अपना बिहार

अपना समाज, अपनी आवाज * बिहार का पहला दैनिक हिंदी न्यूज पोर्टल

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

Special Reports

मैट्रिक परीक्षा को लेकर कंट्रोल रूम स्थापित

पटना(अपना बिहार, 27 फ़रवरी 2017) - मैट्रिक की परीक्षा एक मार्च से शुरू हो रही है। कदाचार मुक्त परीक्षा के संचालन की सतत निगरानी के लिए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की ओर से रविवार को कंट्रोल रूम स्थापित किया गया। कंट्रोल रूम आठ मार्च तक 24 घंटे काम करेंगे। समिति के अध्यक्ष आनंद किशोर ने बताया कि परीक्षा से संबंधित किसी भी प्रकार की सूचना, शिकायत है तो अभिभावक व छात्र-छात्राएं नियंत्रण कक्ष में सूचित कर सकते हैं। इसके लिए समिति की ओर से फोन नंबर जारी किए गए हैं। 0612-2232092 पर फोन कर सकते हैं, जबकि 0612-2222575, 2222576 पर फैक्स भी कर सकते हैं।

Today’s News

· सुधीर की गिरफ्तारी से आईएएस लॉबी ‘गरम’, प्रतिबंधित क्षेत्र में बेखौफ़ किया प्रदर्शन, राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन, काला बिल्ला लगा करेंगे काम

· नये बिजली दरों के लिए जनसुनवाई आज से

· शहाबुद्दीन की वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी आज

· पूर्व मंत्री की बेटी के साथ यौन शोषण मामले में पुलिस का काला खेल, निखिल को मिल रहा एक बड़े आईपीएस पदाधिकारी का संरक्षण

· माले की राज्य कमेटी की बैठक आज, महासचिव दीपंकर रहेंगे मौजूद

· पीएम पद की गरिमा भूल रहे नरेंद्र मोदी : मीसा

· ‘गंगा’ पर एकाधिकार को नीतीश पर बरसे सुमो

· सच्चा कर्म ही असली धर्म : मुख्यमंत्री, संत रविदास की 640वहीं जयंती के मौके पर बोले नीतीश, तेजस्वी ने कहा - संत रविदास हमेशा रहेंगे अनुकरणीय

· यूपी चुनाव में जलेगी भाजपा की होलिका : लालू, कुशवाहा ने कहा - परिणाम आने तक करें इंतजार

· राज्यपाल ने सैनिकों का हौसला बढ़ाया, कहा - सैनिकों का ख्याल रखती है केंद्र सरकार

· जदयू विधायक से मांगी एक करोड़ की रंगदारी

· हर हाल में अविरल बहे गंगा, सीएम ने पीएम पर कसा तंज, गंगा पूछ रहीं - कहां गया उसका बेटा?

· सीएम के बेटे निशांत ने कहा - राजनेता नहीं बनूंगा साधू

· महादलित युवक-युवतियों के साथ धोखा दे रही सरकार, सुशील मोदी ने लगाया आरोप

· गधा हो बीजेपी का चुनाव चिन्ह : राजद

· धुमधाम से मनाया गया शिक्षा मंत्री का जन्मदिन

· सरकार खर्च करने में फिसड्डी, हाशिये पर विकास : प्रेम

· विकास की राह पर बिहार, राज्यपाल ने किया दोनों सदनों को संबोधित

· विपक्ष के खिलाफ महागठबंधन एकजुट : मुख्यमंत्री, सीएम-डिप्टी सीएम दोनों ने दी विधायकों से मीडिया में संभलकर बोलने की सलाह

· गुजराती प्रिंटिंग व्यवसायी गिरफ्तार, बीएसएसएसी मामले में मिली सफलता

· भूमि सुधार लागू कर गांधी को श्रद्धांजलि दे सरकार, पूर्व विधान पार्षद प्रेम कुमार मणि ने शताब्दी समारोह को बताया पाखंड

· ब्रजेश को नहीं मिली कोर्ट से राहत, सेक्स स्कैंडल : बढ़ी मुश्किलें

· अपनों को बचा रही सरकार : सुमो

· माले ने राज्यपाल के अभिभाषण को नकारा

· बजट सत्र के पहले दिन की दिलचस्प झलकियां

· चर्चा में रहे विधायक विनय बिहारी

· सभापति का गर्मजोशी से स्वागत

· शाही घोड़ों के साथ सेल्फी की होड़

· सदन चलाने को पक्ष-विपक्ष दोनों तैयार, हंगामे की भी जबर्दस्त तैयारी

· शांति के माहौल में गुजरा बजट सत्र का पहला दिन, ओमपुरी और नाव हादसे में मारे गये लोगों के प्रति जताया गया शोक

· सेक्स कांड मामले में राजनीतिक बवाल, निखिल के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी करने की केंद्र से अपील, कांग्रेस विधायक ब्रजेश पांडेय के खिलाफ सबूत जुटाने का निर्देश

· जदयू विधायक मेवालाल को लेकर विपक्ष जदयू पर गरम, सबौर कृषि विवि में फर्जी नियुक्ति मामला

· हंगामे के बीच बजट सत्र आज से

 

Text Box: Big Question

दलित रंगमंच का शक्ति-प्रदर्शन है 'आउटकास्ट'

मोदी-भक्त मोदी का कल के भाषण के बचाव में लग गए हैं। कि वे तो यह कह रहे थे कि धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए! बड़े नादान चेले हैं। जो पार्टी ही धर्म की बुनियाद पर चलती हो (कितने मुसलमानों या ईसाइयों को भाजपा ने उत्तरप्रदेश में टिकट दिया है? एक को भी नहीं!), जिस पार्टी की पहचान बाबरी मसजिद ढहा कर राममंदिर के शिगूफे पर धर्मपरायण हिंदू मतदाताओं को गोलबंद करना रही हो, जो प्रधानमंत्री गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम के दाग अब भी सहला रहा हो - वह दूसरों को समझा रहा है कि धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए?

असल बात यह है कि उत्तरप्रदेश में विराट खर्च, मीडिया प्रबंधन, कांग्रेस के नेताओं को टिकट के बँटवारे, वंशवाद से समझौते आदि की तमाम कोशिशें हवा को (आँधी-सुनामी दूर की बात है) भाजपा के हक में नहीं कर पाई हैं। सर्जिकल स्ट्राइक को भी भुना नहीं पाए। नोटबंदी के जिŽक्र से आँख चुरानी पड़ रही है। तो कब्रिस्तान-शमशान की गंदी राजनीति की शरण में जाना हमें तो समझ आता है, मूढ़ और कूपमंडूक भक्तों की समझ में न आता होगा।

विकास या बेरोजगारी-महँगाई जैसे मुद्दों को भुलाकर जमीन और बिजली के बहाने कथित धार्मिक भेदभाव को मुद्दा बनाना हिंदू मतदाताओं को भड़काने के अलावा और क्या है? कहना न होगा, धार्मिक भेदभाव की राजनीति तो मोदी (फिर से) खुद ही करने लगे। ऐसे मुद्दों की शरण में जाना अपनी जीत को सुनिश्चित न कर पाने की झुँझलाहट और बौखलाहट के सिवा कुछ नहीं।

बातें हरिशंकर व्यास की...

वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास को लोग संघ से जुड़ा मानते आए हैं, पर इन दिनों उनके अनेक लेख मोदी और अमित शाह (जो संघ की ही देन हैं) की खाट खड़ी करते हैं। आज उन्होंने अपने अखबार नया इंडिया में लिखा है कि अमित शाह 2014 जैसी आँधी का दावा भाषणों में कर रहे हैं, मीडिया का इस्तेमाल इस बात के प्रचार के लिए कर रहे हैं, इन चीजों के साथ गुजरात से शुरू होने वाला सट्टा भी चरण-दर-चरण भाजपा के पक्ष में उछलता चला जाएगा।

लेकिन उत्तरप्रदेश से लौटकर व्यासजी का कहना है कि मीडिया, शेयर बाजार और भाषण भाजपा को जीत हासिल करवा देंगे इसे मानने में उन्हें दुविधा ही अनुभव हो रही है, क्योंकि उन्होंने अपनी आँख से दूसरी तसवीर देखी है।

मैं अपनी राय पहले लिख चुका हूँ कि मुझे लगा है सरकार अखिलेश फिर से बना लेंगे। और व्यासजी से मैं उत्तरप्रदेश ज्यादा घूम कर आया हूँ।

याद करें, पैसे के बल पर ऐसा प्रचार का हथकंडा दिल्ली और बिहार के चुनाव में भी कम नहीं अपनाया गया था। मगर हुआ कुछ और। मतदाता अब प्रचार, मीडिया, सर्वे, भाषणी दावों के झाँसे में पहले की तरह नहीं आता। बाकी 11 मार्च को देखेंगे।(लेखक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रमुख हैं)

भुक्खड़ ब्राह्मणों का अमानवीय आचरण : यह हिन्दी का घृणित जातिशास्त्र है ...

- संजीव चंदन

तुलसीदास जी के यहाँ भूख की खूब चर्चा है, कबीरदास के यहाँ नहीं, रैदास के यहाँ नहीं. नरोत्तम दास सुदामा का चित्रण करते हैं- मांगत खात चले जहां मारग बाली बूंट- भूख और अन्न-राग ब्राह्मणों ने अपनी भिक्षा-निर्भरता से पैदा की है इसलिए तुलसीदास के यहाँ खूब चर्चा है इसकी- माँगी के खायब.' कबीरदास, रैदास आदि श्रम परम्परा से हैं, तय है कि भूख का उपाय वे स्वयं करते हैं अपने लिए दयनीयता का आवरण इसीलिए नहीं बनाते.

तुलसीदास की ब्राह्मण संतानों की महिमा अपरंपार है. उनकी वंशबेल आजकल वर्धा के हिन्दी विश्वविद्यालय में फल-फुल रहा है- सरयूपारिन और पंक्तिपावन ब्राह्मणों की वंशवेल. इनकी निकृष्टता की कहानी पिछले दिनों वर्धा यात्रा में सुनने को मिली- नहीं मैं यह नहीं बता रहा हूँ कि चुटियाधारी इन ब्राह्मणों के घर में आपके लिए चाय की अलग प्याली रखी होती है या यह भी नहीं कि वे मराठी ब्राह्मणों को बार-बार अहसास दिलाते हैं कि पंक्तिपावन ज्यादा श्रेष्ठ हैं. या यह भी नहीं कि विभूती राय से अपवित्र हुए रसोई को गंगाजल से धुलवाया था नये वाले मिश्रा जी ने.

मुझे तो यह बताया गया कि आजकल हिन्दी विश्वविद्यालय में कई ट्रिब्यूनल की मीटिंग हो रही है, जिसमें राष्ट्रपति के नॉमिनी, विवि के नॉमिनी और अप्लीकैंट के नॉमिनी मेंबर होते हैं. ये बुभुक्षु ब्राह्मण अन्य दो नॉमिनी पर तो सरकारी फंड से लाखो खर्च कर रहे हैं लेकिन अप्लीकैंट के नॉमिनी को वे खाना तक खिलाने की जहमत नहीं उठाते- खाना ब्राह्मणों के लिए अनुपम सुख का साधन जो ठहरा- भिक्षा माँग कर खाने के बाद का आनंद.

मैं यह बखूबी समझता हूँ कि विभूति राय ऐसा नहीं करते यदि वे कुलपति होते तो- खाना न खिलाने, खाना रोकने के महान काम उन्होंने भी किया है, लेकिन वह पुलिसिया दंड विधान जैसा विधान था, जो एक कुलपति के रूप में भी वे अपनाते थे, लेकिन चुटियाधारी मिश्रा जी और उनके मिश्रा अनुचरों का मामला कुछ और है- मामला अन्न-राग से पैदा होता है. आजीवन बुभुक्षु!

उत्तरप्रदेश चुनाव 2017: भाजपा का विघटनकारी एजेंडा

-राम पुनियानी

उत्तरप्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव, न केवल भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि जैसे राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं वरन देश में धर्मनिरपेक्षता और प्रजातंत्र के भविष्य का निर्धारण करने में भी इस चुनाव की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।  राष्ट्रीय परिदृश्य पर भाजपा का उदय, राममंदिर आंदोलन और उसके बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा से शुरू हुआ था। इसके बाद से भाजपा अपने एजेंडे में नए-नए विघटनकारी मुद्दे शामिल करती जा रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य चुनावों में लाभ प्राप्त करना है।

उत्तरप्रदेश के चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही कई भाजपा नेताओं ने राममंदिर, लव जिहाद व कैराना से हिन्दुओं का पलायन जैसे मुद्दे उठाने शुरू कर दिए थे। सन 2002 में गुजरात में हुई भयावह मुस्लिम-विरोधी हिंसा को राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने, क्रिया की प्रतिक्रिया बताकर औचित्यपूर्ण ठहराया था। उन्होंने यह भी कहा था कि दंगा पीड़ितों के लिए स्थापित शरणार्थी शिविर, बच्चों के उत्पादन के केन्द्र बन गए हैं और इसलिए उन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए। समय के साथ उन्होंने अपने मूल सांप्रदायिक एजेंडे को पर्दे के पीछे रखते हुए विकास का नारा बुलंद करना शुरू कर दिया। परंतु यह केवल लोगों की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास था। मीडिया और अत्यंत चतुराईपूर्ण प्रचार के ज़रिए उन्होंने अपनी छवि ‘विकास पुरूष’ के रूप में बनाने की कोशिश की और उनकी सरकार ने ऐसी नीतियां बनाईं, जिनसे कुबेरपतियों को लाभ हुआ। परंतु अपने मूल एजेंडे को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। सन 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान जहां वे ‘अच्छे दिन’ लाने का वायदा करते रहे, वहीं वे ‘पिंक रेव्यूलेशन’ (देश से मांस का निर्यात) और असम में गेंडे के संरक्षण के संदर्भ में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भी उठाते रहे।

इसके अलावा, उनके साथियों ने राममंदिर, मुंहजबानी तलाक और संविधान के अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों को भी जिंदा बनाए रखा। विकास के नारे और पर्दे के पीछे से सांप्रदायिक प्रचार से भाजपा को केन्द्र में अपनी सरकार बनाने में सफलता मिल गई। अभी हाल में चुनाव आयोग ने भाजपा सांसद साक्षी महाराज की इस टिप्पणी पर घोर आपत्ति की कि देश की आबादी में वृद्धि के लिए मुसलमान ज़िम्मेदार हैं।

उत्तरप्रदेश चुनाव में ‘राष्ट्रीयता’, ‘राष्ट्रीय गौरव’ और ‘देशभक्ति’ जैसे भावनात्मक मुद्दे उठाए जा रहे हैं। सरकार, पाकिस्तान के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राईक और नोटबंदी को अपनी बड़ी सफलताएं बता रही है परंतु इन दोनों ही मुद्दों की हवा निकल चुकी है। सर्जिकल स्ट्राईक के बाद भी सीमा पर भारतीय सैनिकों के शहीद होने का सिलसिला जारी है और नोटबंदी के कारण आमजन जितने परेशान हुए हैं, उसके चलते इस बात की बहुत कम संभावना है कि वे इस निर्णय का समर्थन करेंगे। भाजपा को भी यह बात समझ में आ गई है और इसलिए उसने अपना विघटनकारी प्रचार फिर से शुरू कर दिया है। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में बड़ी चतुराई से ऐसे मुद्दों का समावेश किया गया है। घोषणापत्र में ‘हिन्दू गौरव’ और ‘संपूर्ण हिन्दू समाज’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसमें राममंदिर के मुद्दे को भी जगह दी गई है। भाजपा के विरोधियों का कहना है कि राममंदिर एक ऐसा मुद्दा है जिसे भाजपा जब चाहे ठंडे बस्ते में डाल देती है और जब चाहे उसे पुनर्जीवित कर जनता को भरमाने की कोशिश करने लगती है। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद से ही राममंदिर का मुद्दा, भाजपा के एजेंडे में बना हुआ है और यह इस बात के बावजूद, कि यह प्रकरण उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है।

यह स्पष्ट है कि अपने चुनाव प्रचार में जहां मोदी सांप्रदायिक मुद्दों को अपरोक्ष ढंग से उठाएंगे वहीं उनके अन्य साथी खुल्लमखुल्ला नफरत फैलाने वाली बातें कहेंगे। कुछ समय पूर्व, भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने उत्तरप्रदेश के कैराना से हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा उठाया था। अब एक अन्य भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने यह कहना शुरू कर दिया है कि पूरा पश्चिमी उत्तरप्रदेश, कश्मीर बनने की राह पर है, वहां रहने वाले हिन्दुओं को डराया-धमकाया जा रहा है और पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है। सच यह है कि राज्य के मुज़फ्फरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद से हज़ारों मुसलमानों को अपने गांव छोड़कर भागना पड़ा है। हुकुम सिंह के दावे का खोखलापन उजागर हो चुका है। उन्होंने कैराना से पलायन करने वाले जिन हिन्दू परिवारों की सूची जारी की थी, उनमें से कई अब भी वहां रह रहे हैं और कई ने आर्थिक और सामाजिक कारणों से अन्य स्थानों पर रहना बेहतर समझा। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इस मुद्दे पर श्वेतपत्र जारी करने की बात कही गई है।

मुज़फ्फरनगर दंगों को भड़काने में लव जिहाद के दुष्प्रचार की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। अब भाजपा ‘मजनू-विरोधी दल’ बनाने की बात कर रही है। यह लव जिहाद के मुद्दे को नए कलेवर में प्रस्तुत करने का प्रयास है। गोमांस का मुद्दा भी भाजपा के लिए वोट कबाड़ने का ज़रिया बन गया है। इस मुद्दे पर घोषणापत्र में कहा गया है कि सरकार बड़े बूचड़खानों को बंद करवाएगी। लैंगिक न्याय के मसले पर भाजपा के दोहरे मानदंड सबके सामने हैं। जहां वह मुंहजबानी तलाक के कारण मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय को लेकर बहुत चिंतित है, वहीं दलित, आदिवासी और हिन्दू महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के संबंध में चुप्पी साधे हुए है। यह साफ है कि भाजपा, मुंहजबानी तलाक का विरोध इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि वह लैंगिक न्याय की पक्षधर है वरन यह मुद्दा उसके लिए अल्पसंख्यकों के दानवीकरण का उपकरण है। इसके साथ ही, यह कहना भी उचित होगा कि मुंहजबानी तलाक जैसी सड़ीगली परंपराओं से मुक्ति आवश्यक है क्योंकि ये मुसलमानों की प्रगति में बाधक हैं।

हाल में भाजपा विधायक संगीत सोम ने दादरी कांड के बाद दिए गए अपने भाषण का वीडियो प्रसारित किया। इसके बाद उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें उन्हें आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन करने का दोषी बताया गया है। इसी तरह, एक अन्य भाजपा विधायक सुरेश राणा को सांप्रदायिक घृणा फैलाने का दोषी ठहराया गया है और उनके खिलाफ प्रकरण दर्ज किया गया है। राणा ने कहा था कि अगर वे चुनाव जीत जाते हैं तो कैराना, देवबंद और मुरादाबाद में स्थायी कर्फ्यू लगाया जाएगा। योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि अपना वोट देने से पहले मतदाताओं को दंगों और बलात्कारों को याद करना चाहिए।

भाजपा नेताओं की मूल रणनीति, समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की है। उसके सांप्रदायिक एजेंडे में नए-नए मुद्दे जुड़ते जा रहे हैं। अब उसके पास इस तरह के मुद्दों का भंडार है, जिन्हें उसके अलग-अलग नेता, समय-समय पर उठाते रहते हैं। इन नेताओं को अलग-अलग काम सौंपे गए हैं। कुछ विकास की बात करते हैं, कुछ अपरोक्ष रूप से सांप्रदायिकता फैलाते हैं और तो कुछ खुलेआम और अभद्र भाषा में अल्पसंख्यकों के खिलाफ विषवमन करते हैं। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि चुनाव प्रक्रिया, धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए। हमें सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का सम्मान करना चाहिए और चुनाव आयोग को अपनी शक्तियों का प्रभावकारी ढंग से इस्तेमाल करते हुए समाज को बांटने वाली बातें कहने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

- राजेश चन्द्रा

पटना की राग रेपर्टरी ने विगत 12 फरवरी को भारत रंग महोत्सव में रणधीर कुमार के निर्देशन में शरणकुमार लिम्बाले के उपन्यास 'अक्करमाशी' पर आधारित नाटक 'आउटकास्ट' का मंचन कर एक युगान्तर स्थापित किया है। मैं इसे हिन्दी में दलित रंगमंच के पहले ऐतिहासिक और प्रभावी शक्ति-प्रदर्शन के रूप में देखता हूं। इसने राष्ट्रीय फलक पर हिन्दी में दलित रंगमंच की आवश्यकता, अपरिहार्यता, उसकी वैचारिकी, सौन्दर्यशास्त्र और रंगभाषा सबको एकबारगी स्थापित कर दिया है।

 

हिन्दी में दलित रंगमंच बहुत पहले से मौजूद रहा है, पर उसे अब तक वैसी पहचान और स्वीकृति नहीं मिल सकी है, जैसी महाराष्ट्र और कर्नाटक में मिली है। दलित लेखन, जिसे आज सभी भारतीय भाषाओं ने सिर आंखों पर बिठाया है और सर्वहारा के वास्तविक साहित्य का दर्जा दिया है, हिन्दी में बहुत बाद में अपनी प्रतिष्ठा का स्थान पा सका और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह रही कि हिन्दी में जो मीमांसाशास्त्र या आलोचना है, वह अधिकांशत: ब्राह्मणवादी लोकेशन से तय होती रही है। जो ज्ञान अभी हमारे पास है, वह ज्यादातर 'सेकण्ड हैण्ड' है। वह इसीलिये बहुधा एकांगी और अर्द्धसत्य है। ज्ञान की पुस्तकें तथाकथित ऊंची जातियों द्वारा लिखी गयी हैं, इसलिये हम उतना ही देखते रहे हैं, जितना वे दिखाना चाहते हैं। अगर उससे बाहर देखना है तो खिड़की से बाहर कूदना ही होगा। आधुनिक हिन्दी रंगमंच के इतिहास को फिर से देखना होगा। 'आउटकास्ट' इसी मुख्यधारा के ब्राह्मणवादी रंगमंच के बन्द 'लोकेशन' की खिड़की से बाहर की साहसिक छलांग है।

 

गुरुत्वाकर्षण न्यूटन से पहले से मौजूद था, पर उसे पहचानने और स्वीकृति देने की शुरूआत न्यूटन ने की। 'आउटकास्ट' ने भी हिन्दी के तथाकथित आधुनिक और प्रगतिशील रंगमंच के दलित-विरोधी, ब्राह्मणवादी स्वरूप और चेहरे को उजागर करने में न्यूटन जैसी ऐतिहासिक भूमिका निभायी है।

 

'दलित रंगमंच'- शब्द आज जैसे ही उच्चरित होता है, मुख्यधारा के रंगकर्मियों की- चाहे वे वामपंथी हों, दक्षिणपंथी या कलावादी- सब की त्योरियां चढ़ जाती हैं! वे शिखा खोलने लगते हैं, जनेऊ सम्भालते हुए ताल ठोंकने और देख लेने की भंगिमा बनाने लगते हैं! उनके लिये इस अवधारणा को ध्वस्त करना मानो जीवन-मरण का, अपना अस्तित्व बचाने का प्रश्न बन जाता है! कहते हैं 'भाई यह दलित-वलित रंगमंच क्या होता है? इसकी वैचारिकी क्या है? सौन्दर्यशास्त्र कहां है? यह कहां हो रहा है? पहले प्रमाण लेकर आइये फिर हम तय करेंगे!' मानो यह सारे प्रमाण वे मनु महाराज के समक्ष पेश करेंगे! ठीक बात है, मान लिया, यह सब होना चाहिये, है भी, पर आप सुनना तो शुरू कीजिये!

 

दलित रंगमंच का भी वही केन्द्रीय स्वर है या होगा जो दलित साहित्य का है- यानी जातिवाद का विरोध, ब्राह्मणवाद का विरोध और अपने जिये जीवन के यथार्थ की अभिव्यक्ति। 600 साल पहले कबीर ने, रैदास ने, बाद में फुले, अम्बेडकर, बुद्ध आदि ने सताये गये, उत्पीड़न का शिकार होते आ रहे मनुष्य के पक्ष में सामाजिक प्रतिरोध की जिस विद्रोही परंपरा की नींव डाली, परिवर्तन का बिगुल फूंका, दलित रंगमंच अपनी वैचारिकी इसी परंपरा से ग्रहण कर रहा है। आज ब्राह्मणवाद यदि जिन्दा है, और मुख्यधारा का रंगमंच उसके बारे में खामोश है, या मुखर होकर विरोध नहीं कर पा रहा, तो निश्चित रूप से दलित रंगमंच को इस ऐतिहासिक भूमिका को निभाने के लिये आगे आना ही होगा। वह मुख्यधारा के बीच भी है और उसके समानान्तर भी। 'आउटकास्ट' इसका सशक्त प्रमाण है।

 

दलित रंगमंच और मुख्यधारा के रंगमंच के द्वन्द्व को कबीर और तुलसी की सामाजिकता तथा गांधी और अम्बेडकर की सामाजिकता के द्वन्द्व से और अधिक स्पष्टता के साथ समझा जा सकता है। कबीर पूरी समाज-व्यवस्था के विरुद्ध लाठी लेकर खड़े हैं, आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते हैं। तुलसी भी एक नये समाज की स्थापना चाहते हैं। नयी व्यवस्था के हिमायती हैं, किन्तु उनका 'रामराज्य' सामाजिक श्रेणीबद्धता के साथ ही 'रामराज्य' है, उसी सामन्ती सोच और व्यवस्था के साथ। वहां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित- सभी अपने-अपने कर्म और कर्तव्य के साथ सामाजिक आदर्श को प्रेरित और पोषित करते हैं। यह व्यवस्था का परिष्कार है- अपनी शर्तों पर। गांधी भी यही करते और चाहते हैं। मुख्यधारा का रंगमंच भी यही करता है, पर दलित रंगमंच ऐसा नहीं कर सकता। वह गांधी और तुलसी से सहमत नहीं हो सकता। वह कबीर, अम्बेडकर आदि सुधारकों के साथ खड़ा होना चाहता है। यही उसका सामाजिक लोकेशन है।

 

दलित समाज की अपनी चुनौतियां हैं, जिनसे मुठभेड़ करने के लिये दलित साहित्य की तरह दलित रंगमंच की जरूरत है। जब जाति, जाति आधारित पहचान, जाति आधारित शोषण समाप्त ही नहीं हो रहा, तब उसके नाम पर यदि कोई विमर्श खड़ा हो रहा है, तो मुख्यधारा के रंगकर्मियों को दिक्कत क्या है? (लेखक सूबे के प्राख्यात रंगमंच कलाकार व समालोचक हैं)

‘गर्व से कहो हम चमार हैं’- इस उद्घोष के साथ आज पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में गुरु रविदास की 640 वीं जयंती भव्यता से मनाई जा रही है। गो कि कार्यक्रम में भागीदारी करने वाले लोग चमार ही नहीं हैं।

 

'चमार' शब्द की बात करें तो हरिजन की तरह इसका भी नकारात्मक उपयोग करने पर दलितवादियों को आपत्ति है। हालांकि यदि कोई अपने को गर्व से चमार कहता है तो उसमें हिन्दू होने का गर्व भी समा जाता है! छोटी मानी जाने वाली इस जाति पर गर्व किया जा सकता है तो जाति व्यवस्था में कहाँ खराबी हुई? फिर, तो अपने सवर्ण एवं ब्राह्मण जात होने पर कोई गर्व करके कोई क्यों बुरा कहलाये?

 

पोस्टरों-होर्डिंग में उस अम्बेडकर की तस्वीर को भी जगह मिली हुई है जिन्होंने 'हिन्दू धर्म की पहेलियां' और 'जाति का विनाश' किताबें लिखीं और, हिन्दू धर्म को लतिया कर बौद्ध धम्म का वरण किया (बौद्ध धम्म धर्म बन कर निस्तेज हो गया है, यह अलग बात है, अलग सवाल है।)

 

तो अब अम्बेडकर का ऐसे भी सम्मान होने लगा है! समारोह स्थल पर रोहित वेमुला की पोस्टर एवं होर्डिंग भी लगी हुई हैं। कोई रविदास चेतना मंच है जो इस भरदिनी कार्यक्रम को मना रहा है। कार्यक्रम के निवेदकों एवं आयोजकों में राजद एवं जेडीयू के लोग भरे हुए हैं। पोस्टर, होर्डिंग एवं बंदनवार से शहर की मुख्य सड़कें अटी पड़ी हैं।

 

अपने चमार होने पर गर्व करने की जो सलाह बाँटी गयी है उन पोस्टर-होडिंर्गों में रविदास का दाहिना हाथ आशीवार्दी मुद्रा में ऊपर उठा हुआ है एवं उनका आसन आसमान में लगा है, धरती से ऊपर उठा हुआ।

 

गोया, सन्देश यह भी कि चमार जाति को भी जमीन से, धरातल से ऐसे ही ऊपर उठना है!

और, अंधविश्वास, पाखंड, कर्मकांड, जातिवाद, ब्राह्मणवाद पर करारी चोट कर गये रैदास ही अपना आॅब्जरवेशन रख गये हैं -'जात जात में जात है ज्यों केलन के पात।'

 

बुद्ध, आप तो विनष्ट हो ही चुके! आपके समर्थ हमराहों रैदास, कबीर, अम्बेडकर की भी खैर नहीं!(लेखक युवा साहित्यकार व दलित विचारक हैं)

खास रिपोर्ट : अविरल गंगा के बहाने राजनीतिक अविरलता का प्रयास

दोस्तों, हिन्दुओं के लिए गाय और गंगा दोनों प्रारंभ से पवित्र रहे हैं और भविष्य में भी इनकी पवित्रता सत्ता की राजनीति के लिए आवश्यक रहेगी। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि अविरल गंगा की बात उठाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जहां एक ओर इस मुद्दे पर भाजपा के एकाधिकार को चुनौती दी है तो दूसरी ओर उन्होंने गंगा नदी में जल प्रबंधन के संबंध में ठोस सवाल उठाकर आज की युवाओं को साधने का प्रयास भी किया है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि गंगा की अविरलता को बनाये रखने के मुद्दे पर नयी पहल कर श्री कुमार ने अपनी खुद की राजनीति को भी अविरल बनाये रखने का प्रयास किया है।

यह पहला प्रयास नहीं है जब नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए ऐसे मुद्दों की तलाश की है जिसमें विपक्ष भी उसके साथ खड़ा रहा है। इससे पहले अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठायी थी। यह ऐसा मुद्दा था जिसका समर्थन विपक्ष ने भी किया। विधानमंडल के दोनों सदनों के सभी सदस्यों ने श्री कुमार की इस मांग का समर्थन किया। ऐसा ही नजारा विधानमंडल में तब दिखा था जब मुख्यमंत्री ने सूबे में शराबबंदी कानून लागू करने की बात कही। हालांकि यह नजारा विशेष दिलचस्प इसलिए भी था क्योंकि दोनों सदनों के सदस्यों ने शराब नहीं पीने और नहीं पिलाने को लेकर कसम भी खायी थी।

न्यूनतम विरोध वाले मुद्दे तलाशने में माहिर नीतीश कुमार ने इसी शराबबंदी के सहारे अपनी राष्ट्रीय राजनीति की शुरूआत भी की। वे इसी मुद्दे को लेकर यूपी और झारखंड भी गये। लेकिन जमीन पर संगठन नहीं होने के कारण श्री कुमार को वह सफलता नहीं मिल सकी, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। परिणाम यह हुआ कि पहले यूपी में चुनाव लड़ने को बेताब दिख रहे श्री कुमार ने चुनाव के शंखनाद के ठीक पहले अपने पांव वापस खींच लिये।

बहरहाल एक बार फिर नीतीश कुमार ने गंगा का मुद्दा उठाया है। उनसे पहले वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी ने भी गंगा को लेकर राजनीतिक अभियान चलाया था। दिल्ली में सरकार बनने पर उन्होंने नमामि गंगे योजना की शुरूआत भी की लेकिन वह गंगा आरती और श्मशान घाटों के जीर्णोद्धार तक सीमित रह गया। गंगा नदी की असली समस्या जस की तस बनी रही। उधर गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर भी बिहार, यूपी सहित अनेक राज्यों के बीच गतिरोध बढ़ता जा रहा है। ऐसे में फरक्का बांध को गंगा नदी का कसूरवार बताकर नीतीश कुमार ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बना दिया है। सबसे दिलचस्प यह है कि उन्होंने इस मुद्दे को बिहारी अस्मिता के साथ जोड़ा है। ऐसे में गंगा नदी को लेकर उनका यह अभियान महत्वपूर्ण साबित होता जा रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि बात-बात पर यात्राओं पर जाने वाले मुख्यमंत्री गंगा नदी को लेकर यात्राओं की नयी श्रृंखला की शुरूआत की घोषणा कब करते हैं।

संपादकीय : खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करें दलित-पिछड़े नायक

दोस्तों, बीएसएससी पेपर लीक प्रकरण में निशाने पर एक बार फ़िर दलित-पिछड़े नायक हैं। वे नायक जिन्होंने अपने बूते सामंतवादी सिस्टम में अपने लिए मुकाम हासिल किया। एक उदाहरण बीएसएससी के चेयरमैन सुधीर कुमार का है जो दलित वर्ग से आते हैं। एसआईटी ने इनके पूरे परिवार को हिरासत में ले रखा है। आरोप है कि श्री कुमार ने अपने परिजनों के साथ मिलकर पेपर लीक कराया।

खैर यह जांच का विषय है कि श्री कुमार और उनके परिजनों पर जो आरोप लगाये जा रहे हैं, उसमें कितनी सच्चाई है। लेकिन इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता है कि एक आईएएस के रुप में उनका ट्रैक रिकार्ड सबसे बेहतर रहा है। उन्हें एक कड़क व इमानदार अधिकारी के रुप में जाना जाता रहा है। इनकी बेहतर छवि का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि जब जीतन राम मांझी सूबे के सीएम बने और उन्होंने दलित प्रेम दिखाते हुए श्री कुमार को गृह सचिव बनाया तब उनके निर्देश पर उन्होंने नीतीश कुमार की सुरक्षा में कटौती करने का आदेश जारी किया था। तब श्री मांझी की खूब आलोचना हुई थी और माना जाता है कि श्री मांझी और नीतीश कुमार के बीच टकराव का आरंभ था।

आईएएस सुधीर कुमार की ईमानदार छवि कई अवसरों पर उल्लेखनीय रही है। लेकिन ताजा प्रकरण में जिस तरह से उनकी संलिप्तता सामने आ रही है, उसकी सच्चाई आना शेष है। असल सवाल यह है कि दलित और पिछड़े वर्ग के नायकों को सावधानी बरतने की जरुरत है। वजह यह है कि राजनीतिक सत्ता भले ही दलितों-पिछड़ों के हाथ में हो, लेकिन कार्यपालिका और न्यायपालिका में वर्चस्व सामंतों का ही है। ऐसे में उनकी एक गलती न केवल उन्हें तबाह कर देगी बल्कि दलितों व पिछड़ों के नवजागरण में बाधक बनेगी।

बहरहाल यह तो साफ़ है कि बीएसएससी मामले में कारगुजारियां हुई हैं। बिना राजनीतिक संरक्षण के ऐसे मामले नहीं हो सकते हैं। कई कद्दावर नेताओं का नाम भी सामने आ रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में जांच और क्या गुल खिलाती है। लेकिन कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कसूरवार केवल दलित-पिछड़े ही साबित होंगे।

आर्थिक सर्वेक्षण से असलियत उजागर, 70 फीसदी आबादी के आधार कृषि में 7 फीसदी की कमी, एक दशक में प्रति व्यक्ति आय में केवल दो फीसदी की वृद्धि

दोस्तों, किसी भी राज्य या देश के विकास का मानदंड आधुनिक अर्थशास्त्रियों के हिसाब से जीडीपी यानी कुल सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि है। वहीं कई यह भी तर्क देते हैं कि विकास का असली पैमाना जीडीपी में विभिन्न क्षेत्रों की हिस्सेदारी के घटना या बढ़ना है। बिहार के संबंध में बात करें तो विभिन्न क्षेत्रों के विकास दरों से पता चलता है कि दस फीसदी से अधिक विकास दर करने वाले क्षेत्रों में विनिर्माण 17.7 फीसदी, बिजली, गैस व जलापूर्ति 15.2 फीसदी, व्यापार, मरम्मति, होटल और जलपान गृह 14.6 फीसदी, परिवहन, भंडारण और संचार 12.6 फीसदी तथा मत्स्य व जल कृषि 10 फीसदी आदि शामिल हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि विकास के संबंध में राज्य सरकार के तमाम दावों के इतर वर्ष 2011-12 में कुल जीडीपी में प्राथमिक क्षेत्र का 25.2 फीसदी और द्वितीयक क्षेत्र का 18.3 फीसदी हिस्सा था। शेष 54.3 फीसदी योगदान तृतीयक क्षेत्र का था। वर्ष 2015-16 में प्राथमिक क्षेत्र 18.3 फीसदी, द्वितीयक क्षेत्र 18.1 फीसदी और तृतीयक क्षेत्र 59.9 फीसदी है। प्राथमिक क्षेत्र में 7 फीसदी की कमी। तृतीयक क्षेत्र में 6 फीसदी की वृद्धि हुई है। बताते चलें कि प्राथमिक क्षेत्र में कृषि एवं खनिज आदि शामिल होते हैं जिनके आसरे सूबे की 70 फीसदी से अधिक आबादी है।

खैर राज्य सरकार के दावों की बात करें तो सूबे की अर्थव्यवस्था में हाल के दशक में दिखा आवेग पिछले वर्ष भी जारी रहा। राष्ट्रीय आय और राज्यों की आय दोनों के लिए 2011-12 का आधार वर्ष के बतौर उपयोग करते हुए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने हाल ही में जीएसडीपी के अनुमानों की नयी स्थिति जारी की है। इसके अनुसार सूबे के जीडीपी में मध्यकालिक वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत थी जबकि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए यह 6.8 प्रतिशत थी।

जीडीपी के आधार पर आंकड़ों में विकास संबंधी सरकार के दावों के अनुसार वर्ष 2015-16 में सूबे में प्रति व्यक्ति आय 2015-16 में राष्ट्रीय औसत का लगभग 35 फीसदी था जबकि एक दशक पहले यह लगभग 33 फीसदी थी। वर्ष 2015-16 में बिहार का जीडीपी 2011-12 के स्थिर मूल्य पर 3.27 लाख करोड़ रुपए था जिससे प्रति व्यक्ति आय 29 हजार 190 रुपए होती है। वर्तमान मूल्य दर 2015-16 में बिहार का जीडीपी 4.14 लाख करोड़ रुपए अनुमानित है जिससे प्रति व्यक्ति आय 39 हजार 964 रुपए है।

अब यदि सरकार की अर्थ व्यवस्था की बात करें तो राजस्व प्राप्ति में 17,706 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई जिसमें 16,659 करोड़ रुपए यानी 94 फीसदी अकेले केवल कर राजस्व वृद्धि के कारण हुई। केंद्रीय अनुदान में मात्र 420 करोड़ की वृद्धि हुई। कर संबंधी राजस्व में 628 करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज की गयी।

सरकार का कहना है कि वर्ष 2011-12 से 2015-16 तक पांच वर्षों में राज्य का अपना कर राजस्व 12,612 करोड़ रुपए से बढ़कर 25 हजार 449 करोड़ रुपए हो गया जो 19 फीसदी की उच्च वार्षिक वृद्धि को प्रदर्शित करता है। केंद्रीय करों के विभाज्य पूल से राज्य सरकार को होने वाला अंतरण 14 फीसदी की वार्षिक दर से बढ़ा। जबकि केंद्रीय अनुदानों में 19 फीसदी की दर से वार्षिक वृद्धि दर्ज की गयी।

वहीं खर्च को लेकर सरकार का कहना है कि वर्ष 2015-16 में राजस्व व्यय में 2014-15 की अपेक्षा 11,046 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई जिसमें सामाजिक सेवाओं का 4230 करोड़ रुपए (38 फीसदी), आर्थिक सेवाओं का 5251 करोड़ रुपए (48 फीसदी) और सामान्य सेवाओं का 4564 करोड़ रुपए (14 फीसदी) हिस्सा था। सामाजिक विकास के प्रति राज्य सरकार की चिंता इस क्षेत्र को बढ़े आवंटन से व्यक्त होती है जो 2011-12 के 19,536 करोड़ से बढ़कर 2015-16 में 38,684 करोड़ रुपए हो गया।

बहरहाल बीते वित्तीय वर्ष में विकास का एक कुरूप चेहरा यह भी है कि विभिन्न जिलों में इसकी स्थिति अलग है। मसलन जीडीपी में हिस्सेदारी के आधार पर बात करें तो पटना, मुंगेर और बेगूसराय शीर्ष तीन जिले रहे। जबकि शिवहर, सुपौल और मधेपुरा सबसे पिछड़े जिले साबित हुए। वहीं पेट्रोल की खपत के आधार पर पटना, मुजफ्फरपुर व पूर्वी चंपारण अगड़े जिले निकले तो शिवहर, अरवल और शेखपुरा सबसे पिछड़े जिले। लघु बचत के मामले में भी पटना, छपरा व नालंदा ने बाजी मारी तो प.चंपारण,सीतामढ़ी और अररिया सबसे फिसड्डी रहे।

Development can be done only by people of State

(Ramesh Yadav, Fremont, California)

Central government in Delhi has the decision making power for development of entire India.  A person living in desert of Gujrat, jungles of Jharkhand, farmers of Bihar, mines of Bengal, field of Chattisgarh is as much Indian Citizen as person living in high rise of Mumbai, Bangaluru and MP’s and Ministers sitting in sacred Indian Parliament deciding on development. The central Government is like Sun (center of this universe), providing light, energy and life to each and every corner of India and that light, energy and life evenly divided and spreading all across India.

 

However when it comes to states like Bengal, Bihar, UP etc. the central government puts a filter producing the effect of cloud blocking all the development  of the area. And the more interesting part is that MP’s from this area participate in this act of filtering development energy, without feeling the pain of its own constituents and its long term negative effect on area.

 

It was in late 90’s when BJP leadership flocked in Bihar, defining all that was wrong in Bihar and how it would help, made bold promises. The center had BJP leadership but still after that election no one showed up in Bihar to give a development hand. Then again few years back having won handsomely in Bihar MP election, had made long promises and even then no development hand was offered.

 

In the last local election entire BJP leadership went in every corner of Bihar announcing what BJP will offer to Bihar. It has been almost two years and still Bihar is waiting. Same thing is happening in UP and it is to be seen if the development agenda of central Government is independent of who heads up the state Government.

 

Yes BJP has given a name to Bihar “Jungle Raj” and today it is all being played back again in UP calling it “Gunda Raj”

 

Central Government leadership, wake up, you are talking about Indian citizens who have same right as you for development, stop name calling and start calling Bihar and Utter Pradesh with development hand no matter whose leadership is governing the state. These two states have over 25% of India’s population, and do not underestimate smartness of Indian citizens from these states.

 

It is a lesson that development can only be done by its own people of state and not by visitors who just come during election campaign and leave not to be seen till next election. I am hoping that change will happen with synchronization in thinking, talking and implementation all in the direction of development.

 

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...

- ओम थानवी

अब हम जाग गए हैं

- सुरेश राय, डबलिन, कैलिफ़ोर्निया

एक जमाना था जब

सोने में मिलावट होती थी

फिर चांदी में मिलावट, घी और दूध में मिलावट

सब जानते हैं,

आज जमाना ऐसा आ गया है

फल, आटा, सब्जी और मसालों में मिलावट

पानी में मिलावट, हवा में मिलावट

हम सब मिलावट के सौदागर हो गये हैं

भाई लोग 56 इंच का सीना

तानकर कहते हैं दिल है

हिन्दुस्तानी और दिल में मिलावट

 

हंसने-रोने में मिलावट, इश्क में मिलावट

बोलने सुनने में मिलावट, देखने में मिलावट

और तो और, गुरु और ज्ञान में भी मिलावट

हम सब मिलावट के सौदागर हो गये हैं

 

बोलते हैं कुछ, लेकिन मतलब कुछ और है

दिल से मुँह तक निकले शब्दों में मिलावट

फ़ोटोशाप से की मिलावट,

ट्वीटर में मिलावट

फ़ेसबुक में दिखाया कुछ,

लेकिन करते कुछ और,

व्हाट्स अप मैं भी सचाई सदा छुपाई,

हम सब मिलावट के सौदागर हो गये हैं

 

आज देश के नेताओं में मिलावट

कवियों और लेखकों के लेख में मिलावटट

टीवी और न्यूज मे मिलावट

इंटरनेट मे मिलावट,

रंगो मे मिलावट, ख़ुशबू मे मिलावट

हम सब मिलावट के सौदागर हो गये हैं

 

इस मिलावट कि दुनिया मे

कोई तो राह होगी,

जो मिलावट से निकल कर

सचाई की तरफ़ जाती होगी

तंग आ गये इस मिलावट से

बहुत सह चुके हम,

अब मिलावट नहीं चलेगी

मिलावट एक बुरा सपना था

अब जाग गये हैं हम

 

अब ना होंगे मिलावट के सौदागर और

ना होंगे मिलावट के ख़रीदार

बस होगी शुद्ध और ताज़ा हवा

शुद्ध होंगे विचार, शुद्ध होंगे ख़याल

और शुद्ध होगा हमारा बिहार और

हमारा भारत भी

यक्षिणी का सवाल

 भारतीय सिनेमा में औरत ?

साधो! देखा दलित बौराना

- डा. मुसाफिर बैठा