मोहनपुर, नवादा ककोलत, कौआकोल समेत अन्य पहड़तली इलाके में रह रहे मुसहर, भोक्ता समेत अन्य दलितों, पिछड़े समुदायांे के लिये जुमला के सिवा कुछ नहीं है।

रेणु के गांव में राजनीति...

प्रेम कुमार मणि

पिछले 12 नवम्बर को एक साहित्यिक समारोह में भाग लेने के लिए सड़क मार्ग से पूर्णिया गया . साथ में मित्र और लेखक रामधारी सिंह दिवाकर व अरुण नारायण थे . दिलचस्प यात्रा थी . हमलोग वाया मुजफ़्फरपुर फोरलेन से थे . सड़क पूरी तरह दुरुस्त . रस्ते में कोशी पर बना महासेतु भी देखा ,जिसने इस इलाके के जीवन पर सुख की एक चादर दी है . जहाँ जाने केलिए लोग दो दिन हलकान होते थे ,अब दो घंटे में पहुँचते हैं .

रास्ते में ही एक जगह है ,नरपतगंज , जहाँ दिवाकर जी का गांव -घर है . हम सब उनके गांव गए . घर पर चाय -पानी लिया , उनके भाई से थोड़ा ही सही गपियाया भी . आनंद से भर गया . दिवाकरजी मेरे प्रिय लेखक हैं .इसलिए कि वह गांव के ताजे अंतर्विरोधों को समझते हैं . कुछ साल पहले छपी उनकी कहानी 'रंडियां ' ने मुझे बेहद प्रभावित किया था . गाँव किस तरह बदल रहे हैं इसे दिवाकर बखूबी चित्रित करते हैं . लेकिन इस दफा मैं उनके भाई से प्रभावित हुआ ,जो गाँव में रहते हैं और भाजपा की पोलटिक्स करते हैं . जाति -वर्ग के हिसाब से वह अति पिछड़े तबके से हैं . मैंने पूछा कि किस नेता को पसंद करते हैं .उनका जवाब था नीतीश और नरेन्द्र मोदी को . पिछले चुनाव में उन ने और गाँव के ज्यादातर पिछड़े लोगों ने भाजपा को वोट दिया . उनके अनुसार यादव ,कुर्मी और मुसलमानों के अलावे सबके वोट भाजपा को मिले . लेकिन इन तीन के वोटों की संख्या ही महागठबंधन के राजद उम्मीदवार को जीत दिलाने में सक्षम हो गयी . उनसे पता चला कि नीतीश सरकार द्वारा चलाई जा रही गरीबोन्मुख योजनाएं ,भ्रष्टाचार के बावजूद जमीं पर उतरी हैं और लोग नीतीश से खुश हैं . मैंने फिर पूछा कि यदि आज चुनाव हो तो ये पिछड़े गरीब किसे वोट देंगे ? उनका जवाब था कि यही राजनीतिक समीकरण रहा तो ,फिर भाजपा को . ये पिछड़े तथाकथित उच्च जातियों के मुकाबले यादवों से ज्यादा तबाह हैं .

मैं समझता था गांव में केवल जातपात है . नहीं सूक्ष्म राजनीति भी है .इस इलाके को एक और रेणु चाहिए . मैंने दिवाकर जी से कहा ,आप यहाँ जमिये .(लेखक पूर्व विधान पार्षद सह वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

बिहार में आधुनिक रंगमंच के संस्थापक अनिल कुमार मुखर्जी

- अनीश अंकुर

वर्ष 2016 बिहार में आधुनिक रंगमंच के संस्थापकों में रहे अनिल कुमार मुखर्जी का जन्म शताब्दी वर्ष है। अनिल मुखर्जी ने बिहार में नाट्य आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अकेले जितना कार्य किया शायद ही किसी अन्य शख्स ने किया हो। वे एक नाटककार, अभिनेता, निर्देशक, नाट्यचिंतक थे। उनके द्वारा स्थापित बिहार आर्ट थियेटर प्रदेश का इकलौता नाट्य प्रशिक्षण संस्थान है, जिसने कई पीढ़ियों में रंग संस्कार पैदा किया।

आज के युवा रंगकर्मी अनिल मुखर्जी को अधिकांशत: कालिदास रंगालय के संस्थापक के रूप में ही जानते हैं। लेकिन अनिल मुखर्जी के व्यक्तित्व के अन्य महत्वपूर्ण आयाम भी हैं, जिन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। अपने युवा काल में वे विद्रोही के रूप में जाने जाते थे। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े अनिल मुखर्जी स्वतंत्रता संग्राम के इंकलाबी सेनानी थे। विशेषकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उनसे जुड़ी इस सबंध में एक कहानी भी है, जिसके अनुसार उनके साथियों ने किशोर वय में ही एक अंग्रेज कलक्टर को मारने का जिम्मा दिया था। उसकी हत्या के संदेह में वे गिरफ्तार भी किए गए।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही उन्होंने रामगढ़ (अब झारखंड) में विश्राम कर रही ब्रिटिश सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया। उन्होंने काफिले में मौजूद सैनिक वाहनों की पेट्रोल टंकियों में चीनी और रबड़ के टुकड़े डाल दिए। परिणामस्वरूप इंजन स्टार्ट होते ही जाम हो गया और सैनिकों का काफिला रामगढ़ में ही फंस गया। वे फिर गिरफ्तार कर लिए गए और हजारीबाग जेल में डाल दिए गए। जेल में उनकी मुलाकात राजेंद्र प्रसाद एवं अन्य बड़े नेताओं से हुई। आजादी के पश्चात वे बिहार सरकार के भूसंरक्षण विभाग में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत रहे। इनका लिखा नाटक ‘विप्लवी’ क्रांतिकारी युवकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

वैसे तो बंगला रंगमंच पर वे काफी समय से सक्रिय थे, लेकिन 1961 में उनको पहली बड़ी सफलता ‘पालकी’ नाटक के मंचन के साथ मिली। इसी वर्ष उन्होंने ‘बिहार आर्ट थियेटर’ की स्थापना की। यही ‘बिहार आर्ट थियेटर’ बाद में चलकर यूनेस्को के ‘जागृत नाट्य संस्थान’ में परिवर्तित हुआ। यूनेस्को के भारतीय केंद्र का इन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बनाया गया। अनिल मुखर्जी ने 1950 के दशक में होने वाले नाटकों पारसी या पाश्चात्य शैली के नाटकों से इतर अपनी अलग राह बनानी शुरू की। इन्होंने अपना ‘थियेटर आॅफ द सोल सिस्टम’ की वकालत की। बिहार में रंगकर्म के विकास के लिए उन्होंने पुनाईचक स्थित अपने आवास में बिहार नाट्य कला प्रशिक्षणालय की स्थापना की।

उन्होंने 70 से अधिक नाटकों की रचना की। इसके अलावा वे कुशल अभिनेता, निर्देशक भी थे। अग्रणी नाटककार चतुर्भुज एवं अनिल के संयुक्त प्रयासों से तत्कालीन बिहार विश्विद्यालय के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में नाटक को स्थान मिला। इन्होंने 1968 में समकालीन नाट्य संगठनों की एक फेडरेशन बनाने में भी सफलता पाई। बाद के दिनों में पटना में बनने वाले साझा मंचों की यह फेडरेशन एक तरह से पूर्वपीठिका की तरह थी। 1972 में उनके प्रयासों से ही कालिदास रंगालय सांस्कृतिक काम्पलेक्स के लिए भूखंड किसी तरह उपलब्ध हुआ। जिन नाटकों की अनिल ने रचना की उनमें ‘कठपुतली’ (डॉल्स हाउस पर आधारित), अकेला (लुक बैक इन एंगर), ‘कांचन रंग’, ‘चिंदियों का झालर’, ‘डेथ आॅफ सेल्समैन’, ‘गोरों के इंतजार में’, ‘कटघरे में कैद’ एक और इतिहास-टॅयल आॅफ शेखमुजीबुर्ररहमान आदि। भारत सरकार की विशेष अनुमति से वह बांग्लादेश के उन इलाकों में गए जहां मुजीबुर्ररहमान की मुक्तिवाहिनी सेना से लड़ रही थी। शेखमुजीबुर्ररहमान ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अनिल को बुलाकर अपने आतिय में सम्मानित भी किया।

लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद अनिल को राष्ट्रीय स्तर की नाट्य संस्थाओं द्वारा इन्हें वो महत्व और पहचान क्यों नहीं दी गई जिसके वो हकदार थे? इस पर ‘बिहार आर्ट थियेटर’ के वर्तमान महासचिव कुमार अनुपम का कहना है कि ‘अनिल मुखर्जी ने ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ पर आरोप लगाया था वह कि भारतीय राष्ट्रीय हिंदी रंगमंच की स्थापना के स्थान पर पाश्चात्य शैलियों पर आधारित पाश्चात्य अनुदित नाटक के इर्द-गिर्द प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है। शायद यह भी वजह है कि राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़े नाट्यकार-निर्देशकों ने अनिल दा को कभी स्वीकार नहीं किया।’

कालिदास रंगालय 40 वर्षो से अधिक समय से रंगमंच की सेवा कर रहा है। पूरे हिंदी इलाके का यह सबसे सस्ता प्रेक्षागृह माना जाता है। अनिल के बिना यह सब संभव न होता। उम्मीद है उनके जन्मशताब्दी वर्ष में बिहार के रंगमंच व समाज के लिए उनके महत्व का वस्तुपरक मूल्यांकन संभव हो सकेगा। (लेखक पटना के युवा रंग कलाकार और साहित्यकार हैं)

समाजवादियों को रास आ रही युवा वामपंथी कन्हैया की कहानी

पटना(अपना बिहार, 22 नवंबर) - मामला बहुत दिलचस्प है। दिलचस्प इसलिए कि एक बार फिर देश में राजनीति का पुराना दौर शुरू हो चुका है जब समाजवाद और वामपंथ दोनों विचारधाराओं के नेता न केवल एक-दूसरे के साथ मुद्दे साझा करते थे बल्कि कई मौकों पर सरकार बनाने में एक-दूसरे का सहयोग भी किया। ताजा मामला एक युवा वामपंथी की कहानी का है। युवा वामपंथी का नाम है कन्हैया कुमार और इनकी कहानी जगरनॉट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गयी है। किताब का शीर्षक है - कन्हैया कुमार : बिहार से तिहाड़।

सबसे दिलचस्प यह है कि कन्हैया की यह किताब समाजवादियों को भी रास आ रही है। सूबे में समाजवादी आंदोलन के सजीव हस्ताक्षर माने जाने वाले पूर्व राज्यसभा सांसद सह विधान परिषद के पूर्व सभापति और देश के चर्चित साहित्यकार जाबिर हुसेन ने कन्हैया पर लिखी किताब की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। फेसबुक पर प्रकाशित अपनी टिप्पणी में श्री हुसेन ने लिखा है कि कन्हैया कुमार जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे हैं। एक कड़ी और आक्रामक चुनौती में वो चुनाव जीत कर छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे। उनके संस्मरणों पर आधारित यह पुस्तक अपनी सरल भाषा और बेबाक टिप्पणी के कारण पाठकों का ध्यान अवश्य अपनी ओर खींचेगी।

कन्हैया की प्रशंसा करते हुए श्री हुसेन ने लिखा कि एक तो यह कि कन्हैया बिहार के बेगूसराय के निवासी हैं। दूसरे यह कि उनकी प्रतिबद्धता वाम विचारों से रही है। तीसरे यह कि वो संघर्ष के रास्ते अपने लक्ष्यों को पाने के पक्षधर हैं। उन्होंने कालेज की अपनी पढ़ाई कालेज आॅफ कामर्स से शुरू की थी। यहीं से उनके सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई, और दिल्ली का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने कहा कि कन्हैया की यह पुस्तक उनके बचपन, पटना प्रवास, दिल्ली-यात्रा, जेएनयू प्रवेश और तिहाड़ की नजरबंदी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां तो देती ही हैं, उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता की कहानी भी कहती हैं। गांव के एक अतिसामान्य परिवार से आए कन्हैया अपनी शुरूआती जिंदगी के संघर्षपूर्ण और जटिल दौर को याद करते हुए आगे कदम बढ़ाने के अपने हौसलों का जिक्र जिस दिलचस्प और मर्मस्पर्शी अंदाज में करते हैं, वो किसी को भी प्रभावित करेगा। प्रभावित इसलिए भी करेगा कि कन्हैया ने पूरी ईमानदारी के साथ अपने अच्छे-बुरे अनुभव पाठकों के सामने रखे हैं। उन्होंने कहा कि अभाव का शुरूआती दौर, थोड़े बहुत अंतर के साथ, उनकी अब तक की जिंदगी का पीछा करता रहा है। लेकिन अभाव की जिंदगी उनके वैचारिक तेज को बढ़ाती ही रही है। सामाजिक विसंगतियों की विद्रूपता उनके बढ़ते कदमों को रोकने में हमेशा नाकाम रही। यही कारण है कि छात्र संघ के नेता के रूप में उन्हें देशभर में इतनी शोहरत मिली।

अपनी टिप्पणी में श्री हुसेन ने कहा कि किताब कन्हैया की तप्त चेतना की परतें खोलती हैं। वो खुद को उन कंटीले रास्तों पर चलने और अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए तैयार करते हैं। अवश्य ही वो खुशकिस्मत हैं कि उन्हें यातनाओं के इस सफर में भरोसे के कई साथी-संगी मिले। उन्होंने यह भी लिखा कि मेरी उम्र से काफी छोटे, बीहट के इस कन्हैया ने उम्मीद की एक लौ रौशन कर दी है। आज के समय में, विचारों के घटाटोप से अलग, मुझे कन्हैया के लयबद्ध स्वर सुनाई दे रहे हैं। इस स्वर में आजादी के तरानों की धमक और चमक दोनों हैं।

रेल दुर्घटनाओं के गुनाहगार और असलियत

- श्याम सुंदर

जब-जब रेल दुर्घटना हुआ, देष में कोहराम मचा है। बात चाहे आज अहले सुबह कानपुर में पटरी से उतरी पटना-इंदौर एक्सप्रेस की हो या फिर बंगाल में चार साल पहले हुए ज्ञानेष्वरी एक्सप्रेस की। दुर्घटना के पीछे कारण चाहे जो भी हो लेकिन आरोप-प्रत्यारोप में खत्म हो जाती है असली कारणों की तहकीकात और अपने नीयत चाल से पटरियों पर दौड़ पड़ती है रेल। सवारियों की जान-जोखिम में डाल पटरी पर दौड़ती रेलवे प्रशासन क्या इस बार अपनी मुंह खोलेगा और मामले की सही तहकीकात कर दोषियों पर कोई कार्रवाई होगी?

सवाल इसलिये कि आज से करीब 12 साल पहले हावडा-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस के दो बोगी मगध के लाल गलियारे स्थित रफीगंज स्टेशन के समीप मदार नदी में गिर गयी थी। सितंबर का महीना था और नदी में बाढ़ आयी हुई थी। देश की वीआईपी गाड़ियों में शुमार राजधानी एक्सप्रेस के मदार नदी में गिरने से करीब 150 यात्रियों की मौत हो गयी थी और 500 से अधिक गंभीर रूप से घायल थे। तब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे और महज संयोग था कि रेल मंत्री थे नीतीश कुमार। जो इस समय बिहार के मुख्यमंत्री हैं। रात्री के करीब 11 बज रहे थे और अधिकांश यात्री गहरी निद्रा में थे। घटना से उत्पन्न हालात बेकाबू हो गये थे। हालांकि उस वक्त बिहारियों की सेवा को देष ने सराहा था। घायलों को रफीगंज जैसे छोटे जगह में समुचित इलाज नहीं हो पा रहा था। चूकि यह इलाका माओवादियों का गढ़ माना जाता था इसलिये भी प्रशासन फूंक-फंूक कर कदम रख रही थी।

बहरहाल, घटनास्थल पर दोपहर बाद पहुंचे तत्कालीन रेलमंत्री नीतीश कुमार मुदार्बाद के नारे लगे थे। वहीं रेलमंत्री ने इस घटना के लिये बिहार सरकार को लताड़ते हुए सुरक्षा में चूक बताया था। जबकि अहले सुबह रफीगंज पहुंचे तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद इस बड़ी घटना के लिये मदार नदी पर सौ साल पहले बने रेल पुल को कमजोर बताया था। कारण चाहे जो भी हो। लेकिन देश की यह बड़ी घटना भी सियासी भेंट चढ़ गया। अबतक न तो बिहार पुलिस इस मामले में किसी नतीजे पर पहुंची और न ही रेलवे प्रशासन।

बताते चले कि इस घटना के पहले कभी भी माओवादियों पर यह तोहमत नहीं लगा कि माओवादी सनसनी फैलाने या फिर रेलवे पैसेंजर को लुटने के ख्याल से पैसेंजर गाड़ियों पर हमला किये हों। हां जब कभी माओवादी पुलिस से हथियार लूटने के ख्याल से रेलवे को निषाना बनाते रहे हैं। बहरहाल, सच्चाई चाहे जो भी हो सियासी भेंट चढ़ चुके राजधानी एक्सप्रेस कांड का अनुसंधान अब भी पुलिस फाइल में चल रहा है। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोप-प्रत्यारोप के इस सियासी दौर में सरकारें चाहें जो करें लेकिन माओवादियों ने उस वक्त इस मामले को गंभीरता से लिया था और इलाके के कई चोर गिरोहों को खुलेआम जनअदालत लगाकर मार दिया था। उसके बाद से दूसरी बार जब बंगाल में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई। इस घटना में भी सौ से अधिक यात्रियों की मौत हुई थी। घायलों की संख्या सैंकडों थी। तब भी रेलवे प्रशासन ने इस घटना के लिये राज्य सरकार को दोषी माना था वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे माओवादी नेता किशन जी की चाल बतायी थी। हालांकि माओवादी इस घटना के लिये सीपीएम को जिम्मेवार बताते हुए अपना पल्ला झाड लिया था। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में एक बार फिर आशंका है कि कानपुर में हुए पटना-इंदौर एक्सप्रेस की जांच कागजों में दब कर रह जायेगी। (लेखक जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक के प्रदेश प्रवक्ता हैं)

Celebration of "Kosi Puja" in Silicon Valley

 Ramesh Yadav

Rivers are base pillars of life on the earth. Specially economics and cultures of Indian States stand on both banks of rivers. This is the reason behind worshiping rivers in India is still an integral part of life. On the occasion of Chhath Puja people offer "arghya" to Lord Bhaskar along with they offer their devotion to rivers also. It tells the importance of rivers in life. Really it gives wonderful experience when people belonging to Bihar worship Ganga and Kosi here in Silicon Valley, USA.

It was twenty eight years ago in 1988, Bina Prasad’s mother Priyamvada Devi who was visiting here decided to do Chhath puja at Dayanand and Bina’s house. It was indeed an awakening for every one who was familiar with this Puja. Can it be performed here with all the discipline and resources as required in performing this great puja.

Very quickly all these questions turned into lots of excitement and all Bihari and friends and family came together and got blessings from pervetin, a Mother, Grand Mother and all of us felt that she was indeed doing puja for welfare and blessings of all the friends and family. Seeing her standing in cold water with closed eyes and praying to setting and rising sun was an inspiration for all of us. This tradition has been kept alive in Prasad family with grand daughter Reeta performing Chhath this year.

That started celeberation of Chhath Puja in Silicon valley and today it is held in more than 10 locations across Silicon valley. We are so thankful to our guide Priyamveda Devi who is watching all this from up there in haven and spreading her blessings all around.

Chhath festival is the only one in which we pray to setting sun and then next day to rising sun. It is the only festival and puja in which priest has no role. It is performed for the wellbeing of all the family friends and all their near and dear ones. Any one,  Man or Woman. Rich or Poor, Young or Old can perform this puja. This Puja is held on sixth day of the Month of Kartik and hence the name Chhath and prayer to sun and Chhatti Maiya is offered.

As the time went by, with rising population of young professionals, interest in Chhath grew more and more. Prasad family. Vineeta Rakesh family, Menka Vibhu Balaji family, Tarun and family, Sunil Shalini family and many other families in Silicon valley started performing this puja.

It does take effort of entire Bihari and other communities to come together and gallant volunteering effort of Sunil, Rakesh, Sukhnandan, Tarun, Rashmi, Shyam, Ujjwal, Ritesh and many others came together to find  a big enough beautiful place where sunrise and sunset are equally beautiful. The volunteer team located such site in city of Fremont.  With permission of city started performing puja at Querry Lake Fremont few years back.

For this year volunteer team took permission in the form of permit from city of Fremont in Silicon Valley to perform Chhath puja in lake. Over 550 attendees came, they were not bothered by cold water, cold breeze or shorter days.  Because every one was thrilled with opportunity to participate in Chhath puja and feel at home as if it is happening on the banks of Ganges in Patna.

यह भी जानिए : बुद्ध से जुड़ा है मगध में छठ...

- संजीव चंदन

मगध का सांस्कृतिक प्रतीक छठ पूजा स्त्रियों के लिए  एक व्यापक अवसर मुहैय्या कराता है, घर से बाहर सामूहिक अभिव्यक्ति  का, धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का, जिसके सम्पूर्ण प्रारूप में स्त्रियों की भागीदारी उनके अस्तित्व के विविध पहलुओं को उद्घाटित करते हैं- पितृसत्तात्मक नियंत्रण में जकड़े  अस्तित्व और उसके भीतर अपने लिए आंशिक स्पेस के पहलू. मगध सहित पूरे बिहार में ऐसे ऐतिहासिक और मिथकीय स्त्री चरित्र रही हैं, जिनकी अपने समकालीन पब्लिक सफीअर में हस्तक्षेपकारी भूमिका रही है,  साथ ही  समकालीन अध्यात्म, धर्म और धार्मिक आन्दोलनों में बौद्धिक तथा भौतिक भूमिका रही है. सुजाता की  गौतम बुद्ध की शिक्षिका और शिष्या के रूप में ऐतिहासिक उपस्थिति , आम्रपाली की पब्लिक स्फीअर से लेकर बौद्ध आंदोलन में प्रभावाकरी भूमिका, भारती (मंडन मिश्र  की पत्नी )का शंकराचार्य से शास्त्रार्थ आदि ऐतिहासिक-अर्धैतिहसिक आख्यान बिहार के सांस्कृतिक किस्सों में शुमार हैं. मगध सहित बिहार के दूसरे हिस्सों में तांत्रिक साधना पद्धति और उसमें देवी उपासना से लेकर स्त्रियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक समान हिस्सेदारी इस क्षेत्र की संस्कृति के प्रमुख अवयव रहे हैं.

इन आख्यानों और उपाख्यानों के निर्माण में हालाँकि पितृसत्ता से नियंत्रित विमर्श तंत्र की महत्वपूर्ण और भेदमूलक दखल है. चूकि इस संक्षिप्त आलेख में छठ पूजा का स्त्रीवादी पाठ करना उद्देश्य है फिर भी धर्म और धार्मिक तंत्र पर पितृसत्तात्मक कब्जे का असर सक्रिय स्त्रियों पर क्या पड़ता है , उसके उदहारण स्वरूप निरंजना निवासी सुजाता की चर्चा यहाँ पर समीचीन है. बोधगया के उरुवेला के पास सेनानी नामक गांव की सुजाता ने तपस्यारत क्षीणकाय गौतम को खीर  खिलाकर मध्यम मार्ग का रास्ता दिखाया. क्या ऐसा संभव है कि तत्कालीन भारत के लगभग सभी प्रमुख अध्यात्मिक स्कूलों से वाद-विवाद करता हुआ गौतम दु:ख के निदान का अपना मार्ग ढूढने के लिए तपस्या रत हो और  उसे एक साधारण स्त्री खीर खिलाकर चैतन्य कर दे, मार्ग दिखा दे.तर्क और व्यवहार तो ऐसा कहता है कि गौतम उस स्त्री से शास्त्रार्थ के बिना परास्त होने वाले नहीं थे. खीर और स्नेहपूर्ण वातार्लाप से गौतम को बुद्धत्व की दिशा का भान हुआ होगा. लेकिन बौद्ध स्मृतियाँ इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.

जातक कथाओं में सारे बुद्ध, अपने हर अवतरण में सुजाता से खीर प्राप्त करते  हैं, अर्थात इस ईश्वरीय नियति से पहले तो सुजाता के व्यक्तित्व  को नियंत्रित किया गया, फिर बुद्ध कालीन कई सुजाताओं की उपस्थिति की कहानियाँ इस व्यक्तित्व की प्रखरता को नियंत्रित करती हुई कही गईं. मसलन बुद्ध की प्रमुख शिष्या सुजाता , जो अरहंत है, गृहणी सुजाता, जिसे बुद्ध अच्छी और पतिव्रता, नियंत्रित पत्नी होने का उपदेश करते हैं. स्पष्ट है कि अध्यातम के रास्ते इतने आसान नहीं हैं,  स्त्री के अपने व्यकतित्व को अपने तरीके से खड़ा करने के लिए . धार्मिक तंत्र पर पुरुष नियंत्रण उसे अलौकिक श्रेष्ठता तो दे सकती है , देवी के रूप में, लेकिन सांसारिक श्रेष्ठता संभव नहीं, इसके लिए धार्मिक स्मृतियाँ , अनुश्रुतियाँ पितृसत्तात्मक दायरे में स्त्रियों का व्यक्तित्व वृत्त तय करती हैं., विदुषी स्त्रियों के इक्के -दुक्के उद्धरणों को जन स्मृतियों में  यदि ढूढ़ भी लिया जाये तब भी स्त्रियों , श्रमिकों और दलितों का समूह विद्याध्यन, धार्मिक रस्ते से  इश्वर प्राप्ति ,आदि से वंचित  किया गया. बौद्ध मठों में स्त्रियों के प्रवेश के संघर्ष और प्रवेश के बाद भिक्खुओं की तुलना में भिक्खुनियों की दोयम हैसियत आज स्त्रीवादी इतिहासकारों के द्वारा चिह्नित ऐतिहासिक तथ्य हैं. ऐसे में स्त्रियों के लिए धर्म और अध्यात्म का एक रास्ता दिखता है भक्ति मार्ग से, कर्मकांड रहित भक्ति मार्ग. छठ व्रत की भक्ति पद्धति और प्रत्यक्ष ईश्वर से उनका साक्षात्कार उन्हें आकर्षित भी करता  है और धार्मिक स्पेस में आंशिक अधिकार की सुखानुभूति भी देता  है.

भक्ति मार्ग से अध्यात्म और धर्म की इस डगर पर स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर निकलती हैं, जिसका एक बड़ा उदहारण छठ व्रत में उनका बड़े पैमाने पर नदियों के घाटों पर सार्वजनिक रूप से उमडना है. यह एक ऐसा धार्मिक उत्सव है , जिसमें स्त्रियों का इसके सम्पूर्ण प्रक्रिया पर सर्वाधिक नियंत्रण होता है. इस व्रत के स्वरुप को देखते हुए लगता है कि यह जब भी शुरू हुआ होगा, समाज में व्याप्त पुरोहितवाद और उसके संकीर्ण कर्मकांडों के बरक्स हुआ होगा. इस पूजा में बिना किसी मन्त्र या विशिष्ट धार्मिक कर्मकांड के सीधे तौर पर प्रकट प्रकृति देव सूर्य की आराधना की जाती है, नदियों के घाटों पर बिना अपनी  जातीय पहचान के लोग पानी का अर्घ्य देकर अपनी भक्ति निवेदित करते हैं. पूजा का यह फॉर्म स्त्रियों सहित उन सभी जातियों के लिए आसान हो जाता है, जिन्हें शिक्षा के ह्लसष्टांगह्व से वंचित किया गया था या फिर धार्मिक कर्मकांडों से सायास दूर किया गया था.

हिंदू धर्म में कर्म आधारित पारलौकिक सुख सुविधा एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके सहारे जीवन के अधिकारों से वंचित जाति समूह , स्त्रियों सहित, अपने सांसारिक दुखों का निदान ढूंढते हैं. ईश्वर के साथ लगाव दरअसल जनता के लिए मार्क्सवादी व्याख्या में इन्हीं सन्दर्भों में अफीम की तरह काम करता है. धार्मिक कर्मकांडों से मनोवैज्ञानिक लाभ पाती स्त्रियों के लिए यही कर्मकांड नकारात्मक भूमिका अख्त्यार कर लेते हैं, जब वे उन्हें पुरुषों के वर्चस्व के प्रति अनुकूलित करने लगते हैं और पितृसत्तात्मक वर्चस्व उन्हें स्वाभाविक लगने लगता है. ईश्वर जो अधिकांश मामलों में पुरुष है, स्त्रियों के लिए परलोक में भी पितृसत्तात्मक अनुकूलन का वातावरण बनाता है और व्यावहारिक रूप में स्त्रियाँ अपने सांसारिक पति, पिता और पुत्र के प्रति समर्पित होती जाती हैं.

छठ व्रत नदियों के घाटों  पर अंतिम अर्घ्य के पूर्व लगभग चार दिनों का कर्मकांड है. घर के  धार्मिक वातावरण पर स्त्रियों का नियंत्रण होता है, व्रत करती स्त्रियाँ पूजा की, श्रधा की और पवित्रता की प्रतीक हो जाती हैं. पूजा की सामग्रियां यद्यपि जाति दायरो से मुक्त होकर शूद्र , दलित जातियों के परिवारों से भी लाई जाती हैं, मसलन अर्घ्य का सूप दलित जाति के परिवार ही बनाते हैं, परन्तु व्रत के घर में आकर कठोर शुद्धता से नियंत्रित हो जाती हैं. शुद्धता का यह आग्रह आम तौर पर भी स्त्रियों के अस्तित्व को ही प्रश्नाकिंत करता है. मसलन रजस्वला स्त्री अशुद्ध मानी जाती है और छठ सहित किसी भी धार्मिक कर्मकांड के लिए अयोग्य हो जाती है. पवित्रता और अपवित्रता का सिद्धांत धार्मिक पगडंडियों से होते हुए सामाजिक ताने झ्रबाने  को प्रभावित करते रहे हैं और समाजिक पदानुक्रम में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. यह सिद्धांत स्त्रियों के साथ- साथ एक बड़े जन समूह को दोयम दर्जे की अधिकारहीन जिंदगी जीने के लिए विवश कर देते हैं, वहीं इन वंचित समूहों के भीतर अपनी इस सामाजिक अवस्थिति के प्रति अभ्यस्तता और समर्पण का भाव भी पैदा करते हैं. (लेखक देश के जानेमाने पत्रकार और मासिक पत्रिका स्त्रीकाल के संपादक हैं)

अपनी बात : खतरनाक मोड़ पर देश

दोस्तों, आजादी के बाद साढे छह दशक से अधिक का समय बीत चुका है। कहने को इस कालखंड में भारत ने बहुत तरक्की की है। लेकिन धर्म और राजनीति के मामले में हम वहीं हैं जहां से आजाद हिन्दुस्तान का सफ़र शुरु हुआ था। आज पूरे देश में नफ़रत का माहौल है। सरकार के पालतू न्यूज चैनलों व अखबारों में बताये जा रहे अधिकांश जानकारियां लोगों को एकजुट करने के बजाय लोगों में नफ़रत का जहर घोल रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। Read more>>>

सबसे अनोखा है दीपावली का अहसास

दोस्तों, दीपावली हम क्यों मनाते हैं, इसके कई कारण अलग-अलग तरीके से बतायी जा सकती है। हम फ़रही-बुनिया, मिठाइयां क्यों खाते हैं या फ़िर हम पटाखे क्यों फ़ोड़ते हैं, इन सब सवालों का शायद एक ही जवाब है और वह है अहसास। सचमुच अहसास शब्द बड़ा कमाल का शब्द है। भारतीय संस्कृति में पर्वों के साथ इस शब्द का बड़ा अनोखा संबंध है। हर पर्व के साथ एक अहसास। यह अहसास ही है जो हमें उत्सव मनाने को प्रेरित करता है। मसलन दीपावली पर रोशनी का अहसास। इसका मतलब यह कतई नहीं होता है कि हम पूरे वर्ष अंधकार में रहते हैं लेकिन हमारी कोशिश होती है कि इस दिन हमारा घर-आंगन सबसे अधिक रौशन हो। यह अहसास पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को अधिक होता है। संभवतः इसकी एक वजह यह कि हम भारतीय पुरुषों ने महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में कैद कर रखा है। घर में रहने के कारण उनके मन में अधिक लगाव होना अप्राकृतिक नहीं कहा जा सकता है।

बचपन से मैंने भी इस बात को महसूस किया है कि हर दीपावली घर बदलता है। पहले मां यह सब करती थी। घर की रसोई से लेकर बथानी तक का हुलिया बदल जाता था। बाद में जब घर पक्का का बना तब समझ में आया कि गोबर-मिट्टी के लेप के अतिरिक्त भी घरों का रंग होता है। अब जबकि मेरा घर है। घर के कमरों में मेरे अपने परिजन रहते हैं। मां-बाबूजी भी हैं। हर दीपावली घर बहुत कुछ कहता है, जिसे सुनती केवल मेरी पत्नी है। फ़िर हर कमरे की साफ़-सफ़ाई से लेकर वांछनीय और अवांछनीय वस्तुओं की पहचान कर उन्हें सहेजना या फ़िर रद्दी वालों को बेचने से लेकर नये सामान, नये पर्दे, नये बेडशीट सब बदल जाते हैं। हम पुरुष तो बस बदलाव को महसूस कर कभी खुद पर नाज करते हैं तो कभी सच में खुश होकर बदले घर का स्वागत करते हैं। हर बार यही होता है और कहना अतिश्योक्ति नहीं कि यही जीवन चक्र है।

अपनी बात : सवर्ण और गैर सवर्ण इंसाफ़ प्रणाली

दोस्तों, वह दौर बीत चुका है जब गांव-देहात में पुलिस के आने के बाद कर्फ़्यू छा जाता था। पढे-लिखे लोग ही तब अदना पुलिसकर्मी से बात कर पाते थे। अधिकांश घरों में तो पुलिस को देखते ही किवाड़ बंद कर लिया जाता था। पता नहीं पुलिस किसके घर में घुसकर किसको पकड़ ले। वैसे यह एक अच्छा मौका होता था मां के लिए। मां तब धमकी देती कि मैंने सही से खाना नहीं खाया या दूध नहीं पीया या फ़िर रोज स्कूल नहीं गया तो वह पुलिस से पकड़वा देगी। मां की धमकी तब असरकारक हुआ करती थी।

यह सब करीब दो दशक पहले की बात है। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। गांवों में पुलिस की टीम अब रोज आती है। लेकिन अब कोई डरता नहीं। यहां तक कि गांव के बच्चे भी कई अवसरों पर पुलिसवालों से उलझ पड़ते हैं। कई बार तो बेचारों को दबे पांव वापस भी लौटना पड़ता है। यह परिवर्तन केवल मेरे एक गांव का नहीं है और न ही यह परिवर्तन केवल एक स्तर तक का है। वस्तुतः पिछले ढाई दशकों में पुलिसिंग और न्यायिक व्यवस्था की पोल दलितों-पिछड़ों में आयी जागरुकता ने खोलकर रख दी है। जैसे-जैसे लोग अपने अधिकारों के बारे में जानने-समझने लगे हैं, पुलिस से भय खत्म होने लगा है। इस परिवर्तन को दूसरे रुप में युं भी कह सकते हैं कि यह सत्ता के परिवर्तन के कारण भी हुआ है। पहले जब सवर्ण सत्ता के शीर्ष पर थे तब पुलिस सवर्ण थी और अब चूंकि गैर सवर्ण सत्ता में हैं तो पुलिस भी गैर सवर्ण है। बहुसंख्यक अब इस अंतर को समझने लगे हैं।

लेकिन न्यायपालिका के मूल स्वरुप में बदलाव होना बाकी है। अभी तक न्यायापालिका जनसामान्य को इंसाफ़ मिले, इस सिद्धांत के आधार पर काम करती नहीं दिख रही है। फ़िर चाहे वह बाथे, बथानी, मियांपुर आदि नरसंहारों के आरोपियों को बेकसूर करार दिया जाना हो या फ़िर राकी यादव जैसे हत्यारोपी को आसानी से जमानत मंजूर किया जाना।

मामला बहुत दिलचस्प है। इसमें ट्विस्ट लाने का श्रेय मीडिय को जाता है, जो अपने ही सामाजिक चरित्र की बेड़ियों में जकड़ा है। आश्चर्य तो तब होता है जब अनंत सिंह जैसा गुंडा मीडिया के शीर्ष पदों को सुशोभित करने वालों का भगवान बन जाता है। ऐसे लोगों के लिए शहाबुद्दीन और राजबल्लभ भी किसी भगवान से कम नहीं हैं।

बहरहाल इंसाफ़ की व्यवस्था पर सवाल उठने का एक कारण राजनीतिक भी है। दिलचस्प यह है कि सोशल मीडिया के जरिए अब जनता भी राजनीति को प्रति दिन परख रही है। सभी जनता के निशाने पर हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि आने वाले समय में जनता के सामने सभी नंगे होंगे फ़िर चाहे वह विधायिका के लोग हों या फ़िर न्यायपालिका के। बाकियों के नंगे रहने या नहीं रहने का अंतर बहुत पहले समाप्त हो चुका है।

अपनी बात : बिहार के विध्वंसक थे श्रीबाबू

दोस्तों, भारतीय इतिहासलेखन की त्रासदी रही है कि यह कभी भी न्यायसंगत नहीं रहा है। अलग-अलग कालखंड में लिखा गया इतिहास भारतीय सामाजिक व्यवस्था के कारण अपनी सीमाओं से बाहर निकल ही नहीं पाया। श्री बाबू यानी बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के मामले में भी अभी तक यही हुआ है। भूमिहार समाज के लोग उन्हें अराध्य मानते हैं। वे उन्हें बिहार का आधुनिक निर्माता भी कहते हैं। अतिश्योक्ति के माहिर खिलाड़ी यह कहने में शर्म महसूस नहीं करते कि उनका राज बिहार के लिए स्वर्ण युग साबित हुआ।

ऐसा नहीं है कि ऐसा कहने वालों के पास तर्क या जवाब नहीं हैं। संभव है कि पूछने पर वे तमाम बातें सुना देंगे। लेकिन यह अधुरा सच है। संभवतः यही वजह रही कि गांधी नहीं चाहते थे कि श्री बाबू बिहार के सीएम बनें। आजादी के पहले देश में जब अंतरिम सरकार बनी तब युनूस सलीम बिहार के पहले प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन श्रीबाबू ने बड़ी होशियारी से कांग्रेस की लीडरशिप पर कब्जा कर लिया। उन्हें इसका फ़ायदा मिला। वे दो बार सीएम बने। कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं था। अनुग्रह बाबू जाति के राजपूत थे। श्री बाबू ने उन्हें बिहार का पहला सीएम नहीं बनने दिया। इसे राजपूत - भूमिहार जंग की संज्ञा भी दी जा सकती है।

लेकिन अनुग्रह बाबू भी मंजे खिलाड़ी साबित हुए। परिणाम यह हुआ कि श्री बाबू के बाद बिहार में करीब 33 सीएम बनाया गया। जिन दिनों देश में सांप्रदायिक दंगे की आग में जनमानस जल रहा था तब गांधी बिहार आने को बेताब थे। लेकिन श्री बाबू नहीं चाहते थे। लेकिन धुन के पक्के गांधी करीब 64 तक बिहार में रहे। उनकी अपील का असर यह हुआ कि बिहार में सांप्रदायिक दंगे की आग में जलने से बच गया।

बहरहाल श्रीबाबू को बिहार केसरी की उपाधि दी गयी है। केसरी यानी जंगल का राजा शेर। जब श्री बाबू शेर थे तब बिहार में "जंगलराज" तो कहा जा सकता है और यह अतिश्योक्ति भी नहीं कही जानी चाहिए।

संपादकीय : शहाबुद्दीन, राजबल्लभ और असहाय सरकार

दोस्तों, बिहार में सरकार और उसका तंत्र दोनों काम कर रहे हैं या नहीं, इसका मौलिक पैमाना आम जनता को स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा उपलब्ध कराने के अलावा सुरक्षा मुहैया कराना भी है। लेकिन यदि सरकार न्याय की रक्षा न कर पाये तो निश्चित तौर पर सरकार के अस्तित्व पर सवाल उठना जरुरी है कि आखिर बिहार में कोई सरकार है भी या नहीं? कहीं सरकार के नाम पर तीन अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों की राजनीतिक गठजोड़ मात्र है।

मसलन सीवान के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की जमानत मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। इसके मूल में पीड़ित चंदा बाबू और उनके परिजनों की सुरक्षा रही। सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि शहाबुद्दीन जेल से बाहर रहने के कारण उनकी हत्या करवा सकते हैं। हालांकि न्यायालय चाहती तो राज्य सरकार को निर्देश देती कि वह चंदा बाबू और उनके परिजनों को हर हाल में सुरक्षा प्रदान करे और पटना हाईकोर्ट को शहाबुद्दीन मामले की सुनवाई जल्द से जल्द करने का आदेश देती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राज्य सरकार ने भी शहाबुद्दीन को वापस जेल में भेजकर जहां एक ओर उनसे अपना बदला ले लिया। बताते चलें कि जेल से रिहा होने के बाद शहाबुद्दीन ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को परिस्थितियों का सीएम बताया था और लालू प्रसाद को अपना नेता माना था।

एक दूसरा उदाहरण राजबल्लभ यादव का है। इनके खिलाफ़ एक नाबालिग के साथ बलात्कार करने का आरोप लंबित है। इनके मामले में भी अदालत में यह तर्क राज्य सरकार के द्वारा दिया जा रहा है कि राजबल्लभ के जेल में बाहर रहने के कारण पीड़िता दहशत में है और वह अदालत के समक्ष अपना बयान नहीं दे सकती है। एक बार फ़िर अदालत ने इसी आधार पर पूरे मामले की सुनवाई को फ़िलहाल रोक दिया है।

शहाबुद्दीन और राज बल्लभ दोनों में एक बात कामन है। सरकार ने दोनों के मामले में हाथ लगभग खड़े कर दिया है। एक शहाबुद्दीन की जामनत याचिका खारिज की जा चुकी है तो दूसरे राजब्ल्लभ की जामनत खारिज किये जाने की पूरी संभावना है। सवाल उठता है कि क्या राज्य सरकार के पास अपना कोई तत्र नहीं है जो पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करे? एक सवाल यह भी उठता है कि कहीं इन सबके पीछे राजनीति तो नहीं?

फ़र्जिकल स्ट्राइक : गेम इज नाट ओवर…

दोस्तों, अब यह बात साफ़ हो गयी है कि या तो भारतीय सेना द्वारा तथाकथित रुप से पाकिस्तानी सीमा में घुसकर किया गया सर्जिकल स्ट्राइक फ़र्जी था या फ़िर इस स्ट्राइक के सहारे देश में चुनावी जंग जीतने की कोशिश की जा रही है। जिस तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विजयादशमी लखनऊ जाकर मनाया, साबित होता है कि उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए यूपी कितना मायने रखता है। खासकर बिहार में मिली करारी हार के बाद उनके लिए यूपी फ़तह करना अनिवार्य हो गया है। इसलिए श्री मोदी हर दांव आजमा लेना चाहते हैं। Read more>>>

अपनी बात : बजाइये ताली, रावण जल गया है…

संजय स्वदेश

कथा का तानाबाना तुलसीबाबा ने कुछ ऐसा बुना की रावण रावण बन गया। मानस मध्ययुग की रचना है। हर युग के देशकाल का प्रभाव तत्कालीन समय की रचनाओं में सहज ही परीलक्षित होता है। रावण का पतन का मूल सीता हरण है। पर सीताहरण की मूल वजह क्या है? गंभीरता से विचार करें। कई लेखक, विचारक रावण का पक्ष का उठाते रहे हैं। बुरी पृवत्तियों वाले ढेरों रावण आज भी जिंदा हैं। कागज के रावण फूंकने से इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर जिस पौराणिक पात्र वाले रावण की बात की जा रही है, उसे ईमानदार नजरिये से देखे। विचार करें। यदि कोई किसी के बहन का नाक काट दे तो भाई क्या करेगा। आज 21वीं सदी में ऐसी घटना किसी भी सच्चे भाई के साथ होगी, तो निश्चय ही प्रतिशोध की आग में धधक उठेगा। फिर मध्य युग में सुर्पनखा के नाम का बदला रामण क्यों नहीं लेता। संभवत्त मध्ययुग के अराजक समाज में तो यह और भी समान्य बात रही होगी।

अपहृत नारी पर अपहरणकर्ता का वश चलता है। रावण ने बलात्कार नहीं किया। सीता की गरीमा का ध्यान रखा। उसे मालूम था कि सीता वनवासी बन पति के साथ सास-श्वसुर के बचनों का पालन कर रही है। इसलिए वैभवशाली लंका में रावण ने सीता को रखने के लिए अशोक बाटिका में रखा। सीता को पटरानी बनाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन इसके लिए जबरदस्ती नहीं की। दरअसल का मध्य युग पूरी तरह से सत्ता संघर्ष और नारी के भोगी प्रवृत्ति का युग है। इसी आलोक में तो राजेंद्र यादव हनुमान को पहला आतंकवादी की संज्ञा देते हैं। निश्चय ही कोई किसी के महल में रात में जाये और रात में सबसे खूबसूरत वाटिका को उजाड़े तो उसे क्यों नहीं दंडित किया जाए। रावण ने भी तो यहीं किया। सत्ता संघर्ष का पूरा जंजाल रामायण में दिखता है। ऋषि-मुनि दंडाकारण्य में तपत्या कर रहे थे या जासूसी। रघुकुल के प्रति निष्ठा दिखानेवाले तपस्वी दंडाकारण्य अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह क्यों करते थे। उनका कार्य तो तप का है। जैसे ही योद्धा राम यहां आते हैं, उन्हें अस्त्र-शस्त्रों की शक्ति प्रदान करते हैं। उन्हीं अस्त्र-शस्त्रों से राम आगे बढ़ते हैं। मध्ययुग में सत्ता का जो संघर्ष था, वह किसी न किसी रूप में आज भी है। सत्ताधारी और संघर्षी बदले हुए हैं। छल और प्रपंच किसी न किसी रूप में आज भी चल रहे हैं। सत्ता की हमेशा जय होती रही है। राम की सत्ता प्रभावी हुई, तो किसी किसी ने उनके खिलाफ मुंह नहीं खोला। लेकिन जनता के मन से राम के प्रति संदेह नहीं गया। तभी एक धोबी के लांछन पर सीता को महल से निकाल देते हैं। वह भी उस सीता को तो गर्भवती थी। यह विवाद पारिवारीक मसला था। आज भी ऐसा हो रहा है। आपसी रिश्ते के संदेह में आज भी कई महिलाओं को घर से बेघर कर दिया जाता है। फिर राम के इस प्रवृत्ति को रावण की तरह क्यों नहीं देखी जाती है। जबकि इस तरह घर से निकालने के लिए आधुनिक युग में घरेलू हिंसा कानून के तहत महिलाआें को सुरक्षा दे दी गई है। बहन की रक्षा, उनकी मर्यादा हनन करने वालों को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा, पराई नारी को हाथ नहीं लगाने का उज्ज्वल चरित्र तो रावण में दिखता है। लोग कहते भी है कि रावण प्रकांड पंडित था। फिर भी उसका गुणगणान नहीं होता। विभिषण सदाचारी थे। रामभक्त थे। पर उसे कोई सम्मान कहां देता है। सत्ता की लालच में रावण की मृत्यु का राज बताने की सजा मिली। सत्ता के प्रभाव से चाहे जैसा भी साहित्या रचा जाए, इतिहास लिखा जाए। हकीकत को जानने वाला जनमानस उसे कभी मान्यता नहीं देता है। तभी तो उज्ज्वल चरित्र वाले विभिषण आज भी समाज में प्रतिष्ठा के लिए तरसते रहे। सत्ता का प्रभाव था, राम महिमा मंडित हो गए। पिता की अज्ञा मानकर वनवास जाने तक राम के चरित्र पर संदेह नहीं। लेकिन इसके पीछे सत्ता विस्तार की नीति जनहीत में नहीं थी। राम राजा थे। मध्य युग में सत्ता का विस्तार राजा के लक्षण थे। पर प्रकांड पंडित रावण ने सत्ता का विस्तार का प्रयास नहीं किया। हालांकि दूसरे रामायण में देवताओं के साथ युद्ध की बात आती है। पर देवताओं के छल-पंपंच के किस्से कम नहीं हैं।

काश, कागज के रावण फूंकने वाले कम से कम उसके उदत्ता चरित्र से सबक लेते। बहन पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए हिम्मत दिखाते। उसकी रक्षा करते। परायी नारी के साथ जबरदस्ती नहीं करते। ऐसी सीख नहीं पीढ़ी को देते। समाज बदलता। मुझे लगता है कि राम चरित्र की असंतुलित शिक्षा का ही प्रभाव है कि 21वीं सदी में भी अनेक महिलाएं जिस पति को देवता मानती है, वहीं उन पर शक करता है, घर से निकालता है। संभवत: यहीं कारण है कि आज धुं-धुं कर जलता हुए रावण के मुंह से चीख निकलने के बजाय हंसी निकलती है। क्योंकि वह जनता है कि जिस लिए उसे जलाया जा रहा है, वह चरित्र उसका नहीं आज के मानव रूपी राम का है।

गांधी के नाम पर ए. एन. सिन्हा सामाजिक शोध संस्थान में लूट!

-दोस्तों, मामला महात्मा गांधी के नाम पर लूट का है या अनियमितता का यह तो सरकार अपने हिसाब से पूरे मामले की जांच के बाद कह सकती है। लेकिन केवल चार कमरों वाले मकान की मरम्मती की जाय और इसके बावजूद यदि कमरे में पानी रिसने लगे तो सवाल उठना लाजमी है। हम बात कर रहे हैं स्थानीय ए. एन. सिन्हा सामाजिक शोध अध्ययन संस्थान परिसर में बने गांधी कैंप की।

इस कैंप का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है। जिन दिनों देश को आजाद करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, उन दिनों देश विभाजन के कारण देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक दंगा भड़क चुका था। महात्मा गांधी उन दिनों पश्चिम बंगाल के नोआखली में थे। उन दिनों ही बिहार में भी सांप्रदायिक दंगे की आग भड़क चुकी थी और इसका केंद्र पटना था। महात्मा गांधी को जब इसकी जानकारी मिली तो वे बेचैन हो गये। तत्कालीन स्थानीय कांग्रेसी नेतृत्व के विरोध के बावजूद महात्मा गांधी 5 अप्रैल 1947 को पटना आये। तब से लेकर 30 मार्च 1947 तक वे पटना लॉन (आज का गांधी मैदान) के पास तत्कालीन सरकार में मंत्री रहे डा. सैयद महमूद के सरकारी आवास में बने सर्वेंट क्वार्टर में रहे। आज इसी परिसर में ए एन सिन्हा सामाजिक अध्ययन एवं शोध संस्थान स्थापित है।

गांधी जी अपने सहयोगी निर्मल कुमार बोस, मनु गांधी, सैयद अहमद, देव प्रकाश नाय, सैयद मुन्तवा के साथ कैंप कर रहे थे। वे पटना के सुदूर गांवों में जाकर लोगों को समझाने का प्रयास कर रहे थे। उन्हीं दिनों महात्मा गांधी के बुलावे पर 8 मार्च 1947 को सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां भी पटना आये थे और इसी सर्वेंट क्वार्टर में रूके थे। गांधी पटना में सांप्रदायिक सद्भाव की मुहिम में जुटे थे उन्हीं दिनों वायसराय लार्ड माउन्टबेटेन के निमंत्रण पर उन्हें 30 मार्च 1947 को दिल्ली जाना पड़ा। इसके बाद महात्मा गांधी फिर 14 अप्रैल 1947 को पटना वापस आये और 24 मई 1947 तक रहे। यह बिहार में उनका अंतिम प्रवास था। इसके बाद गांधी फिर कभी लौटकर नहीं आये। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या दिल्ली के बिड़ला मंदिर में कर दी।

सूत्र बताते हैं कि देश के आजाद होने के बाद सैयद महमूद के सरकारी आवास के सर्वेंट क्वार्टर को गांधी कैंप घोषित कर दिया गया। बाद में बिहार के प्रथम उपमुख्यमंत्री रहे अनुग्रह नारायण सिंह के निधन के बाद इस परिसर में उनके नाम पर सामाजिक अध्ययन एवं शोध संस्थान की स्थापना की गयी। इसका मकसद राज्य में रिसर्च के जरिए ज्ञान को बढ़ावा देना था। लेकिन इसके बावजूद गांधी कैंप की कोई खोज खबर नहीं ली गयी। इस बीच गांधी कैंप केवल कागजों में रहा और हकीकत में यह संस्थान कर्मियों का आवास बना रहा।

गांधी कैंप पर संस्थान की सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब इसके निदेशक के रूप में प्रो. डी. एम. दिवाकर आये। उन्होंने गांधी कैंप को पुन: स्थापित करने के लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा। तब गांधी कैंप के भवन की हालत जीर्ण-शीर्ण हो चुकी थी। राज्य सरकार ने भी गांधी कैंप के महत्व को समझा और वर्ष 2011-12 में इस भवन के जीर्णोद्धार के लिए अपनी सहमति दे दी।

असल समस्या मरम्मती के समय आयी। प्रो. दिवाकर का मानना था कि भवन के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इसकी मरम्मती में वे सामग्री ही इस्तेमाल किये जायें, जो मूल भवन में है। इसके लिए आर्कियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इन्डिया के द्वारा बनाये गये प्राक्कलन के आधार पर राज्य सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग ने एक करोड़ रुपए की राशि आवंटित कर दी। लेकिन संस्थान ने यह रकम अपने पास लेने के बजाय इसे बिहार विरासत समिति को देने का अनुरोध किया, जिसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया।

परिणाम यह हुआ कि गांधी कैंप की मरम्मती शुरू हुई और इसकी आधारशिला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वयं रखी। वर्ष 2014 में इसकी मरम्मती का कार्य पूर्ण हुआ और इसका उद्घाटन भी श्री कुमार ने ही किया। इस बीच संस्थान के निदेशक तत्कालीन निदेशक प्रो. डी. एम. दिवाकर ने गांधी कैंप में शांति एवं अहिंसा अध्ययन केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को दिया। उनके इस प्रस्ताव को भी राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया। परिणाम स्वरूप गांधी कैंप में इसका बोर्ड भी लग गया, लेकिन गतिविधि लगभग शून्य रही। जबकि इसके लिए अतिरक्ति 9 पदों का सृजन किया गया था।

इस बीच संस्थान के निदेशक के पद पर सुनील रे आये। उनका कहना है कि उन्हें आये एक वर्ष हुआ है और गांधी कैंप व यहां स्थापित शांति एवं अहिंसा अध्ययन केंद्र के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि फिलहाल केंद्र में एक असिस्टेंट प्रोफेसर की तैनाती कर दी गयी है। यह पूछे जाने पर कि दो वर्षों में क्या कोई शोध इस केंद्र के द्वारा कराया गया है, प्रो. रे ने इसका नकारात्मक जवाब दिया। एक अहम जानकारी यह भी कि इस केंद्र में फिलहाल महात्मा गांधी से जुड़ा एक दस्तावेज तक नहीं है। वर्तमान में यह आवारा कुत्तों का आश्रय स्थल भी है।

बहरहाल सवाल कई हैं। पहला सवाल तो यह है कि यदि एक करोड़ रुपए से गांधी कैंप की मरम्मती हुई तो कैसे हुई और उसकी गुणवत्ता का आधार क्या था। किस कारण महज दो वर्षों में ही वह एक बार फिर जीर्ण-शीर्ण की अवस्था में है? दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य सरकार हर साल संस्थान को औसतन दो करोड़ रुपए से अधिक अनुदान के रूप में देती है। फिर इस राशि में से गांधी जी के नाम पर बने शांति एवं अहिंसा अध्ययन केंद्र के विकास पर क्यों नहीं किया जा रहा है। सवाल यह भी है कि आखिर गांधी के नाम पर लूट क्यों?

संपादकीय : शहाबुद्दीन तुम्हें सलाम…

दोस्तों, संपादकीय का शीर्षक आलोच्य है। आलोच्य इसलिए कि मैं भी यह मानता हूं कि किसी भी अपराधी का महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन संदर्भ दूसरा है। असल में शहाबुद्दीन अब केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं रह गया है। वह एक स्टैंडर्ड बन गया है। हालत यह हो गयी है कि एक शहाबुद्दीन के कारण सरकार, न्यायपालिका, विधायिका और पत्रकारिता यानी लोकतंत्र के चारों स्तंभों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा हो गया है। अन्य स्तंभों को उनके हाल पर छोड़ यदि पत्रकारिता जगत की बात करें तो देश के तमाम लिखक्कड़ों ने शहाबुद्दीन को केंद्र में रखकर अपने मन की भड़ास जरुर निकाली है। मानों शहाबुद्दीन ने उन्हें देश की सभी व्यवस्थाओं को गाली देने का मंत्र दे दिया है। मुझ जैसा अल्पज्ञ भी एक शहाबुद्दीन के आधार पर समाज में हो रहे बदलाव को महसूस करने की चेष्टा कर रहा है।

सबसे अधिक दयनीय हालत तो उन पत्रकारों की है, जिनके रगों में कथित तौर पर सवर्ण खून दौड़ता है। जाने किस मिट्टी के बने हैं वे। एक पत्रकार ने हद ही कर दी। उसे शहाबुद्दीन की टी शर्ट नजर आती है। गनीमत है कि उसने शहाबुद्दीन के अंतः वस्त्रों के दर्शन नहीं किये। सबसे मजेदार तो यह है कि भारत के गरीब जनता की कमाई से दस लाख का सोने का सूट पहनने वाला प्रधानमंत्री उसे भगवान सरीखा लगता है। गरीबों को लूटकर अरबों रुपए कमाने वाला अनंत सिंह उसके लिए प्रातः स्मरणीय है।

खैर पसंद अपनी-अपनी। पत्रकारिता में भी यह बात लागू है। किसी को शहाबुद्दीन का टीशर्ट नजर आता है तो किसी को कुछ और। किसी को वह शहाबुद्दीन नजर आता है जो बकरीद के दिन अपने गांव-जवार के लोगों को गले लगाता है। जितने पत्रकार उतना शहाबुद्दीन। मानों हरि अनंत, हरिकथा अनंता। वैसे पत्रकारिता आज जैसी है, वैसी पहले भी थी या नहीं, सही-सही नहीं कहा जा सकता है। लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि इस एक शख्स ने पत्रकारिता की मानक रेखा खींच दी। जिस पत्रकार ने शहाबुद्दीन की आलोचना की, वह सवर्ण लोगों(आप चाहें तो भाजपाई भी कह सकते हैं) को सबसे बड़ा पत्रकार और वह पत्रकार जिसने आंखों-देखी सच्चाई बयां की, वह उनके लिए किसी दलाल से कम नहीं है।

शहाबुद्दीन की महिमा से लोकतंत्र के अन्य स्तंभ भी अछूते नहीं हैं। विधायिका तो वैसे ही राजनीति के अपराधीकरण को लेकर बदनाम है। मतलब साफ़ है कि हर पार्टी को शहाबुद्दीन और अनंत सिंह जैसे लोग चाहिए। यह अलग बात है कि राजनीति में बयानबाजी यह देखकर नहीं की जाती है कि बयान देने वाले में कितना खोट है। राजनेता "चलनी" के समान हैं जिसमें हजार छेद होते हुए भी "सूप" को दोषी करार देते हैं। यही राजनेता होने का सबसे बड़ा सबूत है। बिहार और देश की जनता को शहाबुद्दीन के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए कि केवल उसके कारण बिहार की ठंढी पड़ चुकी राजनीति एकाएक गरमा गयी। सारे बुनियादी मुद्दे केवल शहाबुद्दीन के कारण ठंढे बस्ते में चले गये। हालत तो यह हो गयी कि पप्पू यादव जैसा नेता भी शहाबुद्दीन की रिहाई के विरोध में प्रदर्शन करता है। वहीं पप्पू यादव जिसपर अजीत सरकार की हत्या का आरोप था और सबूत के अभाव में रिहा हो गया।

शहाबुद्दीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उसने विपक्ष को राजनीतिक संजीवनी प्रदान कर दी। मंगल पांडे और सुशील मोदी जैसे नेताओं के भी पर निकल आये हैं। अन्य नेताओं के मुंह में भी जुबान आ गयी है। मानवता के नाते ही इन नेताओं को शहाबुद्दीन के प्रति आभार जरुर व्यक्त करनी चाहिए।

कार्यपालिका सत्ता के शीर्ष का अनुगामी होता है। जब सत्ता के शीर्ष ने चाहा शहाबुद्दीन गिरफ़्तार किया गया। जेल भेजा गया। जेल में भी उसने कम ऐश नहीं किये। उसकी कहानियां आज भी लोग चटखारे लेकर कहते और सुनते हैं। वैसे इन सबके बीच शहाबुद्दीन ने पीएचडी की डिग्री हासिल की। करीब डेढ सौ किताबें पढ डाली। कुछ लोगों को यह कमाल की बात लग सकती है।

अंत में बात न्यायपालिका की। शहाबुद्दीन को मिली जमानत ने न्यायपालिका पर सवाल खड़ा कर दिया। दिलचस्प यह है कि यह सवाल तब नहीं खड़ा किया गया जब बिहार में दलितों और पिछड़ों का नरसंहार कराने वाला ब्रह्मेश्वर मुखिया बाइज्जत बरी हो गया। जिन रक्तपिपासुओं ने दिनदहाड़े दलितों और पिछड़ों को मौत के घाट उतारा, उन्हें बाइज्जत बरी करने पर आज न्यायपालिका की नैतिकता की दुहाई देने वालों के न तो मुंह से कोई शब्द निकला था और न ही उनकी कलम से। अब तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया है। नीतीश कुमार ने अपनी छवि बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है तो प्रशांत भूषण जैसे दिग्गज वकील भी सीवान के चंदा बाबू के पक्ष में खड़े हो चुके हैं। वैसे दिलचस्प बात यह है कि वह प्रशांत भूषण ही थे जिन्होंने बाथे-बथानी के पीड़ितों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में लड़ने से इन्कार कर दिया था।

बहरहाल शहाबुद्दीन सचमुच में मानक बन चुका है। एक सजीव मानक। इस एक मानक ने सभी की सीमाओं को सार्वजनिक कर दिया है। जाहिर तौर पर शहाबुद्दीन का न सही, इस मानक को सलाम देना तो बनता ही है।

खास रिपोर्ट : जातिवाद से पीड़ित 42.2 फीसदी शिक्षक मानते हैं कि पढ़ने में कमजोर होते हैं दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चे

पटना(अपना बिहार, 7 सितंबर 2016) - जाति सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई है। हालत यह है कि सूबे के 42.2 फीसदी शिक्षक भी इससे पीड़ित हैं और वे मानते हैं कि दलित व पिछड़ी जाति बच्चे पढ़ने में कमजोर होते ही हैं। यह आंकड़ा बिहार सरकार के शिक्षा विभाग शोध एवं प्रशिक्षण निदेशालय द्वारा कराये गये सर्वे पर आधारित है। विश्व बैंक के सौजन्य से कराये गये इस सर्वे के पीछे विभाग की मंशा सूबे में शिक्षकों को होने वाली समस्या के बारे में जानना और कमियों में सुधार करना था। सर्वे की रिपोर्ट का यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में सामान्य वर्ग यानी गैर आरक्षित वर्ग के शिक्षकों की संख्या 26.9 फीसदी है और शेष शिक्षक आरक्षित वर्गों से हैं।

जब इस सर्वे की रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी गयी थी तब राज्य सरकार ने शिक्षकों की अध्यापन कुशलता में वृद्धि के लिए कई कार्यक्रम तय किये थे। इसके कई मानदंड भी थे। लेकिन पूरी योजना धरी की धरी रह गयी। हालांकि विभाग द्वारा शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु विशेष पहल अवश्य किये गये हैं।

वहीं सर्वे रिपोर्ट में बताये गये आंकड़े सूबे में शिक्षकों की अकार्यकुशलता को प्रदर्शित करता है। मसलन 45 फीसदी शिक्षक केवल इंटर पास हैं। वहीं राज्य सरकार द्वारा हाल में किये गये शिक्षक नियोजन के कारण स्थिति में सुधार आया है और स्नातक पास शिक्षकों की संख्या 32 फीसदी हो सकी है। वहीं पीजी पास शिक्षकों की संख्या करीब 16 फीसदी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि स्नातक व स्नातकोत्तर उत्तीर्ण शिक्षकों को उच्च वर्गों में अध्यापन की जिम्मेवारी होती है जबकि वर्ग सात से नीचे के वर्गों में पढ़ाने की जिम्मेवारी गैर स्नातक शिक्षकों की है। जबकि सात फीसदी शिक्षकों की योग्यता केवल मैट्रिक पास है।

सर्वे की रिपोर्ट को आधार मानें तो शिक्षकों की अधिक उम्र भी एक बड़ी समस्या है। मसलन 77.2 फीसदी पुरूष शिक्षकों की उम्र चालीस पार है।  हालांकि उम्र के लिहाज से शिक्षिकायें अधिक जवान हैं। केवल 22.8 फीसदी शिक्षिकाओं की उम्र चालीस वर्ष से अधिक है। यह स्थिति राज्य सरकार द्वारा शिक्षक नियोजन में महिलाओं को प्राथमिकता दिये जाने के कारण हुआ है।

बहरहाल शिक्षा विभाग के मुताबिक शिक्षकों की कार्यकुशलता में संवर्द्धन के लिए कई तरह की योजनायें चलायी जा रही हैं। इनमें नियमित प्रशिक्षण के अलावा शिक्षकों का मूल्यांकन भी शामिल है। इसी मूल्यांकन के आधार पर शिक्षकों को सम्मानित करने की योजना भी  शामिल है।

अपनी बात : प्यारी रात के नाम

रात की बात बड़ी निराली होती है। दिन के उजाले में जो नजर नहीं आता, अक्सर रात के अंधेरे में साफ़-साफ़ नजर आता है। वैसे रात का महत्व अलग-अलग समय के हिसाब से अलग-अलग होता है। मसलन बचपन में मां की कहानी सुनने के लिए रात का इंतजार तो आज भी मन को कचोटता है। मां तब कितनी कहानियां कहती थी। तेल लगाने के बाद। कभी-कभी तो कहानियों के बगैर खाने का मन भी नहीं होता तो मां एक-एक कौर खाना खिलाती और साथ में कहानी भी सुनाती। अक्सर ऐसा रात के अंधकार में ही होता था। ढिबरी की रोशनी रहती थी तब। मां का चेहरा दिखता था और आंगन में घुप्प अंधेरा।

मां जब भूत की कहानी सुनाती तो लगता जैसे सचमुच भूत आ जाएगा। परियों की कहानी सुनाती तो आसमान में टिमटिमाते तारे परियों के होने का अहसास कराते। मन कभी डरता तो कभी खुश होता। डरने और खुश होने के बीच मन में बात बैठी रहती कि पहले मां कहानी सुनाये फ़िर आंखें बंद करुं। हालांकि उन दिनों आंखों पर इतना नियंत्रण कहां होता था। कब कहानी सुनते-सुनते मां की गोद में नींद आ जाती, पता ही नहीं चलता था।

रात से अपना रिश्ता तो तभी से है। अब मां बुढी हो गयी हैं और मैं भी जीवन के मई-जून की तेज दुपहरी झेल रहा हूं। रात अब भी आती है। अपने साथ दिनभर की बातें और कल आने वाली चुनौतियों का संदेश लेकर। लेकिन रात भी मां की तरह है। कभी बिना कहानी सुनाये और खाना खिलाये छोड़ती नहीं। हर रात यही होता है। अब भी जबकि मैं भी यह सच जानता हूं कि न भूत होते हैं और न ही परियां। अब तो राजा भी नहीं होते। हां हाथी-घोड़े जरुर होते हैं, लेकिन उनमें अब वैसी दिलचस्पी नहीं रही। अक्सर दिन के उजाले में वे भी हम इंसानों के जैसे दिन के बीतने का इंतजार करते हैं ताकि रात आये। अपनी प्यारी रात। मां के जैसी प्यारी रात।

मोदी की बनियागिरी

- गौरव अरण्य

आज अखवारों में रिलाइंस जियो के फुल पेज प्रचार में पीएम मोदी की तस्वीर ने हंगामा खड़ा कर दिया। दूसरी तरफ आज केंद्रीय व्यापर संघ का आज भारत बंद था। इस तस्वीर ने पूरा ध्यान हड़ताल से हटा दिया। मुकेश अंबानी ने रिलाइंस जियो 4G सर्विस के उद्घाटन के मौके पर पीएम मोदी की तस्वीर लगाई हुई थी, उद्घाटन हो गया, लेकिन अखवार में पीएम की तस्वीर विरोधियो को नहीं पचि। जबकि मुकेश अंबानी ने जियो के लॉन्चिंग को पीएम के डिजिटल क्रांति के सपने से जोड़ अपना पक्ष साफ रखा है।

 

पीएम और जियो के इस संबंध को समझना है तो आपको भूतकाल में जाना होगा। दरसल यह पूंजीवाद का आधुनिक तस्वीर है, जिसे घोर पूंजीवाद कहते है। घोर पूंजीवाद को समझने के लिए आपको कैपिटलिस्म पर अंग्रेजी में लिखी महंगी किताब पढ़ने की जरुरत नहीं है। आप घोर पूंजीवाद को ठेठ भाषा में समझ सकते/सकती है।

 

वैसे महात्मा गांधी ने अंग्रेजो को भगा कर पूंजीवादियों को भगा दिया था लेकिन पूंजीवाद ने मनमोहन सिंह के आर्थिक क्रांति (जो नब्बे के दसक में हुआ ) के साथ रूप बदल कर अपन कदम देश में रखा। अब सरकारी कंपनियों को घाटे में दिखा निजी हाथों में देने का दौर शुरू हुआ। इसका शुभारंभ हमारे प्राधनमंत्री अटल विहारी बाजपई ने किया, एक नया विभाग खोल विनिवेश विभाग( disinvestment Department)। जिसका मुख्य कार्य घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों का निजीकरण करना था। तब से आज तक कई कंपनियों का निजीकरण कर दिया गया। दरसल पूंजीवादी सरकार निजी कंपनियों के साथ मिलकर यह खेल खेलती है कि पहले सरकारी कंपनियों को घाटे दिखा कर उनका बना बनाया इंफ्रास्ट्रक्चर के बल पर लाभ उठाया जा सके। इनमे अधिकतर कंपनियों का निजीकरण कौड़ी के भाव में कर दिया गया। जनता को समझा दिया जाता है कि सरकारी नौकरी वाले काम नहीं करते है, जिसके कारण कंपनियों को नुकसान होता है। अब यह खेल रेलवे और बीएसएनएल जैसी सरकारी कंपनियों के साथ खेला जा रहा है। जैसे यह कहा जाता है कि राजनितिक दबाब के कारण यात्री भाड़े नहीं बढ़ाने के कारण रेलवे को नुकसान होता है।

अब बीएसएनएल के मामले को समझिये, मोदी सरकार भारत में डिजिटल क्रांति लाना चाहते है, सौभाग्य से उनके पास बीएसएनएल है लेकिन नहीं उनको रिलाइंस के साथ मिलकर डिजिटल क्रांति लानी है। मोदी एक मजबूत शासक है। पीएम चाहते तो बीएसएनएल के जरिये डिजिटल क्रांति कर एक मिसाल कायम कर सकते थे। वह मनमोहन और बाजपई सराकर से अलग कर अपना ट्रेड मार्क छोड़ सकते थे। लेकिन पीएम भी वही निकले पूंजीवादियों की कठपुतली मात्र। रिलाइंस के जियो लांच होने के बाद एयरटेल, आईडिया जैसे टेलिकॉम कंपनियों को भाड़ी नुकसान उठाना पड़ा। अब सभी यह जानना चाहते है कि ये कंपनियां रिलाइंस जियो को जबाब क्या देंगे लेकिन इस लड़ाई में बीएसएनएल कही नज़र नहीं आ रहा है। सरकार यह नहीं बता रही है कि इस डेटा क्रांति में बीएसएनएल का क्या प्लान है? बात साफ़ है, घोर पूंजीवाद, मोदी जिसका एक चेहरा मात्र है। यह ध्यान देने वाली बात है की मोदी नब्बे के दसक में आर्थिक क्रांति लाने वाले के भविष्य ही है। जिसे आज हम अखवारों में देख रहे है। इसलिए चौके नहीं , स्वीकार करे , क्योंकि मोदी चले जायँगे, दूसरे प्राधनमंत्री आ जाएंगे लेकिन तस्वीर यही रहेगी जो आप देख रहे है।

28 अगस्त को जयंती पर विशेष : आज यदि राजेन्द्र यादव जीवित होते

दोस्तों, साहित्य समाज का हिस्सा है। सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से इस पर मनन करें तो यह स्थापित भी होता है। हालांकि अब फ़िजा बदलने लगी है। वंचितों का साहित्य अब असर दिखाने लगा है। खास बात यह है कि जिस व्यक्ति की साहसिक सामाजिक उद्यमिता के कारण यह संभव हो पाया है, वह आज मरणोपरांत भी उपेक्षा का शिकार है। जब वे जीवित थे तब अपनी उपेक्षा उन्हें कभी प्रभावित नहीं करती थी। हालत यह होती कि जब लोग उनकी आलोचना(सही मायने में गालियां) करते तब वे ठठाकर हंसते थे। प्रगतिशीलता के नाम पर सामंती ताकतों की दलाली करने वाले साहित्यकार उन्हें कभी जातिवादी साहित्यकार कहकर गलियाते तो कभी कोई उन्हें महज मसखरा कह अपने मन की भड़ास निकालता था। और वे थे जो सिगार के धुंए में आलोचनाओं को उड़ा दिया करते थे।

जी हां हम बात कर रहे हैं राजेन्द्र यादव जी की। वहीं राजेन्द्र यादव जिन्होंने दलितों के साहित्य और नारी साहित्य को माता-पिता दोनों का प्यार व संरक्षण दिया। ओबीसी साहित्य को लेकर उनके मन में कई सवाल थे। ये सवाल संभवतः इस वजह से भी रहे होंगे क्योंकि जिन दिनों वे तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य जो कि मूलरुप से सामंती ताकतों का साम्राज्य स्वरुप था, में वंचितों के लिए अधिकार सुनिश्चित कर रहे थे, उन दिनों ओबीसी वर्ग के साहित्यकार इस स्थिति में नहीं थे कि वे कोई पृथक रुप से चुनौती पेश कर पाते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उन्होंने ओबीसी साहित्य को अपना दुलार नहीं दिया। जैसे उन्होंने दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को साहित्य के केंद्रीय विषय के रुप में स्थापित किया, वैसे ही उन्होंने ओबीसी विमर्श को भी स्थापित करने का प्रयास किया।

असल में राजेन्द्र यादव जी सही मायने में सजग चिंतक थे। वे दूर दृष्टि रखते थे। वे मानते थे कि मुख्य धारा का साहित्य स्वयं ही अपनी मौत मरेगा और वंचित पूरी मजबूती के साथ अपनी बात रखेंगे।

आज उनका कहा सच हो रहा है। दलित, पिछड़ों और महिलाओं पर केंद्रित विमर्श साहित्य में अपनी पूरी भव्यता के साथ स्थान पा रहा है। असल में राजेन्द्र यादव वंचितों के साहित्य को सकारात्मक रुप से स्थापित करना चाहते थे। आजीवन उन्होंने यही किया। यह अलग बात है कि जब महिलायें उनके संरक्षण में बेबाकी से अपने विषयों पर बोलने लगीं तो तथाकथित रुप से मुख्य धारा के साहित्यकारों ने उन्हें रसिया से लेकर मसखरा तक की संज्ञा दी।

लेकिन इन सबसे बेखबर राजेन्द्र यादव की लेखनी न तो खामोश रही और न ही किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त। बदलते समाज के साथ साहित्य को भी समाजोन्मुख बनाने की कोशिश की। यही राजेन्द्र यादव जी की खासियत थी। वैसे यह बात भी सही है कि जो काम राजेन्द्र जी ने किया, उनके बदले किसी ब्राह्म्ण ने किया होता तो अबतक उसे भारत रत्न की उपाधि तो मिल ही जाती।

बहरहाल आज यदि राजेन्द्र यादव जीवित होते तो अपनी आंखों से देखते कि किस तरह वंचित समाज आज देश की राजनीति में अपना स्थान सुरक्षित कर रहा है। मुख्य धारा का साहित्य अपनी मौत मर रहा है और अपनी मौत टालने के लिए वह अपने विमर्श में वंचितों के विषयों को शामिल कर रहा है। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि उनके जाने के बाद देश के द्विज साहित्यकारों ने उनके योगदानों की हत्या करने का षडयंत्र रचना शुरु कर दिया है। यह महज संयोग भी नहीं है। इतिहास गवाह है जिन-जिन लोगों ने वंचितों के पक्ष में आवाज उठायी, उन्हें एक-एक कर भुलाने की जबरन कोशिश की गयी। जोतिबा फ़ुले से लेकर बाबा साहब आम्बेडकर और अब राजेन्द्र यादव तक।

ब्राह्म्णवाद का अंत सुनिश्चित करती एक किताब

- नवल किशोर कुमार

ब्राह्म्णवादी मिथकों की परेशानी यह है कि वे स्वयं एक-दूसरे का न केवल विरोध करते हैं बल्कि समाज में तर्क की परंपरा को ही पूरी तरह खत्म कर देते हैं। एक मिथक राम और रावण का भी है। ब्राह्म्णों के अनुसार एक स्वयं भगवान और दूसरा भगवान का सबसे बड़ा भक्त था। फ़िर भी दोनों के बीच लड़ाई हुई और लड़ाई का फ़लाफ़ल क्या हुआ, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह जानना कि असल में इस लड़ाई का मकसद क्या था?

 

अजय एस शेखर एसएस केरल के एसएस विश्वविद्यालय, कलदी में अंग्रेजी के सहायक प्रोफ़ेसर हैं। वे लिखते हैं : रामायण और महाभारत जैसे हिन्दू महाकाव्यों में श्रीलंका के अपमानजनक संदर्भ का संबंध उसके बौद्ध देश होने से है। श्रीलंका सम्राट अशोक के काल से ही बौद्ध धर्म का अनुयायी है। आश्चर्य नहीं कि रावण जो कि श्रीलंका का बौद्ध सम्राट था, उसने हिन्दू साम्राज्यवाद का विरोध किया था, तो उसे दानव या असुर के रुप में चित्रित किया गया। मौर्य सम्राट अशोक की संतानों महेंद्र और संघमित्रा ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में सिलोन का शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक ढंग से मतांतरित करवाया। सिलोन का बौद्ध वृतांत महावंश भी इस बात का जिक्र करता है कि स्वयं बुद्ध लंका गये थे। उन्होंने अपने 65000 उपदेशों में से कुछ वहां भी दिये थे। संभव है कि अशोक ने बुद्ध द्वारा प्रवचन दिये जाने वाले स्थानों पर धम्म के प्रतीक स्तूप एवं स्तंभ भी बनवाये हों, जिनके शीर्ष पर सिंह उत्कीर्ण हो। (थापर, 1998:68)।

 

श्री शेखर उन युवा विचारकों में शामिल हैं जिन्होंने अबतक थोपे गये ब्राह्म्णवादी विचारों को खुलकर चुनौती दी है। इन युवा विचारकों में प्रमोद रंजन, संजीव चंदन, कर्मानंद आर्य, अश्विनी कुमार पंकज, पूजा सिंह और संजय जोठे भी शामिल हैं। इनके अलावा युवा राजनेताओं यथा राज्यसभा सांसद डा मीसा भारती ने भी अपने विचारों को मजबूती के साथ रखा है कि देश का बहुसंख्यक समाज अब बदलाव को तैयार है। अब वह केवल सुविधानुसार गढे गये मिथकों में विश्वास नहीं करेगा।

फ़ारवर्ड प्रेस और द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक "महिषासुर : एक जननायक" (संपादक : प्रमोद रंजन) एक सार्थक प्रयास के रुप में सामने आया है। इसमें शामिल किये गये लेख व अन्य सामग्रियां सामाजिक चैतन्यता की शून्यता को समाप्त करने का प्रयास करती हैं।

 

मसलन पुस्तक के संपादक प्रमोद रंजन के इस विचार से सहमत हुआ जा सकता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सुव्यवस्थित इतिहास लेखन की परंपरा नहीं रही है। इसलिए महिषासुर के जीवनकाल अथवा शहादत का ठीक-ठीक काल निर्धारण बहुत कठिन है। दुर्गा की एक कथा मार्कण्डेय पुराण में है। इतिहासकारों ने इस पुराण का लेखन काल 250-500 ईसवी के बीच माना है। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महिषासुर का काल इससे पूर्व रहा होगा। लेकिन महिषासुर से संबंधित संस्कृति को समझने के लिए मार्कण्डेय पुराण मात्र एक सहायक ग्रंथ है, जिससे मिलने वाली जानकारियां प्रायः विकृत हैं। दूसरी ओर इस संबंध में बहुजन गाथाओं और लोक परंपराओं में अधिक विश्वसनीय जानकारियां उपलब्ध है। इनसे साफ़ तौर पर मालूम चलता है कि महिषासुर एक ऐतिहासिक चरित्र रहा होगा, मिथकीय नहीं।

 

अतएव इस परंपरा की बेहतर समझ के लिए ब्राह्म्णेत्तर परंपराओं, संस्कृतियों की पड़ताल की जानी चाहिए। प्रसिद्ध इतिहासकार डी डी कौशंबी ने महिषासुर को पशुपालकों का आराध्य बताया है, जिसकी हत्या ब्राह्म्ण धर्म में महिशासुर मर्दिनी करती है। प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता(राजकमल प्रकाशन)। दूसरी ओर देवी प्रसाद चटोपध्याय ने 1959 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ "लोकायत : अ स्टडी इन एनसिएंट इंडिया मेटरलिज्म" के उप अध्याय "दुर्गापूजा का मूल स्रोत" में सप्रमाण साबित करते हुए लिखा है कि दुर्गापूजा में ऐसी बात नहीं है जिससे स्पष्ट रुप से अध्यात्मिक या धार्मिक कहा जा सके। यह कृति संबंधी जादू-टोना मात्र है। विभिन्न स्रोतों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि एक देवी के रुप में दुर्गा वास्तव में मिथकीय चरित्र है। ब्राह्म्णों की कल्पना मात्र है। जबकि महिषासुर एक वास्तविक चरित्र है, जो एक प्रतापी समतावादी जननायक था।

 

असल में जब प्रमोद रंजन या इनके जैसे अन्य विचारक ऐसा कहते हैं तो इसके पीछे बड़ी वजह यही है कि देश के बहुसंख्यक समाज को मिथकों में उलझाकर रखा गया है। एक मान्यता के मुताबिक हिन्दू धर्म में 99 हजार से अधिक देवी-देवता हैं। वह वर्ग जो आजतक मुट्ठी भर द्विजों का आतंक झेल रहा है, वह अब बदलने लगा है। प्रमोद रंजन एवं अन्य विचारकों व लेखकों का यह साझा प्रयास इसी का परिचायक है।

 

कदापि यह संभव है कि इस नये विचार में कुछ खामियां हों लेकिन ये खामियां किसी साजिश के कारण नहीं बल्कि सम्पूर्ण, समग्र व खुले दिमाग के साथ ब्राह्म्णेत्तर इतिहास का नहीं लिखा जाना संभव है। "महिषासुर : एक जननायक" न केवल इस मांग को आगे बढाता है बल्कि वह एक चुनौती भी देता है। एक ऐसी चुनौती जिसका जवाब द्विज समाज के पास सिवाय "साजिश" के बिल्कुल भी नहीं है। देश के संसद में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी इस साजिश का प्रदर्शन कर चुकी हैं। उनकी इस साजिश को बेनकाब करने का सार्थक प्रयास करने वाली और ब्राह्म्णवाद के खात्मे की वैज्ञानिक उद्घोषणा करने वाली इस पुस्तक की कीमत केवल सौ रुपए है। इसे फ़ारवर्ड प्रेस के वेबसाइट से आनलाइन भी खरीदा जा सकता है।

 

 

 

शीतकालीन सत्र रहा राबड़ी देवी के नाम

दोस्तों, जंग और प्यार में सबकुछ जायज है। यह बात राजनीति में भी लागू होती है। इस बार के शीतकालीन सत्र में यही चरितार्थ हुआ। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने जमकर इस सिद्धांत का अनुपालन किया। लेकिन शह और मात के इस खेल में बाजी पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने मारी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनमें आज भी वहीं दमखम है जो उस समय हुआ करता था जब वे स्वयं मुख्यमंत्री थीं। हालांकि उनका एक बयान विवाद का कारण बना लेकिन उनका यही बयान विपक्ष के लिए सबसे घातक साबित हुआ।

दरअसल महागठबंधन में फूट पैदा करने की तमाम कोशिशों के बीच नोटबंदी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बयान ने विपक्ष को मौका दे दिया था। स्वयं नीतीश कुमार भी राजनीतिक उहापोह की स्थिति में रहे कि आखिर वे नोटबंदी के पक्ष में हैं तो फिर नोटबंदी के कारण होने वाली परेशानियों को लेकर क्या करें। उनकी असमंजसता उस समय और बढ़ गयी जब उनकी ही पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने भी नोटबंदी का विरोध कर दिया। लेकिन नीतीश कुमार ने खुलकर नोटबंदी का विरोध नहीं किया।

उनके इस रूख ने विपक्षी नेताओं और मीडिया को अफवाह फैलाने का पूरा अवसर दे दिया। मीडिया में प्रचारित किया गया कि श्री कुमार ने अमित शाह से मुलाकात कर ली है और अब वे राजद से अलग होकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार का गठन करेंगे। अभी यह अफवाह उड़ान भरने ही वाला था कि पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने श्री कुमार को भाजपा में आने का न्यौता दे डाला। सत्ता पक्ष खामोश हो गया।

सत्ता पक्ष के खेमे में इस खामोशी को तोड़ा राबड़ी देवी ने। विधान परिषद में सदन के अंदर लालू प्रसाद को दलाल कहे जाने से नाराज राबड़ी देवी ने पहले तो यह साफ-साफ कहा कि विपक्ष माफी मांगे और यदि विपक्ष माफी नहीं मांगेगा तो सदन को चलने नहीं दिया जाएगा। इसी मौके पर उन्होंने वह कह दिया जिसने विपक्ष की बोलती बंद कर दी। कह दिया - अपनी बहन से नीतीश कुमार की शादी करा दें सुशील मोदी।

जैसे ही इनका यह बयान मीडिया ने सार्वजनिक किया, हल्ला मच गया। विवाद बढ़ा तो राबड़ी देवी ने इसे मजाक बताकर हवा कर दिया लेकिन इसका असर विपक्ष पर बहुत घातक हो गया। उसने नीतीश कुमार को एनडीए में लाने और महागठबंधन में अफवाह फैलाना बंद कर दिया और उसके आक्रमण के निशाने पर राबड़ी देवी रहीं।

बहरहाल, राबड़ी देवी भी अड़ी रहीं। छह दिनों तक चले शीतकालीन सत्र का समापन राबड़ी देवी के नेतृत्व कुशलता के कारण महागठबंधन के सदस्यों की एकजुटता और विपक्ष की हंगामेदार खामोशी के बीच हो गया।

अपनी बात : यह कैसी लोकतांत्रिक मर्यादा?

दोस्तों, ‘तुम्हें पुत्र का शोक, मेरे सिर पर घाव’। यही सार है उस कहानी का जिसमें एक ब्राह्म्ण पुत्र ने मणि के लोभ में एक सांप के सिर पर डंडा चला दिया और जवाब में सांप ने उसे डंस लिया। बाद में जब बुढ़ा ब्राह्म्ण सांप के पास दुबारा गया तो उसने भी यही कहा कि तुम्हें पुत्र का शोक है और मेरे सिर पर घाव है। अब हमारी दोस्ती नहीं चलेगी। यह कहानी बहुत पुरानी है। संभव है कि यह काल्पनिक हो। लेकिन मौजूदा लोकतंत्र में भी इसे चरितार्थ करने की कोशिश की जा रही है जबकि सभी ये जानते हैं कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दुश्मन होता है और न ही दोस्त।

उल्लेखनीय है कि इस बार विधानमंडल का शीतकालीन सत्र नोटबंदी को लेकर हंगामेदार रहा है। शुक्रवार को सत्र का आखिरी दिन है। इससे पहले पांच दिनों तक विधानमंडल के दोनों सदनों में हंगामा ही हुआ है। विधायी कार्य के रूप में केवल वही कामकाज निबटाये गये हैं जिन्हें निबटाना सरकार के लिए जरूरी है। जबकि जनहित से जुड़े प्रश्नोत्तर काल और गंभीर विषय हंगामे की भेंट चढ़ गये।

इस पूरे हंगामे की जड़ में पक्ष और विपक्ष का विवाद है। दोनों एक-दूसरे पर असंसदीय शब्द उपयोग करने का आरोप लगा रहे हैं। पहले विपक्ष की बात करें तो उसका कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने सदन परिसर (सदन के अंदर नहीं) में पत्रकारों से बातचीत में पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया। वहीं सबसे दिलचस्प यह भी है कि महागठबंधन की ओर से विपक्ष पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि उसने सदन के अंदर राजद प्रमुख लालू प्रसाद, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के लिए असंसदीय शब्द का प्रयोग किया। इन दोनों मामलों को लेकर पक्ष और विपक्ष दोनों ने शीतकालीन सत्र को जाया हो जाने दिया है।

बहरहाल यह पहली बार नहीं हो रहा है कि सदन के अंदर असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इससे पहले भी कई अवसरों पर शब्दों को लेकर विवाद हुए हैं और कई मौकों पर माननीय सदस्यों ने माफी भी मांगी है। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष के द्वारा ऐसे शब्दों को कार्यवाही से निकालने का नियमन भी दिया गया है। यह सब इसलिए ताकि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चले। लेकिन इस बार शीतकालीन सत्र में सबकुछ विषम हो रहा है। सवाल यह उठता है कि शीतकालीन सत्र के व्यर्थ बीत जाने के लिए जिम्मेवार कौन है? क्या कोई यह जिम्मेवारी लेगा?

खास खबर : नोटबंदी के सहारे नीतीश से आगे निकलीं ममता

दोस्तों, मामला खुद को सबसे बड़ा नरेंद्र मोदी विरोधी साबित करने का है। दिलचस्प है कि नोटबंदी अब मुख्य हथियार बन गया है। इस पूरे राजनीतिक खेल का मूल आम लोगों को हित से कितना जुड़ा है या फिर नहीं जुड़ा है, यह तो आने वाला वक्त बतायेगा लेकिन फिलहाल नोटबंदी का विरोध कर देश में सबसे बड़ा नरेंद्र मोदी विरोधी साबित करने की होड़ लगी है। इस खेल अथवा राजनीतिक उपक्रम में देश के दो मुख्यमंत्री दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शामिल हैं। जबकि नीतीश कुमार के घोर विरोधी कहे जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बार नोटबंदी का समर्थन कर खुद को इस रेस से अलग कर लिया है।

सबसे दिलचस्प यह है कि ममता बनर्जी का सहयोग कर राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने एक तरफ यह साबित कर दिया है कि भले ही उनकी पार्टी के विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाग लेते हैं, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर होता वही है जो वे स्वयं चाहते हैं।  इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि लालू प्रसाद ने ममता बनर्जी को सपोर्ट देकर नीतीश कुमार को यह भी बता दिया है कि नरेंद्र मोदी के विरोधियों में ममता बनर्जी उनसे कहीं अधिक आगे हैं।

हालांकि इस पूरे खेल का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि राजद के दूसरी श्रेणी के नेताओं ने भले ही ममता बनर्जी के साथ मंच साझा कर और अच्छी खासी संख्या में कार्यकर्ताओं को जुटाकर नोटबंदी के सवाल पर अपना समर्थन सुश्री बनर्जी को दे दिया लेकिन इस कार्यक्रम में लालू प्रसाद या पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी या फिर उनके दोनों मंत्री पुत्र नजर नहीं आये। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि श्री प्रसाद नीतीश कुमार के साथ अपने रिश्ते यानी महागठबंधन को बनाये रखना चाहते हैं।

बहरहाल मामला नोटबंदी के विरोध का भी है। ममता बनर्जी ने नीतीश कुमार के गढ़ में घुसकर न केवल नरेंद्र मोदी को ललकारा बल्कि स्वयं नीतीश कुमार को भी संकेत दे दिया। उन्होंने कहा कि नोटबंदी गरीबों और वंचितों से जीने के अधिकार का हनन कर रहा है और इसका समर्थन करने वाले तानाशाही व्यवस्था के पोषक हैं। वैसे सबसे दिलचस्प यही है कि ममता बनर्जी ने एक के बाद एक कार्यक्रम कर वामपंथी दलों को भी आइना दिखा दिया है कि जनपक्षीय मुद्दों को लेकर लड़ने में वे उनसे किसी भी मायने में कम नहीं हैं।

राहे-बाटे : बदलते झारखंड से कड़वा साक्षात्कार

दोस्तों, बीते दो दिनों झारखंड की राजधानी रांची जाने का मौका मिला। परिस्थितिवश यह यात्रा यादगार बन गयी। यादगार इसलिये कि पटना से करीब साढे तीन सौ किलोमीटर की दूरी मोटरसाइकिल से तय करनी पड़ी। हालांकि यह बेहतर ही रहा। बेहतर इस मायने में कि बदलते झारखंड को समझने का पूरा अवसर मिला। बिहार में शराबबंदी के कारण झारखंड की सीमा से लगे इलाकों के लाइन होटल और ढाबे गुलजार हो गये हैं। हालांकि पूछने पर लोग बताते हैं कि शुरु-शुरु में ऐसा लगता था कि बड़ी संख्या में बिहार के लोग शराब पीने आते हैं, लेकिन अब सब सामान्य हो गया है।

जाने के क्रम में नालंदा तक बेहतरीन सड़क मिली। टौल रोड की व्यवस्था ने पटना से नालंदा तक की यात्रा को तो आसान बना दिया है लेकिन उसके आगे की सड़क चिंतनीय है। नालंदा से लेकर रजौली तक की सड़क बिहार सरकार की उपेक्षा का सजीव सबूत प्रतीत होती है। वहीं रजौली घाटी में घुसने के साथ ही पहाड़ों का सीना चीरकर बनायी गयी सड़क पर चलना रोमांचक है। खासकर मोटरसाइकिल के जरिए। आगे कोडरमा और झुमरी तिलैया के शानदार नजारे किसी को भी मंत्रमुग्ध करने में सक्षम हैं।

बरही से रांची तक की यात्रा सामान्य कही जा सकती है। सामान्य इसलिए कि मुख्य सड़क पर गैर आदिवासी ही मिलते हैं। अधिकांश व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर उनका ही कब्जा है। कुछेक ढाबों में आदिवासी मिलते भी हैं तो वेटर आदि के रुप में। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग साइकिल पर कोयला लादकर पैदल जाते मिले। ये लोग कुज्जु और रामगढ से आगे बढने पर अनायास मिल जाते हैं। दिलचस्प यह है कि करीब 70-80 किलोमीटर की दूरी तीन दिनों में पैदल तय कर ये गरीब रोजाना के हिसाब से 300-400 रुपए कमा लेते हैं। पूछने पर एक व्यक्ति ने बताया कि वह सिरका प्रखंड का रहने वाला है। झारखंड सरकार ने साइकिल से कोयला ढोने की छूट दे रखी है। जबकि किसी भी गाड़ी से कोयला ढोना बड़ा अपराध है। हालांकि कई लोगों ने यह भी शिकायत की कि पुलिस वाले उनसे नजराना वसूलते हैं।

बहरहाल रांची में घुमते हुए आपको यह लग सकता है कि आप एक ऐसे शहर में हैं जहां के मूल वाशिंदे हाशिये पर हैं और गैर झारखंडी मालिक की भूमिका में। यह दृश्य आपको गुलाम हिन्दुस्तान की याद दिला सकता है। सनद रहे कि झारखंड विधानसभा में रघुवर दास सरकार ने जबरन लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना करते हुए सीएनटी एक्ट में संशोधन किया है। इस संशोधन के कारण आदिवासियों की जमीन अब गैर आदिवासी आसानी से हड़प सकते हैं।

बहरहाल आदिवासी बहुल झारखंड में बदलाव जारी है। आदिवासी समाज के लोग भी अब बदल रहे हैं। अपनी संस्कृति और जंगलों को छोड़ वे शहरों की ओर भाग रहे हैं। इसका नकारात्मक पहलू यही है कि एक समुन्नत और प्रकृति आधारित संस्कृति दम तोड़ रही है और सकारात्मकता यह है कि आदिवासी समाज के लोगों ने भी अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीख लिया है। लेकिन उनकी यह लड़ाई आजादी के साढे सात दशक बाद भी शैशवावस्था में है। यह चिंतनीय और विचारणीय सवाल है।

सीधी बात : मद्यपान निषेध दिवस को पाखंड नहीं सार्थक बनाये सरकार

दोस्तों, आज के दिन को बिहार सरकार ने मद्यपान निषेध दिवस के रुप में घोषित कर रखा है। हालांकि यह रिवाज नया नहीं है। पहले भी जब सूबे में शराबबंदी लागू नहीं थी और सूर्य अस्त, बिहारवासी मस्त वाली कहावत चरितार्थ करते थे तब भी आज के दिन को सरकार खूब धुमधाम से मनाती थी। लेकिन अब तो इसका खासा महत्व भी है और सार्थक भी।

सूबे में पूर्ण शराबबंदी लागू है। हजारों लोग इस कानून को तोड़ने के मामले में गिरफ़्तार और लाखों लोग पुलिस को चढावा देकर अपनी जान बचा चुके हैं। लेकिन अभी भी पूरे बिहार में शराब का अस्तित्व कायम है। यहां तक कि राजधानी पटना के कई इलाकों में धड़ल्ले से देशी शराब तैयार किया जाता है और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से बेचा भी जाता है। अन्य सुदूर जिलों में स्थिति की कल्पना आसानी से की जा सकती है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि सरकार द्वारा लागू शराबबंदी कारगर नहीं है। वास्तविकता यह है कि अब कम से कम 90 फ़ीसदी इलाकों में शराब पर रोक लग चुकी है। राजधानी पटना सहित अन्य सभी शहरों में अंग्रेजी शराब आन डिमांड उपलब्ध है लेकिन इसे खरीदना हर किसी के वश की बात नहीं है। लिहाजा शराब तस्करी एक बड़ा उद्योग बन चुका है। इसमें स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी है, इससे इन्कार नही किया जा सकता है।

बहरहाल, शराबबंदी लागू कर बिहार ने मौलिक और अनिवार्य विकास की दिशा में सार्थक पहल किया है। सबसे सुखद है कि शराबबंदी को सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस दिशा में और दृढतापूर्वक कार्य करेगी और बिहार को पूर्णतः शराबमुक्त बनायेगी।

आंखोंदेखी : स्टूपिड पीएम की स्टूपिडिटी झेल रहे बेबस लोग

दोस्तों, पूरे देश में नोटबंदी को लेकर हाहाकार मचा है। भले ही हमारे पीएम नरेंद्र मोदी इस हाहाकार को राष्ट्रवाद की संज्ञा देकर आंसू बहा रहे हों, लेकिन असलियत यही है कि आम जनता उनकी इस स्टूपिडिटी की कीमत चुका रही है। मामला बुधवार की देर रात का है। अपने पिताजी के लिए दवायें खरीदने मैं पटना के अनीसाबाद इलाके के एक मेडिकल स्टोर पहुंचा। दुकान बंद होने वाली थी। किसी तरह दुकानदार ने दवायें निकाली। दवाओं के एवज में मुझे 385 रुपए का भुगतान करना था। मैंने 500 रुपए मूल्य का प्रतिबंधित लेकिन 30 दिसंबर तक मान्य नोट दिया। दुकानदार ने लेने से मना कर दिया। अनुरोध किया तो उसने दस मिनट की मोहलत दी।

आसपास नजर दौड़ाया तो एक साथ चार बैंकों के एटीएम नजर आये। लेकिन सब बेकार। किसी एटीएम में कैश नहीं था। परेशान हो मैं आगे बढा। महावीर कैंसर संस्थान के पास। भारतीय स्टेट बैंक के एटीएम के बाहर एक आदमी परेशान दिख रहा था। पूछा तो जानकारी मिली कि पूरे फ़ुलवारी और अनिसाबाद इलाके के किसी भी एटीएम में कैश नहीं है। उसने अपना नाम धनंजय पांडेय बताया। वह मोतिहारी का रहने वाला था। वह अपनी पत्नी का इलाज कराने पटना आया था और उसे रुपयों की सख्त आवश्यकता थी।

कोई विकल्प नहीं होने की स्थिति में हम दोनों लौट गये। घर पहुंचने से पहले मेरे मन में सैंकड़ों सवाल थे। एक सवाल मेरा खुद का था। यदि पिताजी की दवा अत्यंत ही अनिवार्य होती तो क्या होता। मेरे जैसे असंख्य लोगों को यह परेशानी होती होगी। लेकिन क्या इस देश के पीएम को यह बात समझ में आती होगी, जिसने अपनी मूर्खता का शिकार पूरे देश को बना डाला है।

एक साल में चौमुखी विकास का दावा, ट्रेन हादसे के एक दिन बाद बिना किसी समारोह के सरकारी रिपोर्ट कार्ड जारी, सरकार ने गिनायी अपनी उपलब्धियां, सात निश्चयों के प्रति जतायी प्रतिबद्धता

पटना(अपना बिहार, 22 नवंबर) - सूबे में सत्तासीन महागठबंधन सरकार ने अपने एक वर्ष के कार्यकाल में चौमुखी विकास का दावा किया है। रविवार को कानपुर में इंदौर-पटना एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद डेढ़ सौ से अधिक लोगों के मारे जाने के बाद राज्य सरकार ने सरकारी रिपोर्ट कार्ड को जारी करने के भव्य कार्यक्रम को स्थगित कर दिया था। सोमवार को राज्य सरकार के द्वारा बिना किसी समारोह के रिपोर्ट कार्ड को सार्वजनिक किया गया। बहरहाल रिपोर्ट के अनुसार राज्य में कानून का राज कायम हुआ है तथा शराबबंदी से सूबे में हालात सुधरे हैं. साथ ही राज्य का चौमुखी विकास हो रहा है।

महागठबंधन सरकार के रिपोर्ट कार्ड में सीएम नीतीश के सात निश्चय और शराबबंदी को प्राथमिकता दी गयी है। लगभग 150 पन्ने के रिपोर्ट कार्ड में विभागों के हिसाब से कार्य और उपलब्धियों को दिखाया गया है। रिपोर्ट कार्ड में सरकार के सात निश्चयों को प्रमुखता दी गयी है। इसके तहत आर्थिक हल - युवाओं को बल के अंतर्गत स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना, मुख्यमंत्री स्वयं सहायता भत्ता योजना और कुशल युवा कार्यक्रम 2 अक्टृबर 2016 से प्रारंभ किये जाने की चर्चा की गयी है। इसके अलावा बिहार स्टार्ट अप नीति 2016 के बारे में बताया गया है कि यह महत्वाकांक्षी योजना 7 सितंबर 2016 से लागू की गयी और इसके कारण सूबे में औद्योगिक विकास को गति मिलने की उम्मीद व्यक्त की गयी है।

रिपोर्ट कार्ड में कहा गया है कि सभी सरकारी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में मुफ्त वाईफाई योजना फरवरी 2017 तक शुरू करने का संकल्प लिया गया है। साथ ही राज्य में त्वरित औद्योगिक विकास के लिए बिहार औद्योगिक प्रोत्साहन नीति 1 सितंबर 2016 से लागू किया गया है। इसके अलावा सिंगल विंडो सिस्टम को अधिक प्रभावकारी बनाने की बात भी रिपोर्ट में कही गयी है।

रिपोर्ट कार्ड में महिला सशक्तिकरण को लेकर राज्य सरकार द्वारा किये गये प्रयास की चर्चा की गयी है। इसके तहत आरक्षित रोजगार महिलाओं का अधिकार की चर्चा की गयी है। इसके तहत राज्य के सभी सेवा संवर्गों की नियुक्ति में महिलाओं के लिए 35 फीसदी क्षैतिज आरक्षण 20 जनवरी 2016 से लागू किये जाने की बात कही गयी है। साथ ही हर घर बिजली, हर घर नल का जल, शौचालय निर्माण - घर का सम्मान और ग्रामीण आधारभूत संरचना को सुदृढ करने की योजना आदि का सविस्तार वर्णन किया गया है।

रिपोर्ट कार्ड में नजर आये लालू-राहुल, पूर्ववर्ती एनडीए सरकार की उपलब्धियों का भी बखान, तेजस्वी की युवा नीति को भी तरजीह

पटना(अपना बिहार, 22 नवंबर) - महागठबंधन सरकार के एक वर्ष पूरे होने पर जारी रिपोर्ट कार्ड की सबसे बड़ी खासियत यही है कि रिपोर्ट कार्ड में राजद प्रमुख लालू प्रसाद और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी की तस्वीर भी छापी गयी है। जबकि कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी की तस्वीर से परहेज किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह इस बात का संकेत भी है कि श्री गांधी ही कांग्रेस के अगले खेवनहार होंगे। वहीं रिपोर्ट की बात करें तो इसमें महागठबंधन में शामिल तीनों दलों के विचारों के अनुरूप तथ्यों का वर्णन किया गया है। हालांकि इसमें राजद का सामाजिक न्याय और कांग्रेस के समग्र व समावेशी विकास से अधिक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के न्याय के साथ विकास को अधिक तरजीह दी गयी है।

राजनीतिक जुगलबंदी को छोड़ भी दें तो पूरी रिपोर्ट में इस तथ्य को स्थापित करने की कोशिश की गयी है कि भाजपा से अलग होने बाद जदयू नीत राज्य सरकार विकास के पथ से भटकी नहीं है। इसे स्थापित करने के लिए सरकार ने विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के तहत किये गये खर्च से लेकर राज्य के जीडीपी ग्रोथ तक के आंकड़े प्रमाण के रूप में रखा है। मसलन सरकार का कहना है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में बिहार में कुल 76 हजार 37 करोड़ रुपए खर्च किये गये जबकि 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 2 लाख 28 हजार 452 करोड़ रुपए खर्च किये जायेंगे। वहीं जीडीपी गा्रोथ रेट को लेकर कहा गया है कि तमाम प्रतिकुलताओं के बावजूद देश के जीडीपी गा्रोथ रेट की तुलना में बिहार का ग्रोथ रेट बेहतर रहा है।

सबसे दिलचस्प यह है कि महागठबंधन सरकार के एक वर्ष की उपलब्धियां दिखाने क्रम में सरकार ने पूर्ववर्ती एनडीए (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार का ही) सरकार की उपलब्धियों का बखान भी किया है। मसलन कहा गया है कि बिहार ने पिछले 10 वर्षों में राजस्व संग्रहण करीब 3 हजार 500 करोड़ रुपए से बढ़कर 25 हजार 499 करोड़ रुपए हो गया है। साथ ही राज्य योजना मद की राशि को भी महागठबंधन सरकार की उपलब्धि के रूप में दिखाया गया है। बताते चलें कि वर्ष 2005 में जब नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सत्ता हासिल की थी तब राज्य का योजना आकार 22 हजार 500 करोड़ था जो अब बढ़कर 1 लाख 44 हजार 696 करोड़ रुपए हो गया है।

पूरे रिपोर्ट कार्ड में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और उनकी युवा नीति को भी प्रमुखता दी गयी है। मसलन रिपोर्ट के शुरू में ही युवाओं को लेकर राज्य सरकार द्वारा शुरू किये गये विभिन्न योजनाओं यथा आर्थिक हल - युवाओं को बल के अंतर्गत स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना, मुख्यमंत्री स्वयं सहायता भत्ता योजना और कुशल युवा कार्यक्रम 2 अक्टृबर 2016 से प्रारंभ किये जाने की चर्चा की गयी है। इसके अलावा बिहार स्टार्ट अप नीति 2016 के बारे में बताया गया है कि यह महत्वाकांक्षी योजना 7 सितंबर 2016 से लागू की गयी और इसके कारण सूबे में औद्योगिक विकास को गति मिलने की उम्मीद व्यक्त की गयी है।

बहरहाल रिपोर्ट कार्ड को लेकर विपक्ष ने पहले ही अपनी प्रतिक्रिया जगजाहिर कर दिया है। खासकर मुख्य विपक्षी एनडीए ने 19 नवंबर को ही अपनी रिपोर्ट कार्ड में सरकार को फेल करार दिया था। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि चारा घोटाले में दोषारोपी लालू प्रसाद को लेकर विपक्ष पहले भी हल्ला मचाता रहा है। कई मौकों पर विपक्षी नेताओं ने कहा है कि श्री प्रसाद परोक्ष रूप से सरकार संचालित कर रहे हैं। ऐसे में रिपोर्ट कार्ड में उनकी उपस्थिति निश्चित तौर पर एक बार फिर राजनीतिक गप्पेबाजी के लिए बड़ी वजह बनेगी।

भव्य ऐतिहासिक राजनीतिक धरोहर को नया विस्तार

दोस्तों, सूबे बिहार की राजनीति और शासन का सबसे बड़ा केंद्र बिहार विधान मंडल जहां एक ओर भव्य ऐतिहासिक राजनीतिक धरोहर का सजीव प्रमाण है वहीं अंग्रेजों द्वारा बनाया गया शानदार भवन उत्कृष्ट स्थापत्य कला को भी प्रदर्शित करता है। इसके इतिहास की बात करें तो 22 मार्च 1912 को बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग हुआ। इसके साथ ही बिहार और उड़ीसा संयुक्त रूप से राज्य बने। शासन और प्रशासन के लिए पटना मुख्य केंद्र बना। इस क्रम में पटना हाईकोर्ट एवं अन्य सरकारी कार्यों के लिए सचिवालय की स्थापना भी की गयी। यह सब वर्ष 1913 में हुआ।

लेकिन इसके साथ ही विधायी कार्यों का निष्पादन भी पटना से किया जाने लगा। सर चार्ल्स स्टुअर्ट  बेली पहले उपराज्यपाल बने। विधायी परिषद में पहली बार 40 सदस्य थे। इसमें 24 निर्वाचित और 19 उपराज्यपाल द्वारा मनोनीत थे। वर्ष 1919 में भारत सरकार शासन अधिनियम के द्वारा भारत में नये शासन पद्धति की शुरूआत हुई और संघीय विधान सभा और राज्य परिषद का गठन हुआ। आजादी के बाद बाद में यही लोकसभा और राज्यसभा बना। प्रांतों में भी इसी तरीके से प्रांतीय विधायी परिषद का गठन किया गया और इसके लिए एक स्वतंत्र भवन की बात उठी। पहले भारतीय के रूप में लार्ड सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा गर्वनर नियुक्त किये गये। तब यह बिहार एवं उड़ीसा प्रांतीय विधायी परिषद बना। तब निर्वाचित सदस्यों की संख्या 76 और मनोनीत सदस्यों की संख्या 27 यानी कुल सदस्यों की संख्या 103 थी। संख्या बढ़ने के कारण बड़े भवन एवं पृथक सचिवालय की आवश्यकता महसूस हुई। फलस्वरूप वर्ष 1920 में नये भवन का निर्माण कराया गया। 7 फरवरी 1921 को पहली बार सर वाल्टर मोर की अध्यक्षता में पहली बैठक हुई। राज्यपाल लार्ड सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा ने भी संबोधित किया था।

बिहार विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी के मुताबिक वर्ष 1920-21 में जब विधानमंडल का भवन बनाया गया था तब सदस्यों की संख्या केवल 103 थी। लेकिन बाद में विधानसभा के सदस्यों की संख्या 324 हो गयी। इस कारण जगह की समस्या लगातार बनी रही। इसके अलावा पुराने भवन में विशेष आयोजनों के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं होने के कारण परेशानी होती थी। इन सभी आवश्यकताओं को देखते हुए राज्य सरकार ने विधानमंडल के नये भवन का निर्माण कराने का निर्णय लिया। नये भवन में केंद्रीय संसद के तर्ज पर सेंट्रल हॉल बनाया गया है। इसके अलावा पुस्तकालय को भी विस्तार दिया गया है।

बहरहाल विधानमंडल और सचिवालय के विस्तार से राज्य के शासनिक और प्रशासनिक केंद्र को नया विस्तार मिला है। नये विस्तार के क्रम में यह कोशिश की गयी है कि विधायिक और कार्यपालिका दोनों एक-दूसरे से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ जायेंगे। वैसे राज्य सरकार का यह नया प्रयोग कितना कारगर होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। फिलहाल भव्य ऐतिहासिक राजनीतिक धरोहर को मिले नये विस्तार पर गर्व करना तो बनता ही है।

लोग पूछ रहे नोटबंदी के फायदे, नमक, तेल और आटा की कीमतों को लेकर उठा रहे सवाल

पटना(अपना बिहार, 19 नवंबर 2016) - देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र जनता को पूछने का अधिकार देता है। केंद्र सरकार द्वारा बीते 8 नवंबर को लागू किये गये नोटबंदी के कारण जहां एक ओर आम जनता नकदी के लिए कतारों में लगी है वहीं उसे इस बात का विश्वास भी है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से देश का भला होगा। हालांकि देश का भला कैसे होगा, इस सवाल को लेकर जनता स्वयं मौन है।

मसौढ़ी और जहानाबाद के बीच मुख्य सड़क पर राहुल लाई भंडार के संचालक का कहना है कि नोटबंदी के कारण उसकी बिक्री में करीब 40-45 फीसदी की कमी आयी है। लेकिन उन्होंने सरकार के फैसले के साथ सहमति भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सरकार के फैसले से देश में कालेधन पर रोक लगेगा। इससे देश को लाभ मिलेगा। यह पूछने पर कि काले धन से आम जनता को क्या लाभ होगा, उन्होंने कहा कि आम जनता को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। इससे न तो महंगाई पर कोई रोक लगेगी और न ही अकूत धन संग्रह करने वालों पर कोई विराम।

वही जहानाबाद में स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले बिन्देश्वरी सिंह पूछने पर जवाब के बदले सवालिया अंदाज में कहते हैं कि आप ही बताइये कि केंद्र सरकार के फैसले से आटा की कीमत आधी हो जाएगी। या फिर सरसों तेल एवं अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमत में कोई कमी आएगी। श्री सिंह ने कहा कि इस देश में पूंजीपतियों का राज है और केंद्र सरकार के इस कदम का लाभ भी पूंजीपतियों को मिलेगा। आम जनता को तो कतार में लगे रहने की आदत सी पड़ गयी है।

आम जनता में केंद्र सरकार के इस फैसले को लेकर एक प्रतिक्रिया यह भी है कि उन्हें केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार पर पूरा विश्वास है। मसौढी के ही भाजपा कार्यकर्ता सुबोध शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार के इस कदम से देश में काले धन पर रोक तो लगेगी ही, साथ ही अमीरी और गरीबी के बीच खाई भी पटेगी। हालांकि उनके कहे का विरोध करते हुए धनरूआ निवासी युगेश्वर सिंह ने कहा कि आप भाजपा के कार्यकर्ता हैं, इसलिए ऐसी बातें कर रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि यदि केंद्र सरकार धन पशुओं पर रोक लगाना चाहती है तो उसने दो हजार रुपए के नोट क्यों जारी किये।

बहरहाल नोटबंदी के कारण पूरे देश के बैंकों में कतारें हैं। हालांकि शहरों में बैंकिंग सुविधायें अधिक होने के कारण भीड़ में कमी आयी है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में स्थिति पूर्ववत ही है। वहीं आम जनता सरकार के इस फैसले से इस कारण भी नाराज है क्योंकि उन्हें धान की कटनी छोड़ बैंकों और डाकघरों में कतार में खड़ा होना पड़ रहा है।

काला धन : दक्षिणपंथी पार्टियों की राह पर वामपंथी पार्टियां

पटना(अपना बिहार, 17 नवंबर 2016) - देश और प्रदेश के सियासती गलियारे में काला धन का होना मौजूदा राजनीति के लिए कोई मायने नहीं रखता है। लेकिन अब चुंकि केंद्र सरकार द्वारा देश में काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का दावा किया जा रहा है लिहाजा राजनीतिक दलों के पास काले धन को लेकर भी चर्चायें शुरू हो गयी हैँ। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि दक्षिणपंथी पार्टियों के तर्ज पर अब वामपंथी पार्टियां भी चलने लगी हैं। चलने का मतलब यह है कि मौजूदा राजनीतिक दौर में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए इन पार्टियों ने भी अपने अर्थशास्त्र को मजबूत बनाये रखने के लिए लगभग वहीं प्रयोग किये हैं जो दक्षिणपंथी पार्टियां करती आयी हैं।

मसलद एडीआर के द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2014-15 में देश की सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी सीपीएम की कुल संपत्ति 41,151.32 लाख रुपए थी। इसमें नकद के रूप में 287.41 लाख रुपए और बैंक बैलेंस 26,932.90 लाख रुपए शामिल थे। इसके अलावा वर्ष 2014-15 में सीपीएम की कुल आय 12,392.96 लाख रुपए थी। इसमें सदस्यता शुल्क को छोड़ अन्य श्रोतों से आय 1985.96 लाख रुपए रही। रही बात खर्च की तो सीपीएम का कहना है कि उसने 2324.62 लाख रुपए कर्मियों के वेतन के मद में खर्च किये। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि दक्षिणपंथी पार्टियां करती हैं। वहीं सीपीएम ने सबसे अधिक प्रशासनिक खर्च 4316.37 लाख रुपए वर्ष 2014-15 में किये। जबकि चुनाव खर्च 2078.65 लाख रुपए रहा।

अब देश में दूसरे नंबर की वामपंथी पार्टी सीपीआई की कुल सपंत्ति वर्ष 2014-15 में 929.62 लाख रुपए रही। इसके पास नकद  के रूप में 1.67 लाख रुपए और बैंक बैलेंस 53.81 लाख रुपए था। सबसे दिलचस्प यह है कि दूसरे नंबर की वामपंथी पार्टी के पास भी 539.62 लाख रुपए का फिक्स डिपोजिट था।  जबकि वर्ष 2014-15 में कुल आय 215.56 लाख रुपए थी। इसमें पार्टी फंड, सदस्यता और चुनावी फंड से प्राप्त आय 72.14 लाख रुपए, सांसदों से लेवी 0.35 लाख रुपए, पार्टी सदस्यों से 43.79 लाख रुपए शामिल थे। इससे भी दिलचस्प यह है कि सीपीआई ने इस वर्ष के दौरान ब्याज से 65.75 लाख रुपए कमाये। रही बात खर्च की सबसे सीपीआई ने सबसे अधिक 88.15 लाख रुपए और चिकित्सकीय खर्च 0.31 खर्च शामिल है। वहीं पार्टी कांग्रेस पर 11.73 लाख रुपए खर्च किये गये।

अब भी समर्थकों से धान लेती है माले

पटना(अपना बिहार, 17 नवंबर 2016) - भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल की मानें तो उनकी पार्टी का जनाधार बिहार में अन्य वामपंथी दलों में सबसे अधिक है लेकिन राष्ट्रीय स्तर उनकी पार्टी बहुत छोटी है। वे बताते हैं कि आज भी उनके समर्थक किसान अपनी फसल का एक हिस्सा सहयोग के रूप में पार्टी को देते हैं। किसानों से प्राप्त फसल को बेचकर जो आय प्राप्त होती है, उसे पार्टी कोष में डाल दिया जाता है।

माले सचिव के अनुसार उनकी पार्टी को होने वाली आय के तीन मुख्य श्रोत हैं। इनमें सदस्यता शुल्क और सदस्यता नवीनीकरण से प्राप्त आय। नवीनीकरण के रूप में प्रत्येक सदस्य को प्रति वर्ष 5 रुपए और सदस्यता शुल्क के रूप में प्रति वर्ष साठ रुपए का सहयोग लिया जाता है। इसके अलावा लेवी के जरिए पार्टी को आर्थिक सहायता प्राप्त होती है। मध्य आय वर्गीय समर्थकों से कम से कम दस रुपए का सहयोग लिया जाता है जबकि सरकारी नौकरी करने वाले समर्थकों से उनके कुल वेतन का एक प्रतिशत लिया जाता है। कुणाल बताते हैं कि उनकी पार्टी के विधायक और सांसद सभी अपना पूरा वेतन पार्टी को देते हैं। उनके परिवार और उनकी आवश्यकताओं के मुताबिक पार्टी उन्हें सहायता देती है।

माले सचिव ने बताया कि उनकी पार्टी की आय का तीसरा श्रोत किसान हैं। इनमें भूमिहीन खेतिहर मजदूर भी शामिल हैं। लेवी के रूप में उनसे रुपए न लेकर प्रति कट्ठा पांच किलो धान लिया जाता है।  उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में सीवान और छपरा में लेवी के रूप में धान की वसूली सबसे अधिक होती है। उन्होंने बताया कि उनके कार्यकर्ता लेवी वसूलने के लिए गांवों में जाते हैं और वसूलने के बाद उन्हें बेचकर प्राप्त राशि को पार्टी कोष में जमा कर देते हैं। इसके अलावा उनकी पार्टी विभिन्न आयोजनों के नाम पर भी लोगों से सहयोग राशि लेती है। माले सचिव ने बताया कि तीनों प्रकार के श्रोतों से प्राप्त आय को तीन भागों में विभाजित किया जाता है। इसमें बीस फीसदी राशि सेंट्रल कमिटी, तीस फीसदी राज्य कमेटी और पचास फीसदी राशि जिला कमेटी को दी जाती है।

उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर एक एकाउंट और एक ही पैन नंबर है। सभी राशियों का लेन-देन इसी बैंक अकाउंट के द्वारा किया जाता है और चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित नियमों के मुताबिक प्रतिवर्ष पार्टी की आय-व्यय का विवरण दिया जाता है।

राजनीतिक आंदोलनों में जन सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण : रजी अहमद

पटना(अपना बिहार, 17 नवंबर 2016) - राजनीतिक आंदोलनों में जन सहभागिता सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। विश्व में इसका सबसे अधिक सफल प्रयोग महात्मा गांधी ने किया था जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में वहां के निवासियों (जिनमें भारतीय और गैर भारतीय भी शामिल थे) के सहयोग फीनिक्स में आश्रम बनवाया था। इसके बाद जब वे हिन्दुस्तान वापस आये तब भी उन्होंने अपना आंदोलन जन सहयोग से ही चलाया। गांधी संग्रहालय, पटना के निदेशक डा. रजी अहमद के मुताबिक महात्मा गांधी हिसाब के बड़े पक्के थे। देश की आजादी के वर्ष सांप्रदायिक दंगों में झुलस रहे पटना को बचाने के लिए वे आये थे। इस दौरान पटना के लॉन (आज का गांधी मैदान) में प्रार्थना सभा हुई और जनता से चंदा लिया गया। रोज रात को जमा हुए चंदा और रोजाना खर्च के बारे में प्रेस प्रतिनिधियों को बताया जाता था। एक दिन हिसाब में दो आने की गड़बड़ी  हो गयी। परिणाम यह हुआ कि महात्मा गांधी अपने सहयोगियों के साथ पूरी रात हिसाब मिलाने में लगे रहे। डा. अहमद ने बताया कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके समर्थकों ने गांधी स्मारक निधि की स्थापना की और कूपन निकाले गये। एक वर्ष के अंदर ही उन दिनों करीब 15 करोड़ रुपए की राशि एकत्रित हुई थी।

खास खबर : राजनीतिक दलों का काला धन बना बड़ा सवाल, करोड़पति हैं सूबे के राजनीतिक दल

दोस्तों, काले धन को लेकर पूरे देश में चर्चाओं का दौर चल रहा है। इसमें राजनीतिक दलों की आय और व्यय को भी लेकर तमाम तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि अधिकांश राजनीतिक दलों को प्राप्त का अधिकांश हिस्सा बेनामी दानदाताओं के जरिए आता है और यही वजह है कि देश में राजनीतिक दलों के आय और व्यय को सूचना का अधिकार कानून के तहत लाये जाने की मांग पूरे देश में की जा रही है।

बिहार की बात करें तो सूबे के राजनीतिक दल भी करोड़पति हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक सूबे में सत्तासीन जदयू सबसे अधिक आय वाली पार्टी है। वर्ष 2014-15 में जदयू की कुल संपत्ति 1798.42 लाख रुपए थी। इस वर्ष जदयू को 921 लाख रुपए की आय प्राप्त हुई। इसमें सदस्यता शुल्क 5.63 लाख रुपए, दान व सहयोग से 87.46 लाख रुपए और अन्य सहयोग से प्राप्त आय 378.70 लाख रुपए थी। सबसे दिलचस्प यह है कि इस वर्ष खर्च की तुलना में अतिरिक्त आय 162.37 लाख रुपए रही।

वहीं केंद्र में सत्ता में साझेदार रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा भी करीब ढाई करोड़ रुपए की पार्टी है। एडीआर के अनुसार वर्ष 2014-15 में लोजपा की कुल संपत्ति 259.46 लाख रुपए थी और वार्षिक आय 169.24 लाख रुपए। इस आय के बारे में लोजपा का हिसाब है कि उसने कूपन बेचकर 67 लाख कमाये और सदस्यता शुल्क के रूप में उसे 2.10 लाख रुपए मिले। इसके अतिरिक्त दान से उसे 100.13 लाख रुपए प्राप्त हुए। लोजपा की रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष उसने चुनाव के दौरान हेलीकॉप्टर के भाड़े के रूप में कुल 18.50 लाख रुपए खर्च किये। इतना ही नहीं लोजपा का यह भी कहना है कि उसने अपने उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए 39 लाख रुपए दिये थे। जबकि सूबे में सत्तासीन राजद की बात करें तो वर्ष 2014-15 में इसकी कुल आय 104.97 लाख रुपए रही। इसमें उसे सदस्यता से 44.66 लाख रुपए, दान से 19.16 लाख रुपए और अन्य श्रोतों से प्राप्त आय 35.80 लाख रुपए शामिल है।

अब यदि राष्ट्रीय पार्टियों की बात करें तो भाजपा के पास सबसे अधिक संपत्ति है और वर्ष 2014-15 में उसे सबसे अधिक 97,043.03 लाख रुपए का इनकम हुआ। इसमें व्यक्तिगत सहयोग से 87,202.78 लाख रुपए, सदस्यता शुल्क 460.47 लाख रुपए, आजीवन सदस्यता शुल्क 6700.05 लाख रुपए शामिल है। जबकि खर्च के रूप में स्थापना मद में 1,197.43 लाख रुपए खर्च, परिवहन मद में 988.47 लाख रुपए, विज्ञापन में 47,189.70 लाख रुपए और इंटरटेनमेंट में 210.32 लाख रुपए का खर्च शामिल है।

वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आय के मामले में दूसरे स्थान पर ही। एडीआर के मुताबिक वर्ष 2014-15 में उसे 76,502.57 लाख रुपए प्राप्त हुए। इसमें सदस्यता से 662.58 लाख रुपए, दान से 20,740.73 लाख रुपए, पूर्व के वर्ष का योग 17,171.09 लाख रुपए और अन्य आय 5613.08 लाख रुपए शामिल है। खर्च के रूप में कांग्रेस ने सबसे अधिक खर्च चुनाव पर 58,217.28 लाख रुपए किये।

बहरहाल राजनीतिक दलों की आय और व्यय को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने भी इसकी मांग की है कि चुनाव आयोग सभी दलों के लिए यह नियम बनाये कि वह अपने सभी प्राप्त आय और व्यय का हिसाब जनता को सार्वजनिक करे। लेकिन यह पहली बार नहीं है। पहले भी कई राजनीतिक दलों ने यह सवाल उठाया था। ऐसे में सवाल उठता है कि आम आदमी के काला धन को सामने लाने का केंद्र सरकार का प्रयास राजनीतिक दलों के काला धन को सामने लाने के लिए कब और कौन सा कानून बनायेगी। इन सबके बीच सोशल मीडिया के मुताबिक देश में 500 रुपए और 1000 रुपए के नोटों पर प्रतिबंध लगाये जाने के एक दिन पहले ही भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई द्वारा करोड़ों की रकम बैंक खाते में जमा करायी गयी। हालांकि इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

संपादकीय : देश को भरमाना बंद करें मोदी, विजय माल्या, अंबानी और अडाणी से वसूल कर दिखायें देश का सफ़ेद पैसा

दोस्तों, विश्व भर के तानाशाह लगभग एक जैसा व्यवहार करते हैं। जनता को राष्ट्रवाद के नाम पर इमोशनली ब्लैकमेल करना सबसे आसान फ़ंडा रहा है। भारत में राष्ट्रवाद के साथ धर्म का तड़का लगा नरेंद्र मोदी एक ऐसे तानाशाह के रुप में उभर रहे हैं, जिनके निशाने पर न केवल अल्पसंख्यक हैं, बल्कि देश के तमाम गरीब और वंचित हैं।

देश में 500 और 1000 रुपए के बड़े नोट प्रतिबंधित करने के बाद चारों ओर अराजकता का माहौल है। लोग अपना काम धंधा छोड़ कतारों में लगे हैं। यानी देश की बड़ी आबादी की प्रोडक्टिविटी जीरो हो गयी है। सबसे अधिक परेशानी भूमिहीन खेतिहर मजदूर और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है। परेशानी की बड़ी वजह यह कि वे प्रतिदिन कुआं खोदकर पानी पीने की कहावत को चरितार्थ करते हैं। यानी दिन में काम करने के बाद मिली मजदूरी से ही वे अपना परिवार चलाते हैं। वहीं बाजार में जीवनोपयोगी वस्तुओं की कीमतें बढती जा रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल गोवा में एक संबोधन के दौरान देशवासियों के सामने विधवा विलाप वाली कहावत चरितार्थ करते हुए पचास दिनों का समय मांगा है। इससे पहले केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2-3 सप्ताह का समय मांगा था। उन्होंने कहा था कि 2-3 सप्ताह में स्थिति सामान्य हो जायेगी। अब मोदी 50 दिनों की मोहलत मांग रहे हैं और कह रहे हैं कि इन 50 दिनों में सपनों का भारत साकार हो जायेगा।

अब यदि सपनों का भारत की बात करें तो नरेंद्र मोदी को बताना चाहिए कि वे किसके सपनों का भारत बनाना चाहते हैं। क्या वे गरीब भूमिहीनों के लिए देश में व्यापक भूमि सुधार लागू कर उन्हें उत्पादन के संसाधन में हिस्सेदार बनायेंगे? क्या बड़े कारोबारियों की अवैध संपत्ति का राष्ट्रीयकरण कर उसमें गरीबों को साझेदार बनायेंगे? इन मोटी बातों को छोड़िये। क्या नरेंद्र मोदी देश में आटा, चावल, सब्जी, सरसों तेल की बढी कीमतों पर अंकुश लगायेंगे। क्या देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू करायेंगे।

बहरहाल नोटों पर पाबंदी के बाद एक बात तो साफ़ हो गयी है कि यह मोदीनामिक्स बड़े बैंकों को बड़े बकायेदारों के द्वारा कर्ज नहीं लौटाये जाने के कारण उत्पन्न कंगाली को दूर करने की कोशिश है, जिसकी भरपाई वे आम जनता का दोहन कर रहे हैं। असल में वे अर्थशास्त्र के सहज सिद्धांत भी नहीं समझना चाहते हैं कि इस देश में काला धन नकदी से अधिक जमीन, सोना, हीरे-जेवाहरात आदि के रुप में है। आम आदमी के पास जो थोड़े बहुत पैसे हैं, वे उनकी कमाई के हैं। काला धन नहीं। सबसे अधिक आश्चर्यजनक तो यह है कि देश का करीब 8500 करोड़ रुपया लेकर विजय माल्या विदेश भाग गया और देश की नरेंद्र मोदी सरकार एक आना भी नहीं वसूल सकी है। इससे भी अधिक दिलचस्प यह है कि विजय माल्या देश का व्हाईट मनी लेकर भागा है।

अपनी बात : राजनीति छोड़, आम जनता के बारे में सोचें सरकार

दोस्तों, गांव से लेकर शहर और शहर से लेकर पूरे देश में एक ही दृश्य कॉमन है। सुबह होते ही लोग बिना खाये-पिये बैंकों के आगे कतारों में खड़े हो जाते हैं। सब एक-एक कर अपनी बारी का इंतजार करते हैं ताकि उनके हाथ में भी पैसे हों, जिससे वे अपना परिवार चला सकें। दुधमुंहों के लिए दूध खरीद सकें। खाना बनाने के लिए नून-तेल और साग सब्जी भी। ऐसा नहीं है कि उनके पास पैसे नहीं हैं। वास्तविकता तो यह है कि उनके पास पैसे हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा 500 रुपए और 1000 रुपए के नोटों पर प्रतिबंध के बाद उनके पास कहने को मान्य रूपए नहीं हैं।

इसे संयोग कहिए कि बिहार में अभी तक ऐसी कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आयी है कि किसी ने कतार में लगे-लगे दम तोड़ दिया हो या फिर किसी अस्पताल प्रबंधन ने पैसे के अभाव में किसी का इलाज करने से मना कर दिया हो और मरीज की मौत हो गयी हो। जैसा कि मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में घटित हो चुका है। लेकिन स्थिति अत्यंत ही विस्फोटक है। खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां पहले ही बैंकों की पहुंच नहीं थी, उन इलाकों में लोग कैसे जी रहे हैं या जी नहीं भी रहे हैं, इसकी चिंता न तो केंद्र सरकार को है और न ही राज्य सरकार को।

सभी अपनी जवाबदेही से बचते फिर रहे हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली बार-बार सफाई दे रहे हैं कि बैंकों द्वारा बिना किसी ब्रेक के काम किया जा रहा है और दो सप्ताह के बाद स्थिति सामान्य हो जाएगी। वहीं बिहार में राज्य सरकार को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि उसके अपने नागरिकों की हालत क्या है। संभवत: राज्य सरकार यह सोच रही है कि  नोटों के बदलने का फैसला केंद्र सरकार का है और इस कारण जो भी परेशानियां आ रही हैं, उसे वही भुगते। लेकिन यह अधूरी सच्चाई है।

असल में समस्या बढ़ती जा रही है। जहां एक ओर लोगों के पास नकदी का अभाव होता जा रहा है तो दूसरी ओर दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में आग लगी है। लोगों के लिए कोढ़ मे ंखाज वाली कहावत चरितार्थ करते हुए दो हजार रुपए का नया नोट है। खुले बाजार में लोग इसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। वजह बाजार में मुद्रा का संकट है।

रही बात केंद्र सरकार के नोट बदलने के फैसले का तो यह अच्छा होगा या बुरा या फिर इसके जरिए देश में काला धन कितना आएगा या कितने काले बाजारी पकड़े जायेंगे, यह आने वाला समय बतायेगा। फिलहाल तो केंद्र सरकार के फरमान के कारण उन लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है जिनके पास न तो काला धन है। जो है वह खून-पसीने की कमाई है। इस कमाई के बावजूद यदि वे और उनका परिवार भूखा रहता है तो इसकी जिम्मेवारी तो लेनी होगी।

केंद्र के फैसले से देश में आर्थिक आपातकाल : भट्टाचार्य

पटना (अपना बिहार, 12 नवंबर 2016) - केंद्र सरकार द्वारा 500 और 1000 रुपए के नोट प्रतिबंधित किये जाने से देश में आर्थिक आपातकाल की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। अपने बयान में माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि 9 नवम्बर वह दिन था जब मोदी सरकार के आदेश पर एनडीटीवी इण्डिया चैनल को एक दिन के लिए बंद किया जाना था ताकि मीडिया को राष्ट्रीय सुरक्षा और जिम्मेदार पत्रकारिता का पाठ पढ़ाया जा सके। लेकिन इस अघोषित आपातकाल को पूरे देश में विरोध का सामना करना पड़ा, फलस्वरूप सरकार पीछे हटने पर मजबूर हुई और यह प्रतिबंध लागू होने से रुक गया। जनता इसके बाद राहत की सांसें ले पाती, कि नरेन्द्र मोदी ने अचानक एक घोषणा कर दी वह भी आर्थिक आपातकाल से कम नहीं है। 8 नवम्बर की मध्य रात्रि से 500 और 1000 के नोट गैरकानूनी घोषित कर दिये गये। एक ही झटके में सरकार ने 14 लाख करोड़ रुपये यानि प्रचलन में मौजूद कुल भारतीय मुद्रा के 86 प्रतिशत को रद्दी कागज में बदल दिया।

श्री भट्टाचार्य ने कहा कि श्री मोदी और उनके मंत्री एवं उनके पक्ष में जनमत बनाने वाले तुरंत हरकत में आ गये और इस कदम को काले धन के विरुद्ध एक निर्णायक एवं अभूतपूर्व युद्ध, एक और सर्जिकल स्ट्राइक, की संज्ञा दे डाली। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब भारत में मुद्रा का विमुद्रीकरण हुआ हो। उन्होंने कहा कि आजादी की पूर्व संध्या पर 1946 में 1000 और 10000 के नोट रद्द किये गये थे, जो कि 1954 में 1000, 5000 और 10000 के मूल्यों में पुन: जारी किये गये। बड़े मूल्य वाले इन नोटों को मोरारजी देसाई की सरकार द्वारा जनवरी 1978 में एक बार फिर रद्द कर दिया गया था। हाल ही में जनवरी 2014 में किये गये आंशिक विमुद्रीकरण को भी हमने देखा जब वर्ष 2005 से पहले छपे 500 और 1000 के सभी नोटों को प्रचलन से वापस लिया गया था। इसलिए अब यह बताने की कोई जरूरत नहीं रह जाती कि विमुद्रीकरण से काले धन पर कभी भी बंदिश नहीं लग पायी है। इस बार का विमुद्रीकरण इसलिए विलक्षण है कि इसकी निहायत ही नाटकीय अन्दाज में स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा उद्घोषणा की गई और बिना किसी पूर्व सूचना के तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया। ठीक वैसे ही जैसे कि 1975 के आपातकाल ने भी आधी रात में अचानक दस्तक दे दी थी।

श्री भट्टाचार्य ने कहा कि इस नाटकीय विमुद्रीकरण को काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताना नितांत ही भ्रामक है। सभी जानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने विदेशी बैंकों से काला धन वापस लाने का बार-बार वायदा किया था। इस वापस लाये जाने वाले खजाने से प्रत्येक भारतीय को 15 लाख रुपये देने का वायदा किया गया था, जिसे बाद में भाजपा अध्यक्ष द्वारा ह्यजुमलाह्य बता कर खारिज कर दिया गया। अब, मोदी राज के दो साल बीतने के बाद विदेशी बैंकों में जमा धन की चर्चा को घरेलू जमाखोरी की ओर मोड़ दिया गया है, मानो कि काला धन वाले धन्नासेठ अपने पैसे को घरों में छिपा कर रखते हैं और उसे एक ही झटके में बाहर निकाल लिया जायेगा। ऐसे दावे पर भरोसा तो किसी कल्पनालोक में जाकर ही हो सकता है।

उन्होंने कहा कि काले धन का बहुत छोटा हिस्सा ही कैश में रखा जाता है, वह भी थोड़े समय के लिए और अधिकांश हिस्सा निरंतर गैरकानूनी सम्पत्ति (रीयल एस्टेट, सोना, शेयर या किसी अन्य फायदे वाली सम्पत्ति में निवेश) में बदलता रहता है, अथवा राजनीतिक-आर्थिक तंत्र के संचालन में खप जाता है (राजनीतिक फण्डिंग, रिश्वत आदि जो सत्ता के दलालों और परजीवी वर्गों की विलासिता के खर्चों को पूरा करने में लगता है)।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार और भाजपा के प्रचारक जनता पर हुए इस कोलेटरल डैमेज और थोड़े समय की असुविधा के प्रति बिल्कुल भी चिन्तित नहीं हैं। इसके विपरीत जो अपनी समस्या सामने रख रहा है उसे तत्काल ही भ्रष्टाचार और काले धन का हिमायती बताया जा रहा है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार गौ-गुण्डागर्दी और शासन के भगवाकरण का विरोध करने वालों पर राजद्रोह का आरोप मढ़ा गया था और सर्जिकल स्ट्राइक एवं झूठे एनकाउण्टरों पर सवाल खड़ा करने वालों को राष्ट्रविरोधी और आतंकवाद का पक्षधर बताया गया था। गहराते कृषि संकट, बेतहाशा बढ़ती कीमतें और घटते जाते रोजगार की मार अब भाजपा के धुर समर्थक भी महसूस कर रहे हैं, इसीलिए अर्थव्यवस्था मोदी सरकार की सबसे कमजोर नस बन गई है। विमुद्रीकरण की इस नाटकबाजी से भाजपा को लग रहा है कि उसे चर्चा करने लायक एक ऐसा बिन्दु मिल जायेगा जिससे जनता के गुस्से को ठण्डा किया जा सके और पार्टी द्वारा किये गये बड़े-बड़े आर्थिक वायदों के प्रति कुछ आशा और भरोसा फिर से बन सके।

खास खबर : नब्बे फ़ीसदी से अधिक विधायक काले धन को लेकर परेशान

दोस्तों, अर्थशास्त्र की परिभाषा के हिसाब से ज्ञात श्रोत से अधिक संपत्ति को ही काला धन कहा जाता है। हालांकि इसके लिए सरकारी प्रावधानों में स्लैब की परिकल्पना भी है। इसी परिकल्पना के आधार पर आयकर एवं अन्य प्रकार के करों का निर्धारण किया जाता है। केंद्र सरकार द्वारा काले धन को लेकर किये गये पहल के बाद बिहार के सियासती गलियारे में काले धन को लेकर भी हड़कंप मचा है। हालांकि इस संदर्भ में अभी तक किसी ने भी खुलकर अपनी बात नहीं कही है। वहीं वर्ष 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में जीते विधायकों द्वारा घोषित शपथ पत्र को आधार मानें तो यह बात साफ होती है कि सियासती गलियारे में समृद्धि आयी है। मसलन वर्तमान विधानसभा में कुल 167 विधायक करोड़पति हैं। जबकि 2010 में यह संख्या केवल 45 थी।

 

वर्तमान बिहार विधान सभा में 10 करोड़ से अधिक की घोषित संपत्ति वाले विधायकों की संख्या 14, 5-10 करोड़ की संपत्ति वाले विधायकों की संख्या 22, 1-5 करोड़ के बीच संपत्ति वाले विधायाकें की संख्या 126, 50 लाख से 1 करोड़ के बीच संपत्ति वाले विधायकों की संख्या 51 और 50 लाख से कम संपत्ति वाले विधायकों की संख्या 30 है। सबसे अधिक घोषित संपत्ति वाले विधायकों में खगड़िया की जदयू विधायक पुनम देवी यादव हैं। इनके पास कुल 41 करोड़ 34 लाख 45 हजार 969 की संपत्ति वर्ष 2015 में विधानसभा चुनाव के पहले थी। वहीं भागलपुर से कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा के पास कुल संपत्ति 40 करोड़ 57 लाख 35 हजार 981 रुपए थी। जबकि छोटे सरकार के नाम से कुख्यात मोकामा के निर्दलीय विधायक अनंत सिंह के पास 28 करोड़ 11 हजार 988 रुपए की चल व अचल संपत्ति थी।

 

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वर्तमान में केवल 11 विधायकों ने अपना पैन विवरण नहीं दिया। एक करोड़ से अधिक संपत्ति वाले और पैन कार्ड नहीं रखने वाले तीन विधायकों में राजद के सहरसा विधायक अरूण कुमार(कुल संपत्ति 3,24,88,878 रुपए), बिहारीगंज से जदयू के विधायक निरंजन कुमार मेहता (2,76,78,000 रुपए) और परिहार से भाजपा विधायक गायत्री देवी (1,88,22,261 रुपए) शामिल हैं। वहीं 19 फीसदी विधायकों ने इनकम टैक्स नहीं जमा किया।इनमें बक्सर के कांग्रेस विधायक संजय तिवारी, शिवहर से जदयू विधायक शर्फूद्दीन और अररिया से कांग्रेस के विधायक अबिदुर्र रहमान शामिल हैं।

 

बहरहाल सियासती गलियारे में काला धन कोई नयी बात नहीं है। अब इस मामले कितना हकीकत और कितना फसाना है, यह आजतक यक्ष प्रश्न है। परंतु जिस तरीके से लोकतंत्र में पूंजी का महत्व बढ़ता जा रहा है, कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यदि देश को काले धन से मुक्त करना है तो सबसे पहले देश और प्रदेश के सियासतदान जनता की कमाई पर कुंडली मारकर बैठना बंद करें।

अपनी बात : आश्चर्यजनक नहीं है डोनाल्ड ट्रंप की ताजपोशी

दोस्तों, अमेरिकी मीडिया में डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन से पीछे चल रहे रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकावासियों ने अपना 45वां राष्ट्रपति चुन लिया। जाहिर तौर पर इस घटना से कई लोगों को आश्चर्य हुआ। यहां तक कि अमेरिकी मीडिया भी सन्न रह गयी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आश्चर्य व्यक्त किया गया। लेकिन मेरी समझ से इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है।

दरअसल हम जिस युग में जी रहे हैं, अर्थशास्त्र के हिसाब से यह नव उदारवादी युग है। यह केवल पूंजीवाद नहीं है बल्कि पूंजी का अधिकाधिक स्वामित्व हासिल करने का दौर है। इसका असर पूरे विश्व पर पड़ा है। मसलन हर आदमी सबसे पहले आपको सबसे अधिक अमीर और शक्ति संपन्न बनाना चाहता है। फ़िर सक्षम होने पर अपनी जाति, अपना धर्म, अपना शहर, अपना देश। इस प्रवृति ने छद्म राष्ट्रवाद को पैदा किया है। भारत में न्ररेंद्र मोदी का उभार इसी का उदाहरण है। रुस में पुतिन का उदय भी रुसियों के इसी मनोभाव के कारण हुआ है। अब अमेरिका इसका नया उदाहरण बना है।

डोनाल्ड की जीत में इसकी बड़ी भूमिका है। उन्होंने जमकर राष्ट्रवाद का खेल खेला। अल्पसंख्यकों को लेकर उन्होंने कट्टरता दिखलायी। अश्वेतों को गालियां दी। डेमोक्रेट उम्मीदवार महिला थीं, इसके बावजूद उनके लिए भद्दे शब्द प्रयोग किये। ठीक वैसे ही जैसे हिन्दुस्तान में नरेंद्र मोदी ने किया था। आर्थिक संकट और बेरोजगारी से जुझ रहे अमेरिकी नागरिकों ने डोनाल्ड ट्रंप को अपना मसीहा चुना। इसकी एक वजह यह भी कि तमाम दावों के बावजूद बराक ओबामा अमेरिकी नागरिकों के इस अपेक्षा पर खरे नहीं उतर सके।

बहरहाल नरेंद्र मोदी के बाद डोनाल्ड ट्रंप की ताजपोशी ने यह साबित कर दिया है कि अब किसी भी देश में जीत उसी को मिलेगी जो विभेदकारी रणनीति अपनायेगा। अपने धर्म, अपनी जाति और अपने मुल्क के लिए कट्टरता का प्रदर्शन करेगा। नव उदारवादी युग में फ़िलहाल इसका कोई और विकल्प नहीं है। वैसे यह भी स्थायी दौर नहीं है। वजह यह कि हिन्दुस्तान में लोगों ने नरेंद्र मोदी का चेहरा देख लिया है। अब अमेरिकावासियों की बारी है।

जन्मदिवस पर विशेष : युवा राजनीति का मानदंड स्थापित कर रहे तेजस्वी

पटना(अपना बिहार, 9 नवंबर 2016) - सूबे में मौजूदा नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के सबसे कम उम्र के सदस्य तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री हैं। इनकी खासियत यह है कि इन्होंने युवा राजनीति का मानदंड स्थापित किया है। पथ निर्माण विभाग के मंत्री के रुप में बीते एक वर्ष के दौरान उन्होंने कई अभिनव प्रयोग किये। इसके अलावा सोशल मीडिया का इस्तेमाल बिहार के विकास के लिए कर यह साबित किया कि आज के युवा किसी भी मायने में कम नहीं हैं। वे देश के रचनात्मक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

श्री यादव की अबतक की यात्रा इतनी आसान नहीं रही। माता-पिता से विरासत में राजनीति मिलने के पहले वे एक क्रिकेटर रहे। राजनीति में उनकी सक्रियता तब हुई जब चारा घोटाला मामले में सीबीआई कोर्ट ने राजद प्रमुख और उनके पिता लालू प्रसाद को दोषी करार दे दिया। एक पार्टी के रुप में राजद पर अस्तित्वहीनता का खतरा मंडरा रहा था। ऐसे समय में तेजस्वी ने पार्टी की कमान संभाली। सीबीआई कोर्ट के फ़ैसले को जनता की अदालत में ले गये। उनकी इस मुहिम का सकारात्मक असर हुआ। पार्टी में युवा बड़ी संख्या में जुड़ने लगे।

बाद में जब लालू प्रसाद को जमानत मिली और वे जेल से बाहर आये तब भी तेजस्वी ने अपना अभियान जारी रखा।

विधानसभा चुनाव से पहले हुए लोकसभा चुनाव में तेजस्वी ने अपने पिता के साथ मिलकर चुनावी अभियान का नेतृत्व किया। हालांकि कांग्रेस के प्रति नकारात्मकता के कारण भाजपा को शानदार सफ़लता मिली लेकिन राजद के लिए सुखद यह रहा कि वह सूबे में सबसे अधिक मत पाने वाली पार्टी बनी। यही कारण रहा कि नीतीश कुमार ने सारे मतभेद भूलाकर राजद के साथ गठबंधन किया और विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को ऐतिहासिक जीत मिली। इस जीत के असली हीरो लालू प्रसाद बने तो नीतीश कुमार भी इसके बड़े भागीदार बने। इन दोनों के बीच बिहार की जनता की नजर जिस पर टिकी थी, वे तेजस्वी थे। बाद में जब सरकार का गठन हुआ तब तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बनाये गये। सरकार में शामिल होने के बाद उन्होंने विभाग को काम करने का नया नजरिया दिया।

बहरहाल बिहार के इस शानदार युवा नेता ने अपना जन्मदिवस शानदार तरीके से मनाने का निर्णय लिया है। उन्होंने अपने समर्थकों से इस मौके पर पेड़ लगाने का आह्वान किया है। पर्यावरण के प्रति जागरुकता का संदेश देने वाले तेजस्वी ने वह किया है जैसा आजतक किसी ने नहीं किया। यह वाकई शानदार है।

दिलचस्प खबर : इस कारण भूमिहार कन्हैया से नाराज हैं बिहार के भूमिहार

जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार अब पहले वाले नहीं रहे। जिन दिनों उन्होंने मोदी सरकार की नाक में दम कर रखा था, उन दिनों वे बिहार के भूमिहारों के नायक बन चुके थे। यही वजह थी कि तिहाड़ से निकलने के बाद पहली बार बिहार आये तो भूमिहारों ने उन्हें अपने माथे पर बिठा लिया था। हर अखबार के भूमिहार पत्रकार बेहतर से बेहतर कवरेज देना चाहते थे। लेकिन कन्हैया के एक पहल ने भूमिहारों का जोश ठंढा कर दिया। दरअसल हुआ यह कि कन्हैया जब लालू प्रसाद से मिले तब उन्होंने उनका पैर छूकर आशीर्वाद लिया। यह देखते ही भूमिहार पत्रकार कन्हैया पर भड़क गये। बाद में वे भूमिहार जो उसे अपना नायक मान रहे थे, जल्द ही देशद्रोही और गद्दार मानने लगे। हाल ही में कन्हैया के पिता जयशंकर प्रसाद का निधन हुआ। एक बार फ़िर से कन्हैया विवादों में हैं। कुछ भूमिहार पत्रकार उनके दुख में साथ खड़े होने के बजाय उन्हें गालियां दे रहे हैं तो कुछ उनके नाम पर सहानुभूति का दिखावा कर रहे हैं। वजह चाहे कुछ भी हो, मूल मामला यही है कि यदि कन्हैया ने लालू प्रसाद का पैर नहीं छुआ होता तो वे भूमिहारों के लिए महानायक होते।

एनडीटीवी पर बैन के खिलाफ़ एक दिन के लिए न्यूज चैनलों का बहिष्कार करेंगे सीएम

पटना(अपना बिहार, 6 नवंबर 2016) - मीडिया को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ माना जाता है. विधायिका जहाँ कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या करने के साथ ही उनका उल्लंघन करने वालों को सजा देती है. वहीं लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में समसामयिक विषयों पर लोगों को जागरूक कर उनकी राय बनाने में मीडिया एक बड़ी भूमिका निभाता है. केंद्र सरकार द्वारा एनडीटीवी इंडिया पर बैन लगाने के विषय पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व से हम सभी अवगत हैं। मीडिया लोगों की आवाज उठाने में सहायक बनकर अधिकार एवं शक्ति के दुरूपयोग को रोकता है। केंद्र सरकार द्वारा छक्ज्ट इंडिया पर बैन लगाना निंदनीय है। यह कदम मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने जैसा है। भारत जैसे देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मीडिया का होना अति आवश्यक है.

उन्होंने कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा 9 नवंबर को एनडीटीवी इंडिया न्यूज चैनल को 24 घंटे के लिए बैन करने के निर्णय की कड़ी उपेक्षा होनी चाहिए। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा मीडिया की स्वतंत्रता पर इस प्रकार का अंकुश लगाना, अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का अपमान है।

अपनी बात : अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध का मतलब

दोस्तों, केंद्र सरकार द्वारा एनडीटीवी इंडिया नामक एक निजी न्यूज चैनल को एक दिन बंद किये जाने के निर्णय को लेकर पूरे देश में हड़कंप मचा है। जाहिर तौर पर इसे देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर सरकार द्वारा जबरदस्ती हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। इस कारण केंद्र सरकार सबके निशाने पर है। वहीं इस पूरे मामले का एक पक्ष यह भी है कि जिस आरोप में एनडीटीवी के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है वह इस वर्ष पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले के दौरान किये गये कवरेज से जुड़ा है। केंद्र सरकार के मुताबिक चैनल ने कवरेज के दौरान पठानकोट एयरबेस की महत्वपूर्ण सूचनायें प्रसारित किया जिसके कारण आतंकियों को मदद मिली।

दिलचस्प यह है कि उक्त घटना के दौरान करीब सभी न्यूज चैनलों ने कमोबेश वहीं दिखाया जो आरोपित चैनल ने दिखाया। ऐसे में केवल एक चैनल पर कार्रवाई से राजनीतिक और पत्रकारिता के गलियारे में खलबली है। इसके विरोध में यह कहा जा रहा है कि देश एक बार फिर से आपातकाल की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। इस मामले में राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने तो खुलकर कहा है कि  लोकलाज से लोकराज चलता है। लोकतंत्र में लोकशर्म को दरकिनार नही कर सकते। अपने दूसरे संदेश में श्री प्रसाद ने कहा कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात है। अभिव्यक्ति व गैरसरकारी संस्थाओं की आजादी को जिसने भी कुचलने का प्रयास किया उनको न्यायप्रिय जनता ने क्या सबक सिखाया,इनको भूलना नही चाहिए।

वैसे मीडिया पर सेंशरशिप का यह पहला मामला नहीं है। बिहार में ही पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र द्वारा प्रेस बिल लाया गया था। तब भी उसका मकसद मीडिया पर नकेल कसना था। लेकिन तब इस बिल का पुरजोर विरोध किया गया था और अंतत: मजबूर होकर सरकार को विधेयक वापस लेना पड़ा था। इतना ही नहीं बिहार में मीडिया पर अघोषित सेंसरशिप का आरोप प्रेस काउंसिल आफ इन्डिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी उठाया था। उन्होंने इसकी जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन भी किया था जिसने अपनी रिपोर्ट में बिहार में सरकार द्वारा मीडिया पर अघोषित प्रतिबंध को स्वीकार भी किया था।

बहरहाल इक्कीसवीं सदी में खुले रूप से मीडिया पर प्रतिबंध की यह पहली घटना है। इसके पहले जिन दिनों देश में आपातकाल तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा लगाया गया था, उन दिनों मीडिया पर सरकार की कड़ी निगाह रहती थी। वैसे सबसे दिलचस्प यह है कि केंद्र सरकार द्वारा एनडीटीवी के खिलाफ कार्रवाई का निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई दिल्ली में एक प्रतिष्ठित अखबार के अवार्ड समारोह में भाग लेने के एक दिन बाद की गयी। गौरतलब है कि इसी समारोह में इन्डियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने पीएम को पत्रकारिता का यथार्थ सबके सामने बताया था। इतना ही नहीं टाइम्स आफ़ इन्डिया के वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से सम्मान लेने से इन्कार कर दिया था। उनका कहना था कि श्री मोदी के साथ फ़ोटो फ़्रेम साझा कर वह अपना जीवन नहीं जी सकते।

धान की खरीद 15 नवंबर से शुरू, मुख्यमंत्री ने की समीक्षा बैठक

पटना(अपना बिहार, 4 नवंबर 2016) - इस बार किसानों से धान की सरकारी खरीद आगामी 15 नवंबर से शुरू हो जाएगी। इस संबंध में  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सचिवालय स्थित संवाद सभाकक्ष में समीक्षा बैठक की। इस दौरान सहकारिता विभाग द्वारा प्रस्तुतीकरण में बताया गया कि धान अधिप्राप्ति का मुख्य उद्देश्य है कि राज्य के सभी किसानों को बिना किसी कठिनाई के न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ क्रय के बाद सीधे मिल सके एवं उन्हें अपनी ऊपज की आपात बिक्री की स्थिति का सामना नहीं करना पड़े। प्रस्तुतीकरण के दौरान धान अधिप्राप्ति से संबंधित विभिन्न बिन्दुओं पर विस्तृत चर्चा की गयी। चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री द्वारा आवश्यक दिशा-निर्देश दिये गये। मुख्यमंत्री ने कहा कि धान अधिप्राप्ति की व्यवस्था पारदर्शी हो। इस मौके पर कृषि मंत्री रामविचार राय, सहकारिता मंत्री आलोक कुमार मेहता, खाद्य आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री मदन सहनी, मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, विकास आयुक्त शिशिर सिन्हा, प्रधान सचिव कृषि सुधीर कुमार सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

बड़ी खबर : बलात्कार पीड़ितों की जांच की मुकम्मिल सुविधा नहीं

बिन प्रशिक्षण चिकित्सक करते हैं बलात्कार पीड़ितों की मेडिकल जांच, नहीं अनुपालन हो रहा सुप्रीम कोर्ट का दिशा-निर्देश

पटना(अपना बिहार, 2 नवंबर 2016) - संज्ञेय अपराधों में बलात्कार को गंभीरतम अपराध माना गया है। इसके लिए कानून भी कड़े हैं। सामान्य तौर पर बलात्कार आदि की घटनाओं में पुलिस प्रशासन भी पूरी सजगता के साथ कार्रवाई करती है, लेकिन एक दूसरी सच्चाई यह भी है कि आधे से अधिक मामलों में पुलिस की प्रारंभिक रिपोर्ट में त्रुटियों के का लाभ अभियुक्तों को मिल जाता है। स्वयं एनसीआरबी के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि बलात्कार के दर्ज मामलों की संख्या की तुलना में न्यायालयों में फैसले की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते करीब अस्सी फीसदी मामले दम तोड़ देते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इसके लिए पीड़ित पक्ष पर सामाजिक, आर्थिक अथवा दबंगता कारण तो है ही, साथ ही बलात्कार पीड़िता की जांच के लिए राज्य में मुकम्मिल सुविधा का अभाव होना भी अहम कारण है।

स्थानीय गर्दनीबाग स्थित सरकारी अस्पताल में इस तरह के कई मामले हर वर्ष लाये जाते हैं। राजधानी में होने के बावजूद इस अस्पताल में बलात्कार पीड़िता के मेडिकल जांच के लिए आवश्यक सुविधायें नहीं हैं। इस संबंध में अस्पताल की उपाधीक्षक डा. मंजूला रानी ने बताया कि उनके यहां इस तरह के कई मामले लाये जाते हैं। सामान्य तौर पर अधिकांश मामलों में इतना विलंब हो चुका होता है कि सीधे तौर पर बलात्कार की चिकित्सकीय पुष्टि नहीं हो पाती है। वहीं यह पूछने पर कि क्या यहां के चिकित्सकों को बलात्कार की जांच के लिए आवश्यक किसी प्रकार का प्रशिक्षण राज्य सरकार के द्वारा दिया जाता है, डा. रानी ने इन्कार करते हुए कहा कि उनलोगों को किसी प्रकार कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। सामान्य तौर पर बलात्कार पीड़िता की मेडिकल जांच एक स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक और फोरेंसिक सार्इंस के विशेषज्ञ की मौजूदगी में कराये जाने का नियम है। जब ये चिकित्सक उपलब्ध नहीं होते हैं तो वे इस बाबत सिविल सर्जन को सूचित करती हैं और तदुपरांत उनके निर्देशानुसार पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए कहीं और रेफर किया जाता है।

बताते चलें कि बलात्कार पीड़िता के मेडिकल जांच के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा निर्देश के मुताबिक सरकारी अस्पताल के पंजीकृत चिकित्सक अधिकृत हैं। इनकी अनुपस्थिति में गैर सरकारी अस्पताल के पंजीकृत चिकित्सक पीड़िता पक्ष की सहमति के आधार पर मेडिकल जांच को अंजाम दे सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में एक विशेष प्रपत्र का उपयोग करने का निर्देश जारी किया है जिसका अनुपालन बिहार में नहीं किया जा रहा है। इस संबंध में डा. मंजूला रानी ने बताया कि वे लोग सफेद कागज पर अपने हाथ से लिखकर रिपोर्ट बनाती हैं।

आजतक न्याय से वंचित है बलात्कार पीड़िता

पटना । राजधानी पटना के फुलवारी प्रखंड के टंड़वा मुसहरी की एक पीड़िता सोनी(काल्पनिक नाम) घटना के तीन वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी न्याय से वंचित है। बताते चलें कि करीब तीन वर्ष पहले सोनी की उम्र करीब पांच वर्ष थी। उसी के गांव के एक व्यक्ति ने कचड़ी खिलाने के बहाने खेत में ले जाकर उसके साथ अपना मुंह काला किया था। गांव वालों की सक्रियता के कारण स्थानीय परसा पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया था। लेकिन वर्तमान में अभियुक्त जेल से बाहर है। वहीं पीड़िता सोनी की मां का निधन पिछले वर्ष हो गया और अब उसके परिजन भी इस पूरे मामले से कोसों दूर हैं।

समाज समझे अपनी जिम्मेवादी : अनुराधा

पटना । राजधानी पटना में महिला विकास निगम द्वारा संचालित हेल्पलाइन से जुड़ीं और पटना हाईकोर्ट में अधिवक्ता अनुराधा गुप्ता के मुताबिक बलात्कार के मामले में अभियुक्तों के बच निकलने के पीछे समाज द्वारा अपनी जवाबदेही का निर्वहन नहीं किया जाना है। उन्होंने बताया कि अधिकांश मामले इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा के बहाने पीड़ित पक्ष ही मामला वापस ले लेता है। कई मामलों में यह आर्थिक और कई मामलों में ऐसा अभियुक्त पक्ष की दबंगता के कारण भी होता है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि बलात्कार पीड़िता की मेडिकल जांच सही तरीके से नहीं होने के कारण भी अभियुक्तों को संदेह का लाभ मिल जाता है। श्रीमती गुप्ता कहती हैं कि सबसे अधिक जिम्मेवार न्यायिक प्रक्रिया में होने वाला विलंब है। यदि यह दोष दूर हो जाये तो अधिक से अधिक आरोपियों को सजा मिल सकेगी और बलात्कार की घटनाओं में कमी आयेगी।

बिहार में बलात्कार की घटनायें

वर्ष घटनाओं की संख्या

2005 973

2006 1083

2007 1122

2008 1041

2009 929

2010 795

2011 934

2012 927

2013 1128

2014 1127

2015 1041

संपादकीय : भोपाल में नरसंहार

दोस्तों, कल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर मध्यप्रदेश की पुलिस ने आठ लोगों की सामूहिक हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि ये सभी प्रतिबंधित संगठन सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ़ इंडिया) के सदस्य थे और मौत से करीब 10 घंटे पहले ही दीपावली की रात में भोपाल सेंट्रल जेल की दीवार फ़ांदकर फ़रार हो गये थे। जेल से भागने के क्रम में इन लोगों के उपर कांस्टेबल रमाशंकर यादव की हत्या करने का आरोप भी भोपाल पुलिस द्वारा लगायी जा रही है।

इस पूरे मामले को भारतीय मीडिया के द्वारा दूसरा मामला बताया जा रहा है। मीडिया के मुताबिक जेल में बंद सभी विचाराधीन कैदी आतंकवादी थे। जबकि किसी भी न्यायालय ने उन्हें आतंकी के आरोप में दोषी नहीं करार दिया था। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मारे गये विचाराधीन कैदियों के मामले की सुनवाई अंतिम चरण में थी। संभवतः जो मारे गये, वे भी इस बात को समझते होंगे। ऐसे में उनलोगों ने जेल से फ़रार होने की योजना क्यों बनायी होगी, यह एक जटिल प्रश्न है। यदि उन्हें भागना ही होता तो पहले ही भाग चुके होते। भोपाल सेंट्रल जेल की सुरक्षा का सवाल भी अहम सवाल है। यह विश्वास करने योग्य नहीं है कि भागने वाले कैदी बड़े आराम से 30 फ़ीट की उंची दीवार फ़ांदकर फ़रार हो गये होंगे और जेल प्रशासन मुंह बाये देखता रह गया होगा।

खैर भोपाल में नरसंहार को बड़ी चतुराई से अंजाम दिया जा चुका है और इसे लेकर राजनीति भी की जा रही है। भाजपा के लिहाज से महत्वपूर्ण यह है कि उसे अपनी मुस्लिम विरोधी छवि बनाने में मदद मिलेगी। कदापि यह भी संभव है कि व्यापमं घोटाले की तफ़्तीश के दौरान मारे गये सैंकड़ों गवाहों के कारण उठ रहे सवालों को दबाने के लिए शिवराज सरकार ने स्वयं ही यह नरसंहार कराया हो। सबसे दिलचस्प बात यह है कि व्यापमं घोटाले की जांच में अबतक असफ़ल रहे सीबीआई के बदले शिवराज चौहान ने नरसंहार मामले की जांच एनआईए से कराने की बात कही है। सवाल तो यही ही कि जिस राज्य में सीबीआई जैसी जांच एजेंसी मुंह बाये मजबूर है, वहां एनआईए क्या करेगी। वैसे भी एनआईए की जांच हमेशा से संदेह के घेरे में रहा है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अब हिन्दुस्तान में कानून का इकबाल खत्म हो गया है। खासकर मुसलमानों के लिए। यह अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। जम्मू-कश्मीर में कर्फ़्यू पिछले सवा सौ दिनों से जारी है। घायलों की संख्या दस हजार को पार कर चुकी है। सैंकड़ों लोगों को अपनी आंखों से हाथ धोना पड़ा है। ऐसे वर्तमान में भविष्य की परिस्थिति का आकलन बहुत मुश्किल नहीं है।

मीसा ने बैंड बजाने वाली दलित महिलाओं को सराहा

पटना(अपना बिहार, 30 अक्टूबर 2016) - राज्य सभा सांसद डा. मीसा भारती ने बैंड बजाने वाली दलित महिलाओं के समूह की सराहना की है। उन्होंने कहा कि नारी गुंजन सरगम महिला बैंड- दानापुर के ढिबरा गाँव का मुसहर समाज से आनेवाली 10 महिला सदस्यों से बना बैंड जो स्थानीय शादियों, पर्व-त्यौहारों और अन्य अवसरों पर अपनी सेवाएँ देता है। यह अपने आप में महिला सशक्तिकरण और स्वावलम्बन का अनूठा उदाहरण है क्योंकि एकदम जमीनी स्तर पर कम शिक्षित होने के बावजूद ना सिर्फ घर के दहलीज को लाँघना, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए एक बिलकुल अपारंपरिक व्यवसाय चुनना सचमुच दुर्लभ और साहसिक है। उन्होंने कहा कि नारी उत्थान के क्षेत्र में असली क्रांति शिक्षित और समृद्घ परिवारों से आने वालीं और राजनीति, कॉपोर्रेट जगत, खेल व व्यावसायिक जगत में नाम कमाने महिलाएँ नहीं बल्कि दूर दराज के इलाकों रह रहीं, कहीं ज्यादा पूर्वाग्रह और अवरोधों से जूझ रहीं, कम शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं के आभाव में घर-परिवार, सामाजिक मान्यताओं और रूढ़िवादी सोच के बीच संघर्ष कर रहीं महिलाएँ लेकर आ रहीं हैं जिनकी प्रेरणादायक कहानियाँ हमारे बीच पहुँच भी नहीं पाती हैं।

अपनी बात : इस सोहराई दीया नहीं, चलो सूरज जलायें

दोस्तों, अंधकार और उजाला दोनों अलग-अलग सही, लेकिन महत्व दोनों का है। उजाला न हो तो अंधकार महत्वहीन है और अंधकार न हो तो उजाले का कोई मतलब नहीं। सaब्कुछ आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के मुताबिक है। यह तो एक बात हुई। दूसरी बात यह कि अंधकार नकारात्मकता का प्रतीक है जिसे हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में अलग-अलग प्रकार से बताया गया है। इसी के आधार पर दीपावली मनायी जाती है। वैसे दिलचस्प यह है कि यह पर्व दरअसल सोहराई है जो मूलरुप से आदिवासियों का पर्व है।

पिछले वर्ष गुमला के बिशुनपुर प्रखंड के सखुआपानी गांव के निवासी अनिल असुर ने इस बात की जानकारी दी थी। दिलचस्प यह कि मगध यानी मध्य बिहार में आज भी दीपावली को सोहराई ही कहा जाता है। दीपावली के रुप में इसका ब्राह्म्णीकरण तो हाल के समय का है। गणेश-लक्ष्मी की पूजा और अन्य सारे आडंबरों को दरकिनार कर दें तो सोहराई सचमुच इंसानों का पर्व है। खेतों में धान की फ़सलें पकने को तैयार हैं। किसान बड़ी बेसब्री से अपनी खुशियों का इंतजार कर रहे हैं। आदिवासी समुदाय और बिहार के ग्रामीण इलाकों में इस पर्व के मनाने के पीछे यही मौलिक सोच है। फ़रही-लावा दोनों धान के उत्पाद हैं। आदिवासी समुदाय भी धान को सबसे अहम मानता है। अनिल असुर बताते हैं कि वे जन्म से लेकर मरनी तक धान का इस्तेमाल करते हैं। उनका ऐसा कोई संस्कार नहीं है जिसमें धान शामिल न हो।

खैर बात दीपावली की हो रही है। ब्राह्म्णों के मुताबिक उजाले का पर्व। कहने को सभी अपने घरों में खुशियों के दीपक जलाते हैं। पटाखे फ़ोड़ने की परंपरा संभवतः भारत में मुसलमानों के आने के बाद से शुरु हुई है। बारुद का आविष्कार किसी भारतीय ने तो नहीं ही किया है। बाद में ब्राह्म्णों ने इसे मूलनिवासियों को डराने के लिए सांस्कृतिक रुप से अपना लिया होगा। इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

बहरहाल आप सभी को सोहराई की हार्दिक शुभकामनायें और आज नवजागरण के जिस दौर से हम सभी गुजर रहे हैं, आवश्यकता है कि हम दीपक नहीं सूरज जलायें। ताकि सदियों से थोपा गया अंधेरा खत्म हो और उजाला तब हमारे लिए प्रतीक मात्र न रहे। देश का हर बच्चा शिक्षित होकर सफ़ल इंसान बने। देश सफ़ल देश बने। समाज सफ़ल समाज की परिकल्पना को चरितार्थ करे। इतना सब के लिए एक सूरज जलाने की कोशिश करना तो बनता ही है।

सुप्रीम कोर्ट में गरीबों का नहीं कोई सुनने वाला, चार वर्षों में इंसाफ के लिए नहीं मिला कोई जज, हाल बथानी टोला नरसंहार मामले का

दोस्तों, देश में न्यायिक प्रक्रिया कितनी धीमी हो सकती है, इसका एक प्रमाण बथानी टोला नरसंहार का सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई है। हालत यह है कि पटना हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2012 में इस मामले के सभी 24 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में निर्दोष करार दिये जाने के बाद पीड़ित पक्ष ने 16 जुलाई 2012 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वहीं अद्यतन स्थिति यह है कि इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह तय नहीं किया गया है कि इस मामले की सुनवाई कौन करेंगे। बताते चलें कि यह घटना 11 जुलाई 1996 को भोजपुर सहार के बथानी टोला में घटित हुई थी। इस घटना में रणवीर सेना के सदस्यों के उपर 64 लोगों की सामूहिक हत्या का आरोप था। इस मामले में प्राथमिकी 12 जुलाई 1996 को दर्ज की गयी और 24 मार्च 2000 को 64 अभियुक्तों के खिलाफ आरोप गठित किये गये। करीब दस वर्षों के बाद 5 मई 2010 को आरा की निचली अदालत ने इस मामले में तीन अभियुक्तों को फांसी और 21 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। जबकि 30 अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में रिहा कर दिया गया था। फांसी की सजा पाने वालों में अजय सिंह (इसके उपर दस वर्षीया बच्ची फूल कुमारी की हत्या का आरोप था), मनोज सिंह (तीन माह की मासूम बच्ची की हत्या का आरोपी) और नरेंद्र सिंह (एक दंपत्ति की हत्या का आरोपी) शामिल थे।

इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 17 अप्रैल 2012 को पटना हाईकोर्ट ने सभी 23 अभियुक्तों को बरी कर दिया। यह फैसला जस्टिस नवनीति प्रसाद सिंह और जस्टिस अश्विनी कुमार सिंह की खंडपीठ ने दिया था। बाद में इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही और तदुपरांत 16 जुलाई को 2012 को पीड़ित पक्ष की ओर से मुख्य सूचक नईमुद्दीन और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

बहरहाल इस पूरे मामले के बारे में नईमुद्दीन बताते हैं कि राज्य सरकार के कारण पटना हाईकोर्ट में आरोपियों की जीत हुई। वहीं सुप्रीम कोर्ट में भी राज्य सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की जा रही है, जिसके कारण यह मामला चार वर्ष बाद भी वहीं अटका पड़ा है। हालांकि उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि उन्हें न्यायपालिका में पूरा यकीन है और अदालत इंसाफ करेगी।

खास खबर : अधूरे रह गये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वायदे, गांधी मैदान सीरियल धमाकों के तीन वर्ष पूरे

दोस्तों, वह 27 अक्टूबर 2013 का दिन था। पटना के गांधी मैदान में भाजपा की ओर से हुंकार रैली का आहवान किया गया था और एक दिन पहले से ही पटना भगवा झंडों से पट चुका था। वजह बहुत खास थी। तब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी पटना आने वाले थे। उस दिन पटना में सुरक्षा की तमाम व्यवस्था के बावजूद एक के बाद कुल सोलह धमाके हुए थे। धमाकों का यह सिलसिला उस वक्त भी जारी रहा था जब श्री मोदी पटना के गांधी मैदान में अपने विपक्षियों पर ताबड़तोड़ प्रहार कर रहे थे। रह-रहकर धमाके होते और बड़ी संख्या में गांधी मैदान में मौजूद भीड़ बदहवास इधर-उधर भागती। आगे की पंक्ति के लोग निर्बाध रूप से श्री मोदी का भाषण सुनने में मगन थे।

इस घटना में कुल छह लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। इस मामले की जांच तब एनआईए ने की थी और 24 अप्रैल 2014 को एनआईए ने इन्डियन मुजाहिदीन का इम्तियाज अंसारी के खिलाफ पहला चार्जशीट दाखिल किया था। इसके अलावा इस पूरे मामले मुजिबुल्लाह, हैदर अली, नुमन और तौफिक अंसारी आदि को भी गिरफ्तार किया गया था।

इस पूरी घटना के बाद प्रधानमंत्री पद के दावेदार और वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार आये थे और वे हेलीकॉप्टर से सभी मृतकों के घरों पर उनके परिजनों को ढ़ाढस देने गये थे। इस क्रम में उन्होंने सभी मृतकों के आश्रितों को मुआवजे के तौर पर दस-दस लाख रुपए और सरकारी नौकरी देने की बात कही थी। परंतु आजतक श्री मोदी का आश्वासन महज कोरा आश्वासन ही बनकर रह गया। मृतकों में बेगूसराय के बिन्देश्वर चौधरी, सुपौल के भरत रजक, गोपालगंज के मुन्ना श्रीवास्तव आदि शामिल थे।

बहरहाल मृतकों के परिजनों को भाजपा और सरकार बनने पर सरकार की ओर से नौकरी का आश्वासन आजतक आश्वासन ही है। इस संबंध में जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं कि यही भाजपा का असली चरित्र है।

टुन्ना पांडेय की जमानत पर मीसा ने उठाया सवाल

पटना(अपना बिहार, 26 जुलाई 2016) - चलती रेल में नाबालिग छात्रा के साथ छेड़खानी के आरोप में जेल में बंद भाजपा के विधान पार्षद टुन्ना पांडेय को जमानत दिये जाने पर सवाल नहीं उठाने पर राज्यसभा सांसद डा मीसा भारती ने सवाल उठाया है। अपने बयान में उन्होंने कहा कि मो शहाबुद्दीन, राजबल्लभ यादव और राकी यादव की जमानत पर सवाल उठाने वाले भाजपाई नेता मौन क्यों हैं। उन्होंने मीडिया पर भी सवाल उठाया कि मीडिया भी टुन्ना पांडेय की जमानत पर मौन है।

व्यवसायी पुत्रों के अपहरण मामले में नया पेंच, पुलिस को गुमराह करने को अपहरणकर्ताओं ने खुद को बताया था नक्सली

पटना(अपना बिहार, 25 अक्टूबर 2016) - दिल्ली के दो व्यवसायी पुत्रों के अपहरण मामले में नया पेंच सामने आया है। इस मामले में पिता बाबू लाल शर्मा का कहना है कि शुक्रवार की रात उनके बेटे ने उन्हें फोन किया और कहा कि उन्हें नक्सलियों ने उठा लिया है। वहीं इस मामले में पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है। उधर अपहृतों के माता-पिता पटना पहुंच चुके हैं और उनके आने के बाद पुलिस ने अपनी दबिश बढ़ा ती है। बाबूलाल शर्मा का कहना है कि शुक्रवार की रात जब बड़े बेटे सुरेश का मोबाइल फोन स्विच आॅफ हो गया, तो करीब 11 बजे उन्होंने छोटे बेटे कपिल के मोबाइल पर फोन लगाया। बेटे ने फोन उठाया और रोने लगा. वह बोला कि पिता जी हम लोगों को नक्सलियों ने उठा लिया है। उन्होंने बताया कि इसके बाद फोन पर फिरौती की मांग की गयी और फोन को काट दिया गया। इसके बाद से ही दोनों का मोबाइल स्विच आॅफ हो गया है। लेकिन, मामले की जांच कर रही पुलिस का कहना है कि यह अपराधी गैंग ने अपहरण किया है और गुमराह करने के लिए नक्सली संगठन का नाम लिया है। छानबीन की जा रही है।

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प यह है कि पटना एयरपोर्ट पर शुक्रवार की शाम करीब 7 बजे गो एयर की फ्लाइट आयी थी। इससे दोनों भाई सुरेश और कपिल उतरे। इसके बाद दोनों हैंड बैग लेकर बाहर निकलते हुए देखे गये। फिर टर्मिनल के बाहर बड़ा भाई सुरेश फोन लगाते हुए दिखा। जिस व्यक्ति को वह फोन लगा रहा था, वह कौन था, अभी भी रहस्य ही है। वहीं पुलिस सूत्रों की मानें तो वह व्यक्ति कारोबारियों के पुराने परिचित हैं। ठेका दिलाने के नाम पर बुलाया गया था। दोनों बेटों ने पटना के फतुहा, बख्तियारपुर जाने की बात कहीं थी। सूत्रों कि मानें, तो दोनों भाइयों का अंतिम लोकेशन भी फतुहा इलाके में ही मिला है। उसके बाद यह लोग कहां गये, पता नहीं चला।

छठ बाद तय होगा - कौन कितना खुशकिस्मत?

पटना(अपना बिहार, 24 अक्टूबर 2016) - सूबे में विभिन्न आयोगों व बोर्डों में जगह पाने की आस लगाये नेताओं व कार्यकर्ताओं के लिए अच्छी खबर। खबर यह है कि उनके इंतजार के दिन अब समाप्त हो चुके हैं। सूत्रों की मानें तो छठ बाद सभी नामों का खुलासा कर दिया जाएगा। छठ तक इंतजार की एक वजह केवल यह नहीं है कि नेताओं व कार्यकर्ताओं की आस न टूटे और उनकी खुशियों में कमी आये। बल्कि असली वजह जदयू और कांग्रेस की ओर से दावेदारों की अंतिम सूची नहीं आना भी है। जबकि राजद सूत्रों के मुताबिक राजद कोटे के नब्बे फीसदी दावेदारों की सूची फाइनल है और शेष पदों के लिए मंथन का दौर जारी है।

बताते चलें कि नयी सरकार के गठन के बाद राज्य के विभिन्न आयोगों व बोर्डों का गठन नहीं हुआ है। राजनीतिक और लाभ का पद होने के कारण सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं की निगाहें बनी हुई हैं। जहां एक ओर महागठबंधन दलों के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं में इसे लेकर बेचैनी है वहीं दूसरी ओर दलों के थिंकरों के पास एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है। सूत्रों की मानें तो आयोगों व बोर्ड के लिए भी महागठबंधन के नेताओं ने वहीं फार्मूला अपनाने का निर्णय लिया है जो मंत्रिमंडल के बंटवारे में अपनाया गया था। मसलन जदयू और राजद को चालीस-चालीस फीसदी हिस्सेदारी तो कांग्रेस को बीस फीसदी हिस्सेदारी मिलनी तय है।

सबसे दिलचस्प आयोगों पर अधिकार का सवाल है। सूत्रों की मानें तो महागठबंधन के नेताओं ने यह निर्णय लिया है कि विभागों की जिम्मेवारी जिस-जिस दल के मंत्रियों के पास हैं, उनके अध्यक्ष उसी पार्टी के होंगे। जबकि सदस्य अन्य दलों के होंगे। मसलन कृषि आयोग के अध्यक्ष का पद इस बार राजद के हिस्से में जाएगा। वजह यह है कि यह विभाग राजद के पास है। जबकि इसके सदस्यों में अन्य दलों के नेताओं को हिस्सेदारी मिल सकेगी। इसी प्रकार महिला आयोग और बाल श्रमिक आयोग आदि आयोग जदयू के खाते में जा सकती है।

बहरहाल सबसे अधिक नजरें युवा आयोग पर टिकी हैं। सूत्रों की मानें तो उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव इसे लेकर अधिक उत्साहित हैं। उल्लेखनीय है कि राजद ने चुनाव के पहले ही राज्य में युवा नीति और युवा आयोग बनाने की बात कही थी। वैसे विश्वसनीय सूत्र यह भी बताते हैं कि इस बार सफल नेता व कार्यकर्ता वही होंगे जिनका नाम उनकी पार्टी से अनुशंसित होने के बाद महागठबंधन के बड़े नेताओं को भी प्रभावित कर सकेगा।

यूपी के इस जदयू कार्यकर्ता ने चलाया था शराबबंदी अभियान, अपराधियों ने मारी गोली, देखने पहुंचे वशिष्ठ नारायण सिंह

पटना(अपना बिहार, 23 अक्टूबर 2016) - पिछले महीनों, जदयू में शामिल हुए यूपी के जेवर (नोएडा) समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शराबबंदीे का व्यापक मुहीम चलाने वाले पवन आचार्य को बीती रात शराब माफिया की शह पर गोली मार दी गई। गम्भीर रूप से घायल पवन आचार्य को नोएडा के कैलाश अस्पताल के आईसीयू में रखा गया है। इस आशय की जानकारी जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने फेसबुक पर जारी अपने संदेश में दी। उन्होंने  कैलाश अस्पताल जाकर पवन आचार्य के स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था की जानकारी ली।

उन्होंने कहा कि पवन आचार्य बिहार में शराबबंदी लागू होने से बड़ी प्रभावित थे और नीतीश कुमार के इस अभियान को पूरे उत्तर प्रदेश में फैलाने के लिए जदयू से जुड़े थे। नोएडा के जेवर में उन्होंने नीतीश जी की रैली भी आयोजित की थी, जिसमे बड़ी संख्या में स्त्री-पुरुष और साधु-सन्त शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि आचार्य पवन पर हुआ जानलेवा हमला निस्संदेह शराब माफिया और उनके सहयोगियों की साजिश है। यह शराब जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के जन अभियान पर हमला है। पवन आचार्य रविवार 23 अक्टूबर को महात्मा गांधी की समाधि राजघाट से शराबबंदी के पक्ष में पदयात्रा निकालने वाले थे। मगर उनके अभियान से घबराई शराब लॉबी ने इससे पहले ही कल रात 9 बजे उनपर जानलेवा हमला करवा दिया। हम यूपी सरकार से पवन आचार्य पर हमले के दोषियों की शीघ्र गिरफ्तारी की मांग करते हैं और ईश्वर से उनके जल्दी स्वस्थ होने की कामना करते हैं।

अपनी बात : जमानत पर हंगामा और सियासत

- अनंत सिन्हा

सबसे पहले शहाबुद्दीन, फिर राजबल्लव यादव, और अब राकी यादव की जमानत हुई है। जमानत होने के बाद बिहार में हंगामा मचा है। क्या इस हंगामा के पीछे न्याय दिलाने की इमानदार कोशिश है या सामाजिक राजनैतिक और जातीय कारण भी है। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि इस हंगामा के पीछे सामाजिक राजनैतिक और जातीय कारण है। अब हम आपको याद दिलाते है कि बिहार के पूर्णिया जिला के रूपसपुर चंदवा में जब नरसंहार हुआ था। यह बिहार का पहला नरसंहार था। इस खबर को बिहार के अखबारों ने नहीं छापा था। इस नरसंहार में बिहार विधान सभा के तत्कालीन अध्यक्ष लक्षमी नारायण सुधांशु के परिजनों का हाथ था। कर्पूरी ठाकुर जब गांव का दौरा कर लौटे और ब्यान दिया तो प्रदीप ने इस खबर को प्रकाशित किया। लेकिन आर्यावर्त ने प्रकाशित नहीं किया था। इसी बिहार में एक दो नहीं 60-70 लोगो के हत्या के आरोपियो का कोर्ट ने सजामुक्त किया है। कोई सवाल नहीं उठा खबरे भी प्रमुखता से प्रकाशित नहीं की गई। आखिर क्यो ? इन घटनाओं में स्वर्ण सामंती ताकतो का हाथ था। ब्रहमेश्वर मुखिया की हत्या के बाद तमाम चैनलो सरकार से ज्वाब मांगा। बिहार के अखबारो ने 300 हत्या के आरोपी रहे ब्रहमेश्वर मुखिया को गांधीवादी तक लिख दिया। वहीं जब इनके अंतिम संस्कार में रणबीरिया गुडो की गुंडागर्दी के खिलाफ भी हंगामा नहीं हुआ। आखिर क्यों ?जातीय नजरिये से रिपोर्टिग करने से क्या हो जायेगा। जनता का विश्वास सरकार पर से उठ जाएगा। ऐसा नहीं होगा। सच तो यह है कि बिहार की जनता को मीडिया पर भरोसा ही नहीं है। वह जानती है कि खबरों का राजनैतिक विशलेषण क्या है ?

रणवीर सेना के संरक्षक सुशील मोदी से चंद सवाल

- नवल किशोर कुमार

बिहार की वर्तमान राजनीति में चाणक्य की उपाधि भले ही नीतीश कुमार को मिली हो, लेकिन असली चाणक्यगिरी तो आप ही जानते हैं। आज आज पर शहाबुद्दीन और राजबल्लभ यादव की जमानत पर सवाल उठाते हैं तो लगता है कि काश फिर से बीता समय लौट पाता। तब आप बिहार के उपमुखिया थे। आपकी याददाश्त कमजोर नहीं है, इसलिए कहा जा सकता है कि फारबिसगंज पुलिस गोलीकांड आपको अभी तक याद ही होगा। जिस दिन घटना घटी थी उसके दो दिन पहले आप फारबिसगंज गये थे। अपने पालतु अशोक अग्रवाल से मिलने। तब वहां के डीएम और एसपी को आपने क्या निर्देश दिया था, यह आप इस जीवन में तो नहीं ही बता सकते हैं।

खैर आपको कोबरा पोस्ट का सनसनीखेज खुलासा याद है न? रणवीर सेना को संरक्षित करने में आपकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी। मुझे तो बड़ा आश्चर्य हुआ था जब आपने कोबरा पोस्ट के खिलाफ मानहानि का मुकदमा नहीं ठोंका था। कहीं ऐसा इसलिए तो नहीं हुआ कि कोबरा पोस्ट की रिपोर्ट सही थी? इसका जवाब भी आप शायद ही दें। चलिए इसी सवाल का जवाब दे दिजीये कि जैसे ही आप सत्ता में आये थे तब अमीरदास आयोग को भंग क्यों किया गया?

यह जानते हुए कि आप आरएसएस के पक्के वाले संतान हैं और हर सवाल के बदले सवाल करना आपकी मूल खासियत है, इसके बावजूद चूंकि आज आप सवाल पूछ रहे हैं तो यह सवाल तो बनता ही है कि बथानीटोला, बाथे, मियांपुर, नगरी, शंकरबिगहा आदि नरसंहारों के आरोपियों को जब पटना हाईकोर्ट ने बरी किया तब आपकी जुबान पर ताला क्यों पड़ा था?

चलिए आपके वर्तमान बयानों से एक बात साफ होती दिख रही है। किसी को जमानत मिले या नहीं मिले, सजा मिले या नहीं मिले, बरी हो या सजा पाये, इन सबके पीछे सरकार की भूमिका भी होती है। इस आधार पर पूर्व के फैसलों को लेकर कटघरे में तो आप भी खड़े हैं। लेकिन मुझे हंसी भी आती है आपकी सोच पर। आप कहते हैं कि जब रॉकी की बेल की पैरवी वाई वी गिरि जैसे जाने माने वकील कर रहे थे तो विरोध में एपीपी को क्यों खड़ा किया गया? आपकी जानकारी दाद देने योग्य है, लेकिन अधूरी है। वाई वी गिरि किस तरह के वकील हैं, बिहार की जनता भले न जाने, लेकिन सत्ता के गलियारे में सभी जानते हैं। आपके कई निजी मामलों में उनकी भूमिका।

खैर बिहार का बच्चा-बच्चा जानता है कि रणवीर सेना और आपके बीच क्या संबंध रहे हैं। आपके दुलरूओं को किसी प्रकार की सजा न मिले, इसके लिए सारे तिकड़म आपने किये या किसी और ने। याद रखिए। सवाल तो लोग पूछेंगे ही। फिर चाहे आपको मिर्ची लगे या रसगुल्ला खाने का अहसास हो।

राहे-बाटे : इन दिनों बहुत खुश हैं एक सज्जन वामपंथी

दोस्तों, पूरा मामला बहुत दिलचस्प है। दिलचस्प इसलिए कि पूरा मामला एक सज्जन इंसान का है जिन्हें जन्मजात वामपंथी कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। नौजवान हैं और आये दिन पटना की सड़कों पर वामपंथी साहित्य के जरिए वामपंथ का प्रचार-प्रसार करते हैं। उनकी वेशभूषा भी वामपंथ के जैसे वैसी ही होती है कि दूर से ही पहचान में आ जाते हैं।  कहने की जरूरत नहीं है कि उनका जीवन संघर्ष से पूर्ण है। चुनौतियां भी अनंत हैं लेकिन कभी चेहरे पर जाहिर नहीं होने देते। यही उनकी खासियत है।

लेकिन इन दिनों उनके चेहरे पर दूसरी चमक है। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की लगातार दूसरी हार के बावजूद उनके चेहरे पर खुशी की वजह भी बहुत अलग है। पूछने पर कृत्रिम तरीके से झेंपते हुए बताते हैं कि पत्नी को सिपाही की नौकरी मिल गयी है। मतलब अब घर-परिवार चलाने में कोई परेशानी नहीं होगी। इस विश्वास के कारण उनका रंग-ढंग भी बदला है। क्लीन शेव और चकाचक कपड़े इसका अच्छा प्रमाण देते हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी दुविधाओं का अंत हो गया है। सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वे अब करें क्या? पत्नी सरकारी नौकरी पा गयी है और वह भी सिपाही की। जबकि  वे स्वयं सूबे में पुलिस द्वारा की जाने वाली बर्बरता के कट्टर विरोधी रहे हैं। इसके अलावा वामपंथी होकर सरकार प्रदत्त खुशी का आनंद लें भी तो कैसे। उनकी यह दुविधा भी बेहद दिलचस्प है।

हालांकि पूछने पर स्वयं ही वामपंथ का भविष्य अंधकारमय होने की बात भी करते हैं। कहते हैं कि वामपंथ के शीर्ष नेताओं ने वामपंथ को जीते जी मार दिया। आज भी वे वहीं अटके हैं जहां से नक्सलबाड़ी आंदोलन शुरू हुआ था। जबकि तबसे लेकर अबतक गंगा और यमुना में बहुत पानी बह चुका है। मुद्दे बदल गये हैं। लोगों की सोच बदली है। इसलिए आम जनता के पक्ष से लड़ने के एजेंडों में भी बदलाव होने चाहिए।

बहरहाल पूरी मासूमियत के साथ बताते हैं कि उनकी पत्नी पहले भी उनके विचारों से सहमत नहीं थी। विधानसभा चुनाव और इसके पहले भी हुए चुनावों में उनकी पत्नी ने जदयू के तीर छाप को अपना समर्थन न केवल दिया था बल्कि अपनी सखी-सहेलियों को इसके लिए प्रेरित किया था। खैर, नेताजी अब बहुते खुश हैं। जाहिर तौर पर खुशी की बात भी है।

खास खबर : शराबबंदी ने बदली बिहार की सूरत, महिलाओं की स्थिति में हुआ सुधार, एनएचएफएस - 4 की रिपोर्ट, घरेलू हिंसा के आंकड़ों में हुई कमी

केंद्र सरकार की एजेंसी एनएचएफएस के चौथे चरण के सर्वे की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में शराबबंदी का सकारात्मक असर होने लगा है। एनएचएफएस की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015-16 में ग्रामीण इलाकों में पतियों के द्वारा मारपीट की शिकायत 59 फीसदी महिलाओं ने की थी। जबकि शहरों में ऐसी महिलाओं की संख्या 43.2 फीसदी थी। वहीं वर्तमान वित्तीय वर्ष यानी जबसे शराबबंदी लागू किया गया है तब से इनकी संख्या में कमी आयी है।

मसलन इस वर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में अपने पतियों के द्वारा मारपीट किये जाने की शिकायत करने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 16 फीसदी की कमी आयी है। वहीं शहरी इलाकों में 20 फीसदी की कमी दर्ज की गयी है। सबसे दिलचस्प परिवर्तन शराब पीने वाली महिलाओं के आंकड़ों में आया है। हालांकि सूबे में पूर्ण शराबबंदी लागू है, इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में अल्कोहल का सेवन करने वाली महिलाओं की संख्या 0.3 फीसदी और शहरों में 0.2 फीसदी रही। जबकि पिछले वर्ष ये आंकड़े क्रमश: 1 फीसदी और 0.2 फीसदी थी।

शराबबंदी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता दिख रहा है। एनएचएफएस की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015-16 में 45 फीसदी ग्रामीण महिलाओं के बॉडी मास इंडेक्स सामान्य मानक से कम था। सामान्य मानक 18.5 किलोग्राम प्रति मीटर है। वहीं वर्तमान वर्ष में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली महिलाओं की संख्या 31.8 फीसदी बतायी गयी है। वहीं वर्ष 2015-16 में 30.4 फीसदी महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम था तो इस बार इन महिलाओं की संख्या 22.2 फीसदी रही। ऐसे ही परिवर्तन पुरूषों के बॉडी मास इंडेक्स में भी आया है जो राज्य सरकार की योजना की सफलता की बानगी कही जा सकती है।

बहरहाल एनएचएफएस के आंकड़े एनएसएसओ यानी नेशनल सैंपल सर्वे के द्वारा दिये गये आंकड़ों पर आधारित होते हैं। इन आंकड़ों से पृथक सूबे में शराबबंदी को लेकर जहां एक ओर राजनीतिक सवाल खड़े किये जा रहे हैं तो दूसरी ओर गांवों में समृद्धि बढ़ी है। आने वाले समय में मानव विकास के विभिन्न आंकड़ों में बदलाव और दिखेंगे। एनएचएफएस के आंकड़े इसके संकेत अवश्य देते हैं।

संपादकीय : बिहार का अपमान करने वालों का हो विरोध

दोस्तों, एक बार फिर एक भाजपाई मंत्री ने बिहार का अपमान किया है। सोमवार को केंद्रीय मंत्री नीतिन गडकरी ने एनएच-28 सहित अनेक सड़कों का लोकार्पण करने के बाद अपने संबोधन में कहा कि बिहार मांगते-मांगते थक जाएगा। लेकिन केंद्र नहीं थकेगा। गडकरी के इस कथन में बिहार का अपमान निहित है। इसकी वजह यह है कि देश में संघीय व्यवस्था है और संसाधनों के वितरण हेतु एक व्यवस्था है। इसी व्यवस्था को पहले योजना आयोग कहा जाता था और अब इसे नीति आयोग की संज्ञा दी गयी है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब भाजपा नेताओं ने बिहार का अपमान किया है। गडकरी से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने पीएम पद की मर्यादा को तार-तार करते हुए बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए बिहार के लिए डेढ़ लाख करोड़ रुपए के महापैकेज की घोषणा की थी। उस समय उन्होंने जनसभा में बिहार की बजाप्ता बोली लगायी थी। 25 करोड़ रुपए से लेकर डेढ़ लाख करोड़ तक।  प्रधानमंत्री से भी पहले भाजपा के कृषि प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान में हरियाण मंत्रिमंडल में मंत्री ओ.पी. धनखड़ ने हरियाणा चुनाव के दौरान कहा था कि यदि हरियाणा में भाजपा जीती तो हरियाणा के कुंवारे नौजवानों की शादी बिहार से लड़कियां लाकर कर दी जाएगी।

मुद्दा एक बार फिर से वहीं है कि भाजपाई कबतक बिहार का अपमान करते रहेंगे और कबतक बिहार के लोग अपना अपमान सहते रहेंगे। वजह यह कि बिहार का अपमान भले ही राजनीतिक लाभ-हानि के लिए किया गया हो, लेकिन सबसे अधिक आहत बिहार की जनता होती है। राज्य सरकार को गडकरी सरीखे नेताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि राज्य सरकार ऐसे नेताओं की बदजुबानी के खिलाफ न्यायालय में याचिका दाखिल करे। आखिर इन बयानों से बिहार के जनमानस की भावना आहत होती है।

अपनी बात : मैं यक्षिणी नहीं भारत की नारी हूं…

मैं उस देश की नारी हूं, जहां महिलाओं के लिए एक से बढकर एक उपमा दिये जाते हैं। लेकिन हकीकत में हम महिलायें केवल भोग्या हैं। सौ साल पहले पटना के दीदारगंज में मुझे खोदकर निकाला गया था। लेकिन मेरा जन्म तो बहुत पहले हो गया था। किस मूर्तिकार ने किस राजा के कहने पर मुझे गढा, अब यह तथ्य मेरी स्मृति में नहीं है और न ही अब मैं इसकी कोई जरुरत समझती हूं। वजह यह कि तब से लेकर आज तक युग भले बदला हो, स्त्रियों की स्थिति वही है।

अक्सर मुझे खुद आश्चर्य होता है कि मैं यक्षिणी कैसे बन गयी? मैं तो एक स्त्री हूं। एक दासी स्त्री। जिसका काम चांवर हिलाने का था। पता नहीं मेरे सुंदर नितंबों को देखकर आज की पीढी क्या सोचती है, लेकिन उन दिनों जब मुझे गढा जा रहा था, मैंने सोचा था इस बारे में। लेकिन तब कपड़े कहां होते थे। सोने की चिड़िया कहने का दंभ भरने वाले इस देश में पुरुषों के पास भी कपड़े नहीं थे। हां सोने-चांदी जरुर थे।

मेरी उत्पत्ति की वजह क्या रही, इसका विश्लेषण आज के संदर्भ में करना अधिक जटिल नहीं है। असल में मैं अकेली नहीं थी। मेरे सामने एक पुरुष राजा अपनी पत्नी के साथ क्रीड़ायें कर रहा था और मैं दोनों को चांवर हिला रही थी या फ़िर मुझे दरबार में राजा का चांवर हिलाते समय बनाया गया, अब यह भी याद नहीं है।

आज जब महिलाओं को देखती हूं तो लगता है कि पहले के समय में और आज के समय में कोई फ़र्क नहीं है। अंतर केवल इतना है कि पहले मुझे सार्वजनिक स्तर पर अर्द्धनग्न देखने की हिम्मत पुरुषों में होती थी और अब वे चोरी-चोरी करते हैं। बाकी सब वैसा ही है। पहले भी महिलायें सत्ता में अप्रत्यक्ष तौर पर भागीदार होती थीं और वे आज भी इसी भूमिका में हैं।

बहरहाल एक बार फ़िर मुझे यक्षिणी कहने वाले इंसान के लिए। मैं कोई देव नगरी की परिचारिका नहीं बल्कि इसी देश की एक बेटी हूं, बहन हूं, मां हूं और इन सबसे बढकर महिला हूं। मेरा अपना अस्तित्व है। हम यक्षिणी नहीं, महिलायें हैं। जीवित महिलायें…

अपनी बात : एक देश-एक कानून को छोड़िये, दहेज पर लगाइये पाबंदी

दोस्तों, किसी भी परिस्थिति में कानून की मूल में जो भावना होनी चाहिए, वह यही है कि वह सबके लिए बराबर हो। किसी भी प्रकार का भेद नहीं हो। फ़िर चाहे कोई राजा हो या रंक। हिन्दू हो या मुसलमान। देश में मौजूदा संविधान में भी मूल रुप से यही भावना है। लेकिन चूंकि देश में धर्म निरपेक्षता है और इसलिए धर्म संबंधी मामलों के लिए अलग से विशेष प्रावधान किये गये हैं।

हिन्दू पर्सनल ला और मुस्लिम पर्सनल ला। इनके जरिए संविधान में व्यवस्था की गयी है ताकि लोग अपना जीवन अपने-अपने धर्म के हिसाब से जियें। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में कई बार मामले आये हैं जब इन विशेष कानूनों में बदलाव की बातें उठी हैं। एक बार फ़िर से इन कानूनों को रद्द कर एक देश-एक कानून बनाने की बात हो रही है। इसके लिए जो हथियार उपयोग में लाया जा रहा है, वह इस्लाम में तीन बार तलाक कह देने से तलाक की प्रथा है।

वैसे आज के दौर में तलाक किसी भी धर्म के लोगों के लिए कोई नयी बात नहीं है। सभी धर्मों में तलाक लेने और देने का प्रावधान है। फ़िर चाहे वह हिन्दू हो या इस्लाम। लेकिन इस्लाम में भिन्नता है। इस्लाम धर्मगुरुओं के मुताबिक उनके धर्म में तीन बार तलाक कहना जरुरी है। दिलचस्प यह कि यह अधिकार केवल पुरुषों को हासिल है। महिलाओं के लिए यह प्रक्रिया बहुत जटिल है। वहीं धर्मगुरू यह भी बताते हैं कि तीन बार तलाक कहने की प्रक्रिया कोई तानाशाही प्रक्रिया नहीं है। इसके तहत यदि कोई अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता है तो उसे तीन बार तलाक एक-एक महीने के अंतराल पर देना होगा। महीने का आकलन संबंधित महिला के मासिक चक्र से संबंधित है। यानी इस प्रक्रिया में व्यवस्था की गयी है कि कोई भी दंपत्ति तीन महीने के अंदर अपने रिश्ते सामान्य कर ले। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें एक-दूसरे से अलग होने का अधिकार है।

वहीं यह भी सच है कि कई मामलों में लोगों ने इस प्रथा को मजाक बनाकर रख दिया। किसी ने एसएमएस के जरिए तलाक दे दिया तो एक ने तो सपने में तीन बार तलाक कहा और धर्मगुरुओं ने उसे जायज करार दे दिया। ऐसी घटनायें अपवाद कही जानी चाहिए और इन मामलों में हस्तक्षेप जरुरी है। लेकिन इस्लाम में तीन बार तलाक की प्रक्रिया को पूर्णतः नाजायज करार देना सही नहीं है। हालांकि इसमें महिलाओं को पूर्ण अधिकार मिले, इसके लिए प्रावधान हो, न्यायपालिका को धर्मगुरुओं से मिलकर पहल करनी चाहिए।

बहरहाल विभिन्नता वाले इस देश में खासकर लोगों के व्यक्तिगत मामलों में एक कानून की व्यवस्था करना उनकी भिन्नता को समाप्त करने जैसा है। कोई भी यह तर्क बड़ी आसानी से दे सकता है कि आज तलाक देने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया जा रहा है। कल शादी की प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किया जा सकता है। जिन देशों में तीन तलाक पर पाबंदी की बात कही जा रही है, वहां यह समस्या नहीं है। वे देश धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं हैं। वहां हमारे देश के जैसा भिन्नता नहीं है। रहा सवाल कुछ खत्म करने का तो सबसे जरुरी दहेज प्रथा को खत्म करना है। इस दहेज की आग में सबसे अधिक हिन्दू बेटियां हर साल जिंदा जला दी जाती हैं। मुसलमानों में भी दहेज प्रथा अब खतरनाक बनता जा रहा है। वैसे कानून के हिसाब से दहेज लेना और देना दोनों प्रतिबंधित है। लेकिन इसके बावजूद यह निर्बाध जारी है। क्या यह बड़ा सवाल नहीं है?

नौजवान दिखा रहे जीवन की राह

पटना(अपना बिहार, 16 अक्टूबर 2016) - बिहार देश के उन प्रांतों में शामिल है जहां प्राकृतिक आपदाओं की संभावना सबसे अधिक है। फिर चाहे वह भूकंप हो, बाढ़ हो या फिर अगलगी हर साल बड़ी संख्या में लोग हताहत होते हैं। कई बार तो लोगों की जान इसलिए चली जाती है क्योंकि समय पर उन्हें सहायता नहीं मिल पाती है। खासकर सुदूर के इलाकों में यह समस्या अधिक सामने आती है। वहीं राजधानी पटना को छोड़ अन्य जिलों के शहरी इलाकों में भी सरकारी आपदा विभाग की नींदें तभी खुलती हैं जब लोगों का आशियाना लूट चुका होता है। ऐसे में स्थानीय लोगों में जागरूकता हो कि आपदा की स्थिति में अपनी और दूसरों की जान कैसे बचायी जाय, राजधानी पटना के एक स्वयंसेवी संगठन के युवा कार्यकर्ता मुहिम चला रहे हैं। इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण दो बच्चियों द्वारा तैयार किया साइकिल एम्बुलेंस है।

इस एम्बुलेंस की खासियत यह है कि दो साइकिलों से तैयार इस एम्बुलेंस को चलाने के लिए दो चालकों की आवश्यकता होती है। भीड़ में निकलने में आसानी हो, इसके लिए साइकिल सवार अपनी पीठ पर सायरन भी ढोती हैं। इस संबंध में इस पूरी मुहिम के  नेतृत्वकर्ता प्रभाकर कुमार के सूबे में प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले जानमाल के नुकसान को न्यून करने के मकसद से उनलोगों ने जनजागरूकता का अभियान चलाया है। कोशिश चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में यह अभियान पिछले वर्ष नवंबर से जारी है और अबतक राजधानी पटना के विभिन्न इलाकों में लोगों को प्राकृतिक आपदा से निपटने के स्थानीय उपाय बताये गये हैं।

प्रभाकर के मुताबिक किसी भी आपदा के समय सबसे बड़ी परेशानी समझदारी से काम नहीं लेना होता है। इसलिए हमारी कोशिश यह होती है कि हम लोगों को यह समझा सकें कि आपदा की स्थिति में बचाव तभी संभव है जब इंसान धैर्य के साथ काम ले। इसके बाद सबसे जरूरी चीज उपलब्ध सामानों को एकत्रित करना होता है। मसलन बाढ़ के समय केले के तने का इस्तेमाल कर या फिर ड्रम का उपयोग कर नाव बनाया जा सकता है। इसके अलावा अगलगी के समय खुद को झुलसने से बचाने के उपाय क्या हो सकते हैं, इन सबके बारे में हम लोगों को जागरूक करते हैं।

प्रभाकर बताते हैं कि साइकिल एम्बुलेंस के पीछे भी यही सोच है कि कोई भी आपदा होने की स्थिति में बजाय इसके कि एम्बुलेंस का इंतजार किया जाय, जुगाड़ टेक्नोलॉजी का उपयोग कर भी पीड़ित को अस्पताल पहुंचाया जा सकता है। कोशिश चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा चलाये जा रहे इस मुहिम को बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार के उपाध्यक्ष व्यासजी भी सराहना करते हैं। उन्होंने कहा कि यह राज्य के हर व्यक्ति का परम कर्तव्य है कि आपदा की स्थिति में वह अपनी रक्षा तो करे ही, साथ ही अपने आस पड़ोस के लोगों को भी बचाये। इसके लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार द्वारा बच्चों में इसके लिए जागरूकता हेतु मुख्यमंत्री स्कूल सुरक्षा योजना चलायी जा रही है। इसके तहत अबतक चार सौ स्कूलों में बच्चों को आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

संपादकीय : सभी के लिए महंगी पड़ेगी यूपी की हार

दोस्तों, एक बार फ़िर यूपी में विधानसभा चुनाव होने को हैं। देश का सबसे बड़ा प्रांत होने के कारण यूपी पर सभी की निगाहें रहती हैं। एक समय वह भी था जब यह माना जाता था कि यूपी फ़तह करने वाली पार्टी ही देश पर राज करती थी। यही वजह रही कि सबसे अधिक प्रधानमंत्री उत्तरप्रदेश के रहे। लेकिन अब हालात बदले हैं। इसके बावजूद यूपी का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है।

इस बार चुनौतियां सभी के सामने हैं। मसलन सत्तासीन समाजवादी पार्टी के सामने अपना अस्तित्व बचाये रखने की चु्नौती है। हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर धर्म निरपेक्ष दलों के विलय की प्रक्रिया शुरु हुई थी और लालू-नीतीश जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों ने मुलायम सिंह यादव को अपना नेता माना था। लेकिन मुलायम सिंह ने ऐन वक्त पर इससे किनारा कर लिया था। परिणाम यह हुआ है कि मुलायम सिंह आज अकेले पड़ गये हैं और उन्हें बसपा के साथ ही भाजपा की आक्रामक शैली का अकेले मुकाबला करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं अपनी पार्टी को पूरी तरीके से पारिवारिक पार्टी बना देने वाले मुलायम अपने ही परिवार के सदस्यों के बीच ऐंठन के शिकार भी हो रहे हैं। अब तो उन्होंने साफ़ कर दिया है कि यूपी में अगर उनकी पार्टी जीती तो मुख्यमंत्री कोई और होगा। हालांकि इस पूरे विवाद को एक फ़िक्स्ड मैच भी माना जा सकता है क्योंकि अब समाजवादी पार्टी को पारिवारिक पार्टी की छवि से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता यही है।

लंबे समय से यूपी की सत्ता में वापसी का ख्वाब संजो रही भाजपा के लिए भी कम चुनौतियां नहीं हैं। उसने जातिगत समीकरणों का ख्याल रखते हुए केशव प्रसाद मौर्य जैसे विवादित नेता को अपना सिरमौर माना है। उनकी ताजपोशी यूपी के भाजपाई ब्राह्म्णों और ठाकुरों को सीधे तौर पर नहीं भा रही है लेकिन पिछड़े वर्ग के वोटों के लोभ में वे सब सहने को तैयार हैं। वहीं अमित शाह ने स्वयं इस पूरे प्रदेश की राजनीति को सीधे अपने हाथ में रखा है। लिहाजा समझा जा सकता है कि यूपी भाजपा के लिए कितना महत्व रखता है।

जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए यूपी का यह चुनाव अंतिम मौके जैसा है। यदि इस बार वह चूक गयीं तो उनके लिए वापसी का मार्ग आसान नहीं होगा। इसकी दो वजहें हैं। पहली वजह तो यही कि बसपा अब अपना राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत खोने लगी है और केवल यूपी में सिमट कर रह गयी है। एक समय था जब कांशीराम के कारण दलित राजनीतिक चेतना का असर देश के कई राज्यों में दिखने लगा था। पंजाब से लेकर बिहार और महाराष्ट्र तक। मायावती के समक्ष इस बार केवल अपनी कुर्सी बचाने की जवाबदेही मात्र नहीं है, बल्कि उन्हें दलित राजनीति की साख को भी बचाना है। वजह यह है कि रामदास अठावले, उदित राज और रामविलास पासवान जैसे दलित धुरंधर आरएसएस की गोद में किलकारियां मार रहे हैं।

बहरहाल कांग्रेस की छटपटाहट भी उसके अस्तित्व को बचाये रखने की जद्दोजहद सरीखा है। पिछड़े वर्ग के राज बब्बर को पार्टी की कमान सौंपकर उसने भाजपा को चुनौती देने का साहस किया है, जबकि शीला दीक्षित को अपना चेहरा बनाकर ब्राह्म्णों में सत्ता की भूख को जगा दिया है। नतीजतन नतीजा सचमुच दिलचस्प होगा। इसकी पूरी संभावना है।

सड़क निर्माण को नया मिला आयाम, युवा सोच ने बदली दिशा

पटना(अपना बिहार, 14 अक्टूबर 2016) - नीतीश सरकार के वर्तमान मंत्रिमंडल में सबसे कम उम्र के होने के बावजूद उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने विभागों का कायाकल्प कर दिया है। उनकी युवा सोच के कारण सूबे में सड़क निर्माण को नया आयाम मिला है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भविष्य की आवश्यकताओं को समझते हुए उन्होंने राज्य के सभी स्टेट हाइवे को सात मीटर चौड़ा करने का संकल्प लिया है। अपने संकल्प को गति देते हुए उन्होंने कार्ययोजना बनाकर काम करना शुरू किया। नतीजतन सात मीटर चौड़ा करने का काम विभिन्न चरणों में हो रहा है. बिहार राज्य उच्च पथ परियोजना के तहत सड़कों का निर्माण हो रहा है।

पथ निर्माण विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक अगले साल तक राज्य के चार  स्टेट हाइवे को सात मीटर चौड़ा करने का काम पूरा हो जायेगा। वहीं स्टेट हाइवे 78 बिहटा से सरमेरा, स्टेट हाइवे 81 सक्कडी से नासरीगंज, स्टेट हाइवे 90 मोहम्मदपुर-छपरा व स्टेट हाइवे 87 रून्नीसैदपुर-भीसवा सड़क का निर्माण पूरा होगा। इन सड़कों के निर्माण पर लगभग 2200 करोड़ खर्च हो रहा है।

महत्वपूर्ण यह है कि बिहार में आधारभूत संरचना के विकास में अंतरराष्ट्रीय संस्थायें भी आगे आ रही हैं। मसलन बिहार राज्य उच्च पथ परियोजना के तहत इन सड़कों का निर्माण एडीबी के सहयोग से हो रहा  है। बिहार राज्य पथ विकास निगम की देखरेख में तीनों सड़क का निर्माण काम हो रहा है। इस प्रकार राज्य के किसी भी कोने से पांच घंटे में पटना पहुंचने के लक्ष्य को मान कर सड़कों का निर्माण हो रहा है।

सूबे में चल रहे महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं में बिहटा से सरमेरा पथ भी शामिल है। विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक बिहटा से दनियावां व चंडी से सरमेरा बचे हुए काम को पूरा करने का काम हैदराबाद की कंपनी बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कर रही है।  इस सड़क के निर्माण पर लगभग लगभग 1117  करोड़ खर्च अनुमानित है। अगले साल सितंबर 2017 तक सड़क निर्माण का काम पूरा होने की संभावना है। उसी प्रकार स्टेट हाइवे 90 मोहम्मदपुर से छपरा 64 किलोमीटर सड़क को सात मीटर चौड़ा करने का काम गुड़गांव की कंपनी  गेवार कंस्ट्रक्शन लिमिटेड को मिला है। सड़क निर्माण पर 361 करोड़ खर्च अनुमानित है। सड़क का निर्माण दिसंबर 2017 तक पूरा होगा।  जबकि स्टेट हाइवे 81 सक्कडी से नासरीगंज के बीच 83 किलोमीटर सड़क का निर्माण दो  एजेंसी मिल कर रही है। सक्कडी से सहार तक 44 किलोमीटर सड़क का निर्माण हैदराबाद की कंपनी बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को मिला है। जबकि सहार से नासरीगंज खंड पर लगभग 39 किलोमीटर सड़क का निर्माण हरियाणा की कंपनी एमजी कंस्ट्रक्शन लिमिटेड कर रही है। इस सड़क के निर्माण पर 307 करोड़ खर्च अनुमानित है.  निर्माण काम नवंबर 2017 तक पूरा होना है। वहीं स्टेट हाइवे 87 रून्नीसैदपुर-भीसवा के बीच 68 किलोमीटर सड़क का निर्माण संयुक्त रूप से गुड़गांव की कंपनी बीएससी व सीएंडसी कर रही है। सात मीटर चौड़ा सड़क निर्माण पर 443 करोड़ खर्च होंगे।

पथ निर्माण विभाग की कार्य संस्कृति पर उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की कार्यशैली का असर हुआ है। उनके निर्देश पर कई स्तरों पर परियोजनाओं की मानिटरिंग की जा रही है। मसलन अगर योजना बंद है तो उसपर कितना खर्च हो चुका है। कितना वसावट सड़क से जुटा है और कितना छूटा हुआ है।

पटना की यक्षिणी ने लिखा बेटियों के नाम खुला ख़त

प्यारी बेटियों

आज तुमसब से कुछ ज़रूरी बात करना चाह रही हूँ.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में छऊ सीखते हुये पैर तोड़कर मेसोनिक क्लिनिक, जनपथ दिल्ली के  आर्थोपेडिक से मिली तो हम दोस्त बन गए. उन्हें नाटक देखना बहुत पसंद था इसलिए अक्सर नाटक देखने आते थे. एक दिन डॉक्टर नरेन ने मुझसे पूछा कि अकेली औरत होते हुए क्या दिक्क़तें आईं ?

मैंने कहा- वही जो पूरे युनिवेर्स की औरतों को.....

उन्होंने हँसते हुए कहा -  वाह! बहुत आसान जवाब है.

हाँ, जवाब आसान भी है और मुश्किल भी. अकेली औरत और ऊपर से मैंने पत्रकारिता, साहित्य, रंगमंच और सिनेमा सभी क्षेत्र में काम किया है. बहुत कुछ जानती हूँ. तो मेरे अनुभव भी औरों से ज़रा हट के होंगे न ....

एक बार एक नाती-पोते वाले एन.आर.आई. ने प्रस्ताव रखा कि विदेशों में तो अभिनेत्रियाँ अपने से बड़े उम्र के किसी अमीर और फेमस आदमी से शादी कर लेती है. और ज़िन्दगी ऐश से गुज़ारती है. हीरे की अंगूठी मेरे सामने पेश कर दिया.

मैंने कहा –  नहीं ले सकती. आपके प्रस्ताव और सुझाव से पहले ऐसा कर चुकी हूँ.

वे चौंके ?

मैंने कहा – हाँ, मैं अपने से उम्र में लगभग 25 साल बड़े मशहूर कवि से शादी करके चुकी हूँ लेकिन ऐश नहीं कर रही. संघर्ष कर रही हूँ और अपना काम कर रही हूँ.  

तुमलोग बड़ी हो रही हो. तुमलोगों के सामने भी कई ऐसे प्रस्ताव आयेंगे/आते होंगे. 

हमारे सामज में कुछ साहित्यकार, पत्रकार, वरिष्ठ रंगकर्मी और फ़िल्म निर्देशकों ने कुछ ऐसे जोड़ों के नाम रट लिए हैं जिनके रिश्ते में उम्र का फ़ासला रहा है. जैसे चेख़व (रशियन लेखक और नाट्यकार) और अभिनेत्री ओल्गानिपर, चार्लिन चैपलिन और ओना ऑलिन, टॉम क्रूज़ और कैटी होल्म्स, दिलीप कुमार और शायरा बानो.... ऐसे नामों को गिना कर लड़कियों कहते हैं - बहुत अकेला हूँ और  गाना सुनाते हैं – ‘न उम्र की सीमा हो न जन्म का बंधन हो....’

यह नहीं कहती कि ऐसे रिश्ते ग़लत हैं लेकिन सही भी नहीं है. ख़ास कर जब कुछ चालाक प्राणी द्वारा फासने के लिए सिर्फ़ तुम्हारा ब्रेन वाश करके या हिप्नोटाइज़ करके ऐसे रंगीन/रूमानी रिश्तों के सपने दिखाए जाते हैं.  हकीकत में यह रिश्ते उतने रूमानी नहीं होते.... जितना होना चाहिए. कोई भी फ़ासला इतना आसान नहीं होता कि उसे आसानी से पाटा जाए इसके लिए बहुत समझदारी और परिपक्वता की ज़रूरत होती है.

जब मॉल जाती हो अपने लिए कपड़े लेती हो इतना देखकर, सोच समझकर फ़ैसला लेती हो तो शादी तो ज़िंदगी का सबसे अहम फ़ैसला है. उसके बारे में गंभीरता से सोचोगी न?

लोग रूमानी बातें करके तुम्हें फांस तो लेंगे बहुत कम ही उसे निभा पाते हैं. अभी हाल ही में एक बुद्धिजीवी/पत्रकार/कवि जिनकी मृत्यु हो गयी. लोग कहते हैं - 'उम्र के आखरी पड़ाव पर उनकी पत्नी ने उनकी भूमिका लिख दी इसलिए मर गए.'

ऐसा भी नहीं है जो शादियाँ बराबरी के उम्र में होती हैं वो नहीं टूटती.  टूटना कुछ भी बुरा होता है...  रिश्ता कोई भी हो खत्म होने के लिए तो जोड़े नहीं जाते..... और जब वो टूटता है या खत्म होता है तो बहुत दर्द होता..... बहुत तकलीफ़ होती है..... ऐसा दंश है जो जीवन भर सालता है.....

गुलज़ार की फ़िल्म ‘इजाज़त’ में अभिनेत्री कहती है – “जब शादी मर जाती है तो उससे बदबू आने लगती है.”

अपनी ज़िन्दगी का हर फैसला लेने के लिए तुम सब आज़ाद हो लेकिन फ़ैसला अपने दिल और दिमाग़ से लेना ऐसा नहीं कि कोई तुमपर ऐसे फ़ैसले के लिए हावी हो रहा है. रूमानी बाते अच्छी लगती है लेकिन यह बातें हैं, बातों का क्या? जब तुम लीक से हट कर चलती हो और अपनी ज़िन्दगी का ऐसा कोई फ़ैसले करती हो तो तुम्हारी जिम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती है कि जो तुम मिसाल क़ायम करने जा रही थी उसमें कितनी कामयाब हुई? कहीं मज़ाक़ बनकर न रह जाओ.

मेरी एक बात हमेशा याद रखना ज़िन्दगी में हमसफर ऐसा चुनना जो तुम्हारी इज्ज़त करे. जिस पर तुम्हें तो क्या दुनिया को नाज़ हो वरना लोग यह भी कहेंगे किसे चुन लिया और तुम्हें कभी अपने फ़ैसले पर अफ़सोस न हो ....

ख़ुश रहों....

खुल कर जियो...

ज़िन्दगी की हर खुबसूरत चीज़ पर तुम्हारा हक़ है...

प्यार

असीमा भट्ट

बिहार की मुसलमान बेटी ने विश्व में नाम किया रौशन, मंत्री ने दिया सम्मान

पटना(अपना बिहार, 9 अक्टूबर 2016) - बेलारूस के मिंस्क में आयोजित वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप 2016 में 40 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली सुपौल की बेटी सफीना परवीन को कला संस्कृति एवं युवा मामलों के मंत्री शिवचंद्र राम ने शॉल और बुके देकर सम्मानित किया। श्री राम ने सफीना को सम्मानित करते हुए उसे बधाई दी और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस मौके पर शिवचंद्र राम ने कहा कि सफीना की मेहनत, लगन, निष्ठा और जीत पर देश को गर्व है। सफीना ने देश के साथ राज्य का भी नाम रौशन किया है। साथ ही, बेटियों के लिए प्ररेणाश्रोत बनने का काम किया है। उन्होंने कहा कि बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है। बिहार के युवाओं में हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की क्षमता है। इसलिए जब  यहां के मौका लोगों को मौका मिलता है, तब वे एक कीर्तिमान स्थापित करते हैं। 

कड़वा सच : दलालों का देश बनता रहा है भारत

- नवल किशोर कुमार

दोस्तों, मगही में कहावत है। चलनी दूसे सूप के, जेकरा में हजारों छेद। इस लोकोक्ति को भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के लिए अलट-पलट कर विचार करिए। सैनिकों की शहादत पर दलाली करने का आरोप लगने पर भाजपाई भड़क उठे हैं। उन्हें यह बताना चाहिए कि कारगिल युद्ध के समय शहीदों के ताबूत की खरीद में दलाली किसने खायी थी। वहीं मसूद अजहर को छोड़ने के लिए कितनी दलाली ली गयी थी। यह भी सवाल विचार करने योग्य है। साथ ही बोफोर्स घोटाला और कृष्ण मेनन के समय के जीप घोटाला करने वाले कौन थे, यह कांग्रेस के नेताओं को भी बताना चाहिए।

खैर बात दलाली की ही करते हैं। भारतीय राजनीति के शब्दकोष में दलाली शब्द पहली बार जुड़ा जब आजादी के बाद भारत सरकार ने लंदन की एक कंपनी से 2000 जीपों का सौदा किया था। सौदा 80 लाख रुपए का था। लेकिन केवल 155 जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी के कृष्ण मेनन का नाम सामने आया। लेकिन 1955 में केस बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए।

जिन दिनों देश में जीप घोटाला सामने आया था और तत्कालीन केंद्र सरकार के होश फाख्ता थे, उन दिनों बिहार में दलाली की एक दिलचस्प दास्तान सामने आयी थी। यह दास्तान कोशी हाई डैम से जुड़ा था। बताते चलें कि आजादी के पहले भी कोशी नदी पर हाई डैम बनाने की बात शुरू हुई थी। लेकिन तब बिहार में इसका बड़ा विरोध हुआ था। विरोध की वजह यह थी कि कोशी नदी सबसे अधिक गाद लाने वाली नदी है और यदि इसकी धार को सीमित कर दिया गया तो यह अत्यंत ही भयावह स्थिति पैदा करेगी। सबसे दिलचस्प यह  कि इस आधार पर विरोध करने वालों में देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद भी थे। देश आजाद हुआ तब कांग्रेसी राज में एक बार फिर कोशी हाई डैम की बात शुरू हुई। भारत सेवक समाज के लोगों ने इसका समर्थन किया और आंदोलन चलाया। तब सहमति जताने वालों में राजेंद्र बाबू भी थे। ऐसा क्यों हुआ और जो हुआ उसे दलाली कही जा सकती है या नहीं, यह तो राजनीतिक विश्लेषक ही बता सकते हैं।

चलिए एक बार फिर देश की सुरक्षा में होने वाली दलाली की बात करते हैं। एक बड़े मामले का खुलासा 1987 में हुआ था। मामला था कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 64 करोड़ रूपयों की दलाली चुकाई। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स कांड के नाम से जाना जाता हैं। आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताए जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी।

इसी प्रकार का एक और मामला 1996-97 में सामने आया। बराक मिसाइल इस्राइल से खरीदे जाने थे। इस सौदे पर तत्कालीन डीआरडीपी अध्यक्ष अब्दुल कलाम ने आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बाद मामले में समता पार्टी पूर्व कोषाध्यक्ष आरके जैन की गिरफ्तारी हुई। इस्राइल से 1150 करोड़ रुपए में सात बराक मिसाइलें खरीदी गई थीं। इनकी खरीद में घोटाले के आरोप लगने पर सीबीआई ने 2006 में एक एफआईआर दर्ज की थी। कई आरोपियों से सीबीआई पहले ही पूछताछ कर चुकी है। तब सीबीआई ने यह सवाल भी उठाया था कि डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट आॅर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) के विरोध के बावजूद बराक मिसाइल क्यों खरीदी गई? सीबीआई का आरोप था कि 1996 में इस्राइल ने जो कीमत बताई थी, उससे अधिक कीमत पर यह खरीद हुई थी। यह भी आरोप है कि फर्नांडीज ने वैज्ञानिक सलाहकार की राय को नजरअंदाज किया। 1999 में वैज्ञानिक सलाहकार ने इस डील का विरोध किया था। सीबीआई ने डीआरडीओ और सीसीएस के विरोध संबंधी टिप्पणी को आधार बनाया और इस मामले की जांच की।

अब बात ताबूत घोटाले की। वर्ष 1999 में कारिल युद्ध में भारतीय शहीदों के शव को उनके परिजनों तक पहुंचाने के लिए ताबूत खरीदे गए। इसमें सीबीआई ने सेना के कुछ वरिष्ठ अफसर और अमेरिका के एक ठेकेदार के खिलाफ केस दर्ज किया था। मामले में तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज पर भी आरोप लगे थे। इस मामले में तहलका आॅनलाइन न्यूज पॉर्टल ने स्टिंग आॅपरेशन के जारिए आॅर्मी आॅफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई 15 डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी हुई है और इस्राइल से की जाने वाली बराक मिसाइल डील भी इसमें से एक है। तहलका की इस खोजी मुहिम आॅपरेशन वेस्ट एंड में तहलका के दो पत्रकारों को हथियारों के सौदागर के रूप में कई बड़े राजनेताओं और सेना के कुछ आला अधिकारियों को घूस देते हुए और रक्षा मंत्रालय के कई खुफिया रहस्यों पर बातचीत करते दिखाया गया था। आॅपरेशन वेस्ट एंड के पहले शिकार बने बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण। स्टिंग आपरेशन में उन्हें एक लाख रुपये की घूस लेते दिखाया गया था। शाम होते-होते उन्हें पद से इस्तीफा दे दिया। स्टिंग आपरेशन की सीडी में राजग के प्रमुख घटक दल समता पार्टी की अध्यक्ष और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज की करीबी जया जेटली को भी हथियारों के सौदागर बने पत्रकारों से बातचीत करते दिखाया गया। इसके लपेटे में समता पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष आरके जैन भी आए। स्टिंग आपरेशन में सेना के कुछ बड़े अधिकारियों के नाम आने के बाद केंद्र ने एक मेजर जनरल समेत चार वष्ठि सैन्य अधिकारियों को निलंबित कर दिया। तहलका कांड की आंच से तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज भी नहीं बच पाए थे। विपक्ष के धारदार हमले झेल रही वाजपेयी सरकार ने इस्तीफा देने से तो इनकार कर दिया था, परंतु टालमटोल कर रहे जॉर्ज को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। उनसे पहले ही उनकी पार्टी समता पार्टी की अध्यक्ष जया जेटली को भी इस्तीफा देना पड़ा था।

घोटालों का यह सिलसिला कभी नहीं रूका। 2009 में सीबीआई ने आयुध फैक्टरी बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक सुदीप्तो घोष को गिरफ्तार किया था। आयुध फैक्टरी बोर्ड रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली 40 फैक्टरियों पर नियंत्रण रखने वाली शीर्ष इकाई है। घोष ने कथित तौर पर दो भारतीय और चार विदेशी कंपनियों से रिश्वत ली थी, जिन्हें 5 मार्च को एंटनी ने ब्लैकलिस्ट कर दिया था। सरकार भारतीय वायु सेना के लिए कई अरब डॉलर में 126 नई पीढ़ी के लड़ाकू जेट खरीदने का सौदा करने ही वाली थी कि उसके एक पखवाड़े पहले 31 जनवरी को एक फ्रांसीसी हथियार कंसल्टेंट बर्नाड बैएको दिल्ली पहुंचा। उसे रक्षा अधिकारियों के साथ बातचीत में हिस्सा लेना था। लंदन से छपने वाले अखबार संडे टाइम्स ने इस दौरान एक खबर छापी जिसका शीर्षक था 'इनसाइड ए 18 बिलियन डॉग फाइट।'

अब एक मामला वर्ष 2011 का है। यह वर्तमान में विदेश राज्यमंत्री सह पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह से जुड़ा है। उन्होंने 2011 में खुलासा किया कि टाट्रा ट्रक खरीद की स्वीकृति देने के लिए उन्हें 14 करोड़ रुपए की रिश्वत की पेशकश की गई थी। 1986 में खरीदे गए 700 ट्रकों की गुणवत्ता और कीमत को लेकर उस समय भी सवाल उठे थे।

बहरहाल सच बहुत कड़वा है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह देश जितना देशभक्तों का रहा है, दलालों का भी रहा है। देश की दलाली करने वाले लोग किस खेमे के हैं, यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे दलाल समाज में बेहिचक अपनी जिंदगी पूरे सम्मान के साथ जीते हैं और कई अवसरों पर उन्हें तमगे भी मिले हैं।

सभ्यता के अस्तित्व के लिए भाषाओं को बचाये रखना जरुरी: कल्पना

दोस्तों, बिहार कई मायनों में भाग्यशाली रहा है। इस धरती ने न केवल अपनी कोख से कई महान लोगों को पैदा किया जिन्होंने समाज के हर क्षेत्र में नया कीर्तिमान स्थापित किया, बल्कि अनेक लोग जो बिहार के नहीं होने के बावजूद बिहारी अस्मिता के पर्याय बने। शिल्प एवं मूर्ति कला के भीष्म पितामह कहे जाने वाले उड़ीसा में जन्मे उपेन्द्र महारथी का नाम आज भी कला जगत में आदर के साथ लिया जाता है। गीत-संगीत की दुनिया में भोजपुरी को अलग पहचान दिलाने वाली कल्पना पटोवारी भी मूल रुप से आसाम की हैं। उन्होंने तीस से अधिक भाषाओं में लोकगीतों को अपनी आवाज दी है। लेकिन उनकी एक पहचान भिखारी ठाकुर की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढाने के कारण बनती जा रही है। द लीगेशी आफ़ भिखारी ठाकुर के जरिए कल्पना ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बिदेसिया और बेटीबेचवा का गायन किया। वर्तमान में वे "एन्थ्रोपोलाजी आफ़ बिरहा" पर काम कर रही हैं।

उनसे मुलाकात करीब पांच वर्ष पहले हुई मोबाइल पर अधूरी बातचीत का विस्तार साबित हुआ। लेकिन सवाल करीब-करीब वही रहे। स्वयं कल्पना भी यह मानती हैं कि वर्ष 2001 में उन्होंने भोजपुरी में गाना शुरु किया। तब दो सवाल थे। फ़ूहड़ता और भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का सवाल। आज भी यही सवाल हैं।

कल्पना ने बताया कि बिहार की धरती ने उन्हें जो दिया है, उसे समृद्ध करना मेरा धर्म है। भिखारी ठाकुर और भूपेन हजारिका दोनों ने जनमानस के लिये गाया। कोई कृत्रिमता नहीं। जो भी गाया, दिल से गाया और समाज की बेहतरी के लिये गाया। मेरा सपना है कि दोनों की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को आगे बढाऊं।

बहरहाल कल्पना को विश्वास है कि बिहार सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ आंचलिक भाषाओं को सजीव बनाये रखने का प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि सभ्यता के अस्तित्व के लिये आंचलिक भाषाओं का अस्तित्व बनाये रखना जरुरी है। जो भोजपुरी फ़िल्मों को फ़ूहड़ और अश्लील करार देते हैं, समीक्षा लिखने के लायक भी नहीं मानते हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि उन्होंने भोजपुरी के विकास के लिये क्या किया है। केवल आलोचना से अपनी शेखी बधारी जा सकती है, भोजपुरी का विकास नहीं।

बोल रहे युवा

केवल चीखना राष्ट्रवाद नहीं है प्रधानमंत्री जी

- आजाद हुसैन

कस्तूरी जब असली हो तो गवाही के लिए साथ में हिरण लेकर घूमने की जरुरत नहीं होती। ये कहावत बेहद पुरानी है और मौजूदा दौर के लिए मौजू भी। राष्ट्रवाद अगर असली होता तो उसके लिए चीखने की ज़रुरत शायद नहीं पड़ती। असली राष्ट्रवाद या देशप्रेम कर्मों से परिलक्षित होता है नारों से नहीं। मौजूदा दौर में मैं देश की बड़ी आबादी को भावनाओं की लहरों पर बहता देख रहा हूं। ये लहर उस आबादी को क