अपना बिहार

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Wednesday, 27 जुलाई 2016

उपलब्धि: बिहार की दत्तक पुत्री प्राख्यात भोजपुरी गायिका कल्पना पटोवारी ने मुंबई में इन्डियन फ्राग श्रृंखला के तहत भोजपुरी बिरहा और भिखारी ठाकुर के गीतों को गाकर लोगों का मन मोहा

कैसा है ये प्यार का फर्स्ट लुक जारी

पटना (अपना बिहार, 25 जून 2016) - हिंदी फ़िल्म कैसा है ये प्यार का फर्स्ट लुक नटराज स्टूडियो गगन अपार्टमेंटए एग्जवीशन रोड पटना में जारी हुआ। इस फ़िल्म के निर्माता पीयूष राय और प्रदीप यादव हैं। फ़िल्म का निर्देशन बिरजू पाल ने किया है। नीरा फिल्म्स एंटरटेनमेंट और पी पी प्रोडक्शन के बैनर तले बनी इस फ़िल्म मुख्य भूमिका में जीत सोनी, अभय पटेल और देवोलीना होंगी।

इस दौरान फ़िल्म के निर्देशक बिरजू पाल ने दावा किया कि फ़िल्म की कहानी दर्शकों को बहुत पसंद आएगी। साथ ही बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कमाई भी करेगी। फ़िल्म में सभी कलाकारों की भूमिका सराहनीय है। फ़िल्म के गाने भी लोगों को बहुत पसंद आएंगे। वहीं फिल्म के प्रोड्यूसर ने कहा कि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने के लिए तैयार है।

भोजपुरी फ़िल्म दीवाने की टीम का पटना में इंट्रोडक्शन

पटना (अपना बिहार, 25 जून 2016) - गैलेक्सी एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के बैनर तले बन रही भोजपुरी फ़िल्म दीवाने का इंट्रोडक्शन नटराज स्टूडियोए गगन एग्जवीशन रोड पटना में हुआ। फ़िल्म का निर्देशन फ़िरोज़ खान ने किया है और निर्माता इम्तियाज खान हैं। फ़िल्म में शगुन दुबे मुख्य भूमिका हैं। इस मौके पर दीवाने के फ़िल्मकार ने इस फ़िल्म के बॉक्स ऑफिस पर सफल होने की बात कही। उन्होंने कहा कि दीवाने दर्शकों को खूब पसंद आएगी। यह फ़िल्म लोगों को निराश नहीं करेगा। गाने और डायलॉग्स भी मनोरंजन से भरपूर होंगे।

अपनी बात : "नदियों की आग" में झुलसते हुए

दोस्तों, बिहार विधान परिषद को उच्च सदन का दर्जा हासिल है और यह बेवजह नहीं है। विधान मंडल के इस सदन ने अतीत में जन समस्याओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण तरीके से हस्तक्षेप किया है। इसके अनगिनत सजीव उदाहरण हैं। एक उदाहरण परिषद द्वारा प्रकाशित पत्रिका "साक्ष्य" है। नाम के अनुसार ही इसका अस्तित्व भी होता है,
लिहाजा व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह पत्रिका सबसे अधिक प्रभावकारी प्रतीत होती है। दुख इस बात का होता है कि इसे जनसामान्य को उपलब्ध नहीं कराया जाता है। बेहतर तो यह हो कि बिहार विधान परिषद "साक्ष्य" को किसी निजी प्रकाशक को प्रकाशित करने की जिम्मेवारी दे दे, ताकि आम जनता भी विधान मंडल के उच्च सदन के "साक्ष्य" को जान समझ सके।

 

खैर कल का दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। महत्वपूर्ण इसलिए परिषद द्वारा वर्ष 2004 में प्रकाशित साक्ष्य का वह अंक मिला जिसका शीर्षक "नदियों की आग" है। पूर्व सभापति जाबिर हुसेन द्वारा संपादित इस अंक के कुल 1177 पृष्ठों में नदियों की दुर्दशा और नदियों के सहारे जीने वाले लोगों की वेदना का सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक चित्रण जिस संवेदनशीलता के साथ की गयी है, वह अतुलनीय है। पत्रिका के प्रारंभ में श्री हुसेन की यह पंक्तियां देखें -

 

किशन पटनायक के नाम

 

जो बिना लुकाठी

बाजार में खड़े रहे

और अपनी दुनिया

जराते रहे

 

रेत में अपना कई-कई जनमों का रिश्ता है

अपने पुरखे फ़ल्गू नदी की रेत पर जनमे थे

अपना जनम भी

फ़ल्गू नदी के रेतीले आंगन में हुआ था

उस फ़ल्गू नदी के आंगन में, जिसे शब्दकोश

सारहीन बताते रहे मगर जो एक

अन्तः सलिला, फ़ल देने वाली महान नदी है

 

मुझे यह नदी और इसकी सफ़ेद चादर पर

फ़ैली रेत ऐसा सुख देती है, जिसे

शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकते

 

मेरे लिए साक्ष्य का यह अंक

महज पत्रिका नहीं

फ़ल्गू की रेतीली धरती को

छू लेने की एक कोशिश है

- जाबिर हुसेन

 

यकीन नहीं आता है। खासकर आज के दौर में जबकि लोकतांत्रिक राजनीति पर तमाम तरह के आरोप, लांछन लगते हों(कई अवसरों पर ये आरोप/लांछन व्यर्थ साबित नहीं भी होते हैं), कोई राजनेता इतना संवेदनशील भी हो सकता है कि वह अपनी जननी जैसी नदी के गर्भ के अंदर की आग को इतनी ईमानदारी से बयां करे। क्या इतना नैतिक बल किसी और में है? मैं यह सवाल "नदियों की आग" पढते हुए और खुद झुलसते हुए कर रहा हूं।

 

पत्रिका के दूसरे ही पन्ने पर किशन पटनायक नजर आते हैं। नर्मदा की पीड़ा और मणिबेल के आदिवासियों के दम तोड़ते संघर्ष की गाथा कहते हुए। मेघा पाटकर के साथ मणिबेल के आदिवासी बनाम सरकार व "आर्य वाहिनी" के बीच असमान लड़ाई के साक्षी के रुप में पटनायक कहते हैं -

 

" यह एक असमान युद्ध ऐ। एक तरफ़ तो मणिबेल के भोले-भाले आदिवासियों के पचास परिवार हैं। दूसरी तरफ़ बड़े बांध के खेमे में विश्व बैंक और उसकी विकास नीति है, भारत का राज्यतंत्र है और विश्व बैंक द्वारा निर्देशित विकास पद्धति को अंधवि्श्वास के तौर पर मानने वाले तमाम बुद्धिजीवियों के समुह हैं, जिनका सम्मिलित उपहास "आधुनिक विकास विरोधी" लोगों की हिम्मत पस्त कर देता है।"

 

हिन्दी साहित्य में रिपोर्ताज लिखने की अपनी-अपनी शैली रही है। जिस तरीके से जाबिर हुसेन ने "मरगंगा में दूब" में गंगा और जयमंगली देवी की सजीव-निर्जीव पीड़ा को बयां किया है, मेरे जेहन में फ़णीश्वरनाथ रेणु और जाबिर हुसेन दोनों की तस्वीर एक साथ उभर रही है। वे लोग जो आज कल "भारत माता की जय" के नाम पर किसी के देशभक्त या देशद्रोही होने का प्रमाणपत्र बांटते फ़िर रहे हैं, उन्हें मरगंगा में दूबों के आग में झुलसने का कारण जरुर जानना चाहिए। एक जगह जाबिर साहब जामुन महतो और रामू ढाढी दोनों का दर्द बयां करते हैं -

"जयमंगली माता ने हमें माफ़ कर दिया है, रामू, देख पेड़ की डालियां दोबारा अपने तने तक फ़ैल गयी हैं, और देख पतियों में भी हरकत आ गयी है। और हां, देख आसमान में जिधर-तिधर बादल भी दिख रहे हैं। इस बार टाल छोड़कर कोई बाहर नहीं जाएगा, रामू। माता मान गई है। हम सब यही रहेंगे। माता की कृपा से बादल बरसेंगे, धरती को जरुरत भर पानी मिल जाएगा। हम अपने बीज उसकी गोद में डाल देंगे, रामू। देख, कह दे, सारे गांव वालों को कह दे, कोई बाहरी मंडियों में नहीं जाएगा। बादल बरसेंगे, रामू। देख, माता की पीड़ी पर भी पानी की फ़ुहारें गिर रही हैं।"

टालवासियों ने हैरत भरी आंखों से जामुन महतो की तरफ़ देखा। बोलते-बोलते, जामुन महतो अचानक रुक गये हैं। पीपल के तने को देर से पकड़े-पकड़े उनके हाथ ढीले पड़ गये हैं।

मीलों दूर, मरगंगा की मृत धारा की उपरी सतहों पर हरी दूब उग आयी है!

 

बहरहाल "नदियों की आग" में मेरा झुलसना अभी और शेष है। लेकिन नव उदारवादी युग में भी मुझे उम्मीद है कि नदियों को लेकर नेताओं और सरकार में बैठे लोगों में जो समझ बनाने की कोशिश जाबिर साहब ने की थी, वह रंग जरुर लाएगी। आज न सही, कल ही सही।

आरएसएस की वैचारिक दरिद्रता : राम पुनियानी

इन दिनों, यदि आपको यह साबित करना हो कि आप राष्ट्रवादी हैं तो आपको भारत माता की जय कहना होगा। इससे पहले, वर्तमान सरकार से असहमत सभी लोगों को राष्ट्रद्रोही बताने का दौर चल रहा था। ये दोनों मुद्दे हाल में उछाले गए हैं और जो लोग इन्हें उछाल रहे हैं, उनका उद्देश्य, राज्य द्वारा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर किए जा रहे हमले पर पर्दा डालना है। सरकार न केवल प्रजातांत्रिक मूल्यों को रौंद रही है वरन चुनावी वादों को पूरा करने में अपनी असफलता से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश भी कर रही है। Read More>>>

देवी दुर्गा, महिषासुर व जाति की राजनीति : राम पुनियानी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर हालिया हल्ले ने भारतीय पौराणिकता और उसकी व्याख्या से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया है। अपनी सरकार की कार्यवाही का बचाव करते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि जेएनयू, राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का अड्डा बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जेएनयू के दलित व ओबीसी विद्यार्थियों के कुछ समूह, महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन कर रहे हैं और आरोप लगाया कि इन विद्यार्थियों ने एक पर्चा जारी किया था, जिसमें देवी दुर्गा के बारे में कई अपमानजनक बातें कही गईं थीं। कई लोग देवी दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा करते हैं। Read More>>>

फूलों की खेती से खुशहाल हो रहे किसान

दोस्तों, राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कृषि रोड मैप अब असर दिखाने लगा है। बड़ी संख्या में किसानों ने परंपरागत कृषि छोड़कर आधुनिक कृषि को अपनाया है। इनमें सबसे खास है फूलों की खेती। बिहार सरकार द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार सूबे में फूलों का उत्पादन हाल के वर्षों में बढ़ा है Read More>>>

संपादकीय : नेपाल में संकट और और बिहार की चिंता का सबब

दोस्तों, नेपाल एक बार फिर अत्यंत ही महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वहां नये संविधान को लागू किया जा रहा है, जिसका पुरजोर विरोध भी समांतर तरीके से जारी है। भारत की चिंता का सबब केवल यह नहीं है कि वहां हिंसा की स्थिति बन गयी है और अबतक पचास से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं। भारत की चिंता की मुख्य वजह वह प्राकृतिक रिश्ता है जो अब नये संविधान के बाद प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा वहां मधेसियों की समस्या है जिनकी उपेक्षा की जा रही है। बिहार के मामले में खास बात यह है कि यहां के समाजवादियों ने नेपाल में 1960 के बाद हुए राजनीतिक आंदोलनों में न केवल नेपाल का साथ दिया बल्कि कई मायनों में नेतृत्व भी किया। Read More>>>

संपादकीय : आरक्षण खत्म करने की साजिश और सच्चाई

भागवत का बयान चौंकाने वाला नहीं है। खासकर उनके लिये जो सवर्णों की इस पीड़ा को समझते हैं कि किस तरह वंचितों ने अपनी हिस्सेदारी (फ़िर चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो या फ़िर राजनीतिक) छीनना सीख लिया है। लिहाजा सवाल रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं के लिये है कि वे किसके साथ खड़े हैं। आरक्षण विरोधियों के साथ या फ़िर आरक्षण समर्थकों के साथ। हालांकि यह भी संभव है कि भागवत का यह बयान भाजपा के इन सहयोगी नेताओं को कमजोर करने के लिये दिया गया हो ताकि वे भाजाप की राह में रोड़ा न बन सकें। Read More>>>

संपादकीय : सुभाष चंद्र बोस के नाम पर गंदी राजनीति

दोस्तों, यकीन नहीं आता है कि भारतीय राजनीति का ऐसा चरित्र भी हो सकता है। देश की आजादी के लिये अपना सबकुछ दांव पर लगाने वाले सुभाष चंद्र बोस के नाम पर भी गंदी राजनीति हो सकती है। सवाल उनके मौत पर उठाया जा रहा है। सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहें तो आरोप यह लगाया जा रहा है कि नेताजी की मौत की वजह दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या थी। अब सवाल यह उठता है कि यदि वाकई नेताजी की हत्या हुई थी तब उसके लिये कौन जिम्मेवार थे। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि सारा खेल आधे-अधूरे सच के साथ खेला जा रहा है। बिल्कुल वैसे ही जैसे बाबा साहब आम्बेदकर के निधन के बाद से दलित नेतागण खेलते आ रहे हैं। Read More>>>

महिषासुर महोत्सव : एक श्रमजीवी महानायक की आराधना या ब्राह्म्णवादी पाखंड?

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सांस्कृतिक और सभ्यतामूलक जनजागरण का प्रयास जिसे कभी कबीर, रहीम, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, डा भीम राव आंबेडकर, राजित सिंह, ललई सिंह यादव, राम लखन सिंह यादव, कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद, आदि महानायकों ने शुरू किया था, वह आज तक पूरा नहीं हो सका। आज भी ब्राह्मणवादी शक्तियां समाज के सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व बनाए रखने में कामयाब हैं। इसका मूल कारण सिर्फ और सिर्फ विध्वंसकारी मनुवादी व्यवस्था है, जिसके अहम् हिस्से के रूप में हम सभी शूद्र भी शामिल हैं। Read More >>>>

संपादकीय : तानाशाह का पर्याय न बने अदालत

दोस्तों, पटना हाईकोर्ट ने कल एक बार फ़िर बिहार सरकार के "बढ चला बिहार" कार्यक्रम पर सख्त आदेश दिया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एल नरसिम्हा रेड्डी और अंजना मिश्र की खंडपीठ का कहना है कि इस कार्यक्रम के तहत दिखाये जा रहे वीडियो से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के वीडियो आदि को अलग किया जाय। ऐसा अदालत ने कल एक लोकहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा है। जाहिर तौर पर यह आम आदमी भी समझ सकता है कि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले "बढ चला बिहार" जैसे कार्यक्रम की क्या उपयोगिता है। Read More>>>>

एहसान फरामोश हैं नरेंद्र मोदी : एल.एस. हरदेनिया

अड़सठवें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यदि हम हमारे देश की अब तक कि महायात्रा का मूल्यांकन करें तो हमें नज़र आएगी गरीबी, भुखमरी, निरक्षरता, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और कमजोर वर्ग के लोगों के जीवन में गरिमा का अभाव। इसके अतिरिक्त, इन दिनों कुछ लोग योजनाबद्ध तरीके से यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि इन अड़सठ सालों में देश में कुछ भी नहीं हुआ है। Read More>>>

अपनी बात : जाने यह कैसा लोकतंत्र है

दोस्तों, लोकतंत्र की वह परिभाषा जिसका सृजन कभी वैशाली की धरती पर हुआ था या फ़िर अब्राहम लिंकन ने जिस रुप में परिभाषित किया था, निश्चित तौर पर अब वह परिभाषा नहीं रही। प्रमाण हम सबके सामने है। ललित मोदी जैसे बड़े घोटालेबाज को प्रश्रय देने वाली सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े को लेकर कांग्रेस ने संसद में विरोध किया तब, लोकतंत्र को अपनी रखैल मानने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर लोकसभा अध्यक्षा ने 25 कांग्रेसी सांसदों को सदन की कार्रवाई से निलंबित कर दिया। Read More>>>

अधूरी एकता पर उठने लगे सवाल

पटना (अपना बिहार, 18 जुलाई 2015) - हाल ही में बिहार में परिवर्तन रथ को रवाना करने के बहाने भाजपा के चुनावी जंग का शंखनाद करते हुए अमित शाह ने अपने संबोधन में राजद-जदयू और कांग्रेस की एकता पर सवाल उठाया। यह सवाल लाजमी भी है। यदि इन सभी पार्टियों में वैचारिक समानता है और वे एक-दूसरे के साथ हैं तो यह एकता जमीन पर भी दिखनी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल समाजवादियों की एकता का है। Read More>>>

अपनी बात : अस्तित्व तलाश रहे भिखारी ठाकुर

दोस्तों, भिखारी ठाकुर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। खासकर बिहार के ग्रामीण इलाकों के लिए और उनके लिये जिनका रंगमंच और साहित्य से वास्ता है। लेकिन सबसे दिलचस्प यह है कि बिहार में केवल एक छपरा को छोड़ कहीं भी उनकी प्रतिमा स्थापित नहीं है। यहां तक कि राजधानी पटना में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भिखारी ठाकुर को सम्मान देने के लिए अहम पहल किया। उन्होंने राजधानी पटना में एक ओवरब्रिज का नामकरण भिखारी ठाकुर पुल के रुप में किया। यह वही पुल है जिसे यारपुर पुल के नाम से भी जाना जाता है। उनकी इच्छा संभवतः भिखारी ठाकुर की प्रतिमा स्थापित करने की थी। लेकिन करीब बीस वर्षों के बाद भिखारी ठाकुर पुल के पास एक प्रतिमा स्थापित तो जरुर हुई लेकिन वह प्रतिमा भिखारी ठाकुर की नहीं बल्कि महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त की है। Read More>>>

बिहार में दलित राजनीति - डा. योगेन्द्र

दलित राजनीति की भविष्य बहुत हद तक सवर्ण राजनीति पर निर्भर है।सवर्ण राजनीति के हाथ-पाँव बहुत लंबे हैं।वह कांग्रेस,भाजपा में तो है ही,वह इतना मारक है कि वह वामपंथ तक भी अपना पाँव फैलाता है। दलित राजनीति के उभार के दो प्रमुख कारण हैं। एक,सदियों से दलित समाज पर हो रहे अन्याय और दूसरे इस अन्याय को खत्म करने में असक्षम सवर्ण राजनीति।सवर्ण राजनीति ने दलितों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया। उसने इसका सिर्फ इस्तेमाल किया।सवर्ण राजनीति में दलितों को इतनी ही जगह दी गयी कि पीछे-पीछे ढोल-नगाड़े पीटते रहो। Read More>>>

कर रहे जातिगत जनगणना से इन्कार, इन गद्दारों को मारो जूते हजार

दोस्तों, अब गंगा का पानी बहुत बह चुका है। कहने का मतलब यह है कि आजादी के साढे छह दशक बीतने के बाद वंचित समाज अब अपना अधिकार सवर्ण व सामंती ताकतों से छीन पाने में सफ़ल हो रहा है। लेकिन अब भी स्थिति बहुत अधिक सकारात्मक नहीं है। वह भी तब जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं को वंचित समाज के व्यक्ति के रुप में उद्घोषित करता है। जब बामसेफ़ के बंधुओं ने देश में जातिगत जनगणना की मांग को लेकर आंदोलन शुरु किया था तब राह इतनी आसान नहीं थी। लेकिन इस आंदोलन का असर हुआ और लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव जैसे पिछड़े वर्ग के नेताओं ने तत्कालीन कांग्रेसी सरकार को देश में जातिगत जनगणना कराने को बाध्य कर दिया था। Read More>>>

संपादकीय : जातिगत जनगणना के रिपोर्ट के खुलासे से परहेज की वजह

दोस्तों, केंद्र सरकार ने बहुप्रतीक्षित सामाजिक, जातिगत और आर्थिक जनगणना की रिपोर्ट को जारी कर दिया है। केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली ने आर्थिक रिपोर्ट को देश के समाने रख दिया है। लेकिन जातिगत रिपोर्ट से अब भी परहेज किया गया है। सवाल बड़ा सीधा है। आखिर इस परहेज की वजह क्या है? कहीं इसकी एक वजह बिहार में होने वाला विधानसभा चुनाव तो नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 में शुरू हुआ जातिगत जनगणना अनौपचारिक तौर पर वर्ष 2013 में समाप्त हो गया था। तब इसे पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार ने भी जारी करने से परहेज किया था। उस समय वजह वर्ष 2014 में हुआ लोकसभा चुनाव था। Read More>>>

अपनी बात : असली मुद्दों से भटकाने लगे माननीय

दोस्तों, सूबे में राजनीति चरम पर है। चहुंओर राजनीतिक गूंज आसानी से सुना जा सकता है। नहीं सुना जा सकता है तो वे बुनियादी मुद्दों की गूंज जिसका सूबे की जनता को इंतजार है। जाहिर तौर पर इन मुद्दों में खेतीबाड़ी से लेकर शिक्षा, बिजली, चिकित्सा और रोजगार शामिल है। लेकिन सूबे के माननीयों ने कुछ ऐसा पैंतरा खेला है जिसके कारण जनहित से जुड़े सभी मुद्दे गौण होते जा रहे हैं। असली मुद्दों की जगह जुबानी तल्खियत ने ले ली है। Read More>>>

अपनी बात : अफ़वाहों से बचने की जरुरत

दोस्तों, एक बार फ़िर अफ़वाहों का बाजार गर्म हो गया है। नालंदा जिले में जिस तरह की घटना सामने आयी है वह मधुबनी गोली कांड की यादों को ताजा कर रही है। उस घटना में एक प्रेमी युगल फ़रार हो गया था और लोगों ने पूरे शहर को जला डाला था। यहां तक कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को गोलियां तक चलानी पड़ी थी। बाद में सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन कर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की। ऐसी ही घटना नालंदा जिले में सामने आयी है। एक निजी स्कूल के चार बच्चे लापता हो गये। इनमें से दो का शव एक तालाब में मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों मृत बच्चों के शव पर किसी तरह के चोट का निशान नहीं है। Read More>>>

अपनी बात : जीने दें ख्वाबों को अपनी जिंदगी

जय भीम, जय मंडल साथियों। रात के साढे ग्यारह बज रहे हैं। ठीक आधे घंटे बाद वह दिन आने वाला है जिसे दुनियावी चलन के हिसाब से मेरा जन्मदिन भी कह सकते हैं। लेकिन मेरे लिये यह तारीख महज मेरा जन्मदिन नहीं है। ठीक आठ वर्ष पहले इसी दिन मैंने अपना बिहार का ख्वाब देखा था। ख्वाब बिहार में बड़े मीडिया घरानों के बीच दलितों और पिछड़ों के लिए विशेष मीडिया का। आर्थिक समस्यायें थीं इसलिए ख्वाब को पूरा करने के लिए अंतरजाल का सहारा लिया। प्रारंभ में ब्लाग के जरिए शुरु किया गया मेरा ख्वाब आज पिछले सात वर्षों से आपके सामने है। इसका श्रेय आप सभी को जाता है, क्योंकि आपके प्रोत्साहन के कारण ही मैं इसे आपके समक्ष प्रस्तुत करने में सफ़ल रहा हूं। Read More>>>

देश की सोच पर हावी होने का कुत्सित प्रयास : इरफान इंजीनियर

फिल्म एण्ड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) के शासी निकाय व सोसायटी के अध्यक्ष पद पर गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में वहां के विद्यार्थी आंदोलनरत हैं। संस्थान के विभिन्न पाठ्यक्रमों में अध्ययनरत लगभग 150 विद्यार्थी इस राजनैतिक नियुक्ति के विरूद्ध अनिश्चितकालीन हड़ताल कर रहे हैं। चौहान का नाम गूगल पर डालने से पता चलता है कि उन्होंने कुछ फिल्मों जैसे अंदाज (2003), बागबान (2003) और तुमको न भूल पाएंगे (2002) में अभिनय किया है। विकीपीडिया कहता है कि चौहान ने 150 फिल्मों और 600 टीवी सीरियलों में अभिनय किया है परंतु इन फिल्मों में से केवल चन्द से संबंधित लिंक विकीपीडिया में दी गई हैं Read More>>>

अपनी बात : कुछ अल्फ़ाज आपातकाल के नाम

दोस्तों, सवर्ण इतिहास भले ही इस सच्चाई को स्वीकारने की हिम्मत न करे, लेकिन सच्चाई यही है देश में आपातकाल लागू किये जाने के पीछे देश में सवर्णों के राजनीतिक वर्चस्व को बचाये रखने की अंतिम कोशिश थी। कांग्रेस का ब्राह्म्णवाद तब चरम पर था और पूरे देश में ब्राह्म्णवाद के खिलाफ़ आंदोलन न केवल अपने पैरों पर खड़ा था बल्कि वह ब्राह्म्णवाद को खुली चुनौती दे रहा था। हालांकि इसकी शुरुआत राष्ट्रपिता महात्मा फ़ुले ने वर्ष 1857 में ही कर दिया था लेकिन राजनीतिक स्तर पर इसकी पहचान तब बनी जब बाबा साहब डा भीम राव आम्बेदकर ने इसका नेतृत्व किया। Read More>>>

दलित मुसलमानों की सामाजिक त्रासदी : डॉ० तारिक असलम

भारतीय समाज की यह कैसी विडम्बनापूर्ण त्रासदी है कि यहाँ की बहुसंख्यक जातियां दलितों के रूप में पहचान रखती हैं, जिसमें से कुछ एक जातियों को राज्य एवं केन्द्र के आरक्षण पैनल में विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है और बहुत सारी जातियों को नजरअंदाज कर दिया गया है। इस मुद्दे पर मेरी सोच थी कि मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग करना सर्वथा अनुचित है, दूसरे यदि आरक्षण देना अनिवार्य है तो फिर समस्त जातियों में ऐसे परिवारों या व्यक्तियों की पहचान होनी चाहिए जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने में असक्षम सिद्ध हुए हैं। Read more>>>

धर्म निरपेक्षता और भारतीय राजनीति की त्रासदी

दोस्तों, इसे भारत का दुर्भाग्य कहिए कि आजादी के साढ़े छह दशक बीतने के बाद भी वह संस्कृति अब तक संशयात्मक अवस्था में जो वास्तव में भारत की पहचान रही है। यह बात आर्य इतिहासकार भी मानते हैं कि आर्यों के पहले भी इस देश में लोग रहते थे और उनका अपना धर्म और जीवन जीने का अपना सलीका था। मोहनजोदड़ो में मिले हड़प्पा संस्कृति के अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि इस देश के मूल निवासियों का अपना धर्म था जो बाद में अलग-अलग स्वरूपों में सामने आया। विभिन्न जाति और धर्मों वाले देश का धर्म निरपेक्ष होना एक जटिलतम परिकल्पना है Read more>>>

साहित्य चर्चा : गोरख पांडेय की समाजवादी आलोचना

- नवल

भारत में समाजवाद की परिभाषा अन्य देशों के समाजवाद से अलग है। अलग इसलिए है क्योंकि यहां का समाज अन्य देशों के समाज से अलग है। सबसे दिलचस्प यह है कि आज सामंती बुद्धिजीवी जिसे जातिवाद कहते अघाते नहीं हैं, वही भारत का असली समाजवाद है। जाहिर तौर पर सामंती बुद्धिजीवियों को यह बात कभी पचेगी नहीं कि वंचित तबके के लोग उन्हीं (सामंती) के दिये पहचानरुपी हथियार का उपयोग कर अपना अधिकार छीनने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि नहीं पचने की बात कोई नई नहीं है। एक उदाहरण गोरख पांडेय की कविता है।

 

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

 

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई

 

नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई

 

गांधी से आई, आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई

 

कांगरेस से आई, जनता से आई

झंडा से बदली हो आई

 

डालर से आई, रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई

 

वादा से आई, लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई

 

लाठी से आई, गोली से आई

लेकिन अहिंसा कहाई

 

महँगी ले आई, गरीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई

 

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई

 

परसों ले आई, बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई

 

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

 

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

 

गोरख पांडेय को बिहार के सामंती बुद्धिजीवी प्रगतिशील कवि मानते हैं तो कुछ और। लेकिन उनकी यह रचना साबित करती है कि मंडल कमीशन के पहले जब समाजवाद को भारतीय संविधान के प्रस्तावना में जोड़ा गया था तब भी समाजवाद ने इनकी चूलें हिलाकर रख दी थी। इसलिए गोरख पांडेय के इस व्यंग्य को अप्राकृतिक नहीं कहा जा सकता है।

दरअसल जिन दिनों भारत में समाजवाद को लेकर इतनी बड़ी पहल की जा रही थी, विश्व के स्तर पर पूंजीवाद अपने नये अवतार यानी नवउदारवाद में सक्रिय हो उठा था। ब्रिटेन शक्तिहीन हो चुका था और सोवियत संघ भी विघटन के दौर में था। उन दिनों नवउदारवादी मूल्यों को स्थापित करने और भारत में सामंतों का वर्चस्व बनाये रखने के कई प्रयास किये गये थे। गोरख पांडेय की कविता इसी प्रयास का हिस्सा थी।

हालांकि बहुधा लोग यह कह सकते हैं कि गोरख पांडेय ने जो अपनी कविता में लिखा, वह सब सच हो रहा है। मसलन "लाठी से आई, गोली से आई, लेकिन अहिंसा कहाई" बिहार सहित पूरे देश में मचे भूमि संघर्ष की ओर इशारा करती है। लेकिन सच यही तक सीमित नहीं है। सच यह है कि भूमि संघर्ष के साथ-साथ राजनीतिक संघर्ष भी इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ। लाठी-गोली चली क्योंकि जिन दिनों इस संघर्ष की शुरुआत हुई थी, अधिकांश वंचित तबके के लोग न तो शैक्षणिक दृष्टिकोण से और न ही राजनीतिक दृष्टिकोण से जागरुक थे। उन्हें तो केवल वही अच्छा लगता जो उनकी बात कहता था, फ़िर उसमें नाटकीयता ही क्यों न रही। परिणाम यह हुआ कि वामपंथ देश में स्थापित हुआ। लेकिन यह पंथ भी सवर्ण पंथ सरीखा निकला। हिंसक आंदोलन हुए, लाखों वामपंथ की बलिवेदी पर जबरन चढा दिये गये।

गोरख पांडेय की कविता में इसका कोई जिक्र नहीं होना समाजवाद के कारण सामंती ताकतों को मिलने वाली सशक्त चुनौती का प्रमाण भी है। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि आज भी गोरख पांडेय की कविता एक नजीर यानी उदाहरण के रुप में पेश किया जाता है।

अपनी बात : ललित मोदी पर मेहरबानी का मतलब

दोस्तों, अब यह बात साफ़ हो गयी है कि मोदी सरकार भी भ्रष्टाचारियों को अपना दामाद मानती है। यदि ऐसा नहीं होता तो एक भ्रष्टाचारी के लिये सुषमा स्वराज जैसी तथाकथित पाक साफ़ राजनीतिज्ञ ने भ्रष्टाचार के आरोपी के लिए पैरवी की। यह उनकी पैरवी का ही नतीजा रहा कि चौबीस घंटे के अंदर ही ललित मोदी को इंगलैंड जाने के लिए ट्रैवेल वीजा मिल गया। अब चूंकि इस मामले में नरेंद्र मोदी सरकार फ़ंस चुकी है तो अमित शाह जैसे बड़बोले नेताओं की बदहवासी सामने आ रही है। वहीं इस मामले में नरेंद्र मोदी की खामोशी इस बात को साबित करती है कि वे भी दूध के धुले नहीं हैं। Read More>>>

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल : राम पुनियानी

लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं, उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है? Read More>>>

 

जातिवाद : मिथक या सच्चाई?

कारपोरेट कल्चर में भी जाति और धर्म सामान्य तौर पर मायने नहीं रखते हैं। लेकिन यह महज अधूरा सच ही है। अभी भी भारत विभिन्न जातियों, धर्मों, त्यौहारों, बोलियों, भाषाओं, पहनावों इत्यादि का देश है पर भारतीय समाज का आधार जाति व्यवस्था है। इन सभी का देश की राजनीति में व्यापक इस्तेमाल होता है। उदाहरण के रूप में पिछले वर्ष हुआ लोकसभा चुनाव है जिसमें प्रधानमंत्री पद पाने के लिए नरेंद्र मोदी और उनके दल को यह प्रचारित करना पड़ा कि वे अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं। Read More>>>

1857 का तथाकथित विद्रोह और दलित-ओबीसी विमर्श

दोस्तों, इतिहास कई सवाल खड़े करता है। एक सवाल वर्ष 1857 के विद्रोह से जुड़ा है। क्या मंगल पांडेय को सचमुच गाय की चर्बी वाले कारतूस से घृणा थी? कहीं ऐसा तो नहीं था कि उन दिनों हिन्दू और मुसलमान राजाओं के उकसाने पर यह विद्रोह किया गया। इसमें कहीं भी देशभक्ति वाली कोई बात नहीं थी? एक उदाहरण वीर कुंवर सिंह का दिया जा सकता है। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तब तक अपनी जुबान नहीं खोली जबतक कि उनकी अपनी जमींदारी खतरे में नहीं पड़ी। वैसे सवाल यह भी है कि अपनी जमींदारी बचाने के लिए लड़ी गयी लड़ाई को देशभक्ति की संज्ञा कैसे दी जा सकती है। Read More>>>

मांझी को अपनी नैया पार लगाने की चुनौती

श्री मांझी ने जदयू के विधायकों को तोड़ने के लिए पहले ही अपना पासा फ़ेंक दिया है। उन्होंने ऐलान कर रखा है कि वे अपने नये कबीना को जम्बोजेट आकार का बनायेंगे जिसमें मंत्रियों की संख्या के बराबर ही उप राज्य मंत्री स्तर के सदस्य शामिल होंगे। इसके अलावा उन्होंने दो-दो उपमुख्यमंत्रियों का आफ़र भी दिया है। श्री मांझी के इस आफ़र में सबसे बड़ा डिफ़ेक्ट यह है कि Read more >>>

जयंती पर विशेष : ईमानदार राजनीति के पुरोधा बी एन मंडल

सिद्धांतहीन, मर्यादा और नैतिकताविहीन आज की राजनीतिक दौड़ में समाजवाद के महान पुरोधा भूपेंद्र नारायण मंडल की प्रासंगिकता बहुत बढ़ गई है। भूपेंद्र नारायण मंडल का जन्म मधेपुरा जिले के रानी पट्टी गाँव के एक जमींदार परिवार में एक फरवरी 1904 को हुआ था। उन्होंने भागलपुर के टी एन जे कॉलेज (जिसका नाम बाद में बदलकर टी एन बी कॉलेज, भागलपुर हो गया) से स्नातक और पटना विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की थी। Read more>>

भूमि सुधार के बगैर गरीबी उन्मूलन अधूरा

यह अत्यंत ही सुखद है कि राज्य सरकार की ओर से कैंप लगाकर भूमिहीनों को जमीन दिये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसके अलावा राज्य सरकार के द्वारा उन लोगों को जमीन पर अधिकार भी दिलाया जा रहा है, जिन्हें बासगीत की जमीन का पर्चा तो बहुत पहले ही मिल गया था, लेकिन जमीन पर अधिकार नहीं मिल सका था। Read More >>>

संपादकीय : ईवीएम भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा खलनायक

इस पूरे मसले का एक पक्ष यह भी है कि इसका इस्तेमाल तब शुरु किया गया जब देश का पिछड़ा वर्ग राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने में सफ़ल होने लगा। तर्क यह दिया गया कि ईवीएम के इस्तेमाल से बोगस वोटिंग नहीं होंगे और इसका फ़ायदा बुथ कैप्चरिंग आदि के मामलों में भी होगा। लेकिन परिणाम क्या हुआ, यह हम सभी जानते हैं। Read More >>>

 

दोस्तों, कानून अंधा होता है। बदले हालात में यह शतप्रतिशत सही भी हो रहा है। गुजरात दंगे के मामले में नरेंद्र मोदी का पाक साफ साबित होना, अमित शाह का बेगूनाह होना, बिहार में दर्जनों नरसंहारों के आरोपियों का बरी होना और अब सलमान खान पर न्यायपालिका की मेहरबानी। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि आज की जनता वह जनता नहीं रही जो पुलिस देखकर घरों में दुबक जाती थी। जज भी पहले भगवान की तरह पूजे जाते थे। वकीलों की भी खूब ठाठ होती थी। अब स्थिति बदल गयी है और यह बात लगभग सभी जानते हैं कि इस देश में सब बिकता है। फिर चाहे वह कानून ही क्यों न हो।

अभिनेता सलमान खान के मामले में तो यह बात और भी दिलचस्प है। पहले सलमान खान को अपनी कार से मुंबई में सोये लोगों को रौंदने के मामले में बेदाग साबित करने के बाद न्यायपालिका ने मूक हिरण की हत्या मामले में भी महापुरूष साबित कर दिया है। आधार पुलिस व वन विभाग की जांच रिपोर्ट में अंतर है। यह घटना 26-27 सितंबर 1998 को राजस्थान में घटित हुई थी। सलमान खान पर आरोप था कि उन्होंने दुर्लभ प्रजाति के चिंकारा हिरण का शिकार किया था। उनके साथ सैफ अली खान और तब्बू भी थे। इस मामले में सलमान खान को जेल की हवा भी खानी पडी थी। राजस्थान की स्थानीय निचली अदालत ने सलमान खान को दोषी मानते हुए पांच वर्ष की सजा भी सुनायी थी। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब वे बेदाग हैं।

भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं और यह बेवजह नहीं है। खासकर सोशल मीडिया ने लोगों को अभिव्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता दे दी है। निशाने पर न्यायिक व्यवस्था तो है ही साथ ही इससे उसकी साख पर भी सवाल उठा है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि न्यायपालिका पर सवाल उठने का सिलसिला बंद नहीं हुआ तो आने वाले भविष्य में देश की व्यवस्था का क्या होगा। बेहतर हो कि न्यायपालिका भी इस सवाल पर पूरी ईमानदारी के साथ सोचे। वर्ना आने वाला समय उसके लिए सकारात्मक नहीं होने वाला है क्योंकि पब्लिक अब सब जानती है।?

खास खबर : केरल से आयी विकास की अनोखी ज्योति

दोस्तों, कहते हैं कि अगर जिद और जज्बा हो, तो कामयाबी किसी उम्र की मोहताज नहीं होती. बिहार के सारण जिले में रहने वाली 72 वर्षीया ज्योति ने इसे साबित कर दिया है. ज्योति की जिद थी कि महिलाएं किसी की मोहताज न रहें, वे घर से निकलें और उनका अपना रोजगार हो. बुजुर्ग अविवाहिता ज्योति की इसी जिद ने न केवल इस क्षेत्र की 3,000 से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि सारण जिले के गांव-गांव तक शिक्षा व महिला सशक्तिकरण की ह्यज्योतिह्ण को पहुंचाया.

केरल की रहने वाली समाज सेविका ज्योति करीब 20 साल पहले सारण आईं थीं और यहां की महिलाओं का दर्द देख यहीं की होकर रह गईं. ज्योति ने कहा कि जब प्रारंभ में वे यहां आईं थीं, तब उन्हें यहां की भाषा का ज्ञान भी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बदल गई. महिलाओं के बीच सिस्टर ज्योति के नाम से वो प्रचलित हैं और ज्योति के प्रति यहां की महिलाएं निष्ठावान हैं.

ज्योति की पहल पर महिलाओं ने 150 समूह बनाए और युवाओं ने 30 समूह तैयार किए, जो आज खेती के अलावा मोमबत्ती, डिटरजेंट और दवा बनाने का काम कर रहे हैं. बाद में 72 महिला स्वयं सहायता समूहों ने मिलकर एक एकता सहकारी समिति बैंक बनाया, जो कर्ज में जी रही महिलाओं के लिए मददगार साबित हुआ.

कई महिलाएं जो कल तक घर की चौखट से बाहर नहीं आती थीं, वे आज खेतों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं.

करीब 80 गांवों में महिलाएं खुद रोजगार करती हैं. 3,000 महिलाएं आज न केवल आत्मनिर्भर बन चुकी हैं, बल्कि खुद से मोमबत्ती, सर्फ व दवा बनाकर अपने परिवार का आधार स्तंभ बनी हैं. बैंक में महिलाओं ने मिलकर 60 लाख की पूंजी जमा कर ली है. जमा पूंजी से महिलाएं ऋण के तौर पर पैसा लेकर निर्धन महिलाएं पट्टे पर जमीन लेकर खेती कर रही हैं और पापड़ बनाने का काम कर रही हैं.

समाज सेवा के क्षेत्र में कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार जीत चुकीं ज्योति ने कहा कि एकता सहकारी समिति बैंक में शुरू में 12 हजार ही पूंजी इकट्ठा की गई थी, जो दो साल में मेहनत और लगन से 60 लाख रुपए तक पहुंच गई है. ज्योति ने बताया कि मन में विश्वास और लगन हो तो कोई भी काम छोटा नहीं होता. शुरू में लोगों की समझ थी कि इस काम के पीछे उनका भी कोई लाभ होगा. लेकिन जैसे-जैसे बात लोगों के जेहन में बैठती गई, वैसे-वैसे लोग आत्मनिर्भर बनते चले गए और सरकारी मदद से ज्यादा खुद के काम पर भरोसा करने लगे.(इशलाहउद्दीन खान के वाल से)

अपनी बात: वंचितों के संघर्ष के बदलते संदर्भ

दोस्तों, आज की राजनीति में ऐसे अनेक मिल जायेंगे जो इस बात के समर्थक हैं कि वंचितों को जहां जिस पार्टी में जगह मिले, जगह बना लेनी चाहिए। इससे वंचितों की राजनीतिक हिस्सेदारी बढेगी और संघर्ष भी सकारात्मक दिशा में आगे बढेगा। फिर वह पार्टी या संगठन वंचितों का विरोधी ही क्यों न हो। राजनीति के सामान्य शब्दकोष में इसे अवसरवादिता भी कहा जाता है। लेकिन इसके कई सारे दुष्परिणाम सामने आये हैं। एक बडा उदाहरण बाबू जगजीवन राम का है जो सारी उम्र कांग्रेसी हुक्मरानों और वंचितों के बीच फेस बने रहे। एक बाबूजी के सहारे कांग्रेस ने लंबे समय तक दलितों की एकता का लाभ उठाया। दलितों को इससे क्या लाभ मिला, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि बाबा साहब डा भीम राव आम्बेदकर को 1990 के दशक में भारत रत्न की उपाधि तब मिली जब देश में सामाजिक न्याय का दौर आया। Read More>>>

प्रधानमंत्री जी चेतिये, नहीं तो समेटें अपना कुनबा, राजद प्रमुख ने पीएम को लिखा पत्र, गाय के नाम पर देश में आग न लगायें

पटना (अपना बिहार, 24 जुलाई 2016) - गुजरात के उना में मरी गायों की खाल उतारने वाले दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई के विरोध में राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख है। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि चमड़ा उद्योग से जुड़े चार दलित युवकों को बेरहमी से सरेआम बुरी तरह से सिर्फ इसीलिए पीटा गया क्योंकि उन्होंने अपनी आजीविका के लिए मरी हुई गायों के खाल को उतारा था। यह जो गौ-सेवा और गौ रक्षा के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह जगह-जगह हिंसक तथाकथित गौ-रक्षक दल इत्यादि पनप रहे हैं, इस आग के पीछे सबसे बड़ा हाथ आरएसएस और आपका ही है।

राजद प्रमुख ने लिखा कि पहले लोकसभा चुनाव और हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में जिस गैर जिम्मेदारी से पिंक रेवोलुशन, गौ माँस, गाय पालने वाले और गाय खाने वाले आदि गैर जरूरी बातों पर समाज तोड़ने वाले भड़काऊ भाषण दिए गये थे, उन्हीं का यह असर है कि आज किसान खरीद कर गायों को गाड़ी में लादकर ले जाने से भी डरता है। जाने रास्ते में कौन उन्हें गौ रक्षा के नाम पर घेर कर पीट दे या जान ही ले ले ।

श्री प्रसाद ने कहा कि आपने तो लोगों को बाँटकर, जहर रोपकर वोटों की खूब खेती की और जो चाहते थे वो बन गए। पर आपका बोया जहर रह-रह जातिवादी और सांप्रदायिक साँप का रूप धर, समय-समय पर उन्मादी फन उठाता है और देश की शांति और सौहार्द को डस कर चला जाता है। मुझे अत्यंत दु:ख है कि मुझे अपने देश के प्रधानमन्त्री को यह बताना पड़ रहा है कि यह आग आपकी ही लगाई हुई है। इस आग में भस्म होकर जो गौपालक, किसान बन्धु, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक मर रहे हैं, उसके दोषी सिर्फ आप, आपकी पार्टी और आपकी असहिष्णु विचारधारा की जननी संघ है। अगर आज मैं आपको कठघरे में खड़ा नहीं करूँगा तो मेरे अंदर का गौ-पालक मुझे कभी माफ नहीं करेगा। पुरे देश समेत विदेशी मीडिया भी जानता था कि हिंदुस्तान में जमीन एवं गरीबों से जुड़ा एक जनसेवक है लालू यादव जो लुटयेंस दिल्ली के बंगले एवं मुख्यमंत्री आवास में भी गौ-माता रखता है। मेरे द्वारा दिल्ली के बंगले में गाय रखने पर मुझे जातिवादियों द्वारा ग्वाला और ग्वार कहा गया। मैं दिखाने के लिए गाय नहीं रखता, जब कुछ नहीं थे तब भी गाय रखते थे और आज भी रखते है। आज भी शायद मिलाकर बीजेपी के सभी नेताओं के पास इतनी गायें नहीं होंगी जितनी हमारे आवास एवं खटाल (गौशाला) में है।

राजद प्रमुख ने कहा कि गाय के नाम पर लोगों को बाँटने वाले नेताओं का गौ-सेवा से क्या सरोकार? आपके जम्बो मंत्रिमंडल के 78 मंत्री लुटयेंस दिल्ली के बड़े-बड़े बंगलों में रहते हैं। कितनों ने अपने भीमकाय बंगलों में गाएँ पाली हुई हैं ? कुत्ते जरुर पाल रखे होंगे । पर गायों के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ेंगे। बिहार में आपने गौ-प्रेम पर सभाओं में बड़े-बड़े लेक्चर और अखबारों में करोड़ों के इश्तेहार दिए थे। मोदीजी, अगर सचमुच आप गौ प्रेम करते हैं तो आप अपने हर मंत्री के लिए नियम बनाइए कि हर कोई अपने बंगलों में गाय पालेगा, खुद अपने हाथों से उनकी देखभाल करेगा ,उन्हें नहलाएगा, खिलाएगा और मृत्यु होने पर उनका विधिवत अंतिम संस्कार भी करेगा। ताकि मृत गायों को उनके बंगलों से ले जाते वक्त आप ही के कार्यकर्ता उन दलितों या पिछड़ों की हत्या ना कर दे।

राजद प्रमुख ने कहा कि उना की घटना अपने आप में कोई अनोखी या एकमात्र घटना नहीं है, आए दिन यह पागलपन देश के किसी ना किसी कोने में अपना नंगा नाच दिखाता है और आप दूसरी ओर मुंह फेर लेते हैं। आप लोग तो वोट की राजनीति करके चले जाते हैं पर गरीब इसका भुगतान अपनी आय, खुशियों, संभावनाओं और जीवन से करते हैं। गौ-रक्षा के नाम पर मनुवादी इसका प्रयोग अपने हाथों से धीरे-धीरे खिसकते निरंकुशता को पुन: हथियाने के लिए करते हैं, दलित पिछड़ों को उनकी 'जगह' दिखाने के लिए करते हैं। देश भर में गाएँ सडकों के किनारे कचरा खाती हैं, पर कोई गाय प्रेमी उसे दो रोटियाँ नहीं खिलाएगा। भूख,प्यास, गर्मी, बीमारी से ये गाएँ दम तोड़ देती हैं पर कोई गौ रक्षक आगे नहीं आता है।

उन्होंने कहा कि अब संघ और भाजपा का यह स्वांग बंद होना चाहिए े अब देश को यह बर्दाश्त नहीं है कि किसी 'माँ भारती के सन्तान' रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या पर प्रधानमंत्री का मर्म एक हफ्ते बाद जागे। देश के दलित और पिछड़े संघ की थोपी हुई आचार संहिता को मानने से इंकार करते हैं। अपने विरोध और प्रदर्शन से दलितों ने गुजरात की सरकार को अपने महत्व का आभास कराया है, समाज को आइना दिखाया है और अपने अंदर पल रहे कटुता का एक झलक मात्र दिखाया है।

राजद प्रमुख ने पीएम को कहा कि ब्राह्मणवादी और मनुवादी मानसिकता को पिछले दरवाजे से हम दलित, पिछड़े और आदिवासियों पर पुन: लादने का प्रयास बंद कीजिए, वरना इसका परिणाम देश के लिए विध्वंसक होगा। देश का बहुसंख्यक वर्ग देश में हजारों साल तक चलने वाले काले सामाजिक ढाँचे की पुनरावृत्ति किसी कीमत पर होने नहीं देगा े संघ के मोहन भागवत जैसे विषैली राजनीति करने वालों के लिए मेरी एक ही चेतावनी है - चेतें अथवा अपना कुनबा समेटें।

उद्यमियों को हर संभव सहायता देगी सरकार, टेक्सटाइल निवेशकों ने की मुख्यमंत्री से मुलाकात

पटना (अपना बिहार, 23 जुलाई 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उद्यमियों का आहवान किया है वे बिहार के औद्योगिक गति को तेज करें, सरकार उनके साथ है। शुक्रवार को टेक्सटाइल निवेशकों ने मुख्यमंत्री सचिवालय स्थित संवाद सभाकक्ष में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की। इनमें टेक्सटाइल निवेशकों की तरफ से एप्रल एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल के वाइस चेयरमैन एच.के.एल. मगु द्वारा मुख्यमंत्री के समक्ष बिहार में टेक्सटाइल उद्योग लगाये जाने से संबंधित विभिन्न बिन्दुओं पर प्रस्तुतीकरण दिया गया। बिहार में टेक्सटाइल उद्योग लगाये जाने से संबंधित सभी बिन्दुओं पर विस्तृत चर्चा की गयी। टेक्सटाइल निवेशकों द्वारा बिहार में टेक्सटाइल उद्योग लगाने की इच्छा जाहिर की गयी। मुख्यमंत्री ने टेक्सटाइल निवेशकों को बिहार में टेक्सटाइल उद्योग लगाने में सरकार की तरफ से हरसंभव मदद देने का आश्वासन दिया। बैठक में मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, विकास आयुक्त शिशिर सिन्हा, प्रधान सचिव उद्योग डॉ. एस. सिद्धार्थ, मुख्यमंत्री के सचिव अतीश चन्द्रा, साही एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैनहरिश अहुजा, महाप्रबंधक रिचा एण्ड कम्पनी बिरेन्द्र उपल, निदेशक साही एक्सपोर्ट जेडी गिरी आदि उपस्थित थे।

संपादकीय: नक्सली समस्या का हो स्थायी समाधान

दोस्तों, बीते सोमवार को औरंगाबाद के मदनपुर थाने के डुमरी पुल के पास पुलिस-नक्सली मुठभेड में दस जवान शहीद हो गये। पुलिस का कहना है कि जवाबी कार्रवाई में उसने भी चार नक्सलियों को मार गिराया है। राज्य सरकार के द्वारा शहीद जवानों के परिजनों को 25-25 लाख रूपए देने की घोषणा कर दी गयी है। उधर बिहार पुलिस ने सीआरपीएफ के साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ सर्च अभियान को जारी रखने का फैसला लिया है। हालांकि यह पहला अवसर नहीं है पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड हुई है। मसलन वर्ष 2013 के दिसंबर में औरंगाबाद जिले में गश्ती कर लौट रहे पुलिस वाहन को नक्सलियों ने लैंड माइंस विस्फोट कर उड़ा दिया, इसमें सात जवान शहीद हुये। वहीं नवंबर 2013 मुंगेर जिले के जमालपुर रेलवे स्टेशन के समीप चलती ट्रेन में माओवादी नक्सली संगठन ने हमला किया। इसमें तीन पुलिस जवान शहीद हुये एवं एक यात्री मारा गया। जबकि इससे पहले फरवरी 2013 में गया जिले के रौशनगंज थाना से एक किलोमीटर की दूरी पर नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट किया। इसमें 6 पुलिसकर्मी शहीद हुये एवं दो ग्रामीण मारे गये । इससे भी पहले वर्ष 2009 में जमुई शहर में गस्ती कर रही पुलिस जीप पर नक्सलियों ने गोलीबारी किया। इसमें 3 सैप जवान एवं एक दारोगा शहीद हुये। वहीं वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान जमुई जिले के तारापुर में नक्सलियों ने पुलिस वाहन को बम से उड़ा दिया।इसमें दो सीआरपीएफ के जवान शहीद हुये । जबकि इसी वर्ष जून में औरंगाबाद के मदनपुर में थाना क्षेत्र में नक्सलियों ने सीआरपीएफ पर हमला किया। इसमें असम का एक जवान शहीद हुआ एवं तीन जवान जख्मी हुये थे।

दूसरी ओर पुलिस की कार्रवाईयों में कितने नक्सली मारे गये या फिर कितनों को पकडा गया, इसका सही-सही आंकडा तो बिहार पुलिस ही दे सकती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण दो सवाल हैं। पहला यह कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा नक्सल प्रभावित इलाकों की बेहतरी के लिए चलायी जा रही योजनायें कितनी सफल हैं, इसका मूल्यांकन जरूरी है। समर्पण करने वाले माओवादियों को पुनर्वास के लिए जो सहायता दी जानी चाहिए, क्या वह काफी है। दूसरा सबसे बडा सवाल यह है कि क्या बिहार पुलिस तकनीकी लिहाज से इतनी सक्षम हो पायी है कि वह बेखौफ नक्सलियों का सामना कर सके। इसका जवाब भी सरकार को देना ही चाहिए।

मीसा, शरद सहित नवनिर्वाचित रास सदस्यों ने ली शपथ

नयी दिल्ली/पटना (अपना बिहार, 19 जुलाई 2016) - राज्यसभा के लिए सूबे से नवनिर्वाचित सदस्यों ने सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन शपथ लिया। शपथ लेने वालों में जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव, लालू प्रसाद व राबड़ी देवी की पुत्री डा. मीसा भारती, राम जेठमलानी, आरसीपी सिंह, गोपाल नारायण सिंह आदि शामिल रहे। इनके अलावा केंद्रीय मंत्रियों एम वेंकैया नायडू, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल, सपा नेता अमर सिंह सहित 43 निर्वाचित या पुनर्निवाचित या मनोनीत सदस्यों ने राज्यसभा की सदस्यता की शपथ ली।

देश का फैसला करेगा यूपी का चुनाव

पटना (अपना बिहार, 18 जुलाई 2016) - आबादी के हिसाब से यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है। इस कारण इसका राजनीतिक महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि देश के पहले प्रधानमंत्री से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अधिकांश प्रधानमंत्री देने का श्रेय यूपी को जाता है। इस बार भी उत्तर प्रदेश में 2017 के शुरू में होनेवाले विधानसभा चुनाव की जीत के मायने किसी एक प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने तक सीमित नहीं हैं। सभी प्रमुख पार्टियों को इसका बखूबी एहसास है कि यह चुनाव जहां राज्यसभा में उसकी ताकत में इजाफा करेगा, वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भी बड़ा आधार तैयार करेगा। ऐसे में चुनाव भले अभी कई महीने दूर हो, लेकिन पार्टियों की तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू हो चुकी हैं।

बिहार में मिली करारी हार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यूपी को लेकर संवेदनशील हैं और यही वजह रही कि हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में उन्होंने यूपी को अधिक प्राथमिकता दी। इसके अलावा चुनावी मोड में आते हुए उन्होंने पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने बलिया आकर गरीब महिलाओं को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन देने की उज्ज्वला नामक महत्वाकांक्षी योजना लॉन्च की और अपनी सरकार के दो साल पूरे होने के जश्न की शुरूआत भी यूपी में ही रैली करके की। इसमें कई लोकलुभावन घोषणाओं के साथ, उन्होंने भाजपा सांसदों से कहा कि वे सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने के अभियान में जुट जायें।

उधर कांग्रेस ने भी अपने खत्म होते अस्तित्व को बचाने के लिए शीला दीक्षित और राजबब्बर को जिम्मेवारी सौंप दी है। इनके अलावा सपा पहले से ही अंर्तद्वंद्व व भीतरघात की शिकार होने के बावजूद इस बार के चुनाव में केंद्र सरकार के खिलाफ पूरे देश में बन रहे विरोधी लहर का लाभ लेने को तैयार दिख रही है। इस मामले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी रणनीतियों को अंजाम देना शुरू कर दिया है। वे समाजवादी विकास के जरिए एक बार फि देश के सबसे बड़े राज्य पर कब्जा करने की तैयारियों में जुट गये हैं।

जबकि मुख्य विपक्षी दल बसपा भी दलित वोटों के सहारे ताल ठोंक रही है। हालांकि अभी तक यूपी के राजनीतिक दलों के गणित में कोई बड़ा फेरबदल होने की उम्मीद नहीं हैं। लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य के बसपा छोड़ने के बाद बसपा बैकफुट पर जाती दिख रही है। लेकिन इसका असर कितना होगा, अभी कहना जल्दबाजी कही जाएगी।

बहरहाल प्राय: सारी पार्टियां जिस तेजी से जातीय-धार्मिक समीकरणों को साधने में व्यस्त हैं और उनके लिहाज से उपयोगी चेहरे जुटा रही हैं, उससे लगभग तय हो चुका है कि प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री की प्रदेशवासियों की खैरख्वाही और उनके लिए खजाना खोल देने की तमाम दर्पोक्तियों के बावजूद 2017 में मुख्य रूप से जाति या धर्म के नाम पर ही युद्ध लड़ा जायेगा और विकास या सरकारों के प्रति एंटी-इनकंबैंसी को इस युद्ध की सहायक सामग्रियां बन कर ही संतुष्ट रहना पड़ेगा। इसके अलावा मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से ही अपना पक्ष चुनने को लेकर असहज महसूस कर रहे अल्पसंख्यकों का इस युद्ध में क्या रुख रहेगा, यह तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है।

अपनी बात: आपको जूते मारें या सराहें मिस्टर हिटलर

दोस्तों, सचमुच वर्तमान देशी हिटलर का है और इसके लिए उसे बधाई दिया जाना मानवता है या नहीं, यह अहम सवाल हो सकता है। लेकिन जिस तरीके से देश की आबोहवा बदलती जा रही है, वह हिटलर की हिटलरशाही को स्थापित कर रही है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज देश के हर नागरिक के मन में यह सवाल है कि पाकिस्तान के साथ इस बार लडाई होगी या नहीं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कारगिल युद्ध जानबुझकर लडा गया था और सैंकडों जवानों को अपनी जान गंवानी पडी थी। Read More>>>

राज्यपाल पद की आवश्यकता नहीं : नीतीश, अंतर्राज्य परिषद की बैठक में उठाया बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग, बिहार में तैनात हो सीआरपीएफ की बटालियन

नयी दिल्ली/पटना (अपना बिहार, 17 जुलाई 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भारतीय संघीय व्यवस्था में राज्यपाल पद की सार्थकता पर सवाल खड़ा किया है। नयी दिल्ली में आयोजित अंतर्राज्य परिषद की बैठक में उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपालों की नियुक्ति संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सलाह पर की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि केन्द्र-राज्य सम्बन्धों पर पुँछी आयोग द्वारा वर्ष 2010 में अपना प्रतिवेदन समर्पित किया गया था। आयोग की 273 अनुषंसाओं में से राज्य सरकार द्वारा 114 अनुषंसाओं पर अपना मंतव्य पूर्व में अन्तर्राज्य परिषद को भेजा गया था, शेष 159 अनुषंसाओं पर भी मंतव्य गठित कर प्रेषित किया गया है। मुख्य अनुशंसाएं, जिन पर अंतर्राज्य परिषद के फोरम पर विचार होना है वह भारत के संघीय ढाँचे के संबंध में की गई अनुषंसाएँ हैं। Read more >>>

विज्ञापन घोटाला : जीतन की करतूत से सरकार को फजीहत

पटना (अपना बिहार, 16 जुलाई 2016) - मामला बहुत दिलचस्प है। दिलचस्प इसलिए कि बिहार के दो बडे क्षेत्रीय न्यूज चैनलों के दावे के कारण सरकार को फजीहत झेलनी पड रही है। इससे भी दिलचस्प यह है कि यह पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के एक फैसले के कारण हुआ है। मिली जानकारी के मुताबिक श्री मांझी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में एक न्यूज चैनल को सरकारी विज्ञापन दिये जाने का निर्णय लिया था। सबकुछ व्यवस्था के हिसाब से था लेकिन तब श्री मांझी ने इस बारे में वित्त विभाग की रजामंदी के बगैर ही यह फैसला अकेले ही ले लिया था। वे उस समय सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री थे। उस न्यूज चैनल की देखादेखी एक दूसरे न्यूज चैनल ने भी दावा ठोंका। बताया जाता है कि यह न्यूज चैनल राज्य सरकार के साथ है और यही वजह है कि इसने भी उसी रेट पर विज्ञापनों पर दावा किया है। इस बार सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को वित्त विभाग की याद आयी है। वित्त विभाग ने भी सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को फाइल वापस लौटा दिया है। नतीजतन विवाद जारी है।

संपादकीय : बिहार के फार्मूले पर यूपी की राजनीति

दोस्तों, यूपी और बिहार की न केवल सीमायें एक-दूसरे से मिलती हैं। एक बडी सच्चाई यह है कि दोनों राज्यों का सामाजिक तानाबाना भी कमोबेश एक जैसा है। हालांकि इसके बावजूद बिहार के राजनीतिक क्षत्रपों की यूपी में एक चलती है और न ही यूपी के पहलवान बिहार के अखाडे में अपना जलवा दिखा पाते हैं। हालांकि एक समय बसपा प्रमुख मायावती ने कुछ असर जरूर दिखाया था परंतु अब उनका हाथी भी बिहार में आने के बाद सुध बुध खो बैठता है। Read more >>>

खास खबर: सूबे में जारी है विज्ञापन घोटाला

पटना (अपना बिहार, 15 जुलाई 2016) - बिहार सरकार की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण सूबे में विज्ञापन घोटाला धडल्ले से जारी है। हालत यह है कि अभी भी विज्ञापन के जरिए अवैध कमाई में जितनी हिस्सेदारी फर्जी अखबारों के मालिकों की है, उससे अधिक कमाई सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के विज्ञापन शाखा के बाबुओं की है। यह सब उसी सूचना भवन में धडल्ले से चलता है जहां निगरानी का अपना कार्यालय है। दिलचस्प यह है कि सबकुछ अपनी आंखों के सामने होता देखकर भी निगरानी विभाग मौन रहता है।

वहीं दूसरी ओर रोजाना विज्ञापनों के जरिए लाखों का वारा-न्यारा करने वाले विज्ञापन शाखा के बाबुओं की मौज ही मौज है। इसका अधिक लाभ उन अखबारों के मालिकों को मिलता है, जो सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक रोजाना हजारों प्रतियां छपवाते हैं लेकिन आम जनता के बीच कहीं उनका अखबार दिखता तक नहीं है। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि फर्जी तरीके से अखबार छापने वाले कागज के बडे पक्के हैं। ये डीएवीपी तक को बडे आराम से चूना लगाते हैं। दस्तावेजी तौर पर यह फर्जीवाडा इतना पुख्ता होता है कि सीएजी तक को इसका पता नहीं चलता है।

बहरहाल इस पूरे मामले में राज्य सरकार का तंत्र जानबुझकर खामोश है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले में जांच के आदेश दिया है लेकिन सबसे अधिक दिलचस्प यही है कि जांच की जिम्मेवारी उन अधिकारियों को दी गयी है जो स्वयं इस फर्जीवाडे के महान खिलाडी हैं। जांचोपरांत रिपोर्ट और संभावित कार्रवाई का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

अपनों की शराबखोरी से हलकान सरकार

पटना (अपना बिहार, 15 जुलाई 2016) - सूबे में सरकारी तौर पर पूर्ण शराबबंदी बीते 1 अप्रैल से लागू है। सरकार के नये फरमान के बाद पूरे राज्य में रोजाना शराबियों की गिरफ्तारी और शराब की बरामदगी की जा रही है। खासबात यह भी है कि कथित तौर पर पूर्ण शराबबंदी के बाद जिन मामलों के कारण राज्य सरकार की किरकिरी हुई है, उसके लिए सत्ताधारी दल के नेता ही जिम्मेवार हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि अभी तक इस तरह के मामले में किसी भी विपक्षी दल के नेता का नाम प्रकाश में नहीं आया है।

मसलन गया रोड रेज मामले में हत्यारोपी रॉकी यादव की मां मनोरमा देवी का नाम सबसे पहले शुमार है, जिन्हें पहले तो घर में शराब मिलने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और बाद में पार्टी ने उन्हें दल से निकाल भी दिया। वहीं अभी ताजा मामला औरंगाबाद के कुटुम्बा से पूर्व विधायक ललन राम का है। इनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल में लगी आग की तेजी से वायरल हुआ। इनके मामले में भी पुलिस ने इनकी गिरफ्तारी की गयी और जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने दल से निष्कासित करने का फरमान सुना दिया।

वहीं इस मामले में विपक्ष प्रारंभ से ही राज्य सरकार के शराबबंदी कानून पर सवालिया निशान लगाता रहा है। खासकर पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राष्ट्रीय स्तरीय शराबबंदी मुहिम को लेकर उन्हें कई अवसरों पर कटघरे में खड़ा किया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार के कानून में कई तरह की खामियां हैं और इसके अलावा सरकारी तंत्र भी शराबबंदी को लेकर संवेदनशील नहीं है।

जबकि इस मामले में जदयू के विधान पार्षद व प्रवक्ता नीरज कुमार का कहना है कि यही कानून का राज का प्रमाण है। कानून तोड़ने वाले चाहे कोई भी क्यों न हो, सरकार कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि शराबबंदी के प्रति हमारी पार्टी की प्रतिबद्धता का ही परिणाम है कि अभी तक प्रकाश में आये सभी मामलों में सख्त कार्रवाई की गयी है, जिसमें पार्टी की सदस्यता समाप्ति भी शामिल है।

समय रहते करें पूरी तैयारी : मुख्यमंत्री, संभावित बाढ़/सुखाड़ को लेकर समीक्षा बैठक में दिये निर्देश

पटना (अपना बिहार, 13 जुलाई 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संभावित बाढ़/संभावित अल्प वषार्पात से उत्पन्न होनेवाली स्थिति के मद्देनजर सूबे के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि समय रहते तैयारी पूरी करें। मुख्यमंत्री संवाद कक्ष में आयोजित समीक्षा बैठक में अधिकारियों को निर्देश देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी जिलाधिकारी अपने स्तर से संबंधित विभागों के साथ बैठक करके सभी तैयारी पूर्व में करना सुनिश्चित करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि आपदा की स्थिति से निपटने के लिए बनाये गये एसओपी के अनुसार कार्य करें। सभी तैयारी पूर्व में कर ली जाये ताकि लोगों का ससमय मद्द की जा सके। मुख्यमंत्री ने आंकड़ों के संकलन के गुणवत्ता में सुधार लाने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि सभी जिलाधिकारी प्रत्येक प्रखण्ड में आंकड़ों के संकलन के लिए गाईडलाईन तैयार करें। आंकड़ों के संकलन को व्यक्तिगत दिलचस्पी लेकर करें। आंकड़ों को क्रॉस चेक बेहतर ढ़ंग से करें। सही आंकड़ों का संकलन हो ताकि स्थिति का सही मुल्यांकन कर लोगों को बेहतर सुविधा दी जा सके। उन्होंने कहा कि हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय होता है। आपदा पीड़ित लोगों का सरकारी खजाने पर सबसे अधिक अधिकार होता है। सभी लोग पैनी नजर रखें और तत्काल कार्रवाई करें। मुख्यमंत्री ने सभी जिलों के प्रभारी प्रधान सचिव/सचिव को एक सप्ताह के अंदर अपने संबंधित जिलों में जाकर की जा रही तैयारियों की समीक्षा करने का निर्देश दिया।

समीक्षात्मक बैठक में सभी प्रमण्डलों के आयुक्त, सभी जिलों के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक एवं अन्य अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के माध्मय से जुड़े हुए थे। उक्त बैठक में प्रधान सचिव आपदा प्रबंधन विभाग व्यास जी द्वारा आपदा प्रबंधन की तैयारियों से संबंधित विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया गया। बैठक में बाढ़/सुखाड़ की एस0ओ0पी0, संसाधन मानचित्रण (नाव की उपलब्धता, महाजाल, पॉलीथीन, जीपीएस सेट आदि), मानव दवा की उपलब्धता, पशु दवा और पशु चारा की उपलब्धता, प्रशिक्षित मानव बल, शरण स्थलों की पहचान, तटबंधों की सुरक्षा, सड़कों की मरम्मति, संचार योजना, अकास्मिक फसल योजना के साथ-साथ अल्प वर्षा की स्थिति में की जा रही तैयारी, धान आच्छादन की अधतन स्थिति आदि विषयों पर विस्तृत चर्चा एवं समीक्षा की गयी तथा मुख्यमंत्री द्वारा उक्त विषयों पर आवश्यक दिशानिर्देश दिये गये।

समीक्षात्मक बैठक में जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, ग्रामीण कार्य मंत्री शैलेश कुमार, कृषि मंत्री रामेश्वर राय, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री कृष्णनन्दन प्रसाद वर्मा, आपदा प्रबंधन मंत्री चन्द्रशेखर, उपाध्यक्ष बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, सदस्य बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, मुख्य सचिव श्री अंजनी कुमार सिंह, पुलिस महानिदेशक पी.के. ठाकुर, विकास आयुक्त शिशिर सिन्हा, कृषि उत्पादन आयुक्त विजय प्रकाश, प्रधान सचिव गृह आमिर सुबहानी, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव चंचल कुमार, मुख्यमंत्री के सचिव अतीश चन्द्रा सहित सभी संबंधित विभागों के प्रधान सचिव/सचिव एवं अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

नस्लभेदी और प्रांतवादी टिप्पणी निंदनीय : मीसा

पटना (अपना बिहार, 12 जुलाई 2016) - राज्यसभा सांसद डा. मीसा भारती ने कहा है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में नस्लभेदी और प्रांतवादी टिप्पणी कतई बर्दाश्त नहीँ किया जाना चाहिए। विशेषकर पूर्वोत्तर भारतीयों के खिलाफ, जो आए दिन इस तरह की नस्लीय छींटाकशी का सामना करते हैं।

बताते चलें कि मणिपुर की एक युवती को उस वक्त नस्लभेदी टिप्पणी का सामना करना पड़ा जब वह दिल्ली से सोल जाने के लिए इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर वेरिफिकेशन करा रही थी। मणिपुर की मोनिका खंगेम्बम ने बताया था कि आईजीआई एयरपोर्ट पर दिल्ली से सोल जाने के लिए जब वह आव्रजन डेस्क पर पहुंचीं तो वहां तैनात एक अधिकारी ने उसका पासपोर्ट और चेहरा देखते हुए कहा कि भारतीय तो नहीं लगती हो। पक्का भारतीय ही हो न?

मोनिका ने इस नस्लभेदी टिप्पण्पी की शिकायत एयरपोर्ट पर पुलिस या किसी और से नहीं की है। उन्होंने बाद में फेसबुक पर जब यह वाकया शेयर किया तब यह मामला सोशल मीडिया के माध्यम से सुर्खियों में आया। उन्होंने लिखा कि वह एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए दिल्ली से सोल जा रही थीं। तभी शनिवार को रात लगभग नौ बजे आव्रजन डेस्क पर एक अधिकारी ने उनसे नस्लभेदी टिप्पणी की।

 

जाकिर नायक और अन्य धर्मों के बेवकूफों के लिए

दोस्तों, हम जिस मुल्क में रहते हैं या फिर जिस परिवेश में रहते हैं, यहां की सबसे बडी समस्या अशिक्षा और जागरूकता का अभाव है। यही कारण है कि हमारे समाज में आसाराम, तोगडिया और जाकिर नायक जैसे लोग अपना उल्लू सीधा करने में कामयाब होेते हैं। मौजूदा दौर में सबसे खतरनाक स्थिति यह है कि इन बददिमागों के पास राजनीतिक शक्ति भी है। वहीं शक्ति जिसके सहारे आरएसएस जैसा समाज विनाशक संगठन आज देश की सत्ता पर काबिज है और देश चलाने के नाम पर समाज में नफरत के बीज बो रहा है। Read More>>>

संपादकीय: नयी विज्ञापन नीति का यथार्थ

दोस्तों, विज्ञापन और पत्रकारिता आज एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके दो आयाम हैं। पहला तो यह कि सरकारें अपनी योजनाओं और उपलब्धियों के बारे में आम जनता को बताती हैं तो दूसरा नकारात्मक आयाम यह भी है कि इसके जरिए व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार भी होता है। बिहार अपवाद नहीं है। यहां भी बडे पैमाने पर भ्रष्टाचार रोजाना जारी है।

वैसे यह बेहतर है कि राज्य सरकार ने अपनी विज्ञापन नीति में बदलाव लाने का निर्णय लिया है। अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने भी डीएवीपी नीति में बदलाव किया है और इसके कारण बडे घरानों के बडे अखबारों को अधिक लाभ मिलने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि बिहार सरकार भी विज्ञापन नीति में संशोधन कर नयी पहल करेगी।

खास बात यह भी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया का महत्व समझा है और इसके हिसाब से ही विज्ञापन नीति में बदलाव के निर्देश दिया है। सूत्रों की मानें तो इस बार के विज्ञापन नीति के हिसाब से सोशल मीडिया के वारे-न्यारे होंगे। वजह यह कि राज्य सरकार वैकल्पिक मीडिया संस्थानों को भी विज्ञापन के फायदे देगी।

बहरहाल विज्ञापनों की रेवडियां लूटने वालों की संख्या में इजाफा होने की उम्मीद है। वैसे वर्तमान में भी लूटने वाले दोनों हाथों से लूट ही रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि नयी नीति में सरकार कुछ ठोस कदम उठायेगी।

राहे बाटे : ईद के मौके पर एक सफर दोस्ती की

दोस्तों, नास्तिक होने के कारण ईद या फिर कोई भी पर्व चाहे वह होली, दशहरा ही क्यों न हो, मेरे लिए बेमानी हैं। हालांकि मुझे लोगों की खुशियों में शामिल होना प्रारंभ से ही आकर्षित करता है। बात जब दोस्त की खुशी की हो तो फिर सारी सीमायें खत्म हो जाती हैं।

वैसे पश्चिम के देशों में देशाटन शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विश्वविद्यालयों के द्वारा नौजवानों को इसके लिए अनेक प्रकार की सहुलियतें दी जाती हैं। महात्मा बुद्ध भी देशाटन को ज्ञान का अहम हिस्सा मानते थे। लेकिन यह बात हिन्दुस्तान में अब लागू नहीं होती है। एक छात्र के रूप में मुझे भी इसका मौका नहीं मिला कि अपनी आंखों से अपने हिन्दुस्तान को देखूं और कोई समझ बना सकूं। बाद में जब सवाल पेट का आया तब देश के कई हिस्सों में जाने का मौका मिला। लेकिन तब घुमना और देखना सब व्यर्थ ही था।

पत्रकार बनने के बाद घुमने का असली मतलब समझ में आया। घुमना अब मेरी हॉबी नहीं, बल्कि मेरे काम का हिस्सा भी है। ईद के दिन अपने प्रिय मित्र मआज खान को सरप्राइज देने की योजना थी। इसलिए एक दिन पहले उनके भाई अम्मार खान को फोन किया। गुजारिश किया कि मेरे आने की खबर मआज भाई को न दें।

मआज भाई का घर बक्सर के डुमरांव से पहले नया भोजपुर गांव में पड़ता है। हालांकि यहां जाने के लिए ट्रेन सबसे बेहतर और सस्ता माध्यम है लेकिन मेरे घुमन्तु स्वभाव ने मुझे इसकी इजाजत नहीं दी। बाइक लकर निकल पड़ा। साथ में मेरा एक शैतान भांजा आदित्य उर्फ आदि उर्फ रामाशंकर। मकसद था कि जो अनुभव मैंने अपने कालेज के दिनों में नहीं लिया, वह उसे मिल सके। इसके अलावा उसे दूसरे धर्म व संस्कृति का अनुभव कराना भी मेरा उद्देश्य था।

पटना से बाहर निकलने पर कोइलवर पुल एक सीमा की तरह सीना ताने खड़ा मिलता है। लोहे का यह पुल अंग्रेजों ने बनवाया था। इसे देखकर इसकी उम्र का अनुमान लगाया तो जा सकता है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता है। कोइलवर पुल पार करते समय सूबे में नदियों पर बने कई पुलों का ख्याल आता है। लेकिन मन अंग्रेजों के प्रति आभार भी व्यक्त करता है। यह भाव उस समय और अधिक बढ़ जाता है जब आपके उपर से टेन गुजरती है।

आरा शहर के पहले एक खास जगह है - गीधा। इसकी खासियत यहां के पेड़े हैं। देशी मिठाइयों में सबसे अधिक लोकप्रिय यह मिठाई यहां अपने शुद्धतम स्वरूप में मिलती है। यही वजह है कि मुझ जैसे लोगों के अलावा गरीब-गुरबे भी एक पेड़ा खाकर पानी पीकर आगे बढ़ने के लिए इसे मुफीद जगह मानते हैं।

आरा शहर की सबसे शानदार बात यह है कि इसके दो रास्ते एक साथ मिलते हैं, वह भी शुरूआत में ही। आप चाहें तो सीधे शहर में जा सकते हैं या फिर बाइपास के जरिए बिना शहर की भीड़ से दो-चार हुए आगे बढ़ा जा सकता है।

अम्मार भाई ने फोन पर बताया था कि उनका गांव आरा-बक्सर रोड पर है और आरा से निकलने के बाद कहीं मुड़ना नहीं है। लिहाजा आगे बढ़ने में कोई समस्या नहीं थी। हालांकि जिस सड़क पर मैं आगे बढ़ रहा था, वह एनएच की सड़क थी और चौड़ाई केवल इतनी कि दो बड़े वाहन ही एक साथ आ-जा सकते हैं। बाद में जानकारी मिली कि इस सड़क को फोरलेन में बदलने की कार्रवाई जारी है।

भोजपुर और बक्सर के बीच सीमा का कोई अंदाजा पहली बार यात्रा करने वाला नहीं लगा सकता है। मुझे भी इसका अहसास नहीं हुआ कि कब मैं बक्सर की सीमा में दाखिल हुआ। संभवत: शाहपुर से आगे बढ़ने के बाद एक अजीबोगरीब नजारा दिखा। सड़क किनारे बंदरों की फौज दिखी। मेरे साथ मेरा अपना बंदर यानी मेरा भांजा उन्हें देख मचलने लगा। एक जगह बाइक रोकी। बेचारा बंदर सड़क किनारे बने गड्ढे में जमा पानी के मजे ले रहा था। आदित्य ने उसके साथ सेल्फी ली। बंदर उसे देख रहा था और मैं उनदोनों को।

शाहपुर के आगे रानीसागर और उसके आगे एक के बाद एक कई सारे गांव। गांवों के नाम भी बड़े दिलचस्प। मन में कई सवाल जन्म ले रहे थे लेकिन शांत बक्सर का नजारा उससे अधिक दिलचस्प प्रतीत हो रहा था। नया भोजपुर के पहले एक गांव मिला - पुराना भोजपुर। जेहन में गुदगुदी महसूस हुई। आगे मआज भाई सड़क किनारे खड़े थे।

असल में अम्मार ने सरप्राइज वाली बात को पहले ही सार्वजनिक कर दिया था। करीब चार वर्षों के बाद अपने मित्र को सामने देख मन संतुष्ट हुआ। हालांकि इन चार वर्षों में हम दोनों मोटे हो गये हैं। लेकिन मुझे उनका मोटापन अधिक अच्छा लगा।

नया भोजपुर गांव में घुसने के साथ ही मआज भाई ने उर्दू मध्य विद्यालय के बारे में बताया। लेकिन यह जानकर निराशा हुई कि यहां उर्दू के शिक्षक नहीं हैं। आगे बढ़ा तो एक मदरसा नजर आया। मआज भाई ने बताया कि इसका निर्माण वर्ष 1940 में हुआ था और लंबे समय तक यह उनके दादा जी के जिम्मे था।

गांव में घुसने के साथ ही अहसास हो गया कि हम गंदगी के ढेर पर बसे गांव में हैं। संभवत: ईद के कारण स्थिति ठीकठाक थी। बाद में मआज भाई ने भी बताया कि उनके गांव में करीब दो सौ परिवार कसाईयों के हैं। यह अच्छा हुआ कि मेरा भांजा उनके इस कथन को सुन न सका। मुझे उसकी चिंता हो रही थी।

मआज भाई का घर एक साधारण घर है। बिल्कुल मेरे जैसा। घर में घुसते ही उनके पिता चौकी पर लेटे मिले। मेरा नाम पुकारते हुए उन्होंने कहा कि - नवल आ गये? जवाब में मैं उनके पास बैठ गया। लंबे समय से चलने-फिरने में लाचार उनके शब्दों में अपने प्रति अपनापन मेरे लिए सबकुछ था जिसके लिए मैं पटना से करीब 130 किलोमीटर की दूरी तय कर वहां पहुंचा था।

बगल के कमरे में बैठा ही था कि अम्मार और नेहाल आये। सभी को ईद की शुभकामनायें दी। ईद की सेवईयां और हलवा आदि खाने के बाद राजनीतिक और गैर राजनीतिक बातें हुर्इं। फिर करीब डेढ़ घ्ांटे बाद लजीज खाना। हालांकि मैं अब भी दुविधा की स्थिति में हूं कि खाना लजीज था या फिर मआज भाई और उनके परिजनों की मुहब्बत।

करीब साढ़े चार बजे हम लौट रहे थे। वही रास्ते, वहीं नजारे और मन में अपने मित्र की खुशियों में शामिल होने की खुशी। आंखों के सामने एक और नजारा अब भी घुम रहा है। फरहत नाज(मआज भाई की बेगम) अपने हाथों से अपने ससुर को खाना खिला रही थीं। यह सचमुच इंसानी मुहब्बत की सच्ची मिसाल थी।

टॉपर घोटाले की जांच में आंच

पटना (अपना बिहार, 5 जुलाई 2016) - मामला बहुचर्चित टॉपर्स घोटाले से जुड़ा है। इस एक घोटाले ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन की पोल पूरे देश में खोल कर रख दिया है। हालांकि इस मामले में शिकायत मिलने पर राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया और उसने ताबड़तोड़ अनुसंधान कर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष प्रो. लालकेश्वर प्रसाद सिंह और बच्चा राय सहित अनेक अभियुक्तों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके बावजूद इस पूरे मामले में कई पहलुओं की अनदेखी की जा रही हैँ।

एसआईटी की अनुसंधान में यह बात सार्वजनिक की गयी है कि आर्ट्स टॉपर रही रूबी राय की न केवल कापियां बदली गयीं बल्कि परीक्षा के ठीक पहले बी.आर. कॉलेज का सेंटर भी बदला गया। जबकि बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के परीक्षा संचालन नियमावली 1981 के तहत यह स्पष्ट है कि संबंधित जिले के जिलाधिकारी जिलों में मुख्य परीक्षा नियंत्रक होते हैं और बिना उनकी अनुमति के परीक्षा केंद्र बदलने जैसा महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जा सकता है। ऐसे में यदि बी. आर. कालेज के परीक्षार्थियों का परीक्षा केंद्र परीक्षा के ठीक बदला गया तो इसकी जवाबदेही प्रत्यक्ष तौर पर जिलाधिकारी की थी। लेकिन एसआईटी ने इस मामले में अभी तक कोई खुलासा नहीं किया है।

एसआईटी की जांच में आंच का दूसरा पहलू यह भी है कि परीक्षा संपन्न होने के बाद परीक्षा संचालन नियमावली के तहत स्ट्रांग रूम की संयुक्त जिम्मेवारी दो पदाधिकारियों पर होती है। इनमें से एक अधिकारी बोर्ड द्वारा नामित किये जाते हैं तो दूसरा अधिकारी संबंधित जिला अधिकारी द्वारा। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एसआईटी की जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आयी है कि रूबी राय की उत्तर पुस्तिकायें बदली गयीं। सवाल उठता है कि दो विशेष अधिकारियों के मिलीभगत के बगैर रूबी राय की उत्तर पुस्तिकायें कैसे बदली गयीं। साथ ही यह भी कि इन अधिकारियों के खिलाफ जांच क्यों नहीं की गयी।

बहरहाल एसआईटी की जांच चल रही है और अभी तक एसआईटी ने अपना अंतिम प्रतिवेदन नहीं दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह बिहार को शर्मसार करने वाले घोटाले के ऐसे अनेक पहलुओं पर भी जांच करेगी।

कहानी के आगे की कहानी

यह कहानी महान साहित्यकार प्रेमचंद की कालजयी रचना ईदगाह से प्रेरित है और इसका मकसद कहानियों को आज के परिदृष्य में समझना है। कहानी घर, पटना के बच्चो को समर्पित - नवल किषोर कुमार

ईदगाह

आज फिर ईद है। पूरे मुहल्ले में रौनक है। एक घर को छोड सभी घरों में खुशियां ही खुशियां हैं। सेवइयों की खुश्बू से पूरा मुहल्ला गमक रहा है। रंगबिरंगे पोशाकों में सब एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं। मुहल्ले के हिन्दू भी बिना किसी भेदभाव के ईद की बधाईयां दे रहे हैं और बुढा हामिद अपने घर के ओटे पर बैठकर जाने क्या सोच रहा है।

वैसे बुढे हामिद के पास अब सोचने को कुछ रह भी तो नहीं गया है। दोनों बेटे सूरत में नौकरी करने क्या गये, बुढे हामिद को भूल ही गये। एक बेटी थी, वह भी अल्लाह को प्यारी हो गयी। जाते-जाते एक बेटी छोड गयी। यास्मीन नाम है उसका। अब तो वह भी बारह बरस की हो गयी है। उस वक्त वह तीन बरस की थी जब सईदा उसे छोड कर तन्हां चली गयी थी और मुआ उसका मरद नन्ही सी बच्ची को बुढे हामिद के सहारे छोडकर अपनी दूसरी दुनिया में मगन हो गया। तब से हामिद ही यास्मीन का सहारा है और यास्मीन ही हामिद की सबकुछ। सुबह-सुबह चाय देने से लेकर सबकुछ।

हामिद का बडा बेटा मुश्ताक दिल का बडा अच्छा है। नकचढी बीवी के बावजूद अपने बाप के लिए हर महीने कुछ पैसे भेजता है। पिछले दो महीने से उसने कुछ नहीं भेजा। एक दिन हामिद ने सूरत फोन किया तो जानकारी मिली कि उसे टीबी हो गया है और अस्पताल में भर्ती है। बुढा हामिद रोज फोन कर अपने बेटे के बारे में पूछता है। इस चक्कर में उसे रोज दस रूपए खर्च होते हैं।

गांव का मुखिया हरेंद्र सिंह बडा पक्षपाती है। हामिद एकबार उसके पास गया। बोला - मुखिया बेटा, सरकार हम बुढों को पेंशन देती है। मेरा भी खाता खुलवा दो। अल्लाह तुम्हें खूब बरकत देगा। मुखिया ने ताव देते हुए कहा कि वोट देते समय तो रमेसर यादव नजर आया था चाचा। अब किस मुंह से मेरे पास आये हो। बुढा हामिद खूब गिडगिडाया था। लेकिन मुखिया को नहीं सुनना था। वह नहीं सुना।

यास्मीन अपने नाना जान को समझती थी। न तो किसी बात के लिए जिद करती और न ही कभी रोती। इस बार तो उसने भी रोजा रखा था। हर दिन अल्लाह से एक ही दुआ मांगती। उसे विश्वास था कि एक दिन अल्लाह उसकी जरूर मानेगा और उसके नाना फिर से अपने पैर पर वैसे ही चल सकेंगे जैसे पहले थे। तब उसके नाना उसे रोज अपने कंधे पर घुमाते। उस समय मुहल्ले में ही बीडी की दुकान थी। रोज शाम को घर आने पर दोने भर कर जलेबी, सिंघाडा कितना कुछ लाते थे उसके नाना। एक दिन मोटरसाइकिल वाले ने उसके नाना को ठोकर मार दी। पैर की हड्डी टूट गयी। मुश्ताक मामू जान दौडे-दौडे आये थे। तीन महीने के बाद हामिद अपने पैरों पर खडा हो पाया था।

बुढा हामिद अब भी ओटे पर बैठा था। लोग ईदगाह जा रहे हैं। उसका भी मन हुआ कि अल्लाह के सामने नन्ही यास्मीन के वास्ते दुआ मांगे। लेकिन मुहल्ले से करीब तीन किलोमीटर दूर है ईदगाह। टूटे पैर कितना साथ देंगे। उसने यास्मीन के बारे में सोचा।

एकदम अमीना दादी के जैसी है। कभी-कभी लगता है कि दादी फिर से उसके जीवन में आ गयी है। भेष बदलकर। बेचारी कितना सहती है। इस उमर में ही। रोज अंगीठी पर रोटियां बनाती है। दादी के लिए जो चिमटा उसने बचपन में ईद के दिन खरीदा था, वह तो बहुत पहले ही खत्म हो गयी। बेचारी यास्मीन के हाथ कितने जलते होंगे।

हामिद अपने कुरते की जेब को निहार रहा था। कुल डेढ सौ रूपए थे। उसने सोचा कि क्यों न यास्मीन को कुछ रूपए दे दूं ताकि वह ईद के दिन कुछ खा पी ले। पडोसियों के यहां से जो आएगा, वह तो रहेगा ही। आजकल के बच्चे फूचका, चाट, चाउमिन और पता नहीं क्या-क्या खाते हैं। बेचारी यास्मीन भी तरसती होगी।

बुढे हामिद ने यास्मीन को आवाज दी। मासूम दौडती हुई ओटे पर आयी। हामिद ने पचास रूपए दिये और कहा कि बगल की बच्चियों के साथ कुछ घुम और खा पी आओ। यास्मीन जाना नहीं चाहती थी। वह तो अपने नाना के साथ ईदगाह जाना चाहती थी। नाना ही नहीं गये तो वह अकेले जाकर क्या करेगी। बुढे हामिद ने उसे खूब समझाया तब वह तैयार हुई।

बुढा हामिद अब भी अपने ओटे पर बैठा था। तीन घंटे हो गये। यास्मीन नहीं आयी। उसका बुढा दिल जोर-जोर से धडकने लगा। पसीने से तरबतर वह उठकर गली के मुहाने पर पहुंचा ही था कि यास्मीन आती दिखी। अरे ये क्या - पगली छडी लेकर आ रही है। कैसी पागल है।

बुढा हामिद नतिनी की लायी हुई जलेबियां खा रहा था और छडी को निहार रहा था। यास्मीन यास्मीन नहीं, अमीना दादी बन उसे खिला रही थी और उसकी छडी चिमटे से कम नहीं थी।

तेजस्वी को जेएनयू आने का निमंत्रण

पटना (अपना बिहार, 2 जुलाई 2016) - केंद्र सरकार द्वारा आरक्षण प्रावधानों में छेड़छाड़ के खिलाफ देश भर में चल रहे आंदोलन के मद्देनजर यूनाईटेड फोरम फॉर ओबीसी के प्रतिनिधिनियों ने शुक्रवार को उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव से मुलाकात कर उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। इस आशय की जानकारी जेएनयू के यूनाईटेड फोरम फॉर ओबीसी के संयोजक मुलायम सिंह यादव ने दी। उन्होंने बताया कि उपमुख्यमंत्री ने सामाजिक न्याय पर हो रहे हमले के खिलाफ संघर्ष में साथ देने का वायदा किया है। इस मौके पर दिलीप यादव व छात्र नेता प्रभात यादव भी मौजूद थे।

बिहार टापर्स घोटाले की अनकही सच्चाई

दोस्तों, एक समय था जब बिहार को ज्ञान की भूमि का दर्जा हासिल था। वजह थी कि बिहार के बोध गया में ही गौतम को सूक्ष्म ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और वे महात्मा बुद्ध बने। यदि इस ऐतिहासिक उद्धरण को छोड भी दें तो शिक्षा के मामले में बिहार पूरे देश में पृथक रहा है। इसका प्रमाण हर साल आईआईटी और यूपीएससी परीक्षाओं में बिहारी परीक्षार्थियों की निरंतर शानदार सफलता है।

लेकिन इसके समानांतर एक असलियत यह भी कि सरकारी शिक्षा के क्षेत्र असमानता का जो दृश्य बिहार में दिखता है, वह किसी और राज्य में शायद ही दिखता है। इसकी शुरूआत पूर्व मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्र को जाता है जिन्होंने वित्त रहित शिक्षा नीति का आविष्कार किया। परिणाम यह हुआ कि बडे पैमाने पर ऐसे शिक्षण संस्थान खोले गये, जिनका कोई आधार नहीं था। आधारभूत संरचना एवं शिक्षकों की कमी से जुझते बिहार की शिक्षा व्यवस्था के पास कोई विकल्प नहीं था। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भी अपने कार्यकाल के दौरान वित्त रहित शिक्षा नीति को कायम रखा। इसके दुष्परिणाम अटल सत्य के रूप में सामने आये।

लालू प्रसाद के बाद सत्ता में आये नीतीश कुमार ने वित्त रहित शिक्षा नीति को नया आयाम दिया। उन्होंने वित्त रहित शिक्षण संस्थाओं को वित्त संपोषित करने का फार्मूला खोज निकाला। तय यह किया गया कि जो वित्त रहित संस्थायें जितना अच्छा परिणाम देंगी, उन्हें उतनी सरकारी सहायता मिलेगी। साथ ही उन्होंने यह सुविधा कुकुरमुत्ते के तर्ज पर खोली गयी निजी शिक्षण संस्थानों को भी दे दी।

इसके बाद तो जैसे होड सी लग गयी। वर्ष 2007 के बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम देखें तो यह बात आसानी से समझा जा सकता है कि किस तरह से निजी संस्थानों ने मनमानी की। जबकि सरकारी स्कूलों एवं कालेजों का प्रदर्शन लगातार गिरता चला गया। वहीं राज्य सरकार ने भी इसका जमकर राजनीतिक उपयोग किया।

मसलन सूबे में नारी सशक्तिकरण के दावे को साबित करने के लिए परीक्षाओं में लडकियों को प्राथमिकता के आधार पर प्रोजेक्ट किया जाने लगा। जब सवाल उठे तब जाकर राज्य सरकार सचेत हुई। लेकिन उसकी यह सचेतना पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव के मद्देनजर समाप्त हो गयी।

खैर इस पूरे मामले में तथाकथित स्वायत्त संस्थान बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की भूमिका पहली बार कटघरे में तब आयी जब समिति पर निजी कालेजों को मान्यता दिये जाने की जिम्मेवारी सौंपी गयी। इसके अलावा समिति के अध्यक्ष पद को लेकर भी जमकर राजनीति की गयी। मसलन इसके अध्यक्ष पद को बौद्धिक के बजाय राजनीतिक बना दी गयी। एक जीता जागता प्रमाण यह कि बोर्ड दो लगातार पूर्व अध्यक्ष क्रमशः प्रो राजमणि प्रसाद और प्रो लालकेश्वर प्रसाद सिंह दोनों जाति के कुर्मी हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा के वासी हैं।

वैसे श्री कुमार की स्वजातीयता और जिलावाद का यह कोई एकमात्र उदाहरण नहीं है। प्रो लालकेश्वर प्रसाद सिंह के मामले में तो यह उसी वक्त साफ हो गया था जब उन्हें बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। तब उनकी पत्नी प्रो उषा सिन्हा नालंदा के हिलसा से जदयू की विधायक थीं।

बहरहाल इस वर्ष इंटर परीक्षाओं साइंस एवं आटर््स के टापर घोटाले ने बोर्ड में वर्षों से चली आ रहे भ्रष्टाचार की पोल खोल दी। मीडिया की सक्रियता के कारण सारा सच सामने आया। सरकार ने भी आनन फानन में एसआईटी का गठन कर मामले की जांच शुरू कर दी। हालांकि जांच के दौरान भी राजनीतिक खेल खेला गया।

खासकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस पूरे मामले में बच्चा राय के बहाने राजद प्रमुख लालू प्रसाद पर निशाना साधा। लेकिन जैसे ही जवाब में राजद ने गिरिराज ंिसह और बच्चा राय की तस्वीर को साझा किया, भाजपा पीछे हट गयी। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने यह साबित कर दिया कि अमित कुमार उर्फ बच्चा राय की पैठ सभी दलों के नेताओं के पास है।

बहरहाल इस पूरे मामले में अब दो पक्ष हैं। धवल पक्ष यह कि घोटाले के सारे अभियुक्त जेल में हैं और सूबे के तेज तर्रार आईएएस अधिकारी आनंद किशोर के नेतृत्व में सरकार आपरेशन क्लीन अभियान चला रही है। दूसरा नकारात्मक पहलू यह है कि आटर््स टापर रूबी राय और साइंस टापर सौरव श्रेष्ठ को जेल भेज दिया गया। यहां किशोर न्याय प्रणाली के अस्तित्व पर भी सवाल उठता है। लेकिन इससे भी बडा सवाल बिहार की शिक्षा व्यवस्था का है जो सरकारी कार्यप्रणाली व राजनीति के कारण रसातल में जा पहुंचा है।

अपनी बात: सपनों और चुनौतियों के साथ

दोस्तों, सबकुछ एक सपने के सच होने के जैसा है। हर पल के संघर्ष के बीच जीवन में कब सुबह से दुपहरी हो गयी, पता ही नहीं चला। खास बात यह है कि जीवन में जेठ की दुपहरी भी अब रास आने लगी है। इसका श्रेय मेरे परिजनों और आप सभी मित्रों को जाता है। आज का दिन मेरे लिए इसलिए भी खास है क्योंकि आज के ही दिन नौ वर्ष पहले अपना बिहार मेरे जेहन में आया। लेकिन इसे सच बनाने में जिन तीन अभिभावकों ने मेरा साथ दिया उनमें रमेश यादव सर, राज दूबे भाई और दीपक पांडेय सर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। उनके कारण यह सफर शुरू हो सका। आज फिर इन सभी और आप सभी के प्रति आभार प्रकट करता हूं।

व्यक्तिगत तौर पर मुझे इस बात का गर्व भी है कि आपके अपना बिहार ने पिछले नौ वर्षों में कामयाबी हासिल किया है। एक छोटे से प्रयास के कारण वैकल्पिक मीडिया के क्षेत्र में वंचितों की आवाज आप सभी तक रोजाना पहुंचाने का प्रयास करता हूं। हालांकि इसकी भी अपनी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों में सबसे बडी चुनौती आर्थिक है। लेकिन मैं अपने परिवार के प्रति सम्मान प्रकट करता हूं कि उनके कारण घर की परेशानियों ने अपना बिहार को प्रभावित नहीं किया है।

बहरहाल चुनौतियां हैं तो आप सभी का बहुमूल्य साथ भी है। जैसे जीवन में दुखों का पहाड है तो खुशियां भी हैं। मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है कि आपका अपना बिहार अपने सिद्धांत के साथ पूरी मजबूती के साथ कायम है। यही मेरे जीवन की सार्थकता है। एक बार फिर आप सभी के प्रति दिल से आभार - नवल किशोर कुमार, संपादक, www.apnabihar.org

एनएसजी मामले में मीसा ने नरेंद्र मोदी को घसीटा, सुषमा को बताया सबसे बेहतर, सुषमा स्वराज ने भी बढ़ाया हाथ

पटना (अपना बिहार, 26 जून 2016) - एनएसजी में भारत की दावेदारी समाप्त होने के मामले में नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद डा. मीसा भारती ने जहां एक ओर इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक विफलता की संज्ञा दी। वहीं दूसरी ओर उन्होंने ट्वीटर पर जारी अपने संदेश में कहा कि नरेंद्र मोदी ने सुषमा स्वराज को पीछे कर एनएसजी मामले में सारा श्रेय खुद लेने की साजिश रची। जबकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज मोदी मंत्रिमंडल में सबसे सक्षम कैबिनेट मिनिस्टर हैं।

खास बात यह है कि डा. मीसा भारती के ट्वीटर संदेश को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी लाइक किया और उन्होंने उन्हें राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने पर शुभकामनायें दी। साथ ही उन्होंने कहा कि विदेश नीति को लेकर उनकी समझ और सोच स्वागत योग्य है। श्रीमती स्वराज ने डा. मीसा भारती को बातचीत के लिए आमंत्रित भी किया। जवाब में राजद सांसद ने उनके प्रति आभार व्यक्त किया।

अपनी बात: भारत नहीं, नरेंद्र मोदी की हार

दोस्तों, नरेंद्र मोदी के कुछ अंधभक्त बुद्धिजीवी यह दलील दे रहे हैं कि एनएसजी की सदस्यता नहीं मिलना नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि भारत की हार है। वे प्रधानमंत्री को इस बात के लिए श्रेय देना चाहते हैं कि उन्होंने कम से कम इसके लिए प्रयास तो किया।

अब जबकि यह सामने आ चुका है कि दो वर्षों में करीब 39 देशों की सैर करने वाले (किसी किसी देश की कई बार चक्कर लगाने वाले) प्रधानमंत्री की कोशिशों के बावजूद एनएसजी की सदस्यता भारत को नहीं मिल सकी। सवाल उठता है कि आखिर कमी कहां रह गयी और एक सवाल यह भी कि इस प्रयास की आवश्यकता क्या थी। एनएसजी यानी ऐसे देशों का समूह जो परमाणु सामग्री का व्यापार कर सके। भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश है और इस नाते वह भी एनएसजी का सदस्य बनने की अहर्ता रखता है। कल्पना करिए कि यदि भारत को यह सदस्यता मिल जाती तो क्या होता। भारत का परमाणु व्यापार आगे बढता और सबसे अधिक फायदा नरेंद्र मोदी को होता। इस एक सफलता से वह अपने कार्यकाल के पहले दो वर्षों की विफलता को बडी आसानी से सफलता में तब्दील कर सकते थे। लेकिन इससे भारत की उस जनता को क्या हासिल होता जो आये दिन बढती महंगाई और बेरोजगारी से परेशान है।

अब बात उस कमी की जिसके कारण इंटरनेशनल मंच पर भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पडा। हमारे पीएम विदेशों में तालियां बजवाते फिर रहे थे। वे चीन की कूटनीति को हल्के में ले रहे थे। उनका मानना था कि उनके आका यानी अमेरिकी राष्टपति बराक ओबामा जाते-जाते उन्हें कामयाबी दिला देते। हालांकि अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसी महाशक्तियों ने एनएसजी के सवाल पर भारत का साथ दिया जो एक तरह से उनकी मजबूरी थी। मजबूरी इसलिए भी कि इन तीनों देशों में परमाणु निशस्त्रीकरण का आंदोलन सफल आंदोलन बन चुका है और वे अपना हित साधने के लिए भारत जैसे देश का सहारे परमाण्विक साम्राज्य बनाये रखना चाहते हैं। यदि भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल भी जाती तो उसकी स्थिति परमाण्विक उपनिवेश से अधिक कुछ भी नहीं होती।

बहरहाल वैदेशिक मोर्चे पर विफल भारत को यह सीख लेनी चाहिए कि जो व्यक्ति अपने पडोसियों के साथ अच्छे रिश्ते रखता है, वह सबसे अधिक मजबूत स्थिति मे रहता है। नरेंद्र मोदी की सबसे बडी कूटनीतिक विफलता यही है कि आज की तारीख में कोई भी पडोसी देश भारत के साथ नहीं खडा है। फिर चाहे वह चीन हो, पाकिस्तान हो, नेपाल या फिर श्रीलंका या बांग्लादेश ही क्यों न हो। रही बात चीन के विरोध की तो वह किसी भी सूरत में भारत को अमेरिकी उपनिवेश बनने नहीं देगा। इसकी वजह भी विदेशों में अपने जुमलों पर तालियां बजवाने वाले पीएम नरेंद्र मोदी भी जानते हैं। यदि वे नहीं जानते तो इसे एक व्यक्ति की बददिमागी कही जानी चाहिए। संपूर्ण भारत की मानसिकता नहीं।

दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के साथ हकमारी न करे केंद्र

राजद प्रमुख ने पीएम को लिखा तीखा पत्र

पटना (अपना बिहार, 25 जून 2016) - केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नियुक्ति में आरक्षण में केंद्र द्वारा कटौती को लेकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने एक बार फिर केंद्र सरकार पर तीखा वार किया है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा कि मैं आपका ध्यान 3 जून को प्रकाशित मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सर्कुलर की ओर ले जाना चाहता हूँ, जिसमें यह कहा गया था कि प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर की नियुक्तियों में पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण समाप्त कर दिया गया है।

राजद प्रमुख ने कहा कि इसे लेकर बहुसंख्यक वर्ग के लोगों में संशय की स्थिति यथावत बनी हुई है। लोगों में यह शंका घर कर गई है कि नियमों और प्रावधानों की अनदेखी करते हुए जानबूझकर पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों की हकमारी की जा रही है। उन्होंने श्री मोदी से कहा कि इस अविश्वास की स्थिति का अंत करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय से इस विषय में पूरी जानकारी मांगें और स्वयं इसपर अपने विचार स्पष्ट करें।

उन्होंने श्री मोदी से कहा कि वे जानकारी दें कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्ग से कितने प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हैं और उनकी कुल संख्या उन्हें मिलने वाली आरक्षण के अनुपात में है या नहीं। यह जगजाहिर है कि सुनियोजित तरीके से आरक्षण के हकदारों को आरक्षण से वंचित किया जाता हैे बहुसंख्यक वर्ग यह जानने का इच्छुक है कि क्या प्रधानमंत्री इस यथार्थ से परिचित है भी या नहीं !

उन्होंने कहा कि कुछ दिनों पहले अनुसूचित जनजातियों के विद्यार्थियों को मिलने वाली फेलोशिप को भी यह हवाला देते हुए रोक दिया गया कि इसके लिए धनराशि की कमी है। प्राय: कम धनराशि का हवाला कमजोर वर्ग के लोगों से जुडी योजनाओं में ही क्यों दिया जाता है? और वह भी उनकी शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण क्षेत्र से जुडी योजनाओं के लिए कम पड़ जाती हैं जो उनके जागरण और उत्थान के लिए अपरिहार्य हैं ? क्या देश के संसाधन और खजाने पिछड़े, दलितों और आदिवासियों की बारी आते आते समाप्त हो जाते हैं? क्या सरकार के पास लगभग 650 आदिवासी छात्रों को उच्च शिक्षा में फेलोशिप देने के लिए 80-85 करोड़ नहीं हैं? वहीं दूसरी ओर सरकार की नाक के नीचे हजारों करोड़ का घालमेल करके बड़े बड़े उद्योगपति आसानी से विदेश भाग जाते हैं।

राजद प्रमुख ने कहा कि बिहार चुनावों के दौरान भाजपा की मार्गदर्शक दक्षिणपंथी वैचारिक संस्था आरएसएस प्रमुख ने आरक्षण को हटाने की बात कही थी। मानों उन्हीं के दया दृष्टि के कारण देश के बहुसंख्यक वर्ग को आरक्षण मिला हो। उस बयान की छाया में सरकार के इन कदमों को देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार आरएसएस के बताए मार्ग पर चल पड़ी है। उन्होंने कहा कि जब पीड़ा और बीमारी ही खत्म हो जाएगी तो इलाज बंद करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगीे। चोरी छुपे आरक्षण हटाने की यह दक्षिणपंथी चाल शायद एक बहुत बड़े निर्णय के पहले देश की बहुसंख्यक आबादी के संयम और प्रतिक्रिया को नापने तौलने की कोशिश है।

उन्होंने कहा कि हम आन्दोलन करते हुए राजनीति में आए हैं। हमारे लिए राजनीति आन्दोलन का दूसरा नाम है। मंडल कमीशन को लागू करने के लिए हमने संघर्ष किया, सडकों पर उतरे। पर आज भी मंडल कमीशन के कई सिफारिशों को अमलीजामा नहीं पहनाया गया है, पर आरक्षण और मंडल कमीशन के जिन भी प्रावधानों को लागु किया गया है अगर उनपे ही आँच आने लगे, तो सडकों पर उतरने में क्षण भर भी नहीं सोचेंगे।

उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने हजारों सालों तक तिरस्कार और जिल्लत सहा हो, उनको मिलने वाली आरक्षण से 20-25 साल में ही लोगों को इतनी तकलीफ पहुँचने लगी है। अगर कोई आरक्षण विरोधी हैं तो वो अस्पृश्यता, तिरस्कार, जातिवाद, वर्ण व्यवस्था और क्रूर अन्यायपूर्ण पारम्परिक सोच का पक्षधर हैं। यहाँ सब दिखावे के लिए राम के अनुयायी तो हैं लेकिन शबरी के झूठे बैर खाने से परहेज करते हैें।

केंद्र की घोषणा के बावजूद उठ रहे सवाल, महात्मा गांधी सेतु को लेकर पहले भी चलती रही है कवायद, अलग-अलग कंसलटेंटों ने दिया है अलग-अलग प्राक्कलन, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने पहले ही दे दिया है अल्टीमेटम

पटना (अपना बिहार, 24 जून 2016) - सवाल उत्तर बिहार और शेष बिहार को जोड़ने वाले सबसे महत्वपूर्ण महात्मा गांधी सेतु का है। बुधवार को केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने इसकी मरम्मति के लिए कुल 1742 करोड़ रुपए के व्यय को मंजूरी दी है। साथ ही केंद्र सरकार द्वारा 6000 करोड़ रुपए से महात्मा गांधी सेतु के समानांतर एक और पुल के निर्माण की घोषणा भी की गयी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इससे पहले भी महात्मा गांधी सेतु की मरम्मति को लेकर कवायदें चलती रही हैं। इसके अलावा केंद्र एवं राज्य सरकार के द्वारा नियुक्त अलग-अलग परामर्शदात्री संस्थाओं ने अलग-अलग प्राक्कलन तय किया है।

हिंज बेयरिंग टेक्नोलाजी पर बने इस पुल की सेहत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। चीन में बने इसी तरह के दो पुल ध्वस्त हो चुके हैं। राजधानी पटना में बना यह पुल भी पिछले एक दशक से बीमारावस्था में है। अब हालत यह हो गयी है कि पुल का बायां लेन पूरी तरह तोड़ दिया गया है। एक लेन के सहारे जैसे-तैसे यातायात जारी है।

अभी हाल ही में महात्मा गांधी सेतु के एक्सटेंशन में खराबी आ जाने के कारण एक पाया धंस गया था, जिसके कारण सरकार सकते में आ गयी थी। इस संबंध में विभागीय मंत्री सह उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने साफ कह दिया था कि राज्य सरकार की ओर से पुल की मरम्मति के लिए केंद्र सरकार से बार-बार अनुरोध किया गया है, लेकिन वह गंभीर नहीं हो रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि पुल पर कोई घटना घटती है तो इसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेवार होगी।

संभवत: उपमुख्यमंत्री सह पथ निर्माण विभाग के मंत्री तेजस्वी यादव द्वारा महात्मा गांधी सेतु के जीर्णोद्धार हेतु बार-बार केंद्र सरकार से मांग किये जाने के कारण ही केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने महात्मा गांधी सेतु के लिए 1742 करोड रूपए के व्यय को मंजूरी दे दी। इसके अलावा केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी सेतु के समानांतर ही एक और नये पुल के निर्माण के लिए भी 6000 करोड रूपए के व्यय को मंजूरी दी।

केंद्र सरकार के इस पहल का उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने स्वागत किया है। इस संबंध में उन्होंने कहा कि सवाल 1742 करोड़ रुपए के आवंटन का नहीं है। महात्मा गांधी सेतु की मरम्मति की जिम्मेवारी केंद्र सरकार की है। वह एक रुपए में इसकी मरम्मति करवाये या 1742 करोड़ रुपए में। इससे राज्य सरकार को कोई लेना-देना नहीं है। राज्य सरकार को केवल पुल के ठीक होने से मतलब है। वहीं केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी सेतु के समानांतर एक और पुल बनाये जाने को 6000 करोड़ रुपए की घोषणा के संबंध में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने इसकी अभी घोषणा की है। यह बिल्कुल वैसा ही जैसा कि विधानसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने बिहार को 1 लाख 65 हजार करोड़ रुपए का महा पैकेज देने का एलान किया था।

बहरहाल, मूल मामला महात्मा गांधी सेतु की सेहत और उत्तर बिहार के लोगों से जुड़ा है। सेतु पर जाम के कारण राजधानी पटना की ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा जाती है। लाखों लोग इस जाम के कारण प्रभावित होते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही केंद्र सरकार अपनी घोषणा को क्रियान्वित करेगी ताकि लोगों को जल्द से जल्द रोज-रोज होने वाली परेशानी से मुक्ति मिल सके।

बाहरी और भीतरी के बारुद पर खड़ा झारखंड

-मुकेश भारतीय

आज झारखंड के शहरी हलकों के किसी गांव में देखिये। हर कोई अपनी जमीन बेच रहा है और एक बड़ा तबका उसकी दलाली में जुटा है। अचानक दरिंदगी के कारण सुर्खियों में आये नेवरी गांव के पीपरचौड़ा बस्ती की घटना को लीजिए। पूरा मामला दो जमीन दलाल गिरोह की है। आपसी लेन-लेन में एक गिरोह दूसरे गिरोह के सरगना को रात अंधेरे बुलाकर हत्या कर देता है। उसके प्रतिशोध की आग पूरी बस्ती में तबाही मचा देता है। समूचे पुलिस प्रसाशन को अस्त व्यस्त कर डालता है। थाना प्रभारी पर जानलेवा हमला होता है। उन्हें लोगों की सुरक्षा करने के बजाय खुद की जान बचाने को तीन किमी भागना पड़ता है। डीएसपी, एसपी की फौज के सामने अग्निशमन दस्तों को प्रवेश करने नहीं दिया जाता है। मीडिया कर्मियों को भी दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाता है। उनके कैमरे तोड़ आग के हवाले कर दिया जाता है।

अपनी ढाई दशक की पत्रकारीय जीवन में पहली बार एक खास समुदाय के दो गुटों के बीच बाहरी-भीतरी के मुद्दे पर इतने आक्रामक तेवर में देखा है। अमुमन इस समुदाय में इस तरह की समस्याएं देखने को नहीं मिलती है। अगर आप ईरबा, नेवरी या पीपराचौड़ा समेत अनेक स्थानों की पड़ताल करेगें तो साफ स्पष्ट होगा कि असम से कोई एक या दो जाकिर नहीं, बल्कि देश के अन्य प्रांतों से लेकर बांगला देश और सउदी अरबिया तक के बसे लोग मिल जायेगें। वे कब आकर बसे और कब मजबूती से उभर गए। किसी को कुछ पता नहीं चलता। किसी का कहीं आकर बसना या किसी का बसाना, यह बहस का मुद्दा नहीं है। लेकिन सबाल उठता है कि जब यह खेल होता है तो समाज के उपद्रवी भेड़िए कहां छुपे होते हैं।

पीपरा चौड़ा बस्ती में जमीन दलाल नसीम की हत्या के बाद बाहरी वनाम स्थानीय की आन पर लोग उग्र हो उठे। हिंसा पर किसी कट्टर गुट का उग्र होना स्वभाविक है। लेकिन यह उग्रता हिंसा मचाने के लिए नहीं, अपितु लूट-पाट मचाने के लिए थे। हत्या में जब साथी जमीन दलाल के शामिल होने की बात साफ थी तो फिर समूचे गांव को निशाना क्यों बनाया गया ? हमलावर गांव के लोगों को जाहिलता की श्रोणी में भी नहीं रखा जा सकता। ये ऐसे उपद्रवी हैं, जिनकी विक्षिप्त मानसिकता है कि पहले बसाओ। और फिर उनकी खुशहाल हालत को छीन लो। यहां हर तरफ यहीं सब दिख रहा है।

नेवरी गांव हो या पीपरा चौड़ा बस्ती। यहां मेहनत कश लोग भी हैं, जो दलाली-मक्कारी कर ऐय्यासी करते नहीं फिर रहे हैं बल्कि, वे अपनी खून-पसीने की कमाई से एक घर और उसमें बसे भविष्य को संवारने की आमरन आकांक्षा रखते हैं। क्या किसी एक अपराधी के करतूत की सजा उस पूरे समाज पर प्रहार है। अगर पीपरा चौड़ा का एक जाकिर दरिंदा है तो नेवरी के सैकड़ों उपद्रवी लुटेरों को क्या कहा जाए। जिन्होंने बेकसूर लोगों के घरों में आग लगा दी। उनकी जीवन भर की कमाई छीन ली। उन्हें खुले आसमान में दर दर की ठोकरें खाने को लाचार कर दिया। इनकी हिम्मत तो देखिए कि जो भीड़ रात अंधेरे प्रतिशोध में तबाही मचाती है, वही भीड़ दिन उजाले शव के साथ प्रदर्शन कर न्याय और मुआवजा की मांग करती है। हत्यारों के साथ इन उपद्रवियों पर भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

सबसे बड़ी बात कि समुदाय या संप्रदाय कोई हो। देश में कहीं भी किसी को गुजर बसर का हक-हकुक है। यह हमारे संविधान की मूल भावना जीने का अधिकार में निहित है। मगर आज इसे क्षेत्रीय स्तर पर मरोड़ा जा रहा है। कूपमंडूक नेता इसे दिन रात हवा देते रहते हैं। उन्हें लगता है कि झारखंड एक संघीय प्रांत का हिस्सा नहीं, उनकी खुद की राष्ट्रीय जागीर है और इसके रक्त बीज गांव तक आ पहुंचा है। एक मोहल्ला वाले दूसरे मोहल्ले वाले को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। एक गांव की भौंए हमेशा पड़ोस की गांव पर तनी रहती है। एक जेवार के खिलाफ दूसरे जेवार वाले हमेशा लाठी लिए तैयार खड़े मिलते हैं। आखिर इस मानसिकता का अंत क्या है।

इस संदर्भ में हाल की एक वाक्या है। एक कार्यक्रम को लेकर जो दिखा, उसे लेकर एक खबर लिखा। उसे लेकर पहले केन्द्र व राज्य सत्ता से जुड़े सांसद पुत्र ने रात अंधेरे बुलाकर ढेर सारी धमकियां दी। अहले सुबह उनके कुछ गुर्गों ने गाली-गलौज की। उसके चंद मिनट बाद ही खुद सासंद महोदय बीच सड़क पर बुला कर चीख-चीख कर गालियां देते हुए चेतावनी दी कि रहना है तो सही से रहो वर्ना बांस करके भगा देगें। ..स्स्ला, बिहारी लोग जिस थाली में खाते हो, उसी में छेद करते हो। अब एक वरीय जनप्रतिनिधि की इस मानसिकता को भलिभांति समझा जा सकता है। यहां रहने वाले हर कोई नेता की थाली में ही खाता है? उनके सामने धरती और आसमान कोई मायने नहीं रखता। 20 साल में ही बिहारी अपने ही कर्मभूमि से बाहरी हो गया! जबकि मैं बिहार के इस हलके में उस वक्त से हूं, जब झारखंड राज्य की कल्पना मात्र थी।

जाहिर है कि हर जाति, वर्ग और मजहब के ऐसे ही नेताओं की मानसिकता यहां के नई पीढ़ी में भी भर रहा है और जब तक यह मानसिकता बनी रहेगी, किसी एक अपराध की आड़ में पीपरा चौड़ा जैसी उपद्रवी घटनाएं पनपती रहेगी। (लेखकः मुकेश भारतीय पिछले ढाई दशक से लेखन व पत्रकारिता में सक्रिय हैं और फिलहाल राजनामा डॉट कॉम के संचालक संपादक हैं।)

संपादकीय: आधुनिक भारत के नये जयचंद

दोस्तों, निष्पक्ष इतिहास की सबसे बडी खासियत यह होती है कि वह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं के बारे में जानकारी देता है। मसलन एक इतिहास जयचंद का भी है। खास बात यह है कि जयचंद सरीखे लोग लगभग हर कालखंड में पैदा होते रहे हैं और देश को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पडती रही है। सबसे दिलचस्प यह है कि नवउदारवादी दौर में जयचंदों की बाढ आ गयी है। वर्तमान में इसका अगुआ स्वयं देश का प्रधानमंत्री है।

इसका जीता जागता प्रमाण नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा रक्षा के क्षेत्र में सौ फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी देना है। साथ ही सरकार ने फार्मा एवं एविएशन के क्षेत्र में भी एफडीआई को मंजूरी दी है। इसके कई परिणाम सामने आयेंगे। इसका सकारात्मक पहलू यह संभव है कि भारत में भी अत्याधुनिक हथियार वगैरह निर्माण हो सकेंगे। सामरिक नजरिये से यह एक बेहतरीन निर्णय माना जा सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू बहुत ही खतरनाक है। यह एक प्रकार से देश की संप्रभुता को गिरवी रखने के समान है। ब्राडकास्टिंग के क्षेत्र में भी सौ फीसद एफडीआई को मंजूरी दी गयी है। इसका सकारात्मक पक्ष यह संभव है कि देश के मौजूदा मीडिया घरानों का वर्चस्व टूटेगा और देश में मीडिया का नया स्वरूप सामने आयेगा। लेकिन इस बात की गारंटी सरकार भी नहीं दे सकती है कि जो विदेशी देश की मीडिया में अपनी पूंजी लगायेंगे, वे भारतीय हितों की उपेक्षा नहीं करेंगे। वर्तमान में भी अम्बानी के वर्चस्व वाली मीडिया संस्थानों का रवैया हमारे सामने है।

बहरहाल केंद्र सरकार के फैसले के कारण रक्षा, एविएशन एवं अन्य क्षेत्रों में भारत का बाजार खुल चुका है। सरकार ने रेड कारपेट बिछाकर विदेशी निवेशकों का स्वागत करने की तैयारी शुरू कर दी है। लेकिन सबसे बडा सवाल रक्षा क्षेत्र का है। यदि यही विदेशी ताकतों के कब्जे में रही तो फिर देश की संप्रभुता का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। दो वर्षों के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी द्वारा सात बार ओबामा की परिक्रमा करना बहुत कुछ साबित करता है।

शिक्षा की बुनियाद मजबूत करता "कहानी घर"

पटना (अपना बिहार, 20 जून 2016) - हाल के दिनों में सूबे में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े हो गये हैं। हालांकि ये सवाल आम जनता के समक्ष बहुत पहले ही सुरसा की भांति मुंह फैलाये हैं। इन सबके बावजूद सूबे में कई गैर सरकारी संगठनों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में नायाब प्रयास किये जा रहे हैं। इनमें से एक प्रयास कहानी घर का भी है।

जीवन के गूढ़ सिद्धांत अपनी कल्पना के जरिए कैनवास पर उतारने वाली चर्चित चित्रकार मीनाक्षी झा बनर्जी और उनके पति रॉनी बनर्जी ने मिलकर वर्ष 2014 में कहानी घर की शुरूआत की थी। वे बताते हैं कि कहानी घर की पूरी परिकल्पना आज के नौनिहालों में रंग भरने की थी। फिर बात शिक्षा से लेकर बच्चों के मौलिक अधिकारों तक हुई और अंतत: हमने यह तय किया कि हम शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर काम करेंगे। वह भी उस तरीके से ताकि बच्चे स्वच्छंद हो अपनी सृजनात्मकता का विकास कर सकें।

मीनाक्षी बताती हैं कि कहानियां जीवन में एक साथ कई रंगों का समावेश करती हैं। बच्चों के लालन पालन में कहानियों की अहम भूमिका है। इसलिए हमलोगों ने अपने प्रयास को कहानी घर का स्वरूप दिया। यहां आने वाले बच्चों को हम निशुल्क उनके विषय के साथ ही चित्रकारी, संगीत आदि का प्रशिक्षण देते हैं। इसके अलावा हम बच्चों को कहानियां सुनाते हैं।

मीनाक्षी ने बताया कि इस काम में समाज के लोग अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं। उन्होंने बताया कि कहानी घर में अबतक कई नामचीन साहित्यकार और कलाकार बच्चों को अपनी कहानियां सुना चुके हैं। उन्होंने बताया कि कहानियों के कारण बच्चों में सृजनात्मक क्षमता का विकास होता है। कहानी घर में बच्चों को इसके लिए पूरी मदद भी की जाती है।

बहरहाल मीनाक्षी और रॉनी दोनों चाहते हैं कि राज्य सरकार भी शिक्षा के बुनियादी महत्व को समझे और ऐसी शिक्षा नीति का विकास करे ताकि बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।

राष्ट्रवाद पर विमर्श और महिलाएं : नेहा दाभाड़े

इन दिनों राष्ट्रवाद, भारत में सार्वजनिक विमर्श पर छाया हुआ है। हर ऐसे व्यक्ति, राष्ट्रवाद के संबंध में जिसका दृष्टिकोण वर्तमान राजनैतिक सत्ताधारियों से भिन्न है, पर देशद्रोही का लेबिल चस्पा कर दिया जाता है। परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि हर व्यक्ति देश के प्रति अपने प्रेम और वफादारी को साबित करे। रोहित वेमूला की आत्महत्या के बाद से राष्ट्रवाद में जाति के स्थान पर भी बहस छिड़ गई है। हाशिए पर पड़े अन्य समूहों, जिनमें मुसलमान और ईसाई शामिल हैं, को बाहरी बताकर उनका दानवीकरण किया जा रहा है। उन पर जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप लगाया जा रहा है और भारत के प्रति उनकी वफादारी पर संदेह प्रगट किए जा रहे हैं। अभी हाल में कुछ लोगों ने जेएनयू को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताया था। Read More>>>

अपनी बात: पिता दिवस की सार्थकता

दोस्तों, जिस देश में हर दिन कोई न कोई पूजा-पाठ का योग होता हो, वहां पिता दिवस मनाने की नयी परंपरा को गलत नहीं कहा जा सकता है। इसकी भी सामाजिक और आर्थिक वजहें हैं। खासकर नवउदारवादी युग में पिता शब्द का महत्व अधिक बढ गया है। सीधे शब्दो में कहें तो पिता होने का मतलब ही संतानों एवं परिवार के सभी सदस्यों के भरण-पोषण की हर जिम्मेवारी को वहन करने वाला इंसान। इसके बावजूद पिता कहलाने वाला इंसान स्वयं ही अपने उम्र के अंतिम चरण में बेबस हो जाता है। नारी विमर्श के पैरोकारों के लिए पिता की मजबूरियां और उसकी चुनौतियां कोई मायने नहीं रखती हैं। यह सामान्य सोच है कि पिता को सभी जिम्मेवारियों का वहन करना ही है। फिर चाहे वह जैसे करे।

दूसरी ओर देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आ रहा है। सरकार के द्वारा भी महिलाओं के सशक्तिकरण के सारे प्रयास किये जा रहे हैं। यह सकारात्मक पहल है। हालांकि इसकी कई विमायें हैं, जिनका पूरी गंभीरता के साथ अवलोकन महत्वपूर्ण है। खासकर तेजी से बदलता आर्थिक सिनेरियो इसे और चुनौतीपूर्ण बनाता है। वही पारंपरिक चुनौतियां भी अपनी जगह बरकरार हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, इसकी तमन्ना हर माता-पिता करते हैं, लेकिन यह दिनोंदिन महंगा होता जा रहा है। वैसे सवाल केवल बच्चो के शिक्षा-दीक्षा तक ही सीमित नहीं है। आज के संतान अपने पिता से विरासत में बहुत कुछ की उम्मीदें रखते हैं। यदि कोई पिता उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो उसे अपने ही संतानों के द्वारा उस समय प्रताडित होना पडता है, जब वह स्वयं कुछ भी कर पाने में असमर्थ होता है।

बहरहाल पिता होने के अपने नुकसान-फायदे हैं। परंपरायें और रस्म रिवाज भी हैं। आज एक मौका है जब हम अपने पिता की चुनौतियों में उनका साथ दें और उनके द्वारा किये गये श्रम का सम्मान करें जिनके कारण आज हम हैं। संभवतः पिता दिवस की यही सार्थकता है। आप सभी को फादर्स डे की हार्दिक शुभकामनायें।

जमीन गयी, मुआवजा खत्म और अब खाने के लाले

पटना (अपना बिहार, 17 जून 2016) - पूरा मामला मानवीय मूल्यों का है। करीब आठ वर्ष पहले राज्य सरकार ने राजधानी पटना के बिहटा के पास सैंकड़ों किसानों से जमीन अधिग्रहित कर आईआईटी निर्माण के लिए केंद्र सरकार को दिया था। जिन किसानों का जमीन अधिग्रहित किया गया, उनमें बड़ी संख्या में वे भूस्वामी भी थे, जिनके पास एक कट्टा से लेकर दस कट्ठा तक कुल जमीन थी। उस समय जो सरकार ने मुआवजा दिया था वह वर्तमान के जैसा नहीं था। स्थानीय दिलावरपुर के पीड़ित सुरेंद्र यादव के मुताबिक वे तीन भाई हैं और तीनों भाईयों में कुल मिलाकर एक बीघा जमीन थी। सरकार ने सब जमीन ले लिया। बदले में उस समय के सरकारी दर 36 हजार रुपए प्रति कट्ठा की दर से राज्य सरकार द्वारा भुगतान किया गया। इस प्रकार सभी भाईयों के हिस्से में करीब सवा दो लाख रुपए प्राप्त हुए।

सुरेंद्र यादव के अनुसार राज्य सरकार ने जो मुआवजा दिया था वह बहुत पहले ही विभिन्न पारिवारिक कार्यों में खर्च हो गया। वर्तमान में उनके परिवार के पास भूखों मरने की नौबत है। पहले जब एक बीघा अपनी खेती थी तब इजारा और पट्टा पर खेत लेकर खेती करते थे। इस प्रकार खेती से घर के लिए अनाज उपजा लिया करते थे। लेकिन अब चूंकि सारी जमीन सरकार ने अधिग्रहित कर लिया है, खेती का नामो निशान समाप्त हो गया है।

वहीं दिलावरपुर के ही दूसरे पीड़ित राजकिशोर प्रसाद की दुखद दास्तान भी यही है। उन्होंने बताया कि पहले वे अपने खेतों में खेती करते और समय मिलने पर गाय-भैंस पालते थे। परंतु अब पूरे इलाके में न खेत रहे और न ही चारागाह। परिणाम यह हुआ है कि उनके गांव के सभी लोग अब आजीविका के लिए पूरी तरह दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं।

स्थानीय स्तर पर किसानों के लिए संघर्ष करने वाले किसान नेता रहीश यादव के मुताबिक राज्य सरकार अपने ही भू-अधिग्रहण कानून का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन कर रही है। उन्होंने बताया कि बिहार राज्य भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन कानून 2007 के खंड तीन में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि सरकार जिन भू-स्वामियों से जमीन लेगी और यदि इसके कारण उनकी आजीविका समाप्त होती है तो वह ऐसे लोगों के लिए रोजगार का प्रबंध करेगी। श्री यादव ने बताया कि प्रारंभ में स्थानीय किसानों के संघर्ष के कारण स्थानीय भू अर्जन पदाधिकारी द्वारा लोगों से आवेदन भी लिया गया था। लेकिन कुछ नहीं किया गया।

श्री यादव ने बताया कि बिहार सरकार के कानून में ही इस बात का भी उल्लेख है कि भूमि अधिग्रहण के कारण यदि किसी व्यक्ति की सभी जमीन चली जाये तब सरकार उस व्यक्ति को अपनी ओर से पांच डिसमिल जमीन देगी। लेकिन बिहटा के मामले में राज्य सरकार द्वारा अबतक इसका अनुपालन भी नहीं किया गया है।

बहरहाल बिहटा के दिलावरपुर एवं आसपास के अन्य गांवों के लोग अब किसान नहीं रह गये हैं। उनकी स्थिति अपने ही गांव में परदेसियों के जैसे हो गयी है। रोजी-रोजगार खत्म हो जाने के बाद सभी सरकार की तरफ उम्मीद भरी निगाह से देख रहे हैं।

राहे-बाटे : बिहार-झारखंड का अनकहा दर्द

दोस्तों, बिहारवासी होने के नाते बिहार के लिए पीड़ा न तो अप्राकृतिक कही जा सकती है और न ही पक्षपातपूर्ण चिंतन। यह पीड़ा उस समय अधिक असहनीय हो जाती है जब आंखें राजधानी पटना की जगमगाहट सुदूर जिलों में भी देखना चाहती हैं। लेकिन हाल ही में जब मैं झारखंड के हजारीबाग गया तो झारखंड का अनकहा दर्द भी सामने आया।

हजारीबाग जाने का मकसद व्यक्तिगत था। मन ने पहले यह तय किया कि इस बार ट्रेन की यात्रा की जाय। पहले पटना से कोडरमा फिर सड़क मार्ग से कोडरमा से हजारीबाग। जन शताब्दी पटना से सुबह छह बजे खुलती है। मन के निर्देशानुसार मोबाइल में साढ़े चार बजे का अलार्म सेट किया। पढ़ते-लिखते समय दो बज चुके थे। आंखों ने बंद नहीं होने की जैसे कसम खा रखी थी। परंतु मन जीत गया। वह सोना चाहता था।

सोया तो आंखें सात बजे खुलीं।

कोई विकल्प नहीं था। चाय पी। जरूरी दस्तावेज और गृहमंत्री महोदया से आने-जाने का खर्च लिया और नयी-नवेली धन्नो (मेरी मोटरसाइकिल) के साथ निकल पड़ा। जेहन में जो रूट तय था उसके हिसाब से गया होते हुए जाना था। इसलिए बिना पटना शहर की ओर रूख किये गांव से ही दक्खिन हो गया। रास्ते में अपना गांव-अपना इलाका, अपनी धरती एक साथ कई सवाल करते नजर आये। मन आदतवश उन सवालों के घेरे में रहा।

आगे बढ़ा तो पुनपुन नदी मुंह बाये खड़ी मिली। सड़क पर चाय, निमकी-घुघनी की दुकान देख लालच होना स्वभाविक था। परंतु समयाभाव के कारण मन मसोसकर रह जाना पड़ा। फिर मसौढ़ी का तरेगना स्टेशन भी सवाल पूछता नजर आया। मानों कह रहा हो कि कोई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कहे कि तारेगना को लेकर उन्होंने जो वादा किया था, वह पूरा क्यों नहीं हुआ।

सफर के दौरान केवल जगह ही पीछे नहीं छूटते, सवाल भी पीछे छूट जाते हैं। जहानाबाद को देख मन प्रसन्नचित भी हुआ। पहले शांत और सहमा सा रहने वाला जहानाबाद सुबह के साढ़े आठ बजे भी कितनी शक्ति के साथ जयघोष कर रहा था। मखदुमपुर के पहले मई हाल्ट को देख मन को शरारत सुझी। एक सेल्फी ले ली जाय। गैर मगध वासियों को इसकी जानकारी मिले। आगे धरनई मिला। बिहार का पहला सौर ग्राम। जानकर खुशी मिली कि यहां अब परमानेंट वाली बिजली भी आ गयी है।

दो राज्यों की सीमा पर बसे गांवों की पीडा

कभी बिजली के मामले में निर्धन धनरई गांव में अब एक साथ दो-दो श्रोतों से बिजली है। लोगों के चेहरे पर बिजली की रौनक है। हालांकि खेती को लेकर लोगों में निराशा दिखी। आगे बढने पर गया शहर अलसाया नजर आया। पहले से मन में शंका थी कि भीड के कारण गया शहर को पार करने में ही एक घंटा लग जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और गया शहर ने बिना व्यवधान के आगे बढने की अनुमति दे दी। फिर बोधगया और डोभी चेकपोस्ट। मन ने नयी नवेली मोटरसाइकिल की पीडा को समझा और उसे सुस्ताने को छोड मैं भी पूरी-जलेबी का स्वाद लेने लगा। मगध के इलाके में यह एक शानदार नाश्ता है। रसदार सब्जी के साथ पूरी और जलेबी। करीब आधे घंटे तक विश्राम के बाद जीटी रोड फोरलेन के रूप में मेरे सामने था।

जेहन में शेरशाह का ख्याल आया। उनकी दूरदर्शिता के कारण पूरे भारत को जोडने वाली सडक बनी थी। उपर से फोरलेन की स्थिति अच्छी होने के कारण आगे का सफर शानदार रहा। लेकिन जब आप फोरलेन पर चलते हैं तो अमूमन उसके किनारे बसे गांवों का दर्द अनदेखा ही रहता है। आप इसे चाहें तो माया कह सकते हैं। परंतु मेरी आंखें स्पीड मीटर के बजाय खत्म होते जंगलों को देख रही थीं। पहाडों का अस्तित्व समाप्त हो गया था। दूर-दूर तक बंजर खेत गांवों की कहानी बिना कहे ही बता रहे थे।

झारखंड की सीमा में घुसने से पहले उम्मीद थी कि इन इलाकों में सरकार का अस्तित्व दिखेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो राज्यों की सीमा पर बसे इलाकों तक वैसे भी दो पाटन के बीच में पीसते हैं। हालांकि बिहार में पूर्ण शराबबंदी का एक फायदा बरही-चैपारण के लाइन होटलों में दिखा। बडी संख्या में बिहारवासी जश्न मनाते दिखे। वह भी सुबह के साढे दस बजे। शाम के समय इन इलाकों में मंजर की कल्पना आसानी से की जा सकती है।

बरही को लेकर मन में दुविधा थी। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढता गया, दुविधायें दूर होती गयीं। झारखंड के जंगलों से गुजरने वाले रास्तों पर चलकर ईष्या भी हुई। आखिर किन वजहों से बिहार के हिस्से के जंगलों को नेस्तनाबुद कर दिया गया। सडकों पर चलने वाली छोटी गाडियों एवं सार्वजनिक वाहनों में वास्तविक जीवन दिखता है। झारखंड के इस इलाके में भी लोगबाग लटककर जाते दिखे। कई महिलायें भी जुगाड टेक्नोलाजी से बने वाहनों पर सवारी करती दिखीं। पुरूषों के चेहरे पर बेरोजगारी का असर था। जैसे-तैसे जीवन को जीते रहने की विवशता नियति बन चुकी है। जिला चैक पर पहुंचते ही बेबस हजारीबाग नजर आया।

मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना

बिहार की सीमा से लगे हजारीबाग की अपनी खासियत है। हालांकि यह खासियत बिहार के अनेक शहरों में एक साथ देखी जा सकती है। मसलन पटना जंक्शन के ठीक सामने मंदिर और मस्जिद का एक साथ होना इस बात का गवाह है कि धर्मनिरपेक्षता यहां की बुनियाद में है। यही बुनियाद हजारीबाग का भी है। सर्दू भाई से मेरा परिचय वैसे तो बहुत पुराना नहीं है। पहली बार जब मुलाकात हुई तो हजारीबाग के इंद्रपुरी चौक के पास सार्इं मंदिर के नजदीक।

शांत और गंभीर दिखने वाले सर्दू भाई की और भी कई खासियतें हैं। लेकिन हजारीबाग जैसे शहर में अपने आपको सभी के साथ जोड़कर रखने की काबलियत उन्हें अपवाद बनाती है। फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। वह अमीर हो या गरीब। सबके भाई हैं सर्दू भाई।

हजारीबाग पहुंचते-पहुंचते दोपहर के एक बज चुके थे। सर्दू भाई को मोबाइल पर सूचना दी तो आदेश मिला - इंद्रपुरी चौक आ जायें। सार्इं मंदिर के पास। जिला चौक से वहां पहुंचने में करीब पांच मिनट लगे। इस पांच मिनट में हजारीबाग के हजार गुण एक साथ देखने को मिल गये। अधिकांश अच्छे तो कुछ निहायत ही बहुत बुरे।

सर्दू भाई इंतजार कर रहे थे। तय हुआ कि पहले मैं आराम कर लूं। बाकी बातें बाद में। पास में ही एक होटल स्पार्क इन में एक वातानुकूलित कमरा उन्होंने बुक करवाया। अब बारी खाना खाने की थी। रमजान के कारण तय हुआ कि शाम का खाना सर्दू भाई के यहां। दोपहर में होटल के एक कर्मी दिनेश जी से अनुरोध किया तो गर्मागर्म रोटियां और रसदार सब्जी के साथ करेले की भुजिया। भूख लगी थी सो पांच-छह रोटियां खाकर सीधे पसर गया।

एसी की ठंढी हवा ने करीब ढाई सौ किलोमीटर की ड्राइविंग के दर्द को पलभर में गायब कर दिया। अच्छी नींद आयी और जब आंख खुली तो साढ़े चार बज रहे थे। हजारीबाग जाने के उद्देश्य की पूर्ति शेष थी। इसलिए सर्दू भाई को फोन किया। आदेश मिला कि पहले इफ्तार का आनंद लिया जाय और फिर काम।

मेरे पास कोई और काम था नहीं। सो सर्दू भाई का इंतजार करने लगा। टीवी पर झारखंड की खबरें तलाशने लगा तो सिवाय रूटिन खबरों के कुछ भी हाथ नहीं लगा। देश और दुनिया की खबरों से मन उचट चुका था।

करीब साढ़े पांच बजे सर्दू भाई आये। वहीं से सीधे उनके घर। रास्ते में मासूम फहद और प्यारी आलविया के लिए सेलिब्रेशन का पैक मिला। पहुंचा तो एक और प्यारी सी परी शामरीन ने दरवाजा खोला। प्यारी मुस्कराहट के साथ उसकी आगवानी पिता-पुत्री के आत्मीय संबंधों का सुखद अहसास सरीखा लगा। फहद अपनी शैतानी के साथ अप्राकृतिक नहीं दिखे जबकि आलविया की हाजिर जवाबी अतुलनीय रही।

इफ्तार के समय मुझे संकोच हो रहा था। संकोच की वजह यह कि मैं सचमुच नास्तिक हूं। किसी धर्म से मेरा कोई सरोकार नहीं है। फिर भी मैंने पूरी कोशिश की कि सर्दू भाई एवं उनके परिजनों को मेरी नास्तिकता से कोई फक नहीं पड़े। दिल से मैंने भी उनके लिए शुभकामनायें की। फिर इफ्तार का अनोखा स्वाद। दिन भर प्यासे रहने वाले सर्दू भाई की मेहनत मेरे आंखों के सामने थी। यह जीवटता सभी मुसलमान भाईयों में है। यह सोचकर मन हर्षित हो गया।

अब बारी काम की थी। हम हजारीबाग के मुख्य शहर में थे। भीड़भाड़ वाला शहर और बेतरतीब यातायात व्यवहार अनोखा नहीं था। अनोखा था तो सर्दू भाई का सबके साथ अपनापन। सच में मजहब कभी नहीं सिखाता आपस में वैर रखना। सर्दू भाई इसके सच्चे उदाहरण के रूप में दिखे। वाकई यह एक शानदार अनुभव रहा।

लालू की कहानी, लालू की जुबानी

जब पैसे नहीं थे चलाया रिक्शा, खोली थी चाय की दुकान, विशेष बातचीत में राजद प्रमुख ने बताया अपना जीवन संघर्ष

- नवल किशोर कुमार

पटना(अपना बिहार, 12 जून 2016) - पटना विश्वविद्यालय के बी एन कॉलेज में छात्र राजनीति के प्रारंभिक दिनों में मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। तब जरूरत पड़ने पर मैंने रिक्शा चलाया और पटना हाईकोर्ट परिसर में चाय की दुकान भी खोली। ये बातें राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने अपने 69वें जन्मदिवस के दिन विशेष बातचीत में कही।

जन्म दिवस मनाये जाने के बारे में पूछने पर श्री प्रसाद ने बताया कि देश के अन्य गरीबों की तरह ही उनके जन्मदिन का कोई ऐसा रिकार्ड नहीं है। पिताजी और घर के अन्य लोगों ने माणिकपुर स्थित प्राइमरी स्कूल में पढ़ने को भेजा था तब नाम लिखाते समय स्कूल के हेडमास्टर साहब सूर्यबली मिश्रा ने पिताजी से पूछा था। तब उन्होंने मेरी उम्र 6-7 वर्ष बतायी थी। फिर इसी के आधार पर मेरा जन्म दिन 11 जून 1948 तय किया गया।

पहली बार पटना आने के संबंध में श्री प्रसाद ने बताया कि मेरे चचेरे मामा ठग राय पहले पटना में दुध का कारोबार करते थे। उन्होंने ही मेरे भाइयों महावीर राय और मुकुंद राय को पटना बुलाया था। वे भी पहले यहां यही काम करते थे। उन दिनों ही वे मुझे भी पटना ले आये थे। शेखपुरा मोड़ के पास बने प्राथमिक स्कूल में मेरा नाम लिखाया गया। रोज पैदल स्कूल जाता था। उन दिनों ही मेरे भाई महावीर राय और मुकुंद राय को वेटनरी कॉलेज में अस्थायी नौकरी मिली थी। तब उन्हें रोजाना के हिसाब से 11 आना मिलता था। उनका काम गाय के बच्चों की देखभाल करना था। पांचवीं तक शेखुपरा प्राथमिक स्कूल में पढ़ने के बाद मेरा दाखिला बीएमपी-5 स्थित एक स्कूल में कराया गया जहां पढ़े लिखे सिपाही पढ़ाया करते थे। वहीं फुटबॉल खेलना सीखा। वहां सहाय जी हेडमास्टर साहब थे और एक मौलवी साहब शिक्षक बहुत गरम मिजाज के थे। त्रिकोणमिति के सवाल नहीं हल करने पर खूब मारते थे।

श्री प्रसाद ने बताया कि सातवीं में मेरा दाखिला मिलर हाई स्कूल में हुआ। तब मेरी इच्छा डॉक्टर बनने की हुई। डा. बसंत चौधरी तब मेरे सहपाठी थे। उनसे पूछा तो उन्होंने कह दिया कि डॉक्टर बनने पर मुर्दा का चीड़फाड़ करना पड़ता है और बेंग(मेढ़क) को भी चीरना पड़ता है। इस एक बात ने मन से डॉक्टर बनने का ख्याल निकाल दिया। जिन दिनों यह सब चल रहा था तब मैं गाय का दुध देने, चारा काटने आदि भी जाया करता था। वहीं एनसीसी का कैडेट बना। बाद में सी सर्टिफिकेट भी मिला।

मिलर हाईस्कूल से जुड़ी एक याद साझा करते हुए राजद प्रमुख ने कहा कि उन दिनों मेरे पास पैसे नहीं होते थे। तब एक चाट वाला दुकानदार खूब मानता था। वह रोज बिना पैसा लिये चाट खिलाता था। लेकिन तब मैंने एक उपाय सोचा। पहली समस्या आने-जाने की थी। एक स्थानीय लड़का साइकिल से आता-जाता था। एक दिन अपने दोस्तों से मैंने कहा कि उस लड़के को पीट दो। मेरे दोस्तों ने ऐसा ही किया। लेकिन जैसे ही उन लोगों ने उस लड़के को पीटा, मैंने लड़के की तरफ से अपने मित्रों से लडाई की। इसका असर यह हुआ कि वह मुझे रोज स्कूल ले जाता और वापस घर ले आता था। कपड़े, जूते और नाश्ता आदि की समस्या थी, इसलिए एनसीसी कैडेट बन गया। उन दिनों कैडेटों को नाश्ते में सिंघाड़ा-मिठाई मिल जाया करता था।

राजद प्रमुख ने बताया कि मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने वर्ष 1965 में दी। उनका परीक्षा केंद्र पटना हाईस्कूल था। मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद बी एन कॉलेज में दाखिला हुआ। यह दाखिला मेरिट के आधार पर हुआ था। वहां फुटबॉल टीम का कैप्टन भी बना। वहीं से छात्र राजनीति शुरू हुई। लेकिन तब खर्चा बहुत बढ़ गया था। किताब-कॉपी आदि के लिए रिक्शा भी चलाया और फिर भाइयों के साथ मिलकर पटना हाईकोर्ट के पास चाय की दुकान भी खोली।

ग्रेजुएशन करने के बाद वेटनरी कॉलेज में ही डा. आर.सी.पी. यादव ने मुझे किरानी के रूप में अस्थायी रोजगार दिया। उन दिनों मैं जो पैसे कमाता था, मैं उन्हें पोस्ट आॅफिस में जमा कर देता था। अपने इन्हीं पैसों से मैंने अपनी पत्नी के लिए पांच थान सोने के जेवर बनवाया जो शादी में चढ़ाया गया। शादी के पहले पत्नी को देखने का रिवाज न था, इसलिए अपने मित्र चंद्रभूषण को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा था। गौना दो वर्ष के बाद हुआ था और तबतक पटना में छात्र राजनीति उफान पर थी। नेतृत्वकर्ता होने के कारण मुझ पर बड़ी जिम्मेवारी थी। पत्नी राबड़ी को 18 मार्च 1974 को पटना आना था। इधर पटना में बवाल मचा था। अफवाह फैली कि लालू यादव मारा गया। इस अफवाह के कारण आंदोलन तो तेज हो गया लेकिन मेरे घर वाले परेशान हो गये। दोनों भाई साइकिल लेकर मुझे खोजने लगे। देर रात घर पहुंचा तब उनकी जान में जान आयी।

जमीन और अपनों से आजतक जुड़े हैं लालू

लालू की कहानी, बहन की जुबानी

चपरासी क्वार्टर में सीएम लालू ने गुजारे थे चार माह

अपने 68 वर्षों के जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव झेल चुके राजद प्रमुख वर्तमान में देश की राजनीति में अहम स्थान रखते हैं। खास बात यह है कि उन्होंने आजतक अपना अतीत नहीं भुलाया है। प्रमाण यह कि पहली बार विधायक बनने से लेकर मुख्यमंत्री बनने के चार महीने के बाद पटना के वेटनरी कालेज के चपरासी क्वार्टर के एक छोटे से घर में रहे और आज भी 10, सर्कुलर रोड स्थित पूर्व मुख्यमंत्री आवास के एक कोने में एस्बेस्टस के कमरे में बैठकर देश की राजनीति का नेतृत्व करते हैं।

आज भी चपरासी क्वार्टर में रहने वाली उनकी एकमात्र बहन गंगोत्री देवी की मानें तो श्री प्रसाद भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। वे बताती हैं कि केवल श्री प्रसाद ही उनसे छोटे हैं। अन्य सभी भाई उम्र में उनसे बड़े। श्री प्रसाद के नामकरण के संबंध में उनकी बहन ने बताया कि बचपन में लालू बहुत गोल-मटोल थे और खूब गोरे थे। उनके रंग को देखकर ही उनके पिता कुंदन राय ने उनका नाम लालू रखा था।

श्री प्रसाद और अपने बचपन के बारे में गंगोत्री देवी ने बताया कि अन्य भाइयों की तुलना में श्री प्रसाद के साथ उनका लगाव अधिक था। हालांकि सभी भाई उन्हें भाई सरीखा मानते थे। कहते थे कि हम छह नहीं सात भाई हैं। एक घटना का जिक्र करते हुए श्री प्रसाद की बहन ने बताया कि उस दिन बाबू जी मवेशी चराने जा रहे थे। रास्ते में गांव के ही एक व्यक्ति से उनका झगड़ा हो गया। तब लालू 14-15 वर्ष के किशोर थे। झगड़ा की जानकारी मिलने पर दौड़ पड़े। इस बीच वे स्वयं भी पहुंच गयीं और फिर सबने मिलकर झगड़ा करने वाले उस व्यक्ति की धुनाई कर दी। तब से सभी भाई उन्हें भाई सरीखा ही मानते रहे।

अपने भाई लालू प्रसाद की शिक्षा-दीक्षा व लालन-पालन के संबंध में पूछने पर उनकी बहन ने बताया कि बाबू जी के पास एक धुर भी जमीन नहीं थी। घर में कुछ मवेशी थे और बाबू जी तब खेतिहर मजदूर थे। इसी से घर चलता था। उन दिनों खाने के भी लाले थे। कभी मकई का दर्रा तो कभी साग-रोटी खाकर दिन गुजारना पड़ता था। भाई महावीर राय और मुकंद राय को पटना में नौकरी मिली तब जाकर स्थिति बदली। उन्होंने बताया कि उन दिनों गरीबी इतनी थी कि उनके पिता ने केवल तीस रुपए दहेज में देकर उनकी शादी गोपालगंज जिले के ही सिकटिया पंचायत के चक्रपाणि गांव में की थी। लालू पढ़ने में शुरू से तेज थे। भाइयों को पटना में क्वार्टर मिला तो वे यही आ गये और पढ़ने लगे। यही क्वार्टर के पास गाय-भैंसें रहती, जिसके देख-रेख की जिम्मेवारी श्री प्रसाद की थी। जिन दिनों श्री प्रसाद संपूर्ण क्रांति आंदोलन में संघर्ष कर रहे थे उन दिनों भी घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन किसी तरह से एक ही कपड़ा बार-बार धोकर पहनने को मजबूर श्री प्रसाद ने हार नहीं मानी। फिर वह समय भी आया जब वे पहली बार विधायक चुने गये। विधायक बनने के बाद चपरासी क्वार्टर के पास ही एक बैठका बनवाया था। इसी बैठका में वे लोगों से मिलते थे।

श्री प्रसाद की बहन बताती हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी लालू नहीं बदले। पहले चार महीने तो वे यही से रहकर बिहार की सरकार का कामकाज देखते थे। सुबह में इसी बैठका में अधिकारी, नेता और जनता सब जुटते थे।

बहरहाल श्री प्रसाद की बहन की मानें तो श्री प्रसाद आज भी नहीं बदले हैं। आज भी वे पटना में रहने पर वेटनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर में आते हैं। यहां मुहल्ले में रहने वाले सभी से मिलते हैं। इसके अलावा यहां के लोगों के हर सुख-दुख में शामिल रहते हैं। यहीं संस्कार उनके बच्चों का भी है।

इंसेफलाइटिस का कहर शुरू

अबतक 11 बच्चों की मौत, बच्चों को बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग कर रहा पूरा इंतजाम : महाजन

पटना(अपना बिहार, 9 जून 2016) - सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद मुजफ्फरपुर समेत कई जिलों में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम(एईएस) से बच्चों की मौत का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया है. मिली जानकारी के मुताबिक इसी वर्ष अप्रैल और मई में अबतक एक दर्जन बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं. जबकि इस बीमारी से अबतक 50 से अधिक प्रभावित हैं, जिनका इलाज विभिन्न अस्पतालों में जारी है. महत्वपूर्ण यह है कि यह बीमारी प्रत्येक साल जून महीने में अपना पांव पसारती है और सैकड़ों बच्चों की मौत हो जाती है.

वहीं इस मामले में राज्य स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव आर. के. महाजन ने कहा है कि सरकार की ओर से प्रभावित जिलों के सिविल सर्जन को विशेष तौर पर सतर्क रहने का निर्देश दिया गया है.

इस बीमारी की चपेट में शामिल जिलों में मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, खगड़िया, लखीसराय, मधेपुरा, शिवहर, पश्चिम चंपारण और नालंदा के अलावा भोजपुर जिला भी शामिल है. स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक सबसे ज्यादा बच्चे मुजफ्फरपुर में इस बीमारी से पीड़ित हैं. दूसरे नंबर पर पूर्वी चंपारण और सीतामढ़ी हैं. जानकारी की माने तो 2 जून तक पीड़ितों की संख्या मात्र 28 थी जो अब बढ़कर पचास से ऊपर चली गयी है. चिकित्सक मानते हैं कि बारिश होने के बाद पीड़ितों की संख्या घटने लगती है.

स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक इंसेफलाइटिस से पीड़ित 53 बच्चेजेई ( जापानी इंसेफलाइटिस) से पीड़ित हैं, वहीं दूसरी ओर शेष बच्चों में एईएस(एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम) पाया गया है. बीमारी का सबसे ज्यादा प्रकोप मुजफ्फरपुर में देखा गया है. जिले में 19 बच्चों के पीड़ित होने की रिपोर्ट है. गौरतलब हो कि बच्चों को तेज बुखार, शरीर में ऐंठन जैसे लक्षण दिखें तो इसे नजरअंदाज ना करें बल्कि नजदीक के स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचे. चिकित्सकों के मुताबिक अधिकांश मरीज मुजफ्फरपुर, वैशाली और सारण जिले से आते हैं. उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष भी इस बीमारी से राज्य में 150 से अधिक बच्चों की मौत हुई थी जबकि 2012 में इस अज्ञात बीमारी से 100 से ज्यादा बच्चों ने अपनी जान गंवा दी थी.

आरक्षण भीख नहीं, हमारा अधिकार : लालू

केंद्रीय विवि में प्रोफेसरों, सहायक प्रोफेसरों की बहाली में आरक्षण खत्म किये जाने को वापस लेने की मांग, अभी ओबीसी बाद में दलितों और आदिवासियों का आरक्षण भी खत्म करेंगे नरेंद्र मोदी, नहीं लेने पर दी आंदोलन की चेतावनी

पटना(अपना बिहार, 8 जून 2016) - देश आरएसएस के संविधान के हिसाब से नहीं बल्कि बाबा साहब डा. भीमराव आंबेदकर के संविधान के अनुसार चलाना होगा। आरक्षण दलितों और पिछड़ों को दिया जा रहा कोई भीख नहीं हैं, बल्कि यह हमारा अधिकार है। ये बातें राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने मंगलवार को पटना में संवाददाता सम्मेलन में कही। उन्होंने कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 3 जून को ही केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर एवं एसोसिएट प्रोफेसरों के पद की नियुक्ति के मामले में तत्काल प्रभाव से आरक्षण खत्म करने का आदेश जारी किया गया है।

श्री प्रसाद ने कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना होगा। यदि केंद्र ने ऐसा नहीं किया तो पूरे देश में आंदोलन होगा और इसके अंजाम के लिए केंद्र सरकार स्वयं जिम्मेवार होगी। उन्होंने कहा कि संविधान की धारा(4) , 16(4) और 340 के अनुसार बने संवैधानिक मंडल कमीशन के रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के बजाय संघ के कट्टर जातिवादी नेताओं से नियंत्रित केंद्र सरकार संविधान की धज्जियां उड़ाकर ओबीसी आरक्षण खत्म कर रही है। श्री प्रसाद ने कहा कि दूसरी ओर संविधान 15(4), 16(4) और 340 के हिसाब से ही आर्थिक आधार पर सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से अगड़ों और आबादी से ज्यादा प्रतिनिधित्व होते हुए भी संघ के कट्टर जातिवादी नेताओं से नियंत्रित गुजरात और राजस्थान सरकार ने संविधान की धज्जियां उड़ाकर आर्थिक आधार पर अगड़ों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार बताये कि पिछड़ों की हकमारी कर, वह किसे फायदा पहुंचाना चाहती है।

श्री प्रसाद ने कहा कि जबकि सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों में साठ फीसदी से ज्यादा एससी, एसटी और ओबीसी कोटे के प्रोफेसरों के पद खाली हैं। क्रमबद्ध और शातिराना तरीके से केंद्र उपेक्षित एवं वंचितों का हक छीनने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि संविधान प्रदत्त ओबीसी के 27 प्रतिशत का माखौल उड़ा रहे हैं। बाबा साहब की विचारधारा को खत्म करना चाहते हैं। संविधान से ज्यादा नागपुर की बात को तवज्जो दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि आरक्षण के लिए मरने-मिटने और पिछड़ा मां का बेटा होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहां है। आरएसएस सरकार पर वर्चस्व बना रहा है। उन्होंने कहा कि इतिहास की त्रासदी और विडंबना देखिये कि सामाजिक न्याय विरोधी यह काम ओबीसी प्रधानमंत्री के शासन काल में हुआ है। देश का साठ फीसदी से ज्यादा ओबीसी वर्ग इस हकमारी और अन्याय को सहन नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि केंद्र बड़ी शातिराना तरीके से दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों में फूट डलवा रही है। पहले उसने पिछड़ों का गला काटा है और आने वाले समय में वह अन्य वंचित तबकों का आरक्षण खत्म कर देगी। संवाददाता सम्मेलन में राजद के प्रदेश अध्यक्ष डा. रामचंद्र पूर्वे भी उपस्थित थे।

संपूर्ण क्रांति का जज्बा और चेहरों का घटाटोप

- जाबिर हुसेन

जिस प्रसंग को लेकर आज यह किस्त लिखने बैठा हूं, उसे केंद्र मे रखकर लिखने का मेरा इरादा अभी नहीं था। कुछ विषय मैंने अपनी याददाश्त के किसी गुमनाम कोने में रख छोड़े थे, जिन पर आगे कभी, कुछ ठहर कर, लिखने का ख़्याल था। मगर मेरे मित्र, कुमार कलानंद मणि ने फेसबुक पर एक कमेंट लिखकर मुझे जैसे झंकृत कर दिया हो। अच्छी रचना की एक पहचान यह भी है कि वो आपको स्मृतियों की तह तक पहुंचाने में सहायक हो।

कलानंद जी से मेरी नजदीकी इमरजेंसी के दिनों में बढ़ी, जब हमें ह्यतरूण क्रांतिह्य के प्रकाशन से जुड़ने का मौका मिला। हम एक परिवार की तरह भूमिगत ठिकानों पर, यहां-वहां, काम करते रहे। इस दौरान, कई बार, हमें अपनी जगहें बदलनी पड़ीं। एक-दो ठिकाने तो पुलिस की जानकारी में आने के कारण भी छोड़ने पड़े। ये दिन बड़े कष्ट-भरे थे। लगभग दो वर्ष हम चटाई पर सोते रहे, मूढ़ी और मूली खाकर किसी तरह जीवित रहे। संघर्ष के काम से कभी भागकर वाराणसी या सिताबदियरा जाना पड़ा तो दो समय का खाना नसीब होता। वो भी अमरनाथ भाई, माधुरी बहन भगवान बजाज काका और कृष्ण कुमार जी की सहृदयता के कारण। मैंने, उन लोगों की तरह, संघर्ष के साथियों का ख़्याल रखने वाले लोग अपनी जिंदगी में बहुत कम देखे। कई और परिवार थे, जिन्होंने इमरजेंसी की पीड़ा को कम करने में हमारी मदद की। इन परिवारों में, प्रो. एन पी वर्मा और कविता जी के अलावा प्रो. एस एम रजा और जीशान फातमी को याद करना जरूरी है। जेपी के निकट सहयोगी जनाब अहद फातमी तो हमारे मार्गदर्शक और अभिभावक ही थे।

हम जिस शहर में जाते, पुलिस के मुखबिर हमारी टोह में रहते। कई बार, हम गिरफ़्तार होते-होते बचे। गया, राजगीर, आरा, पटना दियारा जैसी कई जगहों पर, साथियों की बैठक के दौरान, पुलिस के छापे पड़े और हम किसी तरह, स्थानीय नागरिकों की मदद से गिरफ़्तारी से बच सके। पटना से लेकर वाराणसी, दिल्ली, चंडीगढ़ और जसलोक (मुंबई) तक हमारी यात्राएं, तमाम मुश्किलों के बावजूद, जारी रहीं। हमें पैसों की दिक्कत रहती थी। संकोचवश, हम किसी के आगे मुंह नहीं खोल पाते थे। सिर्फ हमारे साथ ही ऐसा हुआ हो, ऐसा नहीं है। हजारों संघर्षकर्मी गांव-शहर में, अभाव का संकट झेल रहे थे। हम उनसे अलग नहीं थे।

इमरजेंसी खत्म हुई, लोकसभा-विधानसभा के चुनाव हुए। मुझे सरकार में शामिल किया गया। कलानंद जी ने अपनी टिप्पणी में राजभवन में आयोजित शपथ समारोह का जिक्र किया है। उन्होंने हमारे रिश्तों की आत्मीयता का लिहाज करते हुए अपनी टिप्पणी में प्रत्यक्षत: मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया। लेकिन संदर्भ स्वयं सच्चाई बयान कर देते हैं। जेपी की निजी कार से शपथ-समारोह में जानेवाला मैं अकेला शख़्स था।

कलानंद जी की टिप्पणी में कुछ अंश जोड़ने की इच्छा है। शपथ समारोह के दिन, मैं मुंगेर के एक-दो साथियों के साथ राजबंसीनगर स्थित अपने चचा के घर से समारोह देखने निकला ही था कि अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। हम सड़क तक आ चुके थे, वापिस घर लौटना भी मुश्किल था। तभी सड़क-किनारे एक फूस की झोपड़ी पर नजर पड़ी। बारिश से बचने के लिए हम उस झोपड़ी में घुस गए। दुकान वाला गरम-गरम ह्यघुघनीह्य बना रहा था। हमें देखकर उसने प्लेटें परोस दीं।

उसी समय पुलिस की दो-तीन गाड़ियां सामने से गुजरीं। आगे की जीप पर सिविल ड्रेस में एक अधिकारी बैठे थे। (बाद में पता चला वो पटना के एडीएम श्री नागेंद्र तिवारी थे।) कुछ देर बाद, जेपी की निजी कार आती दिखी। अब हमारा चौंकना लाजिमी था। हम दुकान से बाहर निकल आए। मुझे देखते ही गाड़ियां रुक गईं। तिवारी जी बोले, राजभवन में आपका इंतजार हो रहा है। मुझे आपको लेने के लिए भेजा गया है। सामने जेपी की कार खड़ी थी, चालक मेरे परिचित थे। कलानंद जी ने राजभवन की यात्रा का सही चित्रण किया है। मैं हजारों-हजार की भीड़ से होकर पुलिस-स्कोर्ट में राजभवन के गेट पर कार से उतर कर पैदल राजभवन में दाखिल हो गया। समारोह संपन्न हुआ। मै भीगे कपड़ों में ही मंच तक गया। बारिश का पानी मेरे कपड़ों से गिरकर राजभवन की नफीस कालीन को भिगो रहा था।

शपथ के तुरंत बाद, कहा गया कि इसी समय सचिवालय में कैबिनेट की औपचारिक बैठक होगी और मुझे वहां पहुंचना है। मेरे लिए सचिवालय के रास्ते अनजान थे। तभी सी एम ने कहा, आप मेरे साथ चलें। बाहर, हजारों-हजार की भीड़ थी। भावना के अतिरेक में, भीड़ नए मंत्रियों के स्वागत में नारे लगा रही थी। राजभवन के मेन गेट पर मैंने इधर-उधर देखा, जेपी की कार भीड़ में कहीं नजर नहीं आ रही थी।

सचिवालय से निकलते समय वरिष्ठ नेता श्री प्रणव चटर्जी ने मुझे सलाह दी, सी एम चाहते हैं आप गुलाम सरवर साहब से आज ही जरूर मिल लें, यह जरूरी है। मेरे पास सरकारी वाहन आ गया था। मैं सचिवालय से चर्खा समिति होता हुआ गुलाम सरवर साहब के घर गया। नीचे किसी मुलाजिम ने उनके ऊपरी मंजिल में होने की बात कही। मैं ऊपर गया, लेकिन हमारी मुलाकात नहीं हो पाई। पास ही शाफी हाउस मे मेरे वालिद रहते थे। उनसे मिलकर मैं आयकर गोलम्बर के पास पहुंचा। गाड़ी मैंने वहीं छोड़ दी, ड्राइवर को सुबह राजबंसीनगर आने को कहा।

अब मैं रिक्शा लेकर किदवइपुरी इलाके के उस भूमिगत ठिकाने की तरफ चला, जो पिछले कई महीने से हमारा आवास था। हमारे एक साथी वहां मौजूद थे, जो हमारे साथ राजभवन भी गए थे। उन्हें उम्मीद नहीं थी, मैं इस तरह अकेले वहां आऊंगा। हम देर रात तक, चटाई पर बैठे, आगे की जिम्मेदारियों को लेकर चर्चा करते रहे। हम सहमत थे कि नई जिम्मेदारी हमारे लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगी। लेकिन हम इस परीक्षा से भाग भी नहीं सकते। हमें इसे चुनौती के रूप में स्वीकारना ही होगा।

एक गहरी पीड़ा और बोझ के एहसास ने मुझे घेर रखा था।

मैं शायद इन लम्हों की व्यथा को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाऊं!

लम्बे समय की गहरी आत्मीयता शोक में बदलने की घड़ी आ रही थी। मैं एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहा था, जहां हर चेहरे पर एक और चेहरा लगा था, जिसकी पहचान मुश्किल थी। चेहरों के इस घटाटोप में अपना चेहरा भी जैसे कहीं खो गया हो!

महाजाम से कराहती रही जनता, हांफती रही सरकार, अगले वर्ष मार्च तक झेलना पड़ सकता है महाजाम

पटना(अपना बिहार, 2 June 2016) - महात्मा गांधी सेतु के जर्जर होने एवं जारी मरम्मती कार्य के कारण राजधानी पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने वाली सड़क पर जाम तो रोजाना बात है। लेकिन अब इसका असर अन्य जिलों को जाने वाली सड़कों पर भी पड़ने लगा है। इसकी वजह यह कि गांधी सेतू पर जाम की स्थिति के कारण पटना बाईपास पर देखते ही देखते गाड़ियों की लंबी कतारें खड़ी हो जाती हैं और इस कारण आम जनता जहां एक ओर कराहती नजर आती है तो दूसरी ओर यातायात व्यवस्था में लगा अमला भी हांफता रहता है। गुरूवार को एक बार फिर राजधानी पटना में महाजाम की स्थिति बन गयी। हालत यह रही कि फतुहां से लेकर दानापुर-खगौल तक गाड़ियां खड़ी नजर आयीं। हालांकि यातायात पुलिस की सक्रियता के कारण सड़कों पर छोटी गाड़ियों का परिचालन होता रहा, जिसके कारण मोटरकार और मोटरसाइकिल वालों को अपेक्षाकृत अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। खास बात यह है कि मार्च तक इस समस्या का समाधान भी नहीं है, क्योंकि तब तक महात्मा गांधी सेतु का कोई विकल्प तैयार नहीं हो पाएगा।

वहीं एक सच्चाई यह भी कि ट्रकों को तेजी से सेतु पार कराने का किसी के पास कोई उपाय नहीं दिखता। ट्रकों की लाइन इतनी बड़ी हो चुकी है कि वहां तक पुलिस की तैनाती संभव नहीं दिखती। मौके का फायदा लेने के लिए ट्रक चालक बेखौफ रैश लगा रहे हैं। इसका सीधा असर राजधानी के तीन से चार लाख लोगों पर पड़ रहा है। बाइपास के आसपास की कॉलोनियों के लोगों को भीषण जाम का सामना करना पड़ रहा है।

सबसे दिलचस्प यह है कि यातायात व्यवस्था से जुड़े पदाधिकारी भी मानते हैं कि जाम की समस्या की मुख्य वजहें क्या हैं। ट्रैफिक पुलिस की मानें तो पाया संख्या 38 से 46 के बीच एक मिनट में 8-10 छोटी गाड़ियों और 7-8 ट्रकों को पार कराया जा सकता है। इस हिसाब से एक घंटे में 450 ट्रकों को पार कराया जा सकता है। वर्तमान में 1500 से 2000 ट्रक हर वक्त सेतु के पार खड़े हैं।

वहीं बेउर से अनीसाबाद के बीच एक किलोमीटर की दूरी में गाड़ियों के लिए सड़क पर जगह नहीं बची है। ट्रकों की अवैध पार्किंग के कारण बालू लदे ट्रकों और प्राइवेट गाड़ियों के लिए सिर्फ 30 फीट जगह ही मिलती है। लगातार प्रयास करने के बाद भी हालात नहीं बदल रहे। एक बड़ी वजह जीरोमाइल चौराहा के पास है। दीदारगंज,बख्तियारपुर, हाजीपुर, गया, बिहटा, नौबतपुर की ओर से हर दिन 80 हजार गाड़ियां आती हैं। अर्धनिर्मित पुल के कारण पटना से बख्तियारपुर जाने-आने वाली गाड़ियों को भी निचले फ्लैंक से होकर गुजरना पड़ता है।

बहरहाल भीषण गर्मी के बीच महाजाम से कराहती जनता को निजात मिले इसके लिए आवश्यक है कि सेतु की दोनों तरफ बनने वाले पीपा पुल को जल्द पूरा कर लिया जाए। इससे छोटी गाड़ियों का दबाव कम हो जाएगा। साथ ही दीघा रोड पुल को जल्द पूरा करना सबसे बड़ा विकल्प होगा। सेतु का टूटा हिस्सा दुरुस्त हो जाए, तो सारी परेशानी एक बार में ठीक हो जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण यह कि लेन ड्राइविंग और सही नियमों का पालन हो। पुलिस सख्ती से नियमों का पालन करे। एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी किया जा सकता है कि भारी वाहनों को रोककर छोटी गाड़ियों को निकाला जाय। हालांकि यातायात पुलिस ने इसे लागू करना शुरू कर दिया है। महाजाम की एक बड़ी वजह वीवीआईपी मूवमेंट भी है। इससे एक बार गाड़ी रुकने पर घंटों जाम की समस्या बनी रहती है।

थर्ड जेंडर के लिए बसों में आरक्षित रहेगी एक सीट

पटना(अपना बिहार, 31 मई 2016) - राज्य सरकार ने थर्ड जेंडर नागरिकों के लिए पहल करते हुए राज्य सरकारी बसों में एक सीट आरक्षित किये जाने का निर्णय लिया है। राज्य परिवहन निगम द्वारा जारी अधिसूचना में इसकी पुष्टि की गयी है। इस आशय की जानकारी थर्ड जेंडर के लिए सूबे में आंदोलन कर रहीं रेशमा ने दी। उन्होंने राज्य सरकार के प्रति इसके लिए आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के इस पहल से थर्ड जेंडर के लोगों को आत्म सम्मान मिलेगा। उन्होंने राज्य सरकार से थर्ड जेंडर के लोगों के लिए आंगनबाड़ी संचालिकाओं के पद में एक प्रतिशत आरक्षण देने की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि जब थर्ड जेंडर के लोग समाज निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करेंगे तब लोगों का उनके प्रति नजरिया बदलेगा।

अपनी बात : बेशर्म नरेंद्र मोदी की निरंकुशता के दो वर्ष

दोस्तों, देश में पिछले दो वर्षों से निरंकुश नरेंद्र मोदी का राज है। इनकी निरंकुशता का प्रमाण समाज के हर तबके में है। हालांकि इसके स्वरुप अलग-अलग हैं। मसलन मुट्ठी भर अडाणी और अम्बानी जैसे पूंजीपति इस निरंकुश राज का जमकर लाभ उठा रहे हैं। एक बड़ा प्रमाण विजय माल्या है, जो भारत की जनता की गाढी क्माई के 9000 करोड़ रुपए लेकर सरकार की आंखों के सामने से चला गया। वहीं अडाणी और अम्बानी पर नरेंद्र मोदी की मेहरबानी का खुलासा भारत सरकार के नियंत्रक महालेखाकार ने भी अपनी रिपोर्ट में कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 15 हजार करोड़ रुपए का घोटाला तेल उत्खनन के क्षेत्र में किया गया है। सबसे दिलचस्प है कि देश की मीडिया पर भी इन्हीं पूंजीपतियों का कब्जा है जिनके दलाल बुद्धिजीवी देश की जनता की आंखों में बड़ी बेशर्मी से धूल झोंक रहे हैं। Read More>>>

दिलचस्प होगी राजद-भाजपा की भिडंत, विधान परिषद चुनाव को लेकर राजद का सरप्राइज बाकी, भाजपा ने भी नहीं खोले हैं अपने पत्ते

पटना(अपना बिहार, 29 मई 2016) - विधान परिषद चुनाव को लेकर जहां एक ओर जदयू ने अपने पत्ते पहले ही खोल रखा है तो दूसरी ओर उसकी साझेदार राजद ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। साथ ही मुख्य विपक्षी दल भाजपा की ओर से भी कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आगामी 30 या 31 मई को ही इस संबंध में बड़ा खुलासा हो सकता है। हालांकि विधान परिषद चुनाव को लेकर कई तरह की कयासबाजियां लगायी जा रही हैं। राजद खेमे के बारे में डा. रामचंद्र पूर्वे, हिना शहाब और सुभाष यादव का नाम उछाला जा रहा है। साथ ही यह बात भी चर्चा में है कि हिना शहाब विधान परिषद सदस्य बनने को तैयार नहीं हैं। एक कयासबाजी यह भी कि यदि श्रीमती शहाब अंतिम समय तक इसके लिए तैयार नहीं हुर्इं तो उनके बदले अशफाक करीम को विधान परिषद भेजा जा सकता है। जबकि तीसरे प्रत्याशी के रूप में बालू व्यवसाय से जुड़े सुभाष यादव का नाम सुर्खियों में है। जबकि सूत्र बताते हैं कि विधान परिषद चुनाव को लेकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद का निर्णय सभी को चकित कर देने वाला होगा।

वहीं दूसरी ओर भाजपा की ओर से दो सीटों पर कब्जा करने को लेकर जद्दोजहद की जा रही है। उल्लेखनीय है कि इस बार विधान परिषद के सात सीटों के लिए चुनाव होने हैं। इनमें आवश्यक संख्या 31 के आधार पर जदयू, राजद और भाजपा तीनों दलों को दो-दो सीटों पर बिना किसी परेशानी के जीत हासिल हो सकती है। असली खेल एक सीट को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक राजद इसके लिए बाजी खेलेगा। लेकिन अभी तक इस बात का खुलासा नहीं हो सका है कि राजद की ओर से तीसरा उम्मीदवार कौन होगा?

बहरहाल लालू प्रसाद न केवल अपने दिलचस्प राजनीतिक निर्णयों के लिए जाने जाते रहे हैं, बल्कि उनकी चाल के उनके विपक्षी भी मुरीद रहे हैं। चूंकि विधानसभा में राजद सबसे बड़ी पार्टी है और उसके पास तीन सीटों पर कब्जा के लिए पर्याप्त संख्या बल है। हालांकि इस चुनाव में एनडीए की एकता भी कसौटी पर जांची परखी जा सकेगी। फिलहाल चर्चाओं का बाजार गर्म है।

राजद कोटे से जेठमलानी और मीसा का राज्यसभा जाना तय, विप में तीसरे सीट के लिए हो सकता है राजनीतिक घमासान, यदि कांग्रेस साथ नहीं आयी तो एनडीए पर टूट का संकट

पटना(अपना बिहार, 28 मई 2016) - राज्यसभा और विधान परिषद में राजद की तरफ से कौन-कौन प्रत्याशी होंगे, इसे लेकर चर्चाओं का दौर शुक्रवार को भी जारी रहा। इस बीच सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने राज्यसभा के लिए राम जेठमलानी और अपनी पुत्री डा. मीसा भारती के नाम पर मुहर लगा दी। हालांकि इस संबंध में अभी तक राजद की ओर से कोई अधिकारिक सूचना नहीं दी गयी है। सूत्रों के मुताबिक पहले जेठमलानी के साथ राबड़ी देवी को राज्यसभा भेजे जाने की चर्चा थी। लेकिन पार्टी सूत्रों की मानें तो राबड़ी देवी के बदले अब डा. मीसा भारती उम्मीदवार होंगी। चूंकि विधानसभा में राजद के पास दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या बल है, लिहाजा किसी भी तरह का कोई राजनीति अड़चन नहीं आने की उम्मीद है। सूत्रों के अनुसार आगामी 30 मई को दोनों राज्यसभा के लिये नामांकन करेंगे। हालांकि इस रेस में कई कद्दावर नेता कतार में थे। वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह और एजाज अली भी इन सीटों पर नजर गड़ाये हुए थे।

वहीं सूत्रों की मानें तो विधान परिषद के लिए राजद के प्रदेश अध्यक्ष डा. रामचंद्र पूर्वे का नाम फाइनल बताया जा रहा है। जबकि दूसरे सीट के लिए पूर्व विधान पार्षद तनवीर हसन और हिना शहाब को लेकर सस्पेंस जारी है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो राजद इस बार तीन प्रत्याशी मैदान में उतार सकता है। इसकी वजह भाजपा के पास दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या बल है। लेकिन एक सीट के लिए राजद घमसान मचा सकती है। वजह यह है कि विधान परिषद में एक सीट के लिए कम से कम 31 सदस्यों का वोट चाहिए। इस लिहाज से राजद को अपने तीसरे प्रत्याशी के लिए 13 अतिरिक्त वोटों की दरकार हो सकती है। इसमें जदयू के दस वोट (विधानसभा में जदयू के कुल 72 सदस्य हैं) के अलावा तीन सीटों के लिए घमासान मचने के आसार हैं। हालांकि माले के तीन विधायकों ने पहले ही मतदान बहिष्कार का निर्णय लिया है। इसके अलावा राजवल्लभ यादव के जेल में होने से आवश्यक मतों की संख्या तीस हो सकती है। सूत्रों की मानें तो राजद खेमे में अपने तीसरे प्रत्याशी को जिताने के लिए उच्च स्तर की जोर आजमाइश की जा रही है और एनडीए के कमजोर कड़ी की तलाश की जा रही है। वहीं उसकी नजर 4 निर्दलीय सदस्यों पर भी है। हालांकि कांग्रेस के साथ आ जाने से उसे किसी प्रकार की कोई राजनीतिक परेशानी नहीं होने की उम्मीद है।

संपादकीय : ताड़ी का "विकास"

दोस्तों, अब यह कहने की आवश्यकता नहीं रह गयी है कि नीतीश कुमार एक विजन वाले मुख्यमंत्री हैं। वे जब भी कोई फ़ैसला लेते हैं तो उसके पहले उस फ़ैसले के हर पहलू के बारे में गहन सोच-विचार करते हैं। हालांकि राजनीतिक मामलों में उनके द्वारा लिये गये कई फ़ैसलों पर सवाल उठाया जा सकता है और मेरे हिसाब से उठाया भी जाना चाहिए। एक अहम फ़ैसला "मानव विकास मिशन" से जुड़ा है। लेकिन शराबबंदी को लेकर उनकी सोच बहुत स्पष्ट है। ताड़ी की सार्वजनिक बिक्री पर रोक का निर्णय भी समालोचना का विषय है, परंतु जिस तरीके से उन्होंने ताड़ी व्यवसायियों व मजदूरों के लिए विकल्प तलाशने की ओर कदम बढाये हैं, उनकी प्रशंसा होनी चाहिए।

गुरुवार को मुख्यमंत्री सचिवालय स्थित संवाद में एक अति विशेष बैठक में मुख्यमंत्री ताड़ी से जुड़े विभिन्न विकल्पों पर विचार किया। उन्होंने इस जीविका से जोड़कर आगे बढाने का निर्णय लिया है। यह भी स्वागतयोग्य पहल है। ताड़ी से लोग गुड़, कैंडी और शहद जैसे उत्पाद बना सकेंगे। इससे ताड़ी उतारने और इससे जुड़े व्यवसायियों को कितना लाभ होगा, यह तो आने वाला समय बतायेगा। लेकिन इसका एक सामाजिक पहलू भी है।

सामाजिक पहलू यह कि ताड़ी उतारने का काम तो पुरुष करते हैं, लेकिन उसे बेचने का काम अधिकांश तौर पर महिलायें करती हैं। यह उनकी मजबूरी भी है। दूसरा इसका मार्केटिंग पहलू भी है। ठीक वैसे ही जैसे आज पुरुषों के उपयोग की चीजों की मार्केटिंग के लिये विज्ञापनों में महिलाओं के सुन्दर चेहरे का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन गांवों में ताड़ी बेचने वाली महिलाओं को सम्मान की दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता है। भोजपुरी में एक गीत तो ऐसा है जो द्विअर्थी तो है ही ताड़ी बेचने वाली महिलाओं के आत्मसम्मान पर चोट भी करता है।

बहरहाल नीतीश कुमार द्वारा इस पूरे पेशे को सम्मानजनक बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। यह नायाब तरीका हो सकता है। लेकिन असल सवाल उनकी कोशिशों के जमीन पर उतरने को लेकर है। इसकी कई वजहें हैं। दिलचस्प यह है कि गांव में पले-बढे मु्ख्यमंत्री स्वयं भी इन वजहों को जानते-समझते हैं। उनकी राजनीति में "मोकामा टाल में ताड़ का पेड़" का बड़ा महत्व है। देखें मुख्यमंत्री की पहल कितने समय में और कितना बदलाव लाती है। फ़िलहाल तो उनके इस अच्छे काम के लिए उन्हें शुभकामना।

संपादकीय : ब्राह्म्णवादी शिकंजे से बाहर निकले वंचितों का साहित्य

दोस्तों, आज के भारतीय साहित्य में विमाहीनता की स्थिति बनती जा रही है। जहां एक ओर मुख्य धारा का साहित्य आज भी ब्राह्म्णवादियों का साहित्य है तो अन्य साहित्य मसलन दलित साहित्य, स्त्री साहित्य और ओबीसी साहित्य की धारायें भी विस्तार के बजाय सीमित होती जा रही हैं। हालांकि यह बात जरुर है कि हलचल तेज है। परंतु वास्तविकता यही है कि वंचितों का साहित्य आज भी अपने लिए पनाह खोजता फ़िर रहा है। Read More>>>

मुख्यमंत्री ने दी प्रधानमंत्री को बधाई, कसा तंज, दो वर्षों में देश के लिए कुछ किया नहीं, शेष समय में करें देश का कल्याण

पटना(अपना बिहार, 26 मई 2016) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार राज्यस्तरीय बैंकर्स समिति की 56वीं त्रैमासिक समीक्षा बैठक में भाग लेने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुये कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दो साल का कार्यकाल पूरा हो गया है, मैं उनको बधाई देता हूं। उन्होंने कहा कि वे पॉच साल के लिये चुने गये हैं, दो साल में तो कुछ किया नहीं है, आगे कुछ करने की कोशिश करें। मुख्यमंत्री ने पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर कहा कि सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन हत्याकांड पर हमने शुरू से ही कहा है कि लोगों को भरोसा रखना चाहिये, लोगों का भरोसा है। कुछ लोगों का भरोसा नहीं रहता है। उन्हें हर चीज पर बयान देने की आदत है। हर चीज को मिसइंटरप्रेटैशन करने की यहॉ एक आदत सी पड़ गयी है। वे अपनी जगह पर हैं। मुझे इस विषय पर कुछ नहीं कहना है। उन्होंने कहा कि पुलिस पर पूरा भरोसा रखना चाहिये और इस मामले की तह में पुलिस पहुॅच रही है। उनका ब्रेक थू्र हो गया है। बार-बार पुलिस के अधिकारी कह रहे हैं कि हमलोग इस मामले का उद्भेदन करने में कामयाब रहेंगे। जो भी इस उद्भेदन में जिम्मवार पाये जायेंगे, उन पर कठोर कार्रवाई होगी। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा कि जदयू राज्य सभा की दो सीट और विधान परिषद की दो सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इसके नामों की घोषणा बाद में की जायेगी।

राज दरबार के राज अबला मंत्री की हैसियत

दोस्तों, राज दरबार का मतलब ही राजा का दरबार होता है। जिन दिनों देश में लोकतंत्र नहीं था, दरबार लगाने का सिलसिला चलता रहा है। दरबार भी कई प्रकार के होते रहे हैं। मसलन राजनीति से लेकर ऐश मौज तक के लिए अलग-अलग दरबार। एक अनोखी पहल मुगल बादशाह जहांगीर ने की थी। जहांगीरी घंटा लगवाकर। जहांगीर ने अपनी प्रजा के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराया था। कोई भी फ़रियादी किसी भी समय घंटा बजा सकता था और वह अपनी फ़रियाद बादशाह के समक्ष रख सकता था। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने दरबार लगायी या नहीं, इसकी अहम जानकारी इतिहास के पन्नों में नहीं देखने को मिलता है। इसकी वजह संभवतः यह भी हो सकती है कि अंग्रेजों ने पहली बार इस देश में एक संगठित शासन पद्धति की नींव डाली। न्यायालय से लेकर स्थानीय पदाधिकारियों की नियुक्ति की गयी।

लेकिन लोकतंत्र में दरबार का बहुत महत्व होता है। कम से कम बिहार में इन दिनों दरबार की राजनीति खूब चल रही है। इसके कई नायाब उदाहरण हैं। एक चर्चा सूबे के राजा के विशेष दरबार की। सचिवालय के सभागार में दरबार का आयोजन किया गया था। खास बात यह थी कि इस दरबार में पक्ष-विपक्ष के लोग भी जुटे थे। जिस विषय पर जुटे थे, वह अत्यंत ही महत्वपूर्ण था। महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के सौ वर्ष पूरे होने पर राज्य सरकार द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को लेकर मुख्य रुप से चर्चा हुई।

दरबार में राजा के आने के पहले सभी पहुंच चुके थे। इनमें एक अबला मंत्री भी थीं, जिनके उपर सूबे में पर्यटन के विकास की जिम्मेवारी राजा ने दे रखी है। चूंकि गांधी पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, इसलिए संभवतः उन्हें भी दरबार में हाजिरी लगानी पड़ी थी। खैर राजा के आगमन के पहले सभी अपने-अपने लिए निर्धारित किये गये जगहों पर विराजमान हो गये। अबला मंत्री भी अपना नेम प्लेट देख कर बैठ गयीं। वह भी राजा के बगल वाली कुर्सी पर।

राजा आये तब लोकतांत्रिक धर्म निभाते हुए सभी खड़े हो गये और राजा ने भी हाथ जोड़कर सभी का अभिवादन किया। सामने नजर पड़ी तो देखा कि एक पुराने कद्दावर साथी दूर बैठे थे। राजा ने अबला मंत्री की ओर देखा और बिना किसी शिष्टाचार के उन्हें दूर बैठने को कह दिया और अपने पुराने साथी को अपने पास बुला लिया। बेचारी अबला मंत्री मन मसोस कर रह गयीं। अगले दिन राजा अपने पुराने साथी के साथ अखबार के पन्नों में चमक रहे थे और बेचारी अबला मंत्री

जल संकट दूर करने को सामूहिक और ईमानदार प्रयास जरुरी

साथियों, अपना बिहार के संपादक नवल किशोर कुमार जी के इस अनुरोध के लिए मैं उनके प्रति आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने आज के संपादकीय आलेख की जिम्मेवारी मुझे दी। आज इस अवसर का लाभ मैं आप सभी के साथ उस संकट को साझा कर उठाना चाहता हूं, जिससे आज केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरा देश और विश्व जूझ रहा है। मैं जल संकट की बात कर रहा हूं। सुखद है कि इस बार मानसून अच्छे होने के आसार हैं और मौसम विभाग ने इसकी भविष्यवाणी की है। परंतु जल संकट सवाल तो है। सवाल की एक पृष्ठभूमि यह है कि महाराष्ट्र के लातूर में सरकार को पानी एक्सप्रेस चलानी पड़ी। जिस तरह से बिहार में भूगर्भ जल स्तर में गुणोत्तर कमी आ रही है, यदि हम नहीं संभले तब आने वाले समय में बिहार में भी ऐसे दृश्य देखे जा सकेंगे।

मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं। मेरे गांव सरेंजा(प्रखंड - चौसा, जिला बक्सर) में उन दिनों कई तालाब थे। यह कहना अधिक सटीक होगा कि तालाबों के बीच में मेरा गांव था। गांव की सीमा के अंदर ही आठ तालाब हुआ करते थे। इन तालाबों का सोन नहर से संपर्क था। उन दिनों की एक और याद अभी भी मेरे जेहन में जीवित है। पहले हथिया नक्षत्र के पहले गांव के सब लोग बरसात को लेकर एक महीने का राशन, जलावन और मवेशियों का चारा इकट्ठा करते थे। बरसात शुरु होती तो खत्म होने का नाम नहीं लेती थी।

खैर यह सब अतीत की बात है। मेरी मुख्य चिंता पारंपरिक जल स्रोतों के खत्म होने से जुड़ी है। पूरे बिहार में आहर-पईन खत्म होते जा रहे हैं। खत्म होने की बड़ी वजह अतिक्र्मण है। हालांकि इस अतिक्रमण के भी दो स्वरुप हैं। एक अतिक्रमण तो वह जो धनाढ्य और बाहुबलियों ने अपनी ताकत के बल पर किया है। दूसरा अतिक्रमण वह जो गरीब भूमिहीनों ने किया है। सवाल यदि नहरों और पईनों को अतिक्रमण मुक्त कराने का हो तो सरकार को दोनों तरीके के अतिक्रमण खत्म करने चाहिए। लेकिन गरीब भूमिहीनों को पुनर्वासित किये जाने की प्रक्रिया भी की जानी चाहिए।

लेकिन जल संकट के लिए केवल सरकार पर ही सारी जिम्मेवारियां नहीं थोपी जा सकती है। इस संकट के लिए आम जनता भी समान रुप से जिम्मेवार है। गांवों में कुएं सूखते चले गये हैं। ये कुएं वाटर हार्वेस्टिंग के सबसे अच्छे तरीके थे। आज आवश्यकता है कि हम सभी पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करें। इसे एक अभियान के रुप में लिया जाना चाहिए। मुझे तो आश्चर्य होता है यह जानकर कि राजधानी पटना में कभी तीन सौ तालाब हुआ करते थे और वर्तमान में केवल 13 शेष रह गये हैं। सवाल है कि जब बिहार की राजधानी पटना में यह हाल है तो अन्य जिलों की क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना जटिल नहीं है। मुझे लगता है कि राज्य सरकार भी अपनी जिम्मेवारी को समझे।

बहरहाल यह बात भी उल्लेखनीय है कि कागज पर सरकार के द्वारा इस तरह के प्रयास किये जाते रहे हैं। मसलन मनरेगा के तहत वर्ष 2006-07 से ही सूबे में जलाशयों के निर्माण और आहर-पईनों के जीर्णोद्धार की योजनायें चल रही हैं। लेकिन दुखद यह है कि अधिकांश योजनायें जमीन पर नहीं बल्कि कागजों में ही पूर्ण की जाती हैं। इस बार भी वित्तीय वर्ष 2016-17 में राज्य सरकार ने करीब 15 हजार जलाशयों के जीर्णोद्धार का लक्ष्य निर्धारित किया है। यदि इसे ही एक मानक मानें तो पिछ्ले दस वर्षों में डेढ लाख जलाशयों का जीर्णोद्धार हो जाना चाहिए था। इससे पहले जल संसाधन विभाग के द्वारा भी इस तरह की योजनायें चलायी जाती रही हैं। सवाल यह है कि इन प्रयासों को जमीन पर क्यों नहीं उतारा जा सका। इसकी जांच भी होनी चाहिए।(लेखक शिव प्रकाश राय बिहार के जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता हैं और नागरिक अधिकार मंच के संयोजक हैं)

दिल्ली में जंगलराज क्यों, बतायें नरेंद्र मोदी : मीसा

पटना(अपना बिहार, 22 मई 2016) - बिहार में कानून के राज पर सवाल उठाने वाले भाजपा नेताओं और विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताना चाहिए कि दिल्ली में जंगल राज क्यों है। ये बातें राजद की वरिष्ठ नेत्री डा. मीसा भारती ने अपने बयान में कही। उन्होंने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा है कि वहां की विधि-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक हो गयी है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में वहां जंगलराज होने की बात कही है। श्रीमती भारती ने कहा कि दिल्ली में सरकार भले ही अरविन्द केजरीवाल की है लेकिन विधि-व्यवस्था की जिम्मेवारी केंद्र सरकार की है। ऐसे में प्रधानमंत्री को सरकार का मुखिया होने के नाते इसका जवाब देना चाहिए। उन्होंने प्रदेश भाजपा के नेताओं पर भी प्रहार करते हुए कहा कि बिहार में आये दिन जंगलराज का राग अलापने वाले नेताओं को दिल्ली में विधि-व्यवस्था की बदहाली को लेकर विरोध प्रदर्शन और कैंडिल मार्च निकालना चाहिए।

अपनी बात : और कितने हिन्दुस्तान मिस्टर तानाशाह?

सबसे बड़ी बात यह है कि 90 के दशक में बाबरी विध्वंस कर इतिहास की हत्या करने की कोशिश तब गैर सरकारी थी। अब इसका सरकारीकरण कर दिया गया है। इसका विरोध जरुरी है।

दोस्तों, दो वर्ष पहले कांग्रेस की गलत रणनीति और धर्म निरपेक्ष ताकतों के बीच एका नहीं होने के कारण एक ऐसी ताकत केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुई, जिसकी बुनियाद ही भारत की बर्बादी पर आधारित है। यही वजह है कि वह अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को लागू करने पर आमादा है। हाल ही में दिल्ली में अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप के नाम पर करने की कवायद की गयी है। इसके पहले गुड़गांव को द्रोणाचार्य के नाम पर "गुरुगांव" करने की बात कही गयी। वहीं द्रोणाचार्य जिसने एकलव्य और कर्ण को शिक्षा देने के बजाय राजपूत्रों को शिक्षा दी थी। हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले नरेंद्र मोदी इस बात को समझ चुके हैं कि देश में केवल दो ही तरीके से राज किया जा सकता है। पहला तो यह कि देश की बुनियादी समस्या को कचरे के डब्बे में डाल भावनात्मक मुद्दों को तरजीह देना और दूसरा समानांतर तरीके से बहुसंख्यक वर्ग को बेहतरी के सपने दिखाना। यह दोनों काम नरेंद्र मोदी और उनकी मातृ संस्था आरएसएस पूरे उत्साह से कर रही है। इतिहास गवाह है कि आरएसएस की धर्म आधारित राजनीति के कारण ही देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान बना। सवाल उठता है कि और कितने टुकड़ों हिन्दुस्तान को बांटना चाहते हैं नरेंद्र मोदी और उनके आकागण।

यह सभी जानते हैं कि मोदी के सत्ता संभालते ही संघ परिवार के विभिन्न अनुषांगिक संगठन अतिसक्रिय हो गए। पुणे में मोहसिन शेख नामक एक सूचना प्रोद्योगिकी कर्मी की हिंदू राष्ट्रसेना के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम हत्या कर दी। संघ परिवार के सदस्य संगठनों ने हर उस व्यक्ति और संस्थान को निशाना बनाना शुरू कर दिया और उसके खिलाफ घृणा फैलानी शुरू कर दी जो सत्ताधारी दल के एजेंडे से सहमत नहीं था। केंद्र में मंत्री बनने के पहले, गिरिराज सिंह ने कहा कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। पार्टी की एक अन्य नेता साध्वी निरंजन ज्योति ने उन लोगों को हरामजादा बताया जो उनकी पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं थे। सत्ताधारी दल और उसके पितृसंगठन आरएसएस से जुड़े सभी व्यक्तियों ने एक स्वर में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध विषवमन करना शुरू कर दिया और हमारे शक्तिशाली प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। यह कहा गया कि प्रधानमंत्री से आखिर यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे हर छोटी-मोटी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें। ऐसा लगता है कि उनकी चुप्पी सोची-समझी और आरएसएस के श्रम विभाजन का भाग थी। यह बार-बार कहा जाता है कि जो लोग घृणा फैला रहे हैं वे मुट्ठीभर अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि वे लोग शासक दल के प्रमुख नेता हैं।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदुत्व की राजनीति, पहचान से जुड़े मुद्दों पर फलती-फूलती है। इस बार गौमाता और गौमांस भक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया गया और इसके आसपास एक जुनून खड़ा कर दिया गया। इसी जुनून के चलते, दादरी में मोहम्मद अख़लाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और देश के अन्य कई स्थानों पर हिंसा हुई। उसके पहले, दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई थी। दादरी की घटना ने पूरे देश का ध्यान बढ़ती हुई असहिष्णुता की ओर खींचा और कई जानेमाने लेखकों, वैज्ञानिकों और फिल्म निर्माताओं ने उन्हें मिले पुरस्कार लौटा दिए। इसे गंभीरता से लेकर देश में तनाव को कम करने के प्रयास करने की बजाए, पुरस्कार लौटाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया गया। यह कहा गया कि वे राजनीति से प्रेरित हैं या पैसे के लिए ऐसा कर रहे हैं।

हिन्दुस्तान को बर्बाद करने के लिए आरएसएस के लोगों ने अपने पूर्वजों अंग्रेजों के जैसे भारतीय साहित्य और संस्कृति पर सबसे पहले हमला करना शुरु किया। प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में चुन-चुनकर ऐसे लोगों की नियुक्तियां की गईं जो भगवा रंग में रंगे हुए थे। गजेन्द्र चैहान को भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति का विद्यार्थियों ने कड़ा विरोध किया परंतु उसे नज़रअंदाज कर दिया गया। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को निशाना बनाया गया। स्थानीय भाजपा सांसद बंगारू दत्तात्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से यह शिकायत की कि विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी और जातिवादी गतिविधियां चल रही हैं। मंत्रालय के दबाव में विश्वविद्यालय ने रोहित वेमूला और उनके साथियों को होस्टल से निष्कासित कर दिया और उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी। इसी के कारण रोहित ने आत्महत्या कर ली।

हालांकि शैक्षणिक संस्थाओं के संबंध में सरकार की नीति का देशव्यापी विरोध हुआ। फिर जेएनयू को निशाना बनाया गया और कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का झूठा आरोप मढ़ दिया गया। जिन लोगों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाए थे उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया। इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया गया कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है। एक छेड़छाड़ की गई सीडी का इस्तेमाल जेएनयू के शोधार्थियों को फंसाने के लिए किया गया। उन पर देशद्रोह का आरोप लगाए जाने से राष्ट्रवाद की परिभाषा पर पूरे देश में बहस छिड़ गई।

बात यहीं नहीं रुकी। आरएसएस के बददिमाग मुखिया ने एक दूसरा भावनात्मक मुद्दा उठाते हुए कहा कि युवाओं को भारत माता की जय का नारा लगाना चाहिए। इसके उत्तर में एमआईएम के असादुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अगर उनके गले पर छुरी भी अड़ा दी जाए तब भी वे यह नारा नहीं लगाएंगे। आरएसएस के एक अन्य साथी बाबा रामदेव ने आग में घी डालते हुए यह कहा कि अगर संविधान नहीं होता तो अब तक लाखों लोगों के गले काट दिए गए होते। यह समझना मुश्किल नहीं है कि यह कितनी भयावह धमकी थी।

अब सवाल एक बार फ़िर से ऐतिहासिक तथ्यों को भगवावादी विचारों से मिटाने की कुचेष्टा की। यह सभी जानते हैं कि महाराणा प्रताप एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपनी सत्ता बचाने के लिए मुगलों के साथ संघर्ष किया। इसे देशभक्ति कहना निश्चित तौर पर इतिहास के साथ खिलवाड़ होगा। जिन दिनों महाराणा प्रताप अकबर के डर से जंगलों में छिपे थे, उन दिनों भी देश में सत्ता को लेकर संघर्ष था। लेकिन उन दिनों लोकतंत्र नहीं था। सत्ता के लिए राजाओं में लड़ाईयां होती थीं। कोई हारता था तो कोई जीतता था। जहां तक अकबर का सवाल है, अकबर महान ने इस देश में पहली बार धर्म निरपेक्षता की बुनियाद रखी। प्रमाण यह कि भले ही जोधाबाई के साथ उनका विवाह तत्कालीन राजपूत राजाओं के साथ एक राजनीतिक समझौता था, अकबर ने इस रिश्ते को आजीवन पूरा सम्मान दिया। अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक पंथ की शुरुआत भी की। उनके शासनकाल को आज भी भारत में मुगलों का स्वर्णिम काल माना जाता है।

बहरहाल देश को तोड़ने का षडयंत्र करने वाले बड़ी तेजी से अपने मंसूबों में कामयाब हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि 90 के दशक में बाबरी विध्वंस कर इतिहास की हत्या करने की कोशिश तब गैर सरकारी थी। अब इसका सरकारीकरण कर दिया गया है। इसका विरोध जरुरी है। विरोध इसलिए कि भारत फ़िर से टुकड़ों-टुकड़ों में बंटने को तैयार नहीं है।

मोदी सरकार के दो साल : टूटे वायदे और विघटनकारी एजेंडा

मोदी सरकार के दो साल के कार्यकाल की समीक्षा के मुख्यतः दो पैमाने हो सकते हैं। पहला, चुनाव अभियान के दौरान किए गए वायदों में से कितने पूरे हुए और दूसरा, भारतीय संविधान में निहित बहुवाद और विविधता के मूल्यों की रक्षा के संदर्भ में सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा। मोदी सरकार के दिल्ली में सत्ता संभालने के बाद लोगों को यह उम्मीद थी कि अच्छे दिन आएंगे, विदेशों में जमा काला धन वापिस आएगा और रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं और गरीबों के भोजन रोटी-दाल में से दाल इतनी मंहगी हो गई कि मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए भी उसे खरीदना मुश्किल हो गया है।Read More>>>

अपनी बात : संघमुक्त नहीं, ब्राह्म्णवाद मुक्त हो भारत

दोस्तों, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वाराणसी में जदयू की एक रैली के दौरान संघमुक्त भारत का आह्वान किया है। इसको लेकर भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं को तो तीखी मिर्ची लगी ही है, साथ ही संघ से सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का भी कलेजा फ़टने लगा है। इतना ही नहीं स्वयं को समाजवादी कहने वाले कुछ नेताओं को भी श्री कुमार का आह्वान रास नहीं आ रहा है। वैसे यह अप्राकृतिक नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री ने सीधे-सीधे आरएसएस पर वार किया है। वहीं आरएसएस जिसके कारण देश में धर्म के आधार पर राजनीति की शुरुआत हुई और परिणामस्वरुप देश को दो भागों में बंटना पड़ा। Read More>>>

फ़्लैक्स बोर्डों में नेताओं का चमकता है चेहरा, कराहता है पटना

हानिकारक रेजिन के इस्तेमाल से बनता है फ़्लैक्स शीट, सरकार भी करती है धड़ल्ले से उपयोग

पटना(अपना बिहार, 16 मई 2016) - मामला बहुत गंभीर है। अभी हाल ही में एक अतंरराष्ट्रीय रिपोर्ट में सूबे की राजधानी पटना को विश्व का सबसे छठा प्रदूषित शहर माना गया है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन की लापरवाही तो जिम्मेवार है ही, साथ ही सरकार के नीतिगत स्तर पर भी इसे लेकर कोई संवेदनशीलता नहीं है। एक उदाहरण सूबे में फ्लैक्स बोर्ड का बढ़ता उपयोग है। यह एक खतरनाक प्लास्टिक माना गया है। साथ ही जिस रसायन से इसके उपर ग्राफिक्स बनाये जाते हैं, वे भी पर्यावरण को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसके उपयोग के लिए सरकार के स्तर पर कोई नियम कानून नहीं है। यहां तक कि राज्य सरकार भी धड़ल्ले से खतरनाक फ्लैक्स बोर्डों का इस्तेमाल अपना चेहरा चमकाने के लिए करती है। इस सच को सूबे के वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव विवेक कुमार सिंह भी मानते हैं। दूरभाष पर बातचीत में उन्होंने कहा कि सूबे में प्लास्टिक के फ्लैक्स के उपयोग को लेकर राज्य सरकार जल्द ही एक नीति बनायेगी। उन्होंने बताया कि वे स्वयं मानते हैं कि फ्लैक्स के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण दुष्प्रभावित हो रहा है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राज्य सरकार जल्द ही सरकारी कार्यक्रमों में इसके इस्तेमाल पर रोक लगाने के संबंध में निर्णय लेगी।

खैर पहले जब फ्लैक्स नहीं थे तब धरना-प्रदर्शन से लेकर विभिन्न कंपनियां अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए कपड़े की सहायता से बैनर बनवाया करती थीं। लेकिन फ्लैक्स के आने के बाद कपड़े का बैनर अतीत बन गया। इसके कारण जहां एक ओर इस व्यवसाय से जुड़े पेंटर बेरोजगार हो गये तो दूसरी ओर फ्लैक्स बनाने वालों की बाढ़ सी आ गयी। फ्लैक्स का व्यवसाय करने वाले एक उद्यमी के मुताबिक प्रत्येक दिन वह कम से कम पांच हजार मीटर फ्लैक्स प्रिंटिंग करता है। जबकि अकेले केवल राजधानी पटना में तीन सौ से अधिक फ्लैक्स कारोबारी हैं। फ्लैक्स उद्यमी स्वयं मानते हैं कि फ्लैक्स पर प्रिंटिंग पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है लेकिन टेक्नोलॉजी के कारण जहां एक ओर यह आसान है तो दूसरी ओर यह ड्यूरेबल भी होता है जिसके कारण ग्राहक केवल इसीकी मांग करते हैं।

बहरहाल फ्लैक्स के उपयोग को लेकर राज्य सरकार कोई गाइडलाइन तय करे, यह तो महत्वपूर्ण है ही। साथ ही इसे सख्ती से लागू भी करे ताकि पूरे सूबे को प्लास्टिक के कचरों से पटने से बचाया जा सके। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि राज्य सरकार ने प्लास्टिक के थैलों को प्रतिबंधित कर रखा है और समय-समय पर इसके लिए कार्रवाईयां भी की जाती हैं, लेकिन नतीजा आजतक सिफर ही है। इसकी एक वजह समाज में प्लास्टिक पर बढ़ती निर्भरता भी है।

पूसा को मिला केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का दर्जा, केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने जतायी खुशी

नयी दिल्ली / पटना(अपना बिहार, 13 मई 2016) - समस्तीपुर में पूसा स्थित राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने बिहारवासियों को बधाई देते हुए कहा है कि पूसा, समस्तीपुर में स्थित डॉ. राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने से बिहार की जनता की वर्षों पुरानी मांग पूरी हो गयी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के लोगों का एक बड़ा सपना पूरा कर दिया।

संसद ने कल, 11 मई, 2016 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय विधेयक - 2015 को अपनी मंजूरी दे दी। पहले राज्य सभा ने और फिर लोक सभा ने ध्वनिमत से इस विधेयक को पारित कर दिया। बाद में कल ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस पर हस्ताक्षर किए।

इस विधेयक के दोनों सदनों से पारित हो जाने के बाद केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय राज्य के लोगों के लिए शानदार तोहफा है। उन्होंने कहा कि अब इस विश्वविद्यालय को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाएगा। यह राज्य का पहला और देश का दूसरा केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय है। केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने कहा कि इस विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा दिलवाने के लिए पिछले सात वर्ष से प्रयास हो रहे थे। इस विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा मिलने से अब बिहार में महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के साथ दो बड़े केन्द्रीय विश्व विद्यालय दो वर्षों के अंदर खोलकर मोदी सरकार ने बिहार वासियों को सबसे बड़ा तोहफा दिया। 2009 से राज्य एवं भारत सरकार के बीच चल रहे विवाद का विराम भी हो गया और किसानों को एक बड़ा उपहार भी मिल गया।

आदित्य की हत्या से हुआ मर्माहत : तेजस्वी

गया में जदयू एमएलसी मनोरमा देवी के पुत्र रॉकी द्वारा आदित्य सचदेवा की हत्या मामले में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने गहरा दुख व्यक्त किया है। Read More>>>

खास खबर : शराबबंदी ने सीमांचल में महिलाओं को बनाया वाइन स्मगलर

- रजा मुराद

किशनगंज(अपना बिहार, 12 मई 2016) - शराबबंदी को शेष बिहार में भले ही कड़ाई से लागू कराया जा रहा हो, लेकिन सीमांचल के जिलों में न तो स्थानीय प्रशासन पूरी जवाबदेही के साथ एक्शन में है और न ही स्थानीय शराबियों पर सरकार की अपील का कोई असर पड़ रहा है। हालत तो यह हो गयी है लोग बड़े आराम से सीमा पार कर मदिरा सेवन करते हैं। इसके अलावा गरीब महिलायें इन दिनों वाइन स्मगलर बन गयी हैं। सीमा पर महिला जवानों की तैनाती नहीं होने के कारण शराब के कारोबार से जुड़ी महिलाओं की जांच नहीं की जाती है।

शराबी धड़ल्ले से होटल ढाबा और बीयर बारों में जाम से जाम टकरा रहे हैं। बिहार और नेपाल के सटे जोगबनी,रंगेलि ,जनता, विराटनगर आदि महज 5 से 30 किलोमीटर के अंदर आते है। जो महज 10 मिनट से 30 मिनट की दुरी तय कर बड़े ही आराम से शराव पीकर वापस चले आते है। जिस कारण शारब के ठिकाने पर जमघट लगा रहता है। हर दिन हजारों की संख्या में लोग नेपाल पहुँच कर जाम छलका रहे है ।बिहार में पूर्ण शराबबंदी से जहा पड़ोसी देश नेपाल के मयखाने गुलजार हो रहे है। शराब के शौकीन खुली सीमा का लाभ उठा करा आसानी से छोटे-बड़े वाहनों व पैदल चले आते है और मस्त होकर वापस लौट आते है।।

अब शराब तस्करी की बात भी सामने आ रही है। नेपाल से चोरी छिपे शराब तस्करी की बात सामने आ रही है। ग़ौरतलब है कि जहा शराब के शौकीन ऊंची कीमत पर भी शराब खरीदने को तैयार हैं। वहीं तस्करो का गिरोह भारी मुनाफा कमाने के लिए शराब के तस्करी का कारोबार शुरू कर दिया है। बताते चलें कि हाल में ही बंगाल से बालू लदे ट्रक पर शरब की बोतले पकड़ी गयी थी। इतना ही नहीं शराब तस्कर टिफिन और झोलों में शराब भरकर उसे ले आते हैं।

बहरहाल, इसमे कोई शक नहीं है कि बिहार और नेपाल के बीच लोगों का शादी विवाह होने के कारण और रोजी-रोटी का सम्बन्ध रहा है। इसी वजह से बॉर्डर के बगल पर लगे खेत की फसल का फायदा उठाकर तस्कर छुप कर आसानी से तस्करी कर सीमा पार हो जाते है । अभी कुछ माह पुर्व ही नेपाल में जब पेट्रोलियम पधार्थ की भारी किल्लत और दामों में वृद्धि हुई थी तब डीजल और पेट्रोल की जम कर तस्करी की जा रही थी।

संपादकीय : उत्तराखंड शक्ति परीक्षण का लोकतांत्रिक यथार्थ

दोस्तों, संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी प्रांत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना पड़ा और इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट में होगा कि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम क्या होगा। हालांकि इस देश में अबतक कई बार विभिन्न राज्यों में विश्वास मत पर प्रस्ताव पेश किया जा चुका है और लोकतांत्रिक मान्यताओं के मुताबिक भविष्य में भी इसे दुहराया जाता रहेगा।

हालांकि उत्तराखंड के मामले में पूरा खेल प्रारंभ से ही नकारात्मक रहा। बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप उत्तराखंड संकट का समाधान विधानसभा में विधायकों के बहुमत के आधार पर ही हो सकता है। इस हेतु पहले 28 मार्च, फिर 30 मार्च फिर 29 अप्रैल पर अटकते हुए अंतत: 10 मई को विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराना ही पड़ा। नौ कांग्रेसी विधायकों के विद्रोह के बाद राज्यपाल ने 28 मार्च को मुख्यमंत्री हरीश रावत को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा था, परंतु उसके पहले ही केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

फिर उत्तराखंड हाईकोर्ट में जस्टिस ध्यानी की बेंच ने 29 मार्च के आदेश से विधानसभा में 31 मार्च को विधायकों के बहुमत परीक्षण का निर्देश दिया था, जिसे केंद्र सरकार की अपील पर चीफ जस्टिस की बेंच ने 30 मार्च के आदेश से स्थगित कर दिया। चीफ जस्टिस जोसफ ने मामले की सुनवाई करते हुए 21 अप्रैल के आदेश से केंद्र सरकार के विरुद्ध सख्त टिप्पणी करते हुए राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना को निरस्त कर दिया और 29 अप्रैल को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए निर्देश दिया। केंद्र सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को स्थगित कर दिया पर 6 मई के आदेश से 10 मई को विधानसभा में बहुमत परीक्षण का निर्देश दिया, जो अब संपन्न हो चुका है।

सुप्रीम कोर्ट में वरीय अधिवक्ता विराग गुप्ता ने इस संबंध में एक नये पहलु की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि 'नायक' फिल्म में अनिल कपूर एक दिन का मुख्यमंत्री बनकर पूरे राज्य में बदलाव ला देते हैं, उसी तर्ज पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद बगैर अधिसूचना के हरीश रावत ने अपने घर में ही 21 अप्रैल को मंत्रिमंडल की बैठक कर अनेक बड़े निर्णय लिए थे, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा गैरकानूनी बताया गया था। संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू होता है, जिसमें विधानसभा भी निलंबित रहती है। हाईकोर्ट द्वारा राष्ट्रपति शासन के दौरान शक्ति परीक्षण को केंद्र सरकार ने असंवैधानिक करार दिया था, परंतु अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश से 2 घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना को निलंबित करते हुए विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराया, जिसके लिए जगदंबिका पाल मामले को आधार माना गया। राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल ही राज्य के शासन को संभालते हैं। सामान्य तौर पर संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिमंडल की अनुशंसा पर काम करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में राज्यपाल को दो घंटे के लिए प्रमुख नियुक्त किया है। अब सवाल यह है कि आज दो घंटे के लिए क्या कानूनी तौर पर हरीश रावत मुख्यमंत्री थे...? अगर यह सच नहीं है तो क्या आज दो घंटे के काल में राज्यपाल, राष्ट्रपति द्वारा ही संचालित थे...?

खैर इस कानूनी सवाल के परे एक बड़ा सवाल लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा है। जिस प्रकार से विधायकों के खरीद फरोख्त की बातें सामने आयी हैं, वे हालांकि नयी नहीं हैं। इस तरह के पैंतरे पहले भी कई राज्यों में आजमाये जाते रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड मामले में नयी बात सामने यह आयी कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने प्रारंभ से ही तेवर तल्ख कर रखा था। इस मामले में ट्वीस्ट तब आया जब कांग्रेस के 9 बागी विधायकों को स्पीकर ने दल-बदल कानून के तहत 27 मार्च को अयोग्य घोषित कर दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 9 मई के आदेश से स्पीकर के निर्णय पर मोहर लगा दी। इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इंकार करते हुए मामले को 12 जुलाई को सुनवाई के लिए लगाया। लेकिन उसके पहले ही बहुमत का प्रस्ताव पेश किया गया। जाहिर तौर पर उत्तराखंड में लोकतांत्रिक संकट को लेकर सवाल कई और हैं जिनका जवाब आने वाले समय में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का शुद्धिकरण तो करेगा ही साथ ही लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत भी करेगा।

संपादकीय : दुश्मनी की राह पर भारत-नेपाल

दोस्तों, बीते दो वर्षों में यानी पीएम नरेंद्र मोदी के राज में देश के अंदर के हालात तो विषम हुए ही हैं, बाहरी हालात भी उनकी असफ़लता की दास्तां कह रही है। सबसे बड़ा उदाहरण भारत और नेपाल के बीच बढती खटास है जो असल में अब खटास की परिधि लांघते हुए दुश्मनी तक पहुंच गयी है। लिहाजा लुम्बिनी महोत्सव को लेकर सवाल उठे ही हैं और सबसे अधिक चिंतनीय यह है कि नेपाल ने भारत से अपना राजदूत वापस बुलाने का निर्णय लिया है। अब तो पानी सिर के उपर बहने लगा है। Read More>>>

संपादकीय : एमएलसी के बेटे को मिले फ़ांसी

दोस्तों, राजनीति के कई रंग होते हैं। शुक्रवार को देर रात गया जिले में जो घटना घटित हुई है, वह न केवल निंदनीय है बल्कि सरकार के अस्तित्व पर सवाल भी उठाता है। जदयू विधान पार्षद मनोरमा देवी के बददिमाग बेटे ने एक बारहवीं कक्षा के छात्र की हत्या केवल इसलिए कर दी क्योंकि मृतक ने विधान पार्षद के बददिमाग बेटे को पास नहीं दिया। दोनों कार से थे और पास नहीं मिलने पर आरोपी ने मासूम छात्र को गोली मार दी। हालांकि इस मामले में कानून अपने हिसाब से काम कर रहा है। नतीजतन आरोपी फ़रार है जबकि पुलिस ने उसके पिता बिन्देश्वरी यादव उर्फ़ बिंदी यादव और सरकारी अंगरक्षक को गिरफ़्तार कर लिया है। Read More>>>

मातृ दिवस की सार्थकता और सवाल

अगर किसी बच्चे के लिए मां उसकी जरूरत है, व उसकी आकांक्षाओं का फल तो मां के लिए भी बच्चा उसका गौरव है, हक है, उसकी उम्मीद है, विश्वास है व उसके जीने का सहारा भी - कुलीना कुमारी Read More>>>

सामाजिक न्याय की सरकार के लिए कलंक है औरंगाबाद जिले का बंदया थाना

दोस्तों, वर्तमान में जो सरकार बिहार में है, उसका सबसे बड़ा आधार सामाजिक न्याय है। स्वयं लालू प्रसाद अप्रत्यक्ष रुप से सरकार के मुखिया हैं और कभी उनके सबसे करीबी रहे नीतीश कुमार प्रत्यक्ष रुप से मुख्यमंत्री। यह संयोग है कि बिहार को इस समय सामाजिक न्याय के दो सबसे बड़े नेताओं के संरक्षण में आगे बढने का अवसर मिल रहा है। शराबबंदी इसका एक नायाब उदाहरण है। लेकिन अभी भी कई मामले हैं, जिनसे सूबे में सामाजिक न्याय कलंकित हो रहा है। एक उदाहरण औरंगाबाद में बंदया थाना है। इसकी स्थापना वर्ष 2014 में हुई और थाना भवन पूर्व विधायक रणविजय कुमार के घर में है। Read More>>>

मातृ दिवस पर विशेष

ये राजनेता भी मानते हैं, सबसे प्यारी है मां

बेघर बच्चियों को यहां मिलता है एक साथ कई मांओं का प्यार

अपनी बात : कुछ बातें तुमसे भी मेरी मां

- नवल

जीवन के तीन दशक पूरे हो चुके हैं। मेरी प्यारी मां तुम अब भी मेरे साथ हो। दिन के उजाले से लेकर रात के अंधियारे तक। सुख और दुख के बीच हर पल चुनौतियों से जुझता मेरा अंतर्मन शायद बड़ा हो गया है। अब मैं तुम्हारा पहले वाला नवल नहीं रहा। बदल चुका हूं। समाज, बाजार, सरकार, अखबार और न जाने कितने कारकों ने मुझे वैसा नहीं रहने दिया है, जैसा तुमने सोचा था। हालांकि वह तो तुम ही थी न मां, जो रोज स्कूल जाने से पहले मेरा माथा चुमती थी और कहती थी कि मैं बड़ा होकर बड़ा आदमी बनूं। खूब सारे पैसे हों। हां, बचपन में मैं तुमसे हाथी-घोड़े, कार, हवाई जहाज सब मांगता था। नहीं देने पर तुम्हारे आंचल का कोना पकड़कर रोता था।

आज पता नहीं, मन फ़िर रोना चाहता है। लेकिन ख्वाहिशें वैसी नहीं रही मां। ख्वाहिशों ने भी आकार बढा लिया है। शायद इतना जिसकी कल्पना न मैंने की थी और न ही तुमने। शायद हाथी-घोड़े और हवाईजहाज से भी बड़े। जब छोटा था तुम्हारे गुल्लक से पैसे चुराकर अपने लिये पांच पैसे में लेमनचूस और चार आने का मार्टन के अलावा कभी कभार एक रुपए में हाथी-घोड़ा भी खरीद लेता था। तुम तो सब जानती थी न मां। तुम्हारे गुल्लक के पैसे कहां जाते थे। हां, तुम सब जानती थी। इसलिए गुल्लक घर की आलमारी के सबसे निचले हिस्से में रखती थी ताकि मेरे छोटे-छोटे हाथ पहुंच सकें।

अब पांच पैसे और आठ आने का जमाना नहीं रहा। तुम्हारे बेटे की खुशियों की कीमत आसमान छुने लगी हैं। लेकिन खुशियां खरीदी नहीं जाती हैं। यह तो तुम कहती थी न मां! फ़िर आज मुझे खुशियों के लिए कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है। तुम कहोगी कि जमाना बदल रहा है तो खुशियां भी बदल रही हैं। यह सब वैसे ही जैसे मैं बदला हूं। मेरे देखने का नजरिया बदला है।

तुम ठीक ही कह रही हो मां। मेरा देखने का नजरिया बदल गया है। अब मुझे बाजार और समाज सब दिखने लगा है। अपने गांव में रोज बनते आलीशान मकान और अधिक से अधिक धन कमाने की होड़ कर रहे मेरे बचपन के सब दोस्त। गांव के बाहर मुसहरी में रहने वाले बैजू काका भी बदल गये हैं। बुढे हो गये हैं। तुम्हारे और पापा की तरह। लेकिन अब भी उनकी बस्ती वीरान क्यों है? इस सवाल का जवाब भी जानता हूं लेकिन वह तो किताबी बात है।

असलियत तो यह है कि मां कुछ नहीं बदला। न मैं बदला हूं, न तुम और न देश-दुनिया। सब वैसा ही है जैसे पहले थे। तुम्हारे ही शब्दों में सब वक्त का फ़ेरा है। वक्त अपने हिसाब से चीजें तय करता है। पुराने चेहरों का एक-एक कर लोप होना और नये चेहरों का आना। यह आना-जाना लगा रहता है। लेकिन मैं उसका क्या करुं मां, जिसका डर मुझे हर पल सताता है। जबसे पैरालाइसिस ने तुम्हे स्थिर किया है, हर पल डर लगता रहता है। अजीब दुविधा है न मां। तुम्हारा बेटा अब शेर, बाघ से नहीं डरता है लेकिन वक्त से डरता है। मां इस डर से मुझे बचाओ। फ़िर कोई कहानी सुनाओ या फ़िर मेरे माथे पर काजल का टीका लगा दो। कुछ न कुछ तो उपाय होगा न मां।

खास रिपोर्ट : काशी के बहाने पूर्वांचल पर रहेगी नीतीश की नजर

दोस्तों, आगामी 12 मई को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से अपने राष्ट्रीय अभियान की शुरूआत करेंगे। हालांकि माना जा रहा है कि श्री कुमार का कार्यक्रम भले ही वाराणसी यानी काशी में हो रहा है लेकिन इसका असर पूर्वांचल पर पड़ने की उम्मीद है। अपने राष्ट्रीय अभियान के शानदार आगाज के लिए जदयू ने तैयारी युद्ध स्तर पर कर रखा है। जदयू नेताओं के मुताबिक फिलहाल लक्ष्य यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने का है और साथ ही अपने अस्तित्व को मजबूत बनाना है। Read More>>>

संपादकीय : यथास्थितिवादी रघुवर दास की बेचैनी

दोस्तों, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धनबाद में वहां की महिलाओं के निमंत्रण पर जायेंगे और झारखंड में शराबबंदी के लिये आंदोलन का आगाज करेंगे। उनके जाने से पहले ही वहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास की बेचैनी सामने आयी है। श्री दास ने बिहार में शराबबंदी को लेकर कहा है कि दस सालों तक नीतीश कुमार ने लोगों को शराब पिला-पिलाकर नशेड़ी बना दिया और अब शराबबंदी की बात करते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि झारखंड में बिहार नहीं बल्कि गुजरात मॉडल चलेगा। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार अंगुली काटकर शहीद बनना चाहते हैं। Read More>>>

अगस्टा मामले में खुली केंद्र की पोल : मीसा

पटना (अपना बिहार, 6 मई 2016) - अगस्टा बेस्टलैंड हेलीकॉप्टर डील मामले में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की पोल खुल गयी है। राजद की वरिष्ठ नेत्री डा. मीसा भारती ने फेसबुक पर जारी अपने बयान में एक पत्रिका में छपी खबर के आधार पर कहा कि पूरे मामले में बिचौलिया की भूमिका निभाने वाले क्रिश्चियन मिचेल ने केंद्र की इस साजिश का भंडाफोड़ कर दिया है। उसका कहना है कि मोदी सरकार ने मुझपर दबाव डाला कि मैं अगूस्ता वेस्टलैंड कांड में गांधी परिवार का नाम लूँ। श्रीमती भारती ने कहा कि मोदी सरकार अब धूर्तता और चालबाजी से विपक्ष पर दबाव बनाना चाहती है क्योंकि अब सरकार भी समझ चुकी है अच्छे काम से नाम कमाना उसके बस की बात नहीँ, क्योंकि उसके लिए योग्यता होनी चाहिए। जब खुद नाम ना कमा सको तो दूसरे को बदनाम कर दो

आंखों देखी : एक नदी की हत्या

दोस्तों, वह भी एक नदी थी। बेशक उसका स्वरुप गंगा, कोसी, गंडक या बागमती के जैसी नहीं थी। वह एक छोटी नदी थी। लेकिन थी बड़ी प्यारी। बरसात के दिनों में उसमें पानी भर जाता और वह समस्तीपुर के बड़े हिस्से को सजीव बना देती थी। लेकिन अब उस नदी की हत्या हो चुकी है।

हत्या का तरीका भी बड़ा बर्बर था। धीरे-धीरे उसकी गर्दन रेती गयी। गर्दन रेतने वालों में सरकार और समाज दोनों शामिल रहे। आज हालत यह है कि छोटी और प्यारी सी जमुआरी नदी दम तोड़ चुकी है। उसके पार्थिव शरीर पर सरकार ने जहां एक ओर कई पुल बना दिये हैं तो समाज के लोगों ने उसके पेट में आलीशान इमारतें। सबसे खास बात यह है कि जमुआरी की हत्या पर आजतक किसी ने शोक व्यक्त तक नहीं किया है और न ही किसी ने उसकी अंत्येष्टि ही की। किसी ने उसकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन तक नहीं किया और न ही उसके लिए एक शब्द।

समस्तीपुर को समस्त प्राकृतिक गुणों की वजह माने जानी वाली इस नदी के कारण ही वहां लगभग सभी तरह के फ़सल उगाये जाते हैं। दोमट मिट्टी और जमुआरी का ममत्व समस्तीपुर को पूरे बिहार में खास बनाता था। संभवतः यही वजह रही कि पराये अंग्रेजों ने कृषि के विकास के लिए पूसा का चयन किया होगा। जिन दिनों जननायक कर्पूरी ठाकुर जीवित थे तब जमुआरी नदी का अस्तित्व कायम था। बाद के दिनों में न तो सरकार ने इसकी सुध ली और न ही यहां के लोगों ने। आज यह नदी एक नाले के रुप में सिमट गयी है।

बहरहाल, सवाल समाज और सरकार दोनों के समक्ष है। क्या ये दोनों अपना गुनाह स्वीकार करेंगे?

खास खबर : घर में अनाज नहीं, कर्ज लेकर पानी खरीदने की मजबूरी

दोस्तों, गंगा, गंडक, बागमती और कोसी जैसी नदियों के कारण पूरे देश में सबसे अधिक ऊर्वर माने जानी वाली बिहार की धरती पर पानी का संकट आ गया है। खासकर उत्तर बिहार के कई जिले इन दिनों भीषण पेयजल संकट झेल रहे हैं। हालत यह हो गयी है कि लोग अब पानी खरीदकर पीने को मजबूर हैं। सबसे बुरे हालात उन लोगों के हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे अपने परिवार के लिए अनाज खरीद सकें, इसके बावजूद वे कर्ज लेकर भी पानी खरीदने को तैयार हैं।

उत्तर बिहार के जिन जिलों में भूगर्भ जल स्तर तेजी से घटता जा रहा है, उनमें समस्तीपुर सबसे अहम जिला है। दोमट मिट्टी के कारण जल संचयन की सबसे अधिक क्षमता के बावजूद इस जिले में इस वर्ष भूगर्भ जल स्तर में चार सौ फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गयी है। मसलन जिले के बखरी बुजुर्ग प्रखंड के उदापट्टी इलाके में लोगों की परेशानी इस कदर बढ़ गयी है कि वे अब खरीदकर पानी पी रहे हैं। स्थानीय निवासी लल्लू पासवान ने बताया कि उनके गांव के वे सभी चापानल जिनकी गहराई डेढ़ सौ फीट से कम है, बेकार हो चुके हैं। पूरे गांव में एक चापानल है जिसे राज्य सरकार द्वारा पिछले वर्ष लगवाया गया था, सजीव है। इस एक चापानल से पूरा गांव पानी पीता है। श्री पासवान ने बताया कि इस चापानल का पानी भी प्रदूषित है। थोड़ा देर पानी छोड़ देने के बाद इसका रंग पीला हो जाता है।

गौरतलब है कि समस्तीपुर भी राज्य के उन जिलों में शुमार है जहां के भूगर्भ जल में आर्सेनिक व आयरन खतरे के मानक को पार कर चुका है। श्री पासवान बताते हैं कि पानी दूषित होने के कारण ही लोग पानी खरीदकर पीते हैं। हालांकि अब भी कई परिवार ऐसे हैं जो दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।

खरीदकर पानी पीने की मजबूरी सरायरंजन प्रखंड के दर्जनों गांवों में देखी जा रही है। स्थानीय लोगों ने बताया कि अधिकांश गांवों में चापानल पूरी तरह बेकार हो चुके हैं। जबकि समस्तीपुर के कर्पूरी ग्राम यानी जननायक कर्पूरी ठाकुर के पैतृक गांव में पहले से ही सरकार द्वारा पाइप के जरिए जलापूर्ति की व्यवस्था है। लिहाजा जननायक के गांव में जल संकट की स्थिति नहीं है। लेकिन दूषित पानी के कारण सक्षम लोग वहां भी पानी खरीदकर पीते हैं। वहीं ताजपुर जैसे इलाके में भी लोगों को बाजारू पानी के आसरे जीना पड़ रहा है।

बहरहाल भीषण जल संकट और दूषित पानी के कारण पूरे जिले में पानी के कारोबारियों की चांदी हो गयी है। कारोबारियों ने पानी का रेट भी अलग-अलग रखा है। मसलन आरओ वाटर की कीमत अधिकतम पांच रुपए प्रति लीटर है तो प्लेन वाटर की कीमत एक रुपए प्रति लीटर है। वहीं ऐसे व्यवसायियों की भी कोई कमी नहीं है जो आरओ वाटर के नाम पर प्लेन वाटर भी बड़े आराम से बेचते हैं।

वहीं इस मामले में जिला प्रशासन की भूमिका सरकार के अस्तित्व पर सवाल उठाता है। पूछने पर पदाधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा मुख्यमंत्री चापानल योजना बंद किये जाने के कारण बंद पड़ चुके चापानलों की मरम्मती संभव नहीं है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने अपने सात निश्चयों में हर घर पाइप से जलापूर्ति का निश्चय किया है।

मनुवादी मूल्यों को खारिज करने वाला समतावादी साहित्य बने हिन्दी की मुख्यधारा : प्रमोद रंजन

हिन्दी साहित्य के इतिहास को आज प्रायः दो दृष्टिकोणों से देखा जाता है। एक खेमा उन कलावादियों और द्विज मार्क्सवादियों का है (इस मसले पर दोनों लगभग एकमत ही हैं), जो इतिहास लेखन को रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा द्वारा दी गई दिशा में ही आगे बढ़ाने का आग्रही है, जबकि दूसरा खेमा हंसवादी लेखकों का है, जो अपने एकांगीपन को विभिन्न प्रकार के पर्दों में ढंकने की निरंतर कोशिश करते रहते हैं। ।Read More>>>

संपादकीय : लालू प्रसाद के धार्मिक आचरण पर सवाल क्यों?

दोस्तों, धर्म की कोई एक परिभाषा संभव नहीं है। वजह यह है कि यह समाज पर पूरी तरह आधारित है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि समाज अपने हिसाब से अपना धर्म और इसके रीति-रिवाज तय करता है। वहीं यह बात भी सही है कि धर्म का उपयोग सत्ता के लिए किया जाता रहा है और इसे सामाजिक शोषण का सबसे अचूक हथियार भी माना गया है। इन सबसे अलग धर्म की एक परिभाषा यह भी है कि मूल रुप से यह व्यक्तिगत विषय है जबकि विस्तार सामूहिक है।

मौजूदा दौर में धर्म को राजनीति का हथियार बनाने के सबसे अधिक प्रभावशाली विरोधियों में लालू प्रसाद शिखर पर हैं। उन्होंने आरएसएस के खिलाफ़ अपने राजनीतिक सिद्धांत से कभी कोई समझौता नहीं किया। अभी हाल ही में उन्होंने अपने घर पर सुंदर कांड का पाठ कराया। वह भी परंपरागत परिधानों में। बिल्कुल एक आम इंसान के जैसे। इस तस्वीर को फ़ेसबुक पर प्रकाशित करने के बाद मेरे दो अहम मित्रों ने टिप्पणियां की। एक मित्र ने लालू प्रसाद के सामाजिक समावेशी राजनीति पर सवाल खड़ा किया। मेरे एक अन्य मित्र ने मोबाइल पर फ़ोन कर अपनी आपत्ति व्यक्त की कि महावीर मंदिर में पूजा-पाठ करने के बाद कोई सेक्यूलर कैसे रह सकता है? एक मित्र ने तो यह भी लिखा कि श्री प्रसाद ब्राह्म्णों की धार्मिक गुलामी से आजाद नहीं हो सके हैं।

सवाल यह है कि क्या केवल पूजा-पाठ करने मात्र से श्री प्रसाद के धर्म निरपेक्ष चरित्र पर सवाल खड़ा किया जा सकता है? लेकिन इस सवाल के पहले उनके धर्म निरपेक्ष चरित्र पर सवाल उठाने वालों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि लालू प्रसाद ने क्या आजतक किसी भी धर्म का विरोध किया है? वे मंदिरों में जाते हैं, मस्जिदों में जाते हैं। मजारों पर चादरपोशी करते हैं। हालांकि उन्होंने हिन्दू धर्म के पाखंड को लेकर उस समय अधिक प्रभावशाली तरीके से विरोध किया था जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। तब उन्होंने गैर ब्राह्म्णवाद को भी तरजीह दी थी। सवाल यह है कि गैर ब्राह्म्णवादी होने का मतलब गैर हिन्दू होना है?

बहरहाल लालू प्रसाद आज की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का मानक बन चुके हैं। इसलिए सवाल भी उठेंगे। लेकिन यह सब प्राकृतिक चीजें हैं। वजह यह है कि उन्होंने न केवल राज्य बल्कि देश की राजनीति को एक रंग में रंगने के भगवावादी साजिशों का डटकर पूरी प्रतिबद्धता के साथ सामना किया है। वहीं दुसरी ओर उन्होंने अपना धार्मिक आचरण अपने हिसाब से तय किया है, जो सचमुच में व्यक्तिगत विषय है। लेकिन चूंकि लालू प्रसाद अब केवल एक इंसान का नाम नहीं है, अब ये दो शब्द देश के सबसे अधिक प्रभावशाली राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, लिहाजा समाज में सवाल तो उठेंगे ही और समाज ही इन सवालों का जवाब भी देगा।

संपादकीय : भगवा आतंकवादी और माले गांव के बेकसूर मुसलमान

दोस्तों, मुंबई की विशेष मकोका अदालत ने माले गांव सिलसिलेवार बम विस्फ़ोटों के एक मामले में सभी आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बेकसूर करार दिया है। आरोपमुक्त हुए सभी आरोपी मुसलमान हैं। इनके उपर माले सितंबर 2006 को गांव के मक्का मस्जिद के पास जुमा के नमाज के दिन विस्फ़ोट करने का आरोप था। इस पूरे मामले में दिलचस्प यह है कि इस मामले की जांच पहले महाराष्ट्र के एटीएस दस्ते ने शुरु की थी और नौ लोगों को गिरफ़्तार किया गया था। बाद में यह मामला सीबीआई को सौंप दी गयी थी। सीबीआई ने भी एटीएस की जांच पर ही मुहर लगा दी थी। Read More>>>

सूबे में जल संकट को लेकर लालू प्रसाद का ऐतिहासिक संबोधन

दोस्तों, सूबे में जल संकट कोई नई समस्या नहीं है। पूर्व में भी सरकार और समाज इससे जुझता रहा है। जल संकट के लिए नदियों के प्रबंधन को अहम कारण माना गया है और समाधान के रुप में नदियों को जोड़ने की बात कही गयी। इसी विषय पर 2 अप्रैल 2003 को पटना में बिहार विधान परिषद के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए लालू प्रसाद ने वह कहा जो उस समय भी सच था और आज भी मुंह बाये खड़ा है। सवाल सरकार और समाज दोनों के समक्ष है। प्रस्तुत है जल संकट को लेकर श्री प्रसाद द्वारा का ऐतिहासिक संबोधन -

स्वर्गीय चौधरी देवीलाल जी बराबर नदियों को जोड़ने के लिए गारलैंड स्कीम की बात करते रहते थे। हमलोगों के नेता थे। इधर महामहिम राष्ट्रपति जी से अभिभाषण कराया गया कि पूरे देश की नदियों को, जिसमें कहीं सूखा है, कहीं बाढ है और कहीं तबाही है। सिंचाई की बात तो दूर, बहुत सारे राज्यों में पीने के पानी का घोर अभाव है। यह कहा गया है कि हम पूरी नदियों को, सारे बेसिनों को जोड़कर जल की परिक्रमा कराते रहेंगे, यहीं कैम्पेन और यही प्रचार और यही बात हर जगह लोगों को समझायी जा रही है और बतायी जा रही है। हम धन्यवाद देते हैं जगदा बाबू को, सभापति जी को और हमारे जो अभियंतागण हैं उनको, कि ऐसी खतरनाक बात पर जहां ढोल पीटा जा रहा है कि यह होगा, वह होगा, पता नहीं, होगा भी कि नहीं होगा? कहा जाता है कि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। ख्वाबों की दुनिया में हमलोग विचरण कर रहे हैं।

जिस तरह से बिहार का कोयला, यूरेनियम, बाक्&#