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रविवार, 29 मई 2016

अपनी बात : "नदियों की आग" में झुलसते हुए

दोस्तों, बिहार विधान परिषद को उच्च सदन का दर्जा हासिल है और यह बेवजह नहीं है। विधान मंडल के इस सदन ने अतीत में जन समस्याओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण तरीके से हस्तक्षेप किया है। इसके अनगिनत सजीव उदाहरण हैं। एक उदाहरण परिषद द्वारा प्रकाशित पत्रिका "साक्ष्य" है। नाम के अनुसार ही इसका अस्तित्व भी होता है,
लिहाजा व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह पत्रिका सबसे अधिक प्रभावकारी प्रतीत होती है। दुख इस बात का होता है कि इसे जनसामान्य को उपलब्ध नहीं कराया जाता है। बेहतर तो यह हो कि बिहार विधान परिषद "साक्ष्य" को किसी निजी प्रकाशक को प्रकाशित करने की जिम्मेवारी दे दे, ताकि आम जनता भी विधान मंडल के उच्च सदन के "साक्ष्य" को जान समझ सके।

 

खैर कल का दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। महत्वपूर्ण इसलिए परिषद द्वारा वर्ष 2004 में प्रकाशित साक्ष्य का वह अंक मिला जिसका शीर्षक "नदियों की आग" है। पूर्व सभापति जाबिर हुसेन द्वारा संपादित इस अंक के कुल 1177 पृष्ठों में नदियों की दुर्दशा और नदियों के सहारे जीने वाले लोगों की वेदना का सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक चित्रण जिस संवेदनशीलता के साथ की गयी है, वह अतुलनीय है। पत्रिका के प्रारंभ में श्री हुसेन की यह पंक्तियां देखें -

 

किशन पटनायक के नाम

 

जो बिना लुकाठी

बाजार में खड़े रहे

और अपनी दुनिया

जराते रहे

 

रेत में अपना कई-कई जनमों का रिश्ता है

अपने पुरखे फ़ल्गू नदी की रेत पर जनमे थे

अपना जनम भी

फ़ल्गू नदी के रेतीले आंगन में हुआ था

उस फ़ल्गू नदी के आंगन में, जिसे शब्दकोश

सारहीन बताते रहे मगर जो एक

अन्तः सलिला, फ़ल देने वाली महान नदी है

 

मुझे यह नदी और इसकी सफ़ेद चादर पर

फ़ैली रेत ऐसा सुख देती है, जिसे

शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकते

 

मेरे लिए साक्ष्य का यह अंक

महज पत्रिका नहीं

फ़ल्गू की रेतीली धरती को

छू लेने की एक कोशिश है

- जाबिर हुसेन

 

यकीन नहीं आता है। खासकर आज के दौर में जबकि लोकतांत्रिक राजनीति पर तमाम तरह के आरोप, लांछन लगते हों(कई अवसरों पर ये आरोप/लांछन व्यर्थ साबित नहीं भी होते हैं), कोई राजनेता इतना संवेदनशील भी हो सकता है कि वह अपनी जननी जैसी नदी के गर्भ के अंदर की आग को इतनी ईमानदारी से बयां करे। क्या इतना नैतिक बल किसी और में है? मैं यह सवाल "नदियों की आग" पढते हुए और खुद झुलसते हुए कर रहा हूं।

 

पत्रिका के दूसरे ही पन्ने पर किशन पटनायक नजर आते हैं। नर्मदा की पीड़ा और मणिबेल के आदिवासियों के दम तोड़ते संघर्ष की गाथा कहते हुए। मेघा पाटकर के साथ मणिबेल के आदिवासी बनाम सरकार व "आर्य वाहिनी" के बीच असमान लड़ाई के साक्षी के रुप में पटनायक कहते हैं -

 

" यह एक असमान युद्ध ऐ। एक तरफ़ तो मणिबेल के भोले-भाले आदिवासियों के पचास परिवार हैं। दूसरी तरफ़ बड़े बांध के खेमे में विश्व बैंक और उसकी विकास नीति है, भारत का राज्यतंत्र है और विश्व बैंक द्वारा निर्देशित विकास पद्धति को अंधवि्श्वास के तौर पर मानने वाले तमाम बुद्धिजीवियों के समुह हैं, जिनका सम्मिलित उपहास "आधुनिक विकास विरोधी" लोगों की हिम्मत पस्त कर देता है।"

 

हिन्दी साहित्य में रिपोर्ताज लिखने की अपनी-अपनी शैली रही है। जिस तरीके से जाबिर हुसेन ने "मरगंगा में दूब" में गंगा और जयमंगली देवी की सजीव-निर्जीव पीड़ा को बयां किया है, मेरे जेहन में फ़णीश्वरनाथ रेणु और जाबिर हुसेन दोनों की तस्वीर एक साथ उभर रही है। वे लोग जो आज कल "भारत माता की जय" के नाम पर किसी के देशभक्त या देशद्रोही होने का प्रमाणपत्र बांटते फ़िर रहे हैं, उन्हें मरगंगा में दूबों के आग में झुलसने का कारण जरुर जानना चाहिए। एक जगह जाबिर साहब जामुन महतो और रामू ढाढी दोनों का दर्द बयां करते हैं -

"जयमंगली माता ने हमें माफ़ कर दिया है, रामू, देख पेड़ की डालियां दोबारा अपने तने तक फ़ैल गयी हैं, और देख पतियों में भी हरकत आ गयी है। और हां, देख आसमान में जिधर-तिधर बादल भी दिख रहे हैं। इस बार टाल छोड़कर कोई बाहर नहीं जाएगा, रामू। माता मान गई है। हम सब यही रहेंगे। माता की कृपा से बादल बरसेंगे, धरती को जरुरत भर पानी मिल जाएगा। हम अपने बीज उसकी गोद में डाल देंगे, रामू। देख, कह दे, सारे गांव वालों को कह दे, कोई बाहरी मंडियों में नहीं जाएगा। बादल बरसेंगे, रामू। देख, माता की पीड़ी पर भी पानी की फ़ुहारें गिर रही हैं।"

टालवासियों ने हैरत भरी आंखों से जामुन महतो की तरफ़ देखा। बोलते-बोलते, जामुन महतो अचानक रुक गये हैं। पीपल के तने को देर से पकड़े-पकड़े उनके हाथ ढीले पड़ गये हैं।

मीलों दूर, मरगंगा की मृत धारा की उपरी सतहों पर हरी दूब उग आयी है!

 

बहरहाल "नदियों की आग" में मेरा झुलसना अभी और शेष है। लेकिन नव उदारवादी युग में भी मुझे उम्मीद है कि नदियों को लेकर नेताओं और सरकार में बैठे लोगों में जो समझ बनाने की कोशिश जाबिर साहब ने की थी, वह रंग जरुर लाएगी। आज न सही, कल ही सही।

आरएसएस की वैचारिक दरिद्रता : राम पुनियानी

इन दिनों, यदि आपको यह साबित करना हो कि आप राष्ट्रवादी हैं तो आपको भारत माता की जय कहना होगा। इससे पहले, वर्तमान सरकार से असहमत सभी लोगों को राष्ट्रद्रोही बताने का दौर चल रहा था। ये दोनों मुद्दे हाल में उछाले गए हैं और जो लोग इन्हें उछाल रहे हैं, उनका उद्देश्य, राज्य द्वारा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर किए जा रहे हमले पर पर्दा डालना है। सरकार न केवल प्रजातांत्रिक मूल्यों को रौंद रही है वरन चुनावी वादों को पूरा करने में अपनी असफलता से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश भी कर रही है। Read More>>>

देवी दुर्गा, महिषासुर व जाति की राजनीति : राम पुनियानी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर हालिया हल्ले ने भारतीय पौराणिकता और उसकी व्याख्या से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया है। अपनी सरकार की कार्यवाही का बचाव करते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि जेएनयू, राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का अड्डा बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जेएनयू के दलित व ओबीसी विद्यार्थियों के कुछ समूह, महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन कर रहे हैं और आरोप लगाया कि इन विद्यार्थियों ने एक पर्चा जारी किया था, जिसमें देवी दुर्गा के बारे में कई अपमानजनक बातें कही गईं थीं। कई लोग देवी दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा करते हैं। Read More>>>

फूलों की खेती से खुशहाल हो रहे किसान

दोस्तों, राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कृषि रोड मैप अब असर दिखाने लगा है। बड़ी संख्या में किसानों ने परंपरागत कृषि छोड़कर आधुनिक कृषि को अपनाया है। इनमें सबसे खास है फूलों की खेती। बिहार सरकार द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार सूबे में फूलों का उत्पादन हाल के वर्षों में बढ़ा है Read More>>>

संपादकीय : नेपाल में संकट और और बिहार की चिंता का सबब

दोस्तों, नेपाल एक बार फिर अत्यंत ही महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वहां नये संविधान को लागू किया जा रहा है, जिसका पुरजोर विरोध भी समांतर तरीके से जारी है। भारत की चिंता का सबब केवल यह नहीं है कि वहां हिंसा की स्थिति बन गयी है और अबतक पचास से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं। भारत की चिंता की मुख्य वजह वह प्राकृतिक रिश्ता है जो अब नये संविधान के बाद प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा वहां मधेसियों की समस्या है जिनकी उपेक्षा की जा रही है। बिहार के मामले में खास बात यह है कि यहां के समाजवादियों ने नेपाल में 1960 के बाद हुए राजनीतिक आंदोलनों में न केवल नेपाल का साथ दिया बल्कि कई मायनों में नेतृत्व भी किया। Read More>>>

संपादकीय : आरक्षण खत्म करने की साजिश और सच्चाई

भागवत का बयान चौंकाने वाला नहीं है। खासकर उनके लिये जो सवर्णों की इस पीड़ा को समझते हैं कि किस तरह वंचितों ने अपनी हिस्सेदारी (फ़िर चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो या फ़िर राजनीतिक) छीनना सीख लिया है। लिहाजा सवाल रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं के लिये है कि वे किसके साथ खड़े हैं। आरक्षण विरोधियों के साथ या फ़िर आरक्षण समर्थकों के साथ। हालांकि यह भी संभव है कि भागवत का यह बयान भाजपा के इन सहयोगी नेताओं को कमजोर करने के लिये दिया गया हो ताकि वे भाजाप की राह में रोड़ा न बन सकें। Read More>>>

संपादकीय : सुभाष चंद्र बोस के नाम पर गंदी राजनीति

दोस्तों, यकीन नहीं आता है कि भारतीय राजनीति का ऐसा चरित्र भी हो सकता है। देश की आजादी के लिये अपना सबकुछ दांव पर लगाने वाले सुभाष चंद्र बोस के नाम पर भी गंदी राजनीति हो सकती है। सवाल उनके मौत पर उठाया जा रहा है। सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहें तो आरोप यह लगाया जा रहा है कि नेताजी की मौत की वजह दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या थी। अब सवाल यह उठता है कि यदि वाकई नेताजी की हत्या हुई थी तब उसके लिये कौन जिम्मेवार थे। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि सारा खेल आधे-अधूरे सच के साथ खेला जा रहा है। बिल्कुल वैसे ही जैसे बाबा साहब आम्बेदकर के निधन के बाद से दलित नेतागण खेलते आ रहे हैं। Read More>>>

महिषासुर महोत्सव : एक श्रमजीवी महानायक की आराधना या ब्राह्म्णवादी पाखंड?

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सांस्कृतिक और सभ्यतामूलक जनजागरण का प्रयास जिसे कभी कबीर, रहीम, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, डा भीम राव आंबेडकर, राजित सिंह, ललई सिंह यादव, राम लखन सिंह यादव, कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद, आदि महानायकों ने शुरू किया था, वह आज तक पूरा नहीं हो सका। आज भी ब्राह्मणवादी शक्तियां समाज के सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व बनाए रखने में कामयाब हैं। इसका मूल कारण सिर्फ और सिर्फ विध्वंसकारी मनुवादी व्यवस्था है, जिसके अहम् हिस्से के रूप में हम सभी शूद्र भी शामिल हैं। Read More >>>>

संपादकीय : तानाशाह का पर्याय न बने अदालत

दोस्तों, पटना हाईकोर्ट ने कल एक बार फ़िर बिहार सरकार के "बढ चला बिहार" कार्यक्रम पर सख्त आदेश दिया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एल नरसिम्हा रेड्डी और अंजना मिश्र की खंडपीठ का कहना है कि इस कार्यक्रम के तहत दिखाये जा रहे वीडियो से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के वीडियो आदि को अलग किया जाय। ऐसा अदालत ने कल एक लोकहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा है। जाहिर तौर पर यह आम आदमी भी समझ सकता है कि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले "बढ चला बिहार" जैसे कार्यक्रम की क्या उपयोगिता है। Read More>>>>

एहसान फरामोश हैं नरेंद्र मोदी : एल.एस. हरदेनिया

अड़सठवें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यदि हम हमारे देश की अब तक कि महायात्रा का मूल्यांकन करें तो हमें नज़र आएगी गरीबी, भुखमरी, निरक्षरता, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और कमजोर वर्ग के लोगों के जीवन में गरिमा का अभाव। इसके अतिरिक्त, इन दिनों कुछ लोग योजनाबद्ध तरीके से यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि इन अड़सठ सालों में देश में कुछ भी नहीं हुआ है। Read More>>>

अपनी बात : जाने यह कैसा लोकतंत्र है

दोस्तों, लोकतंत्र की वह परिभाषा जिसका सृजन कभी वैशाली की धरती पर हुआ था या फ़िर अब्राहम लिंकन ने जिस रुप में परिभाषित किया था, निश्चित तौर पर अब वह परिभाषा नहीं रही। प्रमाण हम सबके सामने है। ललित मोदी जैसे बड़े घोटालेबाज को प्रश्रय देने वाली सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े को लेकर कांग्रेस ने संसद में विरोध किया तब, लोकतंत्र को अपनी रखैल मानने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर लोकसभा अध्यक्षा ने 25 कांग्रेसी सांसदों को सदन की कार्रवाई से निलंबित कर दिया। Read More>>>

अधूरी एकता पर उठने लगे सवाल

पटना (अपना बिहार, 18 जुलाई 2015) - हाल ही में बिहार में परिवर्तन रथ को रवाना करने के बहाने भाजपा के चुनावी जंग का शंखनाद करते हुए अमित शाह ने अपने संबोधन में राजद-जदयू और कांग्रेस की एकता पर सवाल उठाया। यह सवाल लाजमी भी है। यदि इन सभी पार्टियों में वैचारिक समानता है और वे एक-दूसरे के साथ हैं तो यह एकता जमीन पर भी दिखनी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल समाजवादियों की एकता का है। Read More>>>

अपनी बात : अस्तित्व तलाश रहे भिखारी ठाकुर

दोस्तों, भिखारी ठाकुर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। खासकर बिहार के ग्रामीण इलाकों के लिए और उनके लिये जिनका रंगमंच और साहित्य से वास्ता है। लेकिन सबसे दिलचस्प यह है कि बिहार में केवल एक छपरा को छोड़ कहीं भी उनकी प्रतिमा स्थापित नहीं है। यहां तक कि राजधानी पटना में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भिखारी ठाकुर को सम्मान देने के लिए अहम पहल किया। उन्होंने राजधानी पटना में एक ओवरब्रिज का नामकरण भिखारी ठाकुर पुल के रुप में किया। यह वही पुल है जिसे यारपुर पुल के नाम से भी जाना जाता है। उनकी इच्छा संभवतः भिखारी ठाकुर की प्रतिमा स्थापित करने की थी। लेकिन करीब बीस वर्षों के बाद भिखारी ठाकुर पुल के पास एक प्रतिमा स्थापित तो जरुर हुई लेकिन वह प्रतिमा भिखारी ठाकुर की नहीं बल्कि महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त की है। Read More>>>

बिहार में दलित राजनीति - डा. योगेन्द्र

दलित राजनीति की भविष्य बहुत हद तक सवर्ण राजनीति पर निर्भर है।सवर्ण राजनीति के हाथ-पाँव बहुत लंबे हैं।वह कांग्रेस,भाजपा में तो है ही,वह इतना मारक है कि वह वामपंथ तक भी अपना पाँव फैलाता है। दलित राजनीति के उभार के दो प्रमुख कारण हैं। एक,सदियों से दलित समाज पर हो रहे अन्याय और दूसरे इस अन्याय को खत्म करने में असक्षम सवर्ण राजनीति।सवर्ण राजनीति ने दलितों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया। उसने इसका सिर्फ इस्तेमाल किया।सवर्ण राजनीति में दलितों को इतनी ही जगह दी गयी कि पीछे-पीछे ढोल-नगाड़े पीटते रहो। Read More>>>

कर रहे जातिगत जनगणना से इन्कार, इन गद्दारों को मारो जूते हजार

दोस्तों, अब गंगा का पानी बहुत बह चुका है। कहने का मतलब यह है कि आजादी के साढे छह दशक बीतने के बाद वंचित समाज अब अपना अधिकार सवर्ण व सामंती ताकतों से छीन पाने में सफ़ल हो रहा है। लेकिन अब भी स्थिति बहुत अधिक सकारात्मक नहीं है। वह भी तब जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं को वंचित समाज के व्यक्ति के रुप में उद्घोषित करता है। जब बामसेफ़ के बंधुओं ने देश में जातिगत जनगणना की मांग को लेकर आंदोलन शुरु किया था तब राह इतनी आसान नहीं थी। लेकिन इस आंदोलन का असर हुआ और लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव जैसे पिछड़े वर्ग के नेताओं ने तत्कालीन कांग्रेसी सरकार को देश में जातिगत जनगणना कराने को बाध्य कर दिया था। Read More>>>

संपादकीय : जातिगत जनगणना के रिपोर्ट के खुलासे से परहेज की वजह

दोस्तों, केंद्र सरकार ने बहुप्रतीक्षित सामाजिक, जातिगत और आर्थिक जनगणना की रिपोर्ट को जारी कर दिया है। केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली ने आर्थिक रिपोर्ट को देश के समाने रख दिया है। लेकिन जातिगत रिपोर्ट से अब भी परहेज किया गया है। सवाल बड़ा सीधा है। आखिर इस परहेज की वजह क्या है? कहीं इसकी एक वजह बिहार में होने वाला विधानसभा चुनाव तो नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 में शुरू हुआ जातिगत जनगणना अनौपचारिक तौर पर वर्ष 2013 में समाप्त हो गया था। तब इसे पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार ने भी जारी करने से परहेज किया था। उस समय वजह वर्ष 2014 में हुआ लोकसभा चुनाव था। Read More>>>

अपनी बात : असली मुद्दों से भटकाने लगे माननीय

दोस्तों, सूबे में राजनीति चरम पर है। चहुंओर राजनीतिक गूंज आसानी से सुना जा सकता है। नहीं सुना जा सकता है तो वे बुनियादी मुद्दों की गूंज जिसका सूबे की जनता को इंतजार है। जाहिर तौर पर इन मुद्दों में खेतीबाड़ी से लेकर शिक्षा, बिजली, चिकित्सा और रोजगार शामिल है। लेकिन सूबे के माननीयों ने कुछ ऐसा पैंतरा खेला है जिसके कारण जनहित से जुड़े सभी मुद्दे गौण होते जा रहे हैं। असली मुद्दों की जगह जुबानी तल्खियत ने ले ली है। Read More>>>

अपनी बात : अफ़वाहों से बचने की जरुरत

दोस्तों, एक बार फ़िर अफ़वाहों का बाजार गर्म हो गया है। नालंदा जिले में जिस तरह की घटना सामने आयी है वह मधुबनी गोली कांड की यादों को ताजा कर रही है। उस घटना में एक प्रेमी युगल फ़रार हो गया था और लोगों ने पूरे शहर को जला डाला था। यहां तक कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को गोलियां तक चलानी पड़ी थी। बाद में सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन कर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की। ऐसी ही घटना नालंदा जिले में सामने आयी है। एक निजी स्कूल के चार बच्चे लापता हो गये। इनमें से दो का शव एक तालाब में मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों मृत बच्चों के शव पर किसी तरह के चोट का निशान नहीं है। Read More>>>

अपनी बात : जीने दें ख्वाबों को अपनी जिंदगी

जय भीम, जय मंडल साथियों। रात के साढे ग्यारह बज रहे हैं। ठीक आधे घंटे बाद वह दिन आने वाला है जिसे दुनियावी चलन के हिसाब से मेरा जन्मदिन भी कह सकते हैं। लेकिन मेरे लिये यह तारीख महज मेरा जन्मदिन नहीं है। ठीक आठ वर्ष पहले इसी दिन मैंने अपना बिहार का ख्वाब देखा था। ख्वाब बिहार में बड़े मीडिया घरानों के बीच दलितों और पिछड़ों के लिए विशेष मीडिया का। आर्थिक समस्यायें थीं इसलिए ख्वाब को पूरा करने के लिए अंतरजाल का सहारा लिया। प्रारंभ में ब्लाग के जरिए शुरु किया गया मेरा ख्वाब आज पिछले सात वर्षों से आपके सामने है। इसका श्रेय आप सभी को जाता है, क्योंकि आपके प्रोत्साहन के कारण ही मैं इसे आपके समक्ष प्रस्तुत करने में सफ़ल रहा हूं। Read More>>>

देश की सोच पर हावी होने का कुत्सित प्रयास : इरफान इंजीनियर

फिल्म एण्ड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के शासी निकाय व सोसायटी के अध्यक्ष पद पर गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में वहां के विद्यार्थी आंदोलनरत हैं। संस्थान के विभिन्न पाठ्यक्रमों में अध्ययनरत लगभग 150 विद्यार्थी इस राजनैतिक नियुक्ति के विरूद्ध अनिश्चितकालीन हड़ताल कर रहे हैं। चौहान का नाम गूगल पर डालने से पता चलता है कि उन्होंने कुछ फिल्मों जैसे अंदाज (2003), बागबान (2003) और तुमको न भूल पाएंगे (2002) में अभिनय किया है। विकीपीडिया कहता है कि चौहान ने 150 फिल्मों और 600 टीवी सीरियलों में अभिनय किया है परंतु इन फिल्मों में से केवल चन्द से संबंधित लिंक विकीपीडिया में दी गई हैं Read More>>>

अपनी बात : कुछ अल्फ़ाज आपातकाल के नाम

दोस्तों, सवर्ण इतिहास भले ही इस सच्चाई को स्वीकारने की हिम्मत न करे, लेकिन सच्चाई यही है देश में आपातकाल लागू किये जाने के पीछे देश में सवर्णों के राजनीतिक वर्चस्व को बचाये रखने की अंतिम कोशिश थी। कांग्रेस का ब्राह्म्णवाद तब चरम पर था और पूरे देश में ब्राह्म्णवाद के खिलाफ़ आंदोलन न केवल अपने पैरों पर खड़ा था बल्कि वह ब्राह्म्णवाद को खुली चुनौती दे रहा था। हालांकि इसकी शुरुआत राष्ट्रपिता महात्मा फ़ुले ने वर्ष 1857 में ही कर दिया था लेकिन राजनीतिक स्तर पर इसकी पहचान तब बनी जब बाबा साहब डा भीम राव आम्बेदकर ने इसका नेतृत्व किया। Read More>>>

दलित मुसलमानों की सामाजिक त्रासदी : डॉ० तारिक असलम

भारतीय समाज की यह कैसी विडम्बनापूर्ण त्रासदी है कि यहाँ की बहुसंख्यक जातियां दलितों के रूप में पहचान रखती हैं, जिसमें से कुछ एक जातियों को राज्य एवं केन्द्र के आरक्षण पैनल में विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है और बहुत सारी जातियों को नजरअंदाज कर दिया गया है। इस मुद्दे पर मेरी सोच थी कि मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग करना सर्वथा अनुचित है, दूसरे यदि आरक्षण देना अनिवार्य है तो फिर समस्त जातियों में ऐसे परिवारों या व्यक्तियों की पहचान होनी चाहिए जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने में असक्षम सिद्ध हुए हैं। Read more>>>

धर्म निरपेक्षता और भारतीय राजनीति की त्रासदी

दोस्तों, इसे भारत का दुर्भाग्य कहिए कि आजादी के साढ़े छह दशक बीतने के बाद भी वह संस्कृति अब तक संशयात्मक अवस्था में जो वास्तव में भारत की पहचान रही है। यह बात आर्य इतिहासकार भी मानते हैं कि आर्यों के पहले भी इस देश में लोग रहते थे और उनका अपना धर्म और जीवन जीने का अपना सलीका था। मोहनजोदड़ो में मिले हड़प्पा संस्कृति के अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस देश के मूल निवासियों का अपना धर्म था जो बाद में अलग-अलग स्वरूपों में सामने आया। विभिन्न जाति और धर्मों वाले देश का धर्म निरपेक्ष होना एक जटिलतम परिकल्पना है Read more>>>

साहित्य चर्चा : गोरख पांडेय की समाजवादी आलोचना

- नवल

भारत में समाजवाद की परिभाषा अन्य देशों के समाजवाद से अलग है। अलग इसलिए है क्योंकि यहां का समाज अन्य देशों के समाज से अलग है। सबसे दिलचस्प यह है कि आज सामंती बुद्धिजीवी जिसे जातिवाद कहते अघाते नहीं हैं, वही भारत का असली समाजवाद है। जाहिर तौर पर सामंती बुद्धिजीवियों को यह बात कभी पचेगी नहीं कि वंचित तबके के लोग उन्हीं (सामंती) के दिये पहचानरुपी हथियार का उपयोग कर अपना अधिकार छीनने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि नहीं पचने की बात कोई नई नहीं है। एक उदाहरण गोरख पांडेय की कविता है।

 

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

 

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई

 

नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई

 

गांधी से आई, आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई

 

कांगरेस से आई, जनता से आई

झंडा से बदली हो आई

 

डालर से आई, रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई

 

वादा से आई, लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई

 

लाठी से आई, गोली से आई

लेकिन अहिंसा कहाई

 

महँगी ले आई, गरीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई

 

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई

 

परसों ले आई, बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई

 

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

 

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

 

गोरख पांडेय को बिहार के सामंती बुद्धिजीवी प्रगतिशील कवि मानते हैं तो कुछ और। लेकिन उनकी यह रचना साबित करती है कि मंडल कमीशन के पहले जब समाजवाद को भारतीय संविधान के प्रस्तावना में जोड़ा गया था तब भी समाजवाद ने इनकी चूलें हिलाकर रख दी थी। इसलिए गोरख पांडेय के इस व्यंग्य को अप्राकृतिक नहीं कहा जा सकता है।

दरअसल जिन दिनों भारत में समाजवाद को लेकर इतनी बड़ी पहल की जा रही थी, विश्व के स्तर पर पूंजीवाद अपने नये अवतार यानी नवउदारवाद में सक्रिय हो उठा था। ब्रिटेन शक्तिहीन हो चुका था और सोवियत संघ भी विघटन के दौर में था। उन दिनों नवउदारवादी मूल्यों को स्थापित करने और भारत में सामंतों का वर्चस्व बनाये रखने के कई प्रयास किये गये थे। गोरख पांडेय की कविता इसी प्रयास का हिस्सा थी।

हालांकि बहुधा लोग यह कह सकते हैं कि गोरख पांडेय ने जो अपनी कविता में लिखा, वह सब सच हो रहा है। मसलन "लाठी से आई, गोली से आई, लेकिन अहिंसा कहाई" बिहार सहित पूरे देश में मचे भूमि संघर्ष की ओर इशारा करती है। लेकिन सच यही तक सीमित नहीं है। सच यह है कि भूमि संघर्ष के साथ-साथ राजनीतिक संघर्ष भी इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ। लाठी-गोली चली क्योंकि जिन दिनों इस संघर्ष की शुरुआत हुई थी, अधिकांश वंचित तबके के लोग न तो शैक्षणिक दृष्टिकोण से और न ही राजनीतिक दृष्टिकोण से जागरुक थे। उन्हें तो केवल वही अच्छा लगता जो उनकी बात कहता था, फ़िर उसमें नाटकीयता ही क्यों न रही। परिणाम यह हुआ कि वामपंथ देश में स्थापित हुआ। लेकिन यह पंथ भी सवर्ण पंथ सरीखा निकला। हिंसक आंदोलन हुए, लाखों वामपंथ की बलिवेदी पर जबरन चढा दिये गये।

गोरख पांडेय की कविता में इसका कोई जिक्र नहीं होना समाजवाद के कारण सामंती ताकतों को मिलने वाली सशक्त चुनौती का प्रमाण भी है। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि आज भी गोरख पांडेय की कविता एक नजीर यानी उदाहरण के रुप में पेश किया जाता है।

अपनी बात : ललित मोदी पर मेहरबानी का मतलब

दोस्तों, अब यह बात साफ़ हो गयी है कि मोदी सरकार भी भ्रष्टाचारियों को अपना दामाद मानती है। यदि ऐसा नहीं होता तो एक भ्रष्टाचारी के लिये सुषमा स्वराज जैसी तथाकथित पाक साफ़ राजनीतिज्ञ ने भ्रष्टाचार के आरोपी के लिए पैरवी की। यह उनकी पैरवी का ही नतीजा रहा कि चौबीस घंटे के अंदर ही ललित मोदी को इंगलैंड जाने के लिए ट्रैवेल वीजा मिल गया। अब चूंकि इस मामले में नरेंद्र मोदी सरकार फ़ंस चुकी है तो अमित शाह जैसे बड़बोले नेताओं की बदहवासी सामने आ रही है। वहीं इस मामले में नरेंद्र मोदी की खामोशी इस बात को साबित करती है कि वे भी दूध के धुले नहीं हैं। Read More>>>

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल : राम पुनियानी

लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं, उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है? Read More>>>

 

जातिवाद : मिथक या सच्चाई?

कारपोरेट कल्चर में भी जाति और धर्म सामान्य तौर पर मायने नहीं रखते हैं। लेकिन यह महज अधूरा सच ही है। अभी भी भारत विभिन्न जातियों, धर्मों, त्यौहारों, बोलियों, भाषाओं, पहनावों इत्यादि का देश है पर भारतीय समाज का आधार जाति व्यवस्था है। इन सभी का देश की राजनीति में व्यापक इस्तेमाल होता है। उदाहरण के रूप में पिछले वर्ष हुआ लोकसभा चुनाव है जिसमें प्रधानमंत्री पद पाने के लिए नरेंद्र मोदी और उनके दल को यह प्रचारित करना पड़ा कि वे अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं। Read More>>>

1857 का तथाकथित विद्रोह और दलित-ओबीसी विमर्श

दोस्तों, इतिहास कई सवाल खड़े करता है। एक सवाल वर्ष 1857 के विद्रोह से जुड़ा है। क्या मंगल पांडेय को सचमुच गाय की चर्बी वाले कारतूस से घृणा थी? कहीं ऐसा तो नहीं था कि उन दिनों हिन्दू और मुसलमान राजाओं के उकसाने पर यह विद्रोह किया गया। इसमें कहीं भी देशभक्ति वाली कोई बात नहीं थी? एक उदाहरण वीर कुंवर सिंह का दिया जा सकता है। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तब तक अपनी जुबान नहीं खोली जबतक कि उनकी अपनी जमींदारी खतरे में नहीं पड़ी। वैसे सवाल यह भी है कि अपनी जमींदारी बचाने के लिए लड़ी गयी लड़ाई को देशभक्ति की संज्ञा कैसे दी जा सकती है। Read More>>>

मांझी को अपनी नैया पार लगाने की चुनौती

श्री मांझी ने जदयू के विधायकों को तोड़ने के लिए पहले ही अपना पासा फ़ेंक दिया है। उन्होंने ऐलान कर रखा है कि वे अपने नये कबीना को जम्बोजेट आकार का बनायेंगे जिसमें मंत्रियों की संख्या के बराबर ही उप राज्य मंत्री स्तर के सदस्य शामिल होंगे। इसके अलावा उन्होंने दो-दो उपमुख्यमंत्रियों का आफ़र भी दिया है। श्री मांझी के इस आफ़र में सबसे बड़ा डिफ़ेक्ट यह है कि Read more >>>

जयंती पर विशेष : ईमानदार राजनीति के पुरोधा बी एन मंडल

सिद्धांतहीन, मर्यादा और नैतिकताविहीन आज की राजनीतिक दौड़ में समाजवाद के महान पुरोधा भूपेंद्र नारायण मंडल की प्रासंगिकता बहुत बढ़ गई है। भूपेंद्र नारायण मंडल का जन्म मधेपुरा जिले के रानी पट्टी गाँव के एक जमींदार परिवार में एक फरवरी 1904 को हुआ था। उन्होंने भागलपुर के टी एन जे कॉलेज (जिसका नाम बाद में बदलकर टी एन बी कॉलेज, भागलपुर हो गया) से स्नातक और पटना विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की थी। Read more>>

भूमि सुधार के बगैर गरीबी उन्मूलन अधूरा

यह अत्यंत ही सुखद है कि राज्य सरकार की ओर से कैंप लगाकर भूमिहीनों को जमीन दिये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसके अलावा राज्य सरकार के द्वारा उन लोगों को जमीन पर अधिकार भी दिलाया जा रहा है, जिन्हें बासगीत की जमीन का पर्चा तो बहुत पहले ही मिल गया था, लेकिन जमीन पर अधिकार नहीं मिल सका था। Read More >>>

संपादकीय : ईवीएम भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा खलनायक

इस पूरे मसले का एक पक्ष यह भी है कि इसका इस्तेमाल तब शुरु किया गया जब देश का पिछड़ा वर्ग राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने में सफ़ल होने लगा। तर्क यह दिया गया कि ईवीएम के इस्तेमाल से बोगस वोटिंग नहीं होंगे और इसका फ़ायदा बुथ कैप्चरिंग आदि के मामलों में भी होगा। लेकिन परिणाम क्या हुआ, यह हम सभी जानते हैं। Read More >>>

 

दिलचस्प होगी राजद-भाजपा की भिडंत, विधान परिषद चुनाव को लेकर राजद का सरप्राइज बाकी, भाजपा ने भी नहीं खोले हैं अपने पत्ते

पटना(अपना बिहार, 29 मई 2016) - विधान परिषद चुनाव को लेकर जहां एक ओर जदयू ने अपने पत्ते पहले ही खोल रखा है तो दूसरी ओर उसकी साझेदार राजद ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। साथ ही मुख्य विपक्षी दल भाजपा की ओर से भी कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आगामी 30 या 31 मई को ही इस संबंध में बड़ा खुलासा हो सकता है। हालांकि विधान परिषद चुनाव को लेकर कई तरह की कयासबाजियां लगायी जा रही हैं। राजद खेमे के बारे में डा. रामचंद्र पूर्वे, हिना शहाब और सुभाष यादव का नाम उछाला जा रहा है। साथ ही यह बात भी चर्चा में है कि हिना शहाब विधान परिषद सदस्य बनने को तैयार नहीं हैं। एक कयासबाजी यह भी कि यदि श्रीमती शहाब अंतिम समय तक इसके लिए तैयार नहीं हुर्इं तो उनके बदले अशफाक करीम को विधान परिषद भेजा जा सकता है। जबकि तीसरे प्रत्याशी के रूप में बालू व्यवसाय से जुड़े सुभाष यादव का नाम सुर्खियों में है। जबकि सूत्र बताते हैं कि विधान परिषद चुनाव को लेकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद का निर्णय सभी को चकित कर देने वाला होगा।

वहीं दूसरी ओर भाजपा की ओर से दो सीटों पर कब्जा करने को लेकर जद्दोजहद की जा रही है। उल्लेखनीय है कि इस बार विधान परिषद के सात सीटों के लिए चुनाव होने हैं। इनमें आवश्यक संख्या 31 के आधार पर जदयू, राजद और भाजपा तीनों दलों को दो-दो सीटों पर बिना किसी परेशानी के जीत हासिल हो सकती है। असली खेल एक सीट को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक राजद इसके लिए बाजी खेलेगा। लेकिन अभी तक इस बात का खुलासा नहीं हो सका है कि राजद की ओर से तीसरा उम्मीदवार कौन होगा?

बहरहाल लालू प्रसाद न केवल अपने दिलचस्प राजनीतिक निर्णयों के लिए जाने जाते रहे हैं, बल्कि उनकी चाल के उनके विपक्षी भी मुरीद रहे हैं। चूंकि विधानसभा में राजद सबसे बड़ी पार्टी है और उसके पास तीन सीटों पर कब्जा के लिए पर्याप्त संख्या बल है। हालांकि इस चुनाव में एनडीए की एकता भी कसौटी पर जांची परखी जा सकेगी। फिलहाल चर्चाओं का बाजार गर्म है।

राजद कोटे से जेठमलानी और मीसा का राज्यसभा जाना तय, विप में तीसरे सीट के लिए हो सकता है राजनीतिक घमासान, यदि कांग्रेस साथ नहीं आयी तो एनडीए पर टूट का संकट

पटना(अपना बिहार, 28 मई 2016) - राज्यसभा और विधान परिषद में राजद की तरफ से कौन-कौन प्रत्याशी होंगे, इसे लेकर चर्चाओं का दौर शुक्रवार को भी जारी रहा। इस बीच सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने राज्यसभा के लिए राम जेठमलानी और अपनी पुत्री डा. मीसा भारती के नाम पर मुहर लगा दी। हालांकि इस संबंध में अभी तक राजद की ओर से कोई अधिकारिक सूचना नहीं दी गयी है। सूत्रों के मुताबिक पहले जेठमलानी के साथ राबड़ी देवी को राज्यसभा भेजे जाने की चर्चा थी। लेकिन पार्टी सूत्रों की मानें तो राबड़ी देवी के बदले अब डा. मीसा भारती उम्मीदवार होंगी। चूंकि विधानसभा में राजद के पास दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या बल है, लिहाजा किसी भी तरह का कोई राजनीति अड़चन नहीं आने की उम्मीद है। सूत्रों के अनुसार आगामी 30 मई को दोनों राज्यसभा के लिये नामांकन करेंगे। हालांकि इस रेस में कई कद्दावर नेता कतार में थे। वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह और एजाज अली भी इन सीटों पर नजर गड़ाये हुए थे।

वहीं सूत्रों की मानें तो विधान परिषद के लिए राजद के प्रदेश अध्यक्ष डा. रामचंद्र पूर्वे का नाम फाइनल बताया जा रहा है। जबकि दूसरे सीट के लिए पूर्व विधान पार्षद तनवीर हसन और हिना शहाब को लेकर सस्पेंस जारी है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो राजद इस बार तीन प्रत्याशी मैदान में उतार सकता है। इसकी वजह भाजपा के पास दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या बल है। लेकिन एक सीट के लिए राजद घमसान मचा सकती है। वजह यह है कि विधान परिषद में एक सीट के लिए कम से कम 31 सदस्यों का वोट चाहिए। इस लिहाज से राजद को अपने तीसरे प्रत्याशी के लिए 13 अतिरिक्त वोटों की दरकार हो सकती है। इसमें जदयू के दस वोट (विधानसभा में जदयू के कुल 72 सदस्य हैं) के अलावा तीन सीटों के लिए घमासान मचने के आसार हैं। हालांकि माले के तीन विधायकों ने पहले ही मतदान बहिष्कार का निर्णय लिया है। इसके अलावा राजवल्लभ यादव के जेल में होने से आवश्यक मतों की संख्या तीस हो सकती है। सूत्रों की मानें तो राजद खेमे में अपने तीसरे प्रत्याशी को जिताने के लिए उच्च स्तर की जोर आजमाइश की जा रही है और एनडीए के कमजोर कड़ी की तलाश की जा रही है। वहीं उसकी नजर 4 निर्दलीय सदस्यों पर भी है। हालांकि कांग्रेस के साथ आ जाने से उसे किसी प्रकार की कोई राजनीतिक परेशानी नहीं होने की उम्मीद है।

संपादकीय : ताड़ी का "विकास"

दोस्तों, अब यह कहने की आवश्यकता नहीं रह गयी है कि नीतीश कुमार एक विजन वाले मुख्यमंत्री हैं। वे जब भी कोई फ़ैसला लेते हैं तो उसके पहले उस फ़ैसले के हर पहलू के बारे में गहन सोच-विचार करते हैं। हालांकि राजनीतिक मामलों में उनके द्वारा लिये गये कई फ़ैसलों पर सवाल उठाया जा सकता है और मेरे हिसाब से उठाया भी जाना चाहिए। एक अहम फ़ैसला "मानव विकास मिशन" से जुड़ा है। लेकिन शराबबंदी को लेकर उनकी सोच बहुत स्पष्ट है। ताड़ी की सार्वजनिक बिक्री पर रोक का निर्णय भी समालोचना का विषय है, परंतु जिस तरीके से उन्होंने ताड़ी व्यवसायियों व मजदूरों के लिए विकल्प तलाशने की ओर कदम बढाये हैं, उनकी प्रशंसा होनी चाहिए।

गुरुवार को मुख्यमंत्री सचिवालय स्थित संवाद में एक अति विशेष बैठक में मुख्यमंत्री ताड़ी से जुड़े विभिन्न विकल्पों पर विचार किया। उन्होंने इस जीविका से जोड़कर आगे बढाने का निर्णय लिया है। यह भी स्वागतयोग्य पहल है। ताड़ी से लोग गुड़, कैंडी और शहद जैसे उत्पाद बना सकेंगे। इससे ताड़ी उतारने और इससे जुड़े व्यवसायियों को कितना लाभ होगा, यह तो आने वाला समय बतायेगा। लेकिन इसका एक सामाजिक पहलू भी है।

सामाजिक पहलू यह कि ताड़ी उतारने का काम तो पुरुष करते हैं, लेकिन उसे बेचने का काम अधिकांश तौर पर महिलायें करती हैं। यह उनकी मजबूरी भी है। दूसरा इसका मार्केटिंग पहलू भी है। ठीक वैसे ही जैसे आज पुरुषों के उपयोग की चीजों की मार्केटिंग के लिये विज्ञापनों में महिलाओं के सुन्दर चेहरे का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन गांवों में ताड़ी बेचने वाली महिलाओं को सम्मान की दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता है। भोजपुरी में एक गीत तो ऐसा है जो द्विअर्थी तो है ही ताड़ी बेचने वाली महिलाओं के आत्मसम्मान पर चोट भी करता है।

बहरहाल नीतीश कुमार द्वारा इस पूरे पेशे को सम्मानजनक बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। यह नायाब तरीका हो सकता है। लेकिन असल सवाल उनकी कोशिशों के जमीन पर उतरने को लेकर है। इसकी कई वजहें हैं। दिलचस्प यह है कि गांव में पले-बढे मु्ख्यमंत्री स्वयं भी इन वजहों को जानते-समझते हैं। उनकी राजनीति में "मोकामा टाल में ताड़ का पेड़" का बड़ा महत्व है। देखें मुख्यमंत्री की पहल कितने समय में और कितना बदलाव लाती है। फ़िलहाल तो उनके इस अच्छे काम के लिए उन्हें शुभकामना।

संपादकीय : ब्राह्म्णवादी शिकंजे से बाहर निकले वंचितों का साहित्य

दोस्तों, आज के भारतीय साहित्य में विमाहीनता की स्थिति बनती जा रही है। जहां एक ओर मुख्य धारा का साहित्य आज भी ब्राह्म्णवादियों का साहित्य है तो अन्य साहित्य मसलन दलित साहित्य, स्त्री साहित्य और ओबीसी साहित्य की धारायें भी विस्तार के बजाय सीमित होती जा रही हैं। हालांकि यह बात जरुर है कि हलचल तेज है। परंतु वास्तविकता यही है कि वंचितों का साहित्य आज भी अपने लिए पनाह खोजता फ़िर रहा है। Read More>>>

मुख्यमंत्री ने दी प्रधानमंत्री को बधाई, कसा तंज, दो वर्षों में देश के लिए कुछ किया नहीं, शेष समय में करें देश का कल्याण

पटना(अपना बिहार, 26 मई 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार राज्यस्तरीय बैंकर्स समिति की 56वीं त्रैमासिक समीक्षा बैठक में भाग लेने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुये कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दो साल का कार्यकाल पूरा हो गया है, मैं उनको बधाई देता हूं। उन्होंने कहा कि वे पॉच साल के लिये चुने गये हैं, दो साल में तो कुछ किया नहीं है, आगे कुछ करने की कोशिश करें। मुख्यमंत्री ने पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर कहा कि सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन हत्याकांड पर हमने शुरू से ही कहा है कि लोगों को भरोसा रखना चाहिये, लोगों का भरोसा है। कुछ लोगों का भरोसा नहीं रहता है। उन्हें हर चीज पर बयान देने की आदत है। हर चीज को मिसइंटरप्रेटैशन करने की यहॉ एक आदत सी पड़ गयी है। वे अपनी जगह पर हैं। मुझे इस विषय पर कुछ नहीं कहना है। उन्होंने कहा कि पुलिस पर पूरा भरोसा रखना चाहिये और इस मामले की तह में पुलिस पहुॅच रही है। उनका ब्रेक थू्र हो गया है। बार-बार पुलिस के अधिकारी कह रहे हैं कि हमलोग इस मामले का उद्भेदन करने में कामयाब रहेंगे। जो भी इस उद्भेदन में जिम्मवार पाये जायेंगे, उन पर कठोर कार्रवाई होगी। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा कि जदयू राज्य सभा की दो सीट और विधान परिषद की दो सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इसके नामों की घोषणा बाद में की जायेगी।

राज दरबार के राज अबला मंत्री की हैसियत

दोस्तों, राज दरबार का मतलब ही राजा का दरबार होता है। जिन दिनों देश में लोकतंत्र नहीं था, दरबार लगाने का सिलसिला चलता रहा है। दरबार भी कई प्रकार के होते रहे हैं। मसलन राजनीति से लेकर ऐश मौज तक के लिए अलग-अलग दरबार। एक अनोखी पहल मुगल बादशाह जहांगीर ने की थी। जहांगीरी घंटा लगवाकर। जहांगीर ने अपनी प्रजा के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराया था। कोई भी फ़रियादी किसी भी समय घंटा बजा सकता था और वह अपनी फ़रियाद बादशाह के समक्ष रख सकता था। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने दरबार लगायी या नहीं, इसकी अहम जानकारी इतिहास के पन्नों में नहीं देखने को मिलता है। इसकी वजह संभवतः यह भी हो सकती है कि अंग्रेजों ने पहली बार इस देश में एक संगठित शासन पद्धति की नींव डाली। न्यायालय से लेकर स्थानीय पदाधिकारियों की नियुक्ति की गयी।

लेकिन लोकतंत्र में दरबार का बहुत महत्व होता है। कम से कम बिहार में इन दिनों दरबार की राजनीति खूब चल रही है। इसके कई नायाब उदाहरण हैं। एक चर्चा सूबे के राजा के विशेष दरबार की। सचिवालय के सभागार में दरबार का आयोजन किया गया था। खास बात यह थी कि इस दरबार में पक्ष-विपक्ष के लोग भी जुटे थे। जिस विषय पर जुटे थे, वह अत्यंत ही महत्वपूर्ण था। महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के सौ वर्ष पूरे होने पर राज्य सरकार द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को लेकर मुख्य रुप से चर्चा हुई।

दरबार में राजा के आने के पहले सभी पहुंच चुके थे। इनमें एक अबला मंत्री भी थीं, जिनके उपर सूबे में पर्यटन के विकास की जिम्मेवारी राजा ने दे रखी है। चूंकि गांधी पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, इसलिए संभवतः उन्हें भी दरबार में हाजिरी लगानी पड़ी थी। खैर राजा के आगमन के पहले सभी अपने-अपने लिए निर्धारित किये गये जगहों पर विराजमान हो गये। अबला मंत्री भी अपना नेम प्लेट देख कर बैठ गयीं। वह भी राजा के बगल वाली कुर्सी पर।

राजा आये तब लोकतांत्रिक धर्म निभाते हुए सभी खड़े हो गये और राजा ने भी हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन किया। सामने नजर पड़ी तो देखा कि एक पुराने कद्दावर साथी दूर बैठे थे। राजा ने अबला मंत्री की ओर देखा और बिना किसी शिष्टाचार के उन्हें दूर बैठने को कह दिया और अपने पुराने साथी को अपने पास बुला लिया। बेचारी अबला मंत्री मन मसोस कर रह गयीं। अगले दिन राजा अपने पुराने साथी के साथ अखबार के पन्नों में चमक रहे थे और बेचारी अबला मंत्री

जल संकट दूर करने को सामूहिक और ईमानदार प्रयास जरुरी

साथियों, अपना बिहार के संपादक नवल किशोर कुमार जी के इस अनुरोध के लिए मैं उनके प्रति आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने आज के संपादकीय आलेख की जिम्मेवारी मुझे दी। आज इस अवसर का लाभ मैं आप सभी के साथ उस संकट को साझा कर उठाना चाहता हूं, जिससे आज केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरा देश और विश्व जूझ रहा है। मैं जल संकट की बात कर रहा हूं। सुखद है कि इस बार मानसून अच्छे होने के आसार हैं और मौसम विभाग ने इसकी भविष्यवाणी की है। परंतु जल संकट सवाल तो है। सवाल की एक पृष्ठभूमि यह है कि महाराष्ट्र के लातूर में सरकार को पानी एक्सप्रेस चलानी पड़ी। जिस तरह से बिहार में भूगर्भ जल स्तर में गुणोत्तर कमी आ रही है, यदि हम नहीं संभले तब आने वाले समय में बिहार में भी ऐसे दृश्य देखे जा सकेंगे।

मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं। मेरे गांव सरेंजा(प्रखंड - चौसा, जिला बक्सर) में उन दिनों कई तालाब थे। यह कहना अधिक सटीक होगा कि तालाबों के बीच में मेरा गांव था। गांव की सीमा के अंदर ही आठ तालाब हुआ करते थे। इन तालाबों का सोन नहर से संपर्क था। उन दिनों की एक और याद अभी भी मेरे जेहन में जीवित है। पहले हथिया नक्षत्र के पहले गांव के सब लोग बरसात को लेकर एक महीने का राशन, जलावन और मवेशियों का चारा इकट्ठा करते थे। बरसात शुरु होती तो खत्म होने का नाम नहीं लेती थी।

खैर यह सब अतीत की बात है। मेरी मुख्य चिंता पारंपरिक जल स्रोतों के खत्म होने से जुड़ी है। पूरे बिहार में आहर-पईन खत्म होते जा रहे हैं। खत्म होने की बड़ी वजह अतिक्र्मण है। हालांकि इस अतिक्रमण के भी दो स्वरुप हैं। एक अतिक्रमण तो वह जो धनाढ्य और बाहुबलियों ने अपनी ताकत के बल पर किया है। दूसरा अतिक्रमण वह जो गरीब भूमिहीनों ने किया है। सवाल यदि नहरों और पईनों को अतिक्रमण मुक्त कराने का हो तो सरकार को दोनों तरीके के अतिक्रमण खत्म करने चाहिए। लेकिन गरीब भूमिहीनों को पुनर्वासित किये जाने की प्रक्रिया भी की जानी चाहिए।

लेकिन जल संकट के लिए केवल सरकार पर ही सारी जिम्मेवारियां नहीं थोपी जा सकती है। इस संकट के लिए आम जनता भी समान रुप से जिम्मेवार है। गांवों में कुएं सूखते चले गये हैं। ये कुएं वाटर हार्वेस्टिंग के सबसे अच्छे तरीके थे। आज आवश्यकता है कि हम सभी पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करें। इसे एक अभियान के रुप में लिया जाना चाहिए। मुझे तो आश्चर्य होता है यह जानकर कि राजधानी पटना में कभी तीन सौ तालाब हुआ करते थे और वर्तमान में केवल 13 शेष रह गये हैं। सवाल है कि जब बिहार की राजधानी पटना में यह हाल है तो अन्य जिलों की क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना जटिल नहीं है। मुझे लगता है कि राज्य सरकार भी अपनी जिम्मेवारी को समझे।

बहरहाल यह बात भी उल्लेखनीय है कि कागज पर सरकार के द्वारा इस तरह के प्रयास किये जाते रहे हैं। मसलन मनरेगा के तहत वर्ष 2006-07 से ही सूबे में जलाशयों के निर्माण और आहर-पईनों के जीर्णोद्धार की योजनायें चल रही हैं। लेकिन दुखद यह है कि अधिकांश योजनायें जमीन पर नहीं बल्कि कागजों में ही पूर्ण की जाती हैं। इस बार भी वित्तीय वर्ष 2016-17 में राज्य सरकार ने करीब 15 हजार जलाशयों के जीर्णोद्धार का लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि इसे ही एक मानक मानें तो पिछ्ले दस वर्षों में डेढ लाख जलाशयों का जीर्णोद्धार हो जाना चाहिए था। इससे पहले जल संसाधन विभाग के द्वारा भी इस तरह की योजनायें चलायी जाती रही हैं। सवाल यह है कि इन प्रयासों को जमीन पर क्यों नहीं उतारा जा सका। इसकी जांच भी होनी चाहिए।(लेखक शिव प्रकाश राय बिहार के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता हैं और नागरिक अधिकार मंच के संयोजक हैं)

दिल्ली में जंगलराज क्यों, बतायें नरेंद्र मोदी : मीसा

पटना(अपना बिहार, 22 मई 2016) - बिहार में कानून के राज पर सवाल उठाने वाले भाजपा नेताओं और विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताना चाहिए कि दिल्ली में जंगल राज क्यों है। ये बातें राजद की वरिष्ठ नेत्री डा. मीसा भारती ने अपने बयान में कही। उन्होंने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा है कि वहां की विधि-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक हो गयी है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में वहां जंगलराज होने की बात कही है। श्रीमती भारती ने कहा कि दिल्ली में सरकार भले ही अरविन्द केजरीवाल की है लेकिन विधि-व्यवस्था की जिम्मेवारी केंद्र सरकार की है। ऐसे में प्रधानमंत्री को सरकार का मुखिया होने के नाते इसका जवाब देना चाहिए। उन्होंने प्रदेश भाजपा के नेताओं पर भी प्रहार करते हुए कहा कि बिहार में आये दिन जंगलराज का राग अलापने वाले नेताओं को दिल्ली में विधि-व्यवस्था की बदहाली को लेकर विरोध प्रदर्शन और कैंडिल मार्च निकालना चाहिए।

अपनी बात : और कितने हिन्दुस्तान मिस्टर तानाशाह?

सबसे बड़ी बात यह है कि 90 के दशक में बाबरी विध्वंस कर इतिहास की हत्या करने की कोशिश तब गैर सरकारी थी। अब इसका सरकारीकरण कर दिया गया है। इसका विरोध जरुरी है।

दोस्तों, दो वर्ष पहले कांग्रेस की गलत रणनीति और धर्म निरपेक्ष ताकतों के बीच एका नहीं होने के कारण एक ऐसी ताकत केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुई, जिसकी बुनियाद ही भारत की बर्बादी पर आधारित है। यही वजह है कि वह अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को लागू करने पर आमादा है। हाल ही में दिल्ली में अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप के नाम पर करने की कवायद की गयी है। इसके पहले गुड़गांव को द्रोणाचार्य के नाम पर "गुरुगांव" करने की बात कही गयी। वहीं द्रोणाचार्य जिसने एकलव्य और कर्ण को शिक्षा देने के बजाय राजपूत्रों को शिक्षा दी थी। हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले नरेंद्र मोदी इस बात को समझ चुके हैं कि देश में केवल दो ही तरीके से राज किया जा सकता है। पहला तो यह कि देश की बुनियादी समस्या को कचरे के डब्बे में डाल भावनात्मक मुद्दों को तरजीह देना और दूसरा समानांतर तरीके से बहुसंख्यक वर्ग को बेहतरी के सपने दिखाना। यह दोनों काम नरेंद्र मोदी और उनकी मातृ संस्था आरएसएस पूरे उत्साह से कर रही है। इतिहास गवाह है कि आरएसएस की धर्म आधारित राजनीति के कारण ही देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान बना। सवाल उठता है कि और कितने टुकड़ों हिन्दुस्तान को बांटना चाहते हैं नरेंद्र मोदी और उनके आकागण।

यह सभी जानते हैं कि मोदी के सत्ता संभालते ही संघ परिवार के विभिन्न अनुषांगिक संगठन अतिसक्रिय हो गए। पुणे में मोहसिन शेख नामक एक सूचना प्रोद्योगिकी कर्मी की हिंदू राष्ट्रसेना के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम हत्या कर दी। संघ परिवार के सदस्य संगठनों ने हर उस व्यक्ति और संस्थान को निशाना बनाना शुरू कर दिया और उसके खिलाफ घृणा फैलानी शुरू कर दी जो सत्ताधारी दल के एजेंडे से सहमत नहीं था। केंद्र में मंत्री बनने के पहले, गिरिराज सिंह ने कहा कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। पार्टी की एक अन्य नेता साध्वी निरंजन ज्योति ने उन लोगों को हरामजादा बताया जो उनकी पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं थे। सत्ताधारी दल और उसके पितृसंगठन आरएसएस से जुड़े सभी व्यक्तियों ने एक स्वर में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध विषवमन करना शुरू कर दिया और हमारे शक्तिशाली प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। यह कहा गया कि प्रधानमंत्री से आखिर यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे हर छोटी-मोटी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें। ऐसा लगता है कि उनकी चुप्पी सोची-समझी और आरएसएस के श्रम विभाजन का भाग थी। यह बार-बार कहा जाता है कि जो लोग घृणा फैला रहे हैं वे मुट्ठीभर अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि वे लोग शासक दल के प्रमुख नेता हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदुत्व की राजनीति, पहचान से जुड़े मुद्दों पर फलती-फूलती है। इस बार गौमाता और गौमांस भक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया गया और इसके आसपास एक जुनून खड़ा कर दिया गया। इसी जुनून के चलते, दादरी में मोहम्मद अख़लाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और देश के अन्य कई स्थानों पर हिंसा हुई। उसके पहले, दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई थी। दादरी की घटना ने पूरे देश का ध्यान बढ़ती हुई असहिष्णुता की ओर खींचा और कई जानेमाने लेखकों, वैज्ञानिकों और फिल्म निर्माताओं ने उन्हें मिले पुरस्कार लौटा दिए। इसे गंभीरता से लेकर देश में तनाव को कम करने के प्रयास करने की बजाए, पुरस्कार लौटाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया गया। यह कहा गया कि वे राजनीति से प्रेरित हैं या पैसे के लिए ऐसा कर रहे हैं।

हिन्दुस्तान को बर्बाद करने के लिए आरएसएस के लोगों ने अपने पूर्वजों अंग्रेजों के जैसे भारतीय साहित्य और संस्कृति पर सबसे पहले हमला करना शुरु किया। प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में चुन-चुनकर ऐसे लोगों की नियुक्तियां की गईं जो भगवा रंग में रंगे हुए थे। गजेन्द्र चैहान को भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति का विद्यार्थियों ने कड़ा विरोध किया परंतु उसे नज़रअंदाज कर दिया गया। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को निशाना बनाया गया। स्थानीय भाजपा सांसद बंगारू दत्तात्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से यह शिकायत की कि विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी और जातिवादी गतिविधियां चल रही हैं। मंत्रालय के दबाव में विश्वविद्यालय ने रोहित वेमूला और उनके साथियों को होस्टल से निष्कासित कर दिया और उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी। इसी के कारण रोहित ने आत्महत्या कर ली।

हालांकि शैक्षणिक संस्थाओं के संबंध में सरकार की नीति का देशव्यापी विरोध हुआ। फिर जेएनयू को निशाना बनाया गया और कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का झूठा आरोप मढ़ दिया गया। जिन लोगों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाए थे उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया। इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया गया कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है। एक छेड़छाड़ की गई सीडी का इस्तेमाल जेएनयू के शोधार्थियों को फंसाने के लिए किया गया। उन पर देशद्रोह का आरोप लगाए जाने से राष्ट्रवाद की परिभाषा पर पूरे देश में बहस छिड़ गई।

बात यहीं नहीं रुकी। आरएसएस के बददिमाग मुखिया ने एक दूसरा भावनात्मक मुद्दा उठाते हुए कहा कि युवाओं को भारत माता की जय का नारा लगाना चाहिए। इसके उत्तर में एमआईएम के असादुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अगर उनके गले पर छुरी भी अड़ा दी जाए तब भी वे यह नारा नहीं लगाएंगे। आरएसएस के एक अन्य साथी बाबा रामदेव ने आग में घी डालते हुए यह कहा कि अगर संविधान नहीं होता तो अब तक लाखों लोगों के गले काट दिए गए होते। यह समझना मुश्किल नहीं है कि यह कितनी भयावह धमकी थी।

अब सवाल एक बार फ़िर से ऐतिहासिक तथ्यों को भगवावादी विचारों से मिटाने की कुचेष्टा की। यह सभी जानते हैं कि महाराणा प्रताप एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपनी सत्ता बचाने के लिए मुगलों के साथ संघर्ष किया। इसे देशभक्ति कहना निश्चित तौर पर इतिहास के साथ खिलवाड़ होगा। जिन दिनों महाराणा प्रताप अकबर के डर से जंगलों में छिपे थे, उन दिनों भी देश में सत्ता को लेकर संघर्ष था। लेकिन उन दिनों लोकतंत्र नहीं था। सत्ता के लिए राजाओं में लड़ाईयां होती थीं। कोई हारता था तो कोई जीतता था। जहां तक अकबर का सवाल है, अकबर महान ने इस देश में पहली बार धर्म निरपेक्षता की बुनियाद रखी। प्रमाण यह कि भले ही जोधाबाई के साथ उनका विवाह तत्कालीन राजपूत राजाओं के साथ एक राजनीतिक समझौता था, अकबर ने इस रिश्ते को आजीवन पूरा सम्मान दिया। अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक पंथ की शुरुआत भी की। उनके शासनकाल को आज भी भारत में मुगलों का स्वर्णिम काल माना जाता है।

बहरहाल देश को तोड़ने का षडयंत्र करने वाले बड़ी तेजी से अपने मंसूबों में कामयाब हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि 90 के दशक में बाबरी विध्वंस कर इतिहास की हत्या करने की कोशिश तब गैर सरकारी थी। अब इसका सरकारीकरण कर दिया गया है। इसका विरोध जरुरी है। विरोध इसलिए कि भारत फ़िर से टुकड़ों-टुकड़ों में बंटने को तैयार नहीं है।

मोदी सरकार के दो साल : टूटे वायदे और विघटनकारी एजेंडा

मोदी सरकार के दो साल के कार्यकाल की समीक्षा के मुख्यतः दो पैमाने हो सकते हैं। पहला, चुनाव अभियान के दौरान किए गए वायदों में से कितने पूरे हुए और दूसरा, भारतीय संविधान में निहित बहुवाद और विविधता के मूल्यों की रक्षा के संदर्भ में सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा। मोदी सरकार के दिल्ली में सत्ता संभालने के बाद लोगों को यह उम्मीद थी कि अच्छे दिन आएंगे, विदेशों में जमा काला धन वापिस आएगा और रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं और गरीबों के भोजन रोटी-दाल में से दाल इतनी मंहगी हो गई कि मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए भी उसे खरीदना मुश्किल हो गया है।Read More>>>

अपनी बात : संघमुक्त नहीं, ब्राह्म्णवाद मुक्त हो भारत

दोस्तों, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वाराणसी में जदयू की एक रैली के दौरान संघमुक्त भारत का आह्वान किया है। इसको लेकर भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं को तो तीखी मिर्ची लगी ही है, साथ ही संघ से सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का भी कलेजा फ़टने लगा है। इतना ही नहीं स्वयं को समाजवादी कहने वाले कुछ नेताओं को भी श्री कुमार का आह्वान रास नहीं आ रहा है। वैसे यह अप्राकृतिक नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री ने सीधे-सीधे आरएसएस पर वार किया है। वहीं आरएसएस जिसके कारण देश में धर्म के आधार पर राजनीति की शुरुआत हुई और परिणामस्वरुप देश को दो भागों में बंटना पड़ा। Read More>>>

फ़्लैक्स बोर्डों में नेताओं का चमकता है चेहरा, कराहता है पटना

हानिकारक रेजिन के इस्तेमाल से बनता है फ़्लैक्स शीट, सरकार भी करती है धड़ल्ले से उपयोग

पटना(अपना बिहार, 16 मई 2016) - मामला बहुत गंभीर है। अभी हाल ही में एक अतंरराष्ट्रीय रिपोर्ट में सूबे की राजधानी पटना को विश्व का सबसे छठा प्रदूषित शहर माना गया है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन की लापरवाही तो जिम्मेवार है ही, साथ ही सरकार के नीतिगत स्तर पर भी इसे लेकर कोई संवेदनशीलता नहीं है। एक उदाहरण सूबे में फ्लैक्स बोर्ड का बढ़ता उपयोग है। यह एक खतरनाक प्लास्टिक माना गया है। साथ ही जिस रसायन से इसके उपर ग्राफिक्स बनाये जाते हैं, वे भी पर्यावरण को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसके उपयोग के लिए सरकार के स्तर पर कोई नियम कानून नहीं है। यहां तक कि राज्य सरकार भी धड़ल्ले से खतरनाक फ्लैक्स बोर्डों का इस्तेमाल अपना चेहरा चमकाने के लिए करती है। इस सच को सूबे के वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह भी मानते हैं। दूरभाष पर बातचीत में उन्होंने कहा कि सूबे में प्लास्टिक के फ्लैक्स के उपयोग को लेकर राज्य सरकार जल्द ही एक नीति बनायेगी। उन्होंने बताया कि वे स्वयं मानते हैं कि फ्लैक्स के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण दुष्प्रभावित हो रहा है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राज्य सरकार जल्द ही सरकारी कार्यक्रमों में इसके इस्तेमाल पर रोक लगाने के संबंध में निर्णय लेगी।

खैर पहले जब फ्लैक्स नहीं थे तब धरना-प्रदर्शन से लेकर विभिन्न कंपनियां अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए कपड़े की सहायता से बैनर बनवाया करती थीं। लेकिन फ्लैक्स के आने के बाद कपड़े का बैनर अतीत बन गया। इसके कारण जहां एक ओर इस व्यवसाय से जुड़े पेंटर बेरोजगार हो गये तो दूसरी ओर फ्लैक्स बनाने वालों की बाढ़ सी आ गयी। फ्लैक्स का व्यवसाय करने वाले एक उद्यमी के मुताबिक प्रत्येक दिन वह कम से कम पांच हजार मीटर फ्लैक्स प्रिंटिंग करता है। जबकि अकेले केवल राजधानी पटना में तीन सौ से अधिक फ्लैक्स कारोबारी हैं। फ्लैक्स उद्यमी स्वयं मानते हैं कि फ्लैक्स पर प्रिंटिंग पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है लेकिन टेक्नोलॉजी के कारण जहां एक ओर यह आसान है तो दूसरी ओर यह ड्यूरेबल भी होता है जिसके कारण ग्राहक केवल इसीकी मांग करते हैं।

बहरहाल फ्लैक्स के उपयोग को लेकर राज्य सरकार कोई गाइडलाइन तय करे, यह तो महत्वपूर्ण है ही। साथ ही इसे सख्ती से लागू भी करे ताकि पूरे सूबे को प्लास्टिक के कचरों से पटने से बचाया जा सके। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि राज्य सरकार ने प्लास्टिक के थैलों को प्रतिबंधित कर रखा है और समय-समय पर इसके लिए कार्रवाईयां भी की जाती हैं, लेकिन नतीजा आजतक सिफर ही है। इसकी एक वजह समाज में प्लास्टिक पर बढ़ती निर्भरता भी है।

पूसा को मिला केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का दर्जा, केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने जतायी खुशी

नयी दिल्ली / पटना(अपना बिहार, 13 मई 2016) - समस्तीपुर में पूसा स्थित राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने बिहारवासियों को बधाई देते हुए कहा है कि पूसा, समस्तीपुर में स्थित डॉ. राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने से बिहार की जनता की वर्षों पुरानी मांग पूरी हो गयी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के लोगों का एक बड़ा सपना पूरा कर दिया।

संसद ने कल, 11 मई, 2016 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय विधेयक - 2015 को अपनी मंजूरी दे दी। पहले राज्य सभा ने और फिर लोक सभा ने ध्वनिमत से इस विधेयक को पारित कर दिया। बाद में कल ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस पर हस्ताक्षर किए।

इस विधेयक के दोनों सदनों से पारित हो जाने के बाद केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय राज्य के लोगों के लिए शानदार तोहफा है। उन्होंने कहा कि अब इस विश्वविद्यालय को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाएगा। यह राज्य का पहला और देश का दूसरा केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय है। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने कहा कि इस विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा दिलवाने के लिए पिछले सात वर्ष से प्रयास हो रहे थे। इस विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा मिलने से अब बिहार में महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के साथ दो बड़े केन्द्रीय विश्व विद्यालय दो वर्षों के अंदर खोलकर मोदी सरकार ने बिहार वासियों को सबसे बड़ा तोहफा दिया। 2009 से राज्य एवं भारत सरकार के बीच चल रहे विवाद का विराम भी हो गया और किसानों को एक बड़ा उपहार भी मिल गया।

आदित्य की हत्या से हुआ मर्माहत : तेजस्वी

गया में जदयू एमएलसी मनोरमा देवी के पुत्र रॉकी द्वारा आदित्य सचदेवा की हत्या मामले में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने गहरा दुख व्यक्त किया है। Read More>>>

खास खबर : शराबबंदी ने सीमांचल में महिलाओं को बनाया वाइन स्मगलर

- रजा मुराद

किशनगंज(अपना बिहार, 12 मई 2016) - शराबबंदी को शेष बिहार में भले ही कड़ाई से लागू कराया जा रहा हो, लेकिन सीमांचल के जिलों में न तो स्थानीय प्रशासन पूरी जवाबदेही के साथ एक्शन में है और न ही स्थानीय शराबियों पर सरकार की अपील का कोई असर पड़ रहा है। हालत तो यह हो गयी है लोग बड़े आराम से सीमा पार कर मदिरा सेवन करते हैं। इसके अलावा गरीब महिलायें इन दिनों वाइन स्मगलर बन गयी हैं। सीमा पर महिला जवानों की तैनाती नहीं होने के कारण शराब के कारोबार से जुड़ी महिलाओं की जांच नहीं की जाती है।

शराबी धड़ल्ले से होटल ढाबा और बीयर बारों में जाम से जाम टकरा रहे हैं। बिहार और नेपाल के सटे जोगबनी,रंगेलि ,जनता, विराटनगर आदि महज 5 से 30 किलोमीटर के अंदर आते है। जो महज 10 मिनट से 30 मिनट की दुरी तय कर बड़े ही आराम से शराव पीकर वापस चले आते है। जिस कारण शारब के ठिकाने पर जमघट लगा रहता है। हर दिन हजारों की संख्या में लोग नेपाल पहुँच कर जाम छलका रहे है ।बिहार में पूर्ण शराबबंदी से जहा पड़ोसी देश नेपाल के मयखाने गुलजार हो रहे है। शराब के शौकीन खुली सीमा का लाभ उठा करा आसानी से छोटे-बड़े वाहनों व पैदल चले आते है और मस्त होकर वापस लौट आते है।।

अब शराब तस्करी की बात भी सामने आ रही है। नेपाल से चोरी छिपे शराब तस्करी की बात सामने आ रही है। ग़ौरतलब है कि जहा शराब के शौकीन ऊंची कीमत पर भी शराब खरीदने को तैयार हैं। वहीं तस्करो का गिरोह भारी मुनाफा कमाने के लिए शराब के तस्करी का कारोबार शुरू कर दिया है। बताते चलें कि हाल में ही बंगाल से बालू लदे ट्रक पर शरब की बोतले पकड़ी गयी थी। इतना ही नहीं शराब तस्कर टिफिन और झोलों में शराब भरकर उसे ले आते हैं।

बहरहाल, इसमे कोई शक नहीं है कि बिहार और नेपाल के बीच लोगों का शादी विवाह होने के कारण और रोजी-रोटी का सम्बन्ध रहा है। इसी वजह से बॉर्डर के बगल पर लगे खेत की फसल का फायदा उठाकर तस्कर छुप कर आसानी से तस्करी कर सीमा पार हो जाते है । अभी कुछ माह पुर्व ही नेपाल में जब पेट्रोलियम पधार्थ की भारी किल्लत और दामों में वृद्धि हुई थी तब डीजल और पेट्रोल की जम कर तस्करी की जा रही थी।

संपादकीय : उत्तराखंड शक्ति परीक्षण का लोकतांत्रिक यथार्थ

दोस्तों, संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी प्रांत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना पड़ा और इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट में होगा कि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम क्या होगा। हालांकि इस देश में अबतक कई बार विभिन्न राज्यों में विश्वास मत पर प्रस्ताव पेश किया जा चुका है और लोकतांत्रिक मान्यताओं के मुताबिक भविष्य में भी इसे दुहराया जाता रहेगा।

हालांकि उत्तराखंड के मामले में पूरा खेल प्रारंभ से ही नकारात्मक रहा। बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप उत्तराखंड संकट का समाधान विधानसभा में विधायकों के बहुमत के आधार पर ही हो सकता है। इस हेतु पहले 28 मार्च, फिर 30 मार्च फिर 29 अप्रैल पर अटकते हुए अंतत: 10 मई को विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराना ही पड़ा। नौ कांग्रेसी विधायकों के विद्रोह के बाद राज्यपाल ने 28 मार्च को मुख्यमंत्री हरीश रावत को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा था, परंतु उसके पहले ही केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

फिर उत्तराखंड हाईकोर्ट में जस्टिस ध्यानी की बेंच ने 29 मार्च के आदेश से विधानसभा में 31 मार्च को विधायकों के बहुमत परीक्षण का निर्देश दिया था, जिसे केंद्र सरकार की अपील पर चीफ जस्टिस की बेंच ने 30 मार्च के आदेश से स्थगित कर दिया। चीफ जस्टिस जोसफ ने मामले की सुनवाई करते हुए 21 अप्रैल के आदेश से केंद्र सरकार के विरुद्ध सख्त टिप्पणी करते हुए राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना को निरस्त कर दिया और 29 अप्रैल को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए निर्देश दिया। केंद्र सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को स्थगित कर दिया पर 6 मई के आदेश से 10 मई को विधानसभा में बहुमत परीक्षण का निर्देश दिया, जो अब संपन्न हो चुका है।

सुप्रीम कोर्ट में वरीय अधिवक्ता विराग गुप्ता ने इस संबंध में एक नये पहलु की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि 'नायक' फिल्म में अनिल कपूर एक दिन का मुख्यमंत्री बनकर पूरे राज्य में बदलाव ला देते हैं, उसी तर्ज पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद बगैर अधिसूचना के हरीश रावत ने अपने घर में ही 21 अप्रैल को मंत्रिमंडल की बैठक कर अनेक बड़े निर्णय लिए थे, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा गैरकानूनी बताया गया था। संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू होता है, जिसमें विधानसभा भी निलंबित रहती है। हाईकोर्ट द्वारा राष्ट्रपति शासन के दौरान शक्ति परीक्षण को केंद्र सरकार ने असंवैधानिक करार दिया था, परंतु अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश से 2 घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना को निलंबित करते हुए विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराया, जिसके लिए जगदंबिका पाल मामले को आधार माना गया। राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल ही राज्य के शासन को संभालते हैं। सामान्य तौर पर संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिमंडल की अनुशंसा पर काम करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में राज्यपाल को दो घंटे के लिए प्रमुख नियुक्त किया है। अब सवाल यह है कि आज दो घंटे के लिए क्या कानूनी तौर पर हरीश रावत मुख्यमंत्री थे...? अगर यह सच नहीं है तो क्या आज दो घंटे के काल में राज्यपाल, राष्ट्रपति द्वारा ही संचालित थे...?

खैर इस कानूनी सवाल के परे एक बड़ा सवाल लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा है। जिस प्रकार से विधायकों के खरीद फरोख्त की बातें सामने आयी हैं, वे हालांकि नयी नहीं हैं। इस तरह के पैंतरे पहले भी कई राज्यों में आजमाये जाते रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड मामले में नयी बात सामने यह आयी कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने प्रारंभ से ही तेवर तल्ख कर रखा था। इस मामले में ट्वीस्ट तब आया जब कांग्रेस के 9 बागी विधायकों को स्पीकर ने दल-बदल कानून के तहत 27 मार्च को अयोग्य घोषित कर दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 9 मई के आदेश से स्पीकर के निर्णय पर मोहर लगा दी। इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इंकार करते हुए मामले को 12 जुलाई को सुनवाई के लिए लगाया। लेकिन उसके पहले ही बहुमत का प्रस्ताव पेश किया गया। जाहिर तौर पर उत्तराखंड में लोकतांत्रिक संकट को लेकर सवाल कई और हैं जिनका जवाब आने वाले समय में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का शुद्धिकरण तो करेगा ही साथ ही लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत भी करेगा।

संपादकीय : दुश्मनी की राह पर भारत-नेपाल

दोस्तों, बीते दो वर्षों में यानी पीएम नरेंद्र मोदी के राज में देश के अंदर के हालात तो विषम हुए ही हैं, बाहरी हालात भी उनकी असफ़लता की दास्तां कह रही है। सबसे बड़ा उदाहरण भारत और नेपाल के बीच बढती खटास है जो असल में अब खटास की परिधि लांघते हुए दुश्मनी तक पहुंच गयी है। लिहाजा लुम्बिनी महोत्सव को लेकर सवाल उठे ही हैं और सबसे अधिक चिंतनीय यह है कि नेपाल ने भारत से अपना राजदूत वापस बुलाने का निर्णय लिया है। अब तो पानी सिर के उपर बहने लगा है। Read More>>>

संपादकीय : एमएलसी के बेटे को मिले फ़ांसी

दोस्तों, राजनीति के कई रंग होते हैं। शुक्रवार को देर रात गया जिले में जो घटना घटित हुई है, वह न केवल निंदनीय है बल्कि सरकार के अस्तित्व पर सवाल भी उठाता है। जदयू विधान पार्षद मनोरमा देवी के बददिमाग बेटे ने एक बारहवीं कक्षा के छात्र की हत्या केवल इसलिए कर दी क्योंकि मृतक ने विधान पार्षद के बददिमाग बेटे को पास नहीं दिया। दोनों कार से थे और पास नहीं मिलने पर आरोपी ने मासूम छात्र को गोली मार दी। हालांकि इस मामले में कानून अपने हिसाब से काम कर रहा है। नतीजतन आरोपी फ़रार है जबकि पुलिस ने उसके पिता बिन्देश्वरी यादव उर्फ़ बिंदी यादव और सरकारी अंगरक्षक को गिरफ़्तार कर लिया है। Read More>>>

मातृ दिवस की सार्थकता और सवाल

अगर किसी बच्चे के लिए मां उसकी जरूरत है, व उसकी आकांक्षाओं का फल तो मां के लिए भी बच्चा उसका गौरव है, हक है, उसकी उम्मीद है, विश्वास है व उसके जीने का सहारा भी - कुलीना कुमारी Read More>>>

सामाजिक न्याय की सरकार के लिए कलंक है औरंगाबाद जिले का बंदया थाना

दोस्तों, वर्तमान में जो सरकार बिहार में है, उसका सबसे बड़ा आधार सामाजिक न्याय है। स्वयं लालू प्रसाद अप्रत्यक्ष रुप से सरकार के मुखिया हैं और कभी उनके सबसे करीबी रहे नीतीश कुमार प्रत्यक्ष रुप से मुख्यमंत्री। यह संयोग है कि बिहार को इस समय सामाजिक न्याय के दो सबसे बड़े नेताओं के संरक्षण में आगे बढने का अवसर मिल रहा है। शराबबंदी इसका एक नायाब उदाहरण है। लेकिन अभी भी कई मामले हैं, जिनसे सूबे में सामाजिक न्याय कलंकित हो रहा है। एक उदाहरण औरंगाबाद में बंदया थाना है। इसकी स्थापना वर्ष 2014 में हुई और थाना भवन पूर्व विधायक रणविजय कुमार के घर में है। Read More>>>

मातृ दिवस पर विशेष

ये राजनेता भी मानते हैं, सबसे प्यारी है मां

बेघर बच्चियों को यहां मिलता है एक साथ कई मांओं का प्यार

अपनी बात : कुछ बातें तुमसे भी मेरी मां

- नवल

जीवन के तीन दशक पूरे हो चुके हैं। मेरी प्यारी मां तुम अब भी मेरे साथ हो। दिन के उजाले से लेकर रात के अंधियारे तक। सुख और दुख के बीच हर पल चुनौतियों से जुझता मेरा अंतर्मन शायद बड़ा हो गया है। अब मैं तुम्हारा पहले वाला नवल नहीं रहा। बदल चुका हूं। समाज, बाजार, सरकार, अखबार और न जाने कितने कारकों ने मुझे वैसा नहीं रहने दिया है, जैसा तुमने सोचा था। हालांकि वह तो तुम ही थी न मां, जो रोज स्कूल जाने से पहले मेरा माथा चुमती थी और कहती थी कि मैं बड़ा होकर बड़ा आदमी बनूं। खूब सारे पैसे हों। हां, बचपन में मैं तुमसे हाथी-घोड़े, कार, हवाई जहाज सब मांगता था। नहीं देने पर तुम्हारे आंचल का कोना पकड़कर रोता था।

आज पता नहीं, मन फ़िर रोना चाहता है। लेकिन ख्वाहिशें वैसी नहीं रही मां। ख्वाहिशों ने भी आकार बढा लिया है। शायद इतना जिसकी कल्पना न मैंने की थी और न ही तुमने। शायद हाथी-घोड़े और हवाईजहाज से भी बड़े। जब छोटा था तुम्हारे गुल्लक से पैसे चुराकर अपने लिये पांच पैसे में लेमनचूस और चार आने का मार्टन के अलावा कभी कभार एक रुपए में हाथी-घोड़ा भी खरीद लेता था। तुम तो सब जानती थी न मां। तुम्हारे गुल्लक के पैसे कहां जाते थे। हां, तुम सब जानती थी। इसलिए गुल्लक घर की आलमारी के सबसे निचले हिस्से में रखती थी ताकि मेरे छोटे-छोटे हाथ पहुंच सकें।

अब पांच पैसे और आठ आने का जमाना नहीं रहा। तुम्हारे बेटे की खुशियों की कीमत आसमान छुने लगी हैं। लेकिन खुशियां खरीदी नहीं जाती हैं। यह तो तुम कहती थी न मां! फ़िर आज मुझे खुशियों के लिए कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है। तुम कहोगी कि जमाना बदल रहा है तो खुशियां भी बदल रही हैं। यह सब वैसे ही जैसे मैं बदला हूं। मेरे देखने का नजरिया बदला है।

तुम ठीक ही कह रही हो मां। मेरा देखने का नजरिया बदल गया है। अब मुझे बाजार और समाज सब दिखने लगा है। अपने गांव में रोज बनते आलीशान मकान और अधिक से अधिक धन कमाने की होड़ कर रहे मेरे बचपन के सब दोस्त। गांव के बाहर मुसहरी में रहने वाले बैजू काका भी बदल गये हैं। बुढे हो गये हैं। तुम्हारे और पापा की तरह। लेकिन अब भी उनकी बस्ती वीरान क्यों है? इस सवाल का जवाब भी जानता हूं लेकिन वह तो किताबी बात है।

असलियत तो यह है कि मां कुछ नहीं बदला। न मैं बदला हूं, न तुम और न देश-दुनिया। सब वैसा ही है जैसे पहले थे। तुम्हारे ही शब्दों में सब वक्त का फ़ेरा है। वक्त अपने हिसाब से चीजें तय करता है। पुराने चेहरों का एक-एक कर लोप होना और नये चेहरों का आना। यह आना-जाना लगा रहता है। लेकिन मैं उसका क्या करुं मां, जिसका डर मुझे हर पल सताता है। जबसे पैरालाइसिस ने तुम्हे स्थिर किया है, हर पल डर लगता रहता है। अजीब दुविधा है न मां। तुम्हारा बेटा अब शेर, बाघ से नहीं डरता है लेकिन वक्त से डरता है। मां इस डर से मुझे बचाओ। फ़िर कोई कहानी सुनाओ या फ़िर मेरे माथे पर काजल का टीका लगा दो। कुछ न कुछ तो उपाय होगा न मां।

खास रिपोर्ट : काशी के बहाने पूर्वांचल पर रहेगी नीतीश की नजर

दोस्तों, आगामी 12 मई को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से अपने राष्ट्रीय अभियान की शुरूआत करेंगे। हालांकि माना जा रहा है कि श्री कुमार का कार्यक्रम भले ही वाराणसी यानी काशी में हो रहा है लेकिन इसका असर पूर्वांचल पर पड़ने की उम्मीद है। अपने राष्ट्रीय अभियान के शानदार आगाज के लिए जदयू ने तैयारी युद्ध स्तर पर कर रखा है। जदयू नेताओं के मुताबिक फिलहाल लक्ष्य यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने का है और साथ ही अपने अस्तित्व को मजबूत बनाना है। Read More>>>

संपादकीय : यथास्थितिवादी रघुवर दास की बेचैनी

दोस्तों, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धनबाद में वहां की महिलाओं के निमंत्रण पर जायेंगे और झारखंड में शराबबंदी के लिये आंदोलन का आगाज करेंगे। उनके जाने से पहले ही वहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास की बेचैनी सामने आयी है। श्री दास ने बिहार में शराबबंदी को लेकर कहा है कि दस सालों तक नीतीश कुमार ने लोगों को शराब पिला-पिलाकर नशेड़ी बना दिया और अब शराबबंदी की बात करते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि झारखंड में बिहार नहीं बल्कि गुजरात मॉडल चलेगा। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार अंगुली काटकर शहीद बनना चाहते हैं। Read More>>>

अगस्टा मामले में खुली केंद्र की पोल : मीसा

पटना (अपना बिहार, 6 मई 2016) - अगस्टा बेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील मामले में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की पोल खुल गयी है। राजद की वरिष्ठ नेत्री डा. मीसा भारती ने फेसबुक पर जारी अपने बयान में एक पत्रिका में छपी खबर के आधार पर कहा कि पूरे मामले में बिचौलिया की भूमिका निभाने वाले क्रिश्चियन मिचेल ने केंद्र की इस साजिश का भंडाफोड़ कर दिया है। उसका कहना है कि मोदी सरकार ने मुझपर दबाव डाला कि मैं अगूस्ता वेस्टलैंड कांड में गांधी परिवार का नाम लूँ। श्रीमती भारती ने कहा कि मोदी सरकार अब धूर्तता और चालबाजी से विपक्ष पर दबाव बनाना चाहती है क्योंकि अब सरकार भी समझ चुकी है अच्छे काम से नाम कमाना उसके बस की बात नहीँ, क्योंकि उसके लिए योग्यता होनी चाहिए। जब खुद नाम ना कमा सको तो दूसरे को बदनाम कर दो

आंखों देखी : एक नदी की हत्या

दोस्तों, वह भी एक नदी थी। बेशक उसका स्वरुप गंगा, कोसी, गंडक या बागमती के जैसी नहीं थी। वह एक छोटी नदी थी। लेकिन थी बड़ी प्यारी। बरसात के दिनों में उसमें पानी भर जाता और वह समस्तीपुर के बड़े हिस्से को सजीव बना देती थी। लेकिन अब उस नदी की हत्या हो चुकी है।

हत्या का तरीका भी बड़ा बर्बर था। धीरे-धीरे उसकी गर्दन रेती गयी। गर्दन रेतने वालों में सरकार और समाज दोनों शामिल रहे। आज हालत यह है कि छोटी और प्यारी सी जमुआरी नदी दम तोड़ चुकी है। उसके पार्थिव शरीर पर सरकार ने जहां एक ओर कई पुल बना दिये हैं तो समाज के लोगों ने उसके पेट में आलीशान इमारतें। सबसे खास बात यह है कि जमुआरी की हत्या पर आजतक किसी ने शोक व्यक्त तक नहीं किया है और न ही किसी ने उसकी अंत्येष्टि ही की। किसी ने उसकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन तक नहीं किया और न ही उसके लिए एक शब्द।

समस्तीपुर को समस्त प्राकृतिक गुणों की वजह माने जानी वाली इस नदी के कारण ही वहां लगभग सभी तरह के फ़सल उगाये जाते हैं। दोमट मिट्टी और जमुआरी का ममत्व समस्तीपुर को पूरे बिहार में खास बनाता था। संभवतः यही वजह रही कि पराये अंग्रेजों ने कृषि के विकास के लिए पूसा का चयन किया होगा। जिन दिनों जननायक कर्पूरी ठाकुर जीवित थे तब जमुआरी नदी का अस्तित्व कायम था। बाद के दिनों में न तो सरकार ने इसकी सुध ली और न ही यहां के लोगों ने। आज यह नदी एक नाले के रुप में सिमट गयी है।

बहरहाल, सवाल समाज और सरकार दोनों के समक्ष है। क्या ये दोनों अपना गुनाह स्वीकार करेंगे?

खास खबर : घर में अनाज नहीं, कर्ज लेकर पानी खरीदने की मजबूरी

दोस्तों, गंगा, गंडक, बागमती और कोसी जैसी नदियों के कारण पूरे देश में सबसे अधिक ऊर्वर माने जानी वाली बिहार की धरती पर पानी का संकट आ गया है। खासकर उत्तर बिहार के कई जिले इन दिनों भीषण पेयजल संकट झेल रहे हैं। हालत यह हो गयी है कि लोग अब पानी खरीदकर पीने को मजबूर हैं। सबसे बुरे हालात उन लोगों के हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे अपने परिवार के लिए अनाज खरीद सकें, इसके बावजूद वे कर्ज लेकर भी पानी खरीदने को तैयार हैं।

उत्तर बिहार के जिन जिलों में भूगर्भ जल स्तर तेजी से घटता जा रहा है, उनमें समस्तीपुर सबसे अहम जिला है। दोमट मिट्टी के कारण जल संचयन की सबसे अधिक क्षमता के बावजूद इस जिले में इस वर्ष भूगर्भ जल स्तर में चार सौ फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गयी है। मसलन जिले के बखरी बुजुर्ग प्रखंड के उदापट्टी इलाके में लोगों की परेशानी इस कदर बढ़ गयी है कि वे अब खरीदकर पानी पी रहे हैं। स्थानीय निवासी लल्लू पासवान ने बताया कि उनके गांव के वे सभी चापानल जिनकी गहराई डेढ़ सौ फीट से कम है, बेकार हो चुके हैं। पूरे गांव में एक चापानल है जिसे राज्य सरकार द्वारा पिछले वर्ष लगवाया गया था, सजीव है। इस एक चापानल से पूरा गांव पानी पीता है। श्री पासवान ने बताया कि इस चापानल का पानी भी प्रदूषित है। थोड़ा देर पानी छोड़ देने के बाद इसका रंग पीला हो जाता है।

गौरतलब है कि समस्तीपुर भी राज्य के उन जिलों में शुमार है जहां के भूगर्भ जल में आर्सेनिक व आयरन खतरे के मानक को पार कर चुका है। श्री पासवान बताते हैं कि पानी दूषित होने के कारण ही लोग पानी खरीदकर पीते हैं। हालांकि अब भी कई परिवार ऐसे हैं जो दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।

खरीदकर पानी पीने की मजबूरी सरायरंजन प्रखंड के दर्जनों गांवों में देखी जा रही है। स्थानीय लोगों ने बताया कि अधिकांश गांवों में चापानल पूरी तरह बेकार हो चुके हैं। जबकि समस्तीपुर के कर्पूरी ग्राम यानी जननायक कर्पूरी ठाकुर के पैतृक गांव में पहले से ही सरकार द्वारा पाइप के जरिए जलापूर्ति की व्यवस्था है। लिहाजा जननायक के गांव में जल संकट की स्थिति नहीं है। लेकिन दूषित पानी के कारण सक्षम लोग वहां भी पानी खरीदकर पीते हैं। वहीं ताजपुर जैसे इलाके में भी लोगों को बाजारू पानी के आसरे जीना पड़ रहा है।

बहरहाल भीषण जल संकट और दूषित पानी के कारण पूरे जिले में पानी के कारोबारियों की चांदी हो गयी है। कारोबारियों ने पानी का रेट भी अलग-अलग रखा है। मसलन आरओ वाटर की कीमत अधिकतम पांच रुपए प्रति लीटर है तो प्लेन वाटर की कीमत एक रुपए प्रति लीटर है। वहीं ऐसे व्यवसायियों की भी कोई कमी नहीं है जो आरओ वाटर के नाम पर प्लेन वाटर भी बड़े आराम से बेचते हैं।

वहीं इस मामले में जिला प्रशासन की भूमिका सरकार के अस्तित्व पर सवाल उठाता है। पूछने पर पदाधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री चापानल योजना बंद किये जाने के कारण बंद पड़ चुके चापानलों की मरम्मती संभव नहीं है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने अपने सात निश्चयों में हर घर पाइप से जलापूर्ति का निश्चय किया है।

मनुवादी मूल्यों को खारिज करने वाला समतावादी साहित्य बने हिन्दी की मुख्यधारा : प्रमोद रंजन

हिन्दी साहित्य के इतिहास को आज प्रायः दो दृष्टिकोणों से देखा जाता है। एक खेमा उन कलावादियों और द्विज मार्क्सवादियों का है (इस मसले पर दोनों लगभग एकमत ही हैं), जो इतिहास लेखन को रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा द्वारा दी गई दिशा में ही आगे बढ़ाने का आग्रही है, जबकि दूसरा खेमा हंसवादी लेखकों का है, जो अपने एकांगीपन को विभिन्न प्रकार के पर्दों में ढंकने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। ।Read More>>>

संपादकीय : लालू प्रसाद के धार्मिक आचरण पर सवाल क्यों?

दोस्तों, धर्म की कोई एक परिभाषा संभव नहीं है। वजह यह है कि यह समाज पर पूरी तरह आधारित है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि समाज अपने हिसाब से अपना धर्म और इसके रीति-रिवाज तय करता है। वहीं यह बात भी सही है कि धर्म का उपयोग सत्ता के लिए किया जाता रहा है और इसे सामाजिक शोषण का सबसे अचूक हथियार भी माना गया है। इन सबसे अलग धर्म की एक परिभाषा यह भी है कि मूल रुप से यह व्यक्तिगत विषय है जबकि विस्तार सामूहिक है।

मौजूदा दौर में धर्म को राजनीति का हथियार बनाने के सबसे अधिक प्रभावशाली विरोधियों में लालू प्रसाद शिखर पर हैं। उन्होंने आरएसएस के खिलाफ़ अपने राजनीतिक सिद्धांत से कभी कोई समझौता नहीं किया। अभी हाल ही में उन्होंने अपने घर पर सुंदर कांड का पाठ कराया। वह भी परंपरागत परिधानों में। बिल्कुल एक आम इंसान के जैसे। इस तस्वीर को फ़ेसबुक पर प्रकाशित करने के बाद मेरे दो अहम मित्रों ने टिप्पणियां की। एक मित्र ने लालू प्रसाद के सामाजिक समावेशी राजनीति पर सवाल खड़ा किया। मेरे एक अन्य मित्र ने मोबाइल पर फ़ोन कर अपनी आपत्ति व्यक्त की कि महावीर मंदिर में पूजा-पाठ करने के बाद कोई सेक्यूलर कैसे रह सकता है? एक मित्र ने तो यह भी लिखा कि श्री प्रसाद ब्राह्म्णों की धार्मिक गुलामी से आजाद नहीं हो सके हैं।

सवाल यह है कि क्या केवल पूजा-पाठ करने मात्र से श्री प्रसाद के धर्म निरपेक्ष चरित्र पर सवाल खड़ा किया जा सकता है? लेकिन इस सवाल के पहले उनके धर्म निरपेक्ष चरित्र पर सवाल उठाने वालों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि लालू प्रसाद ने क्या आजतक किसी भी धर्म का विरोध किया है? वे मंदिरों में जाते हैं, मस्जिदों में जाते हैं। मजारों पर चादरपोशी करते हैं। हालांकि उन्होंने हिन्दू धर्म के पाखंड को लेकर उस समय अधिक प्रभावशाली तरीके से विरोध किया था जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। तब उन्होंने गैर ब्राह्म्णवाद को भी तरजीह दी थी। सवाल यह है कि गैर ब्राह्म्णवादी होने का मतलब गैर हिन्दू होना है?

बहरहाल लालू प्रसाद आज की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का मानक बन चुके हैं। इसलिए सवाल भी उठेंगे। लेकिन यह सब प्राकृतिक चीजें हैं। वजह यह है कि उन्होंने न केवल राज्य बल्कि देश की राजनीति को एक रंग में रंगने के भगवावादी साजिशों का डटकर पूरी प्रतिबद्धता के साथ सामना किया है। वहीं दुसरी ओर उन्होंने अपना धार्मिक आचरण अपने हिसाब से तय किया है, जो सचमुच में व्यक्तिगत विषय है। लेकिन चूंकि लालू प्रसाद अब केवल एक इंसान का नाम नहीं है, अब ये दो शब्द देश के सबसे अधिक प्रभावशाली राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, लिहाजा समाज में सवाल तो उठेंगे ही और समाज ही इन सवालों का जवाब भी देगा।

संपादकीय : भगवा आतंकवादी और माले गांव के बेकसूर मुसलमान

दोस्तों, मुंबई की विशेष मकोका अदालत ने माले गांव सिलसिलेवार बम विस्फ़ोटों के एक मामले में सभी आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बेकसूर करार दिया है। आरोपमुक्त हुए सभी आरोपी मुसलमान हैं। इनके उपर माले सितंबर 2006 को गांव के मक्का मस्जिद के पास जुमा के नमाज के दिन विस्फ़ोट करने का आरोप था। इस पूरे मामले में दिलचस्प यह है कि इस मामले की जांच पहले महाराष्ट्र के एटीएस दस्ते ने शुरु की थी और नौ लोगों को गिरफ़्तार किया गया था। बाद में यह मामला सीबीआई को सौंप दी गयी थी। सीबीआई ने भी एटीएस की जांच पर ही मुहर लगा दी थी। Read More>>>

सूबे में जल संकट को लेकर लालू प्रसाद का ऐतिहासिक संबोधन

दोस्तों, सूबे में जल संकट कोई नई समस्या नहीं है। पूर्व में भी सरकार और समाज इससे जुझता रहा है। जल संकट के लिए नदियों के प्रबंधन को अहम कारण माना गया है और समाधान के रुप में नदियों को जोड़ने की बात कही गयी। इसी विषय पर 2 अप्रैल 2003 को पटना में बिहार विधान परिषद के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए लालू प्रसाद ने वह कहा जो उस समय भी सच था और आज भी मुंह बाये खड़ा है। सवाल सरकार और समाज दोनों के समक्ष है। प्रस्तुत है जल संकट को लेकर श्री प्रसाद द्वारा का ऐतिहासिक संबोधन -

स्वर्गीय चौधरी देवीलाल जी बराबर नदियों को जोड़ने के लिए गारलैंड स्कीम की बात करते रहते थे। हमलोगों के नेता थे। इधर महामहिम राष्ट्रपति जी से अभिभाषण कराया गया कि पूरे देश की नदियों को, जिसमें कहीं सूखा है, कहीं बाढ है और कहीं तबाही है। सिंचाई की बात तो दूर, बहुत सारे राज्यों में पीने के पानी का घोर अभाव है। यह कहा गया है कि हम पूरी नदियों को, सारे बेसिनों को जोड़कर जल की परिक्रमा कराते रहेंगे, यहीं कैम्पेन और यही प्रचार और यही बात हर जगह लोगों को समझायी जा रही है और बतायी जा रही है। हम धन्यवाद देते हैं जगदा बाबू को, सभापति जी को और हमारे जो अभियंतागण हैं उनको, कि ऐसी खतरनाक बात पर जहां ढोल पीटा जा रहा है कि यह होगा, वह होगा, पता नहीं, होगा भी कि नहीं होगा? कहा जाता है कि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। ख्वाबों की दुनिया में हमलोग विचरण कर रहे हैं।

जिस तरह से बिहार का कोयला, यूरेनियम, बाक्साइट, ग्रेनाइट ले जाया जा रहा है, दूसरी जगह फ़्रेट इक्वलाइजेशन पालिसी और सब्सिडी के नाम पर। बिहार पिछड़ा का पिछड़ा रह गया और तीन लाइन में रेलवे लाइन बिछायी गयी है। खाली मिनरल को ढोने के लिए। फ़िर भी खदान और झरिया में लगी आग को भी नहीं बुझा पाते हैं लोग्।

हमको यह खतरनाक डिजायन लगता है, आप विद्वान लोग यहां बैठे हैं। सिर्फ़ यह हमारी सरकार का नहीं, पूरे बिहारी भाईयों का, सभी दलों के लोग जो राजनीति करते हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हैं, हमको बात उलटी लगती है। एक तो हम गंगा जी को अभी पैदल पार करते हैं, अभी बहुत जगह गंगा मां का बालू से जो पेट भरा है, हमारा सब पानी चला जा रहा है, उधर उत्तर प्रदेश में और दूसरे राज्यों में भी। अभी हरिद्वार मैं गया था। तीन लाइन में वहां है पानी। जहां से शुद्ध जल निकलता है, चला जा रहा है, उधर जहां पंजाब वगैरह है और बगल का जो राज्य है। सरप्लस पानी कभी हो जाता है तो छोड़ देता है, इधर गंगा में। देवगौड़ा जी जहाज से जाकर, जितना बचा हुआ था हमारा पानी, वह बांग्लादेश को नीलाम कर आये। दे आये पानी, जब देवगौड़ा जी थे। अभी हालात क्या है, जो आप देख आये, बांस घाट भी अकेला पड़ गया। सूनसान पड़ गया। पानी ही नहीं है। सूख गयी नदी। अब जो भी पानी आता है, थोड़ा बरसात वगैरह में पानी आया, नेपाल से होकर आया और पानी मिलकर धड़ाधड़ इधर उधर निकल जाता है। तो हमलोग यह लगातार बात कर रहे हैं कि कल जो मारपीट होने वाली है,, इस मुल्क के अंदर और काटा-कुटी होने वाली है, वह पानी के सवाल पर होने वाली है। हमको, बिहार को कुछ मिला नहीं। बिहार को कमजोर बकरी की तरह दूहा गया और जो लोग थे, खैरात में दान करते चले गये। बहुत सारी चीजों की चर्चा हम नहीं करते, यह जातपात वाली तुरंत दस तरह की बातें खड़ी हो जाती हैं। जो हुआ है हम लोगों के साथ और बिहार के साथ,आज से नहीं, बहुत पहले से है। अब जो हमारा पानी बचा हुआ है, अंगुठा का निशान देने के लिए हमलोग तैयार हैं। यदि हमारा पानी हमारे बिहार में ही चारों तरफ़ से परिक्रमा करता रहे, लिंक कर दिया जाय, तो यह बड़ा भारी उपकार हो जायेगा। अगर यह काम हो जाय। लेकिन हमारा पानी साजिश के तहत ब्रह्म्पुत्र का पानी, असम का पानी और बिहार में जमा होने वाले पानी को खींचकर ले जाने का यह षडयंत्र है, दूसरे राज्यों में ले जाने का षडयंत्र।

कौन आयेगा अपने यहां? पानी नहीं रहेगा और पानी नहीं रहेगा तो आदमी, जैसे चूना सूख जाता है। पानी नहीं रहेगा तो कोई इकाई, कोई उद्योग धंधा लगाने वाला आपके यहां नहीं आयेगा। पानी जो हमारा है, वह रुक गया है, तो जितने बाहर भागे हुए हैं लोग, सबको लौटकर आना पड़ेगा। चूंकि हमारा एक पानी ही तो है, हमलोग अब पानी देने के लिए तैयार नहीं हैं और हम आपको कुछ बता दें, चूंकि कोई ज्यादा भाषण, कोई हमलोग विद्वान नहीं हैं। बहुत कुछ हमलोगों ने गंवाया, इसमें सरकार को खत्म कर देंगे हमलोग, झोंक देंगे, कोर्ट का कंटेम्प्ट भी हमलोग झेल लेंगे लेकिन बिहार का पानी खींचकर हम नहीं देने जायेंगे। और हां, अगर कोई कहता है कि बिहार में पानी खींचकर लाया जाएगा दूसरे राज्य से, हमारा जब अभाव होगा, तो वह आके दिखावे कि कहां से पानी लायेगा? कहां से पानी लायेगा?

अभी मैं गुजरात गया था। गुजरात में धरती की छाती फ़टी हुई है। राजस्थान में भी। यह सब सोचिए, विचारिये आप लोग। चूंकि बात है खतरनाक। यह बहुत बड़ी खतरनाक बात चल रही है कि बिहार का पानी और उधर ब्रह्मपुत्र का पानी सब महानंदा के रास्ते से खींच कर के सब पानी लिये जा रहा है। यह है हमको खतरा, यह है हमको संदेह और हमको लगता है संकेत। इसलिए इस पर सभी लोग सोच के, विचार के और सभी लोगों को कान्फ़िडेंस में लेकर सारी बात करें। लेकिन हम लोग तो दृढ संकल्पित हैं। फ़िर हमलोग क्या करेंगे? बालू उड़ेगा। जैसे बगदाद के नजदीक जाने में अमेरिका को जाना पड़ रहा है रेत में से होकर, वहां बालू ही उड़ रहा है। तो बालू उड़ेगा, जब पानी नहीं रहेगा तो। इसलिए इस पर बहुत गंभीरता से विचा र करने की आवश्यकता है। अच्छा और अच्छा हुआ कि एक गोष्ठी करके इसकी शुरुआत हमलोगों ने कर दी है। कैसे पानी लिया वह? दिग्विजय सिंह को फ़ोन किया तब वह हमको पानी छोड़ा। अभी रबी पटाने के लिए बाणसागर वाला। हमको कहा कि भाई, आप लोगों ने पानी बंद कर दिया बिहार का? आपके चीफ़ सेक्रेट्री बंद कर दिया। तब जाकर गेहूं या जो लगता है, वह लगता है। इसलिए इसमें हमको वाइड कांस्पिरेसी लगता है। दिल्ली में बैठे हुए हाई-फ़ाई लोग, जिनका दिल्ली पर हमेशा डोमिनेशन रहा है, जो सारे इंडस्ट्रीज खींच कर ले गये, अपने यहां आजतक और सारी चीज सब पानी का मारकाट, जब युद्ध छिड़ा हुआ है और षडयंत्र करके, फ़िर भी कहीं कुछ नहीं करेगा लोग। पहले इधर से ही बना देगा, बिहार वाला। बिहार से ले जाने वाला बना देगा और बाकी छोड़ देगा। बनायेगा भी नहीं। बोलेगा कि अभी वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए एक दम इसके लिए हर आदमी को तैयार रहना पड़ेगा। दिल्ली में भी फ़िर थोड़ा बुझ लेते हैं। हमको बताइये, इस पर डिस्कसन करिए कि कहां से पानी, कहां से कहां का पानी कहां जाएगा? कहां से पानी आएगा इधर से? और फ़िर जब यह लिफ़्ट करके ले जाएगा, हमारी जमीन चीरते हुए, काटते हुए, पता नहीं, कहां-कहां विस्थापित होंगे लोग। पानी जाएगा और फ़िर कहीं टूटा तो लोग जाकर के दह करके मरेंगे। कितनी जमीन हमारी जाएगी।

आप सब विद्वान लोग जो यहां आये हुए हैं, चिंतक लोग हैं, यह आपका और हमारा धर्म बनता है कि इससे कोई भिन्न जो हमारा अंदेशा और शक है, इसके समाधान के बारे में अगर कोई चीज सोच विचार होंगे, विभाग के लोग, इंजीनियर लोग और इस काम में लगे हुए लोग तो बता दिजीये। लेकिन इसमें हमको खतरा लगता है। इसके लिए हम आपको धन्यवाद देते हैं। अपनी बात समाप्त करते हैं।(बिहार विधान परिषद की पत्रिका साक्ष्य "नदियों की आग" से साभार)

प्यासी धरती, प्यासे लोग और मूकदर्शक सरकार

दोस्तों, कहना गलत है कि देश या फ़िर राज्य में लोकतांत्रिक सरकार है, जिसका पर्याय लोककल्याणकारी राज्य है। वजह यह है कि आज पूरे बिहार में जल संकट बढता जा रहा है और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। गौरतलब है कि अभी अप्रैल का महीना है Read More>>>

संपादकीय : आरएसएस मुक्त भारत की अनिवार्यता

दोस्तों, बिहार में इन दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बयान चर्चा में है। उन्होंने देश भर के सभी धर्मनिरपेक्ष दलों से देश को आरएसएस मुक्त बनाने हेतु एकजुट होने का अहवान किया है। उनके इस आहवान का असर यह हुआ है कि प्रदेश भाजपा नेताओं ने सियासी बवाल मचा रखा है। यह होना लाजमी भी है। वजह यह है कि बिहार में आरएसएस को धूल चटाने के बाद लालू-नीतीश का साझा अभियान देश में असरकारक साबित नहीं होगा, भाजपा व आरएसएस के लोग इसे हल्के में नहीं ले सकते हैं। वैसे यह तो साफ़ है कि जिस तरह से आरएसएस ने देश की राजनीति में धर्म का जहर मिलाया है, उस जहर से देश को मुक्त किया जाना देश के उज्जवल भविष्य के लिए अनिवार्य है। Read More>>>

संकीर्ण पौराणिक दर्शन से नहीं चल सकता है देश : डा मीसा भारती

आरएसएस पर बोला बड़ा हमला, रोहित वेमुला की आत्महत्या के पूर्व लिखा गया पत्र हमारी पूरी सभ्यता और समाज के लिए आत्मचिंतन का दस्तावेज

पटना(अपना बिहार, 20 अप्रैल 2016) - आज की राजनीति में धर्म केंद्र विषय बन चुका है। प्रतीकों और मिथकों को लेकर भी राजनीतिक दलों द्वारा दावे-प्रतिदावे और आरोप-प्रत्यारोप जारी है। रोहित वेमुला की खुदकुशी और जेएनयू विवाद के मूल में भी यही संघर्ष हैं। हालांकि ये संघर्ष कोई आज के संघर्ष नहीं हैं। बदलते समय के साथ समाज के विभिन्न तबकों द्वारा राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के दावे पेश किये जाते रहे हैं और साथ ही धर्म व संस्कृति इन दावों के अनिवार्य हिस्से रहे हैं। वर्तमान के युवा भी कोई अपवाद नहीं हैं। ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली पत्रिका फ़ारवर्ड प्रेस के साथ बातचीत के दौरान राजद की युवा नेत्री डा मीसा भारती ने कहा है कि बहुलतावादी प्रजातंत्र का निर्माण जरूरी है। उनका यह मानना है कि वंचित तबके के नायकों यथा महिषासुर का खलनायकीकरण करने के लिए मनुवादी स्याही और कलम का इस्तेमाल किया गया है। उनका आह्वान है कि आज के युवा बहुलतावादी प्रजातन्त्र के समतामूलक सरोकारों को मज़बूत करें।

उनका कहना है कि जिस तरह के साक्ष्य और घटनाएँ देश के अलग अलग हिस्सों में हो रहीं है इसमें कतई कोई सदेह नहीं है कि धर्म और राजनीति के घालमेल ने लोकजीवन और खास तौर पर राजनीतिक जीवन को एक हद तक विषाक्त कर दिया है. उग्रता और हिंसा की छवियाँ हमारे लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए घटक हैं। जबकि धर्म और संस्कृति मानव जीवन को मूल्यवान बनाते हैं। दोनों अपने प्रभाव से समाज को एक सम्पूर्णता का अहसास देते हैं. लेकिन राजनीति के निहितार्थ और सरोकार अलग हैं। हमें यह मानना होगा कि एक बहुलवादी मुल्क में राजनीति का एक व्यापक समावेशी दृष्टिकोण होना चाहिए। एक बहुधर्मी और बहुलवादी संस्कृति वाले देश में राजनीति को एक ऐसी विचारधारा के रूप में देखना चाहिए जो पूरे हिन्दुस्तानी कारवां को साथ लेकर चल सके।

उदाहरण के तौर पर रोहित वेमुला की आत्महत्या के पूर्व लिखा गया पत्र हमारी पूरी सभ्यता और समाज के लिए आत्मचिंतन का दस्तावेज है। रोहित जब यह कहता है कि, मेरा जीवन ही एक घातक दुर्घटना है तो वोह सिर्फ अपने लिए नहीं बोल रहा था बल्कि तमाम दलित और पिछड़े वर्गों के संरचनात्मक और संस्थागत उत्पीडन की व्यथा कथा कह रहा था। लेकिन सरकारी संवेदनहीनता ने अपनी पूरी कार्यशैली से मनुवादी परंपरा के पोषण का ही परिचय दिया। रोहित के सवालों के पक्ष में अलग अलग जगहों पर, कई विश्वविद्यालयों में लोग खड़े होने लगे और इसमें जेएनयु भी एक था। लेकिन देशभक्ति और देशद्रोह की आड़ लेकर सरकार ने संस्थागत वैमनस्य और उत्पीडन के सवालों को ढंकने की कोशिश की। देशभक्ति के सवाल पर कभी भी दो राय नहीं रही है इस देश में लेकिन मजे की बात है कि सबसे ज्यादा देशभक्ति की बात करने वाले दल का इस देश के बनने और बढ़ने में रत्ती भर भी योगदान नहीं रहा है। सच तो यह है कि दिल्ली की सत्ता पर बैठे लोगों ने छात्रों और युवाओं के खिलाफ एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है।

यह उल्लेखनीय है कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने एक बयान में यह स्वीकारा है कि आदिवासियों की अपनी परंपरा और अपना धर्म व प्रतीक है। उन्होंने रावण और महिषासुर को अपना पूर्वज बताया है। मीसा भी कहती हैं कि न सिर्फ गुरूजी बल्कि कई अन्य लोग अन्य प्रान्तों में इन मिथकों और स्मृतियों में विश्वास करते हैं. बाबा साहब के द्वारा प्रदत्त संविधान के हिसाब से हर कौम और वर्ग, हर जाति और समुदाय को यह आजादी है वो अपनी स्मृति और परंपरा के आधार पर अपनी पूजा पद्धति और प्राथमिकता तय करे। दिक्कत यह है कि आज जो लोग सत्ता पर काबिज हैं वो संविधान से ज्यादा ब्राह्मणवादी सरोकार और संघ(आरएसएस) के विधान से इस विशाल बहुलवादी संस्कृति और परंपरा के मुल्क को चलाना चाहते हैं।

जबकि संविधान समर्पित करते हुए बाबा साहब ने चेतावनी दी थी कि अगर राजनीतिक समता, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समता में रूपांतरित नहीं होगी तो प्रजातान्त्रिक राजनीतिक संरचना का अवशेष नहीं बचेगा। दु:ख और क्षोभ का विषय है कि महू जाकर डॉक्टर अम्बेदकर की प्रतिमा पर फूल चढाने वाले लोगों ने संविधान की प्रस्तावन््राा के मर्म को भी समझने की जहमत नहीं उठाई है। आधुनिक संविधान का व्यापक दर्शन और ब्राह्मणवाद का पौराणिक और संकीर्ण दर्शन एक साथ नहीं चल सकता है।

उन्होंने कहा है कि धर्म की जो व्यवस्थाएं या मान्यताएं हम तक पहुचायीं गयी वो एक सीमित वर्ग ने मनुवादी कलम और स्याही से लिखी थीं। हजारों वर्ष तक ज्ञान और दर्शन सिर्फ एक दो जातियों के कब्जे में बना रहा और जाहिर तौर पर उन्होंने सत्ता और संसाधनों पर अपनी निरंतर नियंत्रण के आलोक में मिथक और परम्पराएँ गढ़ी। लेकिन स्वाधीनता के थोड़े पूर्व और उसके पश्चात शिक्षा और चिंतन में उन जातियों की भी भागीदारी और हिस्सेदारी बढ़ी जिन्हें अब तक एक आपराधिक साजिश के तहत वंचित किया गया था। अत: लोगो ने मिथकों के साथ साथ स्मृति और इतिहास की वैज्ञानिक पड़ताल शुरू की और नतीजा है कि कई पुरानी मान्यताएं और परम्पराओं पर सवालिया निशान लगाये जा रहे हैं। ऐसे में बहुजन संस्कृति से सरोकार रखने वाले युवा अपनी पहल जारी रखें और बहुलवादी प्रजातन्त्र की समतामूलक सरोकारों को और मजबूत करें। इसकी वजह यह है कि हमारे देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक इतिहास, मिथक, आस्था और स्मृति की अलग अलग धाराएँ हैं, जिसे हम सब को सहिष्णुता के साथ समझकर स्वीकार करना ही होगा।

फिर हुआ अदालत परिसर में विस्फोट, हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

पटना(अपना बिहार, 19 अप्रैल 2016) -अदालती परिसर में आये दिन घटित हो रहे आपराधिक गतिविधियों के क्रम में सोमवार को राज्य के सारण जिले के छपरा व्यवहार न्यायालय परिसर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच बम विस्फोट की घटना में घटित हुई। इस घटना में एक कैदी समेत पांच लोग घायल हो गये। इस मामले में पटना हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है और राज्य सरकार को फटकार लगाया है।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक सोमवार की सुबह में कोर्ट परिसर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच एक महिला बम बांधकर कैदी से मिलने गयी थी । इसी दौरान बम के फटने से महिला और कैदी समेत कुल पांच लोग घायल हो गये। सूत्रों ने बताया कि महिला बुर्का में थी। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक पंकज राज, अपर पुलिस अधीक्षक मनीष के अलावा नगर थाना समेत तीन थानों की पुलिस मौके पर पहुंच कर मामले की छानबीन शुरू कर दी। वहीं घायलों को इलाज के लिए छपरा सदर अस्पताल भेज दिया गया। घायल महिला और कैदी के संबंध में तत्काल पता नहीं चल सका है।

उधर सूबे के न्यायालयों में बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर हाईकोर्ट ने सुरक्षा व्यवस्था पर चिंता जाहिर किया है। सोमवार को छपरा में हुये बम विस्फोट मामले में हाईकोर्ट का नजरिया पूरी तरह से सख्त रहा। हाईकोर्ट की न्यायिक बेंच ने संज्ञान लेते हुये मुख्य सचिव ,गृह सचिव एवं डीजीपी को तलब किया और पूछा कि सूबे के न्यायालयों की सुरक्षा को लेकर जो पूर्व में दिशा निर्देश दिये गये थे उसपर क्या कार्रवाई हुई है। अपर महाधिवक्ता ललित किशोर ने कहा कि सरकार की ओर न्यायालय को पूर्ण सुरक्षा मुहैया करायी जा रही है और सुरक्षा की व्यवस्था की जायेगी। इस मामले में अगली सुनवाई 25 अप्रैल को होगी।

खास रिपोर्ट : यूपी विधानसभा चुनाव पर टिकी नीतीश की उम्मीदें

दोस्तों, अगले वर्ष यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल इसलिए दिलचस्प नहीं होगा कि देश के सबसे बड़े राज्य में अगली सरकार कौन बनायेगा। इससे भी अधिक दिलचस्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक भविष्य से जुड़ा है। पिछले वर्ष बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के हाथों करारी शिकस्त खाने के बाद प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर सवाल उठे हैं। वहीं नीतीश कुमार ने वर्ष 2019 में स्वयं को पीएम पद की दावेदारी के लिए अपनी चालें चलनी शुरू कर दी है।

पटना में बीते शनिवार को एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कि अब देश में सिर्फ दो धुरियां होंगी, एक ओर भाजपा और दूसरी ओर सभी पार्टियों को मिलना पड़ेगा। अगर हमलोग अलग-अलग रहेंगे, तो वे सबका बुरा हाल कर देंगे।

श्री कुमार की यह राजनीतिक भविष्यवाणी बेवजह नहीं है। संभवत: यही वजह है कि उन्होंने यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर नये गठबंधनक ा प्रयास शुरू कर दिया है। हालांकि अभी उनकी यह कवायद सफल होती नहीं दिख रही है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यूपी में नीतीश कुमार की राह इतनी आसान नहीं होगी। इसकी सबसे बड़ी वजह उनके संभावित सहयोगी अजित सिंह हैं। कभी पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक धाक के लिए मशहूर अजित सिंह की अब अपने ही इलाके में हालत खराब है। जाटों के वोटों पर एकाधिकार समाप्त हो चुका है।

वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज के लोगों की संख्या निर्णायक होने के कारण नीतीश कुमार असरकारक साबित हो सकते हैं। लेकिन भाजपा के पास अनुप्रिया पटेल रूपी कार्ड पहले से मौजूद है। वहीं सोने लाल पटेल का राजनीतिक अस्तित्व अभी भी कमोबेश बरकरार है।

बहरहाल अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाला चुनाव नीतीश कुमार के नये राजनीतिक अभियान को लेकर महत्वपूर्ण साबित होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल उस राजनीतिक एका के बनने को लेकर है जिसके आधार पर वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती पेश कर रहे हैं।

संपादकीय : ब्राह्म्णों का राम बनाम राजपूतों का राम

दोस्तों, सत्ता को लेकर मौजूदा संघर्ष कोई नया संघर्ष नहीं है। कपोल कल्पित रामायण में भी इस बात को साहित्यिक तरीके से बताया गया है। वैसे यह एक विचारणीय प्रश्न है कि भारतीय सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में ब्राह्म्णों को स्त्ता से हमेशा-हमेशा के लिए दूर कर देने वाले राजपूत राम की पूजा ब्राह्म्ण आज भी क्यों करते हैं? एक सवाल यह भी कि बालि, शंबूक और रावण को छल से मारने वाला राम मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे कहा जा सकता है? वह भी वह राम जिसने सीता के चरित्र की परीक्षा के लिए उसे आग में झोंक दिया। इसके बाद भी उसे विश्वास नहीं हुआ तब उसने सीता को गर्भवती होने के बावजूद अपने घर से बाहर निकाल दिय।

खैर, इसमें कोई शक नहीं कि जिस काल्पनिक चरित्र के नाम पर आज देश में राजनीति की जा रही है, हिन्दू धार्मिक ग्रंथ ही उसका विरोध करते हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम के बजाय एक संकीर्ण विचारों वाला राजपूत साबित करते हैं। असल खेल सत्ता का है। रामायण के मुताबिक ही राम के पहले कोई परशुराम हुआ करता था। उसने सात बार धरती पर से राजपूतों का सर्वनाश किया था। इस बात को लेकर रामायण में कोई जिक्र नहीं किया गया है कि परशुराम किस जाति का था। लेकिन मौजूदा दौर में भूमिहार समाज के लोग उसे अपना आदर्श मानते हैं। वहीं भूमिहार अपने आपको मूल ब्राह्म्ण मानते हैं। उनके संस्कार और रिवाज भी ब्राह्म्णों के जैसे हैं। अंतर यह है कि वे ब्राह्म्णों के जैसे भीख नहीं मांगते हैं। खासकर बिहार के भूमिहार बड़े किसान माने जाते हैं और आज भी बिहार में जमीन के मामले में वे सबसे अधिक समृद्ध हैं।

अब जरा रामायण का अवलोकन करें। रामायण के मुताबिक ही राम के पिता दशरथ को ब्राह्म्णों से लड़ाई लड़नी पड़ी थी। कई लोग इस बात का जिक्र करते हैं कि कैकेयी की मूल जाति ब्राह्म्ण थी। दशरथ ने उससे शादी इसलिए की थी क्योंकि एक ब्राह्म्ण राजा के साथ लड़ाई के समय कैकेयी ने उसका साथ दिया था। बाद में लड़ाई के मैदान में वह अपने पति के साथ हमेशा रही। यही वजह रही कि दशरथ कैकेयी को सबसे अधिक मानता था। राम और उसके भाइयों के जन्म की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। ब्राह्म्णों ने बड़े शातिर तरीके से इस पूरी घटना को अंजाम दिया। रामायण में इस पूरी परिघटना को खीर से इंसानों का जन्म करार दिया गया।

राम और रावण के बीच की लड़ाई केवल सीता को लेकर नहीं थी। यदि सीता को लेकर लड़ाई हुई होती तो लंबे समय तक सीता को अपने यहां कैद में रखने के बजाय वह उसका यौन शोषण कर सकता था। जिस किसी ने रामानंद सागर द्वारा बनायी गयी "रामायण" को देखा हो, उसे यह बात संभवतः याद हो कि कैदावस्था में सीता के पास रावण कभी भी अकेले नहीं गया। वह अपनी पत्नी मंदोदरी के साथ ही गया। रामायण के मुताबिक ही राम ने रावण के साथ उसके पूरे खानदान को मार डाला। इस प्रकार उसने परशुराम का बदला ले लिया। परिणाम यह हुआ कि ब्राह्म्णों का राजनीतिक वर्चस्व हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया।

जब हम राम की बात करते हैं तो एक "गांधी के राम" का जिक्र होना लाजमी है। गांधी ने कई अवसरों पर अपने राम की परिभाषा दी है। वे कहते हैं कि उनका राम तीर-धनुष लिये कोई हिंसक प्राणी नहीं है। उनका राम तो सत्य और अहिंसा में विश्वास करता है। बहरहाल, आज की परिस्थिति कुछ और है। राम राजनीतिक हथियार बन चुका है। इस एक हथियार से देश को तोड़ने की साजिशें की जा रही हैं। कारण सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत की गद्दी पर कब्जा जमाये रखना है। मजे की बात यह है कि ब्राह्म्ण भी राजपूतो के साथ खड़े हैं। वैसे भी इन प्रभुवर्गों के पास इसके अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है।

खास रिपोर्ट : मिलिये अपना धर्म बदलने वाली बहादुर देवरानी मांझी से

दोस्तों, देवरानी मांझी राजधानी पटना के फ़ुलवारी प्रखंड के टंड़वा मुसहरी नामक गांव में रहती हैं। पति अशोक मांझी और अपने तीन बच्चों के साथ उस गांव में रहती हैं जो अवैध शराब के उत्पादन और बिक्री के लिए कुख्यात था। अब चूंकि राज्य सरकार ने शराबबंदी कानून लगा दिया है, इसलिए इनके गांव में भी शराब का नामोनिशान नहीं है। लेकिन देवरानी मांझी ने अपने जीवन में बदलाव बहुत पहले ही कर लिया था। इनके पति मैट्रिक पास थे, इसलिए राज्य सरकार के द्वारा चलायी गयी योजना के तहत टोला सेवक बनाये गये थे। करीब दो वर्ष पहले इनके पति फ़िर से बेरोजगार हो गये।

पहले नियमित आय प्राप्त होने से भी देवरानी मांझी और उनके परिवार की हालत में सुधार आया था। लेकिन बेरोजगार होने के बाद भी अशोक मांझी ने शराब के धंधे में खुद को लगाने के बजाय दिहाड़ी मजदूर के रुप में काम करना पसंद किया। साथ ही गौरव ग्रामीण विकास मंच नामक एक एनजीओ के सहयोग से देवरानी मांझी ने कपड़ा सिलाई करना सीखा और अपने ही घर में अपना काम करने लगीं। पूछने पर बताती हैं कि अब वे रोजाना 300-500 रुपए कमा लेती हैं।

वहीं खास बात यह है कि देवरानी मांझी ने अपने पूरे गांव में स्वयं को उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हिन्दू धर्म का परित्याग कर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। इसके पीछे उनका तर्क अत्यंत ही दिलचस्प है। देवरानी मांझी बताती हैं कि हिन्दू धर्म में उंच-नीच का फ़ेरा है। लोग धर्म के नाम पर तरह-तरह के पाखंड करते हैं। मुंह पर भगवान का नाम लेते हैं, लेकिन मन में पाप भरा होता है। उनका कहना है कि ईसाई धर्म में इस तरह का कोई पाखंड नहीं है। न कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा। सब एक समान परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। पूछने पर देवरानी मांझी कहती हैं कि सवाल केवल हिन्दू धर्म छोड़ने का नहीं है। असल सवाल मानसिकता और सम्मान के साथ जीने का है।

संपादकीय : कोल्लम में कोहराम और शंकराचार्य की बददिमागी

दोस्तों, कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षित होना और जागरुक होने में बड़ा फ़र्क है। अभी हाल ही में केरल के एक मंदिर में जो दुखद घटना घटी, वह इस तथ्य को स्थापित करती है। केवल एक पाखंड के कारण सैंकड़ों लोग बेमौत मारे गये। वैसे यह रोज की कहानी है। आये दिन धार्मिक पाखंडों के कारण लोग शिकार होते रहते हैं। परंतु हर बार लोग मातम मनाते हैं और फ़िर अगली बार पाखंड का उदाहरण पेश करते हैं। सवाल उठता है कि आखिर कब जागरुक होंगे उस धरती के लोग जिसे अतीत में विश्वगुरु का दर्जा हासिल था।

इसी क्रम में एक स्वघोषित शंकराचार्य ने अजीबोगरीब टिप्प्णी कर दी है। उसकी मानें तो देश में पेयजल संकट के पीछे उसके देवताओं की शक्ति है। हास्यास्पद है कि देवता ऐसे भी क्रुर होते हैं। वैसे यह भी दिलचस्प है कि उसने इसके लिए साईं पूजन को जिम्मेवार बताया है। उसके मुताबिक जल संकट की असली वजह साईं की पूजा है। कृष्ण के मामले में भी एक ऐसा ही प्रसंग है। गोकुल वासियों को अपनी पूजा नहीं किये जाने पर इंद्र ने कहर बरपाया था।

असल में सबसे बड़ा मामला पाखंड का ही है। यह सभी धर्मों में है। किसी में ज्यादा तो किसी में कम। आम आदमी के नजरिए से देखें तो यह जीवन शैली का हिस्सा है, जिसका दुरुपयोग कर सत्ता के ठेकेदार अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं और भुगतना आम आदमी को पड़ता है। कोल्लम मंदिर में घटी दुर्घटना भी इसी का उदाहरण है। आश्चर्य है कि पेयजल संकट के लिए साईं को कसूरवार ठहराने वाले बददिमाग शंकराचार्य ने किसी हिन्दू देवी-देवता को जिम्मेवार नहीं बताया।

बहरहाल सबसे बड़ी चुनौती समाज को शिक्षित और जागरुक दोनों बनाने की है। देश में जिस तरफ़ से धार्मिक अंधविश्वास फ़ैलाया जा रहा है, वह अत्यंत ही घातक है। न केवल देश के लिए बल्कि देश में रहने वाले लोगों के लिए। इसमें अहम भूमिका सरकार की है। अब चूंकि देश में भगवावादियों का राज है, इसलिए हिन्दू धर्म के ठेकेदारों की चांदी है। लेकिन वे इस बात को भूल रहे हैं कि इसी देश में बुद्ध, फ़ुले और अम्बेदकर जैसे महामानव भी पैदा हुए, जिन्होंने बिना हिंसा के हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को समाज के सामने नंगा कर दिया था।

देखते ही देखते खत्म हो गयी सजीव साक्ष्य की चुनौती

फुलवारी के कारण ही कुसुमपुर के नाम से प्रसिद्ध था पटना

सम्राट अशोक ने बनवाया था कुआं

दोस्तों, यह सचमुच विडंबना ही है। जहां एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर पुरातातिवक अवशेषों को सहेजने की कोशिशें की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर राजधानी पटना के फुलवारीशरीफ में इतिहास के सजीव साक्ष्य की को मिटाया जा रहा है। वह भी उस साक्ष्य का जिसके एक प्रतीक को देश का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है। हम बात कर रहे हैं फुलवारी शरीफ थाने से महज चंद कदमों की दूरी पर अवस्थित चुनौती कुआं की। लोग बताते हैं कि यह कुआं सम्राट अशोक के द्वारा तब बनवाया गया था जब वह कलिंग पर चढ़ाई करने जा रहे थे। हालांकि यह एक किवदंती ही है। पहले यहां कुछ शिलालेख आदि रहे होंगे, लेकिन अब चुंकि चुनौती कुएं के पूरे अस्तित्व पर संकट है, इसलिए इतिहास के साक्ष्य के रूप में कचरा से भरा एक कुआं है, जिसका स्थापत्य सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गये अन्य कुओं यथा अगमकुआं के जैसा है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां के स्थानीय वाशिंदे भी अब चुनौती कुआं के अस्तित्व को नहीं स्वीकारते हैं। पूछने पर कई लोग दबी जुबान से इस कुएं का पता तो बताते हैं लेकिन विस्तार से बताने में संकोच करते हैं। हालांकि कई अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर यह बताने की हिम्मत दिखाते हैं कि पहले यह एक विस्तृत भूखंड हुआ करता था, जो अब अतिक्रमणकारियों के कब्जे में है। यहां तक कि नगर परिषद कार्यालय भी इसी जमीन पर अतिक्रमण का एक उदाहरण है।

बहरहाल चुनौती केवल चुनौती कुआं के अस्तित्व को ही नहीं है, बल्कि पूरे फुलवारी शरीफ के स्थानीय वाशिंदों के समक्ष भी है। लेकिन स्थानीय अधिकारियों से लेकर स्थानीय नगर परिषद भी इस एकमात्र ऐतिहासिक साक्ष्य के मिटने पर मौन है। यही हालात उपर तक विस्तृत है। लिहाजा चुनौती कुआं आज के दिन ऐतिहासिक धरोहर नहीं बल्कि कुछ लोगों की बपौती बनकर रह गया है।

समय पाटों के बीच आंबेडकर का होना

- डॉ. कर्मानंद आर्य, सहायक प्राध्यापक, दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय

अंबेडकर बीसवीं सदी के बड़े विचारकों में एक थे. वे घोर तर्कवादी थे. उन्होंने अपनी तार्किकता के लिए धर्म के प्रतीकों का सहारा नहीं लिया. धर्मकेन्द्रित भारतीय समाज में आंबेडकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने धर्म को नहीं मनुष्य को केंद्र में रखने की बात की. फ़ालतू कर्मकांडों का विरोध पर जोर दिया. उन्होंने खुद को कबीर की परम्परा में पाया और आजीवन मनुष्य के अधिकारों के लिए लड़ते रहे. उन्होंने जो हेय था उसकी भर्त्सना की. दुनिया के सबसे उदार धर्म बौद्ध धर्म की शिक्षा से प्रेरित उन्होंने प्रत्येक मनुष्य को अप्प दीपो भव का सन्देश दिया.Read More>>>

फारबिसगंज गोलीकांड में पुलिस को क्लीन चिट

तत्कालीन डीएम और बियाडा के अधिकारियों पर संवेदनहीनता बरतने का आरोप, विधानमंडल के दोनों सदनों में न्यायिक आयोग की रिपोर्ट पेश,अररिया जिले के फारबिसगंज प्रखंड के भजनपुरा गांव में 3 जून 2011 को घटी थी घटना, एक बच्चा और एक महिला सहित चार लोगों की हुई थी पुलिस की गोली से मौत

पटना(अपना बिहार, 5 अप्रैल 2016) - करीब साढ़े चार वर्षों के बाद फारबिसगंज गोली कांड का सरकारी सच विधान मंडल के बजट सत्र के आखिरी दिन दोनों सदनों में पेश किया गया। पटना उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश माधवेंद्र शरण की अध्यक्षता में राज्य सरकार द्वारा गठित एक सदस्यीय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जहां एक ओर पुलिस पदाधिकारियों को पाक साफ करार दिया है तो दूसरी ओर अररिया के तत्कालीन जिलाधिकारी एम.सर्वानन और बियाडा के अधिकारियों पर उस मामले में संवेदनहीन करार दिया है जिसके कारण 3 जून 2011 को पुलिस को आत्मरक्षार्थ भीड़ पर गोली चलानी पड़ी थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हो गयी थी। मरने वालों में एक महिला और एक बच्चा भी शामिल था।

आयोग ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि उक्त घटना में पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई घटना स्थल पर मौजूद पुलिस पदाधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं जनसामान्य की सुरक्षा के लिहाज से अनिवार्य था। हालांकि अपनी रिपोर्ट में आयोग ने सरकारी पदाधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाया है। आयोग के मुताबिक मेसर्स औरो सुन्दरम इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित भूखंड को लेकर पहले से ही रास्ते का विवाद लंबित था। लेकिन इस मामले में तत्कालीन जिला प्रशासन द्वारा शिथिलता बरते जाने के कारण मामला बढ़ता चला गया। यदि प्रशासन की ओर से पहले ही विवाद को सुलझाने का प्रयास किया गया होता तो उक्त घटना को टाला जा सकता था। परंतु घटना के दिन जिस तरीके से स्थानीय लोगों द्वारा हिंसक उत्पात मचाया गया, पुलिस के पास फायरिंग के सिवाय कोई विकल्प नहीं था। आयोग ने इस मामले में तत्कालीन एसपी गरिमा मल्लिक सहित तमाम पुलिस अधिकारियों को पाक साफ करार दिया है।

वहीं राज्य सरकार द्वारा सदन में पेश किये गये एक्शन टेकेन रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य सरकार तत्कालीन डीएम एम. सर्वानन के संदर्भ में आयोग द्वारा की गयी टिप्पणी को स्वीकार करती हैै कि उन्होंने समय रहते मूल विवाद को सुलझाने की दिशा में कोई पहल नहीं किया और संवेदनहीन बने रहे। राज्य सरकार द्वारा श्री सर्वानन के खिलाफ कार्रवाई के लिए सामान्य प्रशासन विभाग को निदेशित किया गया है। वहीं विवादित जमीन को लेकर बियाडा के पदाधिकारियों द्वारा शिथिलता बरते जाने संबंधी आयोग की टिप्पणी पर राज्य सरकार ने कहा है कि इस संबंध में दोषी पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उद्योग विभाग को निदेशित किया गया है। जबकि उक्त गोलीकांड में मुस्तफा नामक एक घायल युवक के शरीर पर कूदने वाले होम गार्ड के जवान सुनील कुमार यादव को उसके कृत्य के लिए दोषी करार दिया गया है। इस मामले में राज्य सरकार की ओर से बताया गया है कि आरोपी होमगार्ड के जवान के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसे जेल भेजा जा चुका है और इस मामले में आरोप पत्र अदालत को समर्पित किया जा चुका है।

संपादकीय : अधूरे रह गये सारे सवाल

दोस्तों, हम हुए कत्ल, हम पर ही इल्जाम है। प्राख्यात शायर आमिर उस्मानी की यह पंक्ति फारबिसगंज गोलीकांड न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में सही साबित हुआ। कुल मिलाकर इस आयोग की रिपोर्ट में भी सरकारी पदाधिकारियों को निर्दोष करार दिया गया है और सारा इल्जाम फारबिसगंज के भजनपुरा गांव के लोगों पर डाल दिया गया है। यहां तक कि तत्कालीन एसपी गरिमा मल्लिक और मौके पर मौजूद एसडीओ गिरिवर दयाल सिंह जिसके आदेश पर पुलिस ने कथित तौर पर लोगों पर गोलियां बरसायी उसे भी निर्दोष करार दिया गया है। Read More>>>

राजनीति में आगे आयें युवा, तभी होगा विकास : सरोज यादव

विधायक सरोज यादव वर्तमान में सबसे युवा विधायकों में से एक हैं। इन्होंने आजादी के बाद 68 वर्षों तक राजपूतों के लिए चितौड़गढ कहे जाने वाले बड़हड़ा विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की है। नये सदस्य होने के बावजूद श्री यादव ने जनहित से जुड़े कई सवाल उठाये और पूरी संवेदनशीलता के साथ सदन की कार्यवाही में भाग लिया। अपना बिहार के साथ इनकी खास बातचीत

पटना(अपना बिहार, 5 अप्रैल 2016) - जो देश और समाज में विकास की बात करते हैं, उन्हें राजनीति में सक्रिय होना चाहिए। ये बातें बड़हड़ा के युवा विधायक सरोज यादव ने अपना बिहार से विशेष बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि बजट सत्र के दौरान पहली बार उन्होंने जाना कि विकास के लिए संसदीय राजनीति कितनी महत्वपूर्ण है। इस दौरान संसदीय प्रणाली से रूबरू होने का अवसर मिला। तारांकित प्रश्न, अल्पसूचित प्रश्न, शून्य काल और ध्यानाकर्षण के जरिए जनता के सवालों को उठाने के प्रक्रिया से परिचित हुआ। श्री यादव ने कहा कि इस सत्र ने उन्हें इस बात का अहसास करा दिया है कि जनप्रतिनिधि होने का सही मतलब क्या है। हालांकि उन्होंने कहा कि वे गरीब-गुरबे के बेटे हैं और जनता के बीच सेवक के रूप में गांवों में रहना पसंद करते हैं। इसलिए जनसमस्याओं को लेकर उन्होंने सदन में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाये। उन्होंने उम्मीद व्यक्त किया कि महागठबंधन की सरकार संवेदनशील सरकार है और वह जनसमस्याओं के प्रति गंभीर है।

खास खबर : लुप्त हो रहा जिंदा इतिहास

दोस्तों, यह कोई कहानी नहीं बल्कि जीता जागता इतिहास है। इसे त्रासदी ही कहिए कि इतिहास को लेकर न तो सरकार संवेदनशील है और न ही समाज। परिणाम यह हुआ है कि एक सजीव इतिहास बेमौत दम तोड़ रहा है। आज की अत्याधुनिक युग की पीढ़ी शायद ही इस बात पर यकीन करेगी कि पटना प्रारंभ से ही कला संस्कृति के क्षेत्र में कोलकाता के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता था। उन दिनों जब देश में मृक फिल्में बनती थीं, राजधानी पटना में भी एक सिनेमा हॉल बनाया गया था।

यह सिनेमा हॉल राजधानी पटना के गर्दनीबाग के बाबू बाजार में अवस्थित हुआ करता था। अब इसके अवशेष भी विलुप्त होने के कगार पर हैं। स्थानीय निवासी रतन लाल घोष के मुताबिक उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया था कि इस जगह पर एक सिनेमा हॉल था जिसमें मूक फिल्में दिखायी जाती थीं। लेकिन एक दुर्घटना होने के बाद तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने सिनेमा हॉल को बंद कर दिया था। उन दिनों यहां पर एक बड़ा बाजार भी लगता था।

श्री घोष के मुताबिक इस सिनेमा हॉल की स्थापना किरण चंद्र डे ने की थी। इसके अलावा उन्होंने इस पूरे भूखंड पर बाजार लगवाया था। श्री घोष ने बताया कि इस पूरी इमारत को बनाने के लिए स्व. डे ने अपना र्इंट का निर्माण कराया था। आज भी इमारत की र्इंटों पर के.सी. डे अंकित है।

बहरहाल इस पूरे भूखंड और पटना के संभवत: पहले सिनेमा हॉल का संबंध सूबे के प्राख्यात अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता से है। स्व. किरण चंद्र डे उनके नाना थे। हालांकि सिनेमा हॉल के बारे में श्री गुप्ता ने बताया कि उन्हें इस बात की ठोस जानकारी नहीं है। लेकिन उन्होंने इतना अवश्य कहा कि यहां एक सिनेमा हॉल हुआ करता था।

खुशखबरी : शराबबंदी में शामिल हुई जनता

दोस्तों, सरकारी नीतियां तबतक सरकारी रहती हैं जबतक कि उन्हें सरकारी पेचीदगियों में उलझाकर रखा जाता है। एक बार जब नीतियों को क्रियान्वित कर दिया जाता है तब नीतियां जनता की हो जाती हैं। यह अलग बात है कि अधिसंख्य सरकारी नीतियों को जनता का समर्थन मिलने का सौभाग्य हासिल नहीं हो पाता है। लेकिन नीतीश सरकार द्वारा बनायी गयी शराबबंदी कानून की बात ही अलग है। अलग इसलिए कि अब यह जनता की नीति बनती जा रही है और जनता ने इसे कबूल किया है। यह नीतीश सरकार की सफ़लता है। Read More>>>

बात : सरकार सख्त, शराबी पस्त

दोस्तों, आखिरकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का निश्चय रंग लाया है। बीते दो दिनों से सूबे में देशी शराब का प्रतिबंध लागू है और साथ ही विदेशी शराब की बिक्री की मुकम्मल व्यवस्था नहीं होने के कारण विदेशी शराब की उपलब्धता भी नहीं हो पा रही है। साथ ही शराबबंदी को लेकर जिस तरीके से स्थानीय प्रशासन ने अपना सख्त रवैया दिखलाया है, उससे शराब माफियाओं और शराबियों के हौसले पस्त हो गये हैं।वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा चुनाव पूर्व की गयी शराब बंदी की घोषणा से महिलाओं में खुशी देखी जा रही है। सूबे के ग्रामीण इलाकों में शराबबंदी को लेकर महिलाओं ने घी के दीये जलाये। Read More>>>

खास खबर : गांव में रोजगार मिलता तो नहीं होती बाबूजी की मौत, जागो मांझी की बेटी ने किया खुलासा, जीवन और मौत से जुझ रही जागो मांझी की पत्नी पंचोलिया मांझी

पटना(अपना बिहार, 2 अप्रैल 2016) - बीते 26 मार्च को शेखपुरा में जागो मांझी की मौत हो गयी। पहले खबर यह आई कि जागो मांझी की मौत भूख के कारण हो गयी। मामला प्रकाश में आने के बाद सरकारी जांच में यह बात सामने आयी कि स्व. मांझी की मौत की असली वजह लीवर की बीमारी थी। अब उनकी बेटी बिमली मांझी ने इस मामले में नया खुलासा किया है कि यदि इस वर्ष भी उन्हें और उनके परिवार को गांव में रोजगार मिल गया होता तो उनके पिता की मौत नहीं होती।

पीएमसीएच में अपनी मां पंचोलिया मांझी का इलाज कराने आयी बिमली मांझी ने बताया कि वे दो भाई-बहन हैं और दोनों रोजी-रोटी के लिए हरियाणा के पानीपत में र्इंट थापने का काम करते हैं। जिस दिन उनके पिता की मौत हुई, उस दिन वे लोग वहीं थे। जब लौटकर आये तबतक उनके पिता की अंत्येष्टि हो चुकी थी। बिमली मांझी ने बताया कि जब वे लोग अपने घर में गये तब उन्हें पड़ोसियों ने जानकारी दी कि कुछ लोग आये थे और घर में दो बोरा गेहूं अ‍ैर चावल रख गये हैं।

जागो मांझी की बेटी ने बताया कि पिछले वर्ष माघ के महीने में ही वह अपने घर आयी थी और उस समय उनके पिता की हालत खराब थी। इलाज के लिए पैसा नहीं रहने के कारण अपना पायल-सिकड़ी गिरवी रखकर उसने जागो मांझी का इलाज कराया। हरियाणा वापस जाते समय उसने अपने पिता को खर्च के लिए पांच सौ रुपए भी दिये थे। हालांकि उसने बताया कि घर में तीन परिवारों के पास राशन कार्ड है। जब वे सब घर पर रहते थे तब उन्हें सरकारी राशन मिलता था।

बिमली मांझी ने बताया कि पहले वह मनरेगा के तहत गांव में ही काम करती थी। तब पूरा परिवार साथ रहता था। उसने बताया कि पिछले वर्ष जब रोजगार नहीं मिला तब पूरा परिवार हरियाणा चला गया। घर पर केवल मां-पिताजी रह गये थे। मां लकवाग्रस्त है और इस कारण घर में खाना बनाने से लेकर सभी तरह के कार्य पिताजी ही करते थे। परंतु उनके बीमार पड़ने के बाद घर में ऐसा कोई नहीं था जो उन्हें एक लोटा पानी तक दे।

बिमली मांझी ने बताया कि उसे अफसोस है कि रोजी-रोजगार के लिए परदेस जाने के कारण उसके पिता की देखभाल नहीं हो सकी और उनका निधन हो गया। अपनी बीमार मां के बारे में उसने बताया कि वह खुद से कुछ नहीं करती है। पिताजी की मौत के बाद उसने कुछ नहीं खाया था। बाद में उसकी स्थिति बिगड़ने लगी तब उसे शेखपुरा में भर्ती कराया गया, जहां से उसे पीएमसीएच रेफर कर दिया गया।

संपादकीय : फ़िर सामने आया न्यायिक व्यवस्था का आरक्षण विरोधी चरित्र

दोस्तों, पटना हाईकोर्ट ने वर्ष 2001 में तत्कालीन राबड़ी देवी सरकार के फ़ैसले को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत आरक्षित वर्गों को प्रोन्नति में आरक्षण का लाभ दिया जाता था। आरक्षण विरोधियों ने इस मामले को लेकर अपील दायर किया था। कोर्ट ने आरक्षण विरोधियों के समर्थन में फ़ैसला देते हुए प्रोन्नति पर रोक को हटा लिया और साथ ही उसने प्रोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दिया। उल्लेखनीय है कि 85वें संविधान संशोधन अधिनियम 2001 द्वारा तत्कालीन राबड़ी देवी सरकार ने यह प्रावधान किया था कि आरक्षित वर्ग के सेवकों को प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरीयता का लाभ मिलेगा। Read More>>>

सामाजिक न्याय के लिए अनिवार्य है शराबबंदी : मीसा

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शराब पूरे समाज को प्रभावित करता है। यह समस्या किसी खास तबके तक सीमित नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों में यह विकराल रूप धारण कर चुका है। खास बात यह है कि इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव वंचित तबके के परिवारों में देखा जाता है जहां लोगों की आय सीमित है। अपनी आय का बड़ा हिस्सा शराब के मद में खर्च करने के बाद शराबखोरी से ग्रस्त आदमी अपने परिवार के लिए कुछ भी संचय नहीं कर पाता है। निर्धनता के वास्तविक दंश से कुछ देर के लिए स्वयं को दूर करके काल्पनिक दुनिया में जाने की ललक धीरे धीरे एक ऐसी लत का रूप ले लेती है Read More>>>

शराबबंदी पर आधी आबादी की राय

एक नयी क्रांति की शुरूआत : रीना

पटना(अपना बिहार, 1 अप्रैल 2016) - राज्य सरकार ने सूबे में शराबबंदी को लागू कर एक नयी क्रांति की शुरूआत कर दी है। इस क्रांति का मकसद हर घर में सुख और शांति स्थापित करना है। विधान परिषद में सचेतक रीना यादव ने इस संबंध में कहा कि मुख्यमंत्री बधाई के पात्र हैं जिन्होंने महिलाओं की पीड़ा को समझा और यह पहल किया। उन्होंने कहा कि शराब के कारण सबसे अधिक दलित और पिछड़े वर्ग के गरीब प्रभावित होते हैं। अब वे अपनी कमाई अपने वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कर सकेंगे।

महिलाओं के लिए सबसे जरूरी है शराबबंदी : मनोरमा

पटना(अपना बिहार, 1 अप्रैल 2016) - शराब के कारण सबसे अधिक महिलायें प्रभावित होती हैं। इसलिए शराबबंदी का सबसे अधिक लाभ महिलाओं को मिलेगा। विधान परिषद में जदयू की सदस्य मनोरमा देवी के मुताबिक राज्य सरकार का फैसला महिलाओं के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने समाज बदलने की दिशा में शुरूआत की है। इसका दूरगामी असर दिखेगा। उन्होंने उम्मीद व्यक्त किया कि सरकारी स्तर पर शुरू किया गया यह अभियान जन आंदोलन बनेगा और बिहार शराब के कलंक से मुक्त को सकेगा।

शराबबंदी के पहले चरण का स्वागत, लेकिन पूरी पाबंदी कब : सीमा

पटना(अपना बिहार, 1 अप्रैल 2016) -राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की राष्ट्रीय सचिव सीमा सक्सेना ने बिहार में शराबबंदी के पहले चरण का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि महागठबंधन सरकार दावा कर रही है कि इस चरण में बिहार के तमाम ग्रामीण इलाकों में पूर्ण शराबबंदी लागू हो जाएगी। उन्होंने कहा कि अभी ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ग्रामीण इलाकों में शहरी इलाकों से शराब की तस्करी पर रोक लग जाएगी या पूरे राज्य के ग्रामीण इलाकों में देसी शराब के अवैध कारखाने पूरी तरह बंद हो जाएंगे, इसके बावजूद सरकार ने कदम उठाए हैं, जिसका हम स्वागत करते हैं। रालोसपा सचिव ने पूछा कि सरकार ने बिहार की जनता से पूर्ण शराबबंदी का वादा किया था, ऐसे में उसे शहरी इलाकों में भी शराब पर रोक लगाने की दिशा में कदम बढ़ाना होगा।

पहल अच्छी, लेकिन पुनर्वास की हो पूरी व्यवस्था : प्रतिमा

पटना(अपना बिहार, 1 अप्रैल 2016) - राज्य सरकार की पहल अत्यंत ही सराहनीय है और उम्मीद है कि इससे राज्य में बहुत बदलाव होगा। परंतु राज्य सरकार को जल्द ही पूर्ण शराबबंदी लागू करनी चाहिए। ये बातें गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच की संयोजिका प्रतिमा पासवान ने कही। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को उन परिवारों के पुनर्वास की दिशा में भी पहल करनी चाहिए जिनकी रोजी-रोटी दुर्भाग्यवश शराब पर आश्रित है। उनके प्रति दंडात्मक व्यवहार के बदले उनके पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए। तभी राज्य सरकार की पहल का समुचित लाभ पूरे समाज को मिलेगा।

संपादकीय : सरकार की नेक नीयत पर सवाल

दोस्तों, राज्य सरकार अपना कहा पूरा करने जा रही है। आगामी 1 अप्रैल से सूबे में शराबबंदी का पहला चरण लागू होगा। पहले चरण में देसी शराब को बंद किये जाने का कार्यक्रम है और प्रशासनिक स्तर पर भी तैयारियां कागजी तौर पर लगभग पूरी हो चुकी हैं। निश्चित तौर पर सरकार की नीयत नेक है। नेक इसलिए कि दलितों और पिछड़ों की बड़ी आबादी शराबखोरी के कारण सामाजिक विकास की परिधि से बाहर है। लेकिन सरकार की नेक नीयत पर भी सवाल उठ रहे हैं और ये सवाल बेवजह नहीं हैं। Read More>>>

केवल भाषण में नहीं, महिलाओं को मिले समुचित अधिकार

विधान पार्षद रीना यादव से खास बातचीत

पटना(अपना बिहार, 29 मार्च 2016) - यह विडंबना है कि राजनीति में महिलाओं को बढ़ावा मिले ऐसा सभी कहते हैं लेकिन वास्वतविकता कुछ और है। वास्तविकता यह है कि आज फिर चाहे वह विधानसभा हो या विधान परिषद आधी आबादी की हिस्सेदारी बहुत कम है। विधान परिषद में जदयू की सचेतक रीना यादव ने विशेष बातचीत में कहा कि महिलाओं को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए ईमानदार प्रयास किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि वर्तमान में विधान परिषद में केवल 5 महिला सदस्य हैं।

एक गृहणी से जनप्रतिनिधि बनने तक के अनुभव के बारे में पूछने पर श्रीमती यादव ने बताया कि यह सफर इतना आसान नहीं रहा है। पहले घर चलाने की जिम्मेवारी थी और अब जिम्मेवारियों का विस्तार हुआ है। अब हमने यह महसूस किया है कि हमारी पहचान और हमारा अस्तित्व भी है। उन्होंने कहा कि सदन के अंदर नये सदस्यों को विधायी प्रक्रियाओं का अध्ययन करना चाहिए। बाहर से देखने पर हमें ऐसा लगता है कि विधायक या विधान पार्षद बनने के बाद सबकुछ आसान हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। सदन की अपनी प्रक्रिया है और जनता की समस्याओं के निवारण की प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं होती है। नये होने के कारण पहले झिझक भी होती थी जो अब खत्म हो चुकी है।

नये सदस्य होने के बावजूद जदयू द्वारा विधान परिषद में सचेतक बनाये जाने के संबंध में रीना यादव ने साफ कहा कि पार्टी ने उनके उपर विश्वास व्यक्त किया है। दल के नेताओं के इस विश्वास ने हमारा आत्मविश्वास बढ़ाया है और हम प्रयासरत हैं कि हम सदन के अंदर सचेतक पद की जिम्मेवारी का ईमानदारी से निर्वहन करें।

श्रीमती यादव ने बताया कि वे मूलत: पटना की रहने वाली हैं। उनकी शादी नालंदा में राजू यादव से तब हुई जब वे इंटर की छात्रा थीं। बाद में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से एमए किया। श्री यादव जदयू के पूर्व विधान पार्षद हैं। श्रीमती यादव ने बताया कि राजनीति हमारे परिवार का हिस्सा है लेकिन अब जबकि मैं स्वयं एक जनप्रतिनिधि हूं तब एक जनप्रतिनिधि की जिम्मेवारियों का अहसास होता है। एक जनप्रतिनिधि होने का मतलब केवल स्वयं तक सीमित रखना नहीं बल्कि समाज के लिए पूर्ण रूप से समर्पित होना होता है।

नाकामी छिपाने के लिए जनता को भड़का रहे पीएम : मीसा

पटना(अपना बिहार, 28 मार्च 2016) - हर वादे को पूरा करने में नाकाम केंद्र सरकार एक नारे के सहारे ध्यान भटका राजनीति करने पर आमादा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, व्यापार, महँगाई, राष्ट्रीय सुरक्षा, कृषि जैसी मूलभूत मुद्दों पर अपनी नाकामी से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नित नए भड़काऊ मुद्दे पैदा किए जा रहे हैं। ये बातें राजद की वरिष्ठ नेत्री डा. मीसा भारती ने फेसबुक पर जारी अपने बयान में कही। उन्होंने कहा कि पहले कहा गया था कि मोदीजी आएँगे और अच्छे दिन लाएँगे। पर मोदीजी आए तो सारी समस्याओं को दरकिनार कर बेवजह की राजनीति में कूदकर अपनी विफलता पर पर्दा डालने में लगे हैं।

उन्होंने कहा कि यह दिलचस्प है कि जहां एक ओर सरकार से असहमत लोगों को राष्ट्रद्रोही बताया जा रहा है वहीं दूसरी ओर, भाजपा, कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने की तैयारी में है। पीडीपी, अफजल गुरू को नायक और शहीद मानती है। इससे दोनों पक्षों का पाखंड उजागर होता है। यदि, जैसा कि भाजपा का कहना है, जो लोग कश्मीर की स्वायत्तता के हामी हैं और अफजल गुरू को दी गई मौत की सजा को गलत मानते हैं, वे राष्ट्रद्रोही हैं, तो फिर भाजपा राष्ट्रद्रोहियों से हाथ क्यों मिला रही है?

उन्होंने कहा कि जहां जेएनयू के विद्यार्थियों के खिलाफ संघ परिवार के सदस्य आग उगल रहे हैं वहीं यह भी सच है कि इस तरह के नारे, कश्मीर में दशकों से लगाए जा रहे हैं। मजे की बात यह है कि भाजपा की अकाली दल के साथ भी गठबंधन सरकार है, जो उस आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थक है, जिसमें सिक्खों के लिए स्वायत्त खालिस्तान राज्य के गठन की मांग की गई है।

उन्होंने कहा कि हमारे देश के उत्तर-पूर्वी इलाकों के भारतीय राष्ट्र में एकीकरण की प्रक्रिया कई उतार-चढ़ावों से गुजर रही है और वहां अब भी एक शक्तिशाली अलगाववादी आंदोलन जिंदा है। जरूरत राष्ट्रद्रोह संबंधी कानूनों के पुनरावलोकन की है ना कि अपने विरोधियों पर राष्ट्रद्रोही का लेबल चस्पा कर लोगों को भड़काने की। इस मामले में भाजपा की दोमुंही राजनीति स्पष्ट है। एक ओर वह दिल्ली में राष्ट्रद्रोह और भारत माता की जय का राग अलापती है तो दूसरी ओर देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे दलों व संगठनों से हाथ मिलाती है जो हमारे संविधान में निहित कई मूल्यों को चुनौती देते आ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि बात एकदम साफ है। आरएसएस-भाजपा की राजनीति भावनात्मक मुद्दों को उछालकर समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की है। अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया से दूर रहा है। जिस समय विभिन्न सामाजिक समूह राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़कर राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में हाथ बंटा रहे थे उस समय आरएसएस केवल हिन्दू समाज की बात कर रहा था और मंदिरों के ध्वंस, हिन्दू राजाओं के शौर्य और जाति व लैंगिक पदक्रम पर आधारित हिन्दू व्यवस्था की महानता के गीत गा रहा था। उसने कभी तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकार नहीं किया और एक-एक कर गौवध, बीफ भक्षण, मुसलमानों के भारतीयकरण, राम मंदिर, घर वापिसी व लव जिहाद जैसे मुद्दे उठाए। अब, इस सूची में राष्ट्रद्रोह और भारत माता की जय भी जुड़ गए हैं।

संपादकीय : शिक्षा व्यवस्था का घिनौना सच

दोस्तों, भारत के पौराणिक ग्रंथों में वर्णित गुरु आश्रम की परंपरा आज भी कायम है। आज इसका स्वरुप बदला है लेकिन चरित्र में कहीं भी कोई बदलाव नहीं आया है। पहले भी द्रोणाचार्य जैसा ब्राह्म्ण केवल राजपुत्रों को शिक्षा देता था और आज भी प्राइवेट स्कूलों में धनकुबेरों के बच्चे पढते हैं। सरकारी स्कूलों की हालत का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि इन स्कूलों में केवल उन परिवारों के बच्चे पढते हैं, जिनके पास साधन नहीं हैं। परिणाम हमारे सामने है। सरकारी शिक्षण संस्थायें महज प्रमाणपत्र का उत्पादन करने वाली निर्जीव फ़ैक्ट्रियां बनकर रह गयी हैं। Read More>>>

राहे बाटे : पटना के गांवों में धर्मनिरपेक्ष भारत की तलाश

दोस्तों, यह सवाल मेरे जेहन में कई बार आया कि आखिर नरेंद्र मोदी ने शहरों को समार्ट बनाने की योजना क्यों बनायी। जबकि असल भारत तो गांवों का देश है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नरेंद्र मोदी जिस उन्मादी संगठन के प्रतिनिधि हैं, उनके लिए सबसे बेहतर तो गांव हैं जहां आज भी अशिक्षा और असुविधायें हैं। वे चाहें तो बड़े आराम से गांव के भोले भाले लोगों को गुमराह कर सकते हैं। लेकिन क्या यह संभव है?

भारत के गांवों में धर्मनिरपेक्षता की तलाश का आइडिया मेरे बड़े भाई कौशल किशोर कुमार के एक निर्देश ने जाने-अनजाने में दे दिया। होली के एक दिन पहले पत्रकार वीरेन्द्र यादव भाई के साथ पटना के गांवों में समाजवाद के प्रमाण देखने के ठीक दो दिनों के बाद भैया ने कहा कि आज मेरे साथ गांव चलो। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि पटना से करीब 22 किलोमीटर दूर मसौढी के इलाके में उन्होंने जमीन का एक टुकड़ा खरीदा है। उसे ही देखने चलना है।

हम दोनों भाईयों के बीच उम्र का अंतर बहुत अधिक नहीं है। हम दोनों भाई स्कूल के दिनों में एक ही कक्षा के विद्यार्थी थे। हालांकि तब हमारे रिश्ते ऐसे नहीं थे। कल जब भैया ने कहा तो मैंने भी हामी भर दी। आदेश मिला कि पहले कुछ खाना खा लो, फ़िर चलते हैं। गृह मंत्री महोदया दाल और भात बना चुकी थीं। तरकारी बनने में समय था। इसलिए गर्मागर्म दाल-भात और तीखी हरी मिर्च से काम चलाना पड़ा।

भैया की नई बाइक तैयार थी। आदेश मिला कि तुम चलाओ। मेरे पास ना कहने का कोई विकल्प नहीं था। भैया का हाथ लंबे अरसे के बाद मेरी पीठ पर था। मन को सुकून मिल रहा था और उनकी बाइक गांव की उबड़खाबड़ सड़क पर भी चीते की भांति दौड़ लगा रही थी।

हम पुनपुन जीवन रक्षक बांध पर बनी सड़क पर उड़ते हुए कराय नामक गांव पहुंचे। भैया के लिए यह गांव मायने रखता है। यहां उनकी पत्नी यानी मेरी भाभी का ननिहाल है। एक खंडहर के आगे हम रुके। दालान की शक्ल के इस खंडहर में दो खटिया लगी थी और कुछ लोग आराम फ़रमा रहे थे। हमारे पहुंचते ही वे उठ गये। फ़िर अंदर से सफ़ेदा(बेड शीट) लाया गया। हम दोनों भाई बैठे। साथ में भैया के परिजन भी। इसी दरम्यान जानकारी मिली कि यहां एक बड़ा सा बंगला है। सिराज मियां का। पूछा तो जानकारी मिली कि सिराज मियां के पूर्वज पहले यहां के जमींदार हुआ करते थे। पहले उनलोगों के पास सात सौ बीघा से अधिक जमीन थी। वर्तमान में सिराज मियां के पास इस इलाके में करीब 18 बीघा जमीन शेष है। वे और उनका पूरा परिवार अब पटना में रहता है।

मेरे मन में बंगला देखने की इच्छा हुई। एक बुजुर्ग ने मेरा साथ दिया। हम पैदल ही चल पड़े। करीब दो-तीन मिनट चलने के बाद एक हवेलीनुमा हाता हमारे सामने था। बंगले में बच्चे खेल रहे थे। अंदर के विशाल कमरे और उनका डिजायन इस बात का प्रमाण दे रहा था कि कभी यह बंगला कितना शानदार रहा होगा। करीब डेढ बीघा जमीन में बने इस बंगले का उपयोग अब गांव के लोग करते हैं। इसी हाते में गांव का बाजार लगता है। मुझे बंगला दिखाने गये बुजुर्ग ने बताया कि सिराज मियां के चाचा अली मियां बहुत गुस्से वाले थे। अक्सर जब लोगों के मवेशी और बकरियां इनके खेत में घुस जाया करते थे तब उनके बड़ाहिल (सेवक) उन्हें पकड़कर बंगला के पीछे बने बड़े फ़ाटक में बंद कर देते थे। फ़िर दस पैसा देने पर ही जानवरों को छोड़ा जाता था।

हम वापस दालान पहुंचे। भैया का आदेश मिला। चलो खेत पर चलते हैं। इससे पहले एक और बात हुई। जिस दालान में हमारा स्वागत किया गया था, उसी दालान में एक शख्स ने भैया की ओर इशारा करते हुए कहा। आप लोग तो यहां लूटने आये हैं। मैं समझ गया कि वह व्यक्ति एक किसान है और उसने मजबूरी में अपनी जमीन बेची होगी। मुझे उसकी पीड़ा ने अंदर तक हिलाकर रख दिया।

खेत देखने की औपचारिकता का निर्वाह करने के बाद हम वापस उसी दालान में पहुंचे। हमारे लिए खाने का प्रबंध किया गया था। गर्मागर्म रोटियां और रसदार चिकेन। यानी मेरा फ़ेवरिट। भरपेट खाने के बाद हम वापस लौट रहे थे। अचानक मेरी नजर भभौल गांव में बने एक मस्जिद पर पड़ी। मुझे लगा मेरे सामने बाबरी मस्जिद खड़ा है। तीन विशालकाय गुंबदों वाला मस्जिद। गांव वालों से पूछा तब जानकारी मिली कि इस गांव में अभी भी पचास-साठ घर मुसलमान रहते हैं। भभौल के अलावा आसपास के अनेक गांवों में मुसलमान रहते हैं। इन गांवों में कभी भी कोई दंगा नहीं हुआ। यहां तक कि जब आयोध्या में भगवा आतंकवादियों ने बाबरी को ध्वस्त कर दिया था और पूरा देश सांप्रदायिक दंगे की चपेट में झुलस गया था।

मैंने भैया को एक फ़ोटो क्लिक करने का अनुरोध किया। जब मैं लोगों से बातें कर रहा था तब वे मुझे अजीबोगरीब नजरों से देख रहे थे। मैं कारण समझ नहीं पाया लेकिन उनके चेहरे की मुस्कराहट बता रही थी कि वे नाराज नहीं थे। हम लौट रहे थे। रास्ते में मैंने उन्हें देश विभाजन के समय दंगे की असली वजह बतायी। मैंने उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि दंगा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि तब हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे से नफ़रत करते थे। असली कारण जमीन थी। फ़िर मैंने उन्हें उन गांवों की सच्चाई बतायी जिनके नाम आज भी मुसलमानी हैं।

राहे बाटे : लोहिया, पटना के गांव और समाजवादी भ्रष्टाचार की सार्थकता

दोस्तों, डा राम मनोहर लोहिया देश के पहले राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने "पिछड़ा पावे, सौ में साठ" का नारा दिया था। उनके बाद अमर शहीद जगदेव बाबू ने "सौ में नब्बे भाग हमारा है" की बात कही थी। बिहार पूरे देश में एक नजीर है। नजीर इसलिए कि यहां पिछले 25 वर्षों से वे राज कर रहे हैं जो खुद को लोहिया और जगदेव बाबू दोनों का अनुयायी मानते हैं। हालांकि बीच में करीब साढे सात वर्षों के लिए सवर्ण तबका भी सत्ता का साझेदार रहा। मन में कई सवाल थे। आखिर पिछले 25 वर्षों में कितना कुछ बदला है यह बिहार। Read More>>>

सीधी बात : दलितों और पिछड़ों को अलग करने की नरेंद्र मोदी की चाल

दोस्तों, अब यह बात साफ़ हो गयी है कि आरएसएस देश में आरक्षण की व्यवस्था को समूल समाप्त करने को कृतसंकल्पित है। वजह यह है कि आरक्षण की समीक्षा की बात आरएसएस के नेताओं ने एक बार नहीं बल्कि अनेक बार दुहराया है। अब चूंकि देश के कई राज्यों में चुनाव होने हैं और भाजपा की हालत वैसी न हो जैसी पिछले वर्ष बिहार में हुई थी, नरेंद्र मोदी की दलितगिरी सामने आयी है। उन्होंने कहा है कि दलितों से आरक्षण कोई नहीं छीन सकता है। सवाल उठता है कि क्या नरेंद्र मोदी और उनके आकागण देश के केवल पिछड़े वर्ग से आरक्षण छीनना चाहते हैं?

असल में पूरा मामला यही है। आरएसएस के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती दलित आंदोलन नहीं बल्कि पिछड़ा वर्ग में आयी नवचेतना है। आरएसएस यह जानता है कि पिछड़ा वर्ग बड़ी तेजी से राजनीतिक रुप से जागरुक हो रहा है। इसका प्रमाण यह है कि देश के कई राज्यों में इस वर्ग के लोगों ने राजनीतिक सत्ता हासिल की है। वह भी सवर्णों के हाथ से सत्ता छीनकर। ऐसे में उसके लिए सबसे बड़ा दुश्मन दलित वर्ग नहीं बल्कि देश का पिछड़ा वर्ग ही है।

खैर बाबा साहब के नाजायज औलाद बनने का प्रयास कर रहे नरेंद्र मोदी को इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या वे अपने आकाओं के जैसे ही आर्थिक आधार पर आरक्षण को मानते हैं या फ़िर इसे वर्तमान के सामाजिक आधार पर। वे बाबा साहब को अपना आराध्य बता रहे हैं। लेकिन उन्हें इस बात का भी उल्लेख करना चाहिए कि बाबा साहब ने ही संविधान में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था हेतु आयोग बनाने की बात कही थी।

जिस सरदार वल्लभ भाई पटेल का गुणगाण नरेंद्र मोदी करते फ़िरते हैं, उन्हें इसका जवाब भी देना चाहिए कि आखिर किस कारण से पटेल ने आरक्षण के सवाल पर बाबा साहब का साथ नहीं दिया था। इतिहास गवाह है कि यदि पटेल ने बाबा साहब का साथ तब दिया होता तब पिछड़े वर्ग के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था उसी समय हो जाती जब देश में संविधान लिखा जा रहा था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फ़िर करीब चालीस वर्षों के बाद देश के बहुसंख्यक वर्ग को आरक्षण मिला। वह भी केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए। दलितों के जैसे संसद में आरक्षण का सवाल तो लंबित ही है।

बहरहाल यह साफ़ है कि नरेंद्र मोदी देश के दलितों और पिछड़ों को अलग कर राज करने की नीति अपना रहे हैं। वे देश के वंचितों की ताकत को खत्म करना चाहते हैं। लेकिन वे भूल रहे हैं कि ऐसा कर वे देश के सवर्ण वर्ग के हाथों की कठपुतली बनकर कर रहे हैं। इससे उनका नुकसान तो होगा ही, साथ ही देश के बहुसंख्यक वर्ग को भी नुकसान झेलना होगा। लेकिन मौजूदा दौर में जिस तरह से नरेंद्र मोदी के दांवों का हश्र हुआ है, देश का बहुसंख्यक वर्ग उनकी नयी साजिश को भी बेअसर कर देगा।

विशेष संपादकीय : बेचारे मास्टर साहब

दोस्तों, मास्टर साहब आजकल बड़े परेशान हैं। परेशानी अगर एक हो तो कोई बात नहीं होती। यहां तो परेशानियों का अंबार है। सरकार समय पर वेतन नहीं देती है। घर पर बीवी-बच्चे सांस नहीं लेने देते। स्कूल में बच्चे भी बड़े स्मार्ट हो गये हैं। मास्टर साहब पर ही तरह-तरह के आरोप लगा देते हैं। इन सब परेशानियों से बड़ी परेशानी नौकरी जाने का खतरा है। सरकार ने कह दिया है कि मास्टर साहब का मतलब घसकटवा मास्टर साहब नहीं बल्कि प्रशिक्षित यानी ट्रेंड मास्टर साहब होगा। Read More>>>

नवल की कविता : फिर से होली आयी है...

फिर से होली आयी है,

संग अपने असंख्य खुशियां लायी है,

गरमागरम पुआ, कचौड़ी, आलूदम

और रंगों की फुहार लायी है।

 

फिर से होली आयी है,

परदेसी फिर से घर को आयेंगे,

दो घड़ी अपनों के बीच,

परजीविता का कष्ट मिटायेंगे।

 

फिर से होली आयी है,

गांव की गलियां भी मुस्करायेंगी,

बुढ़ी हो चुकी भौजाइयां भी,

हमें देख-देख इठलायेंगी।

 

फिर से होली आयी है,

संग अपने असंख्य खुशियां लायी है...

नवल की कविता : सर्वनाश

तुम कहते हो शेर पर सवार

नवयौवना सी स्वर्णाभूषणों से लदी

हाथों में हरवे-हथियार लिये महिला

तुम्हारी माता है।

 

तुम उसकी पूजा करो

उसकी रोज आरती उतारो

और भी जो तुम्हारे मन में आये

वह सब करो।

 

यदि तुम्हारा मन करे तो

उसकी स्तूति को राष्ट्रीय वंदना घोषित करवा लो

और जो न रोज गाये

उसे फ़ांसी पर लटकवा दो।

 

लेकिन याद रखो

अब जमाना बदल चुका है

 

महिषासुर और बाबा साहब के संतान

तुम्हारी एक नहीं चलने देंगे

सब मिल तुम्हारा पाखंड मिटा ही देंगे

हम जानते हैं

तुम भी अपना सर्वनाश भांप चुके हो

संपादकीय : कला और साहित्य जगत में सामंतवाद के खिलाफ़ बोलें हमला

दोस्तों, कला और साहित्य भी समाज का हिस्सा है। अब चूंकि समाज में जातिवाद है, इसलिए इन दोनों क्षेत्रों में भी जातिवाद है। खास बात यह है कि इन क्षेत्रों में भी सामंतवाद चरम पर है। एक जीता जागता प्रमाण यह है कि मिथिला के ब्राह्म्णों के घरों में भित्ति चित्रकला यानी मधुबनी पेंटिंग आजकल नयी ऊंचाईयां छू रहा रहा है जबकि अंग क्षेत्र के माली समाज के लोगों की मंजूषा पेंटिंग आज भी अपनी पहचान बनाने में असफ़ल रहा है। Read More>>>

यादों के झरोखे से : मीसा में मेरी गिरफ़्तारी

- जाबिर हुसेन

1974 में, संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान, जनता सरकार के गठन की रणनीति पर विचार-विमर्श के लिए तीन दिनों की बैठक खत्म हो गई थी। मैं अपने कुछ सहयोगियों के साथ खादीग्राम से जमुई जा रहा था कि रास्ते में अचानक मुंगेर के डी एम श्री अभिमन्यु सिंह की गाड़ी पर नजर पड़ी। संभव है, उन्होंने या उनके सुरक्षाकर्मी ने भी हमारी जीप को जाते देखा हो। मुझे इस बात की जानकारी थी कि मीसा के तहत मेरी गिरफ़्तारी का वारंट निकला हुआ है, और जिला प्रशासन को ऊपर से मुझे गिरफ़्तार करने के कड़े निदेश दिए गए हैं। मुझे यह भी पता था कि दो राजनेता, दोनों मंत्री, मुझे किसी कीमत पर जल्द से जल्द मीसा में गिरफ़्तार करने के लिए प्रशासन पर दबाव दे रहे थे।

मेरे सहयोगी डी एम की गाड़ी देखकर थोड़ा घबराए। मेरे झोले में बैठक की कार्यवाही से संबंधित कागजात और ह्यजनता सरकारह्य के गठन की रूपरेखा थी, कुछ प्रकाशित पुस्तकें, कुछ पांडुलिपियां थीं, जिन्हें बचाना जरूरी था।

जमुई में, हमारी जीप खेती घर के सामने रुक गई। गिरफ़्तारी की आशंका थी ही, मैंने अपने एक वरिष्ठ सहयोगी को झोला थमाया और चाय पीने के बहाने सड़क की तरफ देखने लगा। इसी बीच, पुलिस की दो-तीन जीपें वहां पहुंच गईं। एक सीनियर पुलिस अफसर ने बड़ी शालीनता के साथ कहा कि डी एम साहब आपसे कुछ बात करना चाहते हैं। हमारे लिए समझना मुश्किल नहीं था कि गिरफ़्तारी का समय आ गया है।

मजिस्ट्रेट और पुलिस की गाड़ी मुझे लेकर मुंगेर की तरफ चल पड़ी। मुंगेर पहुंचकर मुझे इतनी मोहलत जरूर दी गई कि मैं फोर्ट एरिया के अपने घर से कुछ कपड़े ले लूं। इस प्रकार मैं मीसा के तहत मुंगेर जेल में दाखिल हुआ। श्री शालिग्राम दुबे उन दिनों वहां जेलर हुआ करते थे।

लगभग डेढ़ महीने की अवधि बीती होगी कि एक दिन जेल-अधीक्षक ने मेरे मीसा के अन्तर्गत नजरबंदी-आदेश को हाईकोर्ट द्वारा रद्द कर दिए जाने की सूचना दी। बहुत बाद में पता चला कि समाजवादी नेता श्री प्रणव चटर्जी ने मेरी रिहाई के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस तरह मेरी मीसा-नजरबंदी से मुक्ति संभव हुई।

आज यह तमाम बातें मुझे इसलिए याद आ गईं कि मेरे पड़ोसी-मित्र प्रो. कामेश्वर प्रसाद के सौजन्य से वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी श्री अभिमन्यु सिंह की पुस्तक पब्लिक सर्विस एंड लाइफ बियांउड (2014) मेरी नजरों से गुजरी। (लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद तथा बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति हैं)

तीन मुद्दे, तीन सवाल और एक संपादकीय

दोस्तों, संपादकीय आलेख की तकनीकी परिभाषा के हिसाब से किसी एक मुद्दे का उल्लेख ही आदर्श स्थिति मानी जाती है। ले्किन मुझे लगता है कि समय के साथ संपादकीय आलेख की परिभाषा में भी बदलाव होने चाहिए। अब चूंकि ऐसी कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है और मेरे समक्ष तीन मुद्दे हैं, इसलिए आज अभिनव प्रयोग आपके समक्ष रखने का साहस कर रहा हूं। मैं जिन तीन मुद्दों को लेकर आप सभी पाठकों का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं, उनमें पहला राष्ट्रीयता से जुड़ा है। Read More>>>

चाय दुकानदार ने देखी सदन की कार्यवाही, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी के साथ विधानसभा पहुंचे मंगल यादव

पटना(अपना बिहार, 17 मार्च 2016) - कटिहार रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान चलाने वाले मंगल यादव के लिए बुधवार का दिन यादगार बन गया। सूबे के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के संग गाड़ी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे मंगल यादव ने अपनी आंखों से सदन की कार्यवाही देखी। बाद में उनके बारे में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने पत्रकारों के बताया कि पिछले वर्ष अक्टूबर में चुनाव प्रचार के दौरान एक पत्रिका द्वारा प्रकाशित लेख में मंगल यादव ने विधानसभा चुनाव में राजद के प्रचंड जीत की बात कही थी। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि राजद का अस्तित्व ऐसे ही समाज के प्रति प्रतिबद्ध और कर्मठ लोगों के कारण है।

बाबा साहब के बदले गोलवलकर का संविधान थोपना चाहता है आरएसएस : लालू

पटना(अपना बिहार, 16 मार्च 2016) - मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी देश में बाबा साहब डा. भीम राव आम्बेदकर के संविधान के बजाय अपने गुरू गोलवलकर का संविधान लागू करना चाहते हैं ताकि दलित और पिछड़े वर्ग के लोग आगे नहीं बढ़ सकें। राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने फेसबुक पर जारी अपने बयान में कहा कि ये आरएसएस क्या है, कौन है? यह सभी जानते हैं। असल में वे आरक्षण खत्म करने की आड़ में ये बाबा साहेब के सँविधान की बजाय गुरु गोलवलकर का सँविधान लागू करना चाहते है ताकि छोटी जाति के लोग पढ़ ना सके, बढ़ ना सके, नौकरी ना कर सके, मंदिरों में प्रवेश ना कर सके और हर जगह इनका ही वर्चस्व कायम रहें।

श्री प्रसाद ने कहा कि आरएसएस के गुरु गोलवलकर के "बँच आफ थॉट्स " में लिखे हुए दबे, कुचलें एवं वंचितों को तिरस्कार एवं शोषित करने के तरीकों को लागू करना चाहता है ताकि इस देश में मनुवाद और जातिवाद को बल मिल सके और इनकी दुकानदारी अच्छे से चल सके। पूरा देश जानता है कि केंद्र सरकार द्वारा आरएसएस एवं गुरु गोलवलकर की नीतियों पर चलने के कारण ही हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की मौत हुई। "बँच आॅफ थॉट्स "पुस्तक में लिखी बातों को ही आरएसएस अपना संविधान मानता है और उसे लागू करना ही इनका असली एजेंडा है । ये लोग बाबा साहब द्वारा रचित इस देश के संविधान को कागज का एक टुकड़ा मानते है । अब ये पहचान चुके है कि इस देश का दलित,पिछड़ा एवं उत्पीड़ित समाज जाग गया है इसलिए बाबा साहेब की दिखावटी आड़ लेकर गुरु गोलवलकर का खतरनाक एजेंडा गुप्त रूप से लागू करना चाहते है।

श्री प्रसाद ने कहा कि दिल्ली और बिहार में मिली बुरी हार, आगामी चुनावों में संभावित हार एवं अपने चुनावी वादे पूरा नहीं करने के कारण आरएसएस व भाजपा के लोग हताशा और निराशा में अनाप-शनाप बोल रहे है। विकास के अति महत्वपूर्ण मुद्दों एवं अपनी विफलताओं से से ध्यान भटकाने के लिए ये लोग नित नए नए स्वांग रचते है।

उन्होंने कहा कि बिहार की जनता ने जो कड़ा सबक इनको सिखाया है उसका संदेश पूरे देश में गया है। बिहार में भी इन्होने ये मुद्दा उठाया था, उसका क्या हश्र हुआ ये किसी से छुपा नहीं है। आरक्षण को लेकर आरएसएस का सपना, सपना ही रहेगा। इनका ये सपना कभी भी पूरा नहीं होगा। अब पता नहीं ये खुशफहमी के शिकार है या गलतफहमी के । इनके भेष बदलने से कुछ नहीं होगा , हाँ अगर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख़्यकों को लेकर आरएसएस अपना द्वेष कम करें तो देश का जरूर भला हो सकता है।

पालिटिक्स : दिलचस्प है नीतीश कुमार का वामपंथ प्रेम

दोस्तों, विधानसभा चुनाव में राजद के साथ मिलकर भाजपा को करारी शिकस्त देने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हौसले बुलंद हैं। खास बात यह है कि देश में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच उन्होंने अपनी चाल बदल दी है। पहले यह अनुमान लगाया जा रहा था कि पश्चिम बंगाल में वे ममता बनर्जी का सहयोग करेंगे लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। सूबे के राजनीतिक गलियारे में बह रही बयार को आधार मानें तो वे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ वामपंथी दलों के साथ खड़े होंगे। Read More>>>

खास रिपोर्ट : वाहनों के मामले में सबसे पीछे, जाम में सबसे आगे

दोस्तों, राजधानी पटना और सूबे के मुख्य शहरों में जाम से कराहने वाली आम जनता के लिए खास खबर। खबर यह है कि राज्य में एक हजार लोगों में से केवल 36 लोगों के पास ही वाहन है। इस आंकड़े के लिहाज से बिहार देश में सबसे निचले स्थान पर है। इस मामले में सबसे उपर तामिलनाडू है जहां एक हजार में से 282 लोगों के पास अपने वाहन हैं। वहीं गुजरात में यह संख्या 260 है। तीसरे स्थान पर आंध्रप्रदेश है जहां यह संख्या 252 है। जबकि पड़ोसी राज्य झारखंड के मामले में यह संख्या 106 है।

बिहार सरकार द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक सबसे कम वाहनों के मामले में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल है जहां क्रमश: प्रति हजार आबादी पर केवल 82 और 67 है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या 149 है। हालांकि बिहार के लिहाज से सकारात्मक पहलू यह भी है कि यहां प्रतिवर्ष 16.23 प्रतिशत की दर से वाहनों की संख्या में वृद्धि हो रही है। वहीं पश्चिम बंगाल में यह वृद्धि दर 18.94 फीसदी है।

बहरहाल यह भी सच्चाई है कि सड़कों की उपलब्धता के मामले में भी बिहार बहुत पिछड़ा हुआ राज्य है। सरकार की रिपोर्ट के अनुसार प्रति लाख की आबादी पर राज्य में कुल 189.5 किलोमीटर सड़क है जिसमें राष्ट्रीय उच्च पथ 4 किलोमीटर, राज्य उच्च पथ 4.3 किलोमीटर, मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड़ और ग्रामीण पथों का कुल योग 181.2 किलोमीटर शामिल है।

संपादकीय : न विशेष राज्य का दर्जा, न सवा लाख करोड़ का पैकेज

दोस्तों, शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर बिहार में थे। एक बड़ा मौका था पटना हाईकोर्ट के शताब्दी वर्ष समापन समारोह का। यह मामला न्यायालय से जुड़ा था, सो राजनीति के लिए यह मुफीद नहीं थी। इसलिए एक और कार्यक्रम का आयोजन किया गया था वह भी राजद प्रमुख लालू प्रसाद के गढ़ राघोपुर में। मौका था दीघा-सोनपुर रेल सह सड़क पुल को जनता को समर्पित करने का। इस मौके पर राजनीति भी खूब हुई। लेकिन खास बात यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तेवर अलग रहा लेकिन अंदाज चिरपरिचित रहा। Read More>>>

देश के विकास में बिहार की बड़ी भूमिका : ठाकुर

पटना(अपना बिहार, 13 मार्च 2016) - पटना हाईकोर्ट के शताब्दी समापन समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा कि बिहार का इतिहास समृद्ध है। उन्होंने कहा कि इस धरती से बड़े स्वतंत्रता सेनानी, नेशनल लीडर और वैज्ञानिक पैदा हुए। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें बिहार के लोगों ने योगदान नहीं दिया हो। देश के विकास में बिहार के लोगों का बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि पटना हाईकोर्ट पिछले 100 साल से बिहार के लोगों की सेवा कर रहा है। शताब्दी समारोह के उद्घाटन के मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आए थे और आज समापन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए हैं। इससे देश में कानून के राज और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति कमिटमेंट दिखता है।

अपनी बात : आरोप, प्रत्यारोप और विपक्ष का बहिष्कार बनी नयी परंपरा

दोस्तों, संसदीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की परंपरा कोई नयी बात नहीं है। अबतक यही होता आया है। लेकिन बिहार विधान मंडल के मामले में बात-बात पर बहिष्कार एक नयी परंपरा बनती जा रही है। जारी बजट सत्र में यह दृश्य कई बार सामने आया है।

यह दृश्य उस समय और दिलचस्प हो जाता है जब विपक्ष की ओर से सत्ता पक्ष पर ताबड़तोड़ हमले होते हैं और जब सत्ता पक्ष की ओर से उसका जवाब दिया जाता है। विपक्ष बहिष्कार की राजनीति अपनाता है। इस संबंध में शुक्रवार को विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने स्पष्ट टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अच्छा वक्ता केवल वह नहीं होता है जो अच्छा बोलता है। अच्छा वक्ता वही होता है जो अच्छे तरीके से सुनता भी है।

विधानमंडल के चालू बजट सत्र की सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि दोनों सदनों में बड़ी संख्या में नये विधायक हैं जिनके पास विधायी कार्यों का अनुभव नहीं है। इससे भी दिलचस्प यह है कि सत्ता पक्ष के ऐसे सदस्यों की संख्या अधिक है। इस संबंध में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की यह टिप्पणी भी महत्वपूर्ण रही कि संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि इतनी बड़ी संख्या में युवा सदस्य चुने गये हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को हम जैसे युवा सदस्यों का प्रोत्साहित करना चाहिए न कि हमें हतोत्साहित किया जाय।

विपक्ष के लिहाज से बात करें तो मौजूदा सत्र के दौरान उसके पास मुद्दों का सीमित होना एक बड़ी समस्या है। नालंदा में नाबालिग के साथ दुष्कर्म मामले में राजद से निलंबित विधायक राजबल्लभ यादव द्वारा शुक्रवार को कोर्ट में सरेंडर किये जाने के बाद विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मुद्दा छीन गया। यह भी अत्यंत ही दिलचस्प है कि चालू बजट सत्र में विपक्ष ने सबसे अधिक श्री यादव की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सदन से बहिष्कार किया।

बहरहाल संसदीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप व बहिष्कार की परंपरा अलग-अलग स्वरूपों में आती रहेगी। यही परंपरा है। लेकिन सबसे अधिक चिंतनीय प्रश्न यह है कि सत्ता-विपक्ष की राजनीति में शून्यकाल आये दिन बाधित होता है, जिसके कारण आम जनता के सवाल हाशिए पर रह जाते हैं। वहीं जनता जिसके कल्याण के बारे में नीति बनाने की जिम्मेवारी दोनों सदनों के सदस्यों को है।

विशेष बातचीत : विशेष राज्य का दर्जा दें पीएम, नहीं तो आने-जाने का कोई मतलब नहीं : राबड़ी

पटना(अपना बिहार, 10 मार्च 2016) - बुधवार को पूर्व मुख्यमंत्री सह विधानमंडल में राजद की नेता राबड़ी देवी विपक्षी दलों पर जमकर बरसीं। विधान परिषद स्थित अपने कक्ष में विशेष बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि मो. शहाबुद्दीन एक राजनेता रहे हैं। वे पूर्व में सांसद भी रह चुके हैं। इसलिए उनसे मिलने कोई भी जा सकता है। यह कोई अपराध नहीं है। उन्होंने कहा कि तिहाड़ जेल में बंद बड़े-बड़े कुख्यातों से लोग मिलने जाते हैं। लेकिन तब तो कोई ऐतराज नहीं जताता।

उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार को लगता है कि शहाबुद्दीन से किसी व्यक्ति के मिलने से कानून भंग होता है तो वह इसे रोकने के लिए अलग से कानून बनाये जो सभी के लिए लागू हो। ऐसा केवल शहाबुद्दीन के लिए न हो। उन्होंने कहा कि भाजपा और राजग में एक से एक कुख्यात अपराधी भरे पड़े हैं। भाजपा को पहले अपने गिरेबां में झांकना चाहिए।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वे पिछले तीन महीने से चल रही महागठबंधन की सरकार की अबतक की उपलब्धियों से संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा कि तीन महीने में बिहार सरकार ने विकास के नये कीर्तिमान रचे। लेकिन विपक्ष के पास सिवाय बिहार को बदनाम करने के कोई एजेंडा नहीं है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद सदमे में हैं और इसी सदमे के कारण वे सही और गलत में भेद नहीं कर पा रहे हैं।

आगामी 12 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार आगमन को लेकर पूछे गये सवाल के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी केवल बात में विश्वास करते हैं जबकि राज्य सरकार काम करने में विश्वास करती है। उन्होंने कहा कि मोदी जी को इस बार बिहार वासियों से किया अपना वादा जरूर पूरा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब वे मुख्यमंत्री थीं तभी उन्होंने पटना के गांधी मैदान में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से आंचल फैलाकर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की थी। लेकिन साजिश के तहत बिहार की उपेक्षा की गयी। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात कही थी। अब उन्हें अपना वादा पूरा करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके आने और जाने का कोई मतलब नहीं होगा।

महिलाओं को लेकर मानसिकता बदले समाज : मीसा

आज महिलाओं ने व्यावसायिक जीवन में पुरुषों से कंधे से कन्धा मिलाकर अपनी योग्यता साबित की है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि किसी पुरुष विशेष के समकक्ष आने और पहचाने जाने के लिए एक महिला को उससे दुगना हासिल करके दिखाना पड़ता है, क्योंकि समाज में व्याप्त महिला-विरोधी मानसिकता लोगों को किसी महिला को पुरुषों के मुकाबले अधिक श्रेष्ठ मानने से रोकती है। ये बातें राजद नेत्री डा. मीसा भारती ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को लेकर अपने बयान में कही। Read More>>>

भागलपुर की नित्या बनीं बेस्ट ड्रामेबाज

पटना(अपना बिहार, 8 मार्च 2016) - भागलपुर की स्वस्ति नित्या ने रियलिटी शो इंडियाज बेस्ट ड्रामेबाज का खिताब जीत लिया है। बीते रविवार को हुए ग्रांड फिनाले में नित्या ने छह प्रतियोगियों को मात दी। इस शो को विवेक ओबरॉय, साजिद खान और सोनाली बेंद्रे जज कर रही थे। नित्या को को प्राइज के तौर पर पांच लाख रुपए और यामाहा अल्फा स्कूटर मिली। जीत के बाद नित्या ने अपनी जीत को भागलपुर के लोगों को समर्पित किया है। साथ ही उसने यह भी कहा कि मेरी जीत आप सभी के आशीर्वाद का नतीजा है।

हस्तक्षेप : भीख नहीं है सरकारी शिक्षा

डा मीसा भारती

कोई यह मुगालता ना पाले कि सब्सिडी की मदद से पढ़ाई करने वालों का सरकार की कार्यशैली और नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाने का हक नहीँ है। जो यह कुतर्क दे रहे हैं कि जिनकी पढ़ाई सब्सिडी के भरोसे ही पूरी हो पाती है, वो किसी राजनीतिक विचारधारा के पैरोकार कैसे हो सकते हैं, वो दो बातों का ध्यान रखें। पहली यह कि शिक्षा में सब्सिडी देने का उद्देश्य है निर्धन वर्ग के होनहार विद्यार्थियों को उत्कृष्ट शिक्षा के सुअवसर उपलब्ध करवाना Read More>>>

अपनी बात : मैं अनार्य शंकर हूं

दोस्तों, मैं हिन्दू ग्रंथों में वर्णित शंकर हूं। मेरे कई सारे नाम हैं। हर नाम के अपने मतलब और उसके अपने यथार्थ हैं। ग्रंथों में मुझे अजन्मा और अमर बताया गया है। लिहाजा मैं भी कन्फ़्यूज हूं कि मेरा अपना अस्तित्व क्या है। लेकिन एक बात है कि मैं आर्यों के जैसा नहीं हूं। होता तो जिन चित्रकारों और साहित्यकारों ने अन्य देवी-देवताओं के प्रतीक गढे, वे मुझे भी वैसे ही प्रतिबिंबित करते। मैं तो जंगलों और पहाड़ों में रहता हूं। अपनों के पास। यह अलग बात है कि सनातनी मेरे इस रुप की पूजा अर्चना तो करते हैं लेकिन मेरे सहचरों का शोषण भी करते हैं। Read More>>>

पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों की ममता और ममता की वामपंथीगिरी

दोस्तों, पश्चिम बंगाल में भी चुनावी जंग का एलान हो चुका है। सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस से लेकर भाजपा तक अपने-अपने दांव खेलने को तैयार है। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी तैयार हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि वहां मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी बनाम वामपंथी पार्टियां हैं। अन्य पार्टियां मसलन कांग्रेस और बीजेपी केवल हारे हुए मोहरों की पारी खेलने को मजबूर हैं। वैसे सबसे बड़ा सवाल समाजवादी विचारधारा वाले दलों के लिए है। सवाल इसलिए भी कि आज पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियां बिना किसी पश्चाताप के सामाजिक न्याय के नारे लगा रहे हैं। उनके लिए रोहित वेमूला भी महत्वपूर्ण है और मार्क्स व माओ से अधिक बाबा साहब आदरणीय हो गये हैं। Read More>>>

अपनी बात : अब सही रास्ते पर वामपंथ

दोस्तों, देशद्रोह के झूठे आरोप में 21 दिनों के बाद तिहाड़ जेल से रिहा हुए जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित छात्रसभा को संबोधित करने के दौरान कई किस्से सुनाये। एक किस्सा लाल और नीले रंग की कटोरियों का था। कन्हैया ने कहा कि उन्हें जेल में दो अलग-अलग रंग की कटोरियां दी गयी थीं। एक लाल और दूसरी नीली। मुझे लगा ये दोनों रंग भारत के वर्तमान को प्रतिबिंबित करती हैं। यदि ये दोनों मिल जायें तो देश में आमूलचुल परिवर्तन संभव है। Read More>>>

संपादकीय : कन्हैया को जमानत

दोस्तों, जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार दिल्ली हाईकोर्ट से मिली छह महीने की सशर्त जमानत के बाद जेल से बाहर आ गये हैं। खास बात यह है कि इस पूरे मामले में देश में शासन व्यवस्था की पोल खुल गयी है। पहले कन्हैया को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया जाना और फ़िर इस घटना का मीडिया ट्रायल। यह पहली बार हुआ कि मीडिया ने मोदी सरकार से आंखों में आंख डालकर सच दिखाने का काम किया। हालांकि "छी न्यूज" का मामला भी उजागर हुआ।

कार्यपालिका और मीडिया की कारीगरी सामने आने के बाद न्यायपालिका ने भी गजब के कारनामे किये। चूंकि इस देश में न्यायपालिका लोकतंत्र होने के बावजूद राजतंत्र की परंपराओं के माफ़िक सर्वशक्तिमान है, इसलिए न्यायपालिका इस पूरे मामले में नग्न होने के बावजूद चर्चा का विषय नहीं बन सकी।

फ़िर इसके बाद शुरु हुआ संसद का खेल। मनु स्मृति ईरानी यानी देश की शिक्षा मंत्री ने संसद में अपने नैसर्गिक गुण यानि सधे हुए अभिनेत्री के जैसे लोकसभा में तरह-तरह के पैंतरे दिखाये। जेएनयू को गद्दारों का अड्डा, आतंकियों का गढ और कुसंस्कार फ़ैलाने वाला संस्थान साबित करने का खूब प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने महिषासुर तक का अपमान किया। सबसे दिलचस्प यह रहा कि देश के संसद में अब महिषासुर वंशियों की अच्छी संख्या है। इसके बावजूद किसी ने मनु स्मृति ईरानी का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्होंने उनके अराध्य को जी भरकर गालियां दीं। विरोध हुआ भी तो तथाकथित दुर्गा के लिए।

बहरहाल कन्हैया की जमानत कुछ लोगों के लिए जीत सरीखा हो सकती है। लेकिन यह जीत अधुरी है। अधुरी इसलिए कि कन्हैया ने देश के साथ गद्दारी नहीं बल्कि देश की शासन व्यवस्था के फ़न पर तांडव करने का साहस दिखाया। वैसे अब भी बातें खत्म नहीं हुई हैं। अभी तो बात बहुत दूर तक जाएगी।

अडाणी समूह को कौड़ियों के भाव जमीन : मीसा

पटना (अपना बिहार, 4 मार्च 2016) - केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जहां एक ओर मोदी सरकार मध्यम और निम्न वर्ग पर टैक्स का बोझ लाद रही है। ये बातें राजद नेत्री डा. मीसा भारती ने गुरूवार को जारी अपने बयान में कही। उन्होंने कहा कि महँगाई आम जरूरतों के लिए भी लोगों को मोहताज बना रही है, वहीं अडानी ग्रुप को कौड़ियों के दाम जमीन बेच रही है। उन्होंने कहा कि गरीब लोगों को अपना आशियाना खड़ा करने के लिए अपने जीवन भर की पूंजी लगानी पड़ती है और अरबपतियों को गुजरात में मोदी जी से नजदीकी के कारण औने पौने दाम पर जमीन यूँ ही उपहार स्वरुप दे दी जाती है और किसी को भ्रष्टाचार भी नजर नहीं आता है।

अपनी बात : फिर हाशिए पर बिहार

दोस्तों, केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा सोमवार को प्रस्तुत केंद्रीय बजट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस बार उन्होंने पूरे बजट की परिभाषा को अपने अल्फाज दिये हैं। जहां एक ओर ग्रामीण विकास और अधिसंरचनाओं के विकास के लिए उन्होंने खजाना खोला है तो गरीब लोगों के प्रति उदारता बरती है। परंतु श्री जेटली का यह अभिनव प्रयास इस लिहाज से समालोच्य है कि उन्होंने करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपए की कर्ज माफी देश के बड़े उद्योगपतियों को दी है। वजह यह है कि अपने बजट में श्री जेटली ने जितनी धनराशि सामाजिक क्षेत्र के लिए व्यय करने का निर्णय लिया है, वह उद्योगपतियों को मिले विशेष पैकेज के मुकाबले कुछ भी नहीं है। Read More>>>

हवा-हवाई है बजट : लालू, साजिश के तहत बिहार की उपेक्षा

पटना(अपना बिहार, 1 मार्च 2016) - सोमवार को संसद में पेश केंद्रीय बजट को राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने हवा-हवाई बजट करार दिया है। पटना में पत्रकारों से बातचीत में उनहोंने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल 2019 तक का है। मोदी सरकार द्वारा जो 2022 तक का बजट दिया गया है वह कार्यकाल इस सरकार को किसने दिया है। उन्होंने कहा कि बजट में एक साल की चुनौतियों और योजनाओं का नहीं बल्कि 2022 तक का बजट दे दिया है।

श्री प्रसाद ने यह भी कहा कि मोदी सरकार किसानों से झूठा वादा कर रही है कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना कर देंगे। उन्होंने कहा कि आप 2022 तक सत्ता में नहीं रहेंगे, बेदखल कर दिये जायेंगे। श्री प्रसाद ने कहा कि केंद्र सरकार से लोगों को काफी उम्मीदें थी लेकिन इस बजट में बिहार के पैकेज का कोई जिक्र नहीं है। इस बजट में बिहार की जनता को छला गया है। उन्होंने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार सौ प्रतिशत फेल है केवल बीजेपी अपनी आरएसएस वाली विचारधारा में पास हुई है। आम बजट से पूरे देश में महंगाई बढ़ेगी। सेवा कर की वजह से सभी सेवाएं महंगी होगी। इससे मध्यवर्ग के लोग और परिवार परेशान होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जेटली ने 2022 की बात कर गैरकानूनी एलान किया है। जब सरकार 2019 तक ही है तो फिर 2022 का प्लान बनाने का अधिकार इन्हें किसने दिया।

श्री प्रसाद ने मेक इन इंडिया प्लान को कटघरे में खड़ा करते हुये कहा कि मेक इन इंडिया में कितने का निवेश हआ, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। किसानों की आमदनी क्या अनाज की कीमत बढ़ाकर करेगी। मनरेगा की राशि बढ़ाई गई है लेकिन इसमे केंद्र को मात्र 60 फीसदी ही देना है।

दलितों-पिछड़ों का अधिकार छीन रही भाजपा : लालू

जातिगत जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने की साजिश

प्रताड़ना के कारण रोहित वेमूला ने की थी खुदकुशी : नीतीश

संत शिरोमणि गुरू रविदास की 639वीं जयंती पर साथ नजर आये लालू-नीतीश

अगले वर्ष से संत रविदास की जयंती पर पूर्ण अवकाश

पटना(अपना बिहार, 29 फ़रवरी 2016) - मौका संत शिरोमणि गुरू रविदास की 639वीं जयंती का था। पटना के स्थानीय रवींद्र भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद प्रमुख लालू प्रसाद दोनों एक बार फिर एक साथ नजर आये। इस मौके पर दोनों नेताओं ने भाजपा पर जमकर हमला बोला।

अपने संबोधन में राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने कहा कि बाबा साहब भीम राव अंबेदकर ने संविधान में दलितों और वंचितों को अधिकार और आरक्षण दिया। उन अधिकारों को समाप्त करने की साजिश भाजपा और आरएसएस के लोग कर रहे हैं। वे लोग गुरू गोलवलकर के द्वारा लिखित बंच आॅफ थॉट पुस्तक को मानते हैं तथा गुरू गोलवलकर के सिद्धांत को मानते हैं। वे लोग आरक्षण को समाप्त करने की साजिश कर रहे हैं। इस साजिश को हमलोग कामयाब नहीं होने देंगे।

श्री प्रसाद ने कहा कि जातीय जनगणना की रिपोर्ट को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं करके दलितों और वंचितों को उसके अधिकार से महरूम रखा जा रहा है। जब देश की जनसंख्या बढ़ी तो दलितों और पिछड़ों की भी संख्या बढ़ी है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि केंद्र सरकार बताये कि हर तीसरा परिवार भूमिहीन है वह किस जाति से है, भीख मांगने वाला लोग कौन है, बिहार को बदनाम करने के लिए जंगलराज कहा जा रहा है, इसको बिहार की जनता देख रही है।

श्री प्रसाद ने जोर देकर कहा कि रविदास समाज के लोग एकजुट होकर वैसे लोगों के साजिश को नाकाम करना है जो आपके अधिकार को छिनने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं अपने संबोधन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि संत शिरोमणि गुरू रविदास जी ने अपनी जीवन काल में जो कार्य किये वे अतुलनीय है जिसे आज भी याद किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज पूरे देश में असहिष्णुता का माहौल पैदा किया जा रहा है। इन दिनों कुछ लोग बाबा साहब भीमराव अंबेदकर की जयन्ती तथा संत शिरोमणि गुरू रविदास जी की जयन्ती मना रहे हैं। वही लोग कहते हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संचालक अभी भी अपने बात पर कायम है कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। केंद्र सरकार के विश्वविद्यालय का दलित छात्र रोहित वेमुला को इतना प्रताड़ित किया गया कि वह आत्महत्या करने पर विवश हो गया।

श्री कुमार ने कहा कि बिहार के चुनाव प्रचार के दौरान जंगलराज की बात कही गयी लेकिन यहां कानून का राज है लेकिन दिल्ली के पटियाला कोर्ट में जेएनयू छात्र कन्हैया की पेशी के दौरान भाजपा समर्थित वकिलों ने कन्हैया की पिटाई की यह क्या है? वहां दिल्ली की पुलिस मुकदर्शक बनी रही। उन्होंने कहा कि भाजपा के लोग जनता का ध्यान काला धन और दूसरे मुद्दों से भटकाने के लिए घर वापसी, गौ मांस शुरू कर जनता को भटकाना चाहा लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी हार हुई। आज समझने की जरूरत है हजारों वर्षों से जो वंचित समाज है उसे मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण को जारी रखना होगा। इस मौके पर उन्होंने यह भी घोषणा की कि अगले साल से संत शिरोमणी रविदास जी की जयन्ती पर पूर्ण अवकाश रहेगा।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रविदास चेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह बिहार सरकार के कला संस्कृति मंत्री शिवचन्द्र राम ने कहा कि संत रविदास के विचारों पर चलकर ही समाज से छूआछूत और भेदभाव को मिटाया जा सकता है। बाबा साहब भीम राव अंबेदकर ने पिछड़े वर्ग के लोगों को अधिकार दिया तभी आज दलित, शोषित, पीड़ित समाज के लोग आगे आये हैं उसी को आगे बढ़ाते हुए लालू प्रसाद यादव एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दबे कुचले को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण देने का काम किया साथ ही महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उनको पंचायती राज में आरक्षण देकर समाज के पटल पर आगे बढ़ाने का काम किया। महिलायें सशक्त होकर मुखिया और सरपंच बन रही हैं। आज रविदास समाज को और अधिक एकजुट होने की जरूरत है तथा मनुवादी शक्तियों को मुंहतोड़ जवाब देने और उसके साजिश को बेनकाब करने की आवश्यकता है।

इस कार्यक्रम को अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण मंत्री संतोष निराला, महागठबंधन के उपनेता श्याम रजक, सचेतक एवं विधायक राजेन्द्र राम, विधायक सुबेदार दास, चंदन राम, राजद के प्रदेश प्रधान महासचिव मुन्द्रिका सिंह यादव ने संबोधित किया। धन्यवाद ज्ञापन बिहार सरकार के सहकारिता मंत्री श्री आलोक कुमार मेहता ने की।

मैडम मनु स्मृति अग्रवाल जी के नाम खुला पत्र

मैडम जी,

देश में लोकतंत्र है। एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें जनप्रतिनिधियों के लिए कोई शैक्षणिक अहर्ता निश्चित नहीं है। यह अनुचित भी नहीं है यदि कोई कम पढा जनप्रतिनिधि अपने लोकतांत्रिक अनुभवों से देश और समाज को सही दिशा दे। हमारे ही देश में भूतपूर्व राष्ट्रपति डा ज्ञानी जैल सिंह का उदाहरण हम सबके सामने है। लेकिन आप तो सबसे अलग हैं। अलग इसलिए कि आप एक अच्छी वक्ता हैं लेकिन अफ़सोस कि आप कुत्सित विचारों की स्वामिनी भी हैं।

लोकसभा में रोहित वेमुला और जेएनयू के मामले में सरकार की ओर से जवाब दिये जाने के क्रम में आपने अपनी कुत्सितता की सारी हदें पार कर दी। आपने रोहित वेमुला के संदर्भ में कहा कि - एक मरे हुए छात्र पर राजनीति की जा रही है। आपके राजनीतिक और सामाजिक चरित्र को देखते हुए आपके कहे पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। आपके लिए रोहित वेमुला बे्शक मर गया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि वह देश के करोड़ों दलितों और पिछड़ों के दिलों में जिंदा है। उसके सजीव होने का ही परिणाम है कि आपको लोकसभा में किसी अदाकारा के जैसे लंबी स्क्रिप्ट पढनी पड़ी।

आपकी कुत्सित वैचारिकी का एक प्रमाण यह भी कि आपने अपने डायलाग में महिषासुर का देश के सबसे बड़े संवैधानिक मंच पर अपमान किया। जबकि देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग महिषासुर को अपना अराध्य मानते हैं। यकीन नहीं आये तो कभी मैसूर जाकर देखिए। महिषासुर की गगनचुम्बी प्रतिमा लगी है। कभी घुमने के लिहाज से ही उज्जैन जाइये आपको वहां भी महिषासुर का प्रमाण मिलेगा।

इतने से भी आपकी कुत्सितता ठीक नहीं होती है तो झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के सखुआपानी गांव जाइये। आपको वहां असुर जाति के लोग जिंदा मिल जायेंगे, जिनके लिए महिषासुर उनके पूर्वज हैं। झारखंड यदि दूर लगे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस चले जाइये। वहां गंगा के तट पर ही भैंसासुर(महिषासुर) का भव्य मंदिर है और सबसे सुंदर घाट भी। इतने से भी आपका दिल नहीं माने तो महोबा चले जाइए। वहां तो महिषासुर के मंदिर को भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने ही प्राचीनतम मंदिरों की श्रेणी में रखा है।

बहरहाल जैसा कि मैंने पहले कहा कि आपकी लोकतांत्रिक समझ और योग्यता पर सवाल उठाना भारतीय लोकतंत्र का अपमान करना है, उम्मीद करता हूं कि आप किसी भी बात को कहने से पहले उसके बारे में जानने-समझने का प्रयास करेंगी। वजह यह कि जानने-समझने की कोई उम्र नहीं होती है। वैसे भी भारतीय संसद आपके "सास भी कभी बहू थी" का शूटिंग स्पाट नहीं है।

आपकी कुत्सित वैचारिकी पर अफ़सोस के साथ

नवल किशोर कुमार

बिहार बजट : नीतीश का इम्पैक्ट, लालू का जादू!

दोस्तों, शुक्रवार को महागठबंधन सरकार का पहला बजट अत्यंत ही खास रहा। खास इसलिए कि बजट में जहां एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का इम्पैक्ट साफ नजर आया तो दूसरी ओर बजट में लालू प्रसाद का समाजवाद भी साफ-साफ दिखा। प्रमाण यह है कि इस बार राज्य सरकार ने सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए अधिक से अधिक धनराशि खर्च करने का निर्णय लिया है। Read More>>>

संपादकीय : आंकड़ेबाजी से नहीं होता विकास

दोस्तों, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक खासियत यह है कि वे आंकड़ों के माहिर खिलाड़ी रहे हैं। उन दिनों जब वे पहली बार सीएम बने थे तब भी अपनी शुरुआत उन्होंने बिहार की अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र प्रकाशित कर यह साबित करने का प्रयास किया था कि उनके पूर्व की सरकार ने बिहार की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया था। बाद में हर वर्ष बजट प्रस्तुत करने से पहले आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के जरिए बिहार को आंकड़ों में सबसे आगे बढने की कहानी दुहराने की परंपरा बना दी गयी। इस खास काम के लिए उन्होंने एक खास बौद्धिक संस्थान को हायर किया। दिलचस्प यह है कि अब जबकि सूबे में महागठबंधन की सरकार है तब भी खास संस्थान का कब्जा बरकरार है। Read More>>>

अपनी बात : सवर्णों की बपौती नहीं है मीडिया

दोस्तों, विश्व स्तर पर यह बात स्थापित हो चुकी है कि 21वीं सदी ज्ञान-विज्ञान की सदी है। खासकर इन्टरनेट ने ज्ञान-विज्ञान के प्रसार को अपेक्षा से अधिक गति दी है। भारत में भी इसका असर देखा जा सकता है। विशेषकर सोशल वेबसाइटों ने पूरे भारतीय जीवन शैली को बदल दिया है। हालत यह हो गयी है कि सोशल मीडिया ने हर आम से लेकर खास को अपनी बात कहने और सुनने का सबसे अधिक लोकतांत्रिक मंच प्रदान कर दिया है। लिहाजा पारंपरिक मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं। Read More>>>

भारत में जाति व्यवस्था पर आरएसएस का रूख

- नेहा दाभाड़े

रोहित वैमूला की आत्महत्या ने देश को स्तब्ध कर दिया है और जातिगत भेदभाव व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर देशभर में बहस चल रही है। रोहित, प्रतिष्ठित हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पीएचडी अध्येता थे। वे दलित थे और विश्वविद्यालय में सक्रिय अम्बेडकर स्टूडेंटस एसोसिएशन (एएसए) से जुड़े हुए थे। विज्ञान उन्हें बहुत आकर्षित करता था और वे अम्बेडकर के लेखन और उनकी सोच के लेंस के सहारे सत्य की खोज में रत थे। वे जाति की समस्या से बहुत व्यथित थे और उसके हल के लिए कुछ करना चाहते थे। एएसए ने याकूब मैमन को फांसी दिए जाने के खिलाफ एक बैठक का आयोजन किया क्योंकि वह सिद्धांततः मृत्युदंड के खिलाफ था। इस बैठक में आरएसएस की छात्र शाखा एबीवीपी के सदस्यों ने हंगामा किया। इसके पहले, रोहित ने दिल्ली विश्वविद्यालय में मुजफ्फरनगर बाकी है फिल्म के प्रदर्शन को जबरदस्ती रोके जाने का विरोध किया था। Read More>>>

रविबाबू का गोरा

लाठी - पैना से राष्ट्र नहीं गढ़े जाते . भय और कानून से भी नहीं . इसे वाल्मीकि ,व्यास , कबीर , नानक , रैदास जैसे लोगों ने गढ़ा है .इसे आत्मसात करना होता है . इसकी घुट्टी नहीं पिलाई जा सकती

- प्रेम कुमार मणि

क्या आपने रविन्द्रनाथ टैगोर का उपन्यास- गोरा - पढ़ा है ? यदि नहीं तो जरूर पढ़िए . पूरे देश में राष्ट्रवाद को लेकर आज जो हलचल है , उसका जवाब आप वहां से ढूंढ़ लेंगे . यह १९०९ में लिखा गया . ठीक इसी वर्ष गांधी ने" हिन्दस्वराज " लिखा . हिन्द स्वराज को चालाक प्रतिगामी ताक़तें बखूब इस्तेमाल करती हैं ,लेकिन गोरा से उन्हें भय लग सकता है .

उपन्यास का नायक गौरमोहन उर्फ़ गोरा है ,जिसे अपने ब्राह्मणत्व ,हिंदुत्व पर गर्व है . अंग्रेजों से वह नफरत करता है . अपनी माँ से वह नाराज है की वह एक अछूत महिला को सेविका क्यों रखती है . वह भारत -व्याकुल है , म्लेच्छों को भगाने के लिए कटिबद्ध . कुछ तिलक की सी मूर्ति हमारे मन में बनती है . कोई साढ़े चार सौ पृष्ठ के उपन्यास में अनेक आरोह - अवरोह हैं .

आखिर में मृत्यु सय्या पर पड़े गोरा के पिता उसे बुलाते है और कहते है गोरा तुम मेरा श्राद्ध मत करना ,क्योंकि तुम मेरे पुत्र नहीं हो . माँ -पिता के अनुसार वह एक आयरिश दम्पति की संतान है ,जिसे १८५७ के विद्रोह के समय मारे जाने के पूर्व वे हमारे पास छोड़ गए थे . सुनते ही गोरा सन्न रह जाता है . अब तक वह अंग्रेजो से कुछ भी हेलमेल की बात से घृणा करता था . जब उसे पता चलता है कि वह तो स्वयं सौ फीसदी म्लेच्छ है ,तब अवाक् रह जाता है ." ...उसकी न माँ है , न बाप , न देश है , न जाति , न नाम , न गोत्र . न देवता -- वह मानो एक सम्पूर्ण नकार है ..."

गोरा को आगे सुनिए "-इतने दिन से भारतवर्ष को पाने के लिए अपने प्राण लगाकर साधना करता रहा .लेकिन बाधा होती थी , मैं उस बाधा के साथ अपनी श्रद्धा का समझौता कराने केलिए दिन रात कोशिश करता रहा .. मैं एक निष्कंटक निर्विकार भारतवर्ष गढ़कर उसके अभेद्य दुर्ग के भीतर अपनी भक्ति को सुरक्षित कर लेने के लिए अब तक क्या -क्या लड़ाइयां नहीं लड़ीं ! लेकिन आज मेरी कल्पना का वह दुर्ग पल भर में स्वप्न कि तरह उड़ गया .."

यही तो स्वप्न है भारत -व्याकुलों का . चाहूंगा , वे गोरा जरूर पढ़ें . उनका असली भारतमाता से साक्षात्कार होगा . वास्तविक राष्ट्र से भी . लाठी - पैना से राष्ट्र नहीं गढ़े जाते . भय और कानून से भी नहीं . इसे वाल्मीकि ,व्यास , कबीर , नानक , रैदास जैसे लोगों ने गढ़ा है .इसे आत्मसात करना होता है . इसकी घुट्टी नहीं पिलाई जा सकती - पूर्व विधान पार्षद व वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम कुमार मणि के फ़ेसबुक से साभार

खास रिपोर्ट : बजट में होगी सरकार की अग्निपरीक्षा

दोस्तों, आगामी 25 फरवरी से बिहार विधानमंडल का बजट सत्र शुरू होने वाला है। लिहाजा वित्त महकमे में तैयारियों जोरों पर हैं। खासकर नये वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी ने इस मामले में खास तैयारियां की हैं। इसकी एक वजह यह भी संभव है कि उन्हें करीब एक दशक के बाद सूबे का बजट सदन में रखने का अवसर मिलेगा। वे 26 फ़रवरी को बजट प्रस्तुत करेंगे। हालांकि अभी तक जो बातें बजट पूर्व समीक्षा के दौरान सामने आयी हैं, वे साबित करती हैं कि इस बार का बजट राज्य सरकार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कमतर बिल्कुल भी नहीं होगा। Read More>>>

घर के बावजूद खुली सड़क पर सोने को मजबूर हैं घर वाले, लालू प्रसाद ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बनवाया था गरीबों का आशियाना

पटना(अपना बिहार, 24 फ़रवरी 2016) - राजधानी पटना के पॉश इलाके आशियाना नगर में एक घर ऐसा भी है जिसमें करीब ढाई सौ लोग रहते हैं। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि घर रहने के बावजूद वे घर में रहना नहीं चाहते हैं। खासकर रात में वे अपने घर को भगवान भरोसे छोड़ खुले में सोने को मजबूर हैँ। बताते चलें कि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में लालू प्रसाद ने आशियाना नगर मोड पर एक तिमंजिला मकान बनवाया था ताकि वहां रहने वाले गरीब छत के नीचे रह सकें। अब इस आवास की स्थिति इतनी जर्जर हो गई है कि उसमें रहने वाले लोग हमेषा भयभीत रहते हैं कि कहीं कोई अप्रत्याषित घटना न घट जाए।

यहां रहने वाले सदानंद मांझी ने बताया कि इस मकान में दो कमरा उनके पिता को आवंटित किया गया था। पिता की मृत्यु के बाद हम तीन भाईयों में दो यहां रह गये और एक भाई कौशल नगर स्लम बस्ती में रहता है। उन्होंने बताया कि यह मकान इतना जर्जर हो गया है कि दिन में तो किसी तरह हम यहां रह लेते हैं लेकिन रात में यहां रहना बहुत मुश्किल है। खासकर पिछले वर्ष आये सिलसिलेवार भूकंप के बाद मकान कई जगहों पर क्षतिग्रस्त हो गया है। लेकिन इसे कोई देखने वाला नहीं है।

उन्होंने बताया कि रात में अधिकांश लोग घर को छोड़ पुल के नीचे सोने को मजबूर हैं। पूर्व में कई लोगों के साथ हादसा भी हो चुका है और अभी भी सबसे उपरी तल्ले पर हवा में झूल रहा टूटा छज्जा किसी हादसे को दावत दे रहा है।

वहीं सरबतिया देवी ने कहा कि सरकार इस मकान को तोड़कर नया मकान बनवा दे। यदि यह संभव नहीं है तो हम गरीबों को कोई और आशियाना दे दे। इस मकान में अब एक दिन भी रहना संभव नहीं है। शौचालय और पेयजल की सुविधा के नाम एक चापाकल और नगर निगम का टैप लगा है। लेकिन यह सुविधा यहां रहने वाले लोगों की संख्या को देखते हुए नाकाफी है। सरबतिया देवी कहती हैं कि पानी और शौचालय जाने को लेकर आये दिन मारपीट होते रहती है।

देशद्रोह का आरोप खोखला अपशब्द : मीसा

किसी भी परिपक्व और मजबूत लोकतन्त्र में देशद्रोह का आरोप एक खोखले अपशब्द से अधिक कुछ नहीं है। ये बातें राजद की युवा नेत्री डा. मीसा भारती ने फेसबुक पर जारी अपने बयान में कही। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक देश की विभिन्न संस्थाएँ, उनके निर्णय और नीतियाँ आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती हैं और ना ही हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि देश के विद्यार्थी, बिना कोई गलती किए, कूटनीतिज्ञों और राजनयिकों की भाँति नपे तुले शब्दों में वही बोलें जो लोगोँ को कर्णप्रिय हों, और जो बोलने को उन्हें कहा जाए, ना कि उन विचारों को बेबाकी से रखें जो उन्हें अंदर से कचोट रही हो।

दिल की बात में बोले तेजस्वी - हम बिहारियों से पंगा न ले नरेंद्र मोदी सरकार

पटना(अपना बिहार, 20 फ़रवरी 2016) - जेएनयू मामले में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भाजपा नेताओं पर हमला बोला है। दिल की बात श्रृंखला के तहत उन्होंने अपने बयान में कहा कि विगत एक साल में आर्थिक और सामाजिक विफलताओं से सन्न आरएसएस और बीजेपी अपने आप को हर मोर्चे पर घिरा देखकर बुरी तरह घबरा चुकी है। इनके हाथ पाँव पूरी तरह फूल चुके हंै। इनका राजनीतिक चिंतन और समझ संतुलन खो चुका है। केंद्र सरकार अतिमहत्वपूर्ण आर्थिक,सामाजिक एवं राजनैतिक मामलों में पूर्णरूप से असफल होने के बाद आम अवाम का ध्यान भटकाने के नए नए तरीके इजाद कर रही है। अपने ही मान्यता प्राप्त और आनुषांगिक संगठनों से 'विभाजनकारी मुद्दे' प्लांट करवा कर उन्हें राष्ट्र बहस का मुद्दा बना देती है ताकि उनकी वादाखिलाफी से लोगों का ध्यान बँट सके।

श्री यादव ने कहा कि केंद्र सरकार जेनयू में जो करवा रही है उसकी आग में ये खुद झुलस जायेगी। बिहार में हारने के बाद भाजपाई बिहार एवं सभी प्रगतिशील बिहारियों के पीछे पड़ गए है। बिहार के कन्हैया कुमार का क्या दोष था ये लोग कभी साबित नहीं कर पाएंगे, पुरे बिहार के छात्र एवं युवा कन्हैया के साथ खड़े है। बिहार की हार को अभी 4 महीने भी नहीं हुए है कि फिर ये बिहारियों से पंगा ले रहे है। केंद्र की फासीवादी सरकार छात्रों और युवाओं का दमन करना चाहती है. केंद्र की सत्ता के नशे में चूर पार्टी को बताना चाहता हूँ कि युवाओं के डेमोक्रेटिक राइट्स एवं स्पेस में दखलदांजी बंद करो अन्यथा जिस दिन इस देश के सारे छात्र एवं युवा एक हो गए आपको कोई ठौर नहीं मिलेगी।

श्री यादव ने कहा कि हम सभी देशभक्त है, बाबा साहेब के संविधान एवं लोकतांत्रिक मूल्यों में पूर्ण विश्वास रखते है पर आपके "स्कूल आफ थॉट" व गुरु गोलवलकर की पाठशाला से हमें देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए जहाँ देशभक्त दलितों/पिछड़ों को हीन भावना से देखने के साथ-साथ उनको उत्पीड़ित करने की शिक्षा दी जाती हो। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि इस देश के 80 फीसदी युवा आपके विचार के पास से गुजरना भी नहीं चाहते। आप किस राष्ट्रवाद का दंभ भरते हैं? राजधानी दिल्ली के पटियाला कोर्ट में दिन दहाड़े जो हुआ व कोर्ट के आदेशों की जो अनदेखी हुई क्या ये राष्ट्रवाद है? देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं के साथ घिनौना खिलवाड़ करना, उनके हकों की हकमारी एवं बेशर्मी की सभी सीमाओं को लाँघना ही क्या आपका राष्ट्रवाद है?

श्री यादव ने भाजपा नेताओं से छह सवाल पूछा। उन्होंने कहा कि आपकी सरकार ने पूंजीपतियों के एक लाख चौदह हजार करोड़ के कर्जे माफ किये है, इस श्रेणी में वो कौन महान राष्ट्रवादी लोग कौन है क्या ये बताने का कष्ट करेंगे? दूसरे सवाल में उन्होंने पूछा कि क्या आपकी सरकार में इतना कलेजा है कि वो उन गरीब राष्ट्रप्रेमी किसानों के इतने कर्जे माफ कर दे जो आये दिन हजारों की संख्या में आत्महत्या करते है? किसानों की लगातार बढती आत्महत्या क्या आपके आधारहीन और खोखले राष्ट्रवाद का हिस्सा नहीं है?

श्री यादव ने पूछा कि जब गरीब, मजदुर,किसान, दलित एवं पिछड़े को मारा जाता है और आपके केंद्रीय मंत्रियों द्वारा पढाई छोड़ने को मजबूर किया जाता है तब आपका राष्ट्रवाद कहाँ गायब हो जाता है? रोहित वेमुला के द्वारा चिन्हित प्रश्नों पर आपकी लगातार चुप्पी आपराधिक प्रतीत होता है।

उपमुख्यमंत्री ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि जब आप ही की पार्टी के लोग एक आतंकी को साथ बैठाकर काबुल छोड़ने जाते है तब आपका राष्ट्रवाद कहाँ चला जाता है? इसके अलावा जब आपही की सहयोगी पार्टी पीडीपी के लोग कानून द्वारा दोषी करार दिए गए अफजल गुरु को शहीद बताते है तब आपके छद्म राष्ट्रवाद को देशद्रोह की बू नहीं आती ? उन्होंने कहा कि आरएसएस के दफ्तरों पर जब हमारे प्यारे विजयी तिरंगे की जगह कोई दूसरा झंडा फहरता है तब आपका राष्ट्रप्रेम कहाँ ठिकाने तलाश रहा होता है ? उन्होंने कहा कि एक विशेष विचार के लोगों ने देश की एकता एवं संप्रभुता के सामने विचित्र संकट खड़ा कर दिया है। हम सबों का नैतिक एवं राष्ट्रीय दायित्व बनता है कि मिलजुल कर शांति से इस मसले का समाधान करने में अपना योगदान दे।

संपादकीय : हिन्दी प्रिंट मीडिया की बौद्धिक बेईमानी

दोस्तों, मीडिया समाज का हिस्सा है। लेकिन भारत के संदर्भ में मीडिया की परिभाषा बिल्कुल अलग है। यह समाज का हिस्सा होने के बावजूद बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। खासकर हिन्दी प्रिंट मीडिया। हर मुद्दे के लिए इसके पास अपना दृष्टिकोण है जो मुख्य रुप से मनुवादी व्यवस्था पर आधारित है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ऐसा हिन्दी प्रिंट मीडिया की सामाजिक बुनावट के कारण ही है।

दो मुद्दे आपके समक्ष हैं। पहला हैदराबाद विश्वविद्यालय में भगवा आतंकवादियों की प्रताड़ना से त्रस्त रोहित वेमूला की खुदकुशी और दूसरा राजद्रोह के नाम पर जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष की गिरफ़्तारी। इन दोनों घटनाओं की कवरेज को ध्यान से देखें तो असल मामला समझ में आएगा। रोहित वेमूला की खुदकुशी चर्चा में इसलिए रही क्योंकि देश भर के दलितों और पिछड़े वर्ग के छात्रों, नेताओं और समाजसेवियों ने इस घटना को लेकर अपनी आवाज बुलंद की। इसके बावजूद देश की जनता इस जानकारी से वंचित है कि आखिर किन परिस्थितियों में रोहित वेमूला ने खुदकुशी की। क्या इस मामले में किसी की गिरफ़्तारी हुई, यह खबर भी ब्राह्म्णवादी हिन्दी मीडिया के लिए कोई मायने नहीं रखता है।

वहीं दूसरी ओर कन्हैया कुमार की गिरफ़्तारी है। देश के तमाम बौद्धिक घरानों से लेकर नेताओं तक ने राष्ट्रवाद के सवाल पर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जरा सोचिए कि यदि कन्हैया कुमार बिहार के बेगूसराय के बीहट के भूमिहार होने के बजाय कोई दलित या पिछड़े वर्ग के होते तो क्या तब भी वे सवाल जो उनकी गिरफ़्तारी के बाद उठाये जा रहे हैं, उठाये जाते?

बहरहाल तारीफ़ करनी होगी अंग्रेजी मीडिया की जिसने इन दोनों घटनाओं की अबतक सराहनीय कवरेज किया है। प्रमाण गुरुवार को पटना से प्रकाशित टेलीग्राफ़ ने जेएनयू के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा की गयी रिपोर्टिंग को अपना खबर बनाया है। इस अखबार की इस कोशिश से स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की धर्मनिरपेक्षता की असलियत क्या है। ऐसे शानदार प्रयास के लिए अंग्रेजी अखबार के मित्रों को बधाई।

दो हिन्दुस्तानियों में विभेद करना ही देशद्रोह : अहमद

पटना(अपना बिहार, 19 फ़रवरी 2016) - हिन्दुस्तान हम सबका है। यह किसी एक पंथ, धर्म, समुदाय या वर्ग का नहीं है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित हम भारत के लोग में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। जो कोई इसके खिलाफ काम करे, वह देशद्रोही है। ये बातें जाने-माने गांधी वादी डा. रजी अहमद ने विशेष बातचीत में कही।

उन्होंने कहा कि विश्व के स्तर पर राष्ट्र शब्द अस्तित्व में तब आया जब पहला विश्वयुद्ध हुआ। वर्ष 1904 में एक छोटे से मुल्क जापान ने तब महाशक्ति कहे जाने वाले रूस को हरा दिया था। यह वह दौर था जब पूरे विश्व में उपनिवेशवाद चरम पर था। उन दिनों ही भारत में भी राष्ट्र की परिकल्पना का उभार हुआ, जिसका नेतृत्व बंकिमदास चटर्जी आदि ने किया।

डा. अहमद ने कहा कि वर्तमान जिस तरीके से राष्ट्रवाद बनान छद्म राष्ट्रवाद की राजनीति की जा रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे देश में अराजकता बढ़ेगी जिससे विकास बाधित होगा। उन्होंने कहा कि गांधी हमेशा भारतीय अस्मिता की बात करते थे। उनके लिए राष्ट्रवाद का मतलब केवल एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं था। वे हमेशा संपूर्ण मानवता को इसका पर्याय मानते थे। डा. अहमद ने कहा कि जेएनयू एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना असल में स्कूल आॅफ इन्टरनेशनल स्टडीज के विस्तार के उद्देश्य से किया गया था। प्रारंभ से ही विश्वस्तरीय वैचारिक स्वतंत्रता इस विश्वविद्यालय की खासियत रही है। यदि इसे बाधित किया गया तब इसका असर बहुत घातक होगा।

संपादकीय : देशभक्ति का लबादा

दोस्तों, देशभक्ति एक बार फ़िर कसौटी पर है। जेएनयू में मचे बवाल में अब यह स्पष्ट हो गया है कि देश में एक ऐसी सरकार काम कर रही है, जिसके अनुसार वे सभी जो उसका समर्थन करते हैं, देशभक्त हैं और विरोध करने वाले देशद्रोही। लेकिन मामला केवल देशद्रोही या फ़िर देशभक्त होने तक सीमित नहीं है। असल मामला कुछ और ही है। दरअसल पिछले दो वर्षों के अपने कार्यकाल के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार जनता की उन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सकी है, जिसके लिए भारत की जनता ने उसे प्रचंड बहुमत दिया था। Read More>>>

शैक्षणिक संस्थायें न बनें राजनीति के शिकार

जेएनयू की सबसे बड़ी खासियत यहां का उनमुक्त शैक्षणिक वातावरण है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसे बंद करने की साजिश की जा रही है।

- डा. मीसा भारती

वर्तमान में जेएनयू में जो कुछ चल रहा है, वह उस कड़ी का अगला हिस्सा है जो हैदराबाद विश्वविद्यालय में पहले ही आजमाया जा चुका है। रोहित वेमुला को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। अब यह देश के अनेक शैक्षणिक संस्थाओं में फैलता जा रहा है। यहां तक कि प्रसिद्ध बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भी आग की लपटें तेज हो चुकी हैं। लिहाजा वर्तमान की चुनौतियां बहुत महत्वपूर्ण हो गयी हैं। यह इसलिए भी कि पूरे देश को असली मुद्दों के बजाय देश प्रेम जैसे भावनात्मक मुद्दे के सहारे ठगने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा सबसे अधिक चिंतनीय घटना सोमवार को पटियाला कोर्ट में घटित हुई जब महिला पत्रकारों तक को खदेड़-खदेड़कर पीटा गया।

जेएनयू विश्व स्तर पर एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय है जिसने देश को अनेक स्कॉलर और विशेषज्ञ दिये हैं। लेकिन यह भी सही है कि छात्र राजनीति के लिहाज से यह विश्वविद्यालय अत्यंत ही महत्वपूर्ण रहा है। यहां की छात्र राजनीति पूरे देश की युवा राजनीति को प्रतिबिंबित करती रही है। लिहाजा जेएनयू में राजनीति कोई नई बात नहीं है। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह की राजनीति जेएनयू कैंपस में की जा रही है, दरअसल वही चिंतनीय है। पहले यहां की राजनीति का मकसद देश में विचारधाराओं का निर्माण होता था जिसका लाभ देश को मिलता था। परंतु वर्तमान की स्थिति अब पूर्ववत नहीं है।

जेएनयू की खासियत यही है कि यहां सभी तरह की विचारधारों को सम्मान हासिल होता है। हालांकि अबतक के इतिहास के हिसाब से यहां वामपंथ का वर्चस्व रहा है। वहीं एसएफआई और एबीवीपी सहित अन्य संगठनों का अस्तित्व भी कायम रहा है। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरीके से यहां की आबोहवा को प्रदूषित किये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं, वह न केवल यहां की शैक्षणिक वातावरण को बल्कि पूरे देश की छात्र राजनीति को प्रभावित करने वाला है।

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी निंदनीय है। होना यह चाहिए था कि सरकार पूरे मामले की जांच करती और उन सभी के खिलाफ कार्रवाई करती जिन्होंने राष्ट्र का अपमान किया। लेकिन अभी तक मीडिया के जरिए जो बातें सामने आयी हैं उनके हि&#