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Friday, 24 March 2017

Special Reports

महागठबंधन में कोई मतभेद नहीं : मीसा

पटना(अपना बिहार, 24 मार्च 2017) - राज्यसभा में राजद सांसद डा. मीसा भारती ने कहा है कि बिहार में महागठबंधन में कोई मतभेद नहीं है। बिहार विधानमंडल परिसर में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अच्छा काम कर रही है। चुनाव पूर्व जो वादे महागठबंधन ने किया किया था, उन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है। वहीं महागठबंधन में विवाद को लेकर पूछे गये सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि विवाद का कोई सवाल ही नहीं है। सभी घटक दल आपस में बेहतर समन्वय के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जहां एक साथ कई बर्तन होते हैं वहां कभी-कभार आवाजें होती ही हैं, लेकिन इसका मतलब कोई विवाद नहीं होता है।

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बिहार और यूपी सहित अनेक राज्यों इस्लामिक विषयों के जानकार व पूर्व सांसद सह वर्तमान में बिहार विधान परिषद में जदयू के सदस्य मौलाना गुलाम रसूल बलियावी की नजर में जम्हूरियत यानी लोकतंत्र का संबंध इंसानियत से है। अपना बिहार से विशेष बातचीत में उन्होंने तीन तलाक का सवाल उठाने वाली महिलाओं को मस्तमंडली कहा और यह भी कहा कि भारतीय संस्कृति में महिलायें केवल चमड़े का देह नहीं, आस्था और सम्मान का प्रतीक हैं। यूपी चुनाव परिणाम के मद्देनजर उनसे विशेष बातचीत का संपादित अंश -

नवल - यूपी चुनाव में भाजपा को बड़ी जीत मिली। इसे आप किस रूप में देखते हैं?

गुलाम रसूल बलियावी : देखिए, मेरे हिसाब से यूपी का चुनाव परिणाम भाजपा की जीत से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस चुनाव में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का खोखलापन उजागर हुआ। किसी भी तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टी ने न तो मुसलमानों के हक-हुकूक के लिए पहल किया और न ही समाज के अंतिम पायदान पर रहने वाले गरीबों के लिए। मेरे हिसाब से तो यूपी का चुनाव परिणाम भारत में लोकतंत्र के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करने वाला है। असल यह है कि जम्हूरियत का पर्याय इंसानियत है। इसे केवल हिन्दू अथवा मुसलमानों में बांटकर नहीं देखा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि राजनीति का मतलब जिंदा लोगों को तमाम नागरिक अधिकार व सुविधायें उपलब्ध कराना होता है न कि मरे हुए लोगों के लिए।

नवल : भाजपा के लोग कह रहे हैं कि यूपी में उसे सभी वर्गों यहां तक कि मुसलमानों ने भी उन्हें वोट किया। कहा जा रहा है कि तीन तलाक के मुद्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा को वोट किया।

गुलाम रसूल बलियावी : देखिये, यह कहने की बात है। असलियत कुछ और ही है। सबसे पहले तो बात उन महिलाओं की। वे महिलायें कौन हैं। पहले तो यह जानिए। मैं उन्हें मस्तमंडलियों की संज्ञा देता हूं, जिनका समाज में कोई वजूद नहीं है। उनकी इतनी भी आर्थिक सक्षमता नहीं है कि वे अपने लिए रोटी-पानी का जुगाड़ करें। वे सुप्रीम कोर्ट में महंगे वकीलों को फीस कैसे दे रही हैं। वे दिल्ली जैसी शहरों में महंगे फ्लैटों में रहती हैं। उन्हें यह सब कौन दे रहा है। वे रात-रात भर अपने घरों से बाहर रहती हैं।

नवल : आप उन महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं?

गुलाम रसूल बलियावी : जी बिल्कुल। आप ही बताइये। देश की आजादी के लिए लड़ने वाली लक्ष्मीबाई ने क्या चड्ढी पहनकर आजादी की लड़ाई लड़ी। आप इतिहास से कोई ऐसी महिला निकाल दें जिसने चड्ढी पहनकर देश के लिए कोई आंदोलन किया हो। यह भारत की संस्कृति में ही नहीं है। महिलाओं का शरीर केवल चमड़े का शरीर नहीं है। बल्कि यह आस्था और विश्वास का आधार है।

नवल : खैर, आप यह मानते हैं कि यूपी में भाजपा को मुसलमानों का वोट नहीं मिला?

गुलाम रसूल बलियावी : निस्संदेह नहीं। जहां तक मेरी जानकारी है, उसके हिसाब से भाजपा को फायदा केवल इस बात का मिला कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में वैसी एकता नहीं बन पायी जैसा कि बिहार विधानसभा चुनाव में था। उस समय नीतीश कुमार जी के नेतृत्व में सांप्रदायिक ताकतों को हराने के लिए पूरा बिहार एकजुट था। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ था। नीतीश जी ने एक वर्ष पहले से ही केंद्र में भाजपा सरकार के एक वर्ष पूरे होने के बाद पूरे राज्य में लोगों को बताया कि किस तरह केंद्र की मोदी सरकार अपने वादों मसलन सभी के खातों में 15-15 लाख रुपए और काला धन आदि। इन सब प्रयासों के अलावा बिहार में उनके नेतृत्व धर्मनिरपेक्ष ताकतें एक हुर्इं और इसका परिणाम हुआ कि बिहारवासियों ने भाजपाइयों को सिरे से खारिज कर दिया।

नवल : आने वाले समय में देश की राजनीति में यूपी चुनाव का असर होगा, इसे मानते हैं या नहीं?

गुलाम रसूल बलियावी : देखिए, भारतीय जनता अमन-चैन में विश्वास रखती है। भाजपा की विघटनकारी और विभाजनकारी नीतियों से पूरा देश परेशान है। देश की जनता उनके वादाओं का हश्र देख रही है। महत्वपूर्ण यह है कि देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें अल्पसंख्यकों के हक-हुकूक की बातें ईमानदारी से करें।

नवल : तो क्या आप मानते हैं कि धर्म निरपेक्ष पार्टियों ने अल्पसंख्यकों के सवालों को वाजिब तरीके से नहीं समझा या उसके निराकरण के लिए कोई प्रयास किया?

गुलाम रसूल बलियावी : भारत में मुसलमानों के हक की बात करने का मतलब ही आजकल विवादास्पद हो गया है। जबकि सच्चाई यह है कि पुलिस से लेकर सेना की भर्ती तक में मुसलमानों की उपेक्षा की जाती है। मेरे पास इसके पुख्ता सबूत हैं कि सारी अर्हतायें पूरी करने के बाद भी मुसलमान नवयुवकों को सेना या पुलिस में शामिल नहीं किया जाता है। मैं तो इस संबंध में न्यायालय भी जाऊंगा। देखिए कैसी विडंबना है। देश की सेना में राजपूत रेजीमेंट सरीखे कई रेजीमेंट हैं लेकिन पठान रेजीमेंट के अस्तित्व को ही मिटा दिया गया। आजतक कोई भी मुसलमान देश का न तो थल सेना अध्यक्ष बना है और नही जल सेना व वायु सेना का। यह क्या साबित करता है।

नवल : आपकी नजर में आपके आदर्श कौन हैं?

गुलाम रसूल बलियावी : मेरे हिसाब से तो पूरी दुनिया में एकमात्र वही सच्चा धर्मनिरपेक्ष है जो दुनिया को चलाता है। लोकतंत्र चार सिद्धांतों पर आधारित है। सच्चाई, उदारता, शक्ति और इंसाफ। यह सब पैगंबर मुहम्मद साहब के सिद्धांतों में निहित है।

नवल : देश के राजनीतिक नेताओं में आपके आदर्श कौन हैं?

गुलाम रसूल बलियावी : आप मौजूदा समय के राजनीति की बात कर रहे हैं। कोई शक नहीं है कि आजादी के बाद से लेकर आजतक मुसलमानों को केवल छला गया है। लेकिन गांधी जी, खान अब्दुल गफ्फार सीमांत गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जेपी और कर्पूरी ठाकुर कुछ ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब को समझा और उसे महत्व दिया। लेकिन उनके अनुयायियों ने सत्ता हासिल करने के बाद केवल इसे राजनीतिक मोहरा ही समझा है।

यूपी चुनाव का बिहार की राजनीति पर संभावित असर

- अरविंद शर्मा

उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे बिहार की राजनीति पर गहरा एवं दूरगामी असर डालेंगे। पड़ोसी राज्य में नरेंद्र मोदी विरोधी दिग्गजों राहुल गांधी, मुलायम सिंह, अखिलेश यादव और मायावती के बुरे हश्र ने करीब सवा साल पहले बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों को प्रासंगिक बना दिया, जब मोदी-शाह के ऐसे ही आक्रामक अभियान के बावजूद नीतीश कुमार ने अपने सियासी कौशल से ‘चमत्कार’ कर दिया था।

कहने की बात नहीं कि यूपी के चुनावी नतीजों ने नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है। मिशन-2019 की दृष्टि से यह बड़ा सियासी संकेत है। 

बिहार के संदर्भ में यूपी के नतीजे ने स्पष्ट कर दिया कि सियासत में विकास के वादे और काम के इरादे ही आखिरकार काम आते हैं। समाज को अगड़ा-पिछड़ा में बांटकर सत्ता में टिके रहना कठिन है। यूपी में समाजवादी पार्टी के एमवाई (मुस्लिम-यादव) फॉर्मूला तथा मायावती की तुष्टीकरण नीति को जनता ने खारिज कर दिया। मुकाबला अखिलेश सरकार की पांच वर्ष तथा मोदी सरकार की ढाई वर्ष की परफॉर्मेंस के बीच हुआ। बिहार में भी इसी आधार पर फैसला हुआ था। सत्ता संघर्ष में अब सवर्णों में नहीं, बल्कि पिछड़ों-दलितों में ही प्रतिस्पर्धा है। इसलिए अब सिर्फ सब्जबाग नहीं चलेगा। सबको तरक्की चाहिए।

नीतीश का कद बढऩा तय

सपा-कांग्रेस और बसपा की करारी हार से जदयू प्रमुख नीतीश कुमार को अप्रत्यक्ष तौर पर फायदा मिलना तय है। यूपी के चुनावी नतीजे के बाद भाजपा विरोधी प्रमुख चेहरों में नीतीश का नाम सबसे आगे है। हाल के दिनों में अखिलेश यादव ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की थी। पांच वर्षों के शासन और पार्टी पर कब्जे की कोशिश ने उन्हें राष्ट्रीय ख्याति दी थी। शिकस्त के बाद दोनों नेताओं में अब मुकाबला नहीं रहेगा। बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश ने जो करिश्मा दिखाया था, बाकी दिग्गज वैसा नहीं कर सके।

भाजपा का बढ़ेगा मनोबल

यूपी की फतह बिहार भाजपा के लिए टॉनिक की तरह काम करेगी। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं को सुकून एवं शीर्ष नेताओं के लडख़ड़ाते मनोबल को सहारा मिल सकता है। मिशन-2019 के लिए सूबे में भाजपा नए तरीके से फील्डिंग सजा सकती है। यूपी का सबक काम आएगा। मुख्य पार्टी की मजबूती से सहयोगी दलों के विचलित मन को स्थिरता मिल सकती है।

नए तरीके से होगी गोलबंदी

यूपी में भाजपा के सफल फॉर्मूले को बिहार भी अपना सकता है। भाजपा ने कुशवाहा समाज से केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। अपना दल की अनुप्रिया पटेल के जरिए पटेलों को साधा। भारतीय समाज पार्टी (भासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर की ताकत लेकर अपने प्रतिद्वंद्वी दलों के आधार को कमजोर किया। दोनों प्रतिद्वंद्वी दल जातीय गणना एवं तुष्टीकरण में लगे रहे, लेकिन भाजपा ने बहुमत की नब्ज को मजबूती से पकड़ा जिसने उसे अप्रत्याशित जीत दिलाई।

लालू बदल सकते हैं रणनीति

भाजपा ने जिस तरह यूपी में पिछड़े वर्ग में सेंध लगाकर अखिलेश यादव को बैकफुट पर पहुंचाया उससे लालू की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। भाजपा ने लालू के स्वजातीय नित्यानंद राय के हाथ में कमान देकर इरादे जाहिर कर दिए हैं। 2019 से पहले यूपी के संदेश को बिहार में पहुंचाने की कोशिश होगी।  ऐसे में महागठबंधन की एकता और अपने आधार वोट को बचाए रखने के लिए लालू अपनी रणनीति बदल सकते हैं।(दैनिक जागरण से साभार)

 

दोस्तों, राजनीति कभी भी सरल रेखा की नीति का अनुसरण नहीं करती है। यह आज महागठबंधन की राजनीति में भी लागू हो रही है। सूबे में सत्तासीन महागठबंधन में गांठें खोलने और नये गांठ जोड़ने की कोशिशें शुरु हो गयी हैं। हालांकि तीन घटक दलों के शीर्ष नेताओं ने अभी तक केवल अपनी निगाह बना रखी है।

वैसे देखा जाय तो महागठबंधन में ऐसे कई मुद्दे हैं जिन्हें लेकर आपस में तकरार बढने की संभावना रहती है। मसलन विभिन्न आयोगों के पुनर्गठन का मामला। यह सभी जानते हैं कि इन आयोगों को लेकर तीनों दलों के द्वारा अंतिम सूची निर्धारित कर ली गयी, लेकिन बावजूद इसके आयोगों का पुनर्गठन नहीं हो सका है। इस कारण तीनों घटक दलों के कार्यकर्ताओं व काबिल नेताओं में उदासी है।

हाल ही में महागठबंधन में विवाद उस वक्त नजर आया जब कांग्रेस ने राजद को चुनौती देते हुए विधान परिषद के लिए हुए गया स्नातक और गया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव हेतु अपने उम्मीदवार खड़े कर दिये। नीतीश कुमार पहले से ही भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में खड़े थे। लिहाजा राजद के उम्मीदवारों की हार हुई। दिलचस्प यह है कि गया स्नातक से जीते भाजपाई अवधेश नारायण सिंह ने जीतने के बाद नीतीश कुमार के प्रति सार्वजनिक रुप से आभार व्यक्त किया।

इस पूरे प्रकरण में मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। राजद ने विधान परिषद के सभापति पद पर दावा ठोंका है। उधर नीतीश कुमार अपने "येस मैन" अवधेश नारायन सिंह को फ़िर से काबिज करने की लालसा पाल रहे हैं। आगामी 8 मई को श्री सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। संभव है कि महागठबंधन में लगी यह आग तब और जोर पकड़ेगी। उल्लेखनीय है कि बिहार विधान सभा में अध्यक्ष पद जदयू ने दूसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद कब्जा जमाया और विजय कुमार चौधरी को अध्यक्ष बनवा दिया।

बहरहाल महागठबंधन में असल सवाल राजद के सम्मान का है जिसे जदयू और कांग्रेस बार-बार भंग कर रहा है। यहां तक कि प्रकाश पर्व के मौके पर स्वयं राजद प्रमुख लालू प्रसाद को मंचासीन नरेंद्र मोदी और नीतीश के सामने जमीन पर बैठना पड़ा। वहीं बिहार दिवस के मौके पर शिक्षा विभाग ने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव का सार्वजनिक तौर पर अपमान किया। दिलचस्प यह भी है कि लालू प्रसाद जैसे कुशल राजनीतिज्ञ सब कुछ अपनी आंखों से देख रहे हैं। जाहिर तौर पर मामला बहुत ही पालिटिकल है।

हर प्रहार का प्रतिकार हूं, हां मैं बिहार हूं....

बिहार दिवस पर विशेष

दोस्तों, कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाड़ हूं। हर प्रहार का प्रतिकार हूं। हां, मैं बिहार हूं। मेरी कहानी  इतिहास के पन्नों से परे भी है और वर्तमान की चुनौतियों की सीमा से अधिक विस्तारित भी। मेरा संघर्ष मेरी पहचान रही है। तब भी जब पूरे विश्व में सभ्यता का नामोनिशान नहीं था। मेरी कहानी उसी शून्य के साथ शुरू होती है जिसके बूते आज दुनिया और दुनिया को तबाह कर देने की क्षमता रखने वाले परमाणु बम हैं। आर्यभट्ट का शून्य आविष्कार मेरी ही सृजनतात्मकता का प्रमाण है।

इतिहास गवाह है मेरे संघर्षमय और शानदार अतीत का। विश्व को गणतंत्र का पाठ देने के अलावा शांति और अहिंसा के बूते समाज बदलने का संदेश भी मैंने ही दिया। मैंने ही बताया कि इंसान होना केवल मनु के चार वर्णों का सदस्य होना नहीं है। बौद्ध धर्म का विस्तार मेरे वैश्विक होने का सजीव प्रमाण है। फिर संघर्षों की अंतहीन दास्तां इतिहास में भरी पड़ी हैं। मेरी धरती पर किस-किसने हैवानियत का नंगा नाच किया। किसने इंसानियत की मिसाल कायम की और किसने मेरी सांस्कृतिक विरासत में चार चांद लगाये। सब दर्ज है मेरे अंतर्मन में।

दिनकर का जोश, नागार्जुन की पीड़ा, भिखारी ठाकुर का प्रतिरोध, फणीश्वर नाथ रेणु की संवेदनशीलता। सबमें मैं ही तो था और आज भी मैं ही हूं जो देख रहा हूं। अपनी ही आंखों से। कैसे शासकों ने मुझे तरह-तरह से विभाजित किया। झारखंड के अलग होने का दर्द तो मुझे भी है। लेकिन एक खुशी भी कि कुछ तो नया हुआ। ऐसी ही सुखद पीड़ा तब बंगाल को भी हुई होगी जब मुझे उससे अलग किया गया था। वह तो आज का ही दिन था।

मैं अबतक राजनीति का सबसे बड़ा गवाह रहा हूं। मीरकासिम और मीरजाफर की राजनीति से पहले जरासंध की राजनीति भी मैंने अपने ही आंखों देखा-समझा है। महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह मुझसे ही शुरू हुआ जो अंतत: अंग्रेजों को स्वदेश भेजने के बाद ही समाप्त हुआ।

बहरहाल बाद के दिनों की राजनीति सुखदायक भी है और पीड़ादायक भी। कई किस्से-कहानियां दफन हैं मेरे सीने में अभीतक। कई अच्छी यादें भी हैं। खासकर यह कि लोकतंत्र में राजा रानी के पेट से नहीं जनादेश से पैदा होता है। खैर यह मेरा आगाज है। अंजाम नहीं। अभी तो कमेरूओं का भरपेट खाना, नौनिहालों का चहचहाना, महिलाओं के अस्तित्व का विस्तार होना शेष है। हां अभी नया सवेरा होना शेष है।

21वीं सदी के भारत में राजनीति का बदलता स्वरुप !!

- सागरिका चौधरी

गुजरात हिंदुत्व की प्रयोगशाला है. और अब यूपी में इसे दुहराया जा रहा है. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति के साथ इसकी शुरूआत हो गयी है. दिक्कत ये है कि गुजरात एक्सपेरिमेंट परेशान करने वाला ट्रेंड है. जिसके तहत राज्य में वोटर के धर्म आधारित ध्रुवीकरण के द्वारा प्रदेश का मुख्यमंत्री लाइमलाइट में आता है और अपने प्रतिद्वंदियों को रास्ते से हटाता है, सत्ता के शीर्ष पर पहुचने के लिए. ऐसी राजनीति में किसी तरह के आदर्श की कोई जगह नहीं, जनता के कल्याण के लिए कोई जगह नहीं. महज धर्म, और धर्म आधारित राजनीति.

जो धर्म व्यक्ति के कल्याण के लिए था, अब लोगों में भय फैलाने का माध्यम हो गया है. भले देश में रोजी, रोटी, रोजगार, शिक्षा जैसे मुद्दों पर काम करने की जरुरत है, पर इन मुद्दों को दरकिनार करके लोगों को धर्म का डोज दिया जा रहा है. सोशल मीडिया पर दिन रात बस धर्म और धर्म विषयक मुद्दों पर चर्चा चल पड़ी है. अगर कोई विदेशी इस देश में सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे विषयों को पढ़े, तो वो सोचेगा कि क्या ये 21वी सदी के लोग चर्चा कर रहे हैं. क्यों धर्म को नफरत फैलाने का जरिया बना कर रख दिया गया है?

2019 का लोकसभा चुनाव काफी खतरे का संकेत देता है. अगर यूपी के मुख्यमंत्री अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए गुजरात मॉडल को फॉलो करने लगें, तो फिर भारत के सबसे बड़े प्रदेश में अशांति, हिंसा का राज फैलने में देर नहीं लगेगी. उनके अब तक के वक्तव्य उनके मंसूबों की ओर इशारा करते हैं.

नए ट्रेंड को देख कर लग रहा है कि देश की राजनीती और प्रशासन को चलाने के लिए अब मॉडर्न एजुकेशन की जरुरत नहीं है, अब तो बस वेद, उपनिषद, पुराण ही पढना उचित रहेगा. और हाँ. अब किसी मठ से जुड़ जाना उचित रहेगा.

विकास का नारा लगाने वाली भाजपा को आधुनिक शिक्षा से परहेज दिख रहा है. और मठाधीश से इन्हें कुछ ज्यादा ही लगाव महसूस हो रहा है. और ये हो रहा है 21वी सदी के भारत में. (लेखिका जदयू की युवा नेत्री हैं)

बदल गयी है उच्च सदन की परिभाषा, कई सदस्यों पर हैं आपराधिक मामले

दोस्तों, कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बिहार विधानमंडल के उच्च सदन यानी बिहार विधान परिषद की परिभाषा बदल गयी है। पहले यह माना जाता था कि इस सदन में बुद्धिजीवियों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्ध लोग सदस्य होते थे। परंतु अब स्थिति पूरी तरह बदल गयी है। चूंकि लोकतंत्र में सभी सदस्यों का निर्वाचन नियम सम्मत होता है लिहाजा सवाल अधूरा ही है कि परिभाषा बदलने की वजहें क्या हैं।

एडीआर यानी एसोशिसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफामर््स की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार विधान परिषद में ऐसे कई सदस्य हैं जिनके उपर अनेक संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। ये सदस्य केवल किसी पार्टी विशेष के नहीं बल्कि सभी दलों के प्रतिनिधि हैं। मसलन भाजपा के सदस्य दिलीप कुमार जायसवाल स्थानीय प्राधिकारों के द्वारा निर्वाचित सदस्य हैं। इनके उपर चुनाव में धांधली से लेकर घूसखोरी तक के मामले दर्ज हैं। वहीं निर्दलीय रीतलाल राय के उपर हत्या का प्रयास, डकैती, लूट जैसे अति गंभीर मामलों में कुल 14 मामले दर्ज हैं। फिलहाल ये जेल में बंद हैं और जेल से ही सदन की कार्यवाहियों में भाग लेने आते हैं।

वहीं सत्ता पक्ष यानी महागठबंधन के दलों के भी कई सदस्यों के उपर गंभीर मामले दर्ज हैं। मसलन स्थानीय प्राधिकार के तहत निर्वाचित राजद के राधा चरण साह के उपर कुल चार मामले दर्ज हैं। इनमें तीन गंभीर मामले हैं। जदयू के सलमान रागीब के उपर भी कुल 4 मामले दर्ज हैं। इनमें गंभीर मामलों की संख्या तीन है।

भाजपा के एक अन्य सदस्य राजन कुमार सिंह का निर्वाचन भी स्थानीय प्राधिकार के तहत हुआ है। इनके उपर कुल सात मामले दर्ज हैं। इन मामलों में फर्जीवाड़ा करने से लेकर चोरी आदि शामिल है। जदयू के मनोज यादव, दिनेश प्रसाद सिंह, अशोक अग्रवाल(निर्दलीय निर्वाचित लेकिन वर्तमान में भाजपा के साथ), जदयू सदस्या मनोरमा देवी, राजद के सुबोध कुमार, भाजपा के रजनीश कुमार सहित कई ऐसे सदस्य हैं जिनके उपर कई आपराधिक मामले हैं।

बहरहाल बिहार विधान परिषद में कुल 12 सीटें ऐसी हैं जो प्रावधानों के मुताबिक प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, कलाकारों और साहित्यकारों के लिए आरक्षित हैं। राज्य सरकार की अनुशंसा पर इन सदस्यों का मनोनयन राज्यपाल द्वारा किया जाता है। परंतु वर्तमान में इन सीटों पर अपवादों को छोड़ दें तो यह पूरे प्रावधान पर ही सवाल खड़ा करता है। 

संपादकीय : अखिलेश यादव का बड़ा जिगर

दोस्तों, यूपी की जनता ने विकास को दरकिनार कर उग्रवादी हिन्दुत्व को अपनाया। परिणाम सामने है। केवल मुसलमानों के खिलाफ़ विष वमन करने वाले आदित्यनाथ यूपी के सीएम बने हैं। वैसे यूपी की जनता के फ़ैसले को पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बड़ी ही सहजता और सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया। यहां तक कि वे आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे और उन्हें बधाई भी दी। अखिलेश का यह कहना कि उन्होंने यूपी की जनता को एक्सप्रेस वे बनाकर दिया, लेकिन यूपी की जनता ने बुलेट ट्रेन के लिए वोट किया, उनकी राजनीतिक कुशलता को तो साबित करता ही है। साथ ही ऐसा कहकर उन्होंने आदित्यनाथ सरकार के लिए एक मानदंड भी रख दिया है।

दरअसल ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब जनता को विकास रास नहीं आया। इससे पहले वर्ष 2005 में लालू प्रसाद के नेतृत्व में हुआ सामाजिक विकास भी बिहार की जनता को रिझा नहीं पाया था। एक और बड़ा उदाहरण आंध्रप्रदेश में एन चंद्राबाबू नायडू की हार थी जिन्होंने हैदराबाद को साइबराबाद में तब्दील कर दिया था।

असल सवाल विकास और जनता की जरुरत के बीच सामंजस्य स्थापित करने का है। मसलन बिहार की जनता ने पहले तो लालू प्रसाद के नेतृत्व में सामाजिक विकास को स्वीकार किया और वर्ष 1995 में उन्हें ऐतिहासिक जनादेश दिया। लेकिन बाद में जनता की उम्मीदें बढ गयीं। वह आधारभूत संरचनात्मक विकास भी देखना चाहती थी। लेकिन तब बिहार संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा था। एक तरफ़ नक्सल समस्या से बिहार को निजात दिलाने की चुनौती थी तो दूसरी झारखंड को अलग करने की पीड़ा। संसाधनों का अभाव भी चरम पर था। खैर लालू  प्रसाद ने तमाम विषमताओं के बावजूद बिहार को लांचिंग पैड दे दिया। सबूत यह कि वर्ष 1990 में जब उन्हें सत्ता मिली थी तब बिहार के खजाने में करीब साढे पन्द्रह हजार करोड़ अतिरिक्त देनदारी थी और वर्ष 2005 में जब सत्ता का हस्तांतरण हुआ तब करीब खजाने में 6000 करोड़ रुपए अतिरिक्त थे।

लेकिन जनता खजाना नहीं काम देखती है। उसने नीतीश कुमार को चुना। उन्होंने जनता की इस उम्मीद को समझा और अपने पहले कार्यकाल में आधारभूत संरचनात्मक विकास को प्राथमिकता दी। उनका साथ तब केंद्र में मंत्री रहे बिहार के लिए समर्पित लालू प्रसाद ने भी दिया। आज भी यूपीए-1 के दौरान केंद्र से बिहार को मिली राशि एक उदाहरण है।

बहरहाल मामला अखिलेश यादव का है, जिन्होंने धर्मनिरपेक्ष और विकसित यूपी को साकार करने का प्रयास किया। अब बारी आदित्यनाथ की है। देखना है कि यूपी की सेक्यूलर मर्यादा तार-तार होती है या सीएम बनने पर आदित्यनाथ का चरित्र बदलता है और वे यूपी को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं। वैसे एक लोकोक्ति यह भी है कि आदमी का नेचर और सिग्नेचर नहीं बदलता है।

 

Polluting Universities with Sectarian mindset

Delhi University-Ramjas College Protests

- Ram Puniyani

Universities are an important place for shaping the mind and opinions of the future generations. A free open debate, intermingling of different opinions, castes, and religions shapes the students towards humane inclusive values. The academic work along with the idealism of youth adds up to the better perceptions of World and society. With new dispensation coming to power from last couple of years the matters are being influenced in a narrow direction by various means, one of which is preventing the debates, the other is a more alarming, to create pretexts to attack the liberal democratic tendencies within the campus. The matters which developed in Ramjas College (22nd February 2017 onwards) give an idea of the plan of right wing politics as far as atmosphere in Universities is concerned.

 

A two days seminar was organized, two of the speakers being Omar Khalid Shehla Rashid. On the pretext that they are anti national, the seminar was obstructed-stopped and students and teachers who were for holding the seminar were attacked on the ground of supporting anti national ideas. The attack was done by ABVP, the student wing of RSS. Next day they practically held the teachers and students as hostage, not permitting them to go to the police station to lodge the FIR. Two of the teachers were openly beaten by these students. Following this a Tiranga (tricolor flag) march, was taken out. And the day next a huge ‘DU bachao’ (Save Delhi university) march participated by thousands of students-teachers and supporting students from other colleges also took place. It did show the degree of resistance to tactics of ABVP.

 

The attack on the Ramjas College-Delhi University is the latest in the series of attacks orchestrated by ABVP in different campuses. In Hyderabad Central University, the attack was launched on the ground that Anti-National, castiest activities are going on in the campus. What were these activities which were dubbed as anti national? The Ambedkar Students Association (ASA) had organized the screening of the film Muzzafarnagar Baki hai, (A film on Muzzafarnagar violence), had called for abolition of death penalty as a form of punishment (Yaqub Memon) and had organized beef festival in solidarity with those who consume beef in the country, as they are under attack from the ‘Holy Cow’ squads. It is too well known as to how institutional murder of Rohith Vemula took place and that led to the massive response all over the country as along with University autonomy the issue was also related to dalit issues, attack on Ambedkarite ASA.

 

How anti-nationalism as a weapon is constructed becomes clear if we put JNU and DU together in a sequence. In JNU, to put the things chronologically, some masked men had come, shouted the slogans. Kanhaiya Kumar, Umar Khalid and their friends were arrested on the charges of sedition: anti-nationalism. The interesting point is that the CD which was shown repeatedly by a channel turned out to be a doctored CD and more interestingly while Kanhaiya Kumar and company were arrested, the masked men were not! The court gave bail to Kanhiaya Kumar, Umar Kahlid. Recently Mr. Arvind Kejriwal has accused that BJP-ABVP people themselves shout slogans and then flee.

 

Despite that; all the BJP spokespersons top down picked up that JNU, students were shouting ‘Bharat Ki barbadi’ (Destruction of India) type slogans. The point is despite a lapse of one year investigation is not clear; there are lots of holes in the story, raising lots of questions. In Ramjas College case also the name of Umar Khalid is being repeatedly thrown up. Umar Khalid has an opinion on Kashmir etc. which may not match with the opinion of those attacking him. The point is in the discussion and debate, should we bypass people with opinions different from ours’. More so when ABVP’s brother organization BJP is having a coalition Government with PDP in Kashmir and PDP has been soft to separatists at times. Clearly it seemed that BJP on one hand, as per RSS agenda wants to communalize the educational campuses and on the other intimidate those whose opinions are different from Hindu nationalist ideology.

 

The assertiveness of ABVP in indifferent campuses has gone up with the Modi Sarkar coming to power. Their indulgence in violence is due to the confidence that they can get away with whatever they do as they have mentors who are in the seat of power. This has given their aggression a boost like never before. One after the other colleges and universities are being targeted in the agenda of sectarianism. The case of Jai Narayan Vyas University (Jodhpur) is also a fairly recent one. One Prof Ranawat invited Prof Nivedita Menon of JNU for a talk. After the talk a complaint has been filed against the speaker and the organizer Prof Ranawat has been suspended. The matters are very disturbing. So what are the hopes for future?

 

In the aftermath of Rohith Vemula’s death; the nationwide uprising of students; and the coming to fore as issues of dalits has shaken the youth. Even in Ramjas College-Delhi University episode, while the ABVP’s Tiranga march drew a lukewarm response the liberal, progressive student groups’ ‘DU bachao march’ (Save Delhi University) was massive. At the same time the disturbing part of the whole episode is the trolling of Ramjas Student Gurmehar Kaur. She wrote a face book post that she is not afraid of ABVP that she is for Peace etc. In response BJP leaders and celebrities came down heavily on her. This has further infuriated the students and now there is a clear cut opinion for open debate in the campus. While ABVP debates through violence, the need to debate in seminar rooms is what is being supported by large section of students. The ploy to raise the bogey of Anti Nationalism, and indulge in violence may not work and the attempt to save the culture of debate and discussion in seminar rooms cannot be browbeaten easily.

जम्हूरियत का वास्ता इंसानियत से, हैवानियत से नहीं : बलियावी

राम और बुद्ध से कुछ सवाल ... औरतों के हवाले से

- असीमा भट्ट 

बिहार दिवस के मौके पर सवर्णों का विधवा विलाप

दोस्तों, ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि बिहार सरकार द्वारा बिहार दिवस का आयोजन किया गया और सवर्ण बुद्धिजीवियों द्वारा विधवा विलाप किया जा रहा है। एक तरफ़ वे इस पूरे आयोजन के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ वे इस बात का रोना भी रो रहे हैं कि उनके प्रातः स्मरणीय अराध्यों की पूजा क्यों नहीं की जा रही है।

 

उनका कहना है कि बिहार दिवस के मौके पर सरकार पानी की तरह करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। यदि यही पैसे शिक्षा विभाग की बेहतरी पर खर्च किये गये होते या फ़िर इन पैसों का इस्तेमाल किसी उद्यम के लिए किया जाता तो हजारों परिवारों को रोजगार मिल सकता था।

 

दिलचस्प यह है कि जो यह दलील दे रहे हैं, वे ही जब सूबे की सरकार में भाजपा शामिल थी तब बिहारी अस्मिता के जोश में हुंकार भरते थे। अब चूंकि बिहार में भाजपा की जगह राजद है तो वे विलाप कर रहे हैं।

 

खैर वर्तमान में उनका विधवा विलाप की एक वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। उनका कहना है कि इस ऐतिहासिक मौके पर सरकार ने राजेन्द्र प्रसाद, सच्चिदानंद सिन्हा जैसों को भूला दिया, जिन्होंने बिहार को बंगाल से अलग करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन किया था।

 

आश्चर्य होता है जब वे इस तरह का विधवा विलाप करते हैं। यह सभी जानते हैं कि किन परिस्थितियों में अंग्रेजों ने बंगाल को बांटकर बिहार बनाया और किन परिस्थितियों में बिहार को बांटकर पहले वर्ष 1935 में उड़ीसा और वर्ष 2000 में झारखंड बना। गौर से इन सभी पर मनन करें तो सत्ता स्वार्थ ही केंद्रीय विषय रहा है।

 

बहरहाल इतिहास केवल वही नहीं है जो भारतीय द्विजों ने लिख रखा है। इतिहास के उन्हीं पन्नों में उनके काले कारनामे भी हैं। मसलब उस समय के सवर्ण बुद्धिजीवियों ने अपने सत्ता संपोषित लाभ के लिए बिहार को बंगाल से अलग कराया था। इसके विरोध में तब साइमन कमीशन गो बैक के नारे भी लगे थे और बंग-भंग आंदोलन का दौर भी चला था। उस समय के दौर को देखें तो यह बात स्पष्ट होती है कि जिनके नाम पर बिहार के सवर्ण आज घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं, वे दरअसल अंग्रेजों के पिट्ठु थे। और कुछ भी नहीं।

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